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Friday, April 03, 2009

उसका यूं ही चले जाना किसी मौत से कम नहीं था

वो कब इस जीवन में आयी और कब चली गई कुछ पता ही नहीं चला.. ऐसा लगता है जैसे जीवन के पांच साल यूं ही हवा में उड़ गये.. जीवन के सबसे खुशनुमा पांच साल.. उसकी कमी आज भी खलती है.. मन उदास भी होता है.. उसके वापस आने की कल्पना भी करता हूं.. मगर उसे पाने की कामना नहीं करता हूं.. उसके साथ जीवन के कयी खूबसूरत रंग देखे थे.. किसी के प्यार में आना क्या होता है यह भी उसका साथ पाकर ही जाना था.. उस प्यार का पागलपन.. उस प्यार की गहराई.. उस प्यार का अंधापन.. उस प्यार का दर्द.. वहीं उसके यूं ही चले जाने के बाद ही यह भी जाना की जिसे अंतर्मन से आप चाहते हैं और उसके बिना एक पल भी गुजारने का ख्याल भी डरा जाता हो, उसके अचानक यूं ही चले जाना.. बिना कुछ कहे.. बिना कोई कारण बताये.. शायद किसी अपने की मौत भी तो यूं ही होती है.. कहने को कई बातें होती है.. जिन बातों पर बहस होती थी उन्ही बातों को फिर से सुनने के लिये कान तरस जाते हैं.. अपनी भूल के लिये आप माफी मांगना चाहते हैं.. मगर कुछ कर नहीं सकते.. बस एक छटपटाहट अंदर तक रह जाती है जो अनगिनत रातें आपको पागलों कि तरह जगाती है.. तुम्हारे जाने से दुनिया को एक अलग नजरीये से भी देखा.. कई बुराईयां जिनसे दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं था, उन्हें भी अपना लिया.. मगर शायद पहले से अच्छा इंसान हो गया.. लेकिन उससे क्या तुम्हारी कमी पूरी हो गई? मुझे पता है कि उत्तर तुम नहीं दोगी.. यहां जो नहीं हो.. मगर क्या यहां होने पर भी उत्तर देती? नहीं.. उत्तर हम दोनों को ही पता है.. नहीं.. क्यों चली गई तुम यह सवाल आज भी अंदर तक मुझे खाता है.. उस बेचैनी को धुंवे तले छिपाने की नाकाम कोशिशें भी करता हूं.. अक्सर कईयों से यह सुना है कि जब उदास हो तो उन पुरानी यादों को याद करना चाहिये जब हम बेवजह खुश हुआ करते थे.. मगर मैं किन यादों को याद करूं? सभी बेवजह की खुशियां भी तो तुमसे ही थी, जिन्हें तुम साथ ले गई.. हां! शायद दुनिया के लिये तुम हो इसी दुनिया में कहीं, मगर मेरे लिये तो तुम्हारा यूं ही चले जाना किसी मौत से कम नहीं है..

Friday, January 23, 2009

एण्ड ब्लू डेविल एट माई एक्साईटमेंट

कई साल इसने इंतजार करवाया.. यूं तो मैं बहुत पैसे वाले परिवार से नहीं आता हूं मगर मुझे खाते-पीते परिवार का तो कह ही सकते हैं.. जब बड़ा हुआ और ड्राईविंग लाईसेंस बना तभी से मुझे चलाने को स्कूटर मिल गया.. एक तरह से संपूर्ण अधिकार के साथ.. पापा पटना में बहुत कम होते थे और होते भी थे तो स्कूटर कम ही चलाते थे, उनकी सवारी चार-पहिया ही होती थी.. और जहां तक भैया की बात है तो वो अपने पढ़ाई के चलते लगभग हमेशा अपने कॉलेज में ही रहते थे और जब आते भी थे तो स्कूटर चलाने में आत्मविश्वास की कमी के चलते लगभग नहीं के बराबर ही चलाते थे.. उस स्कूटर का सारा कर्ता-धर्ता एक तरह से मैं ही था.. मुझे यह भी पता था कि मुझे एक अदद स्कूटर भी मिला है नहीं तो अधिकतर मेरी उम्र के लड़कों को यह भी नसीब नहीं होता है.. फिर भी नये स्टाईलिस और शक्तिशाली इंजन वाले बाईक को देखकर दिल ललचाया जरूर करता था.. सोचता था कि कब मेरे पास मेरी अपनी और मेरे पसंद की बाईक होगी.. भैया जब एवेंजर खरीदे थे तब उस पर भी पूर्ण स्वामित्व कि भावना से ही बैठता था और बैठूंगा भी, मगर शत्-प्रतिशत स्वामित्व की भावना नहीं आई(भैया अगर आप पढ़ रहे हैं तो बुरा मत मानियेगा.. आप जानते ही हैं कि आपका छोटे भाई में यह बुराई है कि वह सोचता कुछ ज्यादा ही है..)

कल मैंने यह बाईक शोरूम से उठा कर ले आया.. मगर मुझे समझ में नहीं आ रहा था की जब मैं शोरूम जा रहा था तब भी कोई उत्साह नहीं लग रहा था और जब लेकर आ गया तब भी नहीं.. ऐसा लगता है सारे उत्साह को मैंने इसके बूकिंग के समय ही खर्च कर डाले हैं.. नौकरी जबसे करनी शुरू की तब से ना जाने कितनी ही बार कितने ही छोटी-बड़ी जरूरतों को अनदेखा करके पैसे बचाये काफी पैसे भैया ने भी दिये और इसे खरीदा.. मगर फिर भी.....

मन में कुछ खटक सा रहा है.. कहीं कुछ कमी सी लग रही है.. सोच रहा हूं किसके लिये इसे लिया हूं? किसके सामने प्रदर्शन के लिये इतने तड़क-भड़क वाली गाड़ी खरीदा हूं? मानसिक मंथन चल रहा है मगर कोई उत्तर नहीं मिल रहा है और मुझे लगता भी नहीं है कि उत्तर मिलेगा.. कहीं कुछ कमी जरूर है.. क्या? पता नहीं...

मैं कभी लोन पर नहीं लेना चाहता था, क्योंकि आजकल के बाजार का पता है.. पता नहीं कब सड़कों पर आ जाऊं.. बेरोजगारी के धक्के भी खाने को मिले.. सो उधारी से जितना बच सको उतना बच लो.. कई मित्र सलाह देते थे कि लोन पर उठा लो, मगर इसके लिये ना तो मैं तैयार था और ना ही पापा-मम्मी.. खैर इसके लिये जितना इंतजार करना पड़ा सो ठीक है लेकीन आज किसी बैंक पर अपनी उधारी तो नहीं चढ़ी है..


चलते-चलते -
मैंने पल्सर 200 खरीदा है.. जिसका रंग नीला है.. पल्सर 220, एवेंजर 200 और करिज्मा यह तीनों ही बाईक मशीनी ताकत के मामले में इसी के आस-पड़ोस के हैं.. लेकीन फिर भी पल्सर 200 लेने के पीछे कुछ कारण थे..
1. एवेंजर मुझे बहुत पसंद है लेकीन घर में पहले से ही यह है.. अगर घर में यह नहीं होता तो शायद मैं वही लेता..
2. पल्सर 220 और पल्सर 200 में बस 20CC के इंजन का अंतर है मगर दाम में लगभग 16,000 का अंतर है.. सो बस 20CC के लिये मैं 16,000 ज्यादा खर्च करना अनुचित समझा..
3. करिज्मा ना लेने का सबसे बड़ा कारण इसका हेडलाईट था जो इसके बॉडी से ही ही जुड़ा हुआ है.. अगर इसका हेड लाईट इसके हैंडल से जुड़ा होता तो शायद यह तगड़ा दावेदार होता..

बाद में पता चला कि पल्सर 220 में भी हेडलाईट के साथ यही समस्या है..

यामहा के नये मॉडल FZ-15/16 के साथ ना जाने के पीछे कारण इसका सही रीव्यू उपलब्ध ना होना था.. नेट पर जितने भी रीव्यू मैंने पढ़े उसे पढ़कर मेरे लिये भ्रामक स्थिति बन रही थी.. कुछ शंका भी मन में उत्पन्न हो रहा था.. जैसे कम CC के इंजन से जितने मात्रा में पॉवर उतपन्न हो रहा है उससे आगे चलकर इसके इंजन पर तो कोई असर नहीं पड़ेगा? कुल मिला कर मेरे लिये बजट कोई समस्या नहीं थी, अगर होता भी तो मैं कुछ दिन और इंतजार कर लेता मगर लेता वही जो मुझे पसंद होता.. जैसे इतने दिन इंतजार किया वैसे ही..

एक बार बहुत पहले, सन् 2001 में, मुझसे किसी ने कहा था कि तुम्हारे भीतर पेशेन्स बिलकुल नहीं है.. क्या इससे भी ज्यादा पेशेन्स की उम्मीद उसे थी? अगर यह ना होती तो कभी का ही लोन पर ले चुका होता..

Thursday, November 27, 2008

मेरे अपने सब ठीक हैं मुंबई में, और मैं खुश


"बरसात बहुत जोर से हो रही है.. न्यूज में पढ़ा था कि पूरे तमिलनाडु में 30 के लगभग लोग मर गये हैं.." बाईक चलाते हुये उसने मुझसे कहा.. मैं पीछे बैठा हुआ था..

ट्रैफिक बहुत था और चारों ओर घुटने से थोड़ा कम ही पानी जमा हुआ था.. लोग बिना शोर किये, हार्न बजाये बिना बस चुपचाप खड़े ट्रैफिक के ख्त्म होने का इंतजार कर रहे थे.. एक भाईसाहब बाईक पर ही इत्मिनान से छतरी खोल कर बैठे हुये थे.. जैसे उन्हें पता हो कि अगले 10-15 मिनट तक ट्रैफिक नहीं खुलने वाला हो..

"हां.." मैंने बात आगे बढ़ाते हुये कहा.. इस ट्रैफिक के कारण बात करने का मौका मिल गया था.. "3-4 दिनों से खूब बरसात हो रही है.. वैसे आपने आज कि खबर पढ़ी?" मैंने उड़ता हुआ सवाल उनकी ओर फेका..

"हां.. जो भी हुआ अच्छा नहीं हुआ.." पल भर को चिंता उनके चेहरे पर दिखने लगी जो क्षण भर में ही गायब हो गयी.. थोड़ी खुशी के साथ आगे उन्होंने कहा "एक अच्छी बात यह है कि मेरे जान पहचान में से मुंबई में कोई भी नहीं है.. सो मैं निश्चिंत हूं.. वैसे भी चेन्नई में बम नहीं फूटता है कभी.."

"क्यों? चेन्नई में क्यों नहीं फूटता?" मैंने अगला सवाल किया..

"देखो मैं तमिलनाडु का ही रहने वाला हूं, मैं यहां के लोगों को अच्छे से जानता हूं.. यहां के अधिकतर लोग तमिल को धर्म से भी ऊपर रखते हैं.. उनके लिये पहले मैं तमिल हूं फिर जाकर हिंदू या मुसलमान.. तमिल होना उनका पहला धर्म है, तब जाकर कुछ और.." इतने दिनों से यहां रहते हुये मैं भी अब यह समझने लगा हूं.. मुझे उनकी बातों में सच्चाई लगी..

ट्रैफिक खुल चुकी थी और वो बाईक चलाने में व्यस्त हो चुके थे.. मैं भी सोचने लगा था.. "कल रात मैंने भी क्या किया? अपने सभी जान-पहचान के लोगों कि खबर ले ली और सुबह ऑफिस जाना है सोचकर चैन से सो गया, सोचा कि होगी कोई छोटी सी घटना और ऐसी घटना तो रोज ही घटती है.. एक भैया जो कोलावा में नेवी क्वाटर में रहते हैं, कुछ कालेज के दोस्त और ब्लौग जगत के मित्र.. सभी कुशल से हैं, और मैं भी निश्चिन्त.. क्या हम सभी के लिये ये आम घटना नहीं थी.. आज जिसे देखो उसका खून खौल रहा है इस पर.. 10 दिनों बाद न्यूज चैनलों के लिये ये कोई खबर भी नहीं रहेगी.. फिर आने वाले चुनाव में इसे खूब भुनाया जायेगा.. आरोप-प्रत्यारोप का दौर चलने लगेगा.. जो आतंकवादी पकड़ा गया है उसका धर्म देखा जायेगा.. 10 साल बाद जब कोर्ट उसे मौत कि सजा सुनायेगी तब कुछ बेहद गिरे हुये नेता उसके बचाव में आ खड़े होंगे, उस पर भी राजनीति करेगें.. इस बीच कुछ और बम धमाके.. कुछ और आतंकवादी हमला.. बस हम और हमारे लोग ठीक हैं, हम इसी गुमान में जीते रहेंगे.."

Friday, October 10, 2008

इंतजार भी कितनी खूबसूरत होती है.. है ना?

इंतजार भी कितनी खूबसूरत होती है..
एक ऐसा इंतजार जो कभी लगता है,
खत्म ना ही हो तो अच्छा है..
दिल को सकून तो मिलता है,
कि तुम भी शायद इसी इंतजार में हो..
मेरे इंतजार में..

भुलावे में जीना भी कभी-कभी
जीने कि वजह बन जाती है..
तुम कभी वापस मत आना..
शायद यह खुशफहमी खत्म ना हो जाये..
जीने की वजह ही खत्म ना हो जाये..
तुम कभी वापस मत आना..
प्लीज मत आना..


मेहदी हसन जी का एक गीत..

Sunday, September 14, 2008

सच में मम्मी, कहां फंसा दी

कुछ दिन पहले मैंने अपने एक पोस्ट में अपने भतीजे के जन्म पर एक पोस्ट लिखा था की क्या मम्मी कहां फंसा दी.. वो पोस्ट बस एक मजाक भर में लिखा हुआ था.. खुशियों से भरा हुआ.. मगर कभी-कभी सच में लगता है की क्या मम्मी कहां फंसा दी जन्म देकर.. हर दिन एक नयी चुनौती का सामना करना पड़ता है.. नये अंतर्द्वंद सामने आते हैं.. हर समस्या को हम उचित तरीके से हल नहीं कर पाते हैं तो कुछ समस्याओं का समाधान हमारे बस के बाहर की चीज लगती है, जो होती भी है.. कभी कुछ ना कर पाने का दर्द होता है तो कभी कुछ करने पर भी खोने का डर लगा रहता है..

अगर मैं अपने जीवन के अबतक के बीते हुये सालों पर गौर करता हूं तो पाता हूं की मैं जितना पाने के लायक हूं उतना मुझे कभी मिला नहीं है.. खासतौर पर मैं जो कुछ भी पाने के लिये जी-तोड़ मेहनत करता हूं वो मुझे कभी नहीं मिला है.. जिस किसी से बहुत ज्यादा लगाव होता है, वो मेरे जीवन में क्षणभर से ज्यादा नहीं रहता है.. चाहे वो कोई भौतिक पदार्थ हो या कोई मित्र हो या कोई अपना..

कुछ चीजें इतनी अधिक तकलीफ पहूंचाती है जो मेरे सहनशक्ति से बाहर लगता है.. तब मन में ये जरूर लगता है की क्या मम्मी कहां फंसा दी.. पापा-मम्मी से बहुत ज्यादा लगाव है मुझे, मगर उनसे इतनी दूर हो गया हूं कि जब कभी मुझे उनके साथ की जरूरत होती है तब कभी उन्हें अपने पास नहीं पाया हूं.. स्वभाव कुछ ऐसा मिला है कि अपनी बात अपने भीतर ही रख लेता हूं, किसी से मन की कुछ बात कहना भी चाहूं तो कह नहीं पाता हूं.. कई बार ये भी महसूस हुआ है की अंदर ही अंदर घुटा जा रहा हूं..

कहने को तो ब्लौगिंग एक ऐसा संसार है जहां आप अपने मन की बात बिना किसी सोच-संकोच के रख देते हैं, लिख देते हैं.. मगर हिंदी ब्लौगिंग का चरित्र अंग्रेजी ब्लौगिंग से अलग है.. यहां हम सभी सार्वजनिक होते हैं.. अब ऐसे हालात में अपने मन की बात को सार्वजनिक करना भी उचित नहीं होता है.. किसी सीमा में रहकर ही अपने मन की बात लिखता हूं.. सच कहूं तो मैं अभी भी अंदर ही अंदर घुट रहा हूं.. क्या करूं, कहां जाऊं कुछ समझ में नहीं आ रहा है..

जाता हूं मम्मी से बात करने.. उन्हें कहने.. उनसे पूछने.. कि क्या मम्मी कहां फंसा दी जन्म देकर..

कुछ दिनों से ब्लौगजगत से बिलकुल बाहर हो चला था.. अपने कुछ निजी कारणों से.. अपने अगले पोस्ट में बताता हूं यहां चेन्नई में किये गये बाढ सहायता कार्यों के बारे में..

Friday, June 06, 2008

खिंचाव! कुछ रिश्तों का और कुछ...!

मुझे इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स और बाईक्स का बहुत शौक है.. इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स में भी अगर वो संगीत से जुड़ा हो तो फिर क्या कहना.. मेरे हाथ जो भी नया मोबाईल फोन या आई पॉड या फिर एक हेडफोन ही लग जाये, बस सबसे पहले यही देखता हूं कि इसे किस अधिकतम सीमा तक प्रयोग में लाया जा सकता है.. मेरे पास एक सोनी का ईयर फोन है, जिसे मैंने 2003 में खरीदा था लगभग 1700 रूपये में.. उस पर तो ना जाने क्या-क्या प्रयोग करके देख चुका हूं.. कंप्यूटर में तरह-तरह के साफ्टवेयर से अधिकतम आवाज में लगा कर.. बस ये जानने के लिये कि किस सीमा पर खराब आवाज देना शुरू करे.. मगर वो अभी तक किसी भी प्रयोग में अनुत्तीर्ण नहीं हुआ है.. हां उसके अलावा मेरे पास ना जाने कितने ही हेड फोन हैं जो मेरे इस जुल्म का शिकार होकर दम तोड़ चुके हैं..

कुछ साल पहले भैया ने एक बाईक खरीदी थी.. एवेंजर.. जहां तक मुझे पता है ये बाईक अभी तक बिहार में लांच नहीं हुआ है.. भैया ने ये लखनऊ में खरीदी थी.. जब उन्हें पुना किसी ट्रेनिंग के लिये जाना था और उसी समय मैं कुछ दिनों के लिये पटना जाने वाला था तब उन्होंने अपनी बाईक पटना में लाकर रख दिया.. मेरे चलाने के लिये.. पटना में उस समय ये गाड़ी एक अलग ही चीज की तरह देखी जाती थी.. सबसे अलग जो थी.. शान से उस पर मैं घूमता था.. फिर ये बाईक भी मेरे जुल्म का शिकार हुआ.. कितने कम सेकेण्ड में ये 60 कि गति पकड़ेगा, 10 सेकेण्ड में कितने की अधिकतम गति पर पहूंच सकता है और भी ना जाने क्या-क्या प्रयोग मैंने उस पर किया.. अधिकतम गति के मामले में उसने मुझे 125 के लगभग कि गति दी.. इसने भी मुझे निराश नहीं किया.. हां मैं बस उसी चीज पर ये प्रयोग करता हूं, जिसे अपना समझता हूं.. एक-दो बार कुछ अपनों की वस्तुओं को भी अपना समझने की भूल करके एक सबक सीख चुका हूं.... कहते हैं ना, जिंदगी हर दिन कुछ सिखाती है.. मैं भी निरंतर सीखता गया.. कुछ सही, कुछ गलत..

कभी-कभी लगता है मैं रिश्तों के मामले में भी यही गलती कर जाता हूं.. जिसे अपना समझता हूं, उस पर पूरा अधिकार दिखा जाता हूं.. इतना, जितना कि नहीं दिखाना चाहिये.. चाहे ये रिश्ता कोई सा भी क्यों ना हो(दोस्ती का भी).. भूल जाता हूं कि ये कोई भौतिक चीज नहीं है जो अगर अच्छे गुणवत्ता कि हो तो अपने अधिकतम खिंचाव पर भी आपका साथ नहीं छोड़ती है.. और अगर साथ छोड़ भी दे तो आपके पास विकल्प होता है कि आप उसे त्याग कर वैसा ही एक नया ले आयें.. जो कि आप रिश्तों के साथ नहीं कर सकते हैं..

जिंदगी ने जो ताजातरीन सबक सिखाया है वो कुछ यूं है.. जो आपके पास है वो भी आपका है या नहीं ये पूरी तरह आपके विवेक पर और आपकी किस्मत पर निर्भर करता है.. मैंने किस्मत कि बात इसलिये कि क्योंकि आप कभी मानव स्वभाव को नहीं समझ सकते कि कौन कब और कैसा रूप आपको दिखा जाये..

कोई हाथ भी ना मिलाएगा, जो गले मिलोगे तपाक से..
ये नए मिजाज का शहर है, जरा फासलों से मिला करो..

-----------बसीर बद्र

Friday, April 04, 2008

सोचा भी ना था

सोचा था, तुम्हारे दर्द में मैं
और मेरे दर्द में तुम जागो सारी रात..
मैं तो आज भी जाग रहा हूं,
सोचकर कि तुम्हें कोई तकलीफ़ तो नहीं?
क्या तुम भी जागती हो?

सोचा था कि तुम्हारी खुशियों
में तुमसे ज्यादा मैं खुश होउंगा..
इसी भ्रम में आज भी खुश रहने की कोशिश करता हूं..
बिछड़कर मुझसे क्या तुम भी खुश रहती हो?

सुना था समय हर दर्द को भुला देता है..
मैं अब इसी भ्रम में हूं
कि मेरे घाव भी भर गये हैं..
क्या तुम्हें भी अब दर्द नहीं होता है?

आज कुछ भी लिखने का मन नहीं है सो आज मैं अपनी पिछली पोस्ट को पूरा नहीं कर रहा हूं.. और आपके सामने ये लेकर आया हूं..

Sunday, December 09, 2007

जिंदगी किसी के बिना रूकती नहीं

अक्सर यादें आया करती थी,
यादों में एक चेहरा था..
चेहरे पे एक मासूमियत,
और उस मासूमियत में थी मेरी जिंदगी..
आज ना वो यदें हैं,
ना ही वो चेहरा,
और ना ही वो मासूमियत..
ऐसा लगता है जैसे वो मासूमियत,
कहीं गुम हो गई हो,
जीवन के इस वस्तविकता में..

उस मासूमियत को,
तलाशता फिर रहा हूं हर जगह..
पर वि इन प्लस्टिक के चेहरों में,
कहीं गुम सी नजर आती है..
पर जिंदगी किसी के बिना रूकती नहीं,
वो तो निर्बाध गति से चलती जाती है..

Saturday, September 29, 2007

दो विपरीत अनुभव

पहला अनुभव

मैं चेन्नई में जहां रहता हूं वहां से कार्यालय जाने वाले रास्ते में 'बस' में बहुत ज्यादा भीड़ होती है। उस भीड़ का एक नजारा आप भी इस तस्वीर में ले सकते हैं। (चित्र के लिये आभार 'हिंदू' को)

मैं उस दिन अपने कार्यालय से जल्दी घर के लिये निकल गया था। मैं उस दिन अपने कार्यालय से जल्दी घर के लिये निकल गया था। 'बस' में अपने लिये जगह बनाने के लिये मैं 'बस' के पीछे वाले हिस्से में चला गया। वहां देखा एक बहुत ही बुजुर्ग, जो शायद मेरे दादा जी के उम्र के होंगें और जिन्हें चलने में भी परेशानी होती होगी, वहां खड़े हैं। मुझे वहां बैठे अपने उम्र के लोगों पर तरस आया की इनके पास इतना भी संस्कार नहीं है की खुद उठ कर उन्हें बैठने के लिये जगह दे दें। संस्कार कि बात अगर हटा भी दें तो इतनी मानवीयता तो होनी ही चाहिये। थोड़ी देर बाद मैंने देखा की आगे वाले एक जगह खाली हो रही थी और मैंने लपक कर उस जगह पर बैठ गया। और अपने बगल में खड़े एक सज्जन को कहा की उन्हें यहां बुला दें जिससे मैं उनको बैठने के लिये जगह दे सकूं। वो सज्जन अंग्रेजी नहीं समझ पा रहे थे और मुझे तमिल नहीं आ रही थी। खैर मैंने किसी तरह इशारों में उन्हें समझाया और अंततः वो समझ गये और उन्हें बुलाया। मैं वहां से खड़ा हो गया और उनको बैठने के लिये जगह दे दिया, उन्होंने मुझे तमिल में कुछ कहा जिसे मैं समझ नहीं पाया पर इतना जरूर अंदाजा लगा लिया की वो मुझे आशीर्वाद दे रहे हैं। फिर मैंने देखा कि वहां बैठे लोग मुझे ऐसे देख रहे थे जैसे मैंने कुछ गलती कर दी हो और उनकी नजरें मेरा उपहास कर रही थे। पर मुझे उन नजरों की कोई चिंता नहीं थी, और उनके उपहास भड़ी नजरों से मेरा सर गर्व से और ऊंचा हो गया।

दूसरा अनुभव

यहां मैंने पाया है कि चेन्नई में उत्तरी भारतीय लोगों के लिये एक बात बहुत आम है और वो यह है कि यहां अक्सर आपको ऐसे लोग मिल जायेंगे जो आपसे हिंदी में बात करेंगे और बतायेंगे की कैसे वो यहां आये थे और कैसे उनका सारा सामान चोरी हो गया और अब उनके पास खाने के लिये कुछ भी नहीं है। वो वापस कैसे जायेंगे इसका भी कुछ पता नहीं है। कुछ पैसों से अगर मदद मिल सके तो कर दें। वे सारे लोग आपको अच्छे कपड़ों मे सजे-धजे दिखेंगे और अगर आप चेन्नई में नये हैं तो आप जरूर उनके बहकावे में आकर ठगे जायेंगे।

उस दिन मेरे मित्र विकास के पापा आने वाले थे और मुझे उनको लेने रेलवे स्टेशन जाना था। उसके लिये मैंने यहां के मांम्बलम स्टेशन से लोकल लेकर चेन्नई सेंट्रल जाना मुनासिब समझा। जब मैं अपने कार्यालय से स्टेशन के रास्ते पर था तो मुझे ऐसा लगा जैसे मुझे कोई पूकार रहा हो। "भाई साहब आप हिंदी जानते हैं!" मैं ठिठक गया, सोचा शायद ऐसा कोई हो जिसे कहीं जाने का रास्ता या पता चाहिये होगा। और उसे सही सही कोई बता नहीं पा रहा होगा।
मैंने देखा एक आदमी अपनी बीबी और एक बच्चे के साथ था। वो बताने लगा की वो औरंगाबाद महाराष्ट्र का रहने वाला है और उसकी बात यहां कोई समझ नहीं पा रहा है, क्योंकि उसे अंग्रेजी ठीक से नहीं आती है। मैं उस समय जल्दी में था पर फिर भी रूक कर उसकी बात सुनने लगा की शायद कोई मदद कर सकूं। मगर वो भी वही बात दोहराने लगा जो मैं चेन्नई में आने के बाद कई बार सुन चुका हूं। और फिर मैं अपना मुंह बनाते हुये उसकी पूरी बात सुने बिना आगे बढ गया। पर आगे बढने के बाद मुझे ऐसा लगा जैसे मैंने कुछ गलत कर दिया हो, क्योंकि मुझे उसके बच्चे का चेहरा याद आया जो मासूमियत से भड़ा हुआ था और अपने पिता को देखे जा रहा था। उसे शायद पूरी उम्मीद थी की शायद इस बार कुछ बन सके। और वो कुछ भूखा भी लग रहा था। मुझे पहली बार ऐसा लगा की वो आदमी सही था। लेकिन मैं अब वापस पीछे नहीं जा सकता था नहीं तो मुझे बहुत देर हो जाती। मैंने अपने मन को समझाया कि अगर मैं उसकी मदद करना चाहता, तब भी नहीं कर पाता क्योंकि मेरे पास 7-8 रूपये चिल्लर के अलावा कुछ 500 के नोट थे। लेकिन मुझे पता है कि वो गलत तर्क है, क्योंकि अगर मैं उसकी मदद करना चाहता तो मेरे पास 3-3 कार्ड थे और वो रास्ता बड़े-बड़े डिपार्टमेंटल स्टोर से भड़ा हुआ था। अगर मैं चाहता तो कुछ खाने के लिये खरीद कर उसे दे सकता था।

अभी भी मैं सोचता हूं तो थोड़ी तकलीफ होती है कि किस तरह हमलोग ठगों से बचने के चक्कर में जरूरतमंदों से भी नजरें मोड़ लेते हैं।

Tuesday, April 17, 2007

उद्देश्यहीन जीवन

जी रहा था यूँ,
कि मानो जिन्दगी बसर कर रहा था,
उद्देश्यहीन जीवन,
तब तुम आयी,
जीवन में बहार बनकर,
धड़कन लेकर,
चाहा था तुम्हें,
हमेशा खुश रखने की चाहत थी,
एक उद्देश्य मिला था जीवन को।
अब आज
जब तुम नहीं हो,
जीवन पुनः
उदास झरने के जैसे
बही जा रही है,
मानो उद्देश्यहीन जिन्दगी ही,
जीवन का अंतहीन सत्य हो॥

Friday, December 01, 2006

मेरी लिखी कविता

टूटे सपने
सुबह उठा,
तो हर चीज को उदास पाया,
शायद कुछ खोया था,
या कुछ टूटा था,
हाँ कुछ सपने टूटे थे शायद,
आखें लाल थी,
कुछ भींगी सी भी,
लगा कुछ चुभ रहा हो,
शायद उन्ही सपनों के टुकड़े थे,
दिन तो युँ ही गुजर गया,
रात जब बिस्तर पर पहुँचा तो देखा,
वे टुकड़े अभी भी वहीं पड़े मेरे आने का इन्तजार कर रहे थे,
शायद अब भी कुछ कसर बाकी थी,
लेकिन अभी हर चीज को हंसता पाया,
कोई उदासी नहीं कुछ भी नहीं,
मानो मेरी हँसी उरा रहें हों
और फिर से मेरे नये सपने का इन्तजार कर रहें हों।।।