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Thursday, April 28, 2016

मेला

मैंने वो चक्रधरपुर में लगने वाले सालाना मेले से खरीदी थी. दो लीवर लगे हुए थे उसमें. बाएं वाले लीवर को दबाओ तो पीछे के दोनों पाँव झुक जाते थे, मानो बैठ कर खाना मिलने का इन्तजार कर रहा हो. दायें वाले को दबाओ तो आगे के, जैसे पानी पीने को नीचे झुका हो. दोनों को एक साथ झटके से दबाओ तो पूरा शरीर ही ऐसे गिर पड़ता था जैसे अचानक निष्प्राण हो गया हो. वो खिलौना किसी भी जानवर का हो सकता था. कुत्ता, बिल्ली, शेर, जिराफ, मगर सब के सब चौपाये. बन्दर, गोरिल्ला जैसे जानवरों का कोई स्थान नहीं था. 

यूँ तो मेरे पास तीन-चार जानवरों वाले थे, मगर मुझे जिराफ अधिक पसंद था. लम्बा गर्दन, गर्दन में भी तीन लोच जो किसी और जानवर के खिलौने में नहीं था. हलके से दोनों लीवर को दबाओ तो सिर्फ गर्दन हल्का सा झुकता था, मानो सलामी दे रहा हो. मुझे उसका एक खेल बहुत पसंद था, बाएं लीवर को आधा दबाना, और जब पीछे का पैर आधा झुक जाए तो खिलखिला कर हँसते हुए सबको दिखाना, देखो पॉटी कर रहा है. अब भी याद है जब पापा चक्रधरपुर से कुछ दिनों के लिए गए तो वो खिलौना लेकर गए, जब भी हमारी याद आती तो उस खिलौने को देख लेते.

बहुत सी चीजें बचपन की तरह ही ख़त्म हो जाया करती है, वह खिलौना भी. अब किसी बाज़ार में वह नहीं दिखता. किसी खिलौने के दूकान में जाने पर सबसे पहले मैं वही खिलौना ढूंढता हूँ. उसका परिष्कृत रूप कई जगह दिखते भी हैं, मगर मन तो वही पुराने नौस्तैल्जिया में रहता है. कुछ बचपन की बच्चों सी जिद भी, चाहिए तो बस वही चाहिए. और एक दिन हमें पता भी नहीं चलता और हर कुछ ख़त्म हो जाता है. बचपन, भरोसा, खिलौना, उस किस्म का मेला और हाँ, ज़िन्दगी भी.

हम अपने पसंदीदा खिलौने जैसे ही होते हैं. वे अपने तमाम अच्छाइयों-बुराइयों के बाद भी कभी बुरी नहीं लगती. ठीक वैसे ही जैसे हम खुद को कभी गलत नहीं मानते. हम जानते हैं, खिलौने में किस जगह दरार है. किधर से जरा सा टूट गया है. बाएं वाले लीवर को जरा आहिस्ते से दबाना है नहीं तो धागा टूट जाएगा, वह निष्प्राण करने वाला खेल अब और नहीं. लेकिन फिर भी वह हमारा फेवरेट होता है, सालों साल बचा कर रखना चाहते हैं. उससे ना भी खेलें तो भी सही सलामत हमारे शोकेस में टंगा रखना चाहते हैं. क्योंकि हम ऐसे ही हैं. चीजें ऐसी ही होती हैं.