Thursday, December 17, 2009

पता नहीं, प्रोसेसर स्लो है या हार्ड डिस्क फुल?

आज सुबह ऑफिस जाने की हड़बड़ी में था तभी देखा कि पापा जी का फोन आ रहा है.. और इससे पहले भी तीन बार उनका फोन आ चुका था जिसका मुझे पता नहीं चल सका.. उन्होंने बताया कि मेरे लिये किसी सईद का फोन आया था और उन्होंने मेरा नंबर उसे दे दिया है..

मैं तब से ही सोच रहा हूं कि ये सईद कौन है? और उसके पास मेरे घर पटना का नंबर कैसे आया? क्योंकि पटना में सबसे पहले जो नंबर लिया गया था वो अब बदल चुका है, और मेरे बहुत पुराने मित्रों, जिनसे मैं 5-6 साल से नहिं मिला हूं, के पास वही पुराना नंबर होगा.. और नया नंबर मेरे चुनिंदा मित्रों के ही पास है..

खैर!! जब से सुना हूं तब से मेरे हार्ड डिस्क में सर्चिंग चालू है.. मगर यह नाम अभी तक मिला नहीं.. अब मुझे समझ नहीं आ रहा है कि ये नाम सर्च करने में लगने वाले समय के पीछे कारण क्या है?

कुछ कारण मैंने खोजे हैं, बाकी कुछ चाहें तो आप भी जोड़ सकते हैं -
1. या तो मेरे हार्ड डिस्क में बहुत सारा डाटा है.
2. या फिर मेरा प्रोसेसर स्लो हो गया है.
3. या फिर वह नाम हिडेन मेमोरी में चला गया है.
4. या फिर साफ्टवेयर करप्ट हो गया है!!!!


और अगर वह डाटा मेरे मेमोरी में है ही नहीं तो यह सर्चिंग प्रोसेस इंफायनाईट लूप में क्यों चला गया है? कुछ तो गड़बड़ जरूर है.. :)

खैर जो भी हो, अगर उसे काम होगा तो वह खुद ही फोन करेगा.. :)

Wednesday, December 16, 2009

अब भी उसे जब याद करता हूं, तो बहुत शिद्दत से याद करता हूं

समय के साथ बहुत कुछ बदला है.. मैं भी बदला हूं, मेरी सोच के साथ-साथ परिस्थितियां भी बदली है.. कई रिश्तों के मायने बदले हैं.. पहले जिन बातों के बदलने पर तकलीफ़ होती थी, अब उन्ही चीजों को देखने का नजरिया भी बदला है और उन्हें उसी रूप में स्वीकार कर आगे बढ़ने की प्रवॄति भी आ गई है.. जिन चीजों के बदलने पर तकलीफ होती थी अब उन बातों को आसानी से स्वीकारने भी लगा हूं..

जिस मित्र के साथ हर बात बांचते थे और जिसके पास मेरे बैंक एकाऊंट का पासवर्ड होना भी कोई मायने नहीं रखता था, अब उन्ही मित्रों से कई बाते छुपा जाया करता हूं.. वे भी अमूमन वैसा ही करते हैं, जैसा मैं करता हूं.. वे भी तब वैसा ही करते थे जैसा मैं करता था.. मुझमें और उनमें कोई अंतर बाकी ना रहा.. ना तब, और ना अब..

पहले कुछ भी अपना नहीं होता था, अब कई चीजें सिर्फ अपने लिये होने लगी हैं.. कभी-कभी लगता है कि कहीं स्वार्थी तो नहीं होता जा रहा हूं? मगर फिर लगता है कि अगर यह स्वार्थीपना है तो हम चारों ओर स्वार्थियों से ही घिरे हुये हैं.. वहीं कभी आशावादी तरीके से भी सोचता हूं.. सोचता हूं कि यही तो जीवन का सत्य है.. मानव स्वभाव है.. इसमें स्वार्थीपना कहीं भी नहीं है.. हर कोई अपना एक स्पेस चाहता है, तो उस स्पेस में क्यों जबरन घुसा जाये?

अपने शहर में जाता हूं तो अपने घर के इर्द-गिर्द कई नये बेजान से मकानों को देखता हूं.. हर छः महिने में कम से कम 2-3 नये मकान.. उस मैदान पर जहां मैं क्रिकेट खेला करता था और जिस पर 2-3 टीम एक साथ खेलती थी, उस पर अब एक छोटी सी टीम के खेलने लायक जगह भी नहीं बची है.. बदलावों के बयार में तो हर कुछ बह रहा है..

अब रोना कम हो गया है.. पहले हर इमोशनल बातों पर रोना आता था.. अब वैसी बाते आने पर हंसी आती है.. खिसियानी हंसी.. लगता है जैसे खुद को धोखा देने कि कोशिश में लगा हूं.. दुनिया को दिखाना चाहता हूं कि देखो, मैं कितना प्रैक्टिकल हो गया हूं.. प्रक्टिकल होना या प्रोफेशनल होना अब भी मेरी समझ के बाहर की चीज है.. अब हर बात को पॉलिटिकली करेक्ट करने की कोशिश अधिक लगती है बजाये की दिल कि बात कही जाये.. प्रैक्टिकल होना या प्रोफेशनल होने का अभी तक एक ही मतलब समझ पाया हूं, महसूस कम करना.. कुछ भी महसूस ना करना.. जो जितना कम महसूस करता है, वह उतना ही प्रैक्टिकल है..

एक बात तो समझ में आती है कि मैंने मन में गांठ बांध लिया है की "बदलाव ही जीवन का अटूट सत्य है".. देर से ही सही, समझ में तो आया.. अब तुम्हारा वह पहाड़ी वाला शहर भी अधिक तकलीफ़ नहीं देता है, और ना ही यादों में अधिक ढ़केलता है.. सच कहूं तो तुम्हारे उस शहर में जाकर अंतरमन में रस्साकस्सी बहुत अधिक चलती है.. दिल उन यादों में डूबना चाहता है, मगर दिमाग कहीं और खींचना चाहता है..

कुछ दिन पहले उसी शहर में रहने वाला एक मित्र पूछ बैठा था तुम्हारे बारे में, "क्या उसे अब भी याद करते हो?" "ना!!" तुरत जबान से निकल पड़ा.. आधे मिनट की चुप्पी के बाद मैंने कहा, "अब यादों में डूबे रहना जमाने को प्रैक्टिकल नहीं लगता है.. मगर अब भी उसे जब याद करता हूं, तो बहुत शिद्दत से याद करता हूं.." पता नहीं क्यों, मैं उससे झूठ नहीं बोल पाया.. मगर कई बातें नहीं कह पाया.. जैसे.. उस शहर में अब भी तुम्हारी खुश्बू महसूस करना चाहता हूं, मगर अब उस अहसास का पीछा नहीं करता हूं.. समझ गया हूं.. यह एक मृग-मरिचिका से अधिक और कुछ नहीं है..

चलते-चलते : एक बात जो समझा हूं, एक चीज कभी नहीं बदलती है.. चाहे सारा जमाना बदल जाये.. सारे रिश्तों के मायने बदल जाये.. ब्रह्मांड के बदलाव के नियम को झूठलाते हुये ना बदलने वाली चीज है, मां-पापा का प्यार और स्नेह..

Tuesday, December 15, 2009

DDLJ के जादू का बाकी है असर


कुछ महिने पहले "दिलवाले दुल्हनियां ले जायेंगे" के 14 साल पूरा होने के अवसर पर मैंने अपनी याद अजय जी के ब्लौग चव्वनी छाप पर आप लोगों से बांटा था.. आज उसे ही अपने ब्लौग पर भी बांचे जा रहा हूं.. डीडीएलजे ऋंखला के बाकी लेख पढ़ने के लिये इस लिंक पर जायें..

आजकल जिसे देखो वही डीडीएलजे की बातें कर रहा है.. करे भी क्यों ना? आखिर इसने चौदह साल पूरा करने के साथ ही जाने कितने ही लोगों और लगभग दो पीढि़यों को प्यार करना सिखाया होगा.. चलिये सीधे आते हैं अपने अनुभव के ऊपर..

उस समय हमलोग आधा पटना और आधा बिक्रमगंज में रहते थे.. पापा बिक्रमगंज में पदस्थापित थे और हम बच्चों की पढ़ाई-लिखाई के चलते एक घर हमें पटना में भी लेकर रखना पड़ा था, क्योंकि बिक्रमगंज में "केंद्रीय विद्यालय" नहीं था.. उस समय हमारे घर में सिनेमा हॉल जाकर फिल्म देखने का प्रचलन लगभग ना के बराबर ही था और डीडीएलजे से पहले हमने अंतिम बार किसी सिनेमा हॉल में जाकर सिनेमा कब देखा था यह भी मुझे याद नहीं है.. हमलोग नये-नये जवान होना शुरू हुये थे और इस सिनेमा के आने से घर में हमारी जिद शुरू हो चुकी थी कि इसे देखेंगे तो सिनेमा हॉल में ही..

स्कूल में कई लड़के स्कूल से भागकर यह सिनेमा देखने जाते थे.. जिस दिन उन्हें स्कूल से भागकर सिनेमा देखना होता था उससे एक दिन पहले ही सभी मिलकर प्लानिंग करते थे.. शायद 10 साल बाद आये रौबिन शर्मा के उपन्यास(द मौंक हू सोल्ड हिज फरारी) का एक पंच लाईन वे उसी समय समझ गये जिसे रौबिन शर्मा को समझने में 10 साल और खपाना पड़ा.. "If you fail to plan, means you are planning to fail.." और उनका प्लान कभी फेल होता भी नहीं था.. वे पैसे का इंतजाम कहां से करते थे, यह भी मुझे नहीं पता चलता था और ना ही इतनी हिम्मत थी की स्कूल से भागकर उनके साथ सिनेमा देखने जा सकूं.. उन दिनों हर दिन कोई ना कोई नया डायलौग हमारे सामने होता था और हर लड़की 'सेनेरिटा' होती थी.. अगर कोई अच्छी लग रही है तो वह 'सेनेरिटा'.. अगर किसी का नाम नहीं जानते हैं तो वह 'सेनेरिटा'.. राह चलते कोई दिख जाये तो वह 'सेनेरिटा'..

खैर घर में पापा को मनाया गया.. पापाजी मान भी गये.. संयोग से उस समय पापाजी पटना आये थे और हमारे जिद के आगे झुक कर रिजेंट सिनेमाहॉल की ओर भी बढ़े.. आज भी उस रोमांच की याद ताजा है, क्योंकि जाने कितने ही साल के बाद सिनेमाहॉल के दर्शन होने वाले थे.. ना हमे पता था और ना ही पापा जी को, कि पटना के सिनेमा हॉल के टिकट के लिये कैसी मारा-मारी होती है.. सो बिना अग्रिम बुकिंग किये ही हम वहां पहूंच गये थे, और टिकट वाली खिड़की पर हाउसफुल का बोर्ड हमारा मुंह चिढ़ा रहा था..

वहीं एक बच्चा मिला जो टिकट ब्लैक कर रहा था.. अधिक से अधिक 12-13 साल का होगा.. उसने बताया की उसके पास फर्स्ट क्लास का टिकट है.. हम सभी खुश, वाह जब नाम ही है फर्स्ट क्लास तो सीट भी आरामदायक होगा.. 15 रूपये प्रति टिकट ले कर हम सिनेमाहॉल के अंदर गये.. अंदर जाने पर पता चला की अच्छा फर्स्ट क्लास हॉल के सबसे आगे वाली सीट को कहते हैं.. बामुश्किल हम वहां 15-20 मिनट बैठे और उसके बाद वहां बैठे लोगों के हुल्लड़ हंगामे के चलते हमें बाहर का दरवाजा देखना पड़ा.. जब हम वहां से उठकर जा रहे थे तब वहां के सभी लोगों की नजर हम पर ही थी कि पूरा परिवार अचानक से क्यों जा रहा है..

घर में जाने कितने ही दिनों तक इसके गाने बजते रहे.. इसकी ऑडियो सीडी भी खरीदी गई जिसकी कीमत तब शायद 275 रूपये थी.. उन दिनों भैया को विडियो कैसेट खरीद कर जमा करने का नया-नया शौक जागा था.. वे इंतजार में थे कि कब इसका ओरिजिनल कैसेट बाजार में आये और इसे खरीदा जाये.. उन दिनों सिनेमा और संगीत के बाजार में गहरी हलचल मची हुई थी.. लोग वीसीपी और वीसीआर से वीसीडी प्लेयर की ओर जा रहे थे.. कैसेट की जगह सीडी ले रहा था.. इन्ही सबके बीच जाने कब डीडीएलजे का ओरिजिनल कैसेट बाजार में आया और गुम हो गया.. आज हाल यह है कि कम से कम बीस बार यह सिनेमा देखने के बाद भी जब कभी किसी चैनल पर यह आ रहा होता है वहां रिमोट कुछ क्षण के लिये ठिठकता जरूर है.. मगर यह सिनेमा इतनी आसानी से उपलब्ध होने के बाद भी आज मेरे एक्सटर्नल हार्ड डिस्क में नहीं है जिसमें कम से कम 250-300 सिनेमा पड़ी हुई है..

चाहे कुछ भी हो, मगर इस सिनेमा के जादू का असर अब भी कहीं ना कहीं बाकी जरूर है जिसने होश संभालने के बाद सिनेमा हॉल का दर्शन भी कराया और उसके बारे में जिज्ञास भी जगाई.. इसके जादू के असर कितना था यह आप इससे जान सकते हैं कि जब मैं तमिलनाडु आया तब किसी भी स्थानिय व्यक्ति से, जो हिंदी नहीं जानता था, से हिंदी गाना गाने के लिये कहता था तो वह टूटी-फूटी हिंदी में "तुझे देखा तो ये जाना सनम" ही सुनाता था(और है भी)..

Sunday, December 13, 2009

एक कविता कोडिंग पर

कोई अपने ही घर में चोरी करता है क्या? नहीं ना? मगर मैंने किया है.. ज्ञान जी के शब्दों में यह रीठेल है.. यह कविता मेरे एक बेहद पुराने पोस्ट पर डा.अमर जी ने कमेंट किया था जिसे यहां ठेले जा रहा हूं.. आजकल ब्लौगिंग करने की फुरसत भी नहीं है और कुछ लिखने की इच्छा भी नहीं, तो सोचा क्यों ना अपना शौक कुछ इसी तरह पूरा कर लूं, अपने ही पोस्ट से चुरा कर कुछ डालता चलूं.. :)

तुम भी तो कोडिंग किये जा रहे हो,
हम भी ये कोडिंग किये जा रहे हैं,
ज़हन में दोनों के खयाल है लरज़ा,
क्यों बेसाख़्ता ज़िंदगी जिये जा रहे हैं ??

ये डिफेक्टों की लिस्ट में ये बगों का सामना,
दोनों ही बैठे किये जा रहे हैं,
PM ही जीता है लड़ाई में आखिर,
ज़ख़्म क्यों हम ही झेले जा रहे हैं ??

रहे सामने वो क्लायंट की हाज़िरी में,
हम ही क्यों पर्दे के पीछे जा रहे हैं !!
C.E.O. के Ethics किसी ने न देखे,
हमें ही सारी ट्रेनिंग दिये जा रहे हैं !!

HR यहां है, Manager वहां है,
हमारे सिवा क्या मैनेज किये जा रहे हैं ??
ब्रेक-डाउन में सैलरी के किये हैं घपले,
हम हैं कि सब कुछ सहे जा रहे हैं !!!

पता है हमें भी, पता है तुम्हें भी,
कि सपने कैसे कैसे बुने जा रहे हैं !!
कभी न कभी तो PM बनेंगे,
अरमान यही दिल में किये जा रहे हैं !!

करेंगे वो ही जलसे, के घूमेंगे हम भी,
प्लानिंग अभी से किये जा रहे हैं…
हैं हम भी ढक्कन! कि कोडिंग के बदले
ये फालतू की लाईनें लिखे जा रहे हैं …

Wednesday, December 02, 2009

बैंगलोर में मार-कुटाई की बातें

दो लोग मेरी जिंदगी में ऐसे भी हैं जिन्हें देखते ही धमाधम मारने का बहुत मन करने लगता है.. पता नहीं क्यों.. एक को तो अबकी पीट आया हूं और दूसरे को धमका आया हूं कि जल्द ही आऊंगा, मार खाने को तैयार रहना.. यह मत सोचना कि लड़की समझ कर छोड़ दूंगा.. :)

ये दोनों ही मेरे कालेज के मित्र हैं.. पहले जब कभी बैंगलोर जाना होता था तब मेरी प्राथमिकता में तीन लोग हुआ करते थे, जिनसे मिले बिना मैं नहीं आना चाहता था, बाकी काम बाद में.. चंदन, प्रियंका और रविन्द्र.. जिसमें चंदन और प्रियंका मेरे एम.सी.ए. के मित्र हैं और रविन्द्र मेरे उन सबसे पुराने मित्रों में से है जिससे पहले पहल पटना में दोस्ती हुई थी.. अबकी बार बैंगलोर गया तो एक नाम और जुड़ गया, नीता.. यह भी एम.सी.ए. वाले दोस्तों में से ही है.. बैंगलोर शिफ्ट हुये जुम्मा-जुम्मा चार दिन भी नहीं हुये हैं इसे.. अबकी बार बैंगलोर गया तो नीरज और गार्गी से भी मुलाकात होनी थी, या यूं कहें कि उन्हीं दोनों से मिलने के लिये खास बैंगलोर गया था(चंदन, प्रियंका और नीता अभी बैंगलोर से कहीं भागने वाले भी नहीं हैं).. नीरज के भैया की शादी ती और उसी कारण से वे दोनों कलकत्ता से बैंगलोर आये थे..


बायें से - मैं, नीता और चंदन

अबकी बार बैंगलोर के लिये निकला तो अपने लिस्ट में दो और नाम जुड़े हुये थे जिनसे मुलाकात करने की बहुत इच्छा थी, मगर मुलाकात हो ना सकी.. पहला नाम तो पूजा मैडम का था और दूसरा नाम मेरी पटना कि ही स्कूल के जमाने की मित्र निवेदिता उर्फ रोजी थी.. सच कहूं तो रोजी से मिलने से ज्यादा उसकी बिटिया से मिलने का मन अधिक था..

पिछले 3-4 बार से जब भी बैंगलोर गया था तब हमेशा यह शहर मेरा स्वागत ठंढ़ी फुहारों से करता रहा है, मगर शायद यह शहर भी एकरसता से ऊब गया होगा.. तभी इस बार नहीं बरसा.. सुबह-सुबह चंदन के घर पहूंच कर उसकी पिटाई की तब जाकर मन को तसल्ली मिली.. बहुत दिनों से साले को पीटा नहीं था.. :D

पता नहीं शिवेंद्र को इतनी नींद आती कहां से है? और आती है तो रखता कहां है?(एक सिनेमा से इन्सपायर्ड डायलॉग मारा हूं :)).. रात भर सोने के बाद भी चंदन के घर में पहूंचते ही बिस्तर देख लम्बा हो गया.. वह भी मेरे साथ चेन्नई से बैंगलोर आया था.. फिर थोड़ी देर बाद प्रियंका के घर को निकल लिये पेट-पूजा करने को.. मेरे और प्रियंका के बीच पहले ही बात तय हो चुकी थी कि मुझे चिकेन खिलायेगी.. उसने जब पूछा कि शिव कैसे खायेगा? मेरा कहना था, "शिव खाता नहीं है, मगर सूंघने से उसे परहेज थोड़े ही ना है?" खैर चिकेन भी आया और दबाकर खाया भी गया.. शाम में चंदन और शिवेन्द्र की इच्छा ना होते हुये भी, प्रियंका और मैं जबरदस्ती उठा ले गये सिनेमा दिखाने को, कुर्बान नाम है सिनेमा का.. सिनेमा महा बकवास थी, मगर दोस्तों का साथ था यह क्या कम था? फिर घर पहूंच कर दिन का बचा चिकेन भी दबा गया.. उधर नीता दिनभर एक अदद घर की तलाश में भटकती रही..

अगले दिन नीता से भी मुलाकात हुई और नीरज-गार्गी से भी.. कुछ ही महिने पहले इनसे कलकत्ते मे भी मुलाकात हुई थी और शिव भैया(शिव कुमार मिश्रा जी) को भी इनसे मिलवाया था.. वहीं अंतिम बार नीता से भी मुलाकात हुई थी.. मगर इतने पास होने पर भी बैंगलोर जाकर नहीं मिलने का बस एक ही मतलब था कि इन सबसे खूब गालियां खाना.. सोचा कि क्यों ना भैया की शादी का पर्टी ही खा लूं, गालियां खाने को तो ऑफिस है ही.. सो चला आया था यहां..


बायें से - नीता, प्रियंका, शिवेन्द्र, गार्गी, मैं और नीरज(सबसे दाये वाला नीरज का मित्र है जिसका नाम मुझे नहीं पता)

अब शुरू हुआ नीता के इंतजार का सिलसिला जिसके चक्कर में मैंने पूजा और रोजी को मना कर दिया था इस बार मिलने से.. मगर वह तब आयी जब चंदन ने अपने घोड़े(बाईक) को उसके घर तक लगभग 35 किलोमीटर दौड़ाया.. फिर रात ढ़लने से पहले ही उस जगह भी पहूंच ही गये जहां पार्टी चल रही थी.. इसके लिये नीता और प्रियंका भी जिम्मेदार थी जो आश्चर्यजनक रूप से बस 10 मिनट में ही तैयार हो गई थी.. :D

पार्टी में पहूंच कर मैंने नीरज से सबसे पहले बोला, "अबे तू वेटर जैसा नहीं लग रहा है, मुझे तो लगा था की पांच सितारा होटल में तू वेटर जैसा ही दिखेगा.." चलो अच्छा ही हुआ जो उसने मेरे कमेंट को कंप्लीमेंट समझ लिया, नहीं तो पांच सितारा होटल में खाने का मौका हाथ से निकल जाता.. ;)

खैर एक बार फिर से चिकेन दबा कर खाया और निकल लिये ट्रेन पकड़ने को.. आते समय नीता को धमका आया कि चंदन को तो कहीं भी पीट सकता हूं, मगर तुम्हें बीच सड़क पर पीटूंगा तो खुद ही पिट जाऊंगा.. सो यह प्रोग्राम अगली बार के लिये स्थगित..

चलते-चलते : आज(मेरे लिये तो यह अभी भी आज ही है, सुबह उठुंगा तब यह कल होगा :) ) 1 दिसम्बर को नीता का जन्मदिन भी है..

Friday, November 27, 2009

दर्द की कोई उम्र नहीं होती


दर्द की कोई उम्र नहीं होती, वो ना तो एक साल की होती है और ना ही सौ साल की.. चाहे वह 26/11 हो, मुंबई बम ब्लास्ट हो, 2002 गुजरात हो, सिख दंगे हो या कुछ भी.. वह हमेशा उतनी ही सिद्दत से महसूस की जाती है जैसे पहली बार..

ठीक एक साल पहले, जैसी भागम भाग यहां चेन्नई की सड़को पर थी वैसी ही आज भी है.. लगभग वैसी ही गाड़ियों का जमावड़ा, वैसी ही भीड़, वैसा ही ट्रैफिक.. कुछ भी तो नहीं बदला है.. बदला है तो बस एक सवाल.. किसी परिचित के मिलने पर लोग पूछते थे कि मुंबई में क्या हो रहा है? आज भी कुछ लोग मिले, उनका सवाल भी वही था.. बस शहर अलग थे.. मुंबई का स्थान कानपुर ने ले लिया था.. सभी पूछ रहे थे कानपुर टेस्ट का क्या हुआ? मगर इस प्रश्न में चिंता नहीं झलक रही थी, सभी खुश थे कि चलो भारत अच्छे से जीतने के कगार पर पहूंच गया है.. क्रिकेट की चिंता सभी को थी, मगर एक अदद सवाल देश के नाम पर नहीं था..

आज किसी ने एक बार भी मुंबई का नाम नहीं लिया, ऑफिस के कामों के अलावा अगर किसी बात की चर्चा हुई तो वो बस क्रिकेट ही था.. मैंने ही बात आगे बढ़ाते हुये कहा कि आज 26/11 है? तो उसके जवाब में अधिकतर लोगों का रवैया बेहद उदासीन था.. किसी ने भी मेरी बात पर सहमती जताने के अलावा अपनी कोई बात नहीं रखी.. मुझे याद है आज से एक साल पहले की बात.. 26/11 से पहले एक एक करके भारत के लगभग हर बड़े शहर में बम धमाके हो चुके थे, बस एक ही महानगर अछूता था, चेन्नई.. मेरे मन में कहीं ना कहीं ये बात बैठी हुई थी कि आज नहीं तो कल चेन्नई की बारी भी आने वाली है.. खैर यह बातें फिर कभी..

अगर 26/11 कि बात करें तो हमारे इस रवैये पर दो बातें कही जा सकती है.. आप जिसे चाहे आशावादी या निराशावादी कह-सुन सकते हैं..
1. हम बीती ताही बिसारिये कि तर्ज पर पिछले साल के मुंबई को छोड़कर आगे निकल चुके हैं..
2. हम अब इतने असंवेदनशील हो चुके हैं कि इन सब बातों का हम पर कोई असर नहीं होता है..

कुछ भी हो, मुझे तो अब यही लगने लगा है कि देश का गुस्सा जिसे मिडिया ने भी खूब हवा दी थी, किसी पेसाब के झाग की तरह ही था.. जो कभी का बैठ चुका है..

चलते-चलते : कल मैंने अपने और्कुट का कैप्शन कुछ ये लगाया था "न्यूज चैनल को टीआरपी, न्यूज पेपर को सर्कुलेशन और राजनितिज्ञों को चंद मुद्दों मिले, मगर हमें 26/11 से कोई सीख भी ना मिली.."

Thursday, November 26, 2009

ये बूढ़ी पहाड़ियां अक्सर उदास सी क्यों लगती हैं?


जब कभी किसी हिल स्टेशन पर घूमने जाता हूं तो वहां की पहाड़ियां अक्सर मुझे बहुत उदास सी लगती हैं.. लगता है जैसे कुछ कहना चाहती हों.. अपना दर्द किसी से बांचना चाहती हों, मगर उन्हें सुनने वाला वहां कोई ना हो.. लम्बे-लम्बे देवदार के अधिकांश अधसूखे, अधमुर्झाये और जो पेड़ साबूत बचें हो उन्हे बचाने की गुहार की मुद्रा में ये पहाड़ियां मुझे लगती हैं..

जब हमने चेन्नई से अपनी यात्रा शुरू की तब हमने भी उस नियम को निभाया जिसे "इंडियन टाईमिंग" के नाम से जाना जाता है.. सुबह 7.15 पर कार्यालय के सामने मिलने की बात तय करके सभी आराम से आये, और 7.30 में यात्रा शुरू होने के बजाय 8.10 में यात्रा शुरू हुई.. 7.45 के लगभग फनिन्द्र का एक एस.एम.एस. आया की वह किन्ही निजी कारणों से नहीं आ पायेंगे.. कुछ मन तो उदास हुआ मगर उदास होने से क्या होता है, जब जाना ही है तो खूब मजे करके लौटना है, यही सोच कर उसे खुद पर हावी नहीं होने दिया.. रास्ता चेन्नई-बैंगलोर हाईवे से होकर जाता है जो वेल्लोर से कुछ आगे जाकर हाईवे छोड़ येलगिरी की ओर निकल पड़ता है.. वेल्लोर से गुजरते हुये वो पहाड़ी(जहां की तस्वीर अपने ब्लौगर प्रोफाईल में लगा रखी है) और अपना कालेज भी नजर आया और रास्ते में सलमान खान के वांटेड सिनेमा का तमिल संस्करण, जिसके हीरो विजय हैं, भी देखा.. एक-एक सीन हिंदी वाले सिनेमा जैसा ही था..

रास्ते में दो-तीन जगह रूकना भी हुआ और जिस कारण से धीमे-धीमे सूरज भी भी सर पर चढ़कर नीचे उतरने को चल पड़ा.. अंततः सूरज के नीचे भागने से पहले ही हम अपने गंतव्य पर पहूंच गये.. वहां पहूंचते ही, लोग "Where is Mike?" के नारे बुलंद करने लगे.. और मैं सोच रहा था की हम लोग किसी तरह का लाऊडस्पीकर लेकर तो आये नहीं हैं तो ये लोग "Mike" क्यों ढ़ूंढ़ रहे हैं? खैर थोड़ी ही देर मे यह उलझन भी सुलझ गई.. पता चला की "Mike" नाम का व्यक्ति इस रिसोर्ट की देखभाल करता है.. :)

आम तौर पर मैं किसी भी पहाड़ी वाले जगह पर जाते समय, घाटियों से गुजरते हुये ढ़ेर सारे चित्र अपने कैमेरा से लेता हूं, मगर इस बार जाते समय मैंने नहीं लिया.. चलती गाड़ी से वैसे भी कुछ अच्छा आता नहीं है, ऊपर से हर घाटी मुझे एक जैसी ही लगती है(शोले का एक डायलॉग याद आ रहा था, "मुझे तो हर पुलिस वाले की शक्लें एक सी ही लगती है")..

अगर येलगिरी की बात की जाये तो मुझे यह पर्यटन स्थल जैसा नहीं लगा.. अभी तक पर्यटन स्थल जैसी भीड़-भाड़ नहीं है यहां.. ना ही पर्यटन स्थल जैसी सुविधायें हैं, मगर यही कुछ कारण है जिसके कारण मुझे यह जगह बेहद पसंद आया.. वैसे भी जैसे लगभग शहर एक जैसा ही होता है, एक जैसे मॉल, एक जैसी ना समझ में आने वाली सड़कें.. ठीक वैसे ही सारे हिल स्टेशन भी एक से ही लगते हैं मुझे.. कम से कम यहां जीवन का स्वभाविक प्रवाह तो है.. एक जगह है ट्रेकिंग के लिये, जिसके लिये जगह-जगह एक बोर्ड टंगा हुआ है कि क्या करें और क्या ना करें? पता नहीं कितने लोग उन संदेशों का पालन करते हैं? घाटी में घुसते ही ढ़ेर सारे पालीथिन इधर-उधर फेंके हुये देख कर मुझे तो नहीं लगता कि सभी उस तरह के निर्देशों को मानते ही होंगे.. पास में एक छोटी सी झील भी है जहां लोग बोटिंग का मजा लेते हैं.. इसके अलावा अगर आप यहां आना चाहते हैं तो तभी आयें जब आपके पास ढ़ेर सारा समय हो और आप एकांत की तलाश में हों.. नहीं तो यह जगह बेकार है आपके लिये..

खाना खाकर कुछ लोग क्रिकेट खेलने में व्यस्त हो गये, तो कुछ लोग फुलबॉल.. और मेरे जैसे चंद लोग तालियां बजाने और फोटो लेने में व्यस्त हो गये.. शाम ढ़लते ही आग जला दिया गया, जिसमें लोग हाथ सेंक सके.. तो वहीं कुछ दूरी पर पीने-पिलाने का भी दौर चल निकला.. एक बात मैंने हर जगह कॉमन देखी है, पीने के बाद लोग ना जाने कैसे एक दूसरे के भाई बन जाते हैं और अपनी भाषा को छोड़कर अंग्रेजों की शरण में चले जाते हैं.. "तू तो मेरा भाई जैसा है.." या फिर "यू आर लाईक माय एल्डर ब्रदर.." जैसे जुमले भी उछलने लगे.. वहीं लड़किया और महिलायें अंताक्षरी जैसे खेलों में लग गई.. और मैं पीने वाले लोगों के बीच बैठ कर उनकी बहकी-बहकी बातों का मजा लेने लगा.. :) बगल में गाने बज रहे थे, और मेरे कुछ मित्र नाच भी रहे थे.. मैं भी थोड़ी देर उनमें शरीक हो गया.. थोड़े ठुमके लगा कर फिर से उन लोगों को ढ़ूंढ़कर बाते करने लगा जो पीकर अलग ही रंग में आ चुके थे..


अगले दिन सुबह उठकर सभी लोग झील की ओर निकल लिये.. कुछ बाहर झील के किनारे बैठकर आनंद उठाये और कुछ लोग नौकायन के मजे लेकर.. फिर वापस आकर खाना खाकर कुछ खेल खेले गये और फिर वहां से रवाना होने का समय आ गया..

चलते-चलते - कल मैं अपना मोबाईल घर में ही भूल गया.. पूरे दिन भर कई बार मुझे ये भ्रम होने लगा था की मोबाईल के अलावा भी कुछ है जो मैं भूल रहा हूं.. मगर कुछ था नहीं.. ये मोबाईल की आदत भी बहुत बुरी हो चली है.. खैर कल का दिन इसी बहाने कम से कम शांती से तो बीता.. :)

Monday, November 23, 2009

क्या शीर्षक दूं, समझ में नहीं आ रहा है

अभी कल ही दो दिनों के ट्रिप से लौटा हूं.. येलगिरी नामक जगह पर गया था जो तमिलनाडु का एक हिल स्टेशन है.. अभी फिलहाल इन चार चित्रों को देखें, लिखने का मन किया तो वहां के भी किस्से सुनाऊंगा..








ये पिल्ला अपनी मां और भाई-बहनों को जाता देख रहा है..

Friday, November 20, 2009

भगवान का होना ना होना मेरे लिये मायने नहीं रखता है(एक आत्मस्वीकारोक्ति)

मैंने आज तक इस विषय पर कभी कोई पोस्ट नहीं लिखा है और शायद आगे भी नहीं लिखूं.. मैं भगवान को नहीं मानता हूं और उन्हें मानने या ना मानने को लेकर किसी से कोई तर्क-वितर्क नहीं करता हूं.. जब मैं भगवान को नहीं मानता हूं तो खुदा या ईसा को मानने का सवाल ही पैदा नहीं होता है.. फिर भी मुझे अपने हिंदू होने पर गर्व है.. क्योंकि यही वह धर्म है जो इस बात की भी खुली छूट देता है कि आप उसके अस्तित्व को भी नकार सकते हैं जिसे लेकर यह धर्म बनाया गया है..

मैं कर्म प्रधानता पर विश्वास रखने वालों में से हूं और समय के साथ थोड़ा भाग्यवादी भी होता जा रहा हूं.. मगर फिर भी अच्छे भाग्य के लिये भगवान की प्रार्थना करना मुझे मेरे स्वाभिमान को ठेस पहूंचाने जैसा लगता है.. अगर जीवन की किसी परेशानी से मैं भगवान की शरण में जाऊं तो मुझे यह लगेगा की मैं अंदर से हद दर्जे तक का स्वार्थी भी हूं, जो कभी तो भगवान को नहीं मानता था मगर जैसे ही मुसीबत आन पड़ी वैसे ही पूजा-पाठ में तल्लीन हो गया..

मेरे लिये किसी की इबादत करने से अधिक महत्वपूर्ण है उन जरूरतमंदो की फिक्र करना जिन्हें सच में मदद चाहिये.. किसी भिखारी को पैसे देने से अच्छा मैं समझता हूं उसे खाने को कुछ खरीद देना(जो भिखारी अक्सर नहीं लेते हैं, उन्हें तो पैसा चाहिये).. किसी बूढ़ी अम्मा को सड़क पार करवाना, चाहे उसके बदले मुझे ऑफिस में 5 मिनट और देर हो जाये(आज भी एक अम्मा याद आती है जिन्हें सड़क पार करवाने के एवज में ललाट पर एक प्यार भरा किस और ढ़ेर सा आशीर्वाद मिला था).. किसी छोटे अनजान बच्चे को किसी दुकान से पचास पैसे वाली कैंडी खरीद कर देना मेरे लिये भगवान को पूजने से अधिक महत्वपूर्ण है..

चलते-चलते : आज सुबह-सुबह एक महाशय मुझसे भिड़ गये कि भगवान को मानो.. मेरा कहना था कि मैं तो आपको नहीं कह रहा हूं की आप भगवान को ना माने और ना ही कोई बहस कर रहा हूं? फिर आप जबरी मेरे पीछे क्यों लग गये हैं कि भगवान को मानो? मानने वाले के अपने तर्क हैं और ना मानने वाले के अपने.. दोनों ही समानांतर रेखा की भांती कभी नहीं मिल सकते हैं.. खैर इस चक्कर में आप लोगों को यह झेलना पर गया.. :)

Thursday, November 19, 2009

नौस्टैल्जिक होने के बहाने कुछ गुमे से दिन

यूं तो नौस्टैल्जिक होने के कई बहाने हम-आप ढ़ूंढ़ सकते हैं, तो एक बहाना संगीत का भी सही.. आज सुबह से ही 'माचिस' फिल्म का गीत "चप्पा-चप्पा चरखा चले" का एक लाईन जबान पर चढ़ा हुआ है..


"गोरी-चटखोरी जो कटोरी से खिलाती थी,
जुम्मे के जुम्मे जो सुरमें लगाती थी..
हो कच्ची मुंडेर के तले.....
चप्पा-चप्पा चरखा चले.."


अब पता नहीं, लोग इस गाने को किस नजर से देखते हैं और किस तरह से नौस्टैल्जिक होते हैं.. मुझे तो ये गीत पटना की गलियों तक खींच लाता है.. उन पुराने बूढ़े से होते गलियों का भटकाव याद आने लगता है, जहां आवारगी के दिनों में कदमों से दूरियों को भुलाया करते थे..

जब पुरानी गलियों में भटकने के किस्से सुना ही रहा हूं तो गलियों वाला माचिस का गीत कैसे भला कोई भूल सकता ? "छोड़ आये हम, वो गलियां.." शायद यही आज के इस युवा वर्ग का यथार्थ भी बनता जा रहा है.. जाने कौन कितनी ही गलियों के विछोह का मारा-मारा अपनी जमीन से बेदखल दूसरे प्रदेशों में फिर रहा है? भले ही उस गीत में गुलजार साहब ने कुछ और तरह के विस्थापन के दर्द को दिखाने का प्रयास किया हो..

मेरे लिये नौस्टैल्जिक होने वाले कुछ अन्य गीतों में रात की आवारगी दर्शाता हुआ तेजाब का गीत "सो गया ये जहां, सो गया आसमान.." भी शामिल है.. जिसे सुनते हुये उन पुरानी यादों में चला जाता हूं जब पटना में रात के समय दोस्तों के साथ आवारागर्दी किया करता था(पटना में रात बिरात घूमना उस समय और भी बड़ी समस्या थी, गुजरात दंगों का दौर था और अक्सर अफवाहों के कुछ तूफान गुजरा करते थे) और उस पर भी तुर्रा यह की मेरी आवारगी उन्हीं इलाकों में होती थी जिसे अखबार वाले मुस्लिम बहुल इलाका कहा करते हैं(पटना सिटी)..



जब रात और दोस्तों की बात करता हूं तो एक गीत, जिसमें रात तो कहीं नहीं है, मगर फिर भी बहुत याद आता है.. 'आतिफ़' का गाया हुआ "हम किस गली जा रहे हैं".. यह गीत मुझे उन यादों में खिंचता है जब कालेज के अंतिम पड़ाव से गुजर रहा था और चेन्नई में रहकर अपना प्रोजेक्ट पूरा कर रहा था.. किसी काम से वापस कालेज जाने पर रात के समय कभी कालेज के बाहर वाले ढ़ाबे से खाना खा कर लौटते समय रास्तों पर दोस्तों के साथ कुछ गीत गला फाड़ कर गाया जाता था उसमें यह गीत प्रमुख हुआ करता था.. आस पास के राहगीर या रहने वाले लोग हमें उन निगाहों से देखते थे जैसे पागलों या अपराधियों को देखा जाता है.. हो भी क्यों ना, रात के 12-1 बजे कोई ऐसा करे तो भला और किसी से क्या उम्मीद करें? "वैसे रात की आवारगी वाले गानों में से एक हालिया प्रदर्शित गीत मुझे पसंद तो बहुत है मगर मुझे नौस्टैल्जिक नहीं कर पाता है, शायद अभी नया है इसलिये.. कुछ साल बाद शायद इसे भी किन्ही कारणों से याद करूं.."

अपने कुछ पसंदिदा गीतों की ओर बढ़ने पर पाता हूं कि कुछ गीत मुझे दीदी की बहुत याद दिलाता है.. उन गीतों में एक भी वैसे गीत शामिल नहीं हैं जो रक्षाबंधन पर चित्रहार या रंगोली में बजा करते थे.. ये उन गीतों में से आते हैं जो दीदी को परेशान करने के इरादे से गाया गया था.. रात में दीदी किचन में रोटियां पकाने जाती थी और मैं गर्धवराग में नुसरत के चंद गीत चिल्ला-चिल्ला कर किचन में गाने पहूंच जाता था.. जिनमें से ये दो कव्वाली खास हुआ करती थी, -

"ये जो हल्का-हल्का सूरूर है,
ये जो तेरी नजर का कुसूर है,
जो शराब पीना सिखा दिया.."


और

"यादे नबी का गुलशन महका-महका लगता है..
महफ़िल में मौजूद हैं आका, ऐसा लगता है.."


वैसे अगर भाई-बहनों के ऊपर बने गीतों की बात की जाये तो मुझे 'काजल' सिनेमा का गीत "मेरे भैया, मेरे चंदा, मेरे अनमोल रतन. तेरे बदले, मैं जमाने की कोई चीज ना लूं" वाला गीत सबसे अधिक भाता है..

एक सिनेमा जो बहुचर्चित रहा, मगर किसी और कारण से उस चर्चित सिनेमा के गीत कम ही लोग जानते हैं.. जो उन गानों को आज जानते हैं उनमें भी बड़ी संख्या वैसे लोगों की है जिन्होंने इसे किसी रियैल्टी शो में सुना है और रिलीज के समय होने वाले विवाद के कारण इसके शानदार गाने कहीं गुम से हो गये थे.. मैं "बैंडिट क्वीन" की बात कर रहा हूं.. इसके गीतों में ना तो कहीं तयशुदा लंबाई है और ना ही कोई मीटर, मगर फिर भी अपने आप में यह किसी अनमोल नगीने से कम नहीं है.. इसके गानों को जब कभी भी सुनता हूं, एक अलग तरह कि ही भावनायें उमड़ती है.. सुनकर बेहद उदास भी होता हूं, मगर फिर भी बार-बार सुनता हूं.. एक अजीब सी कशिस महसूस होती है.. उस पायरेटेड वर्सन वाले प्यार की भी याद आती है जिसका लाईसेंस लेने से पहले ही वह एक्सपायर हो चुका था.. आप भी इसके एक गाने पर जरा गौर फरमायें -

सावन आया रिमझिम सांवरे
आये बादल कारे कारे मतवारे
प्‍यारे प्‍यारे मोरे अंगना झूम के
घिर घिर आई ऊदी ऊदी देखो मस्‍त घटाएं
फुरफर आज उड़ाएं आंचल मोरा सर्द हवाएं
डारी डारी पे भंवरा घूम के आये कलियों के मुखड़े चूम के
जिया मोरा जलाए हाय प्‍यारी प्‍यारी रूत सांवली..

मेरे सैंयां तो हैं परदेस मैं क्‍या करूं सावन को
सूना लगे सजन बिन देस.
मैं ढूंढूं साजन को..

देखूं राहें, चढ़के अटरिया
जाने कब जाएं सांवरिया
जब से गए मोरी ली ना खबरिया
छूटा पनघट फूटी डगरिया
सूना लागे सजन बिन देस,
मैं ढूंढूं साजन को..

क्‍यूं पहनूं मैं पग में पायल
मन तो है मुझ बिरहन का घायल
नींद से खाली मोरी अंखियां बोझल
रोते रोते बह गया काजल .
सूना लागे सजन बिन देस मैं ढूंढूं साजन को


इसका एक और गीत जो मुझे बेतरह पसंद है, वह है "सांवरे, तेरे बिना जिया जाये ना.." इस गाने की शुरूवात नुसरत के सरगम से होती है.. आजकल लोग राहत के सरगम को सुनकर मदहोशी में डूबते हैं, मगर जिन्होंने भी नुसरत के सरगम को सुना है वे जानते हैं कि नुसरत के आगे वे कितने फीके हैं.. आखिर हो भी क्यों ना, नुसरत उनके उस्ताद भी जो रह चुके हैं.. इस गीत में पीछे से आती हुई लड़की की आवाज कुछ ऐसा सुकून देता है जैसे अगरबत्ती की भीनी सी खुश्बू.. साथ ही उस आवाज में एक बिछोह का दर्द अंदर से परेशान सा कर जाता है.. इसके बोल कुछ दिये जा रहा हूं -

"सांवरे, तेरे बिना जिया जाये ना!
जलूं तेरे प्यार में,
करूं इंतजार..
किसी से कहा जाये ना!!

ढ़ूंढ़े मेरी प्रीत रे,
तू है कहां मीत रे,
असुवन गीत रे,
काहे संगीत रे.."


आज की महफिल यहीं खत्म करता हूं.. फिर कभी अपने पसंद के गीतों के साथ आता हूं.. आज का विषय यादों को लेकर था, अगली बार कुछ और होगा.. :)

Saturday, November 14, 2009

अलग शहर के अलग रंग बरसात के

बाहर झमाझम बरखा बरस रही है.. तीन-चार दिन सुस्ताने के बाद फिर से मानो आसमान बरस पड़ा हो.. यह बारिश जब कभी देखता हूं, उसमें एक पागलपन सा मुझे नजर आता है.. ढ़ेर सारी खुशियों को मैं उनमें देखता हूं.. ढ़ेर सारी उदासी भी नजर आती है.. कई तरह के भावनाओं को समेंटे हुये एक अलग सा ही ख्याल आता है.. कुछ पुरानी बातें याद आती है.. नौस्टैल्जिक सा हो उठता हूं..

पटना की सड़कों पर मूसलाधार वर्षा में वो पुराना बूढ़ा स्कूटर लेकर निकलना, जिससे थोड़ा भींग भी सकूं..लगभग घुटने भर पानी में स्कूटर के स्केलेटर को पूरा घूमा कर धीरे-धीरे क्लच छोड़ कर आहिस्ता-आहिस्ता आगे बढ़ना, जिससे स्कूटर बंद ना हो जाये.. कुछ दूर भीगते हुये उस लड़की का रिक्सा ढ़ूंढ़ना और उस रिक्सा के मिल जाने पर पूरे स्टाईल से वहां से निकल लेना, पानी के छीटें उड़ाते हुये.. जैसे उस रिक्से से मुझे कोई मतलब ही ना हो.. घर पहूंच कर सबसे पहले मम्मी से डांट खाना और फिर दरवाजे से ही सारे भींगे कपड़े लेकर अंदर आने को कहना.. एक दो बार तो गमछा लपेट कर अंदर घुसा हूं.. आज शाम तक अगर यूं ही बरसात होती रही तो फिर से भींगते हुये घर जाऊंगा.. गाड़ी के बंद होने का डर लिये बिना, साईलेंसर बहुत ऊंचा जो है.. अकेले घर पहूंच कर भींगे बदन ही ताला खोल कर अंदर जाकर कपड़े बदलूंगा.. जहां कोई डांटने वाला नहीं होगा.. फिर कोई ख्याल रखने वाला भी नहीं.. जितने भी बूंदें घर के अंदर होंगी, उसे पोछ कर साफ करना भी मेरा ही काम होगा..



बरसात देख एक शहर याद हो आता है.. जहां एक लड़की के हाथों में हाथ डाले घूमा करता था.. बरसात होने पर कहीं छुपने की जगह उस पहाड़ी वाले शहर में मुश्किल से ही मिलती थी.. फिर आजिज आकर छुपने की जगह ढ़ूंढ़ना छोड़ खूब भींगते थे हम.. अपनी हथेलियों से उस पर गिरने वाली बूंदों को रोकने का नाकाम प्रयास करते हुये.. कुछ अपना सा लगने लगा था वह शहर.. वो जूस का दुकान, चाट-पकौड़ियों का ठेला लगाने वाले भैया, जो हमें देखते ही दो ठोंगा बढ़ा देते थे.. जानते थे कि कुछ देर बहस करने और लड़ने-झगड़ने के बाद हम क्या खायेंगे.. बरसात में शायद अब भी उन हथेलियों की गर्माहट महसूस होगी, या शायद नहीं होगी..

चलते-चलते - खुद से, "ज्यादा सेंटी होने की जरूरत नहीं है भाई.." ;-)

Thursday, November 12, 2009

बेवक्त आने वाले कुछ ख्यालात

कभी-कभी कुछ सवाल दिमाग में ऐसे उपजते हैं कि यदि उसे उसी समय पूछ लो तो गदर मचना तय हो जाये.. हर समय उल्टी बातें ही दिमाग में आती है.. अगर हम खुश हैं तो इस तरह के सवाल ज्यादा आते हैं..

कुछ दिन पहले एक लंबे-चौड़े मिटिंग के बाद हमारे सुपर बॉस आये.. आते ही कुछ फंडे पिला कर बजा डाला, "यू कैन आस्क अनी काईंड ऑफ क्यूश्चन.." मैंने कई दिनों से मेंटोस तो खाया नहीं है, मगर फिर भी दिमाग की बत्ती भन्न से जल उठी.. सवाल पूछने का मन किया, "हम क्लोरमिंट क्यों खाते हैं?" सवाल तो मन ही मन पूछ लिया मगर सामने नहीं पूछा.. नहीं तो मेरे साथ पूरी टीम का बेड़ा गर्क होना निश्चित था.. ;)

एक बार एक ट्रेनिंग, जो किसी प्रोजेक्ट के प्रोसेस से संबंधित था और उसमें बताया जा रहा था कि प्रोजेक्ट प्लानिंग अतिआवश्यक है और हमें एक-एक घंटे का प्लानिंग करके चलना चाहिये.. उस ट्रेनिंग के तुरंत बाद ट्रेनर ने पूछा, "अनी क्यूश्चन?" मन में आया कि पूछ ही लूं कि बिना पहले से बताये अचानक से यह ट्रेनिंग सात लोगों को दिये जाने से देने से क्या पूरी टीम को सात घंटो का नुकसान नहीं हुआ जो लगभग एक 'मैन वर्किंग डे' के बराबर है? यह ट्रेनिंग पहले से प्लान क्यों नहीं किया गया? मगर पूछा नहीं.. :)

मैं अभी जिस टीम में काम करता हूं, उसमें बस पांच सदस्य हैं(प्रोजेक्ट लीड को जोड़कर).. लीड अलग बैठते हैं और बाकी चार लोग एक ही क्यूबिकल(एक क्यूबिकल में चार जगह होते हैं) में बैठते हैं.. अब हमें क्लाइंट के तरफ से एक छोटा सा फोम का बना हुआ टाईगर(अजी वही बाघ) गिफ्ट किया गया है, हमारे उत्कृष्ट काम के लिये.. अब इसे रखा कहां जाये यह प्रश्न उठा.. मेरा सोचना था कि इसके गले में रस्सी बांध कर पूरे टीम के बीचो-बीच लटका दिया जाये.. "हैंग टील डेथ..:D" मगर फिर से कुछ कहा नहीं..

"जब नया-नया कालेज छोड़कर जिंदगी की आपाधापी में कूदा था तब कहीं गूगल का वेकेन्सी देखा था.. उसके क्राइटेरिआ जब पढ़ा तो पाया कि बस एक ही क्राइटेरिआ फुलफील कर रहा हूं.. उसमें था कि 'सेंस ऑफ ह्यूमर' अच्छा होना चाहिये.." ;)

वैसे जानवरों के भी सेंस ऑफ ह्यूमर कुछ कम नहीं होते हैं.. कल रात ही देखा, मेरे पड़ोस के कुछ लोग अपने घर के बाहर रात 11 बजे के आसपास बैठे ठंढ़ी हवा खा रहे थे.. तभी गली का एक कुत्ता आया और उनसे प्यार जताने लगा.. वे लोग उसे भगाने के लिये जैसे ही उठे, वह कुत्ता अपना एक पैर उठा कर लघुशंका दूर कर वहां से पतली गली पकड़ लिया.. :D

Sunday, November 08, 2009

कार्यालय में बनते रिश्ते

हमने एक छोटा सा ही सही जिसमें मात्र तीन सदस्य हुआ करते थे, मगर एक ग्रुप बनाया हुआ था.. जिसका नाम रखा था एस.जी. ग्रुप.. जिसका फुल फार्म हमारे लिये सिंप्ली गॉसिप हुआ करता था.. मगर वही कोई और यदि उसके बारे में पूछे तो उसे सामान्य ज्ञान बताया जाता था.. ये ऑफिस में दोस्ती का दायरा पहली बार बढ़ने पर हुआ था.. जिसमें व्यवसायिकता कहीं से भी सामिल नहीं थी.. कारण हमारा प्रोजेक्ट भी अलग-अलग था.. मैं और फनिन्द्र एक प्रोजेक्ट में थे और बानुमती दूसरे प्रोजेक्ट में, मगर लगभग दो-तीन महिने हमारा क्यूबिकल साथ में ही था..

जब नया-नया नौकरी में आया था तब से लेकर अभी तक ऑफिस में मेरा सबसे नजदीकी मित्र शिवेन्द्र ही था और हो भी क्यों ना, हम जाने कितने ही साल से साथ-साथ थे.. संयोग कुछ ऐसा कि नौकरी एक ही कंपनी में लगी, और शुरूवाती प्रोजेक्ट भी एक ही मिला.. अब ऐसे में सबसे ज्यादा उसी से बात होती थी.. आसपास के लोगों के बारे में भी बाते होती थी, जिसमें सबसे ज्यादा हमारा ध्यान बानुमती ही खिंचती थी.. उन्हें कोई भी देखे तो सोचेगा की बहुत ही आधुनिक किस्म की लड़की होगी, मगर जब धीरे-धीरे उन्हें जानने लगा तो पाया कि भले ही सारे फ्लोर का ध्यान वो अपनी हरकतों से खींचती हो, मगर पूरे फ्लोर पर उनके दोस्ती का दायरा बहुत ही सिमटा हुआ है.. कारण बहुत बारीक से जांचने पर पता चला, बस वही पितृसत्ता समाज.. जिसमें अगर कोई लड़की किसी से भी हंसती बोलती रहे और साथ ही बेहतरीन तरीके से अपना दायित्व भी निभाती रहे तो पुरूषों के बीच मजाक का पात्र बनने में देरी नहीं लगती.. अब चूंकी मेरी और फनिन्द्र(फनिन्द्र पहले उनके ही टीम में थे और पहले से ही उनकी दोस्ती बहुत अच्छी थी) की सोच ऐसी नहीं थी सो हम जल्द ही अच्छे दोस्त भी बन गये..

हमारे बीच एक और बात सामान्य थी जो चेन्नई में मिलना बहुत मुश्किल है.. हम तीनों को ही हिंदी आती है.. इस कारण हमारी बात हमेशा हिंदी में ही होती है.. मैं तो हिंदी भाषी क्षेत्र से ही आता हूं.. फनिन्द्र तेलगु हैं मगर बहुत दिनों तक खाड़ी देश में काम किये हैं, सो उर्दू के साथ-साथ हिंदी अच्छी बोल लेते हैं वो भी बिना किसी क्षेत्रीय उच्चारण के साथ.. वहीं बानुमती तमिल होते हुये भी बचपन बैंगलोर में बिताई हैं, और हिंदी दूसरी भाषा के तौर पर विद्यालय में पढ़ी हैं.. सो हिंदी अच्छा बोल लेती हैं..

मेरी टीम में तीन-तीन सतीश हुआ करते थे.. सतीश पी., सतीश बी. और सतीश एम. इनमें सबसे पहले मैं सतीश एम. से मिला था.. ट्रेनिंग के बाद एक टीम ज्वाईन करने के पहले ही दिन.. मेरे किसी एसाईंगमेंट को चेक करने आये थे और उसमें कई खामियां गिना कर उसे बनाने का नया एप्रोच भी बता गये थे.. लगभग सारे तमिलों के बीच वही थे जो अक्सर बिना किसी बाते के भी बातें करने आते थे और शुरूवाती दिनों में उनसे कई बाते सीखने को भी मिला था..

अक्सर मुझे सिगरेट पीते देखने पर वे मुझे टोका करते थे कि मत फूको सिगरेट.. पता नहीं इतना अधिकार वे अचानक से मुझ पर क्यों समझने लगे थे.. क्योंकि प्रोफेशनल लाईफ में कोई ऑफिस के बाहर कुछ भी क्यों ना करे, कोई किसी तरह का प्रश्न नहीं पूछता है, चाहे वह आपके सुपर बॉस ही क्यों ना हों.... त्रिची के रहने वाले सतीश, तकनिकी रूप से बहुत सक्षम हैं, और आज भी उनसे कई बार कुछ नई चीज सीखने को मिलता ही रहता है.. आमतौर पर मैंने यह पाया है कि तमिल के लोग बिलकुल नये व्यक्ति से जल्दी मिलते-घुलते नहीं हैं.. बाद में भले ही वे आपके अच्छे मित्र हों जायें.. मगर इसके अपवाद के रूप में मैं इन्हें पाया..

सतीश और बानु को लेकर कई बार अफवाहें भी सुनने को मिलती थी और अक्सर कई बार लोग मुझी से उनके बारे में पूछने आते थे, क्योंकि उन्हें लगता था कि मैं उन दोनों के ही करीब हूं सो मुझे जरूर पता होगा उनके बारे में.. जबकी मेरा उन दोनों से ही एक अलग तरह का रिश्ता था.. और मैं दोनों ही रिश्तों को समानांतर रूप से निभाता था, कभी उसे आपस में फेंटा नहीं.. कई बार ऐसा हुआ है कि मैं उन दोनों को ही छुट्टी के दिनों में कहीं बाहर देखता था.. मगर कभी उसमें घुसने की ना तो कोशिश करता था और ना ही कहीं बाहर उन्हें लेकर बाहर बातें करता था.. अभी परसो ही वे अपनी शादी का कार्ड सभी को दे रहे थे.. और ना जाने एक अलग सी खुशी हुई जिसे मैं इस पोस्ट में आप लोगों से बांट रहा हूं..

चलते-चलते - मैं उनका फोटो नहीं लगा रहा हूं क्योंकि मैंने इसके लिये उनसे आज्ञा नहीं ली है, और ना ही उनपर मैं इतना अधिकार समझता हूं कि उनसे बिना पूछे ही उनकी तस्वीर लगा दूं..

Wednesday, November 04, 2009

बदलाव के चिन्ह एक बार फिर

आजकल खूब हंसता हूं.. जहां गुस्सा आना चहिये होता है, वहां भी हंसने लगा हूं.. कभी खुद पर हंसता हूं तो कभी अपने भाग्य पर.. पहले कभी भी भाग्यवादी नहीं था, मगर अब लगता है जैसे धीरे धीरे भाग्यवादी होता जा रहा हूं.. कारण बस इतना ही है कि कहीं देखता हूं कि लोग मर मर कर काम कर रहे हैं मगर कुछ फायदा उन्हें नहीं मिल रहा है, और कहीं देखता हूं की बिना कुछ किये धराये बैठे बिठाये सब कुछ किसी की झोली में गिर रहा है.. (बस अभी अभी अपने ऑफिस के मित्र, गुरू और इमिडिएट बॉस, माने टीम लीड, से बात हुई और वह भी बोल रहे थे कि कल कुछ बातें हुई लीड के साथ और उन्हें उस पर गुस्सा आने के बदले हंसी आ रही थी..) :)

बदलाव जीवन का अटूट सत्य है.. आज से तीन-साढ़े तीन साल पहले मुझमे बदलाव बहुत-बहुत समय बाद आता था.. मगर आजकल उसी बदलाव को आने में सालभर भी नहीं लगता है, और देखते ही देखते पूरी सोच को ही एक नया घुमाव मिल जाता है.. आजकल ऐसा लग रहा है कि मैं फिर किसी भीषण बदलाव की ओर बढ़ रहा हूं.. पता नहीं यह अच्छा होगा या बुरा..

अगर कार्यालय की ही बात करूं तो, पहले जिन बातों पर अपनी असहमती का सुर हमेशा ऊंचा किये फिरता था, अब उन्हीं बातों को चुपचाप मुस्कुरा कर सुनता हूं.. कुछ कहता नहीं.. अब शायद समझ गया हूं कि मेरे कुछ-कहने सुनने से उन्हें कुछ फर्क नहीं पड़ने वाला है.. कभी-कभी लगता है कि इस तरह के विचार किसी लाचारी या विवशता के तहत आने शुरू हुये हैं या फिर मन ही मन एक तरह का विद्रोह इन सबके खिलाफ पनप रहा है? आने वाले समय में ही शायद इन सब प्रश्नों के उत्तर मिल सके..

खैर चाहे कुछ भी हो, मगर एक बात अब अक्सर मन में आती है.. जितनी अधिक मायूसी और परेशानी जिंदगी में आती है, उतनी ही बार एक बार फिर उठकर उन सबसे लड़ने का मन करता है.. अंदर से एक जिद्द सा पनपता है, कुछ अच्छा करने को.. जिंदगी पहले से कुछ और बेहतर बनाने को.. आजकल कुछ ऐसी ही धुन लिये जी रहा हूं.. बचपन में पापाजी अक्सर एक कविता सुनाया करते थे, "मानव जब जोर लगाता है, पत्थर पानी बन जाता है.." इसे सार्थक कर दिखाने की जिद्द सी मन में है..

चलते-चलते : "आजकल ब्लौग लिखना बहुत कम हो गया है.. कई बार कुछ लिखने बैठता हूं तो इतने सारे विचार एक साथ मुझ पर हमला करते हैं कि उनके बीच मैं कोई तारतम्य ही नहीं बिठा पाता हूं.. तो वहीं कई बार हिंदी ब्लौग जगत के तिल का ताड़ बनाने वालों को पढ़ सुनकर भी मन आहत हो जाता है.."

Wednesday, October 28, 2009

कौन सा ब्लौग? कौन सा चिट्ठा? कौन से मठाधीष?

आज कोई भी माई का लाल ऐसा नहीं कह सकता है कि उसने हमे हिंदी ब्लौगिंग सिखाई.. अगर कोई है तो आये, हम भी ताल ठोके तैयार बैठे हैं..

हद है यार.. यहां ब्लौग को चिट्ठा किसने कहा? नामवर जी को क्यों बुलाया? जैसे व्यर्थ प्रश्न में ही अपना दिमाग खराब किये हुये हैं.. हम तो यहां आलोक जी से लेकर नामवर जी तक, सभी का नाम इंटरनेट पर पढ़कर ही जाने हैं.. हिंदी की मेरी इस समझ पर कई खुद को बुद्धीजिवी समझने वाले अपने बुद्धिमता झाड़ने को आ सकते हैं.. उनका स्वागत है..

कोई स्वधन्य ब्लौगर अपने ब्लौग को डिलीट करने की धमकी अपने कमेंट में कर जा रहा है.. कर दो भाई, हमारा क्या जाता है? बस यही कि पहले आपको पढ़ते थे, डिलीट होने के बाद नहीं पढ़ेंगे.. इससे ना तो मेरा कुछ बिगड़ने वाला है और ना ही किसी और का.. आपको पढ़ने या ना पढ़ने से इस संसार में किसी का भी कुछ नहीं जाता है.. कुछ ऐसा ही मेरे ब्लौग के होने या ना होने पर भी लागू होता है..

अब चिट्ठे को चिट्ठा किसने सबसे पहले बुलाया, और जिसने भी बुलाया वही हिंदी का सबसे महान ब्लौगर हो गया यह हम कैसे मान लें? हो सकता है कि उन्होंने ही सबसे पहला हिंदी चिट्ठा बनाया.. मगर मुझे तो इसमें भी कोई महानता नजर नहीं आ रही है.. इंटरनेट की बात करें तो अगर कोई महान है तो वो है जिसने यूनी कोड का पहला साफ्टवेयर बनाया.. मुझे उनका नाम क्यों नहीं याद आ रहा है? ओह मैं तो भूल ही गया, शायद मैंने उनका नाम कहीं पढ़ा ही नहीं.. और अगर पढ़ा भी होगा तो वह इतने हल्के में लिखा गया होगा कि उनका नाम इतने लंबे समय तक मन पर छाप छोड़ ही नहीं पाया..

मैं हिंदी ब्लौग किसी दूसरे के ब्लौग को देखकर नहीं बनाया.. और ना ही इसे बनाने के पीछे ना ही किसी मुद्दे को उठाना था.. और ना ही हिंदी को आगे बढ़ाना.. मेरा हिंदी से अपने व्यवसाय का भी रिश्ता नहीं है.. और ना ही मैं हिंदी में अपने खुद के असीम ज्ञान होने का भ्रम पाले बैठा हूं.. फिर क्यों बनाया हिंदी ब्लौग? अरे देखो ना! मैं भी कितना भुलक्कड़ होता जा रहा हूं.. थोड़ी देर पहले याद नहीं आ रहा था की यूनी कोड साफ्टवेयर किसने बनाया और अब ये भी याद नहीं आ रहा है कि मैंने हिंदी ब्लौग क्यों बनाया? हां याद आया!! मुझे हिंदी में लिखने का कोई औजार नेट पर मिल गया था और बस यूं ही बना लिया हिंदी ब्लौग.. 2006 में बनाया और अब लगभग तीन साल भी होने को आ रहे हैं.. मुझे तो नहीं लगता है कि मैंने कोई तीर मार लिया हो..

जिनके नाम को लेकर यहां बवाल मचा हुआ है कि उन्होंने ब्लौग को सर्वप्रथम चिट्ठा कहा(आलोक जी).. वो खुद तो कुछ कह नहीं रहे हैं और बाकी सभी लोग नये जमाने, पुराने जमाने को लेकर अपनी ढफली अपना राग गा रहे हैं, दुहाई देते फिर रहे हैं.. जिन्हें यह गुमान है कि 35 लोग मिलजुलकर साथ रहते थे वैसा अब क्यों नहीं हो रहा है? तो भाई लोग आप कोई ग्रुप बना लो और वहीं ब्लौग-ब्लौग खेलते रहो.. आप भी खुश रहेंगे कि अब कोई हमसे लड़ता नहीं है, कोई बहस नहीं करता है..

अभी जो समय है उसमें चाहे कोई कुछ भी कर ले, मगर हिंदी ब्लौग के विस्तार को कोई भी नहीं रोक सकता है.. अगर आज गूगल पैसा मांगने लग जाये तो कल ही सभी दूसरे डोमेन पर शिफ्ट हो जायेंगे.. कोई मठाधिषी करने लगे तो उसे बस उसके अनुयायी ही सुनेंगे और दूसरा कोई नहीं.. ब्लौग पर नियंत्रण रखने का भ्रम पाले लोग भी कुछ ना कर सकेंगे.. अभी तो मैं उस दिन के इंतजार में हूं जब हिंदी ब्लौग से कमाई शुरू हो और एक दूसरे तरह का घमासान देखने को मिले ट्रैफिक पाने के लिये..

पहले अफसोस हो रहा था कि मैं इलाहाबाद में होने वाले सम्मेलन में भाग नहीं ले सका.. अब लगता है कि अच्छा हुआ कि मैं इलाहाबाद से मीलों दूर बैठा हुआ हूं और इस वजह से वहां जाने का सपना भी नहीं देख सकता..

Tuesday, October 20, 2009

लंद-फंद देवानंद बतिया रहे हैं, पढ़ने का मन हो तभिये पढ़ियेगा

गूरू लोग अपन गूरूपनी झाड़ले चलते हैं कि बेटा खूब मेहनत करो.. बड़का औफिसर बनोगे.. पढ़ोगे-लिखोगे बनोगे नवाब, खेलोगे-कूदोगे त होगे खराब.. एक्को गो नसिहत काम नहीं आता है.. दोस्त लोग के साथ लंद-फंद देवानंद बतियईते चलते हैं.. अबकी इंटरभ्यू में ई सब पुछिस थी ऊ एच.आर. अऊर टेक्निकल बला राऊंड तक त पहुंचबो नहीं किये.. जाने कौन बतवा पर खिसिया गई थी? बड़ा खीस पड़ता है ई सब देख के..

इंटरभ्यूयो के त अलगे एक्सपिरिंस है.. केतनो सही जवाब दो, ई त पूछे बला पर डिपेंड करता है कि उसको क्या अच्छा लगे? केकरो के सामने त हवाबाजिये में काम चल जाता है और कोई जन त केतना भी बढ़िया से केतना भी राईट बोलो, ऊ बिदकर कर उदबिलाऊ बनले फिरता है.. बेसी अलाय-बलाय बकने का भी अलगे नुकसान हो जाता है.. इससे बढ़िया त रात में कोनो सड़क के कोना कात में जाते समय मच्छड़ भंमोड़े, ऊ जादे बढ़िया लगता है..

ऑफिसवा में सबको कम से कम आठ घंटा का काम चाहिये.. ऊपर से हरमेसा एक-दू ठो सर्टिफिकेशनवा के तलवार लटकईले फिरते हैं.. डेली दू घंटा ऑफिस में उसके लिये निकालो त दू-चारे दिन बाद बॉस हवा-पानी खराब करने के फिराक में दिखने लगे.. बेटा अपन चरचकिया पर घूमे एतना ईजी नहीं होता है..

बड़का ज्ञानी लोग वईसे भी बोल गये हैं - "समय से पहले और भाग्य से ज्यादा किसी को कुच्छो नहीं मिलता है.." हम ई सब सुन कर चद्दर तान कर हाथ में टी.वी. का रिमोट लिये और आंख पर चस्मा टांगे डेढ़-दू बजे तक सुत जाते हैं.. ई सोचते हुये कि कहियो त हमरो किस्मत चमकेगा.. हमरो भाग्य का नीक टाईम आयेगा.. भारत अईसे ही भाग्यवादीयों का देश नहीं कहलाता है.. हर कदम पर भाग्य जैसन कुछ ना कुछ सुनने को मिल ही जाता है..

कुल मिला कर कालेज से लेकर अभी तक का पूरा गप्प सार्ट में लिख दिये हैं..

Monday, October 19, 2009

दिवाली की रात मेरे घर में भूतों का हंगामा


इसमें मैं यह नहीं लिखूंगा की दिवाली की रात हमने कैसे दिये जलाये? क्या-क्या पकाया? और कितने पटाखे जलाये.. ये सब तो लगभग सभी किये होंगे.. मगर दिवाली कि रात कुछ हटकर अलग सा कुछ हो तभी तो मजा है, और वो भी अनायास हो तो सोने पे सुहागा.. तो चलिये सीधे किस्से पर आते हैं..

दिवाली मनाने के बाद हम सभी मित्र खाना खाकर सोने चले गये.. मेरा एक मित्र(नाम नहीं बताऊंगा नहीं तो बाद में बहुत गरियायेगा) :) मेरे घर पर ही रात में रोक लिया गया और उसके लिये बिस्तर मैंने अपने बगल ही लगा दिया.. लगभग रात साढ़े बारह बजे तक हम दोनों टी.वी. देखते रहे और कुछ बाते करते रहे, इस बीच मेरे बाकी दो मित्र सो चुके थे.. एक बजे तक हम दोनों भी सो गये..

मैं गहरी नींद में था तभी अचानक से मुझे अजीब तरीके से किसी के चीखने की आवाज आई, जैसे कोई चुड़ैल चिल्ला रही हो.. कम से कम वह किसी इंसान के चीखने की आवाज तो नहीं थी(नींद में तो ऐसा ही लग रहा था).. उसी समय मैंने एक हाथ अपने गले पर पाया.. अब तक मेरी नींद नहीं खुली थी और मैं काफी हद तक डर गया था और डर के मारे चिल्लाने लगा.. तभी एक भारी सी चीज मेरे ऊपर कूद पड़ी.. अब तक मेरी हालत खराब हो चुकी थी.. एक तो कोई अजीब तरीके से चिल्ला रहा था.. दूसरा मेरे गले को पकड़ने की कोशिश में था.. तीसरा कोई मेरे ऊपर कूद भी रहा था जिसका वजन कम से कम 2-3 किलो रहा होगा..

डर के मारे मैं भी चिल्लाने लगा और हाथ इधर-उधर फेंकने लगा.. मेरे हाथ में किसी के सर का बाल आ गया और मैंने उसे जोड़ से पकर कर खींचने लगा.. यह तमाशा लगभग एक मिनट तक चला और तब तक मेरी और मेरे मित्र की नींद भी खुल गई.. हम दोनों ही अकबका कर उठ बैठे थे और अंधेरे में ही कुछ देखने की कोशिश कर रहे थे.. तब तक मेरे बाकी दो मित्र जो दूसरे कमरे में सो रहे थे वो दोनों भी हमारे दरवाजे पर आकर खड़े हो गये थे और बत्ती जला चुके थे..

तब जाकर सारा माजरा समझ में आया.. मेरा मित्र जो मेरे बगल में सोया हुआ था वह नींद में कोई सपना देखकर डर गया था और चिल्ला पड़ा था.. साथ ही उसने मेरा हाथ पकड़ना चाहा तो मेरी गरदन उसके हाथ में आ गई थी.. इसी बीच एक बिल्ली, जो मेरे कमरे में घूम रही थी, इस हंगामे से डरकर भागना चाही और मेरे ऊपर ही कूद गई.. उसके कूदने से मैं भी डरकर चिल्लाने लगा और इसी बीच मेरे हाथ में मेरे मित्र के सर का बाल आ गया.. अब हम दोनों चिल्ला रहे थे और वो मेरा गला पकड़ कर हिला रहा था और मैं उसके सर का बाल पकड़ कर खींच रहा था.. और हमारे बाकी दोनों मित्र हंसे जा रहे हैं..

खैर नींद टूटने से सारा माजरा तो समझ में आ गया, मगर दिवाली की रात फिर हम दोनों सो नहीं सके.. मेरा मित्र उस सपने से बहुत डरा हुआ था.. और मैं डरा हुआ था कि कहीं ये नींद में फिर से मेरा गला ना दबाने लग जाये ;).. साथ ही एक ने रसोई की बत्ती जला दी, और उस रोशनी से भी मुझे नींद नहीं आ रही थी.. :)

Friday, October 16, 2009

शीर्षकहीन कविता दिवाली की


जहां हर खुशी से
तुम्हारी याद जुड़ी हो
अच्छा है कि हमने मिलकर
कभी नहीं मनाया,
होली या दिवाली..

अब कम से कम
इन दो त्योहारों पर
तुम्हारी याद तो नहीं आती है..

जैसे उन पहाड़ों से भागता हूं,
जहां घूमे थे हम साथ-साथ
हाथों में हाथ लिये..

सच है, कुछ यादें
बहुत देर तक मारती है..

Tuesday, October 13, 2009

एक बीमार की बक-बक

मेरे ख्याल से बीमार आदमी या तो बेबात का बकबकिया हो जाया करता है या फिर चुपचाप अपने में सिमटा रहता है और यह समय भी बीत जायेगा जैसे ख्यालों में रहता है.. जब तक घर में था तब जब कभी पापाजी बीमार पड़ते थे, उनके मुख से अनवरत कविता-कहानियों का निकलना चालू हो जाता था.. एक से बढ़कर एक कविता-कहानी.. किसी आशु कवि की ही तरह हर बात पर उनके पास एक कविता हाजिर मिलती थी.. वह जमाना ब्लौग का नहीं था, नहीं तो कम से कम 15-20 पोस्ट बस उन दो दिनों की बीमारी में ही बन जाती..

जहां तक मेरी बात है तो, बीमार पड़ने पर मैं किसी को उस समय नहीं बताता हूं, ठीक होने के बद ही किसी को इसके बारे में बताता हूं कि बीमार था.. मेरी दिनचर्या भी अन्य दिनों की तरह ही हुआ करती थी, मगर अभी हाल में कुछ बड़ा वाला बीमार पड़ गया था, जिसमें किसी को कुछ बताने की जरूरत नहीं पड़ी.. मेरे चेहरे पर ही हाल लिखा दिख रहा था.. अब घर में कोई था तो नहीं, सो अकेले में मैं भी खूब बकबकाया.. इतना हुनर खुदा ने दिया नहीं है कि खुद अपनी कविता बनाऊं सो कुछ पुरानी कविता-कहानी को ही याद करता रहा..

एक दिन बैठे-बैठे(कह सकते हैं लेटे-लेटे) मैंने सोचा कि अपनी वसीयत भी लिख ही दूं.. क्या पता शाम तक रहूं-ना-रहूं.. चंद चीजों के शिवा अपने पास था ही क्या जो किसी के नाम लिखूं.. सो उन चंद चीजों का ही बंटवारा कर डाला..

मेरा वसियतनामा -
एक अदद बाईक है मेरे पास.. दो मित्र साथ में रहते हैं जिसमें से एक को बाईक चलाना आता नहीं है.. सो जिसे चलाना आता है बाईक उसकी.. बाकी बचा एक टीवी, दो मोबाईल, एक आई-पॉड, एक लैपटॉप और कुछ बरतन.. सो उसे दूसरे मित्र के नाम कर देना ठीक लगा..

एक आखिरी इच्छा भी बताई अपने मित्र शिवेन्द्र को.. मैंने उससे कहा कि अगर शाम में ऑफिस से लौटो और मेरी लाश को पाओ तो घबराना मत.. और मेरी लाश के टुकड़े-टुकड़े करके चील-कौवों को खिला देना.. किसी के तो काम आ सकूं.. ;-) वैसे मेरा मित्र शिव कुछ ऐसा है कि एक बार शायद किसी तेलचट्टे को या चूहे को मार रहा था और उसे देखकर शिव लगभग रो ही दिया था.. अब ऐसे में मेरे लाश के टुकड़े-टुकड़े करना उसके लिये किसी पहाड़ तोड़ने से कम तो नहीं ही होता..

एक कविता भी लिख डाली जो मेरी नहीं, अनंत कुशवाहा जी कि है..
बाद मरने के, मेरी कब्र पर उगाना बैगन..
मेरी वो को भुरता बहुत पसंद है..


खैर, मैं फिलहाल ठीक हो चुका हूं.. बेचारों को जो भी मिलना था सो अब नहीं मिल पायेगा.. :)

Monday, October 12, 2009

ईश्वर बाबू

आज यूं ही अपने ई-मेल के इनबाक्स के पुराने मेल पढ़ते हुये कुछ कवितायें हाथ लगी, जिसे मैं यहां पोस्ट कर रहा हूं.. मुझे नहीं पता यह किसकी लिखी हुई है, मगर जिनकी भी है अगर उन्हें इस कविता के यहां पोस्ट करने से आपत्ति है तो कृप्या एक कमेंट अथवा ई-मेल के द्वारा सूचित करें.. तत्पश्चात इसे यहां से हटा लिया जायेगा..

ईश्वर बाबू

ईश्वर है
कि बस पहाड़ पर लुढ़कने से बच गये
बच्चे लौट आये स्कूल से सकुशल
पिता चिन्तामुक्त मां हंस रही है
प्रसव में जच्चा-बच्चा स्वस्थ हैं
दोस्त कहता है कि याद आती है
षड्यंत्रों के बीच बचा हुआ है जीवन
रसातल को नहीं गयी पृथ्वी अभी तक!

तुम डर से
भोले विश्वासों में तब्दील हो गये हो
ईश्वर बाबू!!!


ईश्‍वर जो गया फिर आया नहीं

ईश्वर
प्रायः आकर
मुझ पर प्रश्न दागता

मैं उसके प्रश्नों के सामने
सिर झुका लेता

...और मैं महसूस करता कि
ईश्वर कैसे गर्व से फूल जाता

और इस तरह उसका ईश्वरत्व कायम रह जाता!

एक दिन
ईश्वर के जाने के बाद
मुझे लगा कि मेरी गर्दन
सिर झुकाते-झुकाते दुखने लगी है

मुझे लगने लगा कि
एक जिंदा आदमी होने के नाते
मेरी सहनशक्ति जवाब देने लगी है

सो, इस बार जब ईश्वर आया
तब उसने प्रश्न किया
और मैंने उत्तर दिया

प्रत्युत्तर में
उसके पास प्रश्न नहीं था

वह चला गया
तब से नहीं आया

शायद मैंने उसका ईश्वरत्व भंग कर दिया था!!!


ईश्‍वर!

ईश्‍वर!
सड़क बुहारते भीकू से बचते हुए
बिल्‍कुल पवित्र पहुंचती हूं तुम्‍हारे मंदिर में

ईश्‍वर!
जूठन साफ करती रामी के बेटे की
नज़र न लगे इसलिए
आंचल से ढंक कर लाती हूं
तुम्‍हारे लिए मोहनभोग की थाली

ईश्‍वर!

Thursday, October 01, 2009

ब्लौगर हलकान सिंह 'विद्रोही' का चेन्नई आगमन

अब क्या कहें, ये हलकान सिंह विद्रोही आजकल जहां देखो वहीं दिख जाते हैं.. पहले कलकत्ता में शिव जी के साथ मटरगस्ती कर रहे थे.. फिर कानपूर में अनूप जी को कथा कहानी सुनाने लगे.. अब जब वह चेन्नई आये थे तब उन्होंने मुझे बताया कि एक दिन वे भटकते हुये मेरे पुराने पोस्ट पढ़ने लगे.. देखा कि यह तो अमूमन जिस किसी ब्लौगिये से मिलता है उस पर एक-दो पोस्ट तो ठोक ही देता है.. और उसमें किसी की बुराई तो छोड़ो, टांग खिंचाई भी नहीं करता है.. तो चलो चेन्नई भी घूम ही आते हैं.. और कुछ नहीं तो एक ठो पोस्टवा तो ठेल ही देगा पीडी.. कुछ हो ना हो मगर उसमें मेरे ब्लौग का लिंक लगा दिया तो चिट्ठाजगत के हवाले में एक और लिंक जुड़ जायेगा.. चिट्ठाजगत रैंकिंग में कुछ जुगाड़ तो होगा सो अलग, ब्लौगवाणी में एक पसंद भी उससे जुड़वा ही लेंगे..

यहां आने के बाद जब उन्हें पता चला कि पीडी तो आजकल मूडिया लेखन कर रहा है.. अब जब उसे मूड होता है तभी किसी के बारे में लिखता है.. यह बात उन्हें तब पता चली जब मैंने उन्हें बताया कि कलकत्ता में आपके चहेते शिव जी से मिला, पूरा दिन उनके साथ बिताया.. मगर एक भी पोस्ट नहीं लिखा.. मुझसे पूछ बैठे कि ऐसा क्यों? काहे नहीं लिखे उनपर? वो तो ऐसे भी हिंदी ब्लौगजगत के नामचीन जेंटलमैन ब्लौगिये बन चुके हैं.. फिर भी नहीं लिखे कुछ? मैंने बहाना बनाना शुरू किया कि घर पर नेट नहीं है.. ऑफिस में काम से फुरसत नहीं है.. इत्यादी.. इत्यादी.. मगर वह संतुष्ट नहीं हुये और मेरा लैपटॉप मांग कर टटोलने लगे उसमें देखे कि दो-तीन पोस्ट टाईप कर के रखा हुआ है, मगर पोस्ट नहीं है.. उसे पढ़ते ही उनके आह्लादित मुख पर मुस्कान फैल गई.. उन्होंने कहा, "बहुत अच्छा लिखते हैं आप.. लिखते रहें.. हिंदी ब्लौगिंग का नाम आपसे रौशन होगा.."

अब हमें ऐसे कमेंट से आश्चर्य नहीं होता है.. पहले तो जैसे ही ऐसा कमेंट आता था बस जोर का झटका लगता था.. भला हम बहुत अच्छा कब से लिखने लगे? और यह कहीं किसी ज्योतिष वाले ब्लौग से तो यहां नहीं आ रहे हैं जो भविष्यवाणी भी कर दिये हैं? मगर अब इन बातों पर भी कितने दिनों तक आश्चर्य करते रहेंगे? अगर आश्चर्य लगातार करते रहें तो हमारा तो शक्ल ही वैसा दिखने लगेगा.. कुछ-कुछ विश्मयकारी चिन्ह जैसा.. एक छोटी सी लकीर और उसके नीचे एक बिंदू.. मुझे उनकी बात सुनकर बचपन के मास्टर की याद आ गई जो बात-बात पर भविष्यवाणी करते थे, "पढ़ाई-लिखाई साढ़े बाईस.. बड़ा होकर घास काटेगा तुम.."

सच में भारत महान ज्योतिषियों का देश है, जहां हर दस में से आठ हमेशा कुछ ना कुछ भविष्यवाणी करते दिख ही जाते हैं.. चुनाव के समय नेता लोग अपने वादों को भविष्यवाणी का रूप देकर इतने आत्मविश्वास के साथ अपनी बात रखते हैं जैसे वह तो अकाट्य सत्य है.. उसे होने से कोई नहीं रोक सकता है.. क्रिकेट शुरू होने से पहले मीडिया और क्रिकेट खिलाड़ी भी वही रवैया अपनाते हैं.. वैसे होता ढाक के तीन पात है, यह मुझे बताने की जरूरत नहीं है..

खैर लगता है मैं विषय से भटक रहा हूं.. मैं तो बैठा था ब्लौगर हलकान सिंह 'विद्रोही' जी के चेन्नई आगमन के बारे में लिखने, मगर चाय की चुस्कियों में कहीं और खो गया.. हां! तो मैंने बातों ही बातों में शिव जी के पोस्ट का हवाला देते हुये पूछा, "आपके कितने ऐसे ब्लौग हैं जिस पर आप अनाम बन कर लिखते हैं?" मैं सोच रहा था कि यह प्रश्न सुनकर थोड़ा तो सकपकायेंगे, मगर वे तो खी-खी करके हंस रहे थे.. इससे एक सबक सीखा, हिंदी ब्लौगर को निर्लज्ज होना अतिआवश्यक होता है..

वे वैसी ही हंसी हंसते हुये बोले, "कितनों का नाम गिनाऊं? मुझे खुद भी याद नहीं है.. वो तो जब अपना डैशबोर्ड देखता हूं तभी याद आता है.."

"फिर भी! कुछ का तो नाम याद होगा?" मैंने पूछा?

वो एक एक को यादकरके सभी का नाम गिनाना शुरू किये.. ठीक उसी समय मुझे कुछ याद आया और जिसे दो-तीन दिनों से याद करते आ रहे थे मगर बार बार भूल जा रहे थे.. अब क्या करें? ब्लौगिंग करने का हमारा मकसद भी तो यही था.. जो भूली बिसरी बातें हैं उन्हें संजो कर रखने की.. कहीं बाद में फिर से भूल गया तो? मुझे कुछ लिखता देख कर वे सशंकित निगाह से मुझे देखने लगे.. मुझसे पूछे कि क्या लिख रहे हो? मैंने कहा कि कुछ चीजें.. कहीं बाद में भूल ना जाऊं.. मगर वो आश्वस्त नहीं हुये..

मुझे सावधान करते हुये कहने लगे, "ये आप सनसनी फैलाने के लिये मेरे सारे अनाम ब्लौग का नाम लिख रहे हैं.. ये सब यहां नहीं चलेगा.. आप गुटबाजी को बढ़ावा देने की कोशिश कर रहे हैं..&^%$#@...." कुछ अपशब्द सुनकर मैंने उन्हें चेताया कि आप ऐसा नहीं कह सकते हैं.. फिर से खिंसे निपोर कर बोले, "मैं कहां, यह तो बेनामी बोल रहा है.." मैंने यह बात साबित करने के लिये कि मैं उनके अनाम ब्लौग का नाम नहीं लिख रहा था, उन्हें अपना नोटबुक दिखाना चाहा.. मगर वह कुछ सुनने को तैयार नहीं और उसी समय विदा हो लिये..

मेरा मूड खराब हो चुका था.. और मेरे नोटबुक का पन्ना हवा में फड़फड़ा रहा था.. जिसमें कभी-कभी कुछ शब्द लिखे दिख रहे थे..

आटा - 5 किलो..
चावल - 5 किलो..
दाल.......

आखिर आज पहली तारीख है तो राशन का भी इंतजाम करना है..

Wednesday, September 30, 2009

मुझे नहीं पढ़ना यह ब्लौग!!


जैसा कि मैं कई बार पहले भी अपने पुराने पोस्ट पर बता चुका हूं, मैं अधिकतर ब्लौग गूगल रीडर की सहायता से ही पढ़ता हूं.. कुछ ब्लौग ऐसे भी मिलते हैं जिसे कुछ दिनों तक देखने के बाद उसमें अपनी पसंद की कोई चीज नहीं मिलती है.. फिर उसे हटा देता हूं..

इसी फीड सब्स्क्रिप्शन/अनसब्स्क्रिप्शन के चक्कर में परेशान हूं.. एक ब्लौग है.. उसे सब्स्क्राईब किया था.. मगर बाद में उस पर अधिकतर सामाग्री किसी एक जाति विशेष से संबंधित पोस्ट होने लगे.. मैंने उसे अनसब्स्क्रिप्शन किया.. उस दिन वह नहीं दिखा.. मगर कुछ दिनों बाद वह वापस अपने उसी जगह पर दिखना शुरू हो गया.. मैं पूरी तरह से कंफ्यूज.. मुझे लगा जैसे मैंने उसे हटाया नहीं था.. फिर से हटाया.. मगर अगले दिन फिर से दिखने लगा..

अबकी बार मैंने उसे हटाने से पहले सारे कूकी और अस्थाई फाईल्स को डिलीट किया और उसे हटाने के बाद भी यही डिलिशन का काम दोहराया.. नतिजा सिफर.. आज फिर जब गूगल रीडर को खोल कर देखा तो पाया वह अपनी जगह पर शान से दिख रहा था और मेरा मुंह चिढ़ा रहा था..

कई साफ्टवेयर ऐसे भी आते हैं जिनका काम दूसरे साफ्टवेयरों को खोप समेत कबूतराय नमः करना होता है.. इन्हें साफ्टवेयर किलिंग कहते हैं.. लगता है अब गूगल रीडर किलिंग नाम का शब्द भी शब्दकोश में जोड़ने की जरूरत है.. ;)

किसी के पास अगर इस समस्या का समाधान है तो कृपया सूचित करें..

Tuesday, September 29, 2009

ब्लौगवाणी के बाद हिंदी चिट्ठाकारिता की दिशा क्या हो सकती थी?

अभी-अभी नेट पर बैठा.. हर दिन की तरह दिन की शुरूवात ब्लौगवाणी से नहीं की.. सोचा कि वह तो बंद हो चुकी है.. मगर जैसे ही अपने ब्लौग पर गया तो पाया कि ब्लौगवाणी के विजेट पर कल के मैसेज के बदले ब्लौगवाणी का लोगो दिख रहा है.. देखकर मन प्रसन्न हो गया.. ब्लौगवाणी का मैसेज भी पढ़ा जिसका लिंक यहां है.. ब्लौगवाणी के नये अवतार के बारे में जानकर और भी अच्छा लगा.. अब उसका इंतजार है..

मैं बैठा सोच रहा था कि अगर ब्लौगवाणी सच में नहीं आती तो हिंदी ब्लौगिंग का ऊंट किस करवट बैठता?

सबसे पहले तो मैं अपने इस ब्लौग की बात कर लूं.. मेरे इस ब्लौग पर लगभग 64000 हिट्स हुये हैं.. जिसमें से लगभग आधे ब्लौगवाणी की ओर से आये हैं.. मुझे अपने शुरूवाती दिनों की भी याद है जब 80 फीसदी ट्रैफिक ब्लौगवाणी देता था.. जैसे-जैसे समय बीतता गया और मेरा गूगल पेग रैंकिंग ऊपर चढ़ता गया, वैसे-वैसे ब्लौगवाणी की भागीदारी कम होती गई.. जो अब कुल 50 फीसदी पर आ गई है.. मतलब आजकल मुझे हर पोस्ट पर ब्लौगवाणी से लगभग 20 से 30 फीसदी ही ट्रैफिक मिलती है, लगभग 10 फीसदी चिट्ठाजगत से, लगभग 50 फीसदी गूगल से और बाकी के श्रोत अन्य हैं..

मतलब कुल मिला कर मैं यह कह सकता हूं कि मुझे अब ब्लौगवाणी के चले जाने से बहुत ज्यादा फर्क नहीं पड़ता.. मगर ऐसे में इसके बंद होने से मुझे बहुत बुरा लगा.. हम जब छोटे होते हैं और माता-पिता पर निर्भर रहते हैं, वहीं बड़े होने के बाद और स्वनिर्भर होने के बाद क्या उन्हें छोड़ देते हैं? कुछ-कुछ मेरे ब्लौग के लिये ब्लौगवाणी का महत्व भी ऐसा ही कुछ है.. किसी अभिभावक की तरह..

मेरी राय में ब्लौगवाणी के बंद होने से उन ब्लौगरों के ट्रफिक पर बहुत ज्यादा फर्क नहीं पड़ता जिनका गूगल पेज रैंक 3/10 या उससे ज्यादा है.. मगर नये ब्लौगरों को जो क्षति पहूंचती वह बयान नहीं किया जा सकता है.. मैंने यह भी देखा है कि नये ब्लौगरों को ही ब्लौगवाणी से अधिक शिकायत होती है.. कि उनके ब्लौग को कोई पसंद नहीं करता या फिर कोई पढ़ता नहीं या फिर कोई कमेंट नहीं करता.. तो यह बात साफ कर देनी चाहिये कि जब वे लगातार अच्छा लिखते रहेंगे तब जाकर 1-2 साल में वे उस स्थिति में पहूंच सकेंगे जहां वे कई ब्लौगरों को देखते हैं.. सिर्फ 3-4 ट्रैफिक खीचने वाले शीर्षक देकर नहीं.. कुछ लोग हैं जो इसके अपवाद हैं और कम समय में ही अपनी पहचान बना लिये हैं..

मैं सभी को यही सलाह देना चाहूंगा कि वे पसंद, ब्लौगवाणी द्वारा आने वाले ट्रैफिक्स और चिट्ठाजगत के रैंक के फेर में ना पड़कर गूगल रैंकिंग और अलेक्सा रैंकिंग के फेर में पड़ें.. तभी वे लंबी दौर में बने रह सकते हैं.. इसी में हिंदी चिट्ठाकारिता की भी भलाई है..

अगर आपके पास भी इस विषय पर कहने को कुछ है तो अपना विचार रखना ना भूलें.. धन्यवाद

Monday, September 28, 2009

बधाई हो, ब्लौगवाणी बंद हो गया है!!!


अंततः ब्लौगवाणी बंद हो गया.. मेरी नजर में अब हिंदी ब्लौगिंग, जो अभी अभी चलना सीखा था, बैसाखियों पर आ गया है.. मैथिली जी में बहुत साहस और विवेक था जो इसे इतने दिनों तक चला सके.. शायद मैं उनकी जगह पर होता तो एक ऐसा प्लेटफार्म, जिससे मुझे कोई आर्थिक नफा तो नहीं हो रहा हो उल्टे बदनामियों का सारा ठीकरा मेरे ही सर फोड़ा जा रहा हो, को कभी का बंद कर चुका होता..

इससे उन लोगों के दिल को तसल्ली जरूर मिल गई होगी जो पानी पी-पी कर ब्लौगवाणी को कोसने में यकीन करते थे.. कुछ ऐसे भी लोग थे जो अपने ब्लौग पर ट्रैफिक बढ़ाने के लिये भी ब्लौगवाणी को कोसने का काम करते थे.. अब वे भी बेचैन रहेंगे, क्योंकि उन्होंने सोने का अंडा देने वाली मुर्गी को ही हलाल कर दिया है..

अब देखना यह है कि हिंदी ब्लौग पर आने वाले ट्रैफिक पर इससे कितना असर पड़ता है.. मेरा अपना अनुमान है कि लोग अब दूसरे अग्रीगेटरों की ओर भी बढ़ना शुरू करेंगे जिसमें पहला नाम चिट्ठाजगत का होगा.. नारद का इतीश्री तो लोग पहले ही कर चुके हैं.. ब्लौगवाणी के जाने से हिंदी ब्लौगिंगा के एक युग का अंत हो गया है..

मेरा मेरे ब्लौग मित्रों से अपील है कि अब एक अंतिम स्तंभ "चिट्ठाजगत" जो बचा हुआ है, उसके क्रियाक्रम में भी अब जुट ही जाओ.. यह अंतिम बड़ा अग्रीगेटर प्लेटफार्म क्यों बचा रहे? इसे भी स्वाहा कर ही दिया जाये..

अंत में मैथिली जी से मैं आग्रह करना चाहूंगा कि आप अपने फैसले पर पुनर्विचार जरूर करें.. अगर कुछ समस्या हो इसे चालू रखने में तो मुझसे संपर्क करें, मैं यथासंभव मदद करने को तैयार हूं..

Saturday, September 26, 2009

गौतम जी अन्य फौजियों से अलग तो नहीं? फिर ये संवेदनहीनता क्यों?


बस अभी अभी खबर मिली कि हमारे प्रिय गौतम जी जख्मी हैं.. आतंकवादिओं से हमारे देश की रक्षा करते हुये कंधे पर गोली खायी और अभी अस्पताल में हैं.. जैसे ही इसे अनुराग आर्य जी के ब्लौग पर पढ़ा, एक झटका सा लगा.. अधिक छानबीन की तो पता चला कि वह अब खतरे से बाहर हैं.. थोड़ी संतुष्टी हुई.. सोचा कि उन्हें उनके ब्लौग पर शुभकामनायें दे दूं.. पहूंचा उनके ब्लौग पर.. कुछ लिखा भी.. मगर तभी एक विचार ने मुझे बहुत परेशान कर दिया, और मैं यह लिखने बैठ गया..

गौतम जी को मैं बहुत अच्छे से जानता हूं.. वे मेरे एकमात्र कंम्यूनिटी चिट्ठा "हम बड़े नहीं होंगे, कामिक्स जिंदाबाद" के लेखक भी हैं(वैसे कहने को एक और कंम्यूनिटी चिट्ठा है मगर वह सिर्फ कुछ खास मित्रों के लिये ही).. गौतम जी शेरों-शायरी करना और कामिक्स-कार्टून में भी रूची रखते हैं.. उनके जख्मी होने की खबर सुनकर लगभग सदमा लगने जैसी स्थिति में ही पहूंच गया.. कभी फोन पर बात नहीं हुई है, फिर भी अपने से लगते हैं..

एक-दो दिन पहले ही उस मुठभेड़ के बारे में किसी समाचार चैनल पर सुना था जिसमें दो जवान के शहीद होने और तीन के जख्मी होने की खबर भी थी.. जब कभी भी इस तरह की खबर सुनता हूं या पढ़ता हूं तो एक बार ख्याल गौतम जी पर जरूर जाता है.. मगर सोचता हूं कि वह ठीक ही होंगे.. इस बार भी कुछ वैसे ही विचार मन में आये थे.. मगर हर बार की सोची चीज पूरी हो जाये यह संभव नहीं है.. अगर ऐसा हो तो जीने का सलीका ही खत्म हो जाये.. जीवन में मिर्च और सरसो का तड़का शायद इसी अनिश्चितता से मिलता है.. मगर अचानक से अधिक मिर्च पड़ जाने से तकलीफ भी होती है..

अभी जब उनके बारे में पढ़ा तो सदमा सा लगा.. फिर थोड़ी देर बाद अजीब सा महसूस होने लगा.. मैं बैठा सोच रहा था कि क्या वे फौजी जो हमारे दोस्त रिश्तेदार होते हैं, उन फौजियों से अलग होते हैं जिन्हें हम नहीं जानते? अपने परिचित फौजियों को मिली एक जख्म भी सदमा पहूंचाती है, मगर अन्य फौजियों को देश रक्षा में मिली मौत भी हम निर्विकार भाव से न्यूज चैनल पर सुनते हैं.. आखिर यह संवेदनहीनता हमारे भीतर आयी कहां से?

अंत में गौतम जी और अन्य सिपाहियों के जल्द से जल्द ठीक होकर आने की कामना करता हूं.. गौतम जी, आपके अगले गजल का कोई बेसब्री से इंतजार कर रहा है..

Friday, September 25, 2009

जिन्हें गुमान था कि वे सितारे हैं, शायद वह टूट गया

आज दोपहर में मैं खाना खाने के लिये अपने दफ़्तर के ठीक बगल में अवस्थित रेस्टोरेंट "पेलिटा नासी कांधार" गया.. कुछ हद तक कह सकते हैं कि वह चेन्नई के कुछ प्रसिद्ध रेस्टोरेंट्स में से एक है.. कारण यह कि वहां मलेशियन खाना अच्छे गुणवत्ता के साथ मिलता है..

मेरे साथ तीन और लोग थे, और वे तीनों तेलगु हैं.. हमने अपना खाना आर्डर किया और लगे गप्पे मारने.. तभी देखा कि एक आदमी पूरे शान से आया और ठीक मेरे बगल वाले टेबल पर बैठ गया.. लोग बाग भी उन्हीं की ओर बारंबार नजरें इनायत रहे थे.. मगर हमें इनसे कोई मतलब नहीं था, क्योंकि उन्हें पहचानने वाला कोई ना था हममें से.. लगभग पांच मिनट बाद उन तीनों में से एक ने उसे पहचाना और हमें बताया कि वह तमिल सिनेमा का एक सितारा है, तभी लोग उसे नजरें इनायत कर रहे हैं.. मगर फिर भी हम चारों में से किसी ने नजर फेर कर भी नहीं देखा.. सभी आपस में ही हंसी मजाक में मसगूल रहे..

थोड़ी देर बाद हमने पाया कि हमारे बदले वह ही हमें बार-बार पलट कर देख रहा है.. शायद आश्चर्य कर रहा होगा कि ये लोग दूसरों कि तरह क्यों नहीं मेरी ओर ध्यान दे रहें हैं.. जब तक हम वहां से जाते तब तक उसके चेहरे पर से वह मुस्कान गायब हो चुकी थी, अब कारण हमारे द्वारा ध्यान ना देना हो या फिर कुछ और ही.. खैर इतना तो जरूर था कि उसे लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचने की आदत सी हो चुकी थी, मगर यहां लोग जब उसकी ओर ध्यान नहीं दे रहे थे तो उसके चेहरे पर खीज आ चुकी थी.. :)

खैर मुझे उसका नाम भी नहीं पता है, और ना ही मैंने पता करने कि कोशिश की..

आज मेरी कंपनी में गरबा नाच का आयोजन किया गया था, जिसमें मैं भी नाचा और फिर तस्वीरें लेने में व्यस्त हो गया.. बस अभी-अभी वहीं से आ रहा हूं, पसीने से लथपथ.. अगले पोस्ट में उसकी कुछ तस्वीरों के साथ कुछ यहां की सांस्कृतिक जानकारी भी लाऊंगा..

Friday, September 18, 2009

दो बजिया वैराग्य

मम्मी की बातों में अक्सर जहां एक मां की ममता का आवेश छिपा होता है वहीं पापा कि बातों में एक विद्वता का पुट और पूरे जीवन भर के अनुभव का निचोर मिलता है.. जब कभी मानसिक रूप से कमजोर होता हूं तो मम्मी को हमेशा साथ पाता हूं.. वहीं ये सब बाते पापाजी से नहीं कर पाता हूं.. खुद के कमजोर दिखने का एक डर सा बैठा होता है.. जीवन या कैरियर से संबंधित किसी अंतर्द्वंदों में घिरे होने की सी स्थिति में पापाजी से जमकर बातें होती है.. साहित्य संबंधित बातों को लेकर अक्सर हम घंटों फोन पर ही बैठ जाया करते हैं.. किसी जमाने में पापाजी को हिंदी साहित्य में भीषण रस मिलता था(जिसे उन्होंने मेरे होश आने से पहले ही छोड़ दिया) जो कार्य की अधिकता और परिवार की जिम्मेदारियों को संभालते-संभालते ना जाने कब पीछे छूट गया.. उन पर भी खूब चर्चा होती है.. एक तो मुझे भी उनमें रस मिलता है, दूसरी साहित्य संबंधी कई बातों में काफी जिज्ञासा भी होती है और तीसरी बात यह कि मुझे लगता है की इन विषयों पर उन्हें भी कोई बात करने वाला नहीं मिलता है.. कम से कम घर में तो नहीं.. मैंने भी अपने पापाजी के अनुभव से एक बात सीखी है.. प्रशासनिक अधिकारी होने से आप या तो अपने आप में बहुत सिमट कर रह जाते हैं या फिर आपको हर जगह हावी रहने की आदत सी पड़ जाती है.. मेरे पापाजी इनमें से पहले श्रेणी में आते हैं..

पापाजी की समझ में जब से मुझे(हमें) अच्छे-बुरे का ज्ञान हुआ तब से उन्होंने कुछ कहना छोड़ दिया.. बस समय आने पर कम शब्दों में मुझे समझा दिया करते हैं.. कक्षा आठवीं की बात याद है मुझे, जब मैंने परिक्षा में चोरी की थी और पापाजी को बहुत बाद में पता चला था.. उस समय भी उन्होंने कुछ नहीं कहा, और तब भी उन्होंने कुछ नहीं कहा जब उन्हें पता चला कि मैं चेन स्मोकर हो गया हूं.. उन्हें मेरी इन बुरी बातों का ज्ञान है बस इतना ही काफी होता था मुझे अपने भीतर आत्मग्लानी जगाने के लिये..

मुझे एक और आत्मग्लानी अक्सर अंदर से खाये जाती है.. मेरे मुताबिक मैंने अभी तक अपने जीवन में कोई भी ऐसा काम नहीं किया है जिस पर पापा-मम्मी गर्व से कह सकें कि "हां! देखो प्रशान्त मेरा बेटा है.." भैया ने उन्हें इस तरह के इतने मौके दिये हैं कि अब तो उन्हें भी याद नहीं होगा.. भैया सन् 1994 में जब मैट्रिक में गणित में 99 अंक लाये थे तब से उस गिनती की शुरूवात हुई थी, जिसमें आई.आई.टी. में टॉप करना भी शामिल रहा.. भैया उम्र में मुझसे बहुत बड़े नहीं हैं.. ऐसे में हर चीज में मैं उनसे स्पर्धा किया करता था.. और हर चीज में उनसे हारता भी था, चाहे वो कोई खेल हो या पढ़ाई.. उस समय बहुत चिढ़न होती थी.. मगर अब वही बातें अब मैं अपने सभी परिचितों के बीच गर्व से सुनाता हूं कि हां मेरे भैया आई.आई.टी. जैसे संस्थान के टॉपर रह चुके हैं और यू.पी.एस.सी. में भी अच्छे रैंक लाये थे..

मैंने खुद को लेकर अक्सर पापाजी के भीतर कुछ सालता सा महसूस किया हूं.. एक-दो बार उन्हें खुद उन बातों पर अफ़सोस करते भी सुना.. उनका यह मानना है कि जब मेरी पढ़ाई का सही समय आया(मैट्रिक और उसके बाद की पढ़ाई का) तब वो मुझ पर कुछ भी ध्यान नहीं दे पाये.. अगर अपने मन की बात करूं तो उन दिनों मेरे मन में भी कुछ इस तरह की हीन भावना थी कि जितना ध्यान भैया पर उन्होंने दिया उतना मुझपर नहीं.. मगर जब आज के संदर्भ में मैं देखता हूं तो पाता हूं कि भले ही उस समय उन्होंने मुझपर उतना ध्यान नहीं दिया था मगर बाद में जितना सहयोग और आजादी पापा-मम्मी ने ना दिया होता तो आज मैं जो कुछ भी हूं, वह ना होता.. एक के बाद एक खराब अंकों से पास होना, फिर बारहवीं में एक बार फेल होने के बाद भी कभी मेरे मन में किसी भी प्रकार की कुंठा को जगने नहीं दिया.. भले ही इस संदर्भ में वो जो कुछ भी सोचते हों मगर मेरा तो यही मानना है कि मैं आज जो कुछ भी हूं वो सभी पापा-मम्मी के कारण ही..

कभी-कभी पापाजी मुझे धिरोदात्त नायक भी कहा करते हैं.. मुझे बहुत आश्चर्य भी होता है उनकी इस बात पर.. मेरे मुताबिक तो मैं नायक कहलाने के भी लायक नहीं हूं.. फिर धिरोदात्त नायक तो बहुत दूर की कौड़ी है.. शायद यह इस कारण से होगा कि सभी मां-बाप अपने बच्चों को सबसे बढ़िया समझते हैं.. उनकी नजर में उनके बच्चे सबसे अच्छे होते हैं, सच्चाई चाहे कुछ और ही क्यों ना हो..


शादी के तुरंत बाद कि पापा-मम्मी की तस्वीर

बहुत सारी बातें मन में आ रही है.. कुछ इमोशनल सा और कुछ नौस्टैल्जिक सा भी हुआ जा रहा हूं.. कुछ बातें लिख डाली है मैंने, कई बातें लिख नहीं सकता और कई और बातें जो लिखने लायक हैं उसे भविष्य के लिये छोड़ रहा हूं..

परसों ऑफिस छोड़ने से पहले मैंने अपने ट्विटर पर जो अंतिम अपडेट किया था वह कुछ ऐसा था, "हर दिन रात के दो बजे मन दार्शनिक सा हुआ जाता है, आज फिर टेस्ट करके देखते हैं.." अभी भी रात के दो बज रहे हैं और मैं बैठा यह सब लिख रहा हूं.. :)

यह पोस्ट मैंने कल रात बैठकर लिखी थी.. पापाजी को जब इस बारे में बताया था तो उन्होंने इसे दो बजिया वैराग्य का नाम दे दिया.. जो कि इसका शीर्षक भी है.. :)

Wednesday, September 16, 2009

आई.टी. में प्रतिदिन कार्यावधि अधिक होने के कुछ प्रमुख कारण

मेरे पिछले पोस्ट पर दिनेश जी ने कुछ प्रश्न पूछे थे, और स्वप्नदर्शी जी ने अपने कुछ अनुभव बांटे थे..

दिनेश जी ने कहा -
एक पहलू से आप की बात सही है। लेकिन यह समझ नहीं आई कि आईटी वालों को 16-16 घंटे क्यों काम करना पड़ता है जब कि अनेक आईटी प्रवीण बेरोजगार हैं। यह गैरकानूनी भी है और मानव स्वास्थ्य की दृष्टि से गलत भी इतना तनाव अनेक वर्ष तक झेलने पर तो मानसिक रोगी बढ़ जाएंगे।


स्वप्नदर्शी जी ने कहा -
I think in general men in IT companies are changing their jobs in every six months, and some people have used this or that extensive training only to improve CV and negotiation for better salary. And if you put the facts together, it will be quite clear that by not employing women, this cost is not being saved effectively. On the contrary, women like more stability, even if the salary is low and do not change jobs so often. I do not think that even 10% of the men in IT sector have been working for a single company for past 10 years.

I typically work myself about 14-16 hours, sometimes even 20 hours at a stretch. But my Academic setting offers me some flexibility that I can break it the way I want, and can carry some work home. What is needed for women and for men, to perform at their best is to have some kind of support system, flexibility with their partners and with working schedule.

Also, marriage is not the end of productive life, its the beginning, in ever sense for individuals. So I will say that neither factually, and not theoretically, this discrimination is justified.

Apart from everything else, I agree with Dwivediji that its not healthy for any one to work in stress, and even if it is the IT Job, basically it is exploitation of cheap labor, and co-operate sector will do everything to create a culture of inequality, and divide and rule people for their benefit, it can be Women vs. Men, old vs New generation, pregnant Vs. unmarried women, Dalit Vs. Savarn and so on .....

specially in India, so that they have to give minimum benefits to their employees.



मुझे अभी जहां तक अनुभव हुआ है उसके मुताबिक मैं निम्नलिखित कारणों को बड़ी वजह मानता हूं जिस कारण आई.टी. में प्रतिदिन कार्य समय अन्य इंडस्ट्री से ज्यादा होते हैं -

1. Wrong Estimation - अक्सर किसी कार्य को सम्पन्न करने में लगने वाले समय की गणना गलत होने के कारण प्रतिदिन कार्यावधि बढ़ जाया करती है.. ऐसा अक्सर उस समय होता है जब कांट्रैक्ट पाने के लिये कम से कम समय में काम अच्छे गुणवत्ता के साथ खत्म करने का प्रस्ताव क्लाईंट के सामने दिया जाता है और कांट्रैक्ट मिलने पर उस टीम के सभी लोगों को तनाव में आकर कार्य करना पड़ता है.. ये कहीं ना कहीं से बाजार के दबाव के कारण से होता है..

2. कई बार कर्मचारी की अपनी गलती के कारण भी ऐसा होता है.. ऐसा तब होता है जब कार्य की डेड लाईन तय होती है, और कर्मचारी पहले से ना लगकर अंत समय में पूरी उर्जा के साथ कार्य को खत्म करने में लगे होते हैं..

3. कई बार मैनेजर या लीड की गलती के कारण भी ऐसा होता है.. जब मैनेजर या लीड अपनी टीम को अच्छा साबित करने के लिये एक-एक व्यक्ति पर दो-दो लोगों का काम सौंप देते हैं.. अगर दूरगामी प्रभावों की बात करें तो यह कहीं ना कहीं से टीम के लिये नुकसानदेय ही साबित होता है..

4. इस क्षेत्र में कार्य करने वाले अधिकतर युवा ही होते हैं, जो घर से बाहर किसी अन्य शहर में बैचलर जीवन बिताते होते हैं.. अब ऐसे में उनका सोचना होता है कि घर जाकर भी करना क्या है, कम से कम यहां चाय-कॉफी और इंटरनेट तो मिल रहा है.. और बॉस पर भी अच्छा प्रभाव पड़ता है कि यह देर तक रूकता है.. मगर यही आदत बाद में गले का पाश बन जाता है.. क्योंकि बॉस सोचते हैं कि यह बंदा देर तक रूक कर काम करता है, जबकी समय हर समय एक जैसा नहीं होता है..

अन्य कई कारण होंगे और हैं भी, जिसका सामना मुझे अभी तक नहीं करना पड़ा है.. पाठकों से इस पर कुछ और प्रकाश डालने के अनुरोध के साथ यह पोस्ट समाप्त करता हूं..

Tuesday, September 15, 2009

आई.टी. क्षेत्र में लड़कियां

अगर इक्का-दुक्का अपवादों को छोड़ दिया जये तो मुझे ध्यान में नहीं आता है कि कभी किसी महिला को मैं आई.टी. क्षेत्र में प्रोजेक्ट मैनेजर से ऊपर वाले पोस्ट पर कभी देखा हूं.. किसी अच्छे आई.टी. कंपनी में प्रोजेक्ट मैनेजर बनने के लिये औसतन कम से कम 8-10 साल चहिये, और कम से कम 3-4 साल पोजेक्ट मैनेजर पर अच्छे रेटिंग पाने के बाद उससे आगे तरक्की होती है.. मतलब अगर आपके पास औसत रूप से लगभग 15 साल का अनुभव होगा तभी आप उस ऊंचाई तक पहूंच पाते हैं.. मगर आई.टी. क्षेत्र में उतने दिनों तक काम करने वाली महिलाओं कि संख्या शायद आय अंगुलियों पर गिन सकते हैं..

अभी कुछ महिने पहले की बात है, मेरी एक मित्र, जो अभी हाल में ही बी.टेक पास हुई है, मुझसे बोल रही थी, "अभी कुछ दिनों में ही मेरा ज्वाईनिंग आने वाला है और मैंने सुना है कि वहां कभी-कभी 16-17 घंटे भी काम करना पड़ता है.. मैं कैसे करूंगी, मुझे समझ में नहीं आता है.."
मैंने उसे कहा कि जैसे सभी करते हैं वैसे ही तुम भी करोगी.. इस पर उसका कहना था कि मैं लड़की हूं ना इसलिये ऐसा बोल रही हूं.. पहले तो मैंने उसे समझाया कि पहले ही मन में बैठा ली हो कि मुझसे नहीं होगा क्योंकि मैं लड़की हूं, तुम तो आधा जंग यहीं हार गई हो.. मगर उसने वही रट्ट लगा रखी थी.. फिर मैंने उसे किसी भी प्रकार के सलाह देने से मना करते हुये कहा कि अगर तुम इसी सोच के साथ इस क्षेत्र में आना चाहती हो तो मेरी तरफ से कोई सलाह नहीं है..

अभी कुछ महिने पहले मेरी टीम में एक सदस्य की आवश्यकता हुई थी.. साक्षात्कारों का दौर चालू था.. मगर जिस किसी अविवाहित लड़कियों का साक्षात्कार लिया गया था वह बिलकुल अनमने ढ़ंग से.. बाद में अंदर की बात मुझे पता चली कि अविवाहित लड़कियां कब शादी करके छोड़कर चली जायें इसका कुछ ठीक नहीं होता है, सो उनका चुनाव ही ना किया जाये..
मैं यहां किसी को सही या गलत नहीं कह रहा हूं.. अगर मैनेजमेंट के नजरिये से देखें तो वह सही है.. क्योंकि वह किसी को नौकरी पर रखकर उसे ट्रेनिंग देती है और वो 6-7 महिने में छोड़ दे तो घाटा मैनेजमेंट को ही है.. वहीं इसे किसी लड़की के नजरिये से देखें तो एक तरह से उसके साथ भेदभाव किया जा रहा है.. (यह बात और है कि बाद में जिसे रखा गया वह भी जल्दी ही छोड़कर चला गया.. :))

ऐसे ना जाने कितने ही किस्से आस-पास बिखड़े हुये हैं जिसे हम कभी गौर से नहीं देख पाते हैं, मगर जिस बात ने मुझे इनपर गौर करने को विवश किया वह यह कि क्यों लड़कियां आई.टी. क्षेत्र में 15-20 साल लगातार नौकरी नहीं कर पाती हैं, वहीं मैनेजमेंट क्षेत्र या किसी और क्षेत्र में आराम से रम जाती हैं?

Friday, September 11, 2009

आज से ठीक एक साल पहले कि एक पोस्ट

पिछले साल आज के ही दिन मैंने एक पोस्ट लिखी थी, जो मेरे द्वारा लिखी गई सबसे छोटी पोस्ट है.. जिसमें सिर्फ पांच शब्दों का प्रयोग किया गया था.. अब आप इसे माईक्रो ब्लौगिंग भी नहीं कह सकते हैं, यह तो उससे भी छोटा था.. मगर उस पर आये कमेंट्स मजेदार थे.. आज इसे ही पढ़िये..


आज सात साल हो गये


आज सात साल हो गये..


10 टिप्पणी:

दिनेशराय द्विवेदी said...

जिन्दगी चल पड़ती है हर बार रास्ते पर

वक्त कैसे गुज़रता है, पता नहीं लगता



डॉ .अनुराग said...

keep it up....



manvinder bhimber said...

chalna hi jindagi hai...chalte raho



mamta said...

जिंदगी इसी का नाम है।



संगीता पुरी said...

बधाई हो।



Lovely kumari said...

तो पंचम सुर में आलाप कीजिये ...समझा समझा के थक गई मैं पर नही ..



Udan Tashtari said...

किस बात के सात साल हुए??
हमारे भी ९ साल हो गये-पहले आप बताओ फिर हम बतायेंगे. :)



PD said...

अजी अमेरिका पर आतंकवादी हमले के 7 साल पूरे हुये..
यहां तो आये कमेंट पढकर सभी ना जाने क्या क्या सोचेंगे.. :)



अभिषेक ओझा said...

हां हां ये भी खूब रही, ये तो अच्छा रहा की मैं लेट से आया !



Lovely kumari said...

:-)


आज कि बात भी लिख ही देता हूं.. आज आठ साल हो गये.. :)

आज कल कुछ भी लिखने का मन नहीं कर रहा है इसलिये अंट-संट पोस्ट कर रहा हूं.. कई पोस्ट आधी-अधूरी पड़ी हुई है, तो कुछ पोस्ट तो अब आधे के बाद अपनी सार्थकता भी खो चुकी है.. मैं अभी तक टंकी पर नहीं चढ़ा हूं और ना ही मेरी ट्यूब खाली हुई है.. बस लिखने का मन नहीं कर रहा है.. :)

Wednesday, September 09, 2009

पिछले एक महिने का लेखा जोखा

कुछ किताबें जो पढ़ी गई -

साहित्य -
1. मुर्दों का टीला (हिंदी)
2. वोल्गा से गंगा (हिंदी)
3. कतेक डारीपर (मैथिली)
4. मेघदूतम (मैथिली)
5. चार्वाक दर्शन (हिंदी)

तकनीक -
1. ProvideX Language Reference
2. Work Order in ERP System.
3. Job Cost in ERP System.
4. Software Engineering - Roger S. Pressman (अभी भी पढ़ी जा रही है)

जिसे पढ़ना है -
1. Some good books on Advance SQL.
2. Bill of Material in ERP System.
3. MAS 90 and MAS 200 ERP. Level 4 Programming Standards.

Friday, September 04, 2009

रात ख्वाब की कुछ कतरनें

पिछले कुछ दिनों से भैया से बात नहीं हुई है.. अधिकांशतः भाभी से ही बात करके फोन रख देता हूं.. कल रात सपने में भैया को देखा.. क्या देखा यह कुछ ठीक से याद नहीं है, मगर उसमें उन बचपन के दिनों की झलक थी जो कहीं मन के सूदूर कोने में जड़ जमाये बैठी है.. सुबह नींद सात बजे ही खुल गई, जबकी मैं अमूमन नौ बजे बिस्तर छोड़ता हूं.. मैंने आज भी बिस्तर नौ बजे ही छोड़ा मगर जब तक लेटा रहा तब तक भैया के बारे में ही सोचता रहा.. कुछ बचपन की बातें तो कुछ किसोरावस्था की यादें..

एक-एक करके कई सीन नजर के सामने से यूं गुजर रहे थे जैसे कोई पैरेलल सिनेमा देख रहा हूं.. अमोल पालेकर वाला.. भकुवाया हुआ सा मन था और मैं अपने सर पर तकिया दबाये उस सिनेमा का नजारा देख रहा था जो मेरे दिल के बहुत पास है..

भैया को लेकर मुझे जो सबसे पुरानी याद है वो सीतामढ़ी की है.. मैं शायद दो-तीन साल से ज्यादा का नहीं रहा होऊंगा और भैया चार-पांच साल के.. भैया उस दिन स्कूल नहीं जाने की जिद में थे और मम्मी उन्हें घर के बाहर वाली चौकी पर बिठा कर अंदर से किवाड़ बंद करके अपना काम करने चली गई थी.. भैया बाहर बहुत देर तक रोते रहे फिर चुप होने के बाद मुझे खिड़की से झांककर किवाड़ खोलने को बोल रहे थे.. मैंने कोशिश की मगर खोल नहीं पाया था.. फिर क्या हुआ, मुझे याद नहीं.. भैया के स्कूल का नाम "आदर्श ज्ञान केन्द्र" था..



भैया की तस्वीर

कुछ यादें जो कभी भी नहीं भूल सकता हूं.. शायद सन् 1988 या 1989 के जाड़े की रातों में रजाई के अंदर घुस कर भूत-भूत खेलना.. हमारा कमरा, बिस्तर और यहां तक की रजाई भी एक ही हुआ करती थी.. सोने के समय जब अंधेरा हो जाया करता था तब हम दोनों में से कोई अचानक बोलता "भूत आया.." और दोनों रजाई के अंदर घुस जाते.. मिनट भर अंदर रहने के बाद कोई एक बाहर झांक कर देखता और बोलता कि भूत चला गया, और दूसरा भी उसके बातों पर भरोसा करके बाहर निकल आता.. फिर थोड़ी देर बाद कोई बोलता भूत आया, और यह तब तक चलता रहता जब तक हम सो ना जायें.. :)

जाने ऐसी कितनी ही आधी-अधूरी यादें आ रही थी.. जैसे भैया को कैरम बोर्ड में लगातार दो-तीन दिनों तक हराना जिसे मैं आज भी किसी उपलब्धि से कम नहीं मानता हूं.. कारण, भैया मेरे अलवा शायद ही किसी और से कैरम में हारे हों.. कभी-कभी मुझे लगता था कि उन दिनों भैया मेरे साथ कैरम खेलने से दरते भी थे.. अब कितना सच है इसमें ये तो भैया ही बतायेंगे.. उनके साथ बैडमिंटन में हर बार हारना फिर भी अगले मैच के लिये भैया से जिद करना..

यूं तो भैया मुझसे दो साल बड़े हैं मगर बचपन से ही मैं कुछ लम्बा होने के कारण हम दोनों भाई की लम्बाई लगभग बराबर ही रहा करती थी.. हम दोनों भाई आपस में खूब मार-पीट भी करते थे.. मगर मुझे वैसी चीजें भी याद है कि जब कभी भैया के साथ कहीं बाहर जाता था तब मन में हौशला होता था कि भैया मेरे साथ हैं तो डरना क्या, भैया सभी को देख लेंगे.. एक दो ऐसी घटना भी याद है जब भैया ने मेरे लिये दूसरों से मारपीट भी कीये थे और दूसरों से पिट कर भी आये थे.. जैसे स्कूल बस में दसवीं कक्षा के एक लड़के के साथ(भैया उस समय आठवीं में थे)..

मैं उन दिनों को भी याद करता हूं जब मैं पढ़ने में बिलकुल फिसड्डी था और लगभग हर परिक्षा में एक-एक करके असफल होता जा रहा था.. उस समय कई बार मुझे यह अहसास हुआ था कि पापा-मम्मी से ज्यादा इस बात कि चिंता भैया को होती थी..

आठ अगस्त को जब भैया और पापा मुझे छोड़ने के लिये स्टेशन आये थे तब मैंने भैया को कहा, "जब कभी आपके बारे में सोचता हूं तो मुझे बस दो ही बातें याद आती हैं.. पहली बात, कैसे हम दोनों आपस में मारपीट करते थे.. दूसरी बात, कैसे आप मेरे लिये दूसरों से मारपीट करते थे.."

Wednesday, September 02, 2009

ओनम के अवसर पर मेरे ऑफिस में फूलों से बनी कुछ रंगोली

ओनम के अवसर पर मेरे ऑफिस में 31 अगस्त को फूलों से बने रंगोली की प्रतियोगिता रखी गई थी.. उसमें जितने रंगोली बनाये गये थे उन सभी की तस्वीर मैंने अपने मोबाईल कैमरा से उतार ली थी.. सबसे नीचे वाली रंगोली को विजेता घोषित किया गया था..












Tuesday, August 25, 2009

कमीने इफेक्ट, "वैसे मैं भी फ को फ बोलता हूं"


जिधर देखो उधर ही एक ना एक पोस्ट या आर्टिकल "कमीने" सिनेमा का पड़ा हुआ है आजकल.. जैसे यह आज के फैशन का एक हिस्सा बन गया है.. देख भले ली हो मगर यदी कुछ लिखा नहीं तो छीछालेदर होना ब्लौगजगत में आवश्यक है.. और हम तो ऐसा चाहते हैं नहीं, सो चलते चलते हम भी इस धर्म को निबाह ही जाते हैं..

यहां कई गुणीजन विशाल भारद्वाज को गरिया चुके हैं, कुछ आहत हैं, तो वहीं कुछ लोग इसे शानदार कमर्सियल सिनेमा बता कर विशाल भारद्वाज को कुछ नया करने की बधाई दे चुके हैं.. गरियाने वाले अधिकतर लोग इस सिनेमा कि तुलना ओमकारा और मक़बूल से कर रहे हैं, वहीं कुछ लोग इसके अंत में हुई अजिबोगरीब हिंसा को टेरंटिनो के सिनेमा की नकल बता रहे हैं.. वहीं कुछ लोग इसके बहाने टेरंटिनो की क्लासिक किलिंग को भी दाद दे रहे हैं.. अब जबकी लगभग सभी कुछ लिखा ही जा चुका है तो मैं क्या लिखूं? ठीक है, मैं आपलोगों को परदे के बाहर का सिनेमा दिखाता हूं..

21 अगस्त, शुक्रवार रात 9 बजकर 10 मिनट.. दोस्तों का फोन आया कि कहां हो तुम, हम सिनेमा हॉल के बाहर खड़े तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं.. "आखिर इंतजार करें भी क्यों ना? टिकट मेरे ही पास जो था.. :)" मैं चेन्नई के सत्यम सिनेमा के बाईक पार्किंग में बाईक पार्क करते हुये कहा कि बस आ रहा हूं दो मिनट में..

चेन्नई में दो-तीन जगह ही ऐसी है जहां खूबसूरत लड़कियां देखने को मिलती हैं, उसमें से सत्यम मल्टीप्लेक्स भी एक है.. उस पर भी स्वाईन फ्लू(देखा, मैंने फ को फ बोला ना? :)) का हमला बोला जा चुका था.. बहुत सारे लोग मुंह पर कुछ ना कुछ बांधकर घूम रहे थे.. ऐसे में लड़कियों के लिये तो और भी आसानी थी, उनके पास दुपट्टा या स्कार्फ तो हमेशा ही होता है.. आगे इस पर और कुछ ना लिखा जा सकेगा मुझसे.. सुबुक.. :(

अंदर जाते समय चेकिंग हुई, वो चेकिंग भी कुछ ऐसी कि अगर कोई कुछ ले जाना चाहे तो आराम से ले जा सकता है.. जिस स्क्रीन में कमीने चल रही थी उसके अंदर जाकर पता चला की हमारे पांच टिकटों में से दो टिकट एक तरफ थी तो वहीं बाकी तीन टिकट उसी रो के बिलकुल अंत में.. अब सबसे किनारे वाला सीट हो तो देखने में दिक्कत आनी स्वभाविक है.. सो मैंने वह सीट पकड़ी जहां से सबसे अच्छे से सिनेमा दिख सकती है.. हमारे मित्र आफ़्रोज़ मुझसे कहते रह गये कि यहां मैं बैठूंगा, मगर मैंने उन्हें यह कह कर पटाया की मान लो मेरे बगल में कोई लड़की आकर बैठती है तो आज तुम्हें एक भाभी मिल जायेगी.. उस समय तो वह मान गया, मगर जब मेरे बगल में एक लड़का आकर बैठ गया तो उसने फिर जिद पकर ली.. तब मुझे धारा 377 की सहायता लेनी पड़ी.. ;)

खैर सिनेमा शुरू हुई और वह सीन भी आया जब शाहिद कपूर को कोकिन एक गिटार में मिलता है.. जैसे ही उसने कोकिन निकाला वैसे ही पीछे से एक लड़के की आवाज आई, "अरे ये तो सत्तू है.." उसके बगल में से किसी लड़की की आवाज आई, "नहीं यार! कोकिन है.." फिर दो-तीन लड़के-लड़कियों की आवाज आने लगी.. "ये सत्तू है.." "नहीं ये कोकिन है.." मैंने आगे से आवाज लगाई, "हां बेटा! सत्तू है तो लिट्टी बना कर खा ले ना?" मेरे बगल में बैठे आफ़्रोज़ ने मुझे केहुनी मारी और धीरे से फुसफुसा कर मुझे बोलने से मना किया.. फिर पीछे से आवाज आई, "बनाऊंगा, जरूर बनाऊंगा.. मगर तुझे नहीं बुलाऊंगा.." और फिर वे लोग और हम लोग, सभी हंसने लगे.. तब तक सिनेमा फिर से अपनी गती पकर चुका था और सभी उस गति के साथ लय ताल मिलाने लगे थे..

इंटरवल के समय मैं पॉपकार्न वाले काऊंटर के बगल में लगे पोस्टरों को देख रहा था.. तभी पीछे से किसी लड़की की आवाज आई, "एक्सक्यूज मी!!" मैंने बिना उसे देखे उसे जाने का रास्ता देते हुये मुस्कुराते हुये कहा, "सॉरी! आई कान्ट एक्सक्यूज.." फिर उसका चेहरा देखा तो अजीब तरह से मुझे देखते हुये वो काऊंटर के लाईन में लग गई और मैं फिर से पोस्टर को देखने लगा.. तभी फिर पीछे से किसी लड़के की आवाज आई, "एक्सक्यूज मी!!" मैंने उसे भी बिना देखे उसे जाने का रास्ता देते हुये मुस्कुराते हुये कहा, "सॉरी! आई कान्ट एक्सक्यूज.." वो लड़का हंसते हुये आगे बढ़ा और काऊंटर के लाईन मे लगते हुये बोला, "नाइस आन्सर.. आगे से मैं भी यही कहा करूंगा.." अबकी वह लड़की उसे अजीब तरीके से देखने लगी.. पक्के से सोच रही होगी कि सभी लड़के शायद ऐसे ही खिसके होते हैं.. ;)

सिनेमा खत्म हो चुकी थी.. मैं आफ़्रोज़ को अपने बाईक पर बिठाया और घर तक का रास्ता लगभग 10-12 किलोमीटर की दूरी 10-15 मिनट में पूरी की और जिसमें अधिकतम रफ़्तार 90 किलोमीटर प्रति घंटे कि थी.. रास्ते में मैं सोच रहा था कि मैं भी तो 'फ' को 'फ' ही बोलता हूं, तो इस बात को लेकर इतने चर्चे क्यों हैं.. बोलकर दिखाऊं क्या?

ठीक है, ठीक है.. बोल कर दिखाता हूं.. "मेरा नाम प्रफान्त प्रियदर्फी है.." ;)


चलते-चलते -
पहले ही इस सिनेमा की इतनी तारीफ मैंने सुन रखी थी कि मैं बस मस्ती करने के मूड में सिनेमा देखने गया था ना की कोई गूढ़ अर्थ ढ़ूंढ़ने.. ना ही ओमकारा या मक़बूल से इसकी तुलना करने में समय गंवाया.. बस मस्त होकर सिनेमा देखी और खूब इंज्वाय करके वापस आ गया.. अपना तो पैसा वसूल..