2003 में पहली बार घर से बाहर पाँव रखा और दिल्ली कि और निकल पड़ा.. मुनिरका में अपना आसरा बनाया.. हर शहर में एक ही शहर बसता है.. मैंने पाया कि हर शहर में एक ही जैसे मोहल्ले, विद्यार्थियों और बैचलर के रहने के लिए एक ही जैसे गाँव जो अब शहर में तब्दील हो गए हैं, एक ही जैसे शौपिंग मॉल, एक ही जैसे नए और पुराने शहरों का मिश्रण पाया जाता है.. फिर चाहे वो दिल्ली हो, मुंबई हो, चेन्नई हो या कोलकाता.. भाषाएँ बदलती हैं, लोग बदलते हैं, रंग बदलते हैं.. मगर शहर का मिजाज नहीं बदलता.. एक शहर के उन पुराने शहरों में जाने पर वैसी ही खुरपेंच गलियां, वही गंदगी और कमोबेश वही अपराध भी देखने को मिलते हैं.. आप चाहे किसी भी शहर को चुन लें..
दिल्ली जाने पर मुनिरका ने सहारा दिया और चेन्नई आने पर ट्रिप्लीकेन ने.. दोनों ही जगहों का मिजाज एक सा ही.. अंतर सिर्फ इतना मिला कि दिल्ली में बिहारी होने कि पहचान थी और यहाँ उत्तर भारतीय होने की.. घृणा का स्तर भी लगभग एक सा ही.. दिल्ली में एक फायदा मिल सकता था, जो मैंने कभी नहीं लिया.. वह यह की मैं आसानी से अपने बिहारी होने कि पहचान छुपा सकता था.. बोलने में वैसे भी बिहारीपन कम ही झलकता था और बात करने के तरीके में जरा सा बदलाव लाने पर कोई पहचान भी नहीं पाता कि मैं बिहार का हूँ, फिर चाहे खुद को यूपी या एमपी का बता देता.. मगर मन में ख्याल आता कि अगर मेरे जैसे लोग ही खुद को बिहार का मानने से इनकार कर देंगे तो लोग जाने कब मेरी जन्मभूमि का सम्मान करना सीख पायेंगे.. हाँ, चेन्नई में यह पहचान छुपाने का कोई उपाय नहीं था कि मैं खुद को उत्तर भारतीय मानने से इनकार कर दूँ..
उधर मुनिरका में सबसे पहले एक बरसाती टाइप के घर में कुछ दिन रहा, बाद में नीचे एक कमरा खाली होने पर उसमे चला गया.. जहाँ दो या तीन मंजिला से अधिक ऊंचा मकान बनाने का परमिशन नहीं मिल सकता है वहां लोग खुलेआम पांच-छः मंजिल बना कर जिंदगी आराम से निठल्ले होकर काट रहे हैं.. किराया इतना अधिक आ रहा है कि कुछ करने की जरूरत ही नहीं है.. उसी किराए के पैसे से शराब पी-पी कर अपने मकान मालिक को लगभग मरणासन्न स्थिति में भी देख चुका हूँ..
मकान मालिक का एक बेटा था, शायद 10-12 साल का रहा होगा उस समय.. पास के साइबर कैफे में हमने उसे कई बार पोर्न देखते पाया भी था.. लोग उसे कुछ भी गाली दे दें, उसे रत्ती भर भी फर्क नहीं पड़ता था.. मगर कोई उसे बिहारी ना बोले.. उसके लिए बिहारी होना दुनिया की सबसे बड़ी गाली थी, और उसके लिए जान परान देने को भी तैयार रहता था.. खुद उसके जबान पर भैन**-माँ** चढा रहता था, मगर कभी गलती से हमें भी उसने बिहारी नहीं कहा..
वह स्थिति मुझे कुछ-कुछ वैसा ही महसूस कराती थी जैसे आज हमें चमार, डोम, दुसाद इत्यादि बोलने का अधिकार नहीं है अथवा हम नहीं बोलते हैं.. कहीं सामने वाले के अहम को ठेस ना लग जाए.. अथवा हम किसी आपराधिक श्रेणी में ना आ जाएँ..
आज मेरे जितने भी मित्र बिहार से हैं वो गर्व से खुद को बिहारी कहलाना पसंद करते हैं.. कारण मुझे सिर्फ इतना समझ में आता है कि वे सफल हैं.. किसी भी तरह की चुनौतियों का सामना कर सकते हैं.. कुछ हफ्ते पहले NDTV पर रवीश की रिपोर्ट में देखा कि कैसे पंजाब के कुछ हिस्से में चमार जाति के लोग खुद को चमार ही कहलाना पसंद करने लगे हैं.. क्योंकि अब वे सक्षम हैं, अमीर हैं और हीन भावना से ग्रस्त भी नहीं हैं..
चलते-चलते : यहाँ के मेरे कई मित्र अक्सर मुझसे पूछते हैं कि बिहार से इतनी अधिक मात्रा में IAS और IIT के लिए या फिर किसी भी अन्य सरकारी नौकरी में कैसे निकलते हैं, जबकि बिहार में साक्षरता दर भी बेहद कम है? अपनी समझ से उन्हें मैं इतना ही बता पाता हूँ कि बिहार में चूंकि कोई बड़ी इंडस्ट्री नहीं है, और इसी वजह से बच्चों को लोग बचपन से ही घुट्टी पिलाते हैं कि बेटा तुम्हे जब सरकारी नौकरी ही करनी है तो IAS ही क्यों ना बनो.. लोग अपने बच्चों को Engineer या Doctor बनाने से कम पर कुछ भी स्वीकार नहीं करना चाहते हैं.. चाहे इस दौड़ में उनके अपने बच्चों के सपने टूट कर चकनाचूर ही क्यों ना हो जाए.. एक लाल बत्ती तो हर घर के आगे होना ही चाहिए..
दिल्ली जाने पर मुनिरका ने सहारा दिया और चेन्नई आने पर ट्रिप्लीकेन ने.. दोनों ही जगहों का मिजाज एक सा ही.. अंतर सिर्फ इतना मिला कि दिल्ली में बिहारी होने कि पहचान थी और यहाँ उत्तर भारतीय होने की.. घृणा का स्तर भी लगभग एक सा ही.. दिल्ली में एक फायदा मिल सकता था, जो मैंने कभी नहीं लिया.. वह यह की मैं आसानी से अपने बिहारी होने कि पहचान छुपा सकता था.. बोलने में वैसे भी बिहारीपन कम ही झलकता था और बात करने के तरीके में जरा सा बदलाव लाने पर कोई पहचान भी नहीं पाता कि मैं बिहार का हूँ, फिर चाहे खुद को यूपी या एमपी का बता देता.. मगर मन में ख्याल आता कि अगर मेरे जैसे लोग ही खुद को बिहार का मानने से इनकार कर देंगे तो लोग जाने कब मेरी जन्मभूमि का सम्मान करना सीख पायेंगे.. हाँ, चेन्नई में यह पहचान छुपाने का कोई उपाय नहीं था कि मैं खुद को उत्तर भारतीय मानने से इनकार कर दूँ..
उधर मुनिरका में सबसे पहले एक बरसाती टाइप के घर में कुछ दिन रहा, बाद में नीचे एक कमरा खाली होने पर उसमे चला गया.. जहाँ दो या तीन मंजिला से अधिक ऊंचा मकान बनाने का परमिशन नहीं मिल सकता है वहां लोग खुलेआम पांच-छः मंजिल बना कर जिंदगी आराम से निठल्ले होकर काट रहे हैं.. किराया इतना अधिक आ रहा है कि कुछ करने की जरूरत ही नहीं है.. उसी किराए के पैसे से शराब पी-पी कर अपने मकान मालिक को लगभग मरणासन्न स्थिति में भी देख चुका हूँ..
मकान मालिक का एक बेटा था, शायद 10-12 साल का रहा होगा उस समय.. पास के साइबर कैफे में हमने उसे कई बार पोर्न देखते पाया भी था.. लोग उसे कुछ भी गाली दे दें, उसे रत्ती भर भी फर्क नहीं पड़ता था.. मगर कोई उसे बिहारी ना बोले.. उसके लिए बिहारी होना दुनिया की सबसे बड़ी गाली थी, और उसके लिए जान परान देने को भी तैयार रहता था.. खुद उसके जबान पर भैन**-माँ** चढा रहता था, मगर कभी गलती से हमें भी उसने बिहारी नहीं कहा..
वह स्थिति मुझे कुछ-कुछ वैसा ही महसूस कराती थी जैसे आज हमें चमार, डोम, दुसाद इत्यादि बोलने का अधिकार नहीं है अथवा हम नहीं बोलते हैं.. कहीं सामने वाले के अहम को ठेस ना लग जाए.. अथवा हम किसी आपराधिक श्रेणी में ना आ जाएँ..
आज मेरे जितने भी मित्र बिहार से हैं वो गर्व से खुद को बिहारी कहलाना पसंद करते हैं.. कारण मुझे सिर्फ इतना समझ में आता है कि वे सफल हैं.. किसी भी तरह की चुनौतियों का सामना कर सकते हैं.. कुछ हफ्ते पहले NDTV पर रवीश की रिपोर्ट में देखा कि कैसे पंजाब के कुछ हिस्से में चमार जाति के लोग खुद को चमार ही कहलाना पसंद करने लगे हैं.. क्योंकि अब वे सक्षम हैं, अमीर हैं और हीन भावना से ग्रस्त भी नहीं हैं..
चलते-चलते : यहाँ के मेरे कई मित्र अक्सर मुझसे पूछते हैं कि बिहार से इतनी अधिक मात्रा में IAS और IIT के लिए या फिर किसी भी अन्य सरकारी नौकरी में कैसे निकलते हैं, जबकि बिहार में साक्षरता दर भी बेहद कम है? अपनी समझ से उन्हें मैं इतना ही बता पाता हूँ कि बिहार में चूंकि कोई बड़ी इंडस्ट्री नहीं है, और इसी वजह से बच्चों को लोग बचपन से ही घुट्टी पिलाते हैं कि बेटा तुम्हे जब सरकारी नौकरी ही करनी है तो IAS ही क्यों ना बनो.. लोग अपने बच्चों को Engineer या Doctor बनाने से कम पर कुछ भी स्वीकार नहीं करना चाहते हैं.. चाहे इस दौड़ में उनके अपने बच्चों के सपने टूट कर चकनाचूर ही क्यों ना हो जाए.. एक लाल बत्ती तो हर घर के आगे होना ही चाहिए..