कई साल इसने इंतजार करवाया.. यूं तो मैं बहुत पैसे वाले परिवार से नहीं आता हूं मगर मुझे खाते-पीते परिवार का तो कह ही सकते हैं.. जब बड़ा हुआ और ड्राईविंग लाईसेंस बना तभी से मुझे चलाने को स्कूटर मिल गया.. एक तरह से संपूर्ण अधिकार के साथ.. पापा पटना में बहुत कम होते थे और होते भी थे तो स्कूटर कम ही चलाते थे, उनकी सवारी चार-पहिया ही होती थी.. और जहां तक भैया की बात है तो वो अपने पढ़ाई के चलते लगभग हमेशा अपने कॉलेज में ही रहते थे और जब आते भी थे तो स्कूटर चलाने में आत्मविश्वास की कमी के चलते लगभग नहीं के बराबर ही चलाते थे.. उस स्कूटर का सारा कर्ता-धर्ता एक तरह से मैं ही था.. मुझे यह भी पता था कि मुझे एक अदद स्कूटर भी मिला है नहीं तो अधिकतर मेरी उम्र के लड़कों को यह भी नसीब नहीं होता है.. फिर भी नये स्टाईलिस और शक्तिशाली इंजन वाले बाईक को देखकर दिल ललचाया जरूर करता था.. सोचता था कि कब मेरे पास मेरी अपनी और मेरे पसंद की बाईक होगी.. भैया जब एवेंजर खरीदे थे तब उस पर भी पूर्ण स्वामित्व कि भावना से ही बैठता था और बैठूंगा भी, मगर शत्-प्रतिशत स्वामित्व की भावना नहीं आई(भैया अगर आप पढ़ रहे हैं तो बुरा मत मानियेगा.. आप जानते ही हैं कि आपका छोटे भाई में यह बुराई है कि वह सोचता कुछ ज्यादा ही है..)
कल मैंने यह बाईक शोरूम से उठा कर ले आया.. मगर मुझे समझ में नहीं आ रहा था की जब मैं शोरूम जा रहा था तब भी कोई उत्साह नहीं लग रहा था और जब लेकर आ गया तब भी नहीं.. ऐसा लगता है सारे उत्साह को मैंने इसके बूकिंग के समय ही खर्च कर डाले हैं.. नौकरी जबसे करनी शुरू की तब से ना जाने कितनी ही बार कितने ही छोटी-बड़ी जरूरतों को अनदेखा करके पैसे बचाये काफी पैसे भैया ने भी दिये और इसे खरीदा.. मगर फिर भी.....
मन में कुछ खटक सा रहा है.. कहीं कुछ कमी सी लग रही है.. सोच रहा हूं किसके लिये इसे लिया हूं? किसके सामने प्रदर्शन के लिये इतने तड़क-भड़क वाली गाड़ी खरीदा हूं? मानसिक मंथन चल रहा है मगर कोई उत्तर नहीं मिल रहा है और मुझे लगता भी नहीं है कि उत्तर मिलेगा.. कहीं कुछ कमी जरूर है.. क्या? पता नहीं...
मैं कभी लोन पर नहीं लेना चाहता था, क्योंकि आजकल के बाजार का पता है.. पता नहीं कब सड़कों पर आ जाऊं.. बेरोजगारी के धक्के भी खाने को मिले.. सो उधारी से जितना बच सको उतना बच लो.. कई मित्र सलाह देते थे कि लोन पर उठा लो, मगर इसके लिये ना तो मैं तैयार था और ना ही पापा-मम्मी.. खैर इसके लिये जितना इंतजार करना पड़ा सो ठीक है लेकीन आज किसी बैंक पर अपनी उधारी तो नहीं चढ़ी है..

चलते-चलते -
मैंने पल्सर 200 खरीदा है.. जिसका रंग नीला है.. पल्सर 220, एवेंजर 200 और करिज्मा यह तीनों ही बाईक मशीनी ताकत के मामले में इसी के आस-पड़ोस के हैं.. लेकीन फिर भी पल्सर 200 लेने के पीछे कुछ कारण थे..
1. एवेंजर मुझे बहुत पसंद है लेकीन घर में पहले से ही यह है.. अगर घर में यह नहीं होता तो शायद मैं वही लेता..
2. पल्सर 220 और पल्सर 200 में बस 20CC के इंजन का अंतर है मगर दाम में लगभग 16,000 का अंतर है.. सो बस 20CC के लिये मैं 16,000 ज्यादा खर्च करना अनुचित समझा..
3. करिज्मा ना लेने का सबसे बड़ा कारण इसका हेडलाईट था जो इसके बॉडी से ही ही जुड़ा हुआ है.. अगर इसका हेड लाईट इसके हैंडल से जुड़ा होता तो शायद यह तगड़ा दावेदार होता..
बाद में पता चला कि पल्सर 220 में भी हेडलाईट के साथ यही समस्या है..
यामहा के नये मॉडल FZ-15/16 के साथ ना जाने के पीछे कारण इसका सही रीव्यू उपलब्ध ना होना था.. नेट पर जितने भी रीव्यू मैंने पढ़े उसे पढ़कर मेरे लिये भ्रामक स्थिति बन रही थी.. कुछ शंका भी मन में उत्पन्न हो रहा था.. जैसे कम CC के इंजन से जितने मात्रा में पॉवर उतपन्न हो रहा है उससे आगे चलकर इसके इंजन पर तो कोई असर नहीं पड़ेगा? कुल मिला कर मेरे लिये बजट कोई समस्या नहीं थी, अगर होता भी तो मैं कुछ दिन और इंतजार कर लेता मगर लेता वही जो मुझे पसंद होता.. जैसे इतने दिन इंतजार किया वैसे ही..
एक बार बहुत पहले, सन् 2001 में, मुझसे किसी ने कहा था कि तुम्हारे भीतर पेशेन्स बिलकुल नहीं है.. क्या इससे भी ज्यादा पेशेन्स की उम्मीद उसे थी? अगर यह ना होती तो कभी का ही लोन पर ले चुका होता..
कल मैंने यह बाईक शोरूम से उठा कर ले आया.. मगर मुझे समझ में नहीं आ रहा था की जब मैं शोरूम जा रहा था तब भी कोई उत्साह नहीं लग रहा था और जब लेकर आ गया तब भी नहीं.. ऐसा लगता है सारे उत्साह को मैंने इसके बूकिंग के समय ही खर्च कर डाले हैं.. नौकरी जबसे करनी शुरू की तब से ना जाने कितनी ही बार कितने ही छोटी-बड़ी जरूरतों को अनदेखा करके पैसे बचाये काफी पैसे भैया ने भी दिये और इसे खरीदा.. मगर फिर भी.....
मन में कुछ खटक सा रहा है.. कहीं कुछ कमी सी लग रही है.. सोच रहा हूं किसके लिये इसे लिया हूं? किसके सामने प्रदर्शन के लिये इतने तड़क-भड़क वाली गाड़ी खरीदा हूं? मानसिक मंथन चल रहा है मगर कोई उत्तर नहीं मिल रहा है और मुझे लगता भी नहीं है कि उत्तर मिलेगा.. कहीं कुछ कमी जरूर है.. क्या? पता नहीं...
मैं कभी लोन पर नहीं लेना चाहता था, क्योंकि आजकल के बाजार का पता है.. पता नहीं कब सड़कों पर आ जाऊं.. बेरोजगारी के धक्के भी खाने को मिले.. सो उधारी से जितना बच सको उतना बच लो.. कई मित्र सलाह देते थे कि लोन पर उठा लो, मगर इसके लिये ना तो मैं तैयार था और ना ही पापा-मम्मी.. खैर इसके लिये जितना इंतजार करना पड़ा सो ठीक है लेकीन आज किसी बैंक पर अपनी उधारी तो नहीं चढ़ी है..

चलते-चलते -
मैंने पल्सर 200 खरीदा है.. जिसका रंग नीला है.. पल्सर 220, एवेंजर 200 और करिज्मा यह तीनों ही बाईक मशीनी ताकत के मामले में इसी के आस-पड़ोस के हैं.. लेकीन फिर भी पल्सर 200 लेने के पीछे कुछ कारण थे..
1. एवेंजर मुझे बहुत पसंद है लेकीन घर में पहले से ही यह है.. अगर घर में यह नहीं होता तो शायद मैं वही लेता..
2. पल्सर 220 और पल्सर 200 में बस 20CC के इंजन का अंतर है मगर दाम में लगभग 16,000 का अंतर है.. सो बस 20CC के लिये मैं 16,000 ज्यादा खर्च करना अनुचित समझा..
3. करिज्मा ना लेने का सबसे बड़ा कारण इसका हेडलाईट था जो इसके बॉडी से ही ही जुड़ा हुआ है.. अगर इसका हेड लाईट इसके हैंडल से जुड़ा होता तो शायद यह तगड़ा दावेदार होता..
बाद में पता चला कि पल्सर 220 में भी हेडलाईट के साथ यही समस्या है..
यामहा के नये मॉडल FZ-15/16 के साथ ना जाने के पीछे कारण इसका सही रीव्यू उपलब्ध ना होना था.. नेट पर जितने भी रीव्यू मैंने पढ़े उसे पढ़कर मेरे लिये भ्रामक स्थिति बन रही थी.. कुछ शंका भी मन में उत्पन्न हो रहा था.. जैसे कम CC के इंजन से जितने मात्रा में पॉवर उतपन्न हो रहा है उससे आगे चलकर इसके इंजन पर तो कोई असर नहीं पड़ेगा? कुल मिला कर मेरे लिये बजट कोई समस्या नहीं थी, अगर होता भी तो मैं कुछ दिन और इंतजार कर लेता मगर लेता वही जो मुझे पसंद होता.. जैसे इतने दिन इंतजार किया वैसे ही..
एक बार बहुत पहले, सन् 2001 में, मुझसे किसी ने कहा था कि तुम्हारे भीतर पेशेन्स बिलकुल नहीं है.. क्या इससे भी ज्यादा पेशेन्स की उम्मीद उसे थी? अगर यह ना होती तो कभी का ही लोन पर ले चुका होता..