Thursday, April 16, 2015

डिस्क ब्रेक

वो जमाना था जब डिस्क ब्रेक नाम की चीज नई हुआ करती थी. उसी ज़माने में हमारे एक मित्र ने सेकेण्ड हैण्ड CBZ खरीदी दिल्ली जाकर. पटना में शायद सेकेण्ड हैण्ड उपलब्ध नहीं थी और अगर थी भी तो बेहद महँगी. याद है हमें की उस दिन खूब बारिश हो रही थी फिर भी हम घर से कोई बहाना बना कर निकल लिए थे उसकी बाईक देखने. बाईक देखने का अड्डा, या यूँ कहें की हम दोस्तों का अड्डा, नाला रोड में एक दोस्त का घर था..और बारिश की वजह से नाला रोड उस समय नदी रोड बना हुआ था..घुटने से बस कुछ ही कम पानी. अब उस समय तक स्कूटर चलाने में उस्ताद हो चुके थे सो उस पानी में भी हेला दिए हम स्कूटर को..पता था की सायलेंसर से ऊपर तक पानी हो तो कितना एक्स्लेरेटर देना पड़ता है.. 

दोस्त का घर भी नाला रोड में ऐसी जगह पर की वहीं का वहीं पटना का पूरा नजारा एक ही बार में दिखा दे.. कदमकुवां के तरफ से नाला रोड में घुसते ही एक तरफ ठेले वाले उस दो लेन वाली सड़क में घुसे हुए मिलते, वहीं दसेक रिक्शा वाले भी घुसाए रहते..साथ में हम जैसे नए खून और लहरियाकाट एक्सपर्ट अपना हुनर दिखाते हुए अपनी गाडी घुसाए रहते. वहीं बगल से अधेड़ उम्र के कोई अंकल जी अपने चेतक को धीरे-धीरे निकालते हुए ऐसे चलते रहते जैसे की अगर थोड़ा सा भी और तेज चलेंगे तो एक्सीडेंट हो जाएगा, और उनके पीछे ट्रैफिक का पूरा हुजूम..साथ में बड़ी छोटी सभी कारें अपना ख्याल खुद रखते हुए बच-बचा कर निकलने की जुगत में.. खैर उस दिन ये सब नहीं था. बारिश से पटना बेहाल था.

अब हम अपने अड्डे पर बैठ कर इन्तजार कर रहे थे की वो दोस्त अपनी गाडी लेकर आये तो हम भी थोड़ा हाथ आजमा कर देखें..उस ज़माने में हमारा एकमात्र बॉडी बिल्डर दोस्त अपनी गाडी पर बैठ शान से आया..आते ही ये दिखाया की इसका सायलेंसर कितना ऊपर है की पानी घुसिए नहीं सकता है.. हम भी एक-एक पार्ट पुर्जा देखकर पुलकित हो रहे थे..उसकी गाडी चलाने की हिम्मत नहीं हो रही थी मगर..एक तो बारिश, दूसरा नाला रोड का नदी रोड हुआ जाना, तीसरा की उतनी भारी गाड़ी कभी चलाये नहीं थे तब तक. उसने अपनी गाडी दिखाते हुए बताया की ये डिस्क ब्रेक है..कितनी भी तेजी से गाड़ी चल रही हो लेकिन अगर यह दबाया जाए तो बिना फिसले जहाँ का तहाँ रुक जाए, ऐसी खूबी है इसमें. हम भी आँखें फाड़ कर ये सब सुनते रहे आश्चर्य से.. फिर मन हुआ की बारिश रुकी हुई है और कालेज के कुछ काम से हड़ताली मोड़ जाना था हम टीम लोगों को, सो हम चल निकलें..

रास्ते में गीले सड़क पर ही हमारा वो दोस्त दो-तीन बार डिस्क ब्रेक का करिश्मा दिखाता रहा की देखो बिलकुल नहीं फिसलता है और पीछे से हम स्कूटर पर बैठे सोचते रहे की कभी हम भी डिस्क ब्रेक वाली बाईक खरीदेंगे. थोड़ी दूर जाने पर पहले जहाँ 'उमा सिनेमा' हुआ करती थी उससे थोड़ा सा आगे और एग्जीविशन रोड से थोड़ा सा पहले उसे ट्रैफिक की वजह से ब्रेक लगाना पड़ा..ब्रेक लगते ही बाईक फिसली और सीधे सड़क पर धड़ाम.. हम पीछे से सकपका कर देखे की 'ले लोट्टा, ई का हो गया'? गाडी कैसे फिसल गई? अपना स्कूटर साईड में लगाये, दोस्तों को उठाने से पहले उस गाडी को उठाये, आखिर नई गाडी जो थी भले ही सेकेण्ड हैण्ड.. जब तक सड़क के किनारे लाते, वहां एक ठेले पर बैठे ठेले के मालिक ने बीड़ी सुलगाते हुए कहा, "भोरे से आप अठवाँ आदमी हैं हियाँ गिरने वाले, भोर में हईजे एक ठो मोपेड गिरा था और उसका पूरा तेल रोडवे पर हेरा गया था.." अब हम लगभग पेट पकड़ कर हँसते हुए बोले, "और आप का कर रहे हैं? भोरे से बीड़ी फूंकते खाली गिन रहे हैं का? की एक..दू..तीन..चार......"

Sunday, April 12, 2015

ब्योमकेश बख्शी


मैंने शरदिंदु बनर्जी जी का उपन्यास ब्योमकेश बख्शी पढ़ी नहीं है..ब्योमकेश की जो भी जानकारी मिली वह नब्बे के दशक के शुरुवाती दिनों में आने वाले टेलीविजन धारावाहिक से ही मिली.. उन दिनों उम्र अधिक नहीं थी, ग्यारह-बारह साल का रहा होऊंगा, उस ज़माने में उस उम्र में होने वाली समझ का अंदाजा भी आप लगा ही सकते हैं. मगर फिर भी इस धारावाहिक का क्रेज गजब का था.. इंटरनेट, यूट्यूब और टोरेंट से पहले जब हम सिर्फ और सिर्फ टेलीविजन पर ही इन धारावाहिकों के लिए निर्भर हुआ करते थे तब की बात है.. जब भी इस धारावाहिक का री-टेलीकास्ट हुआ, हम अपना डेरा-डंडा लेकर टेलीविजन के सामने हाजिर रहे. आज भी याद है की वह भूत कैसा था जो पंद्रह फुट ऊपर दोमंजिले मकान कि खिड़की से झाँक कर भाग जाता था.. बच्चे थे, सो डर भी लगा..अब उस भूत को जब यूट्यूब पर देखता हूँ तो लगता है वाकई बचपना ही था..आज के बच्चे तो उसे भूत ना समझ कर कोई नौटंकी वाला जोकर ही समझेंगे..

खैर, ये तो नोस्टैल्जिक बातें हुई. कुछ और बातें करते हैं. मैं यहाँ सिनेमा की समीक्षा करने नहीं बैठा हूँ, वह काम करने को कई धुरंधर बैठे हैं. बात कहानी की करते हैं. कमिक्सों को दीवानों की तरह पढ़ते रहने के कारण यह समझ जरुर पैदा हुई की जो कहानी कामिक्स में होती है, उसी कहानी को लेकर अगर सिनेमा बनाई जाए तो वह हमेशा कुछ अलग होती है कामिक्स के कथानक से. मेरी समझ से कारण मात्र इतनी सी है की सिनेमा बनाने वाले उस कहानी को उठाते हैं, उस पर आधारित अपना स्क्रिप्ट लिखते हैं और उसमें उसके कैनवास को बड़ा करते हैं. 

फ़िलहाल, चूँकि मैं पहले ही बता चुका हूँ कि मैंने शरदिंदु जी की किताब पढ़ी नहीं है और धारावाहिक को ही सामने रख कर बाते कर रहा हूँ. डा.अनुकूल गुहा, जो एक पीजी चलाते हैं, जो कोकीन का धंधा करते हैं, जो मुसीबत सामने देख हत्या करने से भी नहीं चूकते हैं.. अब धारावाहिक में वे मात्र इतना ही करते हैं..मगर सिनेमा तक आते-आते वे चीनी-जापानियों से संपर्क भी साधने लगे.. धंधा भी कोकीन का ना कर, वे हेरोइन का धंधा करने लगते हैं.. अब अपना जासूस ब्योमकेश भी कोई मामूली जासूस तो है नहीं, सो जेम्स बांड की तरह दुनिया को नहीं तो कम से कम कलकत्ता को तो बचा ही सकता है.. सो बस उसी कैनवास को बड़ा करना था..बस इतनी सी ही कहानी..

धारावाहिक के मुताबिक अनुकूल गुहा का केस सन 1934-35 का था..उन दिनों कलकत्ता को बचाने लायक कोई बहाना नहीं मिल रहा था, सो समय काल को बढाकर द्वितीय विश्व युद्ध तक लाया गया..चीनी-जापानी गैंग को भी शामिल किया गया..अब जापानी को दिखा रहे हैं तो समुराई युद्ध शैली को भी दिखा ही दो, सो वह भी दिखाया गया जिसके होने या ना होने से कोई ख़ास फर्क नहीं पड़ता..

धारावाहिक वाले अनुकूल गुहा को दस साल की कैद मिली जिसमें किसी दुर्घटना के कारण उनका चेहरा जल गया..यहाँ सिनेमा में उन्हें सजा तो नहीं मिली मगर चीनियों के साथ लड़ाई में उन्हें अपनी एक आँख से हाथ धोना पड़ा. धारावाहिक में भी गुहा ने धमकी दी थी की वे वापस आयेंगे, और ठीक दस साल बाद वापस आये भी, खुद का नाम ब्योमकेश रख कर.. शुरू में अपने हीरो को धोखा देने में कामयाब भी हुए, मगर बाद में माचिस और सुराही के कारण पकडे गए..पकडे जाने के बाद फिर से धमकी देते हुए वापस जेल भेजे गए..उसके बाद धारावाहिक में उनका कोई जिक्र नहीं है, शायद उपन्यास में हो.. अब सिनेमा के अगले भाग में(अगर वह बन कर तैयार हुआ तो) देखना है गुहा कि इंट्री कैसे की जाती है..

अब जहाँ तक सिनेमा की बात है तो मेरे लिए वह परफेक्ट थी.. मेरे ख्याल से सिर्फ उन्हें ही इससे दिक्कत हुई होगी जो पुराने धारावाहिक के नोस्टैल्जिया से बाहर निकले बिना यह सिनेमा देखने गए होंगे. मैं भी पूर्वाग्रह लेकर ही पहले ही दिन देखने गया था, मगर अब तठस्थ होकर सोचने पर लगता है की धारावाहिक तो इससे भी धीमा था, मगर था यथार्थ के करीब. और सिनेमा बड़े कैनवास के साथ थोड़ा सा अति की ओर झुका हुआ. वैसे भी अगर सिनेमा ऐसे ना बनाया जाता तो उसमें सिनेमा जैसी कोई बात ही नहीं रहती..

देखते हैं, शायद अगले भाग में ब्योमकेश बाबू शायद पूरी दुनिया को बचाने में कामयाब रहें!

Friday, February 20, 2015

पापा जी का पैर - दो बजिया बैराग्य

पापा जी को पैर दबवाने की आदत रही है. जब हम छोटे थे तब तीनों भाई-बहन उनके पैरों पर उछालते-कूदते रहते थे. थोड़े बड़े हुए तो पापा दफ्तर से आये, खाना खाए और उनके लेटते ही तीनों भाई-बहन उनके पास से गुजरने से कतराते थे, कहीं पापा जी देख लिए तो पैर दबाना पड़ेगा. मगर फिर भी कोई ना कोई चपेट में आ ही जाता था. ऐसा भी नहीं की हर रोज कोई एक ही पकड़ाता था, तीनों ही को अलग-अलग शिफ्ट में पैर दबाने का काम मिल ही जाता था. जब हमें पापा जी के खर्राटे से लगता था की पापा सो गए हैं और हम चुपके से निकलने ही वाले होते थे की पापा जी का पैर हिलने लगता था, जो यह दिखाता था की "सोये नहीं हैं, और दबाओ."

पापा जी तलवे पर चढ़ कर एक ख़ास जगह पर थोडा जोर देते ही 'कट' से आवाज़ आती थी. अब भैया-दीदी ये ट्रिक जानते थे या नहीं ये वो ही जाने, मगर मैं जब भी पैर दबाता था तो उस जगह से 'कट' की आवाज़ के बिना मजा नहीं आता था. अगर आवाज़ नहीं आती थी तो कई बार उस जगह कूदने लगता था आखिर सेल्फ सटीस्फैक्शन भी कोई चीज होती है, और पापा जी डांटते, "दबाना नहीं तो 'ऐड़' क्यों रहा है?"

उन दिनों पापा जी के सर पर इक्के-दुक्के ही पके बाल थे, अगर कोई एक पैर दबा रहा हो तो बाकी दोनों का काम उनके उन सफ़ेद बालों को तोड़ने का भी मिलता था...बाद में हम लालच में सर के सफ़ेद बाल तोड़ें उसके लिए पापा जी हमारा मेहनताना भी तय कर दिए. एक सफ़ेद बाल के दस पैसे. सन उन्नीस सौ नब्बे के आस-पास की बात है ये. हम रोज बाल उखाड़ते थे और रोज पिछले सारे पैसों का हिसाब रखते थे. ये बात दीगर है की वे पैसे शायद ही कभी हमें मिले. हाँ! एक बार मुझे मिला था..पूरे पांच रुपये, और उससे मैंने पेंटिंग करने वाला कलर बॉक्स ख़रीदा था. पिछले साल यूँ ही मजाक में पापा जी मैंने कहा, अब भी पैसे देंगे तो आपके सफ़ेद बाल सारे उखाड़ दूंगा.. अब तो चुनने कि भी झंझट नहीं है, लगभग सारे के सारे सफ़ेद हो चुके हैं. :-)

पापा जी के पैर दबाने का एक फायदा भी मिलता था. पापा जी गाँव-जवार के किस्से-कहानियों और मुहावरों के पूरे खान थे और हैं, तो वे सब उनसे सुनते जाना. अब चूँकि मैं और भैया आपस में बहुत लड़ते थे तो इसी पैर दबाने को लेकर एक किस्सा सुनाये थे जो यहाँ सुनाता जाता हूँ.
एक गुरूजी थे, उनके दो चेले. दोनों ही उनको बहुत मान देते थे. अब गुरूजी की एक आदत थी, रोज दोपहर में खाना खाने के बाद दोनों चेलों से पैर दबवाने की. बस यही पैर दबाना दोनों चेलों के बीच झगड़े की जड़ थी. दोनों ही इस बात पर लड़ते थे की आज पैर मैं दबाऊंगा तो मैं दबाऊंगा. झगड़े का हल गुरूजी ने कुछ यूँ निकाला की, बायाँ पैर चेला १ का और दायाँ पैर चेला २ का. एक दिन चेला १ बीमार पड़ गया तो गुरूजी ने चेला २ से कहा की आज बायाँ पैर भी तुम ही दबा दो. चेला २ गुस्से में सोचा की मैं चेला १ का पैर क्यों दबाऊं? गुस्से में उसने एक पत्थर उठाया और गुरूजी का बायाँ पैर तोड़ दिया. अगले दिन चेला १ वापस आया और देखा की गुरूजी बिस्तर पर पड़े हुए हैं और उनका बायाँ पैर चेला २ ने तोड़ दिया.. अब गुस्से में आने की बारी उसकी...उसने भी एक पत्थर उठाया और चेला २ का पैर, यानी गुरूजी का दायाँ पैर भी तोड़ दिया.
 हम बच्चों  से यह कथा कह कर पापा जी दो निशाने साधते थे. पहला यह की हम खूब खुश हो जाएँ ये मजेदार कहानी सुन कर. और दूसरा यह की खूब मन लगा कर पैर दबाएँ. :-)

इधर पिछले दो-तीन साल से देख रहा हूँ, पापा जी का पैर दबाते समय ऐसा लगता है जैसे मांसपेशियां हड्डियों से कुछ अलग होती जा रही हैं..इधर कुछ सालों से देख रहा हूँ, पापा जी पैर भी उतने मन से नहीं दबवाते जिद करके.. शायद पापा जी अब यही मान कर चलने लगे हैं की हर समय कोई बच्चा साथ तो रहेगा नहीं पैर दबाने के लिए..

पिछले दो-तीन महीनों से पापा जी का पैर दबाने का बहुत मन कर रहा है...किसी तलब की हद्द तक...

Thursday, May 22, 2014

इश्क़ का धीमी आंच में पकना

आज का ही दिन था. ठीक एक साल पहले. मन अंतर्द्वंदों से घिरा हुआ था, कई प्रश्न थे जो भीतर कुलबुला रहे थे. कल पापा-मम्मी अनुजा से मिलने के लिए जाने वाले थे. हमारे यहाँ के चलनों के मुताबिक आमतौर से मिलने-मिलाने की प्रक्रिया तब ही शुरू होती है जब लगभग रिश्ता तय माना जाता है. एक तरह से मेरी शादी की बात तय होने जा रही थी कल, ठीक एक साल पहले. एक-दो दोस्तों को छोड़ किसी को बताया नहीं था.

खुल कर कहूँ तो मैंने तस्वीर देखने तक की जहमत नहीं उठायी थी उस समय तक. घर पर पूछा गया था की कैसी जीवनसाथी चाहिए, तो बस इतना ही कहा की अपना निर्णय खुद लेने वाली हो, बाकी और कुछ नहीं.. दोपहर होते-होते भाभी का फोन भी आ चुका था, चुहल करती हुई..मेरे ठंढे प्रतिक्रिया ने उनके जोश को भी ठंढा कर दिया. शाम होते-होते मम्मी ने अनुजा का नंबर मुझे मैसेज करते हुए बोली आज ही बात कर लेना. मुझे ख़ुशी सिर्फ एक ही बात की थी, घर में सभी खुश हैं....मगर अन्दर से आवाज सुनाई देती...'और तुम्हारी ख़ुशी'? तत्क्षण मैं पशोपेश में था, मुझे यह भी नहीं पता था की मैं खुश हूँ भी या नहीं. बाहरी तौर पर दोनों मित्रों पर अपनी ख़ुशी ही ज़ाहिर की, उनके बधाई को खुश हो कर स्वीकार भी किया...मगर खुद से पूछे गए इस प्रश्न का उत्तर नहीं मिल रहा था, क्या मैं वाकई खुश हूँ?

कुछ बातें समय पर छोड़ देना चाहिए. समय सही निर्णय लेता है. समय पर छोड़ी गई बातें अक्सर समयातीत हो जाती है. आज पुरे एक साल बाद अपने रिश्ते को पलट कर देखता हूँ तो वाकई हमारा रिश्ता समयातीत हो चुका है..आज इस रिश्ते के बिना मेरे अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह लग जाएगा!! आज यही लगता है की तुम्हारे बिना मैं अधूरा हूँ अनुजा...

उसी दिन मैंने उसे फोन किया, मन में चल रहे उथल-पुथल से उसकी ख़ुशी, एक अलग से अहसास को फीका नहीं करना चाहता था..पूरे उत्साह से फोन किया. उस दिन बात नहीं हुई, रास्ते में थी, और घर पहुँचते-पहुंचते देर रात हो चुकी थी उसे..अगले दिन बात हुई. एक साधारण सी मगर लम्बी बात..

एक मजेदार किस्सा याद आता है, दो-तीन दिनों बाद ही उसे कलकत्ता के दम-दम हवाई अड्डे से मेलबर्न के लिए हवाई जहाज पकड़ना था.. देर रात गए मैं उस समय अपने मित्र शिवेंद्र के घर पर था. उसी ने मेरा फोन लेकर अनुजा का नंबर घुमा दिया और मुझे फोन दे दिया. थोड़ी देर की बात के बाद फोन काटने के बाद अनुजा का एक छोटा सा मैसेज आया. "It was a bliss in solitude". शिवेंद्र ने दोस्त की भूमिका निभाते हुए फोन छिनकर मैसेज पढ़ा, उसका मतलब पूछा. मैंने कहा "एकांत में आनंदातिरेक होना"..शिवेंद्र फिर से इस हिंदी अनुवाद का मतलब पूछा..और मैं हँसते-हँसते दोहरा हो गया.. चिढाते हुए उसे बोला, "साले, ना हिंदी समझता है और ना अंग्रेजी"

बीते एक साल में कई लम्हें गुजरे..अधिकाँश ख़ुशी के, कुछ नोंक-झोंक के, तो कुछ लड़ाई के भी. ज़िन्दगी भी तो ऐसी ही कुछ है, खट्टी-मीट्ठी..एक स्वाद आखिर कब तक किसी के जबान पर चढ़ सकता है? एक स्वाद अक्सर बोरियत ही लाता है. एक स्वाद के तुरत बाद ही हम दुसरे स्वाद को चखना चाहते हैं...तुम्हारा इश्क़ जैसे डिनर के बाद डेजर्ट खाना.. तुम्हारा इश्क़ जैसे जून के महीने में तेज आंधी के साथ बारिश.. तुम्हारा इश्क़ जैसे पाला पड़ते दिनों में खिली हुई धूप.. तुम्हारा इश्क़ जैसे किसी बच्चे की मुस्कान.. तुम्हारा इश्क़ जैसे तीखा मशालेदार चाय..तुम्हारा इश्क़ जैसे तुम!!! सिर्फ तुम्हारे इश्क़ का स्वाद ही है जो तालू से चिपकी हुई है, और मन चाहता है जीवन भर चिपकी रहे....आमीन!!!

कुछ बातें सार्वजनिक रूप में सीधे तुमसे कहनी है अनुजा - जानती हो, पिछले आठ-दस सालों में मुझसे सबसे अच्छा साल चुनने को अगर कहा जाए तो यह यही बीता हुआ साल है. शायद इसलिए पता भी नहीं चला की कैसे एक साल गुजर गए! शुक्रिया मेरी ज़िन्दगी में आने के लिए.....

Tuesday, April 22, 2014

मशाला चाय - दिव्य प्रकाश दुबे

दिव्य भाई की पहली किताब(टर्म्स एंड कंडीशंस एप्लाई) एक ही झटके में पूरा पढ़ गया था. और पढने के बाद दिव्य भाई को अपना ओनेस्ट ओपिनियन भी दिया था फेसबुक के इनबाक्स में जिसका सार यह था, "कहानियां साहित्यिक मामलों में कुछ भी नहीं है और बेहद साधारण है, मगर कहानियों की बुनावट और कसावट आपको किताब छोड़ने से पहले पूरा पढने को मजबूर कर दे."

अभी उनकी दूसरी किताब मशाला चाय जब आने वाली थी उस समय अपनी निजी चीजों में कुछ इस कदर उलझा हुआ था की प्री-बुकिंग नहीं किया, जैसा पहली किताब को लेकर किया था. यह किताब आने से पहले उन्होंने बहुत हल्के-फुल्के अंदाज में मुझे इनबाक्स में लिखा, "कुछ ऐसा लिख दो जिससे लोगों को लगे की यह नहीं पढ़ा तो क्या पढ़ा..." और उन्हें मैंने बताया, "मैं आपकी किताब से नए लोगों को पढ़ना सीखा रहा हूँ. मेरे वैसे दोस्त जो कभी कोई किताब नहीं पढ़ते वे भी आपकी किताब बड़े चाव से पढ़े."

मैं यह बात अभी भी उतने ही पुख्ते तौर से कह रहा हूँ. अगर आप हिंदी पढना जानते हैं मगर कभी कोई किताब हिंदी की नहीं पढ़ी है तो यह आपके लिए पहला पायदान है..पहली सीढी... और दिव्य भाई, आपको यह जानकार और भी अधिक आश्चर्य होगा की आपकी पहली पुस्तक अभी मेरे एक कन्नड़ मित्र के पास है जो हिंदी बेहद हिचक-हिचक कर ही पढ़ पाती हैं. मगर थोड़ा पढने के बाद मुझे बोल चुकी हैं की यह तो मैं पूरा पढ़ कर ही वापस करुँगी, कम से कम दो महीने बाद...

यह मैं उस वक़्त लिखने बैठा हूँ जब अधिकाँश लोग जिन्हें इस किताब में रुचि होगी, वे सभी इसे पढ़ चुके होंगे. जिन्हें जो कुछ भी बातें करनी थी, वह भी वे कर चुके. मगर फिर भी लिख रहा हूँ...

पहली कहानी पढ़ते वक़्त बचपन से पहले मुझे अपना वह जूनियर याद आया जो अभी भी बात-बात पर विद्या कसम खाता है. उसे कभी कोई और कसम खाते नहीं देखा हूँ, ना ही भगवान् कसम खाते. शायद अब वह समझ गया होगा की अब विद्या कसम खाने से भी कुछ हानि नहीं होने वाली..

दूसरी कहानी.....मैंने कई आस पास के चरित्र बहुत करीब से देखें हैं जो इससे मिलते हैं...कुछ सौ फीसदी...कुछ नब्बे फीसदी...खुद मैं भी तो साठ-सत्तर फीसदी तक के आस पास पहुँच ही जाता हूँ...दरअसल यह भारत के किसी भी मेट्रो में रहने वाले युवाओं की साझी कहानी है..जो ज़िन्दगी में किसी भी नए बदलाव का स्वागत करना जानता है..कुछ पीछे छूट जाए तो रुदाली नहीं गाता है..अकेलापन दूर करने का एकमात्र साधन दफ्तर और दोस्त ही हैं....ऐसी कई बातें तो मैंने भी कई दफे सोची थी/है, मगर इतनी आसानी से कोई ऐसे भी लिख सकता है? ब्रैवो....

बाकी कहानी अभी पढ़ी नहीं.. सो बाकी किस्सा फिर कभी...

चलते-चलते आपको फिर से याद दिला दूँ, अगर आप यह किताब इस उम्मीद में उठायें हैं पढ़ने के लिए की आपको घोर साहित्यिक खुराक मिले, तो यह किताब आपके लिए नहीं है..मगर याद रखें, इसमें वही कहानियां आपको मिलेंगी जैसी मानसिक अवस्था से आज का युवा गुजर रहा है.

Sunday, January 26, 2014

एक अप्रवासी का पन्ना

बात अधिक पुरानी नहीं है...मात्र एक साल पुरानी...अब एक साल में कितने दिन, कितने महीने, कितने हफ्ते और कितने घंटे होते हैं, यह गिनने बैठा तो लगता है जैसे एक युग पहले कि बात की जा रही हो. मगर यह फक़त एक साल पुरानी ही बात है. आज रात ही को चेन्नई से निकला था बैंगलोर के लिए और सत्ताईस की सुबह पहुँचा था.

चेन्नई छोड़े मात्र एक साल हुआ है, मगर ऐसा लगता है जैसे कभी वहां था ही नहीं. वह भी तब जबकि जीवन में दूसरा सबसे लम्बा समय उस शहर में ही बीता है. पहला पटना था, और तीसरे की खोज में हिसाब-किताब करने बैठा नहीं, वरना तो किस्तों में ज़िन्दगी जाने कितने ही शहर दिखा चुकी है.

जिस शिद्दत से पटना कभी याद आता है, उतनी शिद्दत से मगर चेन्नई को कभी याद नहीं कर पाया. पता नहीं उम्र का असर ठहरा या वाकई उस शहर से उतना लगाव ही ना हो पाया हो? कारण कुछ भी हो सकता है. उम्र का असर इसलिए की समय के साथ आस-पास के जगहों का तिलिस्म टूटने लगता है. शायद यह बहुत बड़ी वजह होती है कि बचपन में बिताये समय और मित्र हमेशा ही ज़ेहन में वैसे ही याद रहते हैं जैसे कल की ही बात हो.

अब भी याद आता है, चेन्नई छोड़ने से महीने भर पहले साथ काम करने वाली एक मित्र ने पूछा था, "क्या हमें याद करोगे वहां?" उस समय तुरत बिना एक क्षण सोचे जवाब दिया था "नहीं".. फिर जैसे-जैसे बैंगलोर आने का दिन नजदीक आने लगा वैसे-वैसे ही कुछ अच्छा नहीं लग रहा था. आखिर छः साल का समय कम भी नहीं होता है. एक दिन ईमानदारी से उस मित्र को अपना जवाब फिर दिया.. "चेन्नई याद आये चाहे ना आये, मगर आप जैसे दोस्त जरुर याद आयेंगे." और अंततः वही बात सही साबित भी हुई.


मुझे अब भी याद आता है, जिस दिन मैंने वहां अपना त्यागपत्र दिया, उस दिन बहुत खुश था. मन में एक ख्याल यह भी था कि इस शहर और इस कंपनी से पीछा छूटा आखिर! मगर जैसे-जैसे दिन करीब आते गए वैसे-वैसे अकुलाहट भी बढती गई. मन मायूस सा होता गया. और आखिर आज के ही दिन अपना सामान बाँध कर रात की बस से बैंगलोर के लिए निकल लिया.

पिछले एक साल के बैंगलोर का पूरा ब्यौरा दूँ तो, कार्यस्थल पर काफी कुछ सीखने को मिला. सबसे अधिक मन में एक 'भय'.. हाँ, वह भय ही था. नयी तकनीक, नया प्रक्षेत्र(Domain) और उस पर भी अपने अनुभव के मुताबिक़ कार्य संपन्न करने का दवाब. कर पाऊंगा या नहीं, इसकी शंका. खैर, इन सबसे उबरने में अधिक मेहनत-मशक्कत नहीं करनी पड़ी. दूसरी बात यह कि वहां कई सालों से एक ही जगह कार्य करने से एक कम्फर्ट जोन में था, वह यहाँ फिर से बनाना. खैर, नए लोगों से मिलना, उन्हें जानना-समझना अच्छा लगता है, सो जल्द ही यहाँ भी अपना कम्फर्ट जोन बना ही लिया.

खैर, जीवन यूँ भी खानाबदोश हो चुका है. अपने देश में रहते हुए भी अप्रवासी होने को हम अभिशप्त हैं. कहने को भले ही कितना भी पटना को अपना कहूँ, मगर अब पटना जाने पर ही परायापन महसूस होता है. और वापस बैंगलोर(पहले चेन्नई) में प्रवेश करते ही लगता है जैसे अपने शहर, अपने घर में आ गया हूँ. पटना अब मात्र नौस्टैल्जिक होने वाला शहर ही बन कर रह गया है.