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Sunday, September 28, 2008

उड़नतस्तरी पर टिपिया कर मुसीबत ना पालें

कुछ दिन पहले मैंने समीर जी के ब्लौग, उड़नतस्तरी पर सबसे पहले टिपियाने वालों में से था.. टिपियाने को तो मैंने टिपिया दिया, मगर ऐसी मुसिबत पाल ली कि अब सोचता हूं कि आगे से ना टिपियाऊं.. और अगर टिपियाऊं भी तो आगे से आने वाले टिपण्णी ई-मेल के द्वारा प्राप्त करने के लोभ में ना परूं..

अरे दोस्तों अब आप ही बताईये कि मैं करूं तो क्या करूं? एक के बाद एक नहीं भी तो 100 ई-मेल मुझे मिल चुके हैं.. अब एक दिन में 100 मेल मिले और उन्हें पढने का लोभ मैं संभाल ना पाऊं तो इसका मतलब है कम से कम 50 से 75 मिनट बस मैं उसे पढने में ही गंवा दूं.. खैर जब ऊपर वाले कि मेरा मतलब है उड़नतस्तरी जी की यही इच्छा है तो यही सही.. :)

ये पोस्ट मैंने बस यूं ही लिखा है, मस्ती में.. मुझे पता है कि समीर जी इस चुहलबाजी को तो समझ ही जायेंगे मगर मैं यह इसलिये स्पष्ट कर रहा हूं कि कोई और इसे गलत तरीके से ना ले.. समीर जी के किसी भी पोस्ट को उसके टिपण्णी समेत पढने पर और उस पर टिपियाने वाले नये नामों के प्रोफ़ाईल में जाकर उनके ब्लौग पर जाकर देखिये.. बस इतने भर से ही आपको पता चले जायेगा कि हिंदी चिट्ठों का संसार बस ब्लौगवाणी और चिट्ठाजगत तक ही सीमित नहीं है.. वो कहते हैं ना, सितारों से आगे जहां और भी है..


समीर जी का फोटू, उनके औरकुट प्रोफाईल से उड़ाई गई.. :)