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Saturday, January 31, 2009

हौले से चढ़ता सा एक नशा

यह नशा कुछ वैसा ही है जो धीरे से चढ़ता है मगर जब चढ़ जाता है तो सर चढ़ कर बोलता है.. अमूमन होता यह था कि मैं जानबूझकर अपना मोबाईल घर में छोड़ आता था मगर कल मैं गलती से अपना मोबाईल घर में ही भूल गया.. घर से कोई फोन तो नहीं आया मगर दोस्तों के मिस्ड कॉल पड़े हुये थे..

सबसे ज्यादा गार्गी के.. शायद छः.. मैं सोच में आ गया कि आमतौर पर यह लड़की बस एक छोटा सा कॉल करके फोन करने को कहती है या फिर मिस्ड कॉल देकर छोड़ देती है और मेरे फोन का इंतजार करती है.. आज क्या बात हो गई जो इसने इतने सारे मिस्ड कॉल दे डाले? थोड़ी चिंता भी हुई कि ऐसी क्या बात हो गई, मगर रात बहुत हो जाने के कारण पलट कर फोन नहीं किया..

सोने से पहले शिवेन्द्र आकर पूछ गया की गार्गी की शादी तय हो गई है, तुम्हे पता है? मुझे यह सुनकर यकायक पहली जनवरी का दिन याद आ गया जब गार्गी के मुंह से गलती से निकल गया था कि शायद अप्रैल तक वह शादी करेगी, सो अपनी छुट्टी बचा कर रखना.. मैंने शिव को कहा कि यह तो पता था कि शादी होने जा रही है मगर तारीख नहीं पता था.. लगे हाथों शिव ने तारीख भी बता दिया..


गार्गी और नीरज, हमारे एम.सी.ए. फेयरवेल वाले दिन

बिलकुल अनमने भाव से मैंने सुना और सोने की कोशिश करने लगा.. मगर मेरे लिये यह खबर किसी अच्छे विदेशी शराब के नशे से कम नहीं है जो बहुत धीरे-धीरे चढ़ता है मगर जब चढ़ता है तो सर चढ़ कर बोलता है.. एक एक करके कालेज के वे सारे दिन याद आ गये जब मैं एम.सी.ए. करने वेल्लोर इंस्टीच्यूट ऑफ टेक्नोलोजी पहूंचा था और पहली बार गार्गी से कालेज में मुलाकात हुई थी.. कुछ दिनों बाद नीरज(जी हां यही महाशय हैं जिनसे शादी होने जा रही है) भी आकर एडमिशन ले लिया था.. गार्गी और नीरज दोनों ग्रैजुएशन के समय से ही मित्र थे.. जिस दिन नीरज ने इसे प्रोपोज किया था उस दिन कैसे अपनी खुशी मुझे जता रही थी, जैसे हवाओं में अपने ठिकाने को तलाश रही थी.. गार्गी के चलते नीरज से भी अच्छी मित्रता हो गयी.. जाने कितनी ही बार इन दोनों के झगड़े को मैंने और विकास ने सुलझाने की कोशिश कि जो हमेशा सफल ही होती थी..

कक्षा में मैं और गार्गी लगभग हमेशा साथ ही बैठते थे, इसे नीरज के साथ बैठने से ज्यादा पसंद मेरे साथ बैठना था.. क्योंकि नीरज तो पढ़ने-लिखने में मस्त रहता था और मैं और गार्गी पूरी कक्षा में बदमाशी करते थे.. :) कभी किसी को चॉक से मारना, तो कभी चीट लिख कर एक दूसरे को पास करना.. आखिर परीक्षा के समय नोट्स के लिये नीरज होता ही था.. मोतियों जैसे सुंदर अक्षर और उसमें भी लिखने की रफ्तार ऐसी कि शिक्षक के मुंह से निकला एक-एक शब्द उसके कॉपी में होता था.. बस उसका फोटोकॉपी करालो और हो गई परीक्षा.. ;)


नीरज, मैं और गार्गी(बायें से), पॉंडीचेरी में

घर आने के समय ट्रेन में सफ़र करते हुये रास्ते भर चुहलबाजी और हंसी-मजाक का दौर.. कौक्रोच को देखकर गार्गी का डर से हालत खराब होना.. कई बार छोटी-छोटी बातों पर भी इतना झगड़ा हो जाना कि कई दिनों तक बात भी ना होना, मगर फिर जब बात शुरू हो तो ऐसे कि कभी कुछ हुआ ही ना हो.. पांचवे सेमेस्टर के मध्य में मेरे कुछ निजी परेशानी की वजह से गार्गी से कुछ दूरी सी आ गई थी.. मैं उन दिनों बहुत चिड़चिड़ा हो गया था.. और यह दूरी छठे सेमेस्टर में भी रही.. मगर कालेज खत्म होने के बाद और गार्गी के चेन्नई आने के बाद सब कुछ पूर्ववत हो गया..

क्या-क्या गिनाऊं? बहुत यादें हैं याद करने को.. ढ़ेर सारी खट्टी-मीठी यादें जिसे याद करके खुशियां ही मिलती है.. कभी नीरज पुराण भी सुनाऊंगा आप लोगों को.. आज गार्गी पुराण से ही काम चला लिजिये.. फिलहाल तो मैं सोच रहा हूं की इनके शादी में छुट्टियां लेकर अपने घर जाना और इनकी शादी में शामिल होना, यह दोनों मैनेज कैसे करूंगा? इनकी शादी सप्ताह के मध्य में जो है.. खैर उस समय का उस समय देखा जायेगा.. :) वैसे आज दफ़्तर में काम कम होने के चलते गार्गी से खूब बातें की मगर फिर भी बातें कम हो गई.. अब कल फिर फोन करता हूं..

Thursday, December 18, 2008

सौ में सौ से ज्यादा नंबर कैसे लायें?

मैंने कुछ दिन पहले अपने कालेज के दिनों का एक पोस्ट लिखा था कि कैसे साफ्टवेयर इंजिनियरिंग पेपर हमे परेशान कर रखा था.. खैर पहला इंटरनल निकल चुका था और उसमें हम सभी फेल हो चुके थे.. अब सुनते हैं आगे का किस्सा..


जब हमने अपनी-अपनी कॉपी देखना शुरू किया तब पता चला कि कॉपी चेक करने वाली मैम को हूबहू किताबी भाषा चाहिये थी और जिसने भी किताबी भाषा का प्रयोग बखूबी किया था बस वही पास हुआ था.. अब जबकी समझ में आ ही गया था तो हम सभी खुद को भरोसा दिला रहे थे, "बेटा तू भी रट्टा मार सकता है.. जो कभी नहीं किया उसे आज कर ही डालो.. मतलब रट्टा मारो.." विकास ने तो यहां तक एलान कर दिया कि दूसरे इंटरनल में जो भी 45 से ज्यादा नंबर ले आयेगा वो साला रट्टू तोता होगा.. वैसे हमने बाद में अपने बीच एक रट्टू तोता को भी पाया, जिसके बारे में मैं बाद में बताता हूं..

जिंदगी में पहली बार मुझे अपने भीतर छुपी इस कला का भी पता चला कि मैं भी रट्टा मार सकता हूं.. दूसरों का तो पता नहीं मगर मैं और विकास दूसरे इंटरनल के 15-20 दिन पहले से ही रट्टा मारना शुरू कर दिये.. हर दिन और कुछ पढ़े चाहे ना पढ़ें मगर एक-दो पन्ने की साफ्टवेयर इंजिनियरिंग जरूर हो जाया करती थी..


यूं ही करते-कराते दूसरा इंटरनल वाला दिन भी आ गया.. उस रात सभी की हालत पहले से भी खराब हो रही थी.. खासतौर पर शिवेन्द्र, रूपेश और संजीव की.. क्योंकि हम सभी रट्टा मारने में सबसे बड़े फिसड्डी थे सो जहां रट्टा मारने की बात आई वहां हालत खराब होनी ही थी.. कुल मिलाकर सबसे अच्छे हालत में विकास था और उसके बाद मैं.. अगली सुबह शिवेन्द्र ने परिक्षा हॉल जाने से मना कर दिया कि नहीं मैं नहीं जा रहा हूं, अगले सेमेस्टर में फिर से यह पेपर दे दूंगा.. उसकी हालत लगभग नर्वस सिस्टम फेल होने जैसी हो चुकी थी.. हम लोग किसी तरह समझा-बुझा कर उसे ले गये कि कुछ भी नंबर आये, मगर चलो और परिक्षा दे ही दो..

परिक्षा देते समय जितना कुछ पढ़ा था, लगा जैसे सब भूल गया हूं.. खैर कुछ दिन बाद नंबर भी आये और हममे सबसे ज्यादा विकास को ही आये.. पूरे 46, पचास में.. उसी ने कहा था कि जिसका 45 से ज्यादा आयेगा वो होगा पक्का रट्टू तोता और उसने खुद को रट्टू तोता साबित कर ही दिया.. मेरे आये थे 28 या 29.. रूपेश का याद नहीं है मगर शिवेन्द्र और संजीव फिर से पास नहीं कर पाये थे.. पास मार्क 25 था..


फिर सेमेस्टर परिक्षा ने भी दस्तक दे ही दिया.. साफ्टवेयर इंजिनियरिंग शायद अंतिम पेपर था.. जब मैं परिक्षा भवन से बाहर निकला तब मुझे पूरा भरोसा था कि मैं पास तो हो ही जाऊंगा, विकास को सोचना ही नहीं था कि पास होगा या नहीं.. उसे तो अच्छे नंबर की चिंता थी.. शिवेन्द्र और संजीव सोच रहे थे कि अगले सेमेस्टर में फिर से देने कि तैयारी करनी परेगी..


क्लास रूम कि एक तस्वीर, क्लास खत्म होने के बाद का

जब मैं परिक्षा दे कर बाहर आया था तब मुझे पूरा भरोसा था की मैं पास हो जाऊंगा मगर जैसे-जैसे मैं होस्टल की ओर बढ़ रहा था वैसे-वैसे मुझे पता चल रहा था कि मैंने इसका उत्तर गलत लिखा है, तो उसका उत्तर गलत लिखा है.. फिर जोड़-घटाव करके देखा तो पाया जितना मैंने सही लिखा है उसमें अगर पूरे नंबर मिल गये तभी पास होऊंगा, नहीं तो मुझे भी तैयारी शुरू करनी ही चाहिये..

अगले सेमेस्टर की नई सुबह.. रिजल्ट आने से पहले एक दिन मैं और विकास कालेज कैंपस में घूम रहे थे और आने वाले रिजल्ट के बारे में बात कर रहे थे.. ऐसे ही जोड़कर देखा तो पाया कि विकास को अगर पूरे सौ नंबर आते हैं तो उसका 'A' ग्रेड बनेगा और 'S' ग्रेड आने के लिये उसे 108 नंबर चाहिये.. और संयोग ऐसा कि उसी शाम रिजल्ट आया.. नेट पर हमने चेक किया तो पता चला कि विकास के 'S' ग्रेड हैं.. और जिसके पास होने की कोई उम्मीद नहीं थी वह भी पास कर गया है.. कुल मिलाकर हमने यही निष्कर्स निकाला की सभी को ग्रेस नंबर मिले हैं इसी कारण सिर्फ विकास ही नहीं और भी कुछ विद्यार्थियों के सौ से ज्यादा नंबर आये थे.. ऐसा ही कुछ सेकेण्ड सेमेस्टर में माईक्रोप्रोसेसर के पेपर में भी हुआ था..


क्लास के बाहर का गैलरी

तो ऐसे हमे सौ में सौ से ज्यादा नंबर भी मिलते थे.. मगर मुझे कभी नहीं मिला.. ;) जब विकास का नंबर देखा था तब मुझे बचपन में कही पापा की बाता याद हो आयी.. वो परिक्षा के समय आशीर्वाद देते थे कि ऐसा लिखना कि मास्टर बोले बेटा कमाल लिखा है सो इसे सौ में एक सौ आठ दे दूं.. :D

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मेरे पिछले पोस्ट पर मेरे कालेज के छोटे भाई क्षितिज ने कमेंट किया था और पूछा था की भैया आपको भी कहां से इस साफ्टवेयर इंजिनियरिंग कि याद आ गयी? उसका जवाब है, "क्या बताऊं भाई, कालेज में पीछा तो छूटा मगर उस दिन मुझे एक ट्रेनिंग लेने के लिये रिस्क एनालिसिस पढ़कर डाक्यूमेंट बनाना पर रहा था.. सो बरबस ही उसकी याद हो आयी.. अब समझ में आ गया है कि इससे जीवन भर पीछा नहीं छूटने वाला है..":)

आप कभी क्षितिज के ब्लौग पर जाईये और उसकी नज्में पढ़िये.. बहुत शानदार लिखता है.. मगर उसे ज्यादा पाठक कभी नहीं मिलते हैं.. सच कहूं तो इतना बढिया नज्म मैं लगातार कभी नहीं लिख सकता हूं..

Thursday, December 11, 2008

हमारे अठारह, तेरे कितने?

पढ़ाई करो बस एक रात और उसमें भी चाहो कि नंबर आये अव्वल नंबर वाला.. ये कुछ इंसानों के लिये तो संभव है मगर मुझ जैसे साधारण प्राणियों के लिये असंभव.. मगर फिर भी ये आदत पूरे कालेज जीवन में नहीं बदली.. एक बार मैंने जोड़ा कि पूरे सेमेस्टर में कितने दिन मैं पढ़ाई करता था.. पांच जोड़ पांच, कुल जमा दस दिन दो इंटर्नल परीक्षा के लिये और दस दिन सेमेस्टर परीक्षा के लिये और चार दिन लैब परीक्षा के लिये.. सच कहूं तो लैब को छोड़कर बस उसी विषय पर दिल लगा कर पढ़ने कि कोशिश करता था जिसमें लटकने की कोई संभावना नजर आती थी, नहीं तो आराम से बैठे ठाले पिछहत्तर प्रतिशत से ज्यादा नंबर आ ही रहे हैं तो टेंशन काहे का? लैब भी इसलिये दिल लगाकर तैयारी करते थे क्योंकि बस प्रोग्रामिंग में ही तो दिल लगता था, और ऊपर से वो धीरे-धीरे प्रतिष्ठा का भी प्रश्न बन चुका था..

आज मैं आपके पास लेकर आया हूं कुछ कालेज के दिनों की कहानियां.. जिसमें मुझे सबसे पसंद है किस्सा-ए-साफ्टवेयर इंजिनियरिंग..

तीसरे सेमेस्टर में यह पेपर था.. जैसे किसी अन्य विषय कि तैयारी होती थी वैसे ही इसकी भी की गई.. परिक्षा से 3-4 दिन पहले से लेकर परीक्षा के दिन तक फोटो-कॉपी और नोट्स के लिये भागते रहे.. उस समय होस्टल में हम पांच मित्र इकट्ठे ही पढ़ाई किया करते थे.. विकास, शिवेन्द्र, रूपेश, संजीव और मैं.. साफ्टवेयर इंजिनियरिंग की पहली इंटर्नल परीक्षा से एक रात पहले लगे हुये थे सारे नोट्स को घोंट कर पी जाने में.. रात के 1-2 बजते-बजते सभी का बैटरी डाऊन होने लगा.. मगर विकास लगा हुआ था कि नहीं जब तक संतुष्टी ना हो तब तक पढ़ते रहना है..

"अरे यार तू और रूपेश क्यों चिंता करता है? तुम दोनों आज तक कभी फेल हुये हो क्या जो इस बार हो जाओगे? चिंता तो मुझे, संजीव और शिवेन्द्र को करना चाहिये.." मैंने उन दोनों से अपनी बात कही और खुद भी पढ़ने में जुट गया..


साफ्टवेयर इंजिनियरिंग वाली परीक्षा वाले दिन की गर्मी, रूपेश पस्त ;)

जैसे-जैसे रात गुजरती गई, वैसे-वैसे रोमांच और नींद अपनी चरम सीमा पर भी पहूंचता जा रहा था.. अंत में मैंने बस सारे फंडामेंटल बातों को ध्यान में रखा और सोने चला गया.. अगले दिन सुबह जल्दी उठ कर कोई नास्ता करने भी नहीं गया और लग गये पढ़ाई में.. खैर ऐसे ही होते-होते परीक्षा का समय भी आ गया.. हम सभी भागे परीक्षा भवन कि ओर.. आम तौर पर मैं और विकास पहले ही निकल लेते थे क्योंकि शिवेन्द्र और संजीव हमेशा परीक्षा शुरू होने के 5-10 मिनट बाद ही आते थे.. उस दिन भी वैसा ही हुआ.. परिक्षा शुरू हुआ और खत्म भी हो गया.. मैंने जो भी उत्तर लिखा था वो बिलकुल गलत नहीं तो शत-प्रतिशत सही भी नहीं था.. मैं सोच रहा था की शायद घींच-घाच कर पास हो जाऊंगा.. बाद में पता चला कि शिवेन्द्र 1 घंटे 30 मिनट का पेपर बस 45 मिनट में ही करके बाहर आ गया था.. सभी परेशान कि शिवेन्द्र इतनी जल्दी कैसे अपना पेपर खत्म कर दिया और सीना तान कर बाहर आ रहा है, मगर असलियत तो बस वही जान रहा था.. रूपेश का चेहरा ऐसे सूखा हुआ था जैसे कोई मर गया हो और हम सभी होस्टल ना जाकर शमशान जा रहें हों..

3-4 दिन बाद नंबर भी आने शुरू हो गये.. एक दिन साफ्टवेयर इंजिनियरिंग का भी नंबर आ गया.. पता चला कि पूरे 180 विद्यार्थियों में से 6-7 ही पास हुये हैं.. मेरे और शिवेन्द्र के 'नौ' नंबर आये पूरे 50 में.. अपने क्लास से जैसे ही बाहर आया सामने अर्चना दिखी.. पूछा कि तेरा कितना आया? वो बताने से मना कर रही थी कि नहीं बहुत खराब है.. जब मैंने आश्वासन दिया कि कितना भी खराब हो मगर मुझसे ज्यादा ही होगा तब जाकर उसने बताया कि उसके 11 या 13(अब ठीक से याद नहीं है) आये हैं.. अब उसने पूछा कि तुम दोनों के कितने आये? हमने साथ उत्तर दिया हमारे अठारह नंबर आये(हम दोनों ने अपना नंबर जोड़ कर बताया :)).. हम दोनों ऐसे भी लगभग साथ ही रहते थे, सो जो भी मिलता और पूछता कि कितना आया, दोनों बोलते हमारे अठारह आये..

वापस जब होस्टल पहूंचा तो विकास और रूपेश अलग से गाली दे रहा था मुझे, कि तुम्ही ने कहा था कि "तुम दोनों आज तक कभी फेल हुये हो क्या जो इस बार हो जाओगे?" लो तेरे कारण इस बार फेल हो गये.. ;) रूपेश को शायद 15 आये थे और विकास को 20 आये थे.. हां मगर एक बात तो जरूर हुआ कि उसके बाद से मैं जिस किसी को भी ये कहता कि आजतक तुम कभी फेल थोड़े ही हुये हो जो इस बार हो जाओगे? तो सामने वाले का अगला प्रश्न होता कि दुवायें मांग रहे हो या मना रहे हो मेरे फेल होने का?(साथ में गालियां भी) :)

ये बहुत लंबा पोस्ट हो गया है सो, अगले भाग में रूपेश और शिव का नर्वस ब्रेक डाऊन दूसरे इंटर्नल परिक्षा से पहले.. :)


होस्टल में मस्ती के पल
इस चित्र में शक्ल रूपेश की और हाथ मेरा है.. :)

Wednesday, October 01, 2008

नये न्यूज चैनल VMM का खबरिया, प्रशान्त

नमस्कार!! आप देख रहे हैं VMM न्यूज चैनेल.. आज का समाचार आप प्रशान्त प्रियदर्शी से सुनने जा रहे हैं.. आज के मुख्य समाचार इस प्रकार हैं..

*शिवेन्द्र अपने घर बीबीपुर, छपरा के लिये रवाना, वडापलानी चिड़ियाघर में खुशियों का सा माहौल..
*वडापलानी चिड़ियाघर में इंडियन आईडल का धमाल..
*कोलकाता में त्योहारों का उल्लास मगर नीता को अपने पैसे अभी तक नहीं मिलने से उनका मन उदास..
*मुम्बई में लंगड़ा त्यागी जी प्रशान्त कि नयी कविता के इंतजार में.. संजीव के 3-4 कॉल अमित ने मिस किये..
*बैंगलोर में सन्नाटा..
*USA में आर्थिक संकट..
*प्रशान्त ने क्रिकेट टीम से अपना नाम वापस लिया.. चंदन शतक कि ओर..


अब समाचार विस्तार से सुने..
अभी-अभी हमारे विश्वस्त सूत्रों से पता चला है कि शिवेन्द्र कुमार गुप्ता जी अपने घर बीबीपुर जाने के लिये चेन्नई सेन्ट्रल पहूंच चुके हैं.. यह खबर सुनते ही वडापलानी चिड़ियाघर में स्थित हमारे मित्रों में खुशियों की लहर सी दौर गई.. हमारे संवाददाता ने उनसे फोन लाईन पर संपर्क किया और पुछा आपको कैसा लग रहा है.. उन्होंने बताया की बहुत उल्लास पूर्वक वो घर जा रहे हैं.. संवाददाता ने उन्हें याद दिलाया कि बोतल में चूड़ा का भूंजा पैक करके लाना ना भूलें.. वो इन दिनों बहुत परेशान नजर आ रहे थे, उनकी परेशानी दूनी हो गई जब उन्हें पता चला कि 25 वर्ष तक ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिये और 25 से 50 तक गृहस्थ का.. उन्हें पता चला की इस तरह उन्होंने अपना 1 वर्ष और 1 महिना व्यर्थ कर दिया है.. हम उम्मीद लगा रहे हैं कि बीबीपुर से वापस आ कर साथ में अप्नी बीबी का भी हाल समाचार सुनायेंगे.. यह समाचार हम सबसे पहले आप तक पहूंचा रहे हैं.. हमारे दूसरे फोन लाईन पर मौजूद हैं वडापलानी चिड़ियाघर में रहने वाले एक प्राणी विकास..
"हां विकास जी, क्या आप हमें सुन पा रहे हैं?"
घर्रर्रर्र.. "हां कहिये.."
"आपको कैसा लग रहा है?"
"अच्छा हुआ साला चला गया.. कुछ दिन मन को शांति मिलेगी.. एक साला से उसकी सूरत देख-देख कर पक गया था.. दूसरी बात यह है कि जब घर से आयेगा तो खाने-पीने का सामान भी लेता आयेगा.."
"तो आप देख रहे हैं कि वडापलानी चिड़ियाघर के प्राणियों के चेहरे पर कितनी खुशी छाई हुई है.."
सबसे तेज VMM न्यूज चैनल..

आज-कल वडापलानी चिड़ियाघर में स्थित हमारे सभी जानवर गण रात में अपने पिंजड़े में पहूंचते ही ठ्V पर टूट परते हैं.. आज-कल वहां इंडियन आईडल और जरा-जरा नच के दिखा जैसे रियालिटी शो ने धमाल मचा रखा है.. आज-कल प्रशान्त को उनके मित्र विकास, अमित और शिव इंडियन आईडल में भाग लेने के लिये चने कि झाड़ पर चढा रहे हैं.. देखिये कब तक चने कि झाड़ पर प्रशान्त चढने में सफल होते हैं, जिससे कि उन्हें वहां से धक्का दिया जा सके..

दशहरा के पावन मौके पर कोलकाता में खुशियों का सा महौल है.. रोज खरीददारी करके बाकी जगहों के लोगो को जलाया जा रहा है.. उधर हमें अभी-अभी पता चला है कि नीता को अपने पैसे नीरज से वापस नहीं मिले हैं.. वो काफी गुस्से में हैं और उदास भी.. और इस त्योहार में नीरज को गालियों का उपहार देने का सोच रहीं हैं..

आज ही पता चला कि हमारे अनुज कुमार सिंह उर्फ़ 'लंगड़ा त्यागी' काफी दिनों से दूसरों कि कवितायें पढकर बोर हो जाने के कारण से एक अदद कविता कि मांग प्रशान्त प्रियदर्शी के सामने रखे हैं.. उन्होंने धमकी दी है कि अगर जल्द से जल्द उन तक कविता ना पहूंचाई गयी तो वो देशव्यापी बंद का आयोजन करेंगे.. इधर प्रशान्त घबरा कर अपने ऑफिस में ही किसी कविता कि तलाश में जुट गये हैं.. एक कविता को वो जानते थे, मगर वो तो दूसरे ब्रांच में काम करती है..

उधर कल रात अमित ने संजीव भाई के 3-4 बार फोन करने पर भी फोन नहीं उठाया.. हमारे विश्वत शूत्रों से पता चला है कि अमित ने वो कॉल देखा ही नहीं.. मगर अमित कि हालत पतली बताई जा रही है.. उन्हें डर है कि कहीं मुम्बई से भाई लोगों का फोन जबरदस्ती टैक्स वसूलने के लिये तो नहीं था? उन्होंने अभी तक पुलिस को खबर नहीं की है और इससे अपने स्तर से निकलने कि तैयारी में हैं..

आज ही अर्चना का मेल भी मिला, जिसमें उन्होंने कहा एडवांस में हैप्पी ईद और हैप्पी दशहरा.. हाल में हुये बम धमाकों को मद्देनजर रखते हुये इसे एक प्रकार कि धमकी के रूप में लिया जा रहा है.. माना जा रहा है कि इसमें उच्च स्तर के तकनीक का प्रयोग किया गया है.. मुम्बई के किसी Wi-Fi नेट्वर्क को हैक करके यह ई-मेल भेजे जाने कि भी संभावना व्यक्त की जा रहीं है.. विरोधी पार्टी इस ई-मेल कि जांच उच्च स्तर पर किये जाने की मांग कर रहे हैं..

उधर बैंगलोर में काफी सन्नाटा छाया हुआ है.. कहीं से किसी प्रकार कि खबर मिलने कि सूचना नहीं है.. आशंका व्यक्त की जा रही है कि कहीं यह तूफान से पहले की शांति तो नहीं है?

अब चलते हैं कुछ अंतरराष्ट्रीय खबरों कि ओर..
वाणी मिश्रा के USA पहूंचने कि खबर सुनते ही वहां आर्थिक मंदी का माहौल तैयार हो गया है.. माना जा रहा है कि ऐसे कंजूस के वहां पहूंचने से वहां की उपभोक्तावाद संस्कृति पर भी काफ़ी बुरा असर परा है और लोग पैसे खर्च करना बंद कर दिये हैं.. फेडेरल बैंक ने इस स्थिति से बाहर निकलने के लिये $700 बिलियन बाजार में लाने का प्रबंध कर रही थी मगर राष्ट्रपति बुश ने यह सोचकर इसे खारीज कर दिया कि वाणी को तो अब बस 1.5 महिने ही यहां रहना है.. उसके बाद सब खुद ही ठीक हो जायेगा..

अभी अभी हमारे तेज खबरिया रिपोर्टर से पता चला है कि USA में छाई मंदी का असर कोलकाता में भी हुआ है.. नीरज अफ़रा-तफ़री में अपना सारा पैसा बैंको से निकाल कर अपने घर में जमा कर रहे हैं.. उन्हें चोर-लूटेरों का भी भय हो रहा है, मगर वह निश्चिंत हैं की बैंक जैसे चोर-लूटेरों से तो मोहल्ले वाले चोर-लूटेरों अच्छे हैं.. कुछ तो छोड़ ही जायेंगे.. बैंक वाले तो कुछ भी नहीं छोड़ते हैं..

अब कुछ खेल समाचार..
अभी पूरा विश्व दिल थामे बैठे हैं कि कब चंदन अपना शतक पूरा करते हैं.. वो अभी नर्वस नाईन्टी में पहूंच चुके हैं.. 90किलो पार करने के बाद वो अभी संभल कर बल्लेबाजी कर रहे हैं.. उम्मीद जतायी जा रही है कि एक बार 100 पूरा कर लेने के बाद फिर से उनकी धुवांधार बल्लेबाजी देखने को मिलेगी.. इधर चेन्नई में CSS कंपनी के तरफ से आयोजित क्रिकेट टूर्नामेंट से प्रशान्त ने अपना नाम वापस ले लिया है.. माना जा रहा है कि उन्हें चयनकर्ताओ ने जबरी टीम में शामिल कर लिया था..

इसी के साथ आज का समाचार समाप्त होता है.. नमस्कार..

आपको यह समाचार कैसा लगा? आप अपना जवाब हमें इस पते पर दे सकते हैं..
पिंजड़ा नंबर 420,
वडापलानी चिड़ियाघर, चेन्नई-26
या फिर आप हमें ई-मेल भी कर सकते हैं.. पता है - prashant7aug@gmail.com
या फिर आप अपना विचार हमें SMS के द्वारा भी बता सकते हैं.. नंबर है - 9940648140

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यह पत्र मैंने अपने दोस्तों के लिये लिखा था.. इसमें वडापलानी में मेरा घर है जिसे सभी मित्रगण वडापलानी चिड़ियाघर के नाम से बुलाते हैं.. और बाकी सभी मेरे कालेज के मित्रों के नाम हैं.. VMM का फुल फार्म है - VIT MCA Mitra Mandali NEWS Channel.. ;)

Monday, September 29, 2008

कुछ बदनाम गीत जो खूब सुने गये(सुट्टा सांग)

लोग उन्हें बदनाम गीत मानते हैं, मगर किसी कालेज के होस्टल में जाकर देखिये तो पता चलेगा कि कैसे ये बदनाम गीत अच्छे-अच्छे गीतों का बैंड बजा रहे हैं.. अब इसे किसने गाया है, किसने लिखा है और संगीत संपादक कौन है मुझे पता नहीं है.. आप अगर इसके बोल पर ना जाकर बस संगीत और गिटार के धुनों को सुनेंगे तो आपका मन भी झूम उठेगा..

बोल में बस गालियों की भरमार है, सो मैं यहां इसे लिख रहा हूं मगर जहां कहीं भी गालियां होगी वहां आपको सेंसर बोर्ड द्वारा पास किये गये किसी सिनेमा कि तरह बीप ही पढने को मिलेगा.. :) अब मैं गाने को तो एडिट नहीं कर सकता हूं सो आप अगर सुनना चाहते हैं तो नीचे विजेट लगाया हुआ है.. वहां जाकर सुने..

मैं एक बार फिर बताना चाहूंगा कि आप इसके बोल पर ध्यान ना देकर बस गिटार पर ध्यान दें.. सच में जबरदस्त है..

दोस्तों में बैठा, मैं सुट्टा पी रहा..
पापा ने मुझे सुट्टा पीते देख लिया..
घर जब पहूंचा मुझे बीप हो गया..
बीप सुट्टा, सुट्टा ना मिला..
बीप सुट्टा, सुट्टा ना मिला..
बीप सुट्टा, सुट्टा ना मिला..
बीप सुट्टा, सुट्टा ना मिला..

कालेज में गया, मुझे प्यार हो गया..
उसने भी मुझसे मेरा सुट्टा छीन लिया..
सड़कों पे घूमा मैं तन्हा रह गया..
बीप सुट्टा, सुट्टा ना मिला..
बीप सुट्टा, सुट्टा ना मिला..
बीप सुट्टा, सुट्टा ना मिला..
बीप सुट्टा, सुट्टा ना मिला..

शादी हुई, मैं हसबैंड बन गया..
रात भर बीप, मैं थककर गिर गया..
खुशियों की खातिर मेरा सुट्टा छीन गया..
बीप सुट्टा, सुट्टा ना मिला..
बीप सुट्टा, सुट्टा ना मिला..
बीप सुट्टा, सुट्टा ना मिला..
बीप सुट्टा, सुट्टा ना मिला..

बीप सुट्टा, सुट्टा ना मिला..
बीप सुट्टा, सुट्टा ना मिला..
बीप सुट्टा, सुट्टा ना मिला..
बीप सुट्टा, सुट्टा ना मिला..

बीप, बीप, बीप बीप बीप बीप..
बीप, बीप, बीप बीप बीप बीप..
बीप, बीप, बीप बीप बीप बीप..
बीप, बीप, बीप बीप बीप बीप..
:)
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Sunday, September 21, 2008

अनिता जी! मुझको पहचान ना पायेंगी आप, मैं हूं डॉन

आज अनिता जी ने मेरे पिछले पोस्ट पर टिपियाया और पूछा कि कौन वाले आप हैं.. मेरा उत्तर है, मैं हूं डॉन.. अरे चौंकिये मत, ये नामांकरण तो मेरे एक मित्र नीता ने किया था और उसका साथ वाणी भी देती है.. नीता तो अब भी मुझे डॉन ही बुलाती है, वाणी अब बोलना छोड़ दी है.. वैसे मेरा डायलॉग डॉन वाले डायलॉग से कुछ अलग है..

"डॉन को पहचानना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है.."

अनिता जी ने प्रियंका को स्नेह देने के साथ लिखा था - बारिश में बाइक यात्रा, वाह हम तो सोच कर ही मजा ले रहे हैं। प्रियंका को खास स्नेह, इतनी तेज बाइक चलाने के लिए। हम तो कार इस स्पीड में दौड़ाते हैं, दुपहिया तो संभलती ही नहीं। रोड काफ़ी अच्छा लग रहा है। जनाब आप के ब्लोग पर जो आप का फ़ोटो लगा है और ये जो यात्रा वर्णन के फ़ोटोस हैं उसमें तो बहुत अलग लग रहे हैं। कौन से वाले आप हैं?…:)

मेरे कालेज में पढने वाली मेरी एक छोटी बहन अर्चना(कालेज में कभी उससे मिल नहीं सका था, मगर ब्लौग कि दुनिया में आकर उससे जान-पहचान हो गई..) ने भी एक बार यह प्रश्न पूछा था.. "भैया आपकी हर फोटो अलग सी क्यों लगता है?" मैंने उसे कहा था की मैं इस पर कभी विस्तार से लिखूंगा.. आज अनिता जी का कमेंट पढकर इस पर लिखने का मौका मिल गया..

आप इस चित्र को देखिये, मेरे विभिन्न रूप.. किसी भी रूप में मैं आपके सामने आ सकता हूं.. अगर मुझे पहचान सकते हैं तो पहचान लिजियेगा..

इसमे लाल रंग से जिस चित्र पर निशान बना हुआ है, मेरे उसी गेट-अप को देख कर नीता ने मेरा नाम डॉन रखा था..

कहिये आप क्या कहते हैं? :)