तमिल व्याकरण में किसी भी प्रश्न पूछने के लिए अंत में 'आ' का प्रयोग किया जाता है.. जैसे 'पुरंजिदा' का मतलब 'समझ गए?' होता है.. ठीक इसी तरह अंग्रेजी के शब्दों को भी लोग तमिल व्याकरण में ढाल कर लोग उच्चारण करते हैं, जैसे - "टूआ या थ्रीआ".. मतलब "क्या दो" या "क्या तीन".. वेल्लोरा का मतलब अब आप लोग उसी से लगा लें..
दरअसल का कल मैं वेल्लोर गया था.. इसे व्यस्तता तो नहीं कह सकते हैं, हाँ मगर परेशान जरूर था.. मेरे बेहद करीबी मित्रों में से एक 'चन्दन' के पिताजी का स्वर्गवास अप्रैल के महीने में CMC वेल्लोर में हो गया था और उन्ही का मृतक प्रमाण पत्र बनवाने के लिए मैं वेल्लोर गया था.. यूँ तो एक दफे पहले भी जा चुका था, मगर उस दिन काम नहीं हो पाया था.. मगर कल काम भी हो गया और मैं कालेज भी घूम आया..

कल का दिन वैसे भी कुछ खास था, अगर मैं कालेज के सन्दर्भ में बात करूँ तो.. कल के ही दिन, यानी 21 जुलाई 2006 को, मुझे अपनी पहली नौकरी का ऑफर लेटर मिला था.. और संयोग कुछ ऐसा बना कि वर्किंग डे होते हुए भी मुझे छुट्टी लेकर जाना पड़ा..
खैर, सुबह निकला अपनी गाडी लेकर.. हलकी बूंदा-बांदी हो रही थी.. आसमान के साफ़ होने का कोई इरादा भी नहीं दिख रहा था.. मैंने सोचा कि गाडी को बस स्टैंड के पार्किंग में लगा दूँगा और बस लेकर चला जाऊंगा.. मगर एक बार जब निकल गया तो मन में आया कि चल चलूँ इसी से.. पेट्रोल से टैंक फुल करवाया और निकल लिया.. कल जाने क्यों, ट्रैफिक भी कम थी अन्य दिनों की तुलना में..
चेन्नई-बैंगलोर हाईवे का तो मैं बस दीवाना हूँ.. कम से कम चार और अधिक से अधिक आठ लें कि सड़कें.. कहीं एक गड्ढा तक नहीं.. कोई सिग्नल नहीं.. हाइवे और फ्लाईओवर से पटी पड़ी सड़कें.. बीच में या तो फूलों कि क्यारियां लगी हुई हैं या फिर पीले रंग का बड़ा सा डिवाइडर, जिससे रात के समय सामने से आने वाली गाड़ियों कि बत्तियों से आँखे ना चौंधियाए.. चेन्नई से बाहर निकलते ही सबसे पहले श्रीपेरम्बूर(यह वही जगह है जहाँ राजिव गाँधी कि हत्या हुई थी, फिलहाल नेहरू परिवार के हर मृतक सदस्य के समान ही यहाँ भी सैकड़ों एकड़ कि जमीन इनके स्मारक कि भेंट चढा हुआ है) आता है.. हाँ, उससे पहले एक टोल गेट भी है.. शायद टोल गेट से पहले ही बारिश बन्द हो चुकी थी और मेरी रफ़्तार भी 50 से बढ़कर 75 पहुँच गया था.. उससे अधिक की रफ़्तार में चलना मुझे कल नहीं भा रहा था.. आराम से 75 कि रफ़्तार में बढे चलो..
जारी...
मैं कल कुर्ग नामक पहाड़ी इलाके में छुट्टियाँ मनाने जा रहा हूँ.. मंगलवार को वापस लौटूंगा, फिर आगे कि चर्चा करूँगा.. :)
दरअसल का कल मैं वेल्लोर गया था.. इसे व्यस्तता तो नहीं कह सकते हैं, हाँ मगर परेशान जरूर था.. मेरे बेहद करीबी मित्रों में से एक 'चन्दन' के पिताजी का स्वर्गवास अप्रैल के महीने में CMC वेल्लोर में हो गया था और उन्ही का मृतक प्रमाण पत्र बनवाने के लिए मैं वेल्लोर गया था.. यूँ तो एक दफे पहले भी जा चुका था, मगर उस दिन काम नहीं हो पाया था.. मगर कल काम भी हो गया और मैं कालेज भी घूम आया..
कल का दिन वैसे भी कुछ खास था, अगर मैं कालेज के सन्दर्भ में बात करूँ तो.. कल के ही दिन, यानी 21 जुलाई 2006 को, मुझे अपनी पहली नौकरी का ऑफर लेटर मिला था.. और संयोग कुछ ऐसा बना कि वर्किंग डे होते हुए भी मुझे छुट्टी लेकर जाना पड़ा..
खैर, सुबह निकला अपनी गाडी लेकर.. हलकी बूंदा-बांदी हो रही थी.. आसमान के साफ़ होने का कोई इरादा भी नहीं दिख रहा था.. मैंने सोचा कि गाडी को बस स्टैंड के पार्किंग में लगा दूँगा और बस लेकर चला जाऊंगा.. मगर एक बार जब निकल गया तो मन में आया कि चल चलूँ इसी से.. पेट्रोल से टैंक फुल करवाया और निकल लिया.. कल जाने क्यों, ट्रैफिक भी कम थी अन्य दिनों की तुलना में..
चेन्नई-बैंगलोर हाईवे का तो मैं बस दीवाना हूँ.. कम से कम चार और अधिक से अधिक आठ लें कि सड़कें.. कहीं एक गड्ढा तक नहीं.. कोई सिग्नल नहीं.. हाइवे और फ्लाईओवर से पटी पड़ी सड़कें.. बीच में या तो फूलों कि क्यारियां लगी हुई हैं या फिर पीले रंग का बड़ा सा डिवाइडर, जिससे रात के समय सामने से आने वाली गाड़ियों कि बत्तियों से आँखे ना चौंधियाए.. चेन्नई से बाहर निकलते ही सबसे पहले श्रीपेरम्बूर(यह वही जगह है जहाँ राजिव गाँधी कि हत्या हुई थी, फिलहाल नेहरू परिवार के हर मृतक सदस्य के समान ही यहाँ भी सैकड़ों एकड़ कि जमीन इनके स्मारक कि भेंट चढा हुआ है) आता है.. हाँ, उससे पहले एक टोल गेट भी है.. शायद टोल गेट से पहले ही बारिश बन्द हो चुकी थी और मेरी रफ़्तार भी 50 से बढ़कर 75 पहुँच गया था.. उससे अधिक की रफ़्तार में चलना मुझे कल नहीं भा रहा था.. आराम से 75 कि रफ़्तार में बढे चलो..
जारी...
मैं कल कुर्ग नामक पहाड़ी इलाके में छुट्टियाँ मनाने जा रहा हूँ.. मंगलवार को वापस लौटूंगा, फिर आगे कि चर्चा करूँगा.. :)