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Monday, January 19, 2009

प्रेम करने वाली लड़की जिसके पास एक डायरी थी

उसके पास भी एक डायरी थी.. जिसे वह हर किसी से छुपा कर रखती थी.. जब वह कालेज जाती थी तब वह डायरी उसके कालेज बैग का एक हिस्सा होती थी.. और घर पहूंचने पर उसकी आलमीरा का एक हिस्सा.. अगर कालेज बैग साथ में ना हो तो उसके हाथों कि शोभा बढ़ाती थी वह डायरी.. जो भी उसे करीब से जानता था उसके लिये वह डायरी चंद्रकांता के तिलिस्म से कम नहीं होता था.. कालेज खत्म होने के बाद वही डायरी अक्सर उसके पर्स का एक हिस्सा बन जाया करती है.. साल दर साल बीतते जाते हैं, मगर उसकी डायरी कभी नहीं बदलती है.. हर दिन उसे उसी डायरी के साथ देखने की भी एक आदत सी हो जाती है..

- क्या है इस डायरी में?

- मैं नहीं बताऊंगी..

- मुझे भी नहीं बताओगी?

- नहीं..

- तुम तो कहती थी कि तुमसे कुछ भी नहीं छुपाती हूं मैं.. फिर इसे क्यों छुपा रही हो? क्या वो बातें भूल गई हो?

- नहीं यार! ऐसी कोई बात नहीं है.. कुछ छुपा नहीं रही हूं.. इसमें कुछ है ही नहीं..

- कुछ नहीं है तो मुझे दो देखने के लिये..

- नाह.. नहीं दे सकती..

- तो मैं छीन लूंगा..

- तुम नहीं छीन पाओगे..

- लो मैंने तुम्हारा बैग ले लिया.. इसी में वह डायरी है न?

- मेरा बैग मुझे दे दो..

- मुझे बैग से क्या लेना देना.. ये लो.. लेकीन डायरी ना दूंगा..

.......थोड़ी देर शांति........

- अरे यार!! इतना उदास क्यों हो रही हो? जाओ नहीं पढ़ता तुम्हारी डायरी.. मगर तुम्हे उदास नहीं देख सकता..

- दे दो ना मेरी डायरी.. प्लीज..

- लो.. मगर अब तो मुस्कुरा दो..

- मैं जानती थी कि तुम मुझे दे दोगे.. ये सब तो नाटक था.. डायरी वापस लेने का..

- सोचो, तुम्हे नाटक में भी उदास नहीं देख सकता.. सच में उदास हो जाओगी फिर मेरा क्या होगा?

- देखो आईसक्रीम वाला जा रहा है.. एक आईसक्रीम दिला दो ना..

- इतनी ठंढ में? नहीं.. आज नहीं..

- नहीं मुझे चाहिये.. दिला दो ना.. प्लीज..

- कितनी जिद्दी हो तुम.. चलो..


ऐसा क्यों अक्सर होता है! हर प्रेम करने वाली लड़की के पास एक डायरी होती है.. जिसे वह छिपा कर रखती है.. यहां तक कि अपने प्रेमी से भी.. क्या सच में उस डायरी में कुछ लिखा होता है? या फिर सिर्फ एक गल्प कथा बनाने के लिये ही वह डायरी उसके पास होती है? जिससे सभी को भरमाया जा सके..

Tuesday, January 06, 2009

जाने क्यों हर शय कुछ याद दिला जाती है

पिछले कुछ दिनों से नींद कुछ कम ही आ रही है.. कल रात भी देर से नींद आयी और आज सुबह जल्दी खुल भी गयी.. मगर बिस्तर छोड़कर नहीं उठा.. बिस्तर पर ही लेटा रहा चादर को आंखों पर खींच कर औंधा ही पड़ा रहा.. घर की याद हो आयी.. सोचने लगा कि कैसे जाड़े के मौसम में सुबह-सुबह पापा अपने ठंढ़े हाथों को मेरे गालों से सटा कर मेरी नींद तोड़ते थे और मैं भी वैसे ही नखरे मारता हुआ रजाई में और अंदर घुस जाता था.. यहां ना वो ठंढ़ है, ना पापा और ना ही वो ठंढ़े हाथों का प्यार भड़ा स्पर्श..

नौ बजे सोकर उठा, चाय-कॉफी मैं साधारणतया नहीं पीता हूं मगर आज कुछ चाय जैसी कुछ चीज पीने की इच्छा हो रही थी.. पापा कि एक शिक्षा याद हो आयी जिसका पालन कभी नहीं किया.. वो कहते थे, "आलस्य मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु होता है.." मगर मैंने तो उस शत्रु के साथ दोस्ती गांठ ली है.. कुछ दिन पहले कॉफी लेकर आया था मगर बनाया बस एक बार ही.. आज भी पीने कि इच्छा होते हुये भी नहीं बनाया.. जब छोटा था तब चाय पीने की बात भी जुबान पर लाने से किसी पाप कि तरह होता था, मगर अब कभी घर जाता हूं तो बार-बार पूछा जाता है कि चाय पियोगे या नहीं? बार बार मना करने के बाद भी.. शायद अब पापा-मम्मी को कोई साथ देने वाला चाहिये होता है इसलिये.. थोड़ी देर घर में चहलकदमी करने के बाद एक सिगरेट जलाया.. तीन-चार कश मार कर आधे में ही फेंक दिया.. आज उसे पीने कि इच्छा भी नहीं हो रही थी..

थोड़ी देर कंप्यूटर पर किटर-पिटर करने के बाद तैयार होकर ऑफिस के लिये निकला.. याद आया कि जब घर में था तब कहीं बाहर जाने से पहले पापा-मम्मी का पैर छूकर, आशीर्वाद लेकर निकलता था.. एक रूटीन सा बन चुका था यह जिसका भैया अभी तक पालन कर रहे हैं पटना में.. होस्टल में था तो कमरे की मेज पर पापा-मम्मी की तस्वीर रखे हुआ था, और कालेज जाने से पहले उसी तस्वीर से आशीर्वाद लेकर कमरे से निकलता था.. यहां तो वो भी मैंने अपने ऑफिस के क्यूबिकल में लगा रखा है..

ऑफिस के लिये घर से निकलते ही सड़क को पार करते अपने ही उम्र के एक लड़के-लड़की को देखा.. मुझे उस लड़की कि याद हो आयी.. वो जब मेरे साथ होती थी तो सड़क पार करते समय कसकर मेरा हाथ पकर लेती थी, एक तरह से मेरी ओट में छुप सी जाती थी डरकर और सड़क पार करते ही अपनी झेंप छुपाने के लिये मुझसे लड़ने लगती.. "तुम्हें ठीक से सड़क पार करना भी नहीं आता.. वो कार.. वो ऑटो.. वो साईकिल.. वो बाईक.." और भी ना जाने क्या-क्या.. उसे सड़क पर चलती गाड़ियों से बहुत डर जो लगता था..

रास्ते में एक कालेज के सामने से गुजरते हुये कुछ लड़के आपस में चुहलबाजी करते हुये मिले.. अपने कालेज के दिन याद हो आये.. कैसे बिना बात के एक दूसरे कि टांग खिंचाई होती थी.. रात के दो बजे कैसे मैगी खाने कि लड़ाई होती थी.. कैसे दोस्तों कि खातिर प्रोफेसर तक से बिना आगा-पीछा सोचे बहस करते थे.. कभी किसी दोस्त को किसी नयी लड़की से बात करते देख कर ही हफ्तों तक खिंचाई होती थी, अब भले ही वो उस लड़की को कोई पता ही क्यों ना बता रहा हो.. किसी मित्र को उदास देखकर उसकी उदासी दूर करने को क्या-क्या जतन नहीं होता था.. किसी पेपर में खराब नंबर आने पर घरवालों से ज्यादा मानसिक सहयोग कैसे दोस्तों से मिलता था.. खैर, अब ये भी यादों का ही एक हिस्सा बना रहेगा..

ऑफिस पहूंच कर अपने सामानों को व्यस्त करने के बाद पापा-मम्मी कि तस्वीर देखी और याद आया कि बचपन में पापाजी के ऑफिस जाकर कितना खुश होते थे.. किसी राजकुमार कि भांति पूरे ऑफिस में घूमते थे.. पापाजी की मेज पर शुरू से ही मां सरस्वती कि एक तस्वीर होती है और पापाजी का तबादला जहां-जहां होता रहा वहां सबसे पहले पापाजी उस चित्र को ही स्थापित करते रहे हैं.. भगवान जैसी चीजों पर से आस्था खत्म होने के बाद मेरे लिये तो पापा-मम्मी कि यह तस्वीर ही हमेशा मेरे कार्यस्थल पर लगी रहेगी..

जाने यादों का यह कारवां आज कहां जाकर रूकने वाला है..

Tuesday, November 18, 2008

क्या आवाज में भी नमी होती है

कल शाम एक चिट्ठा बनाया, उसे चारों तरफ से सुरक्षित करके सुकून से बैठ गया.. उसे बनाने का मकसद बस अपने मन कि बातों को, जिसे मैं किसी से कह नहीं सकता.. किसी से बांट नहीं सकता.. बिलकुल एक निजी डायरी कि तरह.. कोई उसे पढ़ नहीं सके.. उसमें बस मैं रहूं और मेरी बातें रहे..

अभी मम्मी का फोन आया.. पूछी कहां हो? घर पहूंच गये क्या? मैं तुरत घर पहूंच कर, कपड़े बदल कर कंप्यूटर चालू करके नेट चलाया ही था.. मम्मी बतायी कि कैसे आजकल मेरी बिटिया(भगीनी) बातें करती है.. मम्मी का फोन आते ही दौड़कर फोन उठाती है और कहती है, "आपको अपनी बेटी से बात करनी है क्या?" और मम्मी के हां कहते ही जोर से चिल्लाती है, "मम्मी! तेरी मम्मी का फोन आया है.."

"तुम्हारे पाहुनजी आज भिवाड़ी ज्वाईन कर लिये हैं.." मम्मी यह खबर सुनायी.. साथ ही यह भी जोड़ दी कि भिवाड़ी में क्या-क्या है घूमने के लिये.. हमारे यहां जीजाजी को पाहुनजी कहने का रिवाज है और हम जीजाजी को पाहुनजी ही बुलाते हैं.. यह फैसला मैं और मेरे भैया, हम दोनों का लिया हुआ है..

बातों ही बातों में मैंने उन्हें अपने इस चिट्ठे के बारे में बताया.. कुछ तकनिकी बातें भी बतायी कि मैंने इसे कैसे सुरक्षित किया है.. मुझे पता है कि उन्हें कुछ समझ में नहीं आ रहा है फिर भी.. फीड को बंद किया, परमिशन हटाया और भी ना जाने क्या-क्या.. मैंने बताया कि मैंने इसे क्यों बनाया? इसे अपनी निजी डायरी कि तरह प्रयोग में लाना चाहता हूं.. मम्मी ने कुछ भी इंटेरेस्ट नहीं दिखाया उसे पढ़ने के लिये..

आगे मैंने कहा कि कोई कुछ भी और कितना भी निजी क्यों ना हो मगर पापा-मम्मी के सामने मेरे लिये कुछ भी निजी नहीं है.. क्या आप सुनना चाहेंगी कि मैंने क्या लिखा है? मम्मी को शायद पता था कि मैं क्या लिख सकता हूं.. उधर से कोई आवाज नहीं आयी.. मैंने सुनाना शुरू किया.. पहला पोस्ट पढ़कर खत्म हुआ.. मम्मी बोली कि अब इस सबसे बाहर निकलो.. भूल जाओ इन सबको.. तब तक मैंने दूसरा पोस्ट पढ़ना शुरू कर दिया..

उसके खत्म होते-होते मम्मी बोली अब नींद आ रही है.. सोने जा रही हूं.. मगर उनके आवाज से एक नमी सी झलक कर मेरे सामने गिर सी गई और मैं उसे बटोरने कि कोशिश करता रह गया..

देखा है कई बार आंखों कि नमी को..
पोछा है उसे इन हाथों से..
मगर मां के आवाज कि नमी का क्या करूं?
इसे तो बस दिल से महसूस किया जा सकता है..

Tuesday, October 21, 2008

तेरे मेरे प्यार का ये रिश्ता कभी ना टूटे

नुसरत के गानों कि खूबी या खराबी जो कहना चाहें वह नाम दे सकते हैं.. वह यह कि जिसे उनका गाना अच्छा लगता है वह किसी और के गाये उसी गीत को कभी पसंद नहीं कर सकता है और जिसे उनके गाने अच्छे नहीं लगते हैं वह किसी भी हालत में उनकी आवाज नहीं सुन सकता है.. अब सुफ़ियाने गानों कि यह खूबी होती है कि जो भी चाहे वह उस गाने को अपनी आवाज और अपनी धुन से सजा सकता है.. यही कारण है कि एक ही गाने कई कई बार, कितने ही गायकों द्वारा और कितने ही अलग धुनों में आपको मिल सकता है.. मगर जिसने एक बार नुसरत की आवाज में कोई गीत सुन लिया, बस.. उसे कोई और आवाज सुहा ही नहीं सकती..

खैर आज मैं बात करता हूं सलाम नाम अलबम के ही अनसुने मगर खूबसूरत नगमों कि जो पिया रे कि जैसे शानदार गीत के सामने छुप सा गया था मगर यह सभी अपने आप में अनमोल नगीने से कम नहीं थे.. यह गीत भी रोमांस के रंग में डूबा हुआ एक बेहतरीन नगमा है जिसमे नुसरत के सुफियाने अंदाज और पाश्चात्य संगीत पर नुसरत के पकड़, दोनों को ही दिखाता है.. इसके बोल कुछ यूं हैं - "मेरे हाथ में, तेरा हाथ हो".. एक कल्पना जिसमें प्रेमिका का हाथ अपने हाथों में आने कि कल्पना में प्रेमी डूबा हुआ है और फिर उसे सारा जमाना अपना लगने लगता है.. इस अहसास को लिखा नहीं जा सकता है इसे बस सुन कर महसूस किया जा सकता है.. सो आप भी इसे महसूस करें..





मेरे हाथ में, तेरा हाथ हो..
महकी हुई, हर रात हो..
हो.. प्यार से जो दिल मिले सपने हैं खिले-खिले..
तेरे मेरे प्यार का ये रिश्ता कभी ना टूटे..
हमसे जमाना चाहे रूठे..

मेरे हाथ में, तेरा हाथ है..

हो.. दिल तुम्ही हो.. मेरी मंजिल तुम्ही हो..
दुनिया को भूल जाऊं मैं तेरे प्यार में..
हो.. दिल तुम्ही हो.. मेरी मंजिल तुम्ही हो..
दुनिया को भूल जाऊं मैं तेरे प्यार में..
सामने बिठा के तुझे प्यार करूं..
पूजा मैं तुम्हारी मेरे यार करूं..
देखे ये जमाना..
ओ मेरी जाने जाना..
संग रहना अपना..

तेरे मेरे प्यार का ये रिश्ता कभी ना टूटे..
हमसे जमाना चाहे रूठे..

मेरे हाथ में, तेरा हाथ है..

मेरे मन में..
ओ दिलबर तन बदन में..
आग लगाने लगी ठंढी ठंढी ये हवा..
ओ..मेरे मन में..
ओ दिलबर तन बदन में..
आग लगाने लगी ठंढी ठंढी ये हवा..
अंखियों में है नशा सा ये छाने लगा..
प्यार भड़ा दिल बहकाने लगा..
दिल है बेकाबू..
चल गया जादू..
आ गले लग जा..

तेरे मेरे प्यार का ये रिश्ता कभी ना टूटे..
हमसे जमाना चाहे रूठे..

मेरे हाथ में, तेरा हाथ है..

प्यार से जो..
मांगे तू जां मेरी..
जान क्या है तुम पे जमाना सारा वार दें..
प्यार की ऊमंगो को जगाया तूने..
जब से है अपना बनाया तूने..
ये चेहरा तुम्हारा..
है जीने का सहारा..
और कहूं मैं क्या?

तेरे मेरे प्यार का ये रिश्ता कभी ना टूटे..
हमसे जमाना चाहे रूठे..

मेरे हाथ में, तेरा हाथ है..
हो.. प्यार से जो दिल मिले सपने हैं खिले-खिले..


Wednesday, October 15, 2008

मत पढिये इसे, सब बकवास लिखा है

आज 2-3 शीर्षकों के ऊपर मैं चर्चा करना चाहूंगा जिसके बाद बुद्धिजिवी वर्ग के प्राणी बहस तक कर सकते हैं कि क्या इस तरह की चिट्ठाकारी को आप साहित्य का दर्जा दे सकते हैं? और उन लोगों का भ्रम भी टूटेगा जो चिट्ठाकारिता को एक साहित्य के रूप में सामने रख कर पढने कि नाकाम कोशिश करते हैं.. तो चलिये चलते हैं पहले बकवास की ओर..

कौवा क्या सोचता होगा?

क्या अजीब शीर्षक है ना? मगर आपने कभी सोचा है कि इतनी जगह से दुत्कारे जाने के बाद भी वो आपके द्वार पर दुबारा क्यों आता है? क्या उसके मन में रोष जैसी भावना नहीं आती होगी? कभी कोई प्रेमिका अपने प्रीतम की याद में(साठ के दशक वाले स्टाईल में सोचे तभी कल्पना कर सकते हैं) किसी कौवे से प्राथना करती दिखेगी तब उस समय एक कौवा क्या सोचता होगा?

बहुत पहले की बात है.. हमने घर में हमने एक तोता पाला था.. बहुत प्यार से.. मेनका गांधी से भी छुपा कर.. एक जाड़े की नर्म धूपा में(कुछ याद आ रहा है क्या? हां जी गाना.. या जाड़े की, नर्म धूपा में.. आंगन में लेट कर.. अर्रर्र.. मैं विषय से भटक रहा हूं, अगर कहीं विषय जैसी कुछ चीज होगी तो..) हम उसका पिंजड़ा रख छोड़े थे.. तभी एक कौवे ने आकर उसे बहुत परेशान किया.. तभी हमें कौवे की एक बात पता चली.. हमारा तोता बेचारा, जब तक वहां कौवा था तब तक कौवे की भाषा में बोलता रहा.. पहले तो हमें लगा कि तोता परेशान होकर कांय-कांय चिल्ला रहा है सो उस कौवे को मार कर भगा दिया.. बाद में खूब सोचा तब जाकर महसूस हुआ कि वो बेचारा तड़प रहा था कौवे से बात करने के लिये.. इतना ज्यादा बेचैन था कि वो सुध-बुध खोकर भूल बैठा कि वो तोता है, कौवा नहीं.. और उसी की भाषा में बोलने लगा.. बाद में पाया कि रात में कभी किसी बिल्ले ने आकर तंग किया तो भी कौवे की भाषा में पुकारता था.. कांय-कांय.. नेवला परेशान करे तो भी वहीं भाषा.. कांय कांय..

मन में आया कि कहीं मैकाले की कोई प्रजाति कौवे में भी तो नहीं थी जिसके कारण मेरा तोता अपनी भाषा का सम्मान करना छोड़कर अंग्रेजों.. आं.. माफ किजियेगा कौवे की भाषा में बोलने लगा है..(कॄपया यह प्रश्न ना उठायें कि कौवे अंग्रेज कब से हो गये या फिर अंग्रेज कौवे कैसे.. एक काला और दूजा गोरा.. दोनो में समानता कैसे.. भई हम ब्लौगरों का यही काम ही होता है.. जो चाहे सिद्ध कर सकते हैं.. वैसे भी भई मेरा चिट्ठा है, मेरा लेख है.. जो मन में आये लिखूंगा).. ;) फिर मैंने सोचा कि जब यही कौवा इतना अच्छा है तो क्यों ना कौवा ही पाल लिया जाये.. वैसे भी एक दिन मेरा तोता पिंजड़े से संन्यास लेकर निकल भागा.. अब संन्यास से फिर कुछ याद आ रहा है.. गांगुली.. अजी क्या बतायें हम.. हमको कितना अच्छा लगता है.. वो भी संन्यास ले लिये हैं..

उस दिन से अब तक प्रतिक्षा में हैं कि कब कोई कौवा उस पिंजड़े में आकर बैठता है.. मगर उसकी प्रजाति में गुलाम होना नहीं लिखा है.. सो अब क्या करें.. देखिये.. आपने तो मुझे विषय से ही भटका दिया था.. विषय था कौवा क्या सोचता होगा? मैंने बहुत सोचा और अंततः समझ भी गया.. वो सोचता होगा "कांव-कांव".. अगर मैं गलत हूं तो साबित करके दिखायें.. :D

चलिये अब दूसरे बकवास की ओर चलते हैं.. क्या अभी भी आपमें इतनी उर्जा बची हुई है कि दूसरा बकवास भी पढेंगे? अगले पोस्ट का इंतजार तो कर लें.. :)

Sunday, September 14, 2008

सच में मम्मी, कहां फंसा दी

कुछ दिन पहले मैंने अपने एक पोस्ट में अपने भतीजे के जन्म पर एक पोस्ट लिखा था की क्या मम्मी कहां फंसा दी.. वो पोस्ट बस एक मजाक भर में लिखा हुआ था.. खुशियों से भरा हुआ.. मगर कभी-कभी सच में लगता है की क्या मम्मी कहां फंसा दी जन्म देकर.. हर दिन एक नयी चुनौती का सामना करना पड़ता है.. नये अंतर्द्वंद सामने आते हैं.. हर समस्या को हम उचित तरीके से हल नहीं कर पाते हैं तो कुछ समस्याओं का समाधान हमारे बस के बाहर की चीज लगती है, जो होती भी है.. कभी कुछ ना कर पाने का दर्द होता है तो कभी कुछ करने पर भी खोने का डर लगा रहता है..

अगर मैं अपने जीवन के अबतक के बीते हुये सालों पर गौर करता हूं तो पाता हूं की मैं जितना पाने के लायक हूं उतना मुझे कभी मिला नहीं है.. खासतौर पर मैं जो कुछ भी पाने के लिये जी-तोड़ मेहनत करता हूं वो मुझे कभी नहीं मिला है.. जिस किसी से बहुत ज्यादा लगाव होता है, वो मेरे जीवन में क्षणभर से ज्यादा नहीं रहता है.. चाहे वो कोई भौतिक पदार्थ हो या कोई मित्र हो या कोई अपना..

कुछ चीजें इतनी अधिक तकलीफ पहूंचाती है जो मेरे सहनशक्ति से बाहर लगता है.. तब मन में ये जरूर लगता है की क्या मम्मी कहां फंसा दी.. पापा-मम्मी से बहुत ज्यादा लगाव है मुझे, मगर उनसे इतनी दूर हो गया हूं कि जब कभी मुझे उनके साथ की जरूरत होती है तब कभी उन्हें अपने पास नहीं पाया हूं.. स्वभाव कुछ ऐसा मिला है कि अपनी बात अपने भीतर ही रख लेता हूं, किसी से मन की कुछ बात कहना भी चाहूं तो कह नहीं पाता हूं.. कई बार ये भी महसूस हुआ है की अंदर ही अंदर घुटा जा रहा हूं..

कहने को तो ब्लौगिंग एक ऐसा संसार है जहां आप अपने मन की बात बिना किसी सोच-संकोच के रख देते हैं, लिख देते हैं.. मगर हिंदी ब्लौगिंग का चरित्र अंग्रेजी ब्लौगिंग से अलग है.. यहां हम सभी सार्वजनिक होते हैं.. अब ऐसे हालात में अपने मन की बात को सार्वजनिक करना भी उचित नहीं होता है.. किसी सीमा में रहकर ही अपने मन की बात लिखता हूं.. सच कहूं तो मैं अभी भी अंदर ही अंदर घुट रहा हूं.. क्या करूं, कहां जाऊं कुछ समझ में नहीं आ रहा है..

जाता हूं मम्मी से बात करने.. उन्हें कहने.. उनसे पूछने.. कि क्या मम्मी कहां फंसा दी जन्म देकर..

कुछ दिनों से ब्लौगजगत से बिलकुल बाहर हो चला था.. अपने कुछ निजी कारणों से.. अपने अगले पोस्ट में बताता हूं यहां चेन्नई में किये गये बाढ सहायता कार्यों के बारे में..

Sunday, June 22, 2008

एक लड़की


एक लड़की,
ख्वाबों में जीने वाली लड़की,
ख्वाबों में ही मेरे पास आती,
ख्वाबों में ही मुझे गले लगाती,
ख्वाबों में ही कभी यूं ही,
मेरी राहों से होकर गुजर जाती,
ख्वाबों में अक्सर मैं उसका होता,
मुझे पाकर कभी वो चूम लेती,
कभी गले लगा लेती,
मुझे पाकर वो खुश होती,
हंसती खिल-खिलाकर,
अक्सर मैं कहता,
एक हंसी उधार दे दो,
मैं हंसता कम हूं,
वो कहती,
मैं आपकी ही हूं,
जो चाहे ले लो,
हकीकत का आभास भी था उसे,
मगर वो ख्वाबों में जीती थी..

एक लड़की,
ख्वाबों में जीने वाली लड़की,