Wednesday, August 15, 2012

लोनलिनेस इज द बेस्ट फ्रेंड ऑफ़ ओनली ह्युमनस

हम हों चाहे किसी जलसे में
अकेलापन का साथी
कभी साथ नहीं छोड़ता हमारा

हम हों चाहे प्रेमिका के बाहों में
अकेलापन का साथी
कभी साथ नहीं छोड़ता हमारा

हम पा लिए हों चाहे मनुष्यता का शिरोबिंदु
अकेलापन का साथी
कभी साथ नहीं छोड़ता हमारा

हम बैठे हों किसी प्रयाग में
अकेलापन का साथी
कभी साथ नहीं छोड़ता हमारा

बुद्ध ने भी ज्ञान प्राप्त किया था
अकेलेपन में ही
हिटलर ने की थी आत्महत्या
अकेलेपन में ही
बड़ी वैज्ञानिक खोजे भी होती हैं
अकेलेपन में ही

जाने क्यों लेमिंग करता है
सामूहिक आत्महत्या?

मेरी समझ में तो
लोनलिनेस इज द बेस्ट फ्रेंड ऑफ़ ओनली ह्युमनस

Wednesday, August 01, 2012

अतीत का समय यात्री

हम मिले. पुराने दिनों को याद किया. मैंने उसके बेटे कि तस्वीरें देखी, उसने मेरे वर्तमान कि पूछ-ताछ की. सात-आठ मिनटों में हमने पिछले छः-सात सालों को समेटने की नाकाम कोशिश की.

- तुम मोटी हो गई हो!
- मम्मी जैसी हो गई हूँ ना? मम्मी बन भी तो गई हूँ.
और एक बेतक्कलुफ़ सी हंसी...

- तुम शादी कब कर रहे हो? बूढ़े हो जाओगे तब कोई शादी भी नहीं करेगी तुमसे..
मैं बस मुस्कुरा भर दिया... चार साल पहले कि हमारी बात याद आ गई, जब उसने यही सवाल पूछा था और मेरे यह कहने पर की "थोड़े पैसे तो जमा कर लूं" के जवाब में वह पलट कर बोली थी "बोल तो ऐसे रहे हो जैसे दुल्हन खरीदनी है तुम्हें"

हमें जनकपुरी मेट्रो स्टेशन में बैठने के लिए कोई जगह नहीं मिली थी, सो हम सीढियों पर ही बैठ गए थे...और वहाँ से गुजरने वाले मुसाफिरों की आँखों में चुभ भी रहे थे. कुछ हमारे बगल से बुदबुदाते हुए भी, हमें कोसते हुए, वहाँ से गुजरे....और हम बेपरवाह अपनी ही बातों में मगन.

- कैसा मेट्रो बनाई हो तुमलोग? देखो सीढी हिल रहा है!
लोगों के वहाँ से गुजरने से सीढियों में होने वाले कंपन को महसूस करते हुए मैंने उसे उलाहना दिया, सनद रहे की मेरी मित्र दिल्ली मेट्रो में ही उच्च पद पर आसीन है.
- अब क्या करें, ऐसा ही है..
आँखें नचाते हुए उसने ऐसे जवाब दिया कि मैं हंसने लगा..

- समय कैसे गुजर जाता है, लगता है कल की ही बात है और हम सीतामढ़ी में अपनी कॉलोनी में हंगामा मचाते फिरते थे..
- हाँ, और मैं तुमको एक रूपया दिया था...चुकिया वाली गुल्लक लाने के लिए.. जो तुम्हारे स्कूल वाले रास्ते में बिकता था.
- और मैं ले ली थी?
विस्मयकारी भाव चेहरे पर लाते हुए उसने पूछा
- हाँ...
- मैं भी ना..पता नहीं कैसे ले ली थी?
- लेकिन अगले दिन वापस कर दी थी..शायद आंटी डांटी होगी..
इस दफे दोनों ही साथ-साथ हँसे...

- पता है? मैं भी कार चलाना सीख ली..लेकिन अभी स्टेशन से घर तक पहुँचते-पहुँचते मैं पसीने से भींग जाती हूँ..
- कार में एसी नहीं है क्या?
- है ना...लेकिन सीसा चढा रहेगा तो हाथ निकाल कर "हटो-हटो" कैसे चिल्लायेंगे?
"हटो-हटो" कहते समय उसका हाथ भी ऐसे ही हिल रहा था जैसे सामने वाले कार को हटने के लिए बोल रही हो...
- साफ़-साफ़ बोल दो ना कि मेरे घर के आस-पास मत दिखना नहीं तो तुम्हारे एक्सीडेंट के जिम्मेदार हम नहीं होंगे.. इशारों में क्यों धमका रही हो?
फिर से एक हंसी..दोनों कि ही साथ-साथ..

फिर वो अपने घर के लिए निकल ली.. कुछ देर बार उसका एस.एम.एस. आया, "इतने दिनों बाद मिलकर लगा कि कुछ रिश्ते कभी नहीं बदलते. लगा कि तुम पूछोगे की इंस्टीट्यूट जाना है क्या? ऐसे ही रहना." मुझे सहसा याद हो आया, जब पटना में किन्हीं वजहों से लगभग सात-आठ महीने उसे रोजाना एल.एन.मिश्रा इंस्टीट्यूट उसे छोड़ने जाता था.. भले ही मुझे कितना भी जरूरी काम क्यों ना रहा हो, उसकी प्राथमिकता को बाद में रखकर.. मैंने जवाब में लिखा "कुछ चीजों को नहीं ही बदलना चाहिए"

कुछ लोगों से मिलते वक्त हम अपना चोंगा उतार कर मिलते हैं.. मगर ऐसे लोग जिंदगी में कम ही होते हैं... जिंदगी कि भी अपनी ही रफ़्तार होती है.. सामने देखो तो वक्त कटता नहीं रहता है, पीछे देखो तो वक्त मानो लाईट-स्पीड को भी मात देती दिखती है.. जनकपुरी पश्चिम मेट्रो स्टेशन से हम दोनों की ही मेट्रो अलग दिशाओं में भागती चली जा रही थी...
"27-July-2012"