Showing posts with label Blogging. Show all posts
Showing posts with label Blogging. Show all posts

Thursday, October 01, 2009

ब्लौगर हलकान सिंह 'विद्रोही' का चेन्नई आगमन

अब क्या कहें, ये हलकान सिंह विद्रोही आजकल जहां देखो वहीं दिख जाते हैं.. पहले कलकत्ता में शिव जी के साथ मटरगस्ती कर रहे थे.. फिर कानपूर में अनूप जी को कथा कहानी सुनाने लगे.. अब जब वह चेन्नई आये थे तब उन्होंने मुझे बताया कि एक दिन वे भटकते हुये मेरे पुराने पोस्ट पढ़ने लगे.. देखा कि यह तो अमूमन जिस किसी ब्लौगिये से मिलता है उस पर एक-दो पोस्ट तो ठोक ही देता है.. और उसमें किसी की बुराई तो छोड़ो, टांग खिंचाई भी नहीं करता है.. तो चलो चेन्नई भी घूम ही आते हैं.. और कुछ नहीं तो एक ठो पोस्टवा तो ठेल ही देगा पीडी.. कुछ हो ना हो मगर उसमें मेरे ब्लौग का लिंक लगा दिया तो चिट्ठाजगत के हवाले में एक और लिंक जुड़ जायेगा.. चिट्ठाजगत रैंकिंग में कुछ जुगाड़ तो होगा सो अलग, ब्लौगवाणी में एक पसंद भी उससे जुड़वा ही लेंगे..

यहां आने के बाद जब उन्हें पता चला कि पीडी तो आजकल मूडिया लेखन कर रहा है.. अब जब उसे मूड होता है तभी किसी के बारे में लिखता है.. यह बात उन्हें तब पता चली जब मैंने उन्हें बताया कि कलकत्ता में आपके चहेते शिव जी से मिला, पूरा दिन उनके साथ बिताया.. मगर एक भी पोस्ट नहीं लिखा.. मुझसे पूछ बैठे कि ऐसा क्यों? काहे नहीं लिखे उनपर? वो तो ऐसे भी हिंदी ब्लौगजगत के नामचीन जेंटलमैन ब्लौगिये बन चुके हैं.. फिर भी नहीं लिखे कुछ? मैंने बहाना बनाना शुरू किया कि घर पर नेट नहीं है.. ऑफिस में काम से फुरसत नहीं है.. इत्यादी.. इत्यादी.. मगर वह संतुष्ट नहीं हुये और मेरा लैपटॉप मांग कर टटोलने लगे उसमें देखे कि दो-तीन पोस्ट टाईप कर के रखा हुआ है, मगर पोस्ट नहीं है.. उसे पढ़ते ही उनके आह्लादित मुख पर मुस्कान फैल गई.. उन्होंने कहा, "बहुत अच्छा लिखते हैं आप.. लिखते रहें.. हिंदी ब्लौगिंग का नाम आपसे रौशन होगा.."

अब हमें ऐसे कमेंट से आश्चर्य नहीं होता है.. पहले तो जैसे ही ऐसा कमेंट आता था बस जोर का झटका लगता था.. भला हम बहुत अच्छा कब से लिखने लगे? और यह कहीं किसी ज्योतिष वाले ब्लौग से तो यहां नहीं आ रहे हैं जो भविष्यवाणी भी कर दिये हैं? मगर अब इन बातों पर भी कितने दिनों तक आश्चर्य करते रहेंगे? अगर आश्चर्य लगातार करते रहें तो हमारा तो शक्ल ही वैसा दिखने लगेगा.. कुछ-कुछ विश्मयकारी चिन्ह जैसा.. एक छोटी सी लकीर और उसके नीचे एक बिंदू.. मुझे उनकी बात सुनकर बचपन के मास्टर की याद आ गई जो बात-बात पर भविष्यवाणी करते थे, "पढ़ाई-लिखाई साढ़े बाईस.. बड़ा होकर घास काटेगा तुम.."

सच में भारत महान ज्योतिषियों का देश है, जहां हर दस में से आठ हमेशा कुछ ना कुछ भविष्यवाणी करते दिख ही जाते हैं.. चुनाव के समय नेता लोग अपने वादों को भविष्यवाणी का रूप देकर इतने आत्मविश्वास के साथ अपनी बात रखते हैं जैसे वह तो अकाट्य सत्य है.. उसे होने से कोई नहीं रोक सकता है.. क्रिकेट शुरू होने से पहले मीडिया और क्रिकेट खिलाड़ी भी वही रवैया अपनाते हैं.. वैसे होता ढाक के तीन पात है, यह मुझे बताने की जरूरत नहीं है..

खैर लगता है मैं विषय से भटक रहा हूं.. मैं तो बैठा था ब्लौगर हलकान सिंह 'विद्रोही' जी के चेन्नई आगमन के बारे में लिखने, मगर चाय की चुस्कियों में कहीं और खो गया.. हां! तो मैंने बातों ही बातों में शिव जी के पोस्ट का हवाला देते हुये पूछा, "आपके कितने ऐसे ब्लौग हैं जिस पर आप अनाम बन कर लिखते हैं?" मैं सोच रहा था कि यह प्रश्न सुनकर थोड़ा तो सकपकायेंगे, मगर वे तो खी-खी करके हंस रहे थे.. इससे एक सबक सीखा, हिंदी ब्लौगर को निर्लज्ज होना अतिआवश्यक होता है..

वे वैसी ही हंसी हंसते हुये बोले, "कितनों का नाम गिनाऊं? मुझे खुद भी याद नहीं है.. वो तो जब अपना डैशबोर्ड देखता हूं तभी याद आता है.."

"फिर भी! कुछ का तो नाम याद होगा?" मैंने पूछा?

वो एक एक को यादकरके सभी का नाम गिनाना शुरू किये.. ठीक उसी समय मुझे कुछ याद आया और जिसे दो-तीन दिनों से याद करते आ रहे थे मगर बार बार भूल जा रहे थे.. अब क्या करें? ब्लौगिंग करने का हमारा मकसद भी तो यही था.. जो भूली बिसरी बातें हैं उन्हें संजो कर रखने की.. कहीं बाद में फिर से भूल गया तो? मुझे कुछ लिखता देख कर वे सशंकित निगाह से मुझे देखने लगे.. मुझसे पूछे कि क्या लिख रहे हो? मैंने कहा कि कुछ चीजें.. कहीं बाद में भूल ना जाऊं.. मगर वो आश्वस्त नहीं हुये..

मुझे सावधान करते हुये कहने लगे, "ये आप सनसनी फैलाने के लिये मेरे सारे अनाम ब्लौग का नाम लिख रहे हैं.. ये सब यहां नहीं चलेगा.. आप गुटबाजी को बढ़ावा देने की कोशिश कर रहे हैं..&^%$#@...." कुछ अपशब्द सुनकर मैंने उन्हें चेताया कि आप ऐसा नहीं कह सकते हैं.. फिर से खिंसे निपोर कर बोले, "मैं कहां, यह तो बेनामी बोल रहा है.." मैंने यह बात साबित करने के लिये कि मैं उनके अनाम ब्लौग का नाम नहीं लिख रहा था, उन्हें अपना नोटबुक दिखाना चाहा.. मगर वह कुछ सुनने को तैयार नहीं और उसी समय विदा हो लिये..

मेरा मूड खराब हो चुका था.. और मेरे नोटबुक का पन्ना हवा में फड़फड़ा रहा था.. जिसमें कभी-कभी कुछ शब्द लिखे दिख रहे थे..

आटा - 5 किलो..
चावल - 5 किलो..
दाल.......

आखिर आज पहली तारीख है तो राशन का भी इंतजाम करना है..

Saturday, July 04, 2009

एक चीयर गर्ल हमें भी चाहिये, आईटी वालों की पीड़ा


एक चीयर गर्ल हमें भी चाहिये.. जब भी कोई डिफेक्ट फिक्स हुआ, तो वह नाचे.. हम सभी को चीयर करे.. हिंदी सिनेमा में अक्सर सुनता आया हूं, कि जिंदगी एक खेल के समान है.. और वैसे लोगों को यह भ्रम भी है कि आई.टी. में बहुत पैसा है.. अब जबकी यह खेल भी है और इसमें पैसा भी है तो चीयर गर्ल भी क्यों ना हो?

जरा सोचिये, एक तरफ डेवेलपर की फौज हो.. दूसरी तरफ टेस्टरों की.. रेफरी की भूमिका में प्रोजेक्ट मैनेजर हों.. कैप्टन की भूमिका में प्रोजेक्ट लीड.. बस मैच चालू..

टूर्नामेंट का नाम "मेंटेनेन्स प्रोजेक्ट".. दोनों ही टीम के पास अपनी-अपनी चीयर गर्ल्स हों, जो जब तब मौका मिलने पर लोगों को चीयर कर सके और अगर सही समय हो तो मोटिवेट भी कर सके.. वैसे भी मोटिवेशन का काम मैनेजर्स के बस की बात नहीं लगती है..

डेवेलपर के पास कुछ डिफेक्ट आये.. उसने फिक्स करना शुरू किया.. फिक्स करके उसे टेस्टर के पास भेज दिया और लगा इंतजार करने कि टेस्टर उसे पास करते हैं या फेल करते हैं? ये कुछ-कुछ वैसा ही है जैसे थर्ड अंपायर के निर्णय का इंतजार करना..

टेस्टर उसमें कोई भी खामी नहीं ढ़ूंढ़ पायी.. बेचारों को मजबूरी में उसे पास करनी पड़ी.. डेवेलपर की टीम में खुशी की लहर दौड़ गई.. ठीक वैसे ही जैसे कि रन आऊट होते-होते कोई बल्लेबाज को हरी बत्ती दिख जाये.. या फिर बौंड्री पर कैच होते-होते गेंद सिक्सर चली जाये.. यही तो समय है, चीयर गर्लस का.. वे नाच-नाच कर डेवेलपर को चीयर करने लगी..

अब सीन दो पर आते हैं.. डिफेक्ट फिक्स होकर टेस्टर के पास गया.. टेस्टर ने जी-जान लगा कर उसमें गलती ढ़ूंढ़ निकाली.. बस टेस्टिंग टीम में खुशी का महौल तैयार हो गया.. चीयर गर्लस भी हाथों में रंग-बिरंगे झालर लेकर नाचने लगी.. वहीं पीछे तेज आवाज में संगीत बजने लगा..

इस खेल की सबसे बड़ी खूबी यह होती है कि मैच हमेशा ड्रा ही होता है.. मैच(यानी प्रोजेक्ट) जैसे ही खत्म वैसे ही टेस्टर और डेवेलपर, दोनों ही बेंच पर.. और मैनेजमेंट उन्हें बाहर निकालने की जुगत में..

आहा.. क्या सुंदर नजारा होगा.. बस जरा सोचिये कि आपके कार्यस्थल पर आपके काम पूरा करने पर अचानक से नाचने लगे.. कितना मजेदार नजारा होगा ना? ;)

Saturday, June 06, 2009

ना फुरसतिया जी को फुरसत, और ना मुझे

फुरसतिया जी चेन्नई आये और चले गये.. लगभग 7 दिन पहले अनूप जी का फोन आया और वो अपने चिर-परिचित अंदाज में बोले, "पीडी, मैं ये देखने चेन्नई आ रहा हूं कि सच में तुम्हारा पैर टूटा है या बस नाटक कर रहे हो?" मैंने तुरत फुरत में कारण जानना चाहा, फुरसतिया जी को चाहे कितनी भी फुरसत हो मगर इतनी दूर चेन्नई बस फुरसत के पल बिताने के लिये आने से तो रहे..

खैर, उन्होंने भी उत्तर देने कि औपचारिकता निभाते हुये तुरत कहा कि बेटे का काऊंसेलिंग है, उसी के लिये आ रहा हूं.. अगला प्रश्न भी तैयार था, "किस कॉलेज में?"
"कोई वी.आई.टी. करके कॉलेज है."

अब मुझे तो पता नहीं कि बांछें कहां होती है, मगर जहां भी होती है वो वहीं पर खिल गई.. आखिर खिलती भी क्यों ना? आखिर मेरे ही कॉलेज में वो अपने बेटे को प्रवेश दिलाने ले जा रहे थे.. अब जल्दी से मैंने उनका प्लान पूछा और उनका सारा प्लान जानने के बाद वो बांछे जैसे खिली थी वैसे ही मुरझा भी गई.. क्योंकि उनका सारा प्लान सप्ताह के कार्य दिवस के बीच ही था.. मतलब मुझे दिन भर फुरसत नहीं और अगर रात में भी जल्दी निकलना हो तो अपने बॉस को कई तरह के तर्क देना..

खैर अनूप जी(अरे वही फुरसतिया) अपने बेटे के साथ 2 जून को चेन्नई आये और अगले ही दिन वेल्लोर के लिये निकल लिये.. दिन भर वहां व्यस्त रहने के बाद शाम में वापस आये, उनके बेटे को वहां प्रवेश भी मिल गया और मेरे मुताबिक वी.आई.टी. के कुछ अच्छे ब्रांचों में से एक ब्रांच भी मिल गया..

अब 4 जून भी आ गया, जिस दिन उन्हें जाना था, और 4 कि शाम जल्दी ऑफिस से निकलने के चक्कर में 3 को देर रात तक काम भी करना पड़ा.. "देखिये फुरसतिया जी, केतना कष्ट उठवायें हैं आप हमको.. :)" अब 4 को दिन भर वह क्या किये यह आप उनसे ही जाकर पूछिये.. हम तो उसके आगे का हाल सुनाते हैं..

संयोग से मेरे गुरू जी(अरे वही, बॉस) को हैदराबाद जाना था सो वो जल्दी निकल लिये.. अब मेरे लिये शाम 7.30 मे ऑफिस से निकलना थोड़ा आसान हो गया.. हम निकलने से पहले पूछे, "कहां हैं आप और कहां मिलना है?"
"हां पीडी, तुम एक काम करो.. बॉम्बे हलवा सेंटर पर आ जाओ.." जैसे वो फोन पर बोलते हैं, बिलकुल उसी स्टाईल में लिखे हैं.. ;)
उन्होंने कहने को तो कह दिया कि बॉम्बे हलवा सेंटर पर आ जाओ, मगर हमें यह भी तो पता होना चाहिये कि यह है कहां? वैसे फुरसतिया जी इतना कांफिडेंट होकर बोके थे कि हमें लगा बहुत फेमस जगह होगी, जिसके बारे में फुरसतिया जी को पता है मगर मुझे चेन्नई में रहते हुये भी नहीं पता.. उनके बताने के तरीके से तो ऐसा लग रहा था कि वह हलवा सेंटर मेरे घर के नुक्कड़ पर ही है, और मैं ऐसे ही आ जाऊंगा.. :D अब हमने अपने कुछ उन दोस्तों से उसका पता पूछा जो चेन्नई में ही पैदा हुये हैं और यहीं मरने कि तमन्ना भी रखते हैं.. मगर नतिजा सिफ़र.. किसी को कुछ भी नहीं पता..

सो फिर से मैंने फोन लगाया, और पूछा कि यह है कहां? उन्होंने अपने मित्र से पूछ कर बताया कि ईगा थियेटर के पास है.. चलो कम से कम ईगा थियेटर को चेन्नई में रहने वाला लगभग हर उत्तर भारतीय जानता है, कारण यह चेन्नई के उन चंद सिनेमा हॉल में से है जहां हिंदी सिनेमा लगता है..

मैं सोचने लगा, अब वहां कैसे जाऊं? अगर सार्टकट से जाता हूं तो ट्रैफिक बहुत मिलेगा.. सो थोड़ा लौंग कट ही मारा जाये.. ट्रैफिक थोड़ा कम मिलेगा.. अब मैंने पूरा माऊंट रोड(चेन्नई का लाईफ लाईन कह सकते हैं जैसे दिल्ली में रिंग रोड) घूम कर पूनामल्ली हाई रोड पकड़ा और ईगा थियेटर पहूंचकर फिर से फोन लगाया.. अब पता चला कि हम जिस ओर से आ रहे हैं उसी तरफ ईगा थियेटर से 2-3 किलोमीटर आगे है.. हमने यू टर्न मारा और सीधा बॉम्बे हलवा हाऊस(असली नाम बॉम्बे हलवा सेंटर नहीं, बॉम्बे हलवा हाऊस है) जाकर ही माने..

वहां फुरसतिया जी भी मिल गये.. उनको प्रणाम करने लगे तो उन्होंने गले लगा लिया.. :) अब तक उन्हें बहुत देर हो चुकी थी, सो बॉम्बे हलवा हाऊस के अंदर ना जाकर सीधा चेन्नई सेंट्रल(अजी वही रेलवे स्टेशन) जाने का प्रोग्राम बन गया.. मैं बाईक से आगे-आगे, फुरसतिया जी अपने बेटे के साथ ऑटो पर पीछे-पीछे.. इतने में अचानक मूसलाधार वर्षा.. मुझे संभलने का बस इतना ही समय मिला कि मैं अपनी सारी जरूरी कागजात अपने बैग में रखे प्लास्टिक कि थैली में डाल सकूं.. बस मैंने सारा सामान उसके अंदर डाला और भींगते हुये पहूंचा स्टेशन..

चेन्नई सेंट्रल पर मुझे सबसे ज्यादा जो बात परेशान करती है वह ये कि बाईक कैसे पार्क करूं? थोड़ी सी जगह, उसी में सभी अपनी अपनी मोटरसाईकल लेकर जुटे रहते हैं.. मेरे साथ और बड़ी परेशानी यह होती है कि 150 किलो कि बड़ी गाड़ी उस छोटे से जगह में कैसे घुसाऊ? खैर जब तक मैं पार्क करता तब तक अनूप जी भी वहां पहूंच गये और मेरे लिये प्लेटफार्म टिकट भी ले लिये..

अब जाकर थोड़ा चैन से उनसे बाते हुई, और वहीं पर उनके बेटे से भी मिला.. बच्चा जिन कपड़ों में था, उन कपड़ों में जिस मात्रा में अधिकतम स्टाईल मारा जा सकता था, उतना स्टाईल में था.. :D वैसे मुझे इसमें कोई ऐतराज नहीं है.. बच्चा था बहुत ही शालीन(कम से कम अपने पापा के सामने..) :D सौमित्र नाम है अनूप जी के बेटे का..

हमलोग वहीं ईडली खाये.. फुरसतिया जी ने मुझे कानपुरिया मिठाई भी खिलाई.. उन्होंने पूरा डब्बा मेरे सामने खोल कर रख दिया और मैंने जैसे ही एक मिठाई ली वैसे ही उसे अंदर रखने लगे.. मगर हम भी ठहरे मैथिल आदमी(अब इतना भी नहीं समझे? अरे, मिथिलांचल के रहने वाले), तुरत उनसे डब्बा ले लिये.. अब किसी को साल भर के बाद मोतीचूर के लड्डू मिले तो भला वह क्यों और किसके लिये छोड़ेगा? :D

हमने अपने ब्लौग दुनिया में बहुत डायरियां पढ़ी है.. दुर्योधन की डायरी जो शिव भैया लिखते हैं, वो तो इतिहास बना ही रहा है.. खुद हमने भी एक लड़की कि डायरी लिख डाली थी.. जब इतनी डायरी लिखी-पढ़ी जा चुकी है तो फुरसतिया जी ने सोचा होगा कि पीडी को "एक नौकरानी कि डायरी" भी पढ़ा ही देते हैं.. उन्होंने मुझे दो किताबें भी भेंट की -
"एक नौकरानी कि डायरी"
"नेकी कर अखबार में डाल"


इसमें से "नेकी कर अखबार में डाल" के लेखक तो हमारे ब्लौग दुनिया में भी धमाल दिखाते ही रहते हैं.. अजी वही आलोक पुराणिक जी.. पिछले साल इनसे भी मिलने का सौभाग्य पंगेबाज जी और मैथिली जी के सौजन्य से मुझे प्राप्त हो चुका है..

4 कि शाम में जब मैं अनूप जी से मिलने को निकलने ही वाला था उसी समय शिव जी का फोन भी आया, वह यह जानने को उत्सुक थे कि फुरसतिया जी से मिले या नहीं? हम उन्हें बताये कि बस उन्हीं से मिलने के लिये निकल ही रहे हैं..


यह फोटो अंधेरे का शिकार हो गई है.. :(

बस थोड़ी देर में कुछ मिनटों कि देरी से ट्रेन भी वहां से रवाना हो गई.. कुल मिला कर अनूप जी से पहली बार मिलना बहुत ही सुखद रहा.. कुल मिलाकर मैं बस इतना ही कह सकता हूं कि जैसा उनका लेखन है और जिस प्रकार से वह फोन पर बतियाते हैं, उससे कुछ भी अलग नहीं है.. वैसे ही खुशमिजाज, वैसा ही उनका सेंस ऑफ ह्यूमर.. कुल मिला कर बहुत ही बढ़िया अनुभव रहा उनसे मिलने का.. :)

दो दिन देर से छापा इसे.. कारण - हमने सोचा कि फुरसतिया जी के बारे में कुछ भी लिखने से पहले पूरा फुरसत निकालो, और वह फुरसत आज ही मिली है.. :)

Monday, April 27, 2009

बारिश

कई दिनों से बारिश नहीं हुई..
मन रीता सा लगता है..
अगर बारिश हो जाये तो
अपनी यादों को अच्छे से खंघालूं..
जो पुरानी यादें हैं उसे धो डालूं..
और रख दूं सूखने धूप में..
तब तक उसे सुखाता रहूं,
जब तक पुरानी यादों का दर्द उड़ ना जाये..
आखिर ये शरीर भी तो मांगता है,
बिना दर्द का मन....


अचानक से दोस्तों को मेल लिखते हुये यह कुछ पंक्तियां भी लिख डाला.. आज इसे ही पढ़ लिजिये, बेटा मन में लड्डू फूटा कथा का अंतिम भाग कल सुनाता हूं.. :)

Saturday, April 25, 2009

बेटा मन में लड्डू फूटा (पार्ट दो)

एक दिन "एक्स डियो" का एड देखा.. मन को बहुत भाया.. बस एक बार डियो लगाओ और सारी लड़कियां मेरे पीछे भागेगी.. मैंने प्रचार में देखा भी था कि एक्स डियो थोड़ा सा नहीं लगाया जाता है.. उसे तो ऐसे लगाते हुये दिखाता है जैसे उसी से नहा रहा हो.. मैंने भी तुरत जाकर एक एक्स डियो खरीदा.. पानी और साबुन से रगड़-रगड़ कर नहाने के बाद उस डियो से फिर से अच्छे से नहाया.. आजकल टूटे पैर कि वजह से एम.टी.सी(मद्रास ट्रांस्पोर्ट कॉरपोरेशन) का प्रयोग कर रहा हूं, सो निकल लिया ऑफिस के तरफ जाने वाली बस पकड़ने के लिये..

बस में चढ़ते ही मेरी नजर तो बस भटक रही थी कि शायद बस अभी कोई खूबसूरत सी लड़की अपना फोन नंबर देगी.. आस-पास की लड़कियां तो मेरी ओर देख ही रही थी और जैसे ही मैं उनके पास से गुजर रहा था वैसे ही उनके चेहरे का भाव भी बदल रहा था.. मैं खुश.. समझ गया कि यह जरूर डियो का ही असर है.. सोच, चलो इस बार तो काम बना.. मगर किसी ने अपना नंबर नहीं दिया.. मुझे इस बात कि भी खुशी हुई कि चलो अभी तक अपनी तथाकथित भारतीय संस्कार भी बचे हुये हैं.. अब तक मैं ऑफिस पहूंच चुका था.. जैसे ही ऑफिस के अंदर गया मेरे एक मित्र ने मुझे रोक कर यूं ही मजाक उड़ाते हुये पुछ, "कितने दिनों से नहीं नहाये हो भाई?" मैं चौंक गया और पूछा, "क्यों?" उसका कहना था कि इतना डियो तो बस वही लगाता है जो 3-4 दिनों से नहाया ना हो..

बस मेरी सारी खुशी हवा हो गई और अब जाकर समझ में आया कि वे सभी मुझे इतना घूर-घूर कर क्यों देख रही थी.. फिर पूरे दिन भर बस यही कोशिश करता रहा कि मैं जिस हद तक हो सके सभी से दूर ही रहो.. कोई और भी वैसा ही ना समझ ले.. मैं अक्सर रात में बहुत देर से घर आता हूं.. मेरे घर के आस-पास घूमने वाले आवारा कुत्ते भी मुझे मेरी शक्ल से नहीं मेरी गंध से पहचानते हैं.. अब 11 बजे रात में घर पहूंचा.. वहां के आवारा कुत्तों ने भी पहचानने से इनकार कर दिया.. गलती उनकी भी नहीं थी, बेचारों ने कभी शक्ल देखी ही नहीं है.. कुत्ता भी साला कुत्ता निकला.. आव ना देखा ताव बस दौड़ा दिया.. अब टूटे पैर से कैसे दौड़ा ये मैं ही जानता हूं या मेरा बेचारा पैर.. मन ही मन एक्स डियो वालों को गालियां देता हुआ जैसे तैसे घर पहूंचा..

अब अखिरी किस्से में मन में लड्डू फूटने कि कथा भी सुने.. यह कथा जो भी सुनता है उसके सात पुस्तों तक पुण्य का लाभ होता है.. :)

Thursday, April 23, 2009

अथ श्री बेटा मन में लड्डू फूटा कथा (पार्ट एक)

मैं चकाचक सफेद टी-शर्ट के ऊपर नीले रंग का जींस चढ़ा कर क्रिकेट खेलने के लिये मैंदान में पहूंचा था.. अंततः मेरा दोस्त आऊट हुआ और मेरी बैटिंग आ ही गई.. मेरे भीतर पूरा आत्मविश्वास था और पहली ही गेंद पर सिक्सर लगा दिया.. अरे यह क्या गेंद तो पड़ोस वाले अंकल के घर में चला गया.. अब चूंकि सबसे ज्यादा सफेद और चमकदार कपड़ा मैंने ही पहना था.. रिन डिटर्जेंट से रगड़-रगड़ कर.. सो जाहिर सी बात है सबसे ज्यादा आत्मविश्वास मेरे ही भीतर था.. और कायदा यही कहता है कि जो बैटिंग कर रहा हो वही गेंद लेकर आये.. मैं निकला पूरे आत्मविश्वास के साथ और अंकल जी से गेंद मांगा.. अंकल जी एक छड़ी लेकर खड़े थे, बोले "बेटा सिक्सर मारेगा? हाथ आगे करो.." मैंने अपने आत्मविश्वास का प्रयोग करते हुये दोनों हाथ बढ़ा दिया और बोला, "अंकल अगला बॉल भी सिक्सर ही जायेगा.." अंकल जी ने कान पकड़ा और दनादन छड़ी कि बरसात कर दी.. पहले मेरा पिछवाड़ा मार-मार सुजा दिये और फिर गेंद देकर बोले, "जा बेटा.. अब जी भर कर सिक्सर मारना.." अब काहे का सिक्सर भैया? चला भी नहीं जा रहा था..

कथा पूर्ण नहीं हुई है.. कल भी आईयेगा..
इसके शीर्षक से यह ना समझें कि कथा कुछ और है और शीर्षक कुछ और.. कथा का अंत मन में लड्डू फुटने से ही होगा.. :)

कथा पसंद आने पर ऊपर अपनी पसंद पर क्लिक करना ना भूलें.. :)

Wednesday, April 22, 2009

टुकड़ों में बंटा पोस्ट

पहला टुकड़ा -
आज मेरे पापा-मम्मी कि बत्तीसवीं शादी कि सालगिरह है.. घर कि याद भी बहुत आ रही है..

दुसरा टुकड़ा -
कल ऑफिस में मुझे कुछ बहुत जरूरी काम है मगर ऑफिस आना बहुत मुश्किल लग रहा है.. आखिर कल तमिलनाडु बंद है.. अगर कल नहीं आया तो मुझे शनिवार को ऑफिस आना पड़ेगा, जो मैं नहीं चाह रहा हूं..

तीसरा टुकड़ा -
मैंने अभी घर(पटना) जाने का प्लान बना रखा था.. मेरी मित्र की शादी है 5 मई को कोलकाता में उसी के लिये.. बस इसी शादी में जाने के लिये मैं होली में भी घर नहीं गया था और अभी भी ऑफिस के चक्कर में मेरा जाना संभव नहीं हो पा रहा है.. बहुत लाचारी महसूस हो रही है.. :(

चौथा टुकड़ा -
यह कोई टुकड़ा नहीं है दोस्तों.. असल में आज कुछ लिखने का मन कर भी रहा है और नहीं भी कर रहा है.. तो सोचा कि क्यों ना कुछ लिखे भी दूं और ना भी लिखूं.. ;) और इसलिये मैंने यह टुकड़ों में बंटा पोस्ट ठेल दिया..

Friday, April 17, 2009

अथ हिंदीभाषी कथा इन चेन्नई

पिछली कथा पढ़कर घुघुती जी ने मुझसे यह उम्मीद जतायी कि मैं जल्द ही यहां हिंदी बोलने के ऊपर कि कोई कथा लेकर आऊंगा, तो लिजिये हाजिर हूं.. इसके कयी छोटे-छोटे अध्याय हैं और सभी अद्याय अपने आप में संपूर्ण.. तो चलिये आपको यहां कि भाष के साथ अपने और अपने मित्रों के कुछ हिंदी से जुड़े दिलचस्प और कड़वे अनुभव सुनाता हूं..

अध्याय एक -
मेरा एक मित्र जब पॉडिचेरी घूम रहा था तब उसे एक ट्रैफिक पुलिस ने पकर लिया.. पुलिस का कहना था कि आप वन वे में हैं और मेरा मित्र का कहना था कि यहां कहां लिखा हुआ है कि यह वन वे है? उसने उसे साईन बोर्ड दिखाया जिसमे तमिल में लिखा हुआ था.. मेरे मित्र ने उसे कहा कि उसे तमिल कि समझ नहीं है, तो उस पर उस पुलिस वाले ने कमेंट करते हुये कहा कि तमिल नहीं आती तो तमिलनाडु में क्यों आये? मेरे मित्र ने उस समय उससे बहस के मूड में नहीं था लेकिन बाद में उसका कहना था कि अगर इन्हें हिंदी नहीं आती तो भारत में क्या कर रहे हैं? इन्हें श्रीलंका ही भगा देना चाहिये..

अध्याय दो -
यहां तमिलनाडु में रहते हुये हमने सबसे पहले एक से दस तक तमिल में गिनती सीख ली.. जब शुरूवात में चेन्नई आये थे तब मैं और मेरा मित्र शिवेन्द्र बस से ऑफिस तक का सफर साथ-साथ किया करते थे.. हम जब भी अंग्रेजी में कंडक्टर को कहते थे कि, "अन्ना टू टिकट!! पौंडिबाजार".. तो तमिल में उत्तर आता था.. एक दिन हममे से किसी ने टिकट के लिये कंडक्टर को तमिल में कहा, "अन्ना रंड टिकट!! पौंडिबाजार".. उधर से जवाब आया, "दो टिकट चाहिये?" ;)
(तमिल गिनती में रंड का मतलब दो होता है)

अध्याय तीन -
मेरी एक मित्र का हमेशा कहना होता है कि, "यहां बाजार में कहीं चलते हुये अगर् किसी को हिंदी बोलते हुये सुन लो तो झट से आंखों कि बत्ती जल जाती है.. अरे, ये तो नोर्थ इंडियन है.." ;)
जी हां, यह बिलकुल सच है.. यहां के लोग अपनी भाषा को बिलकुल पकर कर रहते हैं और किसी भी हालत में उसे छोड़ना पसंद नहीं करते हैं.. अगर उन्हें हिंदी आती भी है तो हिंदी ना समझने का नाटक करते रहते हैं.. वैसे अब धीरे-धीरे यह मानसिकता खत्म हो रही है.. खासतौर से उन लोगों का अनुभव जिन्हें हिंदी नहीं आती है और कभी उत्तर भारत चले गये हों तो उनकी परेशानी का कोई ठिकाना नहीं रहा था..

अभी कुछ दिन पहले यहां के एक लोकल समाचार पत्र में मैंने पढ़ा था कि अब यहां के लोग अपने बच्चों को तमिल के साथ-साथ हिंदी भी सिखाने के लिये आगे आ रहे हैं.. क्योंकि अब उन्हें भी समझ में आ रहा है कि इस ग्लोबलाईजेशन के समय में हो सकता है कि उनके बच्चों को उत्तर भारत में जाकर काम करना परे.. उस रिपोर्ट में यह भी था कि यहां के बुजुर्ग जो तमिल भाषा को बिलकुल पकड़ कर बैठे हुये हैं, वे इसे तमिल के ऊपर हिंदी का हमला मान रहे हैं मगर उनके पास भी कोई दूसरा विकल्प नहीं है..

Monday, April 13, 2009

ताऊ का तोता हिरामन या पोपटलाल?


कुछ साल पहले कि बात है.. कौन बनेगा करोड़पति बिलकुल सुपर-डुपर हिट टीवी का प्रोग्राम था.. ताऊ के घर में भी बहुत प्रसिद्ध था यह.. ताऊ, ताई, सैम, बीनू-फिरंगी, हिरामन, रामप्यारी.. सभी साथ बैठकर कौन बनेगा करोड़पति देखा करते थे और साथ में करोड़पति बनने के सपने भी देखते थे.. सभी सपने में सोचते थे कि कभी हमें भी इस हॉट सीट पर बैठने का मौका मिलेगा.. उस हॉट सीट का उन्हें दो फायदा दिखता था.. पहला पैसा कमाने का मौका लेकिन दूसरा सबसे बड़ा फायदा अमिताभ बच्चन के साथ बैठने का मौका मिलना.. मगर कभी करोड़पति का फोन नंबर लगने की बात तो दूर आज तक उन्हें कभी किसी मित्र ने फोन अ फ्रेंड में भी फोन नहीं किया.. मगर वे सभी तो थे धुन के पक्के.. इंतजार करना नहीं छोड़े..

अब एक दिन की बात है.. एक फोन आया और उसे संयोग से हिरामन तोते ने उठाया.. उधर से अमिताभ बच्चन जैसी आवाज थी..

"मैं अमिताभ बच्चन बोल रहा हूं कौन बनेगा करोड़पति से.. क्या पोपटलाल है?"

हिरामन सोचा कि मैं तो हिरामन हूं, सो बोला "नहीं".. इससे आगे कुछ कहता उससे पहले ही उधर से फोन रख दिया गया..

दुबारा फिर से फोन आया, "मैं अमिताभ बच्चन बोल रहा हूं कौन बनेगा करोड़पति से.. क्या पोपटलाल है?"

फिर से हिरामन ने कहा, "नहीं" और फिर से फोन रख दिया गया..

एक बार फिर फोन आया, "मैं अमिताभ बच्चन बोल रहा हूं कौन बनेगा करोड़पति से.. क्या पोपटलाल है?"

अबकी हिरामन समझ गया कि हो ना हो कोई ऐसे ही परेशान कर रहा है. आखिर ताऊ का तोता था सो होशियारी उसमें कूट-कूट कर भड़ी हुई थी.. उसे गुस्सा भी खूब आया, मगर वो पूरी धीरता से फोन का जवाब दे रहा था..

ऐसे ही करके 6-7 बार फोन आया और हर बार यही पूछता और जैसे ही हिरामन 'नहीं' कहता वैसे ही फोन रख दिया जाता.. अब तक हिरामन बहुत गुस्से में आ गया था, मगर उसने खुद को संभालते हुये सोचा कि जब सामने वाला मजाक कर रहा है तो मैं भी क्यों ना थोड़ा सा मजाक कर लूं..

अबकी बार जैसे ही फोन आया और उधर से आवाज आयी, "मैं अमिताभ बच्चन बोल रहा हूं कौन बनेगा करोड़पति से.. क्या पोपटलाल है?" वैसे ही हिरामन बोला.. "हां.. पोपटलाल है.."

उधर से आवाज आयी,"गलत जवाब.. पोपट लाल नहीं पोपट हरा होता है.." और फिर फोन नहीं आया..

इधर हमारा हिरामन गुस्से से लाल होकर अपना शक्ल आईने में देख कर सोच रहा था कि मैं तो पोपट ही हूं और गुस्से से लाल भी.. तो जवाब गलत कहां था? जवाब तो सही था.................

Tuesday, April 07, 2009

कड़ोड़पति बनने की ओर अग्रसर

अभी हाल फिलहाल में दो ऐसी घटना घटी है जिससे मुझे अब ऐसा लगने लगा है कि मैं जल्द ही कड़ोड़पति बनने जा रहा हूं और वो भी अपने इस जीमेल और ब्लौग के कारण.. चलिये मैं अपनी बात आपके सामने सिलसिलेवार ढ़ंग से रखता हूं..

1. अभी कुछ दिन पहले की बात है.. मैं द्विवेदी अंकल के अनवरत ब्लौग पर यूं ही टहला-टहली कर रहा था कि मैंने देखा उनके ब्लौग की कीमत.. आंखें फैल कर चौड़ी हो गई, "अरी तोड़ी की.. द्विवेदी अंकल इत्ते पैसे वाले हैं और हमें पता ही नहीं?" फिर सोचा की हम अपना चिट्ठा भी देख ही डालते हैं.. हम कितने पानी में हैं यह अभी पता चल जायेगा..
जो हमने देखा वह आप भी देखिये.. आपकी भी आंखे हमारे जैसी ही आप मेरा आंकड़ा देखेंगे.. नीचे के स्नैप शॉट पर जरा गौर फरमायें..


सबसे आश्चर्य की बात है कि कई ऐसे चिट्ठे जो मेरे चिट्ठे से ज्यादा पढ़े जाते हैं उनकी कीमत भी मेरे चिट्ठे की कीमत से कम दिखा रहा है.. वहीं कई ऐसे भी चिट्ठे हैं जो मेरे अनुमान से कम पढ़े जाते हैं मगर उनकी कीमत मेरे चिट्ठे से ज्यादा दिखा रहा है.. ऐसा क्यों? यह तो पता नहीं..

मैंने कुछ और भी ब्लौगों का आंकड़ा देखा, उन सबकी कीमत इस प्रकार है (बाकी लोग अपनी कीमत का अंदाजा यहां इस लिंक से लगायें :))-

अनवरत - 1,273,804
उड़न-तस्तरी - 917,156
मोहल्ला - 1,331,671
ताऊ जी का हरियाणवी ताऊनामा - 1,889,893
सभी आंकड़े अमेरिकन डॉलर में है..

मैंने लगभग साल भर पहले इस विषय से संबंधित एक और पोस्ट लिखी थी, जो किसी और साईट से छनकर आती थी.. वह पोस्ट आप यहां पढ़ सकते हैं.. कहने को चाहे जो कुछ भी कहें हम तो अभी से ही ख्याली पलाव पकाने लगे हैं.. ;)

क्या हमारा दुसरा राज भी आज ही जानना है? अरे मित्रवर इसके लिये आप कम से कम एक दिन का इंतजार कर ही लिजिये.. कल पक्के से आपको अपने कड़ोड़पति बनने का दुसरा राज बताने वाले हैं जो बिलकुल अचूक है.. :)

Friday, April 03, 2009

उसका यूं ही चले जाना किसी मौत से कम नहीं था

वो कब इस जीवन में आयी और कब चली गई कुछ पता ही नहीं चला.. ऐसा लगता है जैसे जीवन के पांच साल यूं ही हवा में उड़ गये.. जीवन के सबसे खुशनुमा पांच साल.. उसकी कमी आज भी खलती है.. मन उदास भी होता है.. उसके वापस आने की कल्पना भी करता हूं.. मगर उसे पाने की कामना नहीं करता हूं.. उसके साथ जीवन के कयी खूबसूरत रंग देखे थे.. किसी के प्यार में आना क्या होता है यह भी उसका साथ पाकर ही जाना था.. उस प्यार का पागलपन.. उस प्यार की गहराई.. उस प्यार का अंधापन.. उस प्यार का दर्द.. वहीं उसके यूं ही चले जाने के बाद ही यह भी जाना की जिसे अंतर्मन से आप चाहते हैं और उसके बिना एक पल भी गुजारने का ख्याल भी डरा जाता हो, उसके अचानक यूं ही चले जाना.. बिना कुछ कहे.. बिना कोई कारण बताये.. शायद किसी अपने की मौत भी तो यूं ही होती है.. कहने को कई बातें होती है.. जिन बातों पर बहस होती थी उन्ही बातों को फिर से सुनने के लिये कान तरस जाते हैं.. अपनी भूल के लिये आप माफी मांगना चाहते हैं.. मगर कुछ कर नहीं सकते.. बस एक छटपटाहट अंदर तक रह जाती है जो अनगिनत रातें आपको पागलों कि तरह जगाती है.. तुम्हारे जाने से दुनिया को एक अलग नजरीये से भी देखा.. कई बुराईयां जिनसे दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं था, उन्हें भी अपना लिया.. मगर शायद पहले से अच्छा इंसान हो गया.. लेकिन उससे क्या तुम्हारी कमी पूरी हो गई? मुझे पता है कि उत्तर तुम नहीं दोगी.. यहां जो नहीं हो.. मगर क्या यहां होने पर भी उत्तर देती? नहीं.. उत्तर हम दोनों को ही पता है.. नहीं.. क्यों चली गई तुम यह सवाल आज भी अंदर तक मुझे खाता है.. उस बेचैनी को धुंवे तले छिपाने की नाकाम कोशिशें भी करता हूं.. अक्सर कईयों से यह सुना है कि जब उदास हो तो उन पुरानी यादों को याद करना चाहिये जब हम बेवजह खुश हुआ करते थे.. मगर मैं किन यादों को याद करूं? सभी बेवजह की खुशियां भी तो तुमसे ही थी, जिन्हें तुम साथ ले गई.. हां! शायद दुनिया के लिये तुम हो इसी दुनिया में कहीं, मगर मेरे लिये तो तुम्हारा यूं ही चले जाना किसी मौत से कम नहीं है..

Saturday, March 14, 2009

और लवली का जन्मदिन आकर चला गया

11 मार्च को होली थी, और मुझे यह भी याद था की कल यानी 12 मार्च को लवली का जन्मदिन है.. नहीं-नहीं मुझे उस समय सिर्फ इतना ही याद था की कल लवली का जन्मदिन है.. क्योंकि अगले दिन भी मेरे दिमाग में बस इतना ही घूम रहा था की कल लवली का जन्मदिन है(मुझे अभी समझ में नहीं आ रहा है की मैं यहां मुस्कुराता हुआ स्माईली बनाऊं या उदास वाला सो दोनों ही डाल देता हूं.. ":)" ":(")

वृहस्पतिवार मेरे लिये इस साल का सबसे व्यस्ततम दिनों में से एक रहा.. दम मारने की भी फुरसत नहीं, ऊपर से मन में यह बात थी की लवली का जन्मदिन कल है.. रात लगभग 10 बजे लवली का मैसेज आया, "भैया क्या कर रहे हैं?" मैंने जवाब मैसेज से ही दिया, "काम कर रहा हूं.. आज बहुत काम है.." फिर से उधर से उसका मैसेज आया, "खाना खाये?" मैंने कहा, "नहीं.. घर जाकर खाऊंगा.." उस समय मैं बहुत तन्मयता से एक टेस्ट केस का रीव्यू कर रहा था.. अबकी बार उसका मैसेज आया, "12 बजे से पहले आपका काम खत्म हो जायेगा? वो क्या है कि आज किसी ने मुझे जन्मदिन पर आशीर्वाद नहीं दिया.."

अब जाकर मुझे याद आया कि मैं कल से कल पर ही अटका हुआ हूं मगर वह कल तो आज बन चुका है और जल्दी ही फिर से कल बनने वाला है.. मैं अपने जिस सहकर्मी के काम का रीव्यू कर रहा था उससे पांच मिनट का समय मांगा और डरते हुये फोन किया की लवली बहुत गुस्सा हो रही होगी.. मगर वह गुस्सा बिलकुल नहीं थी और बहुत बेसब्री से अपने भैया के फोन का इंतजार कर रही थी..

वैसे तो उसका जन्मदिन बीते 2 दिन हो चुके हैं मगर फिर भी मैं उसे इस पोस्ट के माध्यम से ढ़ेर सारे प्यार और आशीर्वाद के साथ अनेकानेक शुभकामनायें देता हूं.. :) आप भी चलते-चलते उसे बधाईयां देना ना भूलें.. उसके ब्लौग का पता यह रहा - संचिका

Monday, February 09, 2009

ताऊ की जर्मनी यात्रा

ये बात तब की है जब ताऊ गोटू सोनार का सारा माल उड़ा कर कहीं छिपने की जगह ढ़ूंढ़ रहा था.. तो उसके दिमाग में यह ख्याल आया कि क्यों ना जर्मनी चला जाऊं.. अपना राज भटिया तो है ही वहां, सो मौज से दिन गुजरेंगे.. सो बांधा उन्होंने बोरिया-बिस्तर, खबर दी राज भाटिया जी को कि मैं जर्मनी आ रहा हूं और पहूंच गये जर्मनी.. वहां हवाई-अड्डे पर राज भाटिया जी को ना देखकर हुये बहुत हैरान परेशान..

राज जी तो अलग ही जुगत में थे, उनका सोचना था कि यही ताऊ है जिसने मेरे पिस्से अभी तक वापस नहीं किये, इतनी आसानी से तो जाने ना दूंगा.. अबकी बार तो भारत से बाहर है और इसे तो अंग्रेजी भी ठीक से नहीं आता है, जर्मन तो दूर की बात.. पहले खूब परेशान करूंगा और फिर अपने पिस्से निकलवा कर ही छोड़ूंगा.. वो नहीं पहूंचे हवाई अड्डा उन्हें लेने.. अब ताऊ क्या करे? जर्मनी में तो राज भाटिया जी को छोड़कर और किसी को जानते ही नहीं थे.. उन्होंने सोचा क्यों ना फोन पर पता कर लूं.. ताऊ ने फोन किया.. उधर से राज भाटिया जी के बेटे ने फोन उठाया जो पता नहीं क्यों फुसफुसा कर बातें कर रहा था.. उन दोनों के बीच कुछ ऐसी बातें हुई जिसके बाद ताऊ ने सोचा कि जब बेटा इतना खुराफाती है तो बाप कैसा होगा, और ऊपर से तो मुझपर उधार भी चढ़ा हुआ है.. और यह सोचकर उल्टे पांव वहां से भारत भाग निकले..

तो आप भी सुने राज भाटिया जी के बेटे से अपने ताऊ ने क्या बातें की..

"पापा घर पर हैं?"

"हां!!"

"क्या मैं उनसे बात कर सकता हूं?"

"नहीं!!"

बेचारे ताऊ सोच में आ गये.. अब उन्हें किसी बड़े से तो बात करनी ही थी सो आगे उन्होंने पूछा, "मम्मी घर पर हैं?"

फिर से उधर से फुसफुसाहट की आवाज आयी, "हां!!"

"उनसे बात कर सकता हूं?"

"नहीं!!"

अब तक ताऊ चिढ़ चुके थे.. उन्होंने गुस्साते हुये पूछा, "कोई और बड़ा घर पर है?"

"हां!!" फुसफुसाहट भड़ी आवाज में ही उसने कहा.. "पुलिस!"

अबकी तऊ घबरा गये.. सोच में पड़ गये कि गोटू सुनार के पिस्से मैंने उड़ाये हैं, कहीं उसकी बात यहां तक तो नहीं पहूंच गई.. फिर सोचा कि पहले मामला जान लूं सो उन्होंने पूछा, "बेटा जरा पुलिस को फोन देना.."

"नहीं!!" बच्चे का सपाट सा उत्तर आया.. "वो अपना काम कर रहे हैं.."

"क्या कर रहे हैं?"

"पापा-मम्मी और दमकल वालों(फायरमैन) से बात कर रहे हैं.."

अबकी ताओ बेचारे सोच में आ गये कि क्या हो रहा है.. तभी उन्हें फोन पर तेज शोर सुनाई दी.. उन्होंने पूछा, "यह कैसी आवाज है?"

"हेलिकाप्टर का!!"

अब ताऊ थोड़ा ज्यादा ही घबरा गये.. जोर देकर उन्होंने पूछा, "सही-सही बताओ, क्या हो रहा है वहां पर?"

"ढ़ूंढ़ रहे हैं.." फिर से फुसफुसाहट की आवाज आयी..

"किसे ढ़ूंढ़ रहे हैं?"

बच्चे ने फिर फुसफुसाते हुये और हल्की हंसी के साथ कहा, "मुझे.."

इतना सुनना था कि बस ताऊ अगली फ्लाईट पकड़ कर वापस भारत भाग आये.. सोचा जिसका बेटा इत्ता खुराफाती बुद्धि का है उसका बाप तो उसका बाप ही होगा..

गोटू सुनार के बारे में जानने के लिये यहां पढ़ें..

Friday, February 06, 2009

अरे! मैं लेखक कब से बन गया?

मेरे कल के पोस्ट(हमें नहीं पढ़ना जी आपका ब्लौग, कोई जबरदस्ती है क्या?) पर सबसे अंत में रोहित त्रिपाठी जी का कमेन्ट आया, जिसका उत्तर पहले मैंने मेल में लिखा.. मगर बाद में लगा कि इसे सार्वजनिक करने में भी कोई बुराई नहीं तो मैं इसे पोस्ट कर रहा हूँ..

उन्होंने ने लिखा था -
प्रशान्त सर, लोग कुछ समझ कर ही तो मेल करते होगे ना आपको? आपके ब्लॉग पर 40 कमेन्ट उसके बेचारे के ब्लॉग पर एक भी नहीं और 40 कमेन्ट देख कर लगा कि शायद बहुत बड़े लेखक है जो कि इनके ब्लॉग पर इत्ते कमेन्ट आये इसलिए बेचारा भेज देता है कि आप कुछ लिख देगे उसकी पोस्ट पर तो मन कितना खुश हो जायेगा कि कितने बड़े लेखक ने उसके पोस्ट पर कमेन्ट किया :-) :-) कुछ सोचिये प्रशान्त भाई.

मेरा उत्तर है उन्हें -
आपका कहना सही है रोहित जी,

मगर शायद आप दूसरी बार मेरे चिट्ठे पर आये हैं(यह आपका मेरे चिट्ठे पर दूसरा कमेन्ट है सो बस एक अंदाजा लगाया है :)) सो कुछ बातें मैं पहले बताना चाहूँगा..

मैं कोई बड़ा या छोटा लेखक नहीं हूँ.. या यूँ कहें कि लेखक हूँ ही नहीं तो ज्यादा अच्छा रहेगा.. अगर आप मेरे कुछ पुराने पोस्ट देखेंगे तो आप जान जायेंगे कि मैं भी किसी आम ब्लॉगर कि तरह ही हूँ जिसकी कोई पोस्ट बहुत पढ़ी जाती है और 40-50 से ज्यादा कमेंट्स भी मिलते हैं तो वहीँ दूसरी तरफ कुछ को 3-4 से ज्यादा कमेंट्स नहीं मिलते हैं(और वे 3-4 कमेंट्स भी उन्हीं के होते हैं जिनसे एक तरह कि आत्मीयता हो गयी है इस चिट्ठाजगत में)..

मैं दिन भर में आने वाले लगभग हर पोस्ट पर एक नजर जरूर डालता हूँ और जो मुझे पढने लायक लगता है उसे पढता जरूर हूँ.. और जिसे भी देखकर ऐसा लगता है कि कमेन्ट करना चाहिए उस पर कमेन्ट भी जरूर करता हूँ.. मगर कमेंट्स से ज्यादा जरूरी पढना समझता हूँ..

एक महाशय मेरे हर पोस्ट पर अपने नये पोस्ट का विज्ञापन चढा जाते हैं.. और उनका वह विज्ञापन उस दिन आये लगभग हर पोस्ट पर दिखता था.. अगर बिना किसी पूर्वाग्रह के सच्चे दिल से कहूँ तो उनकी कवितायेँ मुझे पसंद है और कई कविताओं कि मैंने जम कर तारीफ भी कि है उनके पोस्ट पर.. मगर बिना पढ़े नहीं.. अच्छे से पढ़कर और सोच समझकर..

लगातार अच्छा लिखो, लोग खुद ही आयेंगे पढने के लिए.. हाँ कुछ दिन इंतजार करना भी होगा.. यही मेरा मानना है.. यहाँ जितने भी लोगों को ढेर सारे कमेंट्स मिलते हैं या ज्यादा पढ़े जाते हैं वे सभी या तो काफी दिनों से हिंदी ब्लॉग दुनिया में लगातार बने हुए हैं या फिर जबरदस्त लेखनी से कुछ ही दिनों में छा गए.. नहीं तो मैं आज देखता हूँ कि 2-3 साल पहले के कई चिट्ठाकार आज दिखाई नहीं देते हैं.. और यही यदा-कदा उनकी कोई पोस्ट आ भी जाती है तो पुराने लोगों को छोड़कर ना तो कोई उन्हें पढना चाहता है और ना ही टिपियाना चाहता है..

अब और क्या लिखूं?

आपका बहुत-बहुत धन्यवाद..

Wednesday, February 04, 2009

हमें नहीं पढ़ना जी आपका ब्लौग, कोई जबरदस्ती है क्या?

हर दिन कम से कम 6-7 मेल जरूर मिलता है ऐसा जिसका उद्देश्य कुछ ऐसा ही होता है कि मैंने अभी-अभी एक पोस्ट लिखा है.. आप जरूर पढ़ें और अपनी राय दें.. कुछ मेल तो इस तरीके से लिखा होता है जैसे हम तो मरे जा रहे हैं उनका पोस्ट पढ़ने के लिये.. ऐसे में अगर किसी को चिढ़ हो ऐसे मेल से तो मानव मनोविज्ञान तो यही कहता है कि बिना पढ़े उसे डिलीट कर दो, और मैं भी इस मानव मनोविज्ञान को भली-भांती निभा रहा हूं.. ऐसा हो सकता है कि जो कुछ वह महाशय अपने पोस्ट में लिखें हैं वह मेरी पसंद का हो, मगर फिर भी उसे पढ़ना ही होगा तो मैं ढूंढ कर पढ़ ही लूंगा..

कुछ मेल तो इस अंदाज में भेजा होता है जैसे वह कह रहे हों, "क्यों बच्चू! कभी देखा है ऐसा पोस्ट? वो तो हमी हैं जो ऐसा लिख पाते हैं और सबसे बड़ी बात तो यह है कि आपको हम मेल भी करते हैं.. अब इतना अहसान तो मान ही लो.."

कुछ चिट्ठाजगत के मित्रगण तो उस दिन आने वाले हर पोस्ट पर जाते हैं और पहले एक बधाई फिर अपने ब्लौग को पढ़ने का आग्रह और साथ में अपने नये पोस्ट का पता देते हैं.. बिकलुल यही कमेंट लगभग हर पोस्ट पर दिखता है, जिसे देखकर कोई भी समझ सकता है कि उन्होंने ना पोस्ट पढ़ा है और ना ही पढ़ने की इच्छा रखते हैं.. मगर साथ में चाहते हैं कि हर कोई उनका पोस्ट पढ़े भी और टिपियाये भी.. मैं किसी का नाम तो नहीं लूंगा, मगर समझने वाले समझ ही जायेंगे की मैं किनके लिये यह पोस्ट लिख रहा हूं.. वे लोग हो सकता है मुझे अख्खड़ भी समझें, कोई परवाह नहीं..

अगर सकारात्मक रूप से लें तो हिंदी के लिये यह अच्छा ही है, क्योंकि अंग्रेजी मेल में स्पाम का जन्म भी इसी तरह हुआ था.. कुछ ही दिनों में इस तरह के बल्क मेल हिंदी स्पाम में भी जगह बना ही लेंगे.. हिंदी अब अपना पांव पसार रही है.. मगर अभी मैं सकारात्मक लेना नहीं चाह रहा हूं.. मुझ पर कृपा करके इस तरह के मेल भेजना बंद करें.. अगर आपने सच में कुछ ऐसा लिखा है जो मेरे मुताबिक पढ़ने योग्य है तो उसे मैं कहीं ना कहीं से ढूंढ ही लूंगा.. इसके कई तरीके हैं.. एग्रीगेटर साईट्स, गूगल रीडर, फीड फेचर..

Friday, January 23, 2009

एण्ड ब्लू डेविल एट माई एक्साईटमेंट

कई साल इसने इंतजार करवाया.. यूं तो मैं बहुत पैसे वाले परिवार से नहीं आता हूं मगर मुझे खाते-पीते परिवार का तो कह ही सकते हैं.. जब बड़ा हुआ और ड्राईविंग लाईसेंस बना तभी से मुझे चलाने को स्कूटर मिल गया.. एक तरह से संपूर्ण अधिकार के साथ.. पापा पटना में बहुत कम होते थे और होते भी थे तो स्कूटर कम ही चलाते थे, उनकी सवारी चार-पहिया ही होती थी.. और जहां तक भैया की बात है तो वो अपने पढ़ाई के चलते लगभग हमेशा अपने कॉलेज में ही रहते थे और जब आते भी थे तो स्कूटर चलाने में आत्मविश्वास की कमी के चलते लगभग नहीं के बराबर ही चलाते थे.. उस स्कूटर का सारा कर्ता-धर्ता एक तरह से मैं ही था.. मुझे यह भी पता था कि मुझे एक अदद स्कूटर भी मिला है नहीं तो अधिकतर मेरी उम्र के लड़कों को यह भी नसीब नहीं होता है.. फिर भी नये स्टाईलिस और शक्तिशाली इंजन वाले बाईक को देखकर दिल ललचाया जरूर करता था.. सोचता था कि कब मेरे पास मेरी अपनी और मेरे पसंद की बाईक होगी.. भैया जब एवेंजर खरीदे थे तब उस पर भी पूर्ण स्वामित्व कि भावना से ही बैठता था और बैठूंगा भी, मगर शत्-प्रतिशत स्वामित्व की भावना नहीं आई(भैया अगर आप पढ़ रहे हैं तो बुरा मत मानियेगा.. आप जानते ही हैं कि आपका छोटे भाई में यह बुराई है कि वह सोचता कुछ ज्यादा ही है..)

कल मैंने यह बाईक शोरूम से उठा कर ले आया.. मगर मुझे समझ में नहीं आ रहा था की जब मैं शोरूम जा रहा था तब भी कोई उत्साह नहीं लग रहा था और जब लेकर आ गया तब भी नहीं.. ऐसा लगता है सारे उत्साह को मैंने इसके बूकिंग के समय ही खर्च कर डाले हैं.. नौकरी जबसे करनी शुरू की तब से ना जाने कितनी ही बार कितने ही छोटी-बड़ी जरूरतों को अनदेखा करके पैसे बचाये काफी पैसे भैया ने भी दिये और इसे खरीदा.. मगर फिर भी.....

मन में कुछ खटक सा रहा है.. कहीं कुछ कमी सी लग रही है.. सोच रहा हूं किसके लिये इसे लिया हूं? किसके सामने प्रदर्शन के लिये इतने तड़क-भड़क वाली गाड़ी खरीदा हूं? मानसिक मंथन चल रहा है मगर कोई उत्तर नहीं मिल रहा है और मुझे लगता भी नहीं है कि उत्तर मिलेगा.. कहीं कुछ कमी जरूर है.. क्या? पता नहीं...

मैं कभी लोन पर नहीं लेना चाहता था, क्योंकि आजकल के बाजार का पता है.. पता नहीं कब सड़कों पर आ जाऊं.. बेरोजगारी के धक्के भी खाने को मिले.. सो उधारी से जितना बच सको उतना बच लो.. कई मित्र सलाह देते थे कि लोन पर उठा लो, मगर इसके लिये ना तो मैं तैयार था और ना ही पापा-मम्मी.. खैर इसके लिये जितना इंतजार करना पड़ा सो ठीक है लेकीन आज किसी बैंक पर अपनी उधारी तो नहीं चढ़ी है..


चलते-चलते -
मैंने पल्सर 200 खरीदा है.. जिसका रंग नीला है.. पल्सर 220, एवेंजर 200 और करिज्मा यह तीनों ही बाईक मशीनी ताकत के मामले में इसी के आस-पड़ोस के हैं.. लेकीन फिर भी पल्सर 200 लेने के पीछे कुछ कारण थे..
1. एवेंजर मुझे बहुत पसंद है लेकीन घर में पहले से ही यह है.. अगर घर में यह नहीं होता तो शायद मैं वही लेता..
2. पल्सर 220 और पल्सर 200 में बस 20CC के इंजन का अंतर है मगर दाम में लगभग 16,000 का अंतर है.. सो बस 20CC के लिये मैं 16,000 ज्यादा खर्च करना अनुचित समझा..
3. करिज्मा ना लेने का सबसे बड़ा कारण इसका हेडलाईट था जो इसके बॉडी से ही ही जुड़ा हुआ है.. अगर इसका हेड लाईट इसके हैंडल से जुड़ा होता तो शायद यह तगड़ा दावेदार होता..

बाद में पता चला कि पल्सर 220 में भी हेडलाईट के साथ यही समस्या है..

यामहा के नये मॉडल FZ-15/16 के साथ ना जाने के पीछे कारण इसका सही रीव्यू उपलब्ध ना होना था.. नेट पर जितने भी रीव्यू मैंने पढ़े उसे पढ़कर मेरे लिये भ्रामक स्थिति बन रही थी.. कुछ शंका भी मन में उत्पन्न हो रहा था.. जैसे कम CC के इंजन से जितने मात्रा में पॉवर उतपन्न हो रहा है उससे आगे चलकर इसके इंजन पर तो कोई असर नहीं पड़ेगा? कुल मिला कर मेरे लिये बजट कोई समस्या नहीं थी, अगर होता भी तो मैं कुछ दिन और इंतजार कर लेता मगर लेता वही जो मुझे पसंद होता.. जैसे इतने दिन इंतजार किया वैसे ही..

एक बार बहुत पहले, सन् 2001 में, मुझसे किसी ने कहा था कि तुम्हारे भीतर पेशेन्स बिलकुल नहीं है.. क्या इससे भी ज्यादा पेशेन्स की उम्मीद उसे थी? अगर यह ना होती तो कभी का ही लोन पर ले चुका होता..

Tuesday, January 20, 2009

हर तरफ बस तू ही तू

उस मोड़ पर खड़ा था मैं फिर.. ये किसी जीवन के मोड़ कि तरह नहीं थी जो अनायास ही कहीं भी और कभी भी पूरी जिंदगी को ही घुमाव दे जाती है.. ये तो निर्जीव सड़क थी, जहां आकर मुझे अपनी आत्मा के निर्जीव होने का अनुभव सा होने लगता है.. जैसे वो था या है या ऐसा ही कुछ भी.. मगर यह सड़क हमेशा मुझे जीवंत यादों में ढ़केलता रहा है..

तुम्हें आखिरी बार आते हुये भी और जाते हुये भी यहीं से देखा था.. सफेद सूट धूप में चमक रहा था.. इतना कि दूर से नजर आ जाए.. बाल खुले थे या बंधे हुये, लंबे थे या छोटे, जब तुम चलती थी तब आवाज आती थी या नहीं, तुम हंसते या रोते समय कैसी दिखती थी, इन सबका मेरे लिये कोई अर्थ नहीं था.. तब बस तुम्हारे होना ही मेरे लिये एक अर्थ रखता था और अब तुम्हारा नहीं होना..

आखिरी बार जब हम साथ थे और खुश थे, ये वही जगह थी.. उस दिन भी बरसात हो रही थी और आज भी.. अंतर बस यह रह गया है कि उस दिन कि बरसात रूमानियत भर जाती थी और आज कि बरसात विरह.. यूं ही खड़ा भींग रहा था लेकिन मन जैसे रीता ही रह गया..

जब भी इस शहर में आता हूं तो एक बेचैनी साथ लिये जाता हूं.. मन में एक हूक सी उठती रहती है.. कभी-कभी सोचता हूं कि अपनी इस भावना कि हत्या भी कर डालूं.. ठीक उसी गीत कि तरह जो मुझे हमेशा तुम्हारी याद दिलाती थी और उसे मैं नहीं सुनता था.. एक दफे दिन-रात कई दिनों तक मैं उसी गीत को सुनता रहा, इतनी बार कि उसे लेकर मन में जो भी भाव अपनी छाप छोड़ जाते थे, वे सभी खत्म हो गये.. उसी तर्ज पर उस शहर में, उन जगहों के इतने चक्कर लगा डालो कि उनको लेकर भावनाशून्य हो जाऊं.. कोई तड़प दिल में बाकी ना रहे.. कोई कसक दिल में बाकी ना रहे.. पथराती आंखों से मैं वहां से गुजरूं, बिना कोई भाव मन में लाये..

कई बार कोशिश भी कि की तुम्हारी यादों को मिटा डालूं.. कई बार जलाने कि भी कोशिश हुई और जला भी डाला.. मगर इस शहर के रूमानियत से वह अहसास फिनिक्स कि तरह राख के ढ़ेर से फिर से जी उठता है.. जैसे लगता है कि मेरी रूह में समा चुकी हो तुम..

मेरी प्रीत भी तू,
मेरी गीत भी तू,
मेरी रीत भी तू,
संगीत भी तू..

मेरी नींद भी तू,
मेरा ख्वाब भी तू,
मेरी धूप भी तू,
माहताब भी तू..

मेरी खामोशी भी तू,
मेरी गूंज भी तू,
मेरी बूंद भी तू,
समुंद भी तू..

मेरी सांस भी तू,
मेरी प्यास भी तू,
मेरी आस भी तू,
रास भी तू..

मेरा नक़्स भी तू,
मेरी हूक भी तू,
मेरा अक्स भी तू,
मेरी रूह भी तू..

मेरा मान भी तू,
मेरा ज्ञान भी तू,
मेरा ध्यान भी तू,
मेरी जान भी तू..

मेरा रंग भी तू,
ये उमंग भी तू,
मेरा अंग भी तू,
ये तरंग भी तू..

मेरे जिगर के सरखे-सरखे में
कुछ और नहीं
बस तू ही तू..

मेरे लहू के कतरे-कतरे में
कुछ और नहीं
बस तू ही तू..

क्यों चली गयी तुम? कहां चली गयी तुम? जाना ही था तो आयी क्यों थी? किसी को दिलासा दिलाकर छोड़ जाना अच्छा नहीं होता.. आ जाओ तुम, कहीं से भी.. बस उड़कर.. देखो तुम्हारे बिना मैं कितना अकेला हूं, कितना उदास हूं..

Monday, January 19, 2009

प्रेम करने वाली लड़की जिसके पास एक डायरी थी

उसके पास भी एक डायरी थी.. जिसे वह हर किसी से छुपा कर रखती थी.. जब वह कालेज जाती थी तब वह डायरी उसके कालेज बैग का एक हिस्सा होती थी.. और घर पहूंचने पर उसकी आलमीरा का एक हिस्सा.. अगर कालेज बैग साथ में ना हो तो उसके हाथों कि शोभा बढ़ाती थी वह डायरी.. जो भी उसे करीब से जानता था उसके लिये वह डायरी चंद्रकांता के तिलिस्म से कम नहीं होता था.. कालेज खत्म होने के बाद वही डायरी अक्सर उसके पर्स का एक हिस्सा बन जाया करती है.. साल दर साल बीतते जाते हैं, मगर उसकी डायरी कभी नहीं बदलती है.. हर दिन उसे उसी डायरी के साथ देखने की भी एक आदत सी हो जाती है..

- क्या है इस डायरी में?

- मैं नहीं बताऊंगी..

- मुझे भी नहीं बताओगी?

- नहीं..

- तुम तो कहती थी कि तुमसे कुछ भी नहीं छुपाती हूं मैं.. फिर इसे क्यों छुपा रही हो? क्या वो बातें भूल गई हो?

- नहीं यार! ऐसी कोई बात नहीं है.. कुछ छुपा नहीं रही हूं.. इसमें कुछ है ही नहीं..

- कुछ नहीं है तो मुझे दो देखने के लिये..

- नाह.. नहीं दे सकती..

- तो मैं छीन लूंगा..

- तुम नहीं छीन पाओगे..

- लो मैंने तुम्हारा बैग ले लिया.. इसी में वह डायरी है न?

- मेरा बैग मुझे दे दो..

- मुझे बैग से क्या लेना देना.. ये लो.. लेकीन डायरी ना दूंगा..

.......थोड़ी देर शांति........

- अरे यार!! इतना उदास क्यों हो रही हो? जाओ नहीं पढ़ता तुम्हारी डायरी.. मगर तुम्हे उदास नहीं देख सकता..

- दे दो ना मेरी डायरी.. प्लीज..

- लो.. मगर अब तो मुस्कुरा दो..

- मैं जानती थी कि तुम मुझे दे दोगे.. ये सब तो नाटक था.. डायरी वापस लेने का..

- सोचो, तुम्हे नाटक में भी उदास नहीं देख सकता.. सच में उदास हो जाओगी फिर मेरा क्या होगा?

- देखो आईसक्रीम वाला जा रहा है.. एक आईसक्रीम दिला दो ना..

- इतनी ठंढ में? नहीं.. आज नहीं..

- नहीं मुझे चाहिये.. दिला दो ना.. प्लीज..

- कितनी जिद्दी हो तुम.. चलो..


ऐसा क्यों अक्सर होता है! हर प्रेम करने वाली लड़की के पास एक डायरी होती है.. जिसे वह छिपा कर रखती है.. यहां तक कि अपने प्रेमी से भी.. क्या सच में उस डायरी में कुछ लिखा होता है? या फिर सिर्फ एक गल्प कथा बनाने के लिये ही वह डायरी उसके पास होती है? जिससे सभी को भरमाया जा सके..

Saturday, January 17, 2009

शिव जी का लैप-टॉप और मेरा सर

कल अचानक लवली का फोन उसके कोलकाता वाले नंबर से आया, फोन उठाते ही उसने कहा, "भैया पता है अभी मैं घर्रर्रर्र..(टेलीफोन की घरघराहट)"
"क्या? किनके साथ हो?" मैंने छूतते ही पूछा..
"शिव कुमार मिश्रा!!"
"अरे वाह.." हम किसी तरह अपनी आवाज में खुशी घोलते हुये कहे.. अब हम बैठे ही इत्ते दूर हैं कि किसी की खुशी देखते ही दुखी हो जाते हैं.. खासतौर से जब से शिव जी ने धमकियाने के अंदाज में कमेंट लिखने वाला पोस्ट हत्या करने के कैसे-कैसे बहाने.... लिखा है तब से उनके साथ कोई पंगा हम नहीं लेने वाले हैं.. क्या पता पहला निशाना उनके लैपटॉप का मेरा सर ही हो?
आगे लवली बोली, "लिजिये इनसे बात किजिये.." कहकर उन्हें फोन पकड़ा दी..

हम तो ठहरे सीधे-साधे बेचारे टाईप प्राणी.. ई फोनवा भी बहुत बुरी चीज होती है ससुरी, लोग चाहे जो बोलें मगर चेहरे का भाव नहीं बता पाती है.. अगर बता पाती तो शिव जी तो मेरी हालत देख कर ही खुश हो लेते..

खैर हम कांपते हाथों से फोन पर उनसे हाल-चाल पूछे.. शिव जी बहुत खुश लग रहे थे.. आखिर क्यों ना हों, लवली के साथ जो बैठ गप्पे जो हांक रहे थे.. ज्यादा लम्बी बात नहीं हुई, मगर छोटी सी ही बात-चीत में उन्होंने कहा, "प्रशान्त! तुम कलकत्ता आ ही जाओ.. मैं तुम्हें लैपटॉप उठाकर नहीं मारूंगा.."

मैंने थोड़ा और आश्वस्त होने के इरादे से पूछा, "कहीं आप डेस्कटॉप से मारने का इरादा तो नहीं बना रहे हैं?"
उनका कहना था, "मेरे पास डेस्कटॉप है ही नहीं.."

अब जाकर मेरी छोटी बुद्धि में यह बात आयी.. वो मेरी तलाश क्यों कर रहे हैं.. अपने लैपटॉप की मजबूती जानने के लिये मुझे खोज रहे हैं.. "लैपटॉप से नहीं मारूंगा" वाली बात तो बहलाने के लिये कहा था उन्होंने.. अब वैसे भी एक ऐसे व्यक्ति पर कैसे भरोसा कैसे किया जा सकता है जो कभी दुर्योधन कि डायरी चुरा लाते हैं तो कभी किसी उद्योगपति कि डायरी.. जो जगह सी.बी.आई. वालों के लिये भी अगम्य मानी जाती है वहां से भी बातें उड़ा लाते हैं..

फिर उन्होंने कहा कि मैं तुम्हें बाद में फोन करता हूं.. मेरा कहना था कि मैं ही आपको फोन कर लूंगा.. मन ही मन सोचते हुये कि "पहले थोड़ी हिम्मत तो जुटा लूं".. बहाना बना दिया कि "आजकल अतिव्यस्त चल रहा हूं, सो पता नहीं जब आप फोन करें उस समय मैं व्यस्त रहूं और ठीक से बात ना हो पाये?" काश वो मेरे चेहरे के भाव देख सकते और कम से कम खुश तो हो ही लेते कि चलो मुझसे डर ही गया है, सो इसे अपने लैपटॉप से नहीं मारूंगा.. वैसे भी भय ज्यादा कारक होता है.. वो फिल्मी मार्का डायलॉग सुने ही होंगे, "अपने सारे पत्ते कभी नहीं खोलना चाहिये"..

मन में डर भी लग रहा था कि आज लवली का क्या होगा? क्या उसका सर बचेगा? शाम में लवली का फिर से फोन आया.. उससे बातें हुयी और जानकर अच्छा लगा कि उसका सर सही सलामत है.. मैंने इस पर खूब सोचा कि ये बचकर कैसे आ गयी? कुछ बातें दिमाग में आई जिसे नीचे लिख रहा हूं..
1. शायद लवली उनके हर पोस्ट पर टिपिया आई होगी.. मगर इसकी पुष्टी करनी होगी.. अगर यह कारण ना हो तो, तो उसके बचने का दूसरा कारण दूसरे प्वाईंट में है..
2. महिला ब्लौगर होने का फायदा उसे मिल गया होगा.. शिव जी भी चाहे जिससे भी पंगा ले लें मगर महिला ब्लौगर से पंगा नहीं लेंगे इसका मुझे पूरा भरोसा है.. इतनी समझ तो उन्हें होगी ही कि उनसे पंगा लेने पर कल को कोई उनके खिलाफ मोर्चा खोल दे.. "यह पुरूष ब्लौगर पितृसत्ता समाज का अगुवा है.. चुन-चुन कर महिला ब्लौगर पर हमला कर रहा है.. महिला को आगे बढ़ते नहीं देखना चाहता है.. कुछ दिन पहले लवली का नाम राजस्थान के एक अखबार में छपा था इसी कारण उसकी बढ़ती लोकप्रियता से चिढ़कर उस पर हमला किया गया है.. इत्यादी इत्यादी.."
3. जब से प्रत्यक्षा जी ने उन्हें जेंटलमैन का खिताब दिया है, तब से वे अपने खिताब को बचाये हुये हैं और इसे आगे भी बचाये रखना चाहते होंगे..

चलिये अब मैं अपनी सुरक्षा व्यवस्था बताता हूं जिससे उनके लैपटॉप से अपने सर को बचाया जा सके..
1. अतिव्यस्तता के कारण मैं उनका पिछला 2-3 पोस्ट पढ़कर नहीं टिपिया पाया हूं, सो समय मिलते ही सबसे पहले उसी पर टिपियाऊंगा..
2. मुझे उनका 26 जनवरी वाला किस्सा हमें कल शाम में पता चला.. अब हम जब चाहे उन्हें काला-पुरूष(ब्लैक मेल) कर सकते हैं.. या नहीं तो वो खुद ही अपना किस्सा हमें पूरे मजे के साथ सुना दें.. हम भी बहुत चाव से सुनने को तैयार हैं.. :)
3. एक हेल्मेट पहन कर ही उनके पास जाऊं, पूछने पर कहना कि हम भी आपके ही तरह क्रिकेट के दीवाने हैं, क्या पता भारतीय क्रिकेट टीम से कब बुलावा आ जाये.. आखिर उनकी क्रिकेट मैनिया के बारे में पता है तो कुछ लाभ भी उठाना चाहिये.. :)

Wednesday, December 31, 2008

साल भर के ब्लौग पोस्ट और ब्लौगरों का कच्चा-चिट्ठा

इस साल मैंने कुल 296 लेख विभिन्न ब्लौग पर लिखे.. जिसमें से 227 पोस्ट मैंने मेरी छोटी सी दुनिया पर लिखी, 12 पोस्ट अपने तकनिकी चिट्ठे पर लिखी, 4 पोस्ट भड़ास के लिये लिखा, 1 पोस्ट मोहल्ला के लिये लिखा, 1 पोस्ट रेडियोनामा के लिये लिखा, 5 पोस्ट अपने चित्र कथा-A Pictorial Story नामक ब्लौग पर किये, 14 पोस्ट मैंने अपने नये कॉमिक्स चिट्ठे के लिये लिखा और 32 पोस्ट अपने निजी चिट्ठे के लिये लिखा.. और इन सब पर कुल मिला कर 40,000 से अधिक पाठक भी मिले..

इस साल कि शुरूवात मैंने एक तकनिकी चिट्ठे बनाने के साथ की थी.. पहले महीने बेहद जोश के साथ लिखता रहा, मगर बाद में कुछ अन्य कारणों से नहीं लिख पाया.. उम्मीद करता हूं कि इस साल उसे फिर से जीवंत कर सकूंगा..

इन सबके अलावा मैंने एक और चिट्ठा शुरू किया जिसका मैं लगभग दिवाना सा हूं.. जी हां, कामिक्स चिट्ठा.. अभी हाल-फिलहाल में इस पर लिखना भी काफी हद तक बंद है.. यह एक कम्यूनिटी चिट्ठा मैंने बनाया था.. जिस पर कोई भी अपने बचपन कि कामिक्स या कहानी की किताबों से जुड़ी यादें बांट सकता है.. यूं तो कई लोग इस चिट्ठे के सदस्य हैं मगर अभी तक मेरे अलावा बस आलोक जी ही इसके मुख्य लेखक में से हैं.. इनके लेख हमेशा जानकारी से भरे हुये होते हैं.. महीने में एक या दो पोस्ट ही करते हैं मगर काफी छानबीन करने के बाद इनका पोस्ट आता है..

कुछ चिट्ठाकार जिनसे इस साल संपर्क में आया -
इस साल कुछ चिट्ठाकार के व्यक्तिगत तौर पर संपर्क में भी आया.. इसमें सबसे प्रमुख नाम लवली, दिनेश जी, पंगेबाज जी, अजित वडनेकर जी, कुश, अभिषेक ओझा, पूजा उपाध्याय, अनिता जी, युनुस जी, विकास कुमार, शिव जी हैं.. चलिये एक एक करके इनके बारे में भी बताता हूं..

लवली - इससे कैसे बात होनी शुरू हुई मुझे याद नहीं, मगर यह मेरी नेट बहन है.. अब यह मत पुछियेगा कि नेट बहन क्या होता है.. असल में हुआ यह कि रक्षा बंधन से पहले इसने मुझसे मेरा पता मांगा, और चूंकी मैं उस समय घर(पटना) जा रहा था सो मैंने पटना का पता दे दिया.. मेरे घर पहूंचने से पहले इसकी राखी घर पहूंच गई थी.. मेरी मम्मी लवली को जानती नहीं थी, मैंने कभी चर्चा ही नहीं किया था, सो उन्होंने पूछा कि कौन है ये? मेरा उत्तर था कि नेट बहन है.. मम्मी बेचारी हैरान परेशान कि नेट फ्रेंड के बारे में तो सुना है, मगर नेट बहन क्या होता है? और तब मैंने लवली के बारे में मम्मी को बताया.. मैंने उन्हें बताया कि यही स्वभाव है हिंदी ब्लौगिंग का.. यहां बस नेट फ्रेंड ही नहीं नेट अंकल, नेट आंटी और नेट भाई-बहन भी बनते हैं.. :)
(एक बार लवली से उसकी अच्छी सी तस्वीर मांगी थी तो उसने यह तस्वीर दी.. यूं तो मेरे पास उसकी अच्छी वाली तस्वीर है मगर मैं यहां यही लगा रहा हूं..)

दिनेश जी - मुझे इनसे सबसे पहले हुई बात याद आती है जब मैंने इन्होंने वेताल कि कामिक्स के प्रति अपनी रूची प्रकट की थी और मैंने इन्हें वेताल कि एक कामिक्स मेल भी किया.. खैर तब कि बात है और आज कि बात है.. आज मुझे जब भी मार्गदर्शन की जरूरत होती है मैं इनसे जरूर संपर्क करता हूं और कभी निराश नहीं होना पड़ा है मुझे.. हमेशा एक अभिभावक कि तरह इन्होंने मेरा मार्गदर्शन किया है..




पंगेबाज अरूण जी - इनसे जीमेल के चैट द्वारा बात शुरू हुई और 14 अगस्त को इनसे मुलाकात भी हुई.. उससे पहले बाकलमखुद में इनके बारे में पढ़कर इनकी जिजिवशा का मैं कायल पहले ही हो चुका था.. जब इनसे मुलाकात हुई तब इनके दिलखुश मिजाज और सेंस ऑफ ह्यूमर का भी मैं कायल हो गया..



अजित वडनेकर जी - इनसे पहले कभी बात नहीं हुई थी और कभी कोई मेल भी नहीं हुआ था.. मगर संयोग ऐसे ही तो बनता है.. जिस दिन(14 अगस्त) मुझे दिल्ली में ब्लौगवाणी के कार्यालय में जाना था उसी दिन इन्हें भी हरिद्वार जाने के लिये दिल्ली आना था और ब्लौगवाणी के कार्यालय में मुलाकात हो गई.. मगर उसके बाद जब भी फुरसत में होता हूं और इन्हें ऑनलाईन देखता हूं तो इन्हें जरूर परेशान करता हूं.. कभी-कभी इन्हीं के अंदाज में इन्हें "जै जै" कह कर इनका अभिवादन भी करता हूं.. :)

अनिता जी - ब्लौग दुनिया में सबसे पहले किसी से मेरी बात हुई थी तो वो अनिता जी ही थी.. इन्होंने मुझे कमेंट करके मुझसे मेरा ई-मेल पता मांगा था और कुछ मेरे बारे में जानना चाहती थी.. ये वो दौर था जब हिंदी में कुल मिलाकर 1000 के आस-पास चिट्ठे ही हुआ करते थे और मुझे अनिता जी जैसे बड़े लोगों के चिट्ठे पर कुछ भी लिखने में संकोच भी खूब होता था.. जब इनसे पहली बार बात हुई तो खूब मजे में बात हुई.. बहुत अच्छा लगा था उस दिन..

युनुस जी - इनका चिट्ठा रेडियोवाणी जब इन्होंने शुरू किया था तबसे ही पढ़ता रहा हूं, मगर पहला कमेंट किया लगभग एक साल के बाद.. फिर मेल का आदान-प्रदान चालू हुआ.. और बाद में बाते भी हुई.. जब पहली बार इनसे बात हुई थी तब इनसे बात करके इनके व्यक्तित्व का इतना अधिक प्रभाव पड़ा था कि मैंने 2-3 पोस्ट इनके नाम से ठेल दी थी.. युनुस जी के बारे में मैं बस इतना ही कहूंगा कि, इनके जैसे व्यतित्व से मैं अपने जीवन में कम ही मिला हूं..






अभिषेक ओझा - जबसे इसने अपना चिट्ठा शुरू किया है तभी से मैं इसका चिट्ठा पढ़ता आ रहा हूं.. मुझे अभी भी याद है जब मैंने इसके चिट्ठे पर कमेंट किया था और सलाह दी थी कि इतना लम्बा-लम्बा पोस्ट ना लिखे, छोटा पोस्ट लिखें और रोचक लिखें तो लोग बड़े चाव से पढ़ने आयेंगे.. इन्होंने सहृदय मेरी बात स्वीकार की थी.. धीरे-धिरे कब इनसे फोन पर भी बाते होने लगी कुछ याद नहीं.. चाहे जो भी कहें मगर इनसे बात करना मन को बहुत भाता है..



विकास कुमार - इनका ब्लौग पढ़कर उसपर कमेंट बहुत दिनों तक किया है मगर बात कि शुरूवात कुछ यूं हुई जब इन्होंने मुझे जीटॉक पर चैट रीक्वेस्ट भेजा और पूछा था कि क्या मैं इनके स्कूल का मित्र तो नहीं.. मैं नहीं था.. फिर बातों का सिलसिला चलता ही रहा.. इनकी लेखनी मुझे हद दर्जे तक पसंद है.. जो भी लिखते हैं, बस छा जाते हैं..



कुश - इनसे बात शुरू कैसे हुई यह भी एक मजेदार घटना है.. एक दिन लवली का फोन आया और उसने मुझसे एक नामी चिट्ठाकार का नाम लेते हुये पूछा कि क्या आपने उसे मेरा नंबर दिया है? मुझे वह फोन करके परेशान कर रहा है.. मैंने मना कर दिया और उससे वो नंबर ले लिया जिससे उसे फोन आ रहे थे.. उस नंबर पर मैंने फोन किया तो पता चला कि कुश महाराज लवली को अपने नये नंबर से तंग कर रहे थे.. बेहद खुशमिजाज हैं यह.. कभी इनसे बात करके खुद ही देख लें..




पूजा उपाध्याय - जब यह अपने लिये स्कूटी खरीदने का सोच रही थी उस समय कुछ जानकारी लेने के लिये इन्होंने मुझे मेल किया और फिर पत्रों का आदान-प्रदान चलता ही रहा.. फिर पत्र कब जीटॉक चैट में बदल गया कुछ पता ही नहीं चला.. जब भी हम फुरसत में ऑनलाईन होते हैं तो खूब बातें होती है.. कभी फोन पर बात करने की जरूरत नहीं हुई सो कभी फोन पर बातें भी नहीं हुई.. मगर इनसे बात बिलकुल वैसे ही होती है जैसे किसी अच्छे मित्र के साथ होती है.. थोड़ा हंसी-मजाक, थोड़ा चिढ़ाना..



शिव कुमार मिश्र जी - लास्ट बट नाट लीस्ट.. कई बार इनसे बातें करने की इच्छा होती थी मगर हर बार संकोच कर जाता था.. सोचता था इतने बड़े ब्लौगर हैं, कैसे बात करूंगा.. मगर जो होना होता है वही होता है.. एक दिन लवली से बातें करते हुये इन्हें पता चला कि लवली के पास मेरा नंबर है और इन्होंने बिना संकोच के उससे मेरा नंबर लेकर मुझे फोन लगा दिया.. कितनी खुशी हुई मुझे मैं वह बता नहीं सकता.. फिर हमारी बातें होती ही रही.. हर विषय पर.. इनसे बातें करते वक्त समय का पता ही नहीं चलता है..

अब जब सब के बारे में लिख ही दिया है तो कुछ और लोगों को कैसे छोड़ दूं?

जी.विश्वनाथ जी - इनसे जब मिला तब इन्हें देख कर मेरे मन में पहली बात यही आयी, "60 साल के बूढ़े या 60 साल के जवान.." जी हां, इनके भीतर की उर्जा को देखकर कोई भी यही कहेगा.. जितने प्यार और अपनापन से यह मुझसे मिले वो एक यादगार क्षण ही है मेरे लिये.. इनके बारे में मैं पहले भी 3 पोस्ट लिख चुका हूं, सो ज्यादा जानकारी के लिये यहां, यहां और यहां पढ़ सकते हैं..

कुछ और भी हैं जिनका आशीर्वाद हमेशा मुझ पर बना रहता है, भले ही उनसे लगातार बातें हो या ना हो.. उनमें प्रमुख हैं मैथीली जी, मसिजीवी जी, शास्त्री जी और आलोक पुराणिक जी.. ताऊ जी का नंबर भी मुझे मिला है और मैं सोच रहा हूं कि नये साल में एक और मुलाकात आगे बढ़ाई जाये.. मतलब कल मैं उन्हें फोन करता हूं.. आखिर अगले साल के लिये भी तो कुछ चाहिये ना? :)
डा.प्रवीण चोपड़ा जी का नाम छूट गया था, सो क्षमापार्थी हूं..

चलिये आज का यह चिट्ठा बहुत लम्बा हो चुका है और मेरे पिछले पोस्ट से लेकर इस पोस्ट के बीच में मेरे चिट्ठे का मीटर भी 40,000 को पार कर गया है और मेरे इस पोस्ट को मिला कर पूरे 297 पोस्ट हो गये हैं.. चलते चलते ब्लौगवाणी के ऑफिस में लिया गया यह चित्र भी देखें..


आप सभी को नववर्ष कि ढ़ेर सारी शुभकामनायें.. :)