Saturday, March 03, 2012

भोरे चार बजे की चाय अब भी उधार है तुमपे दोस्त!!

दिल्ली में पहली मेट्रो यात्रा सन 2004 में किया था, सिर्फ शौकिया तौर पर.. कहीं जाना नहीं था, बस यूँ ही की दिल्ली छोड़ने से पहले मेट्रो घूम लूं.. नयी नयी मेट्रो बनी थी तब.. उसके बाद 2009 मार्च में मुन्ना भैया के घर जाते हुए, वैसे आज मुझसे उस जगह का नाम पूछेंगे तो मुझे याद नहीं, मगर दिल्ली से बाहर ही था..फिर 2011 फरवरी में फिर से काफी मेट्रो यात्रा करने का मौका मिला.. खास करके पंकज के घर जाते हुए, फिर दीदी के घर से आराधना के घर जाते हुए..

घर से निकलते समय पहले ही पंकज ने बता दिया था की दिल्ली उतर कर मेट्रो लेकर हुडा सिटी सेंटर आ जाना.. मेट्रो के रूट का अता पता ना होते भी पता लगाते हुए मेट्रो में चढ़ ही गए और वहाँ से मालिक को फोन किये.. मालिक सोये हुए थे.. मुझे बोले कि मैं आ रहा हूँ, जब मैं वहाँ स्टेशन पर उतरा तो पता चला की मालिक मुझे इंस्ट्रक्शन देकर फिर सो गए थे..खैर सेक्टर 41(शायद) मार्केट बुलाया गया और मैं वहाँ पहुँच गया.. पहले कभी मिला नहीं था इस लड़के से, फिर भी पहचानने में कोई गलती नहीं हुई.. उलटे इसी ने मुझे पहले देखा, नहीं पहचाना होता तो फिर मैं लफड़े में पड़ जाता ;).. फिर वहाँ से घर.. घर का बनावट बिलकुल मस्त.. बोले तो एकदम रापचिक टाइप.. ग्राउंड फ्लोर पर एक हॉल और अंदरग्राउंड दो कमरे बने हुए, वो भी इतने अच्छे से दिख रहा था की कोई चोरी-चपाटी करके छुपने के लिए प्रयोग ना कर सके.. हाँ मगर चोरों को भुलावे में रखने के लिए बेहद उम्दा.. अगर अंदर घर में बत्ती ना जल रही हो तो पक्के से चोर ही इनपर केस कर दे और उसका मसौदा कुछ ऐसा तैयार होगा "इनके घर में चोरी करने जैसे ही घुसा तो अंदर घर में घुप्प अँधेरा था.. और बत्ती जलाने के लिए स्विच ढूँढने के लिए दीवाल पर हाथ से टटोलते हुए जैसे ही दो कदम आगे बढ़ा वैसे ही मानो मेरे पैरों टेल जमीन ही खिसक गई.. और मैं नीचे जाने वाली सीढियों से लुढकते हुए सीधा नीचे जा गिरा.. अब आप ही कहिये जज साहब, ये कोई तरीका है? ऐसा घर इन्होंने किराए पर क्यों लिया? मेरे टूटे हाथ-पैर के साथ मानसिक तकलीफ का हर्जाना भी इन्हें देना होगा."

खैर.. घर तो मैं पहुँच ही गया था.. पापा ने जो तिलकुट दिया था वह मैंने इसके हाथों में थमाया.. साला, बहुत मन कर रहा था की इसको देने से पहले दो-चार तिलकुट खा ही लें, क्या पता बाद में देखने को भी नसीब ना हो!! मगर जब दे ही दिया तो फिर क्या!! ;)

अब आते हैं इनके साथ रहने वाले मित्रों पर.. एक रवि और एक देवांशु.. रवि तो बड़े ही सीधे टाईप के लगे.. नहीं-नहीं, गाली नहीं दे रहा हूँ.. सच्ची में सीधे लगे.. :) देवांशु के बारे में अभी नहीं, वे बाद में पिक्चर में आयेंगे.. जब मैं घर में घुसा तब इनके कुछ और मित्र नीचे वाले कमरों में सोये हुए थे.. मुझसे जैसे ही परिचय कराया गया उसके पाँच मिनट के भीतर सब निकल भागे, बाद में पता चला की मुझसे डर कर नहीं भागे, दरअसल उनमें से किसी को दफ्तर और किसी को किसी इंटरव्यू में जाना था.. उनके जाने के बाद गहरी नींद में सोये रवि को पंकज ने मेरे मना करने के बावजूद जगाया, पता नहीं मन ही मन में कितनी गालियाँ मिली होगी मुझे, और पंकज खुद सो गया.. इसके पीछे एक छोटी कहानी है(लंबी नहीं), जो मैं नहीं बताने वाला हूँ.. ;)

फ्रेश होकर और मुंह हाथ धोकर नाश्ते के जुगाड़ बारे में सोचा गया और तब पता चला की रात में ही लगभग बारह अंडे ये सब मिलकर कब खा गए यह इन्हें भी नहीं पता.. खैर हम निकले नाश्ता करने.. घर के पास ही वाले मार्केट में एक आलू-पराठे वाले के यहाँ के लिए.. बीच में देवांशु के बारे में बताया गया.. कि कैसे नेट पर ही उनसे पंकज की मुलाक़ात हुई थी, और संयोग से दोनों एक ही शहर के, लखीमपुर के.. बाद में अच्छे दोस्त भी हो लिए, और अभी कहीं इंटरव्यू के लिए निकले हुए हैं.. रास्ते में ही उनसे मुलाक़ात हुई, हमने हाथ भी मिलाया.. उन्होंने "चाय" के लिए भी पूछा और हमने मना कर दिया.. यहाँ गौर किया जाए, "चाय" बहुत महत्वपूर्ण शब्द है.. इसकी महत्ता से ही यह पोस्ट भी है.. वापस लौटने पर देखा की रवि व्यायाम में लगे हुए हैं और देवांशु बड़े गौर से रजाई लपेट कर बिस्तर पर पालथी मार कर बैठे हुए हैं और लगातार उन्हें देखे जा रहे हैं.. हम दोनों(पंकज और मैं) ही सोफे पर बैठ कर कभी इनको देख रहे हैं तो कभी उनको.. थोड़ी देर बाद पंकज से रहा नहीं गया, उसने पूछ ही लिया कि क्या देख रहे हो? देवांशु बाबू का जवाब था "सोचते हैं कि हम भी एक्सरसाइज शुरू कर दें".. कहीं से एक जुमला उछला "एक्सरसाइज करने के लिए आदमी रख लो भाई"... और लगे हाथों भाईसाब(देवांशु) ने फिर से पूछ लिया "चाय पियोगे?" मैंने ना कहा, बाकि दोनों ने हाँ.. देवांशु ने मुझे थोडा दवाब देते हुए कहा कि पी लो यार, और तब उन्हें पता चला कि मैं चाय नहीं पीता हूँ.. फिर देवांशु बाबू उन दोनों की ओर मुखातिब होते हुए बोले "ठीक है तीन कप ही बनाना".. ;) अब समझ में आया की वे तभी से, सभी से चाय के लिए क्यों पूछ रहे थे?

खैर चाय भी बनी, उन दोनों ने पीया भी.. पंकज की बारी के समय जब चाय नीचे गिर गई तब उसे पता चला की कप का हैंडल टूटा हुआ है.. और उसी समय पता चला की देवांशु को पहले से यह बात पता थी, और उसने कप की खूबसूरती खत्म ना हो इसलिए उसे इस तरह रख छोड़ा था कि उसका टूटा हैंडल पता भी ना चले.. स्टेटस का सवाल है आखिर, नहीं तो लोग कहेंगे की IT वालों के घर में चाय के कप तक टूटे-फूटे होते हैं. खैर अपन को क्या? अपन चाय पीते थोड़े ही ना हैं! है की नहीं? :)

शाम ढलते ना ढलते फिर से देवांशु "चाय" के लिए सबसे पूछने लगा.. इसी बीच पंकज का एक और मित्र आ गया, पवन.. देखते ही देखते कहीं चला जाए कह कर प्लान भी बन गया एम्बिएंस मॉल घूमने का.. वहाँ कुछ तफरी करके और चंद किताबें खरीद कर रात नौ बजे वापस लौटते हुए घर के पास ही खाना कर पैदल ही घर का रास्ता नापने का प्लान भी बना.. खाना भी खा लिए और वापस भी चले, मगर रात गए सभी कन्फ्यूज, की सही रास्ता कौन सा है? कोई बुजुर्ग भी आस-पास नहीं जो हम भटके हुए नौजवानों को सही रास्ता बताये!!

खैर, एक नौजवान ही मिल गया जिससे हमने रास्ते के बारे में पूछा.. उसने एक तरफ दिखाते हुए बोला की यह रास्ता आपके घर को जाता है.. फिर हमारा सवाल था, कितनी देर में हम पहुंचेंगे? अब वो भाई साहब को लगा कि इन्हें विस्तार से समझाया जाए, सो पहले धीरे-धीरे चल कर बोले "ऐसे जाओगे तो आधा घंटा लगेगा" फिर जल्दी-जल्दी चल कर दिखा कर बोले "ऐसे जाओगे तो दस मिनट में पहुँच जाओगे".. पहले तो हम हक्के-बक्के की भाईसाब कर क्या रहे हैं? फिर ठहाके लगाते हुए उसके बताये रास्ते पर चल लिए..

भाईसाब का आधा घंटा होने को था, मगर घर का तो छोडिये जनाब, घर के पास की गली का कुत्ता भी नजर नहीं आ रहा था.. हमें सब समझ में आ गया, इस नौजवान पीढ़ी से रास्ता दिखाने की उम्मीद करना ही गलत है.. सो अबकी ऑटो लेकर वापस लौटे तो वह वापस उसी रास्ते पर ले आया जहाँ से अभी-अभी गुजरे थे.. हम भी मुंह छिपा कर वहाँ से निकल लिए की कहीं कोई देख कर बेवकूफ ना समझ ले..

अब तक रात हो चुकी थी, और सुबह-सुबह दीदी के यहाँ भिवाडी जाने के लिए भी निकलना था, सो जल्दी सोना था, और बाक़ी सभी को सलीमा देखना था.. तो वे सभी गए लैपटॉप पर सलीमा देखने, और हम चले निन्नी करने.. उन लोगों को सिनेमा देखते-देखते चार बज गया, जिस वक्त मैं खर्राटे मार कर सो रहा था, ठीक उसी वक्त फिर से देवांशु को फिर से चाय का सरूर चढा.. उसने फिर सभी से पूछा की "चाय पियोगे?" सभी ने मना कर दिया. अब उसका कहना था की PD से भी पूछ लेता हूँ, शायद हाँ कह दे और बना भी लाये.. सबने उसे मना कर दिया कि अभी उसे मत उठाओ.. और मैंने भोरे चार बजे की चाय मिस कर दी..

तो दोस्त, तुम्हारी वो सुबह चार बजे की चाय अब भी उधार है!! ;-)

Monday, December 26, 2011

हैप्पी बर्थडे पापाजी

कुछ साल पहले आपको एक खत लिखा था, आपको याद है पापा? ई-मेल किया था आपको? आपने कहा था की इसका जवाब आप मुझे डाक से भेजेंगे.. लगभग तीन साल होने आ रहे हैं, अभी भी इन्तजार कर रहा हूँ उस खत का.. शायद आपको याद भी नहीं हो!!

दसवीं में खराब अंक लाने के बाद भी जब नहीं पढता था तब आपने कहा था, "जितना इस मकान का किराया देता हूँ, उतना भी अगर तुम महीने में कमा लोगे, इसकी उम्मीद नहीं है मुझे.." आपकी उस बात ने मुझे हौसले और आत्म-सम्मान की शिक्षा दी.. मैं जानता हूँ की आपको वह भी याद नहीं!!

छोटे में आप जान बूझ कर मुझसे हर खेल में हार जाते थे और मैं बहुत खुश.. बहुत बाद में ये समझ में आया की आप जान कर हारते थे.. मैं ये भी जानता हूँ कि आपके लिए शायद यह सब उतने महत्व का विषय नहीं होगा जिसे क्रमवार याद रखा जाए, मगर मुझे याद है पापाजी.. कह सकता हूँ की वे सब घटनाएं लगभग क्रमवार याद हैं मुझे.. याद है पापाजी, आप क्रिकेट में बौलिंग करते समय थ्रो फेकते थे? ठीक विकेट को निशाना बना कर?

मैं जानता हूँ कि आप समझते हैं और भरोसा भी करते हैं की मैं झूठ नहीं बोलता हूँ, भले ही कितना भी गलत काम किया रहूँ या फिर उसकी सजा कुछ भी हो.. भले ही सच भी ना कहूँ, मगर झूठ नहीं बोलता हूँ.. बहुत अपराधबोध के साथ कह रहा हूँ, आप गलत थे.. लगभग बीस-बाईस साल पहले, डुमरा वाले घर में, सोफे के गद्दे पर कलम से मैंने ही लिखा था पापा और नकार दिया था की मैंने वह नहीं लिखा है.. बाद में भैया को मेरे बदले डांट मिली थी.. देखिये, आप ये भी भूल गए हैं ना? शायद भैया को भी याद नहीं होगा.. सौरी भैया!!

उन्नीस सौ सतासी-अठासी की बात होगी शायद, आपसे झूठ बोल कर कुछ कॉपी(नोटबुक) खरीदवाया था कि मुझे जरूरत है, और उसे अपने मित्र जितेन्द्र को दे दिया था, जिसके पास कॉपी खरीदने के पैसे नहीं थे.. पहली या दूसरी कक्षा में था तब.. मैं हर उस रात को झूठ बोलता रहा हूँ जिस रात पैसे की कमी के कारण या साधनों की कमी के कारण खाना नहीं खाया.. जानता था कि आपको तकलीफ होगी.. अब आगे से मेरी कही हर बात पर भरोसा मत कीजियेगा पापा!! मैं भी झूठ बोल सकता हूँ..

मेरी सबसे बड़ी कमजोरी यही रही है कि मैं कुछ भूलता नहीं हूँ..

मैं जानता हूँ, आपके तीनों बच्चों में सबसे नालायक और नकारा संतान हूँ मैं.. रेशम की चादर में टाट का पैबंद सा.. मैं भी अपनी जिंदगी की एक तिहाई से अधिक उम्र गुजार चुका हूँ, फिर भी एक भी क्षण ऐसा याद नहीं आता है जिस पर आप अपने उन दोनों बच्चों से भी अधिक गर्व का अनुभव किये होंगे. इन सब के बावजूद मैं जानता हूँ, आप कहें ना कहें, आपने सबसे अधिक प्यार मुझ पर ही लुटाया है.. कई लोगों से सुना है कि बच्चों में जो सबसे मजबूत होता है उसे बाप का प्यार अधिक मिलता है और जो कमजोर उसे माँ का, उनसे कुछ कहता नहीं हूँ, जमाने से बेमतलब की बातों पर बहस क्या करना? मगर अपने अनुभव से मैं कह सकता हूँ की वे झूठ कहते हैं..

कुछ साल पहले किसी बात पर मैंने कहा था कि आज अगर मेरी आखिरी इच्छा पूछी जाए तो वह यही होगी की मेरे पापा मुझे एक बार गले लगा लें.. साल-दर-साल बीतने के बाद आज भी इसमें कोई बदलाव नहीं आया है पापा!!

समय बीतने के साथ कुछ अधिक ही विद्रोही स्वभाव का होता जा रहा हूँ.. बाहरी संसार के लिए शायद थोड़ा कठोर भी हूँ.. मगर मैं जानता हूँ की आपकी मुझे पहले भी जरूरत थी और आज भी है और हमेशा रहेगी.. आठ साल से अधिक हो चुके हैं घर से निकले हुए मुझे, ऐसा लगता है जैसे बड़ा हो कर कोई पाप कर दिया हूँ, आपलोगों ने ऐसे ही छोड़ रखा है, कभी देखने भी नहीं आते हैं की वो बेटा जिसे पलकों पर बिठाए रखते थे, वो कैसे रह रहा है. अपनी जिंदगी कैसे जी रहा है? आई मिस यू टू मच पापा.. प्लीज आ जाईये ना.. प्लीज!!! ऐसा कौन सा जरूरी काम है आपके लिए जो मुझसे अधिक महत्वपूर्ण है!! बस एक बार आ जाईये ना..... प्लीज!!!!!!!

Saturday, November 12, 2011

लफ्ज़ों से छन कर आती आवाजें

१ -
वो काजल भी लगाती थी, और गर कभी उसका कजरा घुलने लगता तो उसकी कालिख उसके भीतर कहीं जमा होने लगती.. इस बदरा के मौसम में उस प्यारी की याद उसे बहुत सताने लगती है.. काश के मेघ कभी नीचे उतर कर किवाड़ से अंदर भी झांक जाता.. ये गीत लिखने वाले भी ना!!
(कहाँ से आये बदरा गीत के सन्दर्भ में)

२ -
समय बदल गया है, जमाना बदल गया है,
एक हमहीं हैं जो सदियों पुराने से लगते हैं..

३ -
तुम अब भी, यात्रारत मेरी प्यारी,
अब भी वही इन दस सालों बाद,
धंसी हुई हो मेरी बग़ल में, किसी भाले की तरह..
(मुझे याद नहीं, मेरी ही लिखी हुई या फिर कहीं का पढ़ा याद आ गया हो)

४ -
मैं उस असीम क्षण को पाना चाहता हूँ जब इस दुनिया का एक-एक इंसान यह भूल जाए की मेरा कोई अस्तित्व भी है.. और अवसाद के उस पराकाष्ठा को महसूस करना चाहता हूँ...

५ -
लेकिन वह दोपहर ऐसी न थी कि केवल चाहने भर से कोई मर जाता..
[निर्मल वर्मा कि एक कहानी से]

६ -
होश से कह दो, कभी होश आने ना पाए.
एक मदहोशी का आलम बना है अभी अभी...

७ -
लगता है जैसे एक सपना सा बीता था या कोई फ्लैश सा चमका हो.. मैं भी तो अभी फ्लैश बैक में ही जी रहा हूँ! एक अकथ पीड़ा जैसी कुछ!! जीवन में अचानक से ही अनेक घटनाएं घट जाने पर उसी तरह उन सभी बातों का मूल्यांकन कर रहा हूँ जिसका कोई मूल्य निर्धारित ना किया जा सके, सभी चीजें वैसी ही दिख रही है जिस तरह अचानक किसी निर्वात में हवा के भरते समय सनसनाहट की सी आवाज होती है.. या फिर किसी घटना से आश्चर्यचकित सा होकर कोई उन सारे घटनाओं से परे हटकर, किनारे पर बैठ कर जैसे माझी को नाव खेते हुए देखता हो..

८ -
कई दिनों से इन्द्रधनुष की तलाश में हूँ. सुना है उसके दोनों छोर, जहाँ से वह धरती से मिलता है, वहाँ खुशियाँ ही खुशियाँ पायी जाती है.. यह मूवा इन्द्रधनुष भी तो यहाँ निकलता नहीं है..

९ -
गुमे हुए लोगों की उम्र कभी बढती नहीं है, वे हमेशा वैसे ही होते हैं जैसा उन्हें आखिरी दफ़े देखा गया होता है..
आपकी यादों में...

१० -
कभी-कभी सोचता हूँ कि अपनी लिखी डायरी को एक दिन नष्ट कर दूँ, नहीं तो अगर किसी दिन वह दुनिया के हाथ लग गई तो सारी दुनिया जान जाएगी की मैं किस हद तक का नीच, कायर और डरपोक इंसान था, एक ऐसा इंसान जो खुद को धोखे में रखने कि बीमारी से ग्रसित था..

११ -
वह एक ऐसा शहर था जिसका अँधेरा मुझे कभी भयभीत नहीं करता था. उसकी भीड़-भाड़ कभी मन को विचलित नहीं करती थी. उसके बारे में मैं वैसे ही सुना करता था जैसे बचपन में दादी-नानी से बच्चे भूत-प्रेत, राजा-रानी और परियों की कहानियां सुनते हैं, पूरी बेचैनी के साथ, पूरी श्रद्धा के साथ.

उस शहर में रहने वाले लोगों से अक्सर मुझे रश्क होता आया है, मेरे लिए यह जानना भी दिलचस्प होगा की उस शहर में रहने वाले लोग किसी दूसरे शहर, कस्बे अथवा गाँव के बारे में ठीक वैसा ही सोचते होंगे, जैसा मैं उस शहर के बारे में. और वे भी ऐसे ही इर्ष्या करने को मजबूर कर दिए गए होंगे उन जगहों में रहने वालों के बारे में..

१२ -
वो भी ठीक ऐसी ही रात थी.. सुबह चार बजे तक जगा हुआ था, और आज भी ढाई बज चुके हैं.. बस उस दिन "मौसम" जैसी कोई सिनेमा साथ नहीं थी...

देखो ना, देखते ही देखते पूरे दस साल गुजर गए. मगर लगता है ऐसे जैसे कल ही की तो बात थी, फिर खुशगंवार पांच साल और अवसाद के पांच साल भी तो आज साथ हैं सुबह के चार बजाने को......

१३ -
अतीत कभी आपका पीछा नहीं छोड़ती है. आप कितना भी बच कर निकलना चाहें, मगर यह पलट कर वापस आती है और पिछले हमले से अधिक जोरदार हमला करती है. अवसाद के पहले चरण की शुरुवात यहीं से होती है, और अंत का कहीं पता नहीं..

१४ -
कुछ यादें हैं, धुंधली सी.. जैसे कोई भुला हुआ गीत, जिसके सुर तो याद हों, मगर बोल याद नहीं.. जैसे कोई भुला हुआ स्वर, जिसकी आवाज याद हैं, मगर बोलने वाले का चेहरा याद नहीं.. जैसे कोई प्रमेय, जिसका हल तो याद हैं, मगर प्रश्न नहीं.. जैसे कोई खंडहर, जिसके दरख़्त तो याद हैं, मगर उसका पता याद नहीं... यादें जो आती हैं, खो जाती हैं... अधूरी यादें.. यादों को कभी अधूरा नहीं रहना चाहिए, तुम्हारे प्यार की तरह.. उसका भी एक अंत होना चाहिए, मेरे प्यार की तरह..


पिछले कुछ महीनों में फेसबुक पर अलग-अलग मूड में लिखे गए अपडेट्स का लेखा-जोखा.

Sunday, November 06, 2011

कहाँ जाईयेगा सsर? - भाग ३

दिनांक २३-११-२०११

सबसे पहले - मैंने गिने-चुने लोगों को ही बताया था कि मैं घर, पटना जा रहा हूँ.. घर वालों के लिए पूरी तरह सरप्राईज विजिट.. अब आगे -

मेरे ठीक बगल में एक लड़का, जिसकी दाढ़ी के बाल भी अभी ठीक से नहीं निकले थे, बैठा हुआ था.. वो काफी देर से मेरे DELL Streak को बालसुलभता से देख रहा था.. मगर बात नहीं कर रहा था.. अजनबियों से बात ना करने की सीख सबसे अधिक फ्लाईट में ही निभाई जाती है, जिसकी वजह से ही मुझे फ्लाईट की यात्रा सबसे उबाऊ यात्रा लगती है.. खैर, मैं ही बात शुरू की, और बात शुरू होने पर सबसे पहले उसने मेरे मोबाईल के बारे में ही पूछा.. बात आगे बढ़ने पर पता चला की वह दिल्ली के किसी स्कूल में बारहवीं का छात्र है और दिवाली कि छुट्टियाँ मनाने बिहारसरीफ जा रहा है.. मैंने आश्चर्य से पूछा की इतनी रात गए तुम पटना से बिहारसरीफ कैसे जाओगे तो उसने बताया की मम्मी आई हुई है उसे लेने के लिए.. उस वक्त मैं सोच रहा था कि 16-17 साल का यह लड़का दिल्ली से पटना कि यात्रा फ्लाईट से पूरी कर रहा है, और वह भी दिवाली के वक्त जब दिल्ली से पटना की फ्लाईट दस हजार से ऊपर चल रही है.. अधिक वक्त नहीं बीता है, बामुश्किल दस-पन्द्रह साल.. मगर हमारे समय में मैंने अपने किसी भी मित्र को थर्ड एसी में भी यात्रा करते नहीं देखा था उस उम्र तक..

किन्ही वजहों से फ्लाईट कुछ देर हो चुकी थी और शायद रनवे खाली ना होने के कारण से लगभग आधे घंटे और तक रात के समय पटना देखने का मौका मिलता रहा.. कुछ देर में ही पटना में फ्लाईट लैंड कर चुकी थी.. मैं अपना सामान लेकर बाहर निकल रहा था तभी अभिषेक का फोन आया, मैं उससे बाते करते हुए बाहर आया और सारे टैक्सी-ऑटो वाले मेरे कानों के पास आकर चिल्लाने लगे "कहाँ चलिएगा सsर?" पहली बार उन्हें इशारों से बताया की रुको, अभी फोन पर बात कर रहा हूँ.. वे चुप नहीं हुए तब दुबारा बताया.. फिर भी वे चुप नहीं हुए तो खीज कर अभिषेक को होल्ड पर रख कर लगभग उन पर चिल्लाने ही जा रहा था कि अंतरआत्मा से आवाज आई "शांत गदाधारी भीम, शांत" और उनसे पूछा, "पहले फोन पर बात तो खत्म करने दो दोस्त".. वे भी एक अच्छे दोस्त की तरह बात एक बार में ही मान गए.. :)

अभिषेक से बात करके मूड फ्रेश हो चुका था.. अब उन ऑटो-टैक्सी वालों से बात करने की बारी थी..
- कहाँ जाईयेगा सsर? चलिए ना टैक्सी में ले जायेंगे..
- नहीं-नहीं.. टैक्सी नहीं, ऑटो नहीं है क्या?

यह सुनते ही दो बंदे बीच में कूद पड़े और पहला वाला निराश हो कर दूसरे ग्राहक की तलाश में निकल लिया..
- हाँ हाँ, चलिए ना..
- तुम क्या ले जाओगे, सsर हमरे साथ चलेंगे.. कहाँ जाईयेगा?
- लाल बाबू मार्केट, शास्त्रीनगर..
- चलिए ना..
"चलिए ना"
बोलकर मेरा सामान पकड़ने लगा.. मैंने रोककर पूछा "कितना लोगे?" और साथ ही इस शहर से अनजान बनने का नाटक करते हुए अगला सवाल भी रख दिया "कितनी दूर है? जादे है का?"
- साढ़े तीन सौ..
उसका कहना था और मेरी हंसी छूट गई..
- साढ़े तीन किलोमीटर का साढ़े तीन सौ..
- सsर, जब जानते हैं त काहे पूछते हैं?

झेंपते हुए वो बोला.. खैर, खूब मोल-मोलाई(मोल-भाव) हुआ और पचास रूपया में वह तैयार हो गया.. :)

Saturday, November 05, 2011

यह लठंतपना शायद कुछ शहरों की ही बपौती है - भाग २

जब कभी भी इन रास्तों से सफ़र करने का मौका मिला हर दफ़े एक अजब सा लठंतपने को देखने का मौका भी मिला, मगर उसी लठंतपना का ही असर बाकी है जो मुझे पटना की ओर खींचता है.. चेन्नई से देल्ली तक का सफ़र वही आराम से और सुकून भरा था, मगर देल्ली से!! सुभानल्लाह.. दिल्ली उतर कर मुझे दूसरी फ्लाईट पकडनी थी.. दिल्ली में फ्लाईट डोमेस्टिक एयरपोर्ट पर लैंड किया, और मुझे वहाँ से टर्मिनल 3 पर जाना था.. समय पास में लगभग तीन घंटे का था.. एयरपोर्ट बस सर्विस का लाभ उठाया और पहुँच गया वहाँ.. टिकट लेने से लेकर चेक-इन तक हर काम समय पर और ठीक तरीके से मुकम्मल हुआ.. अब समय था उस लठंतपने का सामना करने का.. जिस दरवाजे से फ्लाईट पकड़ने था वहाँ कतार का कोई अत पता नहीं था.. फिर मैंने ध्यान दिया तो पाया की कुछ शहरों के लिए जाने वाली उड़ान के लिए कतारों का कोई मतलब ही नहीं था, मानों हम सब इन बातों से ऊपर उठ चुके हों.. :) उन शहरों का नाम नहीं लूँगा, मगर यह जरूर बताना चाहूँगा की उनमें हर एक नाम उत्तर भारत का ही है..

एक मजेदार घटना, जो ठीक अभी अभी घटी.. "एक जानकारी - हवाई जहाज के उड़ान भरते समय सभी सीटों को सीधा कर लेने के लिए कहते हैं.." अब घटना - मेरे ठीक पीछे वाले महाशय को एयर होस्टेज दो दफ़े समझा कर गई की अपनी सीट सीधी कर लें.. तीसरी बार का मौका उन्होंने नहीं दिया और खुद ही सीट सीधा कर लिया.. अब जब हमारा जहाज उड़ान भर चुका था तब मैंने अपनी सीट को हल्का पीछे की ओर झुका लिया.. ओ भाईसाब!! मत पूछिए, किसी स्कूली बच्चे की तरह उनका व्यवहार हुआ.. तुरंत टीचर को, मेरा मतलब एयर होस्टेज को बुलाकर शिकायत की गई.. तब उसने उन्हें कहा की आप भी अपनी सीट अब झुका सकते हैं.. भाईसाहब ने कुछ कहा तो नहीं, मगर उनका चेहरा देखने लायक ही होगा, चूँकि वो मेरे ठीक पीछे बैठे थे सो मैंने पीछे मुड कर उनका चेहरा देखना मुनासिब नहीं समझा..

शीघ्र ही पटना की सीमा रेखा को भी हवाई जहाज छूने लगा.. पटना की सडकों की रोशनी को देखते ही लगभग चीख पड़े वह "पटना में ढुक गए".. उनके बगल में बैठे उनके साथ के लोग उन्हें शांत कराये की भाई, इतना एक्जाईटेड(एक्साईटेड) क्यों हो रहे हैं!! शुक्र मना रहा हूँ की वे इसे नहीं पढ़ रहे हो.. वो मेरे ठीक पीछे बैठे हैं.. :)

खैर उतरते समय मैंने उनका शक्ल देखा तो पाया की सत्तर के आस-पास की उम्र रही होगी उनकी..