Friday, December 28, 2007

मेरी कम्पनी में बम विस्फोट की अफवाह

आज मैं थोडी देर से लगभग 10:30 AM में आफिस पहूंचा। जैसे ही अंदर दाखिल हुआ तो मेरे एक साथी ने बताया कि थोडी देर पहले हमारे कम्पनी के एक दूसरे ब्रांच में बम रखे जाने की धमकी मिली है और उस पूरी इमारत को खाली करा लिया गया है। मैं पहले तो चौंका कि अभी तक चेन्नै बस जयललिता और करूणनिधि के हाथों ही परेशान रहता था लेकिन अब ये भी सुनना पड़ेगा? मैंने अभी तक चेन्नई को छोटे-मोटे अपराधों के मामले में सबसे सुरक्षित शहर पाया है सो थोड़ा आश्चर्य होना जायज था।

खैर हम सभी दिल थाम कर इस घटना के पटापेक्ष होने का इंतजार करने लगे। लगभग 12 बजे मेरे एक मित्र ने, जो उसी ब्रांच में काम करते हैं, फोन पर बताया कि वो बस एक अफवाह थी और कोई भी बम नहीं मिला। मगर आज दिन भर के लिये उस ब्रांच को बंद कर दिया गया।

असल में मेरी कम्पनी के 15-16 ब्रांच हैं चेन्नई में जिसमें से सबसे बड़े ब्रांच में मैं काम करता हूं जिसे साउथ विंग के नाम से जाना जाता है और इसमें लगभग 1600 कर्मचारी कार्यरत है। दूसरा सबसे बरा ब्रांच, जिसमें बम मिलने कि अफवाह आयी थी, को इस्ट विंग कहते हैं और उसमें लगभग 1200 लोग काम करते हैं।

हां बाद में ये अफसोस जरूर हुआ कि मेरे ब्रांच में ऐसी अफवाह क्यों नहीं आयी। कम-से-कम आज कि छुट्टी तो मिलती। :D

Thursday, December 27, 2007

कुछ चीजें अजब-गजब ब्लौगवाणी पर

आज मैं फिर आया हूं कुछ अजब-गजब चीजें लेकर। मैं एग्रीगेटर के रूप में ब्लौगवाणी को सबसे ज्यादा प्रयोग में लाता हूं सो नित्य दिन इसकी खूबियों के साथ-साथ इसकी खामियों पर भी नजर परती रहती है।

अब ये तो स्पष्ट है कि अगर मैं इसे प्रयोग में लाता हूं तो जरूर मुझे इसमें कुछ खूबी नजर आती होगी। आज जो मैंने इसकी तकनीकी खामी ढूंढी है वो इस चित्र से आपको स्पष्ट हो जायेगा।

इसमें दो पोस्ट जिसे मैंने लाल रंग से घेर रखा है उसे आप गौर से देखेंगे तो आप पायेंगे कि वे दोनों पोस्ट जितनी बार पढे भी नहीं गये हैं उससे कई ज्यादा बार पसंद किये गये हैं। अब बिना पढे लोग कैसे उसे पसंद कर लिये ये मैं नहीं समझ पाया, अगर आप लोग समझ गये हों तो मुझे भी समझा दें।

वैसे मेरी नजर में ये ब्लौगवाणी कि खामी नहीं है क्योंकि आप एक सर्वर से एक ही बार किसी पोस्ट को अपनी पसंद का बता सकते हैं। जो कि खामी नहीं खूबी है। और इसका मतलब ये हुआ कि ब्लौगवाणी सर्वर का आई पी अड्रेस को अपने डेटाबेस में सुरक्षित रखता है। मेरे ख्याल से अगर ब्लौगवाणी उस आई पी पते का इस्तेमाल करते हुये ये भी करे कि जिस आई पी पते से कोई पोस्ट देखा गया हो बस उसी आई पी पते से ही उसे पसंद वाले सूची में डाला जा सकता है तो इस समस्या का हल हो सकता है। और इसके लिये ब्लौगवाणी को अपना कोई मेमोरी स्पेस खर्च भी नहीं करना परेगा।

आपके विचार इस पर आमंत्रित हैं। धन्यवाद।

Wednesday, December 26, 2007

पापा एक चौपाया जानवर होते हैं

"पापा एक चौपाया जानवर होते हैं। उनके दो कान, दो आंख, एक नाक, एक मुह, दो सींग, चार पैर और एक पूंछ होती है। पापा दूध देती है। पापा लाल, काला, सफेद और पीले रंगों में पाये जाते हैं।" ये निबंध मैंने कब लिखा था ये मुझे याद भी नहीं है पर मेरे पापा मम्मी बताते हैं कि जब मैं बहुत छोटा था तब एक दिन मैं विद्यालय से घर आया और बहुत खुश होकर बताया कि आज हमें गाय पर निबंध लिखना सिखाया गया है। मेरे पापाजी ने कहा कि ठीक है जब निबंध लिखना सीख गये हो तो पापा के उपर निबंध लिखो, और मैंने जो लिखा था वो आप सबों के सामने है।

आज मेरे पापाजी का जन्मदिन है और आज मुझे उनसे जुड़ी कई बातें याद आ रही है, और् उन यादों की पिटारी में से कुछ चुनिंदा यादें मैं आज यहां आप लोगों के साथ बांट रहा हूं।

मुझे याद है एक बार एक योगा कक्षा में जब कहा गया था कि आंखे बंद करके उस चीज के बारे में सोचो जो तुम्हें सबसे अधिक खुशी देती है और बस डूब जाओ उन क्षणों में, मानों वो सजीव हों। सभी लोगों कि तरह मैंने भी अपनी आंखें बंद की और सबसे अधिक खुशी के क्षणों को ढूंढने लगा। बहुत मुश्किल था ये सब, कई दृश्य आंखों के सामने आये और गये मगर अंततः मैंने ढूंढ ही लिया। मैंने पाया कि जब कभी मैं घर लौटता हूं तो मेरे पापाजी मुझे अपने सीने से लगाकर आशीर्वाद देते हैं और वही क्षण मेरे लिये सबसे खुशी का क्षण होता है।

पापाजी से मुझे घर में सबसे ज्यादा दुलार मिला है। मैं तो उनके गोद में 15-16 साल के उम्र तक बैठा हूं। वो बचपन में मुझे "पुछड़ू" कह कर बुलाते थे। इस नाम से बुलाना उन्होंने कब छोड़ा ये तो पता नहीं पर वे यादें तो अब शायद मेरे साथ ही जायेगी।

मेरे पिताजी एक प्रशासनिक अधिकारी हैं, और लाल-फितासाही नामक काजल की कोठरी से बेदाग निकलते हुये उन्होंने हम सभी भाई-बहनों को नैतिकता, ईमानदारी और मनुष्यता का अच्छा पाठ पढाया है। उन्होंने मुझे एक बार कभी एक बात कही थी जो शायद उन्हें भी आज याद ना हो। उन्होंने कहा था की "मनुष्य कि पहचान इससे नहीं होती है कि वो अपने से उपर वालों से कैसा व्यवहार करता है, बल्की इससे होता है की वो अपने से नीचे वालों से कैसा व्यवहार करता है।" शायद ये उनका सिखाया हुआ पाठ ही है कि बचपन से घर में सरकारी नौकरों की फौज होते हुये भी हम सभी भाई-बहन आज भी व्यवसायिक तौर पर कोई बहुत निचले स्तर के व्यक्ति से मिलते हैं तो इंसानों कि तरह ही मिलते हैं।

अगर आज कोई मुझसे पूछे कि बड़े होकर क्या बनना चाहोगे तो मेरा जवाब होगा कि अपने पापाजी कि तरह अच्छा इंसान बनना चाहूंगा।

Tuesday, December 25, 2007

ईसाई भारतीय नहीं हैं क्या?

मैं जब से हिंदी चिट्ठाजगत में आया हूं तब से लेकर अभी तक एक बात मैंने पाया है, वो ये कि हिंदी चिट्ठाजगत कुछ विभिन्न ध्रुवों में बंटा हुआ है। जिनमें से दो प्रमुख ध्रुव कम्यूनिस्म और भगवाधारीयों का है। पर एक बात तो जरूर है कि चाहे जो भी मतभेद अलग विचारधाराओं में हों लेकिन एक बात पर दोनों के विचार एक हो जाते हैं। वे सभी भारतीयता और राष्ट्रभाषा के नाम पर एक ही तरह की बातें कहते हैं चाहे तर्क जो भी दें।

ये बहुत ही अच्छी बात है, लेकिन कभी-कभी कुछ ऐसी बातें पढने को मिल जाती है जिससे लगता है कि सिर्फ हिंदू और मुसलमान ही भारतीय हैं ईसाई नहीं, जो भी पाश्चात्य शैली को अपनाता है या फिर विदेशी त्योहारों में भाग लेता है वे सभी देशद्रोहीयों की कतार में शामिल है।

जैसे एक उदाहरण मैं देना चाहूंगा। अभी 2-3 दिन पहले ही मैंने कहीं पर अपने किसी ब्लौगिये मित्र की टिप्पणी पढी थी, उनका कहना था कि हमने होली-दिपावली मना लिया, ईद भी मना लिया, क्रिसमस भी मना लेंगे। लेकिन नववर्ष हम क्यों मनाये?

मेरा उनसे पूछना है कि क्या हिंदूओं और मुसलमानों का पर्व और नववर्ष ही भारतीयता है, ईसाइयों का पर्व और नववर्ष नहीं?

मैं ना तो भगवान को मानता हूं, ना अल्लाह को, ना तो ईशू को और ना ही उनकी तरह के किसी और चीजों को। मगर जो मानते हैं, मैं उनकी भावनाओं का पूरा सम्मान भी करता हूं। मैं कभी उनसे ये अपेक्षा नहीं करता हूं कि वो भी मेरी तरह सोचने लगें। मेरा सोचना है कि जब तक आपको किसी से कोई व्यक्तिगत परेशानी ना हो तब-तक आप किसी को कोई भी त्योहार मनाने से क्यों रोकें? चाहे वो नया वर्ष हो, या वेलेंटाईन डे हो, या रोस डे या फिर कुछ और ही क्यों ना। इस तरह के दिवस और भारतीयता में कोई संबंध नहीं है, हां अगर कोई इस तरह के दिवस मना कर ये सोचता है कि जो इस तरह के दिवस नहीं मनाते हैं वो छोटे हैं तो उनकी यही मानसिकता बहुत कुछ कह जाती है।

खैर आज के इस शुभ पावन अवसर पर मैं भी क्या लेकर बैठ गया। आज तो मुझे याद करना चाहिये था अपने उन दोस्तों को जिनके घर पर बैठकर हम सारे दोस्त "जिंगल बेल" गाते थे। उनकी मां के हाथ का बना हुआ केक खाते थे। और जिंगल बेल के बाद शिक्स स्ट्रिंग (गिटार) पर कुछ ब्रायन एडम्स और कर्लोस संटाना के गीत को अपनी आवाजों से सजाते थे। हमलोगों का सबसे पसंदिदा गीत "Summer of 69" हुआ करता था। अगर आपने नहीं सुना है तो मैं आपसे कहूंगा कि आप इसे एक बार जरूर सुने, आप इसे सुनकर अपने पूराने दिनों में जरूर लौट जायेंगे।

summer of 69.mp3


"Merry Chrismas"

Sunday, December 23, 2007

औरकुट प्रोफाइल अब गूगल पर भी

अब आप किसी का औरकुट प्रोफाइल गूगल पर भी देख सकते हैं. इसके लिए आपको कुछ और नहीं बस अपने औरकुट के सेटिंग में जाकर "show my orkut information when my orkut friends search for me on Google.com" को आन करना परेगा. वरना आपको गूगल पर कोई सर्च नहीं कर सकेगा.



ये ख़बर मुझे आज अपने एक मित्र के ब्लौग पर पढने को मिला और आप लोगों की जानकारी के लिए मेरे ब्लौग शुरू करने के पीछे मेरा प्रेरणा श्रोत वही मित्र है. पूरी जानकारी के लिए आप उनके ब्लौग पर जाएं. मेरे मित्र का नाम रूपेश मंडल है और उनके ब्लौग पर जाने के लिए आप यहाँ चटखा दबाएँ.

मगर अभी भी एक परेशानी है, अगर आप कोई अपने नाम के जगह पर ASCII Character या कुछ और इस्तेमाल में ला रहें हैं तो आपको कोई सर्च नहीं कर पाएगा. अब ये आपके ऊपर है की आप क्या चाहते हैं? गूगल पर दिखना या नहीं दिखना.

Friday, December 21, 2007

ब्लौगवाणी हैक हो सकता है

मेरे इस पोस्ट का ये अर्थ कदापि नहीं है कि मैं ब्लौगवाणी को हैक करना चाहता हूं, मैं तो बस इतना चाहता हूं की ब्लौगवाणी अपनी तकनीकी खामियों को सुधारे वरना वो दिन दूर नहीं है जब आपको सुनने को मिलेगा कि प्रसिद्ध एग्रीगेटर साइट ब्लौगवाणी हैक हो गया है।

आप इस चित्र पर ध्यान दें जो मुझे तब मिला जब मैंने ये देखना चाहा कि पिछले 30 दिनों में सबसे ज्यादा पढे जाने वाला पोस्ट कौन-कौन सा है। (अब भाई लोग, उसमें मेरे जैसा छोटा-मोटा चिट्ठाकार का भी 2-3 पोस्ट शुरू के 30-40 में आज-कल दिख रहा है तो देख-देख कर खुश हो लेता हूं :D ।)





इस तरह का ERROR साधारणतया ASP.NET से कि गई प्रोग्रामिंग पर ही आता है। इस चित्र में web.config फ़ाइल के अन्दर का कुछ हिस्सा दिख रहा है, जिसमें साइट से संबंधित बहुत सी गुप्त जानकारियां होती है। इस ERROR PAGE में जो महत्वपूर्ण गुप्त जानकारी है मैंने उसे लाल रंग से घेर रखा है। मुझे पहले भी ब्लौगवाणी में इस तरह का ERROR मिल चुका है जिसमें web.config फ़ाइल का हिस्सा दिखता रहता है।

इसका उपाय कोई नवसिखुआ प्रोग्रामर भी बता सकता है और वो ये की वहां पर Exception Handle करके अपना मनचाहा संदेश प्रेषित कर दिया जाये।


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मैं जब ये पोस्ट लिखने के बाद पोस्ट करने जा रहा था तो मैंने एक बार कंफर्म करने के लिये फिर से ब्लौगवाणी को खोला जिसमें मुझे फिर से एक नया ERROR MESSAGE मिला। शायद उसमें कुछ और ही समस्या है या फिर उसमें कुछ बदलाव के लिये काम चल रहा है। खैर जो भी हो, मैं यही उम्मीद करता हूं कि ये जल्दी से जल्दी ठीक हो जाये।

इंटरनेट और बढती दूरियां

मुझे आज भी वो दिन याद है जब मेरे पापाजी की घड़ी का समय कुछ आगे-पीछे हो जाता था तो वो बीबीसी के समाचार सेवा का लाभ उठा कर अपनी घड़ी का समय मिलाते थे। फिर वो दिन भी आया जब घर में बुद्धु बक्से का आगमन हो गया और दूरदर्शन के समाचार सेवा का लाभ उठाया जाने लगा।

पर अब तो जमाना है गूगल देव का। मैं हर दिन सुबह-सुबह नेट पर बैठते ही सबसे पहले गूगल महाराज का आशीर्वाद लेता हूं और उस पर सर्च करता हूं "Indian Time" और मुझे बिलकुल सही समय मिल जाता है। और ऐसा बस मैं ही नहीं करता हूं, मेरे साथ बैठ कर काम करने वाले मेरे कई मित्र भी यही करते हैं।

फिर दूसरा कदम होता है Sametime और Lotus Notes पर Login करके अपने ठीक बगल में बैठने वाले अपने मित्र को गुड मार्निंग बोलने का। जबकि वो मेरे इतना पास बैठता है कि मैं बस अपनी कुर्सी को घुमा कर फ़ुसफ़ुसा कर भी उसे कुछ कहूं तो वो उसे सुन सकता है। अगर मैं उससे पहले पहूंच गया हूं तो ये काम उसका होता है। अब जैसे आज जो हमारे बीच कुछ बाते हुई हैं उसका ब्योरा मैं यहां दे रहा हूं।

Sherin Iranimosh : hi, gm..
Prashant Priyadarshi : gm.. hru? wats up there?
Sherin Iranimosh : f9 buddy.. nothin much more.. wat bout u?
Prashant Priyadarshi : same here.. :) wat we have to do today?
Sherin Iranimosh : i don't know, lets check it with our PL.. ping him and let me know..
Prashant Priyadarshi : sure yar.. ok then bfn..


ठीक इसी तरह दोपहर के भोजन के समय हम फिर से बाते करते हैं, और उस समय हमारी बातें कुछ ऐसे होती है।

Prashant Priyadarshi : lunchhh???????
Sherin Iranimosh : after 10 minutes..
Prashant Priyadarshi : ok.. i'll wait..


अब आपके क्या विचार हैं इस नेट सभ्यता पर? आप लोग भी अपनी कुछ यादों को जीवंत करते हुये बतायें कि आप अपने नौकरी के शुरुवाती दिनों में अपने साथी का कैसे अभिवादन करते थे।

Wednesday, December 19, 2007

मैं, मौसी, बसंती और चंदन

मौसी : अरे बेटा बस इतना समझ लो कि घर में जवान बेटी सिने पर पत्थर कि शील की तरह होती है, बसंती का ब्याह हो जाये तो चैन कि सांस लूं।

मैं : हां, सच कहा मौसी आपने, बड़ा बोझ है आप पर।

मौसी : लेकिन बेटा इस बोझ को कोई कुंवे में तो फेंक नहीं देता। बुरा नहीं मानना, इतना तो पूछना ही पड़ता है कि लड़के का खानदान क्या है? उसके लक्षण कैसे हैं? कमाता कितना है?

मैं : कमाने का तो ये है मौसी कि एक बार बीबी-बच्चो की जिम्मेवारी सर पे आ गई तो विद्यार्थी का काम छोड़ कर नौकरी पेशा भी हो ही जायेगा और कमाने भी लगेगा।

मौसी : हें! तो क्या अभी कुछ भी नहीं कमाता?

मैं : नहीं-नहीं ये मैने कब कहा मौसी। कमाता है लेकिन, अब रोज-रोज तो छात्रवृति का इनाम नहीं जीत सकता है ना? साल में एक ही बार तो मिलता है।

मौसी : हें !! एक ही बार मिलता है?

मैं : हां, मौसी, ये कम्बख्त कंप्यूटर चीज ही ऐसी है, अब मैं VIT में टाप करने के बारे में क्या कहूं।

मौसी : हें, राम-राम !!! तो क्या वो VIT में पढता है?

मैं : छी! छी! छी! मौसी, वो और पढता है?? ना ना, वो तो बहुत अच्छा और नेक लड़का है। लेकिन मौसी, एक बार कोई सुंदर क्लासमेट मिल जाये ना फिर अच्छे-बुरे का कहां होश रहता है। हाथ पकड़कर बैठा लिया किसी कन्या ने पढने के लिये। अब इसमें बेचारे चंदन का क्या दोष।

मौसी : ठीक कहते हो बेटा, VITian वो, क्लास टापर वो, लेकिन उसका कोई दोष नहीं है।

मैं : मौसी आप तो मेरे दोस्त को गलत समझ रही हैं, वो तो इतना सीधा और भोला है, अरे बसंती से उसकी शादी करके तो देखिये। ये स्टुडेंट गिरी और क्लास में टाप करने कि आदत, सब खत्म हो जायेगा।

मौसी : अरे बेटा, मुझ बुढिया को समझा रहे हो?? ये पढने कि और क्लास में टाप करने की आदत किसी की छुटी है आज तक?

मैं : मौसी, आप चंदन को नहीं जानती। विश्वास कीजिये वो इस तरह का लड़का नहीं है। एक बार शादी हो गयी तो उस बैंगलोर वाली से चैट करना भी बंद कर देगा, बस चैटिंग की आदत अपने आप छूट जायेगी।

मौसी : हाये हाये !!! बस यही एक कमी रह गयी ती? वो क्या किसी बैंगलोर वाली से चैट भी करता है?

मैं : तो इस में कौन सी बुरी बात है मौसी? अरे, चैटिंग-सैटिंग तो राजा-महाराजा, उंचे-उंचे खानदान के लोग करते हैं।

मौसी : अच्छा!! तो बेटा ये भी बताते जाओ की तुम्हारा ये गुणवान दोस्त किस शहर में पढता है?

मैं : बस मौसी, VIT Vellore का पता मिलते ही हम आपको खबर कर देंगे।

मौसी : एक बात की दाद दूंगी बेटा, भले सौ बुराइयाँ हैं तुम्हारे दोस्त में, फिर भी तुम्हारे मूंह से उसके लिये तारीफ ही निकलती है।

मैं : हा हा (हल्का मुस्कुराते हुये), क्या करूं मौसी, मेरा तो दिल ही कुछ ऐसा है।



ये सारी चीजें मैंने चंदन के लिये तब लिखी थी जब मैं कालेज में था और इसे लिखने का प्रेरणा श्रोत और्कुट था। आज चंदन छात्रवृति नहीं पा रहा है, बल्कि नौकरी कर रहा है और वो भी एक अच्छे कंपनी में। पैसा भी अच्छा कमा रहा है, मगर बेचारे को बसंती अभी तक नहीं मिली है। इसके पास काम से इतना समय भी नहीं रहता है कि ये किसी से भी चैट कर सके, मगर फिर भी मौसी का दिल नहीं पसीजता। अब आप लोग् ही मौसी से आग्रह करें, शायद आपकी दुआ ही रंग ला दे। :)


esnips से करें mp3/wma फाइल डाउनलोड

ज्ञानजी की टिप्पणी पढकर मैंने सोचा कि क्यों ना पहले यही पोस्ट पोस्ट किया जाये। तो चलिये मैं आपको बताता हूं कि esnips से MP3/WMA फ़ाइल कैसे डाउनलोड करते हैं।

सबसे पहले मैं आपको बताना चाहूंगा कि ये विधि IE(Internet Explorer) वालों के लिये नहीं है, ये FIREEFOX वालों के लिये है। मगर ये बहुत बड़ी परेशानी कि बात नहीं है, FIREFOX को आप यहां से डाउनलोड कर सकते हैं :

http://www.mozilla.com/en-US/firefox/

सबसे पहले तो आप www.esnips.com पर अपना रजिस्ट्रेसन करा लें ये फ्री में उपलब्ध है, अगर नहीं करेंगे तो कुछ परेशानी आ सकती है, और LOGIN कर लें। अब मान लें कि आप www.esnips.com पर मरहूम नुसरत फ़तेह अली खान का अंखियां नु चैन ना आवे सुन रहें है तो उसका URL कुछ ऐसा होगा :

http://www.esnips.com/doc/c550cf4e-16c4-4c4a-b1a9-b89d1452f61b/NFAK---Akhian-Nu-Chain-Na-Aave

अब एक काम करें इस पते में से हरे रंग वाले भाग को मिटा दें फिर आपके पास बचेगा :

http://www.esnips.com/doc/c550cf4e-16c4-4c4a-b1a9-b89d1452f61b/

अब लाल रंग वाले हिस्सा जो doc है उसे बदल कर nsdoc कर दें। और फिर आपको ये URL पता मिलेगा :

http://www.esnips.com/nsdoc/c550cf4e-16c4-4c4a-b1a9-b89d1452f61b/

अब बस इंटर मारने भर की देरी है और आपका मनपसंद गाना डाउनलोड के लिये तैयार मिलेगा। आप बस इसे SAVE ON DISK पर सेलेक्ट कर लें।

अगली कड़ी में गूगल विडियो से डाउनलोड। धन्यवाद..

Tuesday, December 18, 2007

YOUTUBE से विडियो डाउनलोड हुआ आसान

आप अकसर youtube पर विडियो देखते होंगे और आप हमेशा ये सोचते होंगे कि काश इन्हें हम डाउनलोड कर पाते। मगर ये समझ में नहीं आता होगा कि इसे डाउनलोड करें तो कैसे करें क्योंकि वहां तो कोई लिंक रहता ही नहीं है डोउनलोड करने के लिये।

आपकी समस्या का समाधान लेकर मैं आ गया हूं।

आप जब भी www.youtube.com पर कोई विडियो देखते होंगे तो उस समय जो भी पता आपको अड्रेस बार में दिखे बस उसके आगे आपको kiss जोड़ देना है और फिर आपको उसे डाउनलोड करने का लिंक दिख जायेगा।

उदाहरण के तौर पर मान लिजीये कि आप मेरे द्वारा किया हुआ ट्रेकिंग वाल विडियो देख रहें हैं जिसका लिंक नीचे है :

www.youtube.com/watch?v=mkcCn8G5BPU

आप इसके आगे बस kiss जोड़ दें। जैसे :

www.kissyoutube.com/watch?v=mkcCn8G5BPU

बस आपको एक डाउनलोड करने का लिंक दिख जायेगा और आप उसे वहां से डाउनलोड कर लें।

मगर अभी भी एक समस्या का सामना आपको करना परेगा। वो ये कि इस विडियो फ़ाइल का EXTENSION कुछ भी नहीं होगा, जिसे आपको बदल कर .FLV करना होगा।

जैसे, मान लिजीये आपने abc नाम से डाउनलोड किये हुये फ़ाइल को सेव किया है, तो आपको इसे बदल कर abc.flv करना होगा।

"FLV का पूरा नाम फ़्लैश विडियो होता है।"

इस फ़ाइल को चलाने के लिये या तो आपको कोडेक्स इंस्टाल करना होगा या फिर कोई साफ़्टवेयर डाउनलोड करना होगा। आप इस फ़ाइल को चलाने के लिये यहां से साफ़्टवेयर डाउन्लोड कर सकते हैं।

http://www.download.com/3000-2139_4-10769546.html

मैं कल फिर आउंगा ये लेकर कि गूगल विडियो कैसे डाउनलोड करते हैं। अगर आप कोई और साइट से विडियो देखते हैं और यही समस्या आपके साथ है तो कृपया उस साइट का नाम बतायें, मैं यथासंभव आपकी मदद करने की प्रयत्न करूंगा। धन्यवाद..

Monday, December 17, 2007

दैनिक मजदूर और कम्प्यूटर इंजिनियर

जमाने पहले की बात है...बगल के घर कि सिढी ढलने वाली थी..Uncle ने कहा की उनके बेटे के साथ जा कर Station के पास से कुछ मजदूर ले आऊँ...

मैनें पुछा "किसी को भी कैसे रख सकते हैं? किसी को भी कैसे ले आऊँ? कितने मजदूर ले आऊँ?"

Uncle ने समझाते हुए कहा.. "1 राजमिस्त्री ले लेना..2-3 कारीगर और 4-5 मजदूर ले लेना.."

मैने पुछा "ऐसा क्यों?"



ये लेख मेरे एक मित्र ने लिखा है अपने ब्लौग पर और वो भी बहुत ही आकर्षक ढंग से। अब चूंकि वो अभी चिट्ठाकारों कि दुनिया में नये हैं और किसी अग्रीगेटर से भी नहीं जुड़े हैं सो उनके चिट्ठे तक पहूंच बहुत कम लोगों की है। पूरा लेख पढने के लिये इनके चिट्ठे पर जायें, इनके चिट्ठे पर जाने के लिये यहां खटका दबायें और इस नवोदित चिट्ठाकार को बधाईयां भी देते जायें।

Thursday, December 13, 2007

अविनाश जी और उनका सामंती भोजन

आज हिंदी ब्लौगिये संसार में अविनाश जी को लगभग सभी जानते हैं, सो मैं उनका परिचय दिये बगैर सीधे अपनी बातों पर आता हूं।

अभी का तो मुझे पता नहीं है कि कितने लोग उन्हें 'लौटकर अविनाश' के नाम से जानते हैं पर बात उन दिनों की है जब अविनाश जी कि पहचान 'लौटकर अविनाश' के नाम से होती थी। और हम बच्चे उन्हें प्यार से मुन्ना भैया कह कर बुलाते थे और आज भी बुलाते हैं।

एक परंपरागत पत्रकार कि तरह खादी का झोला कंधे पर लटकाये, खादी का कुर्ता जिंस पर चढाये हुये, पैरों में कोई सा भी एक सादा सा चप्पल डाले हुये, दुबला-पतला छड़हरा सा बदन, चेहरे पर हमेशा बढी हुई दाढियां मानों अभी-अभी किसी के कैद से छूटकर भागे हुये हों। वे जब भी हमारे घर आते थे तो उनका हुलिया ऐसा ही होता था।

उन दिनों घर में जब कभी भी पर्व-त्योहार या कोई उत्सव होता था और मुन्ना भैया पटना में होते थे तो उनका आना अनिवार्य होता था। पर भैया के आने का कोई समय नहीं होता था। साधारनतया वो रात के 10 बजे के बाद ही आते थे, और मैं उन्हें कभी-कभी निशाचर कह कर चिढाया भी करता था।

अब घर में कोई उत्सव हो या किसी का जन्मदिन हो तो कई बार खाने में "पलाव" भी बनता था, जो मुन्ना भैया को पसंद नहीं था। जब भी ऐसी स्तिथि का सामना उन्हें करना परता था तो वो सीधे-सीधे कभी नहीं कहते थे कि उन्हें पलाव पसंद नहीं है, वो बोलते करते थे की "ये सामंती भोजन है, मैं सामंती भोजन नहीं खाता हूं"। और जब बात जन्मदिन का केक खाने कि होती थी तो मुन्ना भैया केक को बड़े चाव से खाते थे। हमलोग जब उनको चिढाते हुये पूछते थे कि क्या केक सामंती भोजन ना होकर जन-साधारण का भोजन है? तो उनका उत्तर होता था कि नही केक सामंती भोजन नहीं है। इसका कारण पूछने पर वो अपना तर्क(तर्क या कुतर्क जो भी कह लें :)) देते थे कि, "पलाव इसलिये सामंती भोजन है क्योंकि जब पलाव भारत में प्रचलन में मुगलों के साथ आया था तब भारत में सामंती व्यवस्था का बोल-बाला था, पर जब केक भारत में प्रचलन में आया तब तक भारत आजाद हो चुका था और सामंती व्यवस्था खत्म हो चुकी थी।"

अब आप ही कहिये आपके क्या विचार हैं इस तर्क(कुतर्क) पर? :D



मुन्ना भैया अपनी बिटिया के साथ

Monday, December 10, 2007

मानवाधिकार दिवस और मेरी दीदी

आज 10 दिसम्बर है, आज मानवाधिकार दिवस है, आज मेरी दीदी का जन्मदिन है। अब चूंकि आज मानवाधिकार दिवस के दिन मेरी दीदी का जन्म हुआ है तो ये स्वभाविक है की जब भी अपने अधिकारों को लेकर दीदी कुछ कहती तो बस हम दोनों छोटे भाई चिढाना चालू कर देते कि मानवाधिकार दिवस के दिन पैदा हुई है सो हर समय उसी की बातें करती रहती है।

बात उन दिनों कि है जब भैया अपनी पढाई के लिये घर से बाहर निकल गये थे, पापाजी भी पटना से बाहर पदस्थापित थे और घर में बस मम्मी, दीदी और मैं था। दीदी को हर दिन मैं मैनेजमेंट क्लास के लिये छोड़ने जाता था और घर लौटने पर एक दूसरे को घंटो बैठ कर अपने-अपने कालेज के किस्से सुनाते थे। दीदी को कालेज छोड़ने का मेरा यह क्रम लगातार दो सालों तक चलता रहा, चाहे कितनी भी ठंड हो या वर्षा हो रही हो, या फिर हम दोनों के बीच झगड़ा ही हुआ हो। मगर मेरा यह क्रम कभी भी नहीं टूटा।

किसी भी समझदार परिवार की तरह मेरे घर में भी दीदी की इच्छाओं का सबसे ज्यादा ख्याल रखा जाता था और जब तक हम दोनों भाई छोटे थे तब तक हम दोनो ही इससे बहुत ज्यादा चिढते थे। और उस पर भी कभी-कभी जब दीदी महिला अधिकारों की बाते करती थी तो लगता था की पुरूष अधिकार की रक्षा संबंधी कोई संघटन क्यों नहीं बनाया जाता है। :)

दीदी के भीतर बौद्धिक क्षमता कूट-कूट कर भरी हुई है। उनमें तार्किक शक्ति और बौद्धिक क्षमता का सामंजस्य अद्भुत है।

मैं कभी भी पाप-पून्य और भूत-भगवान को नहीं माना हूं, पर मुझे लगता है कि मैं सच में बहुत नसीब वाला हूं जो मुझे ऐसी दीदी मिली। दीदी मुझसे 3 साल बड़ी है और जब मैं छोटा था तब हमारे बीच जब कभी भी झगड़ा होता था तो मैं दीदी को बहुत मारता भी था। पर दीदी उस समय भी, जब उनमें शारीरिक शक्ति मुझसे बहुत ज्यादा थी, कभी मुझपर हाथ तक नहीं उठाया। उल्टा जब दीदी को रोता देख कर पापाजी मुझे मारने आते थे तब मुझे उनसे मुझे बचाती ही थी।

आज दीदी जयपूर में मेरे जीजाजी और मेरी दो भांजीयों के सथ रह रही है। और उनका गृहस्थ जीवन बहुत सुखी है। और मैं इतनी दूर हूं उनसे की वहां जाने का सोचने के लिये भी दो महिने पहले से ही योजना बनानी पड़ती है।

मैं इस चिट्ठे से अपनी दीदी को बस इतना ही कहना चाहूंगा कि, "दीदी, आप मेरा मार्गदर्शन हमेशा करते रहना। जब भी मैं कहीं भटकने लगूं तो मुझे सही राह दिखाना। और अगर अगले जन्म जैसी कोई चीज भी होती है तो हर जन्म में मेरी दीदी बन कर मुझपर अपनी ममता बिखेरते रहना।"



सन् 2002 का पटना संजय गांधी जैविक उद्यान में लिया गया चित्र.. जिसमें पापा, मम्मी, दीदी और मैं हूं..

Sunday, December 09, 2007

जिंदगी किसी के बिना रूकती नहीं

अक्सर यादें आया करती थी,
यादों में एक चेहरा था..
चेहरे पे एक मासूमियत,
और उस मासूमियत में थी मेरी जिंदगी..
आज ना वो यदें हैं,
ना ही वो चेहरा,
और ना ही वो मासूमियत..
ऐसा लगता है जैसे वो मासूमियत,
कहीं गुम हो गई हो,
जीवन के इस वस्तविकता में..

उस मासूमियत को,
तलाशता फिर रहा हूं हर जगह..
पर वि इन प्लस्टिक के चेहरों में,
कहीं गुम सी नजर आती है..
पर जिंदगी किसी के बिना रूकती नहीं,
वो तो निर्बाध गति से चलती जाती है..

Wednesday, December 05, 2007

आज भी फिरंगियों की गुलामी में इंडिया

कल मैं अपने एक मित्र को छोड़ने चेन्नई हवाई अड्डे गया था। मैं अपने मित्रों से थोड़ा पहले ही पहूंच गया था सो मुझे थोड़ा समय मिल गया और मैं उस समय को वहां के लोगों के हाव-भाव को पढने में खर्च करने लग गया। थोड़ी देर इधर-उधर देखने पर मैंने पाया की एक विदेशी महिला और एक विदेशी पुरूष हवाई अड्डे के प्रांगण में सुट्टे पर सुट्टा उड़ाये जा रहें हैं और बगल में ही स्पष्ट रूप से एक चेतावनी लिखी हुई थी, "NO SMOKING ZONE." लेकिन वे दोनों ही इस चेतावनी से बेमतलब-बेपरवाह अपना काम किये जा रहे थे। सुरक्षाकर्मी भी वहां से गुजरते हुये उन्हें नजर-अंदाज किये जा रहे थे। और उस समय मैं सोच रहा था कि इनके जगह पर मैं या कोई अन्य भारतीय नागरीक यहां धूम्रपान करता होता तो अभी तक यहां बवाल मच चुका होता।

वहीं पर मैंने एक और बात देखी। मैं वहां अपने जिस मित्र को छोड़ने के लिये गया हुआ था वो इधर कुछ दिनों से बीमार चल रही थी और इसी वजह से उसका चेहरा बुझा हुआ था और उसने लगभग मुड़े-सुड़े वस्त्र पहन रखे थे। जब वो सुरक्षा जांच से गुजर रही थी तब सुरक्षा कर्मी उसे ऐसे देख रहे थे मानो उसके लिये वहां कोई जगह ही ना हो क्योंकि उसे उस समय देखकर ऐसा नहीं लग रहा था की उसकी माली हालत हवाई यात्रा करने के लायक है। ये देखकर तो यही महसूस हुआ कि आदमी की पहचान बस उसके कपड़ों से ही होती है।



चेन्नई हवाई अड्डा गूगल से

इन सब चीजों को देखकर मैंने यही सोचा कि भारत का तो पता नहीं पर इंडिया अभी भी फिरंगियों के हाथों गुलाम है।

Sunday, December 02, 2007

चेन्नई के हिंदी ब्लौगरों सावधान


मैं पिछले 2-3 दिनों से अनीता जी के ब्लौग में ब्लौगर मीट के बारे में पढ रहा था तो बरबस ही ये विचार आया की चेन्नई से कितने लोग हैं जो हिंदी में ब्लौग लिखते-पढते हैं। और अगर कोई है तो क्यों ना हम भी एक चेन्नई ब्लौगर मीट करें? बस उसी सोच ने मुझे ये पोस्ट लिखने को प्रेरित किया।
तो कृपया जो भी हिंदी चिट्ठा जगत के ब्लौगर चेन्नई से हैं वो मुझे इस पोस्ट में टिपियाये या फिर मुझसे इस पते पर संपर्क करें।

prashant7aug@gmail.com

और जो चेन्नई से बाहर के ब्लौगर हैं वो मुझे मेरे विचारों को नये आयम देने के लिये अपनी सलाह दें।

धन्यवाद।

Monday, November 26, 2007

मेरे मित्र का प्रणय निवेदन

"यार! ये प्राणाय क्या होता है?", शिवेन्द्र ने चीख कर पूछा।

"क्या? मैं कुछ समझा नहीं", मैंने रसोई में रोटीयां सेकते हुये चिल्ला कर पूछा साथ में रोटीयां बेलते हुये विकास ने भी पूछा।

"प्राणाय? प्राणाय?"

"पूरी बात बताओ तब समझ में आयेगा।"

"यहां लिखा हुआ है यह एक प्रणय कथा है--नहीं, नहीं!"

"अबे प्रणय कथा का मतलब लव स्टोरी होता है, हिंदी में कहो तो प्रेम कथा", मैंने कहा।

"और ये प्राणाय नहीं, प्रणय होता है", पीछे से विकास ने भी आवाज लगायी।

"मुझे कुछ-कुछ याद आ रहा है कि बचपन में हम अप्लिकेशन(आवेदन) लिखते थे की प्रणय निवेदन है कि.....", शिवेन्द्र ने कहा।

और उसके बाद हमलोगों का ठहाका रोके नहीं रूक रहा था। शिवेन्द्र बेचारा हक्का-बक्का होकर हमें देख रहा था कि उसने ऐसा क्या कह दिया। थोड़ी देर बाद मैंने उसे कहा, "अरे यार प्रणय निवेदन नहीं, सविनय निवेदन।" और फिर उसके चेहरे पर शर्मीली सी हंसी थी। फिर हमने उसे चिढाना चालू किया कि, "तुम अपने प्रिंसिपल को प्रणय निवेदन भेजते थे क्या?"

और फिर हमारे बीच ढेर सारी ब्लाह...ब्लाह...ब्लाह...ब्लाह...

हुआ ये था कि शिवेन्द्र ने मेरे और विकास के मुंह से ययाति की बड़ाई सुन कर उसे पढने के लिये उठाया था और उसके पहले पन्ने पर ही प्रणय शब्द पढकर उलझन में पर गया था। ये बात और है कि वो अभी भी उस पुस्तक को लेकर मैदान में डटा हुआ है। आप कृपया उसका उत्साह कमेंटस के द्वारा बढाये ताकि हिंदी पाठकों कि संख्या एक और बढे। धन्यवाद। :)

Friday, November 23, 2007

एक अजनबी सी मुलाकात, एक अजनबी से मुलाकात

मैंने वंदना को फोन किया और पूछा कहां हो तुम, उसने कहा कि 10 मिनट में आती हूं। उस समय सुबह के 10 बजकर 15मिनट हो रहे थे। हमने 10 बजे मिलने का समय तय किया था पर मैं 15 मिनट देर् से पहूंचा था और वंदना, जिसे मैंने पहले बता दिया था कि मैं 15 मिनट देर से आऊंगा, जो मुझपर पहले देर से आने के कारण गुस्सा हो रही थी वो मुझे फोन करके और 10-15 मिनट मांग रही थी। मैंने उसे आने को कहा और तब तक के लिये अपने मोबाईल पर अपनी पसंद के गानों को सुनने लगा। थोड़ि देर तक मैं 'द ग्रेट इंडिया मौल' के सामने वाले हिस्से में बैठा रहा और फिर सड़क वाले हिस्से में चला गया। लगभग 10:25 के आस-पास मुझे लगा कि कोई मुझे देख रहा है। ये मानव स्वभाव होता है कि जब कोई उसे एकटक देखता रहता है तो उसे इस बात कि अनुभूती हो जाती है। मैंने तेजी से अपनी नजर उधर डाल कर उसी तेजी से हटा भी लिया, मैंने पाया की कोई लड़की मुझे लगातार देखे जा रही है। मैं समझ गया कि वंदना ही है पर फिर भी मैंने ऐसे दिखाया कि मैंने उसे नहीं देखा। मैं उसे पूरा मौका देना चाहता था मुझे अचम्भित करने के लिये, क्योंकि मुझे पता है कि किसी को भी अचंभे में डालने पर हर किसी को प्रसन्नता का अनुभव होता है और मैं वही खुशी उसके चेहरे पर भी देखना चाहता था।



नोयडा मे ग्रेट इंडिया मॉल के सामने वाला मॉल


लगभग 2 मिनट के बाद मैंने देखा की वो आकृति मेरी ओर आ रही है तो मैंने पीछे मुड़ कर देखा और वंदना को देखकर मुस्कुराया। जब वो पास आयी तो पता नहीं मैं क्या सोच रहा था और पहले अभिनंदन करने का मौका उसे मिल गया। वो आसमानी रंग के सल्वार-समीज में आयी थी, चेहरे पर कोई मेक-अप नहीं था, चेहरे पर अंडाकार वाला चश्मा और बाल खुले हुये थे। मुझे अच्छा लगा, क्योंकि जब भी आप किसी ऐसे से मिलते हैं जिसके विचार आपसे मिलते हों तो उनसे मिलकर प्रसन्नता का अनुभव होना स्वभाविक ही है, क्योंकि मैं भी कोई कास्मेटिक प्रयोग में नहीं लाता हूं यहां तक की आफ्टर सेव लोशन भी नहीं रखता हूं। मिलने के बाद हाथ मिलाते हुये उसने कई बातें पूछी, जैसे शादी कैसी रही, अभी तक की यात्रा कैसी रही, इत्यादि। इधर-उधर की बातों से गुजरते हुये उसने मुझसे पूछा "आप तो मुझे गालियां दे रहे होंगे, मैं देर से जो आयी?" और मैंने अपने प्राकृतिक ढंग से उत्तर दिया "हां" और ये हमारे कालेज के दोस्तों के बीच बहुत सामान्य सा है, पर शायद उसे पहली मुलाकात में इसकी उम्मीद नहीं थी। शायद उसे इस तरह के उत्तर की आशा नहीं थी और ये भाव उसके चेहरे पर साफ झलक रहा था। फिर मैंने अपने उत्तर पर थोड़ी सी लीपा-पोती की, और उसने भी शायद मेरा साथ देने के लिये उस बात को वहीं छोड़ दिया। मैं जाने से पहले सोच रहा था की मैं कुछ भी उपहार लेकर नहीं जा रहा हूं और सच्चाई यही थी की वास्तव में मुझे उतना समय मिला भी नहीं था कि मैं उसके लिये कुछ ले पाता, पर वंदना नहीं भूली और मेरे लिये मेरी पसंदीदा मिठाई काजू की बर्फी लेती आई थी।

एक परिचयः


वंदना जी से मेरी मित्रता और्कुट के माध्यम से पिछले साल दिसम्बर में हुई थी। उस समय मैं दीदी के घर जयपूर गया हुआ था। उसके बाद कभी हमारी बातें हुई तो कभी नहीं हुई और हमारी मित्रता का स्वरूप बस किसी भी आम नेट फ़्रेंड तक ही था। धीरे-धीरे उसमे कब प्रगाढता आती चली गई इसका मुझे पता ही नहीं चला। आज ये चिट्ठा लिखते समय ना जाने क्यों अनायास ही मुझे वो बात याद आ गयी जब मैं जून में चेन्नई आया था और ट्रेनिंग में था और एक झेलाऊ लेक्चर में मैंने उनसे लगभग 2-3 घंटे चैट किया था। उसकी लम्बाई लगभग 590 पंक्तियां थी। मैंने अभी तक इनको जितना समझा है उस आधार पर ये तो जरूर कह सकता हूं कि ये स्वभाव से बहुत ही संवेदनशील हैं और विनोदिता में तो इनकी कोई सानी नहीं है। इनकी संवेदनशीलता का अंदाजा आप इनके चिट्ठे पर इनकी कविताओं से लगा सकते हैं। मैं इनका परिचय यहीं खत्म करता हूं क्योंकि अगर मैं इनके बारे में लिखता रहा तो मेरा चिट्ठा भी शायद पूरा ना पड़े।

मैंने उस समय से पहले ये तो जानता था कि वंदना जी हर चीज पर बहुत ही सूक्ष्म दृष्टि डालती हैं इसे प्रत्यक्षतः अपनी आंखो से उस दिन देख भी लिया। और बाद में मुझे पता चला कि मैंने जो भी देखा वो 10% भी नहीं था। मैं क्या कर रहा हूं, मैं क्या पढ रहा हूं, मैं क्या देख रहा हूं। हर चीज पर सूक्ष्म दृष्टि।



मुझे कभी ये सोचकर आश्चर्य भी होता है की कई चीजों के बारे में हमारे विचार इतना ज्यादा मेल क्यों खाते हैं जिसे हम अक्सर हंसी-मजाक में कहते हैं कि "फ़्रिक्वेंसी मैच" करना। जैसे इन्हें भी मौल संस्कृति पसंद नहीं है और मुझे भी उससे ज्यादा लगाव नहीं है, ये बात और है कि हमारी पहली मुलाकात नोयडा के एक शौपिंग मौल में हुई। ये भी नेट का कीड़ा हैं और मैं भी। अंकों को याद रखने में इनकी कोई सानी नहीं है और मुझे भी अंक बहुत याद रहते हैं। सबसे बड़ी बात तो ये है की हमारी दोस्ती औरकुट के जिस कम्यूनिटी में हुई थी उसमें हमारे उम्र के लोगों की दखल कम ही होती है क्योंकि वो बच्चों की कामिक्स वाली कम्यूनिटी है।

समय अपनी पूरी रफ़्तार से भागा जा रहा था, वंदना जी को 12 बजे कार्यालय के लिये निकल लेना था। पर उन्होंने अपने टिम के सदस्यों से बात करके उसे और बढा लिया। हमारे पास इतनी बातें थी कहने के लिये की वो समय भी कम हो गया था। मुझे बाद में वंदना जी ने कहा कि वो सोच रही थी की 12 बजे से पहले ही हमारी मीटिंग खत्म हो जायेगी पर ऐसा हुआ नहीं। मुझे तो जाना था ही और मैं वहां से 1:25 में निकला और पीछे छोड़ गया एक और यादों का सिलसिला। जिसे मैं कभी भूलाना नहीं चाहूंगा।

हम हर दिन पता नहीं कितने लोगों से मिलते हैं पर बहुत ही कम लोग अपने पद-चिन्ह छोड़ जाते हैं। और वंदना के पद-चिन्ह किसी रेत पर नहीं किसी पत्थर जैसी सख्त चीज पर है, जो शायद कभी नहीं मिटेगी।

Tuesday, November 20, 2007

एक क्षण

एक क्षण,
जब कुछ भी आपके लिये मायने नहीं रखता,
एक पल में सब अधूरा लगने लगता है..

ना जिंदगी से प्यार,
ना मौत से भय,
ना सुख का उल्लास,
ना दुख का सूनापन,
ना चोटों से दर्द,
ना सड़कों की गर्द..

निर्वाण की तलाश,
आप करना चाहते हैं,
पर मखौल उड़ाती जिंदगी,
खुद आपको तलाशती फिरती है..

एक क्षण में आपको,
दुनिया बदलती सी लगती है..
पर बदलता कुछ भी नहीं है..
बदलते तो आप हैं,
ये दुनिया आपको,
बदलने पर मजबूर कर देती है..

एक क्षण में,
आप खुद को,
लाचार महसूस करने लगते हैं..
एक क्षण में,
ना जाने क्या कुछ हो जाता है..

एक क्षण..



तस्वीर के लिए गूगल को आभार

Saturday, November 17, 2007

दिपावली कि छुट्टीयां

शुक्रवार का दिन था, मैं आफिस से जल्दी घर लौटना चाह रहा था और अपना सामान ठीक करके जल्दी सो जाना चाह रहा था क्योंकि मुझे अगले दिन दिल्ली के लिये फ्लाईट पकड़नी था। मैं जिस छुट्टी का कई दिनों से इंतजार कर रहा था वो पास आ चुका था। मैंने आफिस से निकलने से पहले विशाल (मेरा रूम मेट और सहकर्मचारी भी) से भी पूछ लिया क्योंकि उसकी भोपाल जाने वाली ट्रेन रात में ही थी और वो भी मेरे साथ घर के लिये हो लिया।

रात में खाना तो जल्दी खा लिया लेकिन वंदना से बाते करते हुये रात के साढे ग्यारह बज ही गये। मैंने उसे बताया की मुझे कल सुबह की फ्लाईट पकड्ड्ढनी है और उसके लिये मुझे सुबह 3:15 में उठना है। उसने मुझे आश्वस्त किया की मैं उठा दूंगी, मैंने मना भी किया की मैं उठ जाऊंगा तुम क्यों परेशान होती हो? लेकिन वो नहीं मानी और ठीक सुबह 3:15 में मुझे फोन करके उठा दिया। शायद ये अच्छा ही हुआ की उसने मेरी बात नहीं मानी क्योंकि मैंने 3 बजे की घंटी लगाई तो थी पर नींद में ही उसे बंद करके फिर सो गया था।

मैंने घर ठीक 4:08 पर छोड़ा और समय पर चेन्नई एयरपोर्ट पहूंच गया। मैंने जब पहली बार हवाई यात्रा की थी तो मुझे बहुत आनंद आया था और ये रोचकता अगले 1-2 और हवाई यात्रा तक बनी रही, पर अब मुझे इस हवाई यात्रा से उब सी होने लगी है। सारे लोग शराफत का चोंगा पहनकर अपने-अपने में सिमटे हुये से लगते हैं। और अगर किसी से कुछ पूछो तो विदेशी भाषा में उत्तर मिलता है, जैसे अगर वो हिंदी में कुछ बोलेंगे तो कहीं कठपूतलियों की ये भीड़ जो प्लास्टिक के मुखौटे ओढे हुये हैं उन्हें गंवार करार न दें। इससे अच्छा तो मुझे ट्रेन के स्लीपर क्लास का डब्बा लगता है। मैं एक तो रात में ठीक से सो नहीं पाया था और दूसरा हवाई जहाज में कोई बातें करने वाला नहीं होता है सो मैंने बैठते ही सोने का निश्चय कर लिया और जब दिल्ली उतरने वाला था तब जाकर उठा। हवाई जहाज से सूर्योदय का समां कुछ निराला ही था और बहुत दिनों बाद सूर्योदय देखने का मौका भी मिला सो मन को बहुत सुकून मिला।



हवाई जहाज से सूर्योदय का चित्र


दिल्ली में भी मेरे मित्र मंडली के कुछ रत्न रहते हैं और उनमें से ही एक है निधि। इनसे मेरी मित्रता नीता के कारण हुआ जो मेरे साथ कालेज में थी और मेरी अच्छी मित्र भी थी और निधि नीता की अच्छी मित्र है। मेरी दिल्ली जाने से पहले उससे बात हुई थी और उसने कहा था की वो मुझे लेने हवाई अड्डे पहूंच जायेगी, पर जब मैं दिल्ली पहूंच कर उसे फोन किया तो पता चला कि वो अभी तक सोयी हुई थी। अब चूंकी वो तत्काल वहां तो पहूंच नहीं सकती थी सो उसने मुझे "इस्को चौक" आने को कहा और रास्ता बताया जो उसके घर के बिलकुल पास में ही था। जब मैं वहां पहूंचा तो वो पहले से मेरा इंतजार कर रही थी। ये हमारी तीसरी मुलाकात थी, और हमारी ज्यादातर बातें नेट पर चैट के द्वारा ही होती आयी थी और कभी-कभी फोन पर भी। सो जब मैं वहां पहूंचा तो कई तरह के पूर्वाग्रहों के साथ था। लेकिन जब निधि से मिला तो सारे पूर्वाग्रह पता नहीं कहां चले गये और बचा रहा तो बस अच्छे दोस्तों कि चुहलबाजियाँ। हमारे बीच एक बहुत पूराना थोड़े से पैसों का हिसाब बाकि था जिसे लेकर मैं अक्सर उसे चिढाता था कि मेरे पैसे कब वापस दोगी, इस बार उसने बहुत प्रयत्न किया उसे वापस करने के लिये पर मैंने मना कर दिया की अगर अभी ये ले लूंगा तो आगे कैसे चिढाऊंगा? :) वहां से जाने से पहले निधि ने पूछा की अगली बार कब मिलोगे, और मैंने उसे चिढाते हुये आश्वासन दिया की तुम्हारी शादी में पार्टी खाने जरूर आऊंगा। फिर उसने मुझे जयपूर जाने वाली बस में बैठा दिया। (यहां मैंने एक बहुत अच्छे से अनुभव को छोटे में ही समेट दिया है, उसके लिये क्षमा चाहूंगा)।



मेरी दोनों भांजियां और मेरी मम्मी


मैं शाम में 7 बजे के करीब जयपूर पहूंचा और वहां उतर गया जहां मेरे पाहूनजी(हम लोग जीजाजी को इसी नाम से बुलाते हैं) ने मेरे लिये एक गाड़ी भिजवा दी थी। मगर यहां भी एक उलझन थी, मैं वाहन चालक को नहीं पहचानता था और वो मुझे नहीं पहचानता था। एक दूसरे को खोजने में ही 8 बज गये, उस समय थोड़ी झल्लाहट भी हुई की अगर मैं औटोरिक्सा किया होता तो अब तक मैं घर पर होता। खैर अंततः मैं घर पहूंच गया और वहां मम्मी, पापा, दीदी और मेरी प्यारी सी भांजी मेरा इंतजार कर रही थी। मेरी भांजी तो सुबह से ही रट लगायी हुई थी की मामू आयेंगे फिर मैकडोनाल्ड जायेंगे। थोड़ा सा मम्मी और दीदी से प्यार भड़ा उलाहना भी सुनना परा की दोस्तों के चक्कर में मम्मी-दीदी को भूल जाता है तभी इतनी देर से आ रहा है। नहीं तो 2-3 घंटे पहले ही आ जाता। फिर हमलोग रात का खाना बाहर खाये और घर आकर सो गये।



जयपूर जाते समय लिया हुआ एक चित्र


मेरी नौ दिनों की छुट्टीयों के कुछ महत्वपूर्ण हिस्सों में से ये हिस्सा यहीं खत्म होता है। अगले हिस्सों और किस्सों के साथ जल्दी ही आऊंगा।

Thursday, November 15, 2007

ययाति

मैं जब घर से चला तो मैंने पापाजी से हमेशा की तरह पूछा, कोई अच्छी किताब मिलेगी क्या? उन्होंने कहा, "उधर रैक पर से कोई सा भी उठा लो"। मेरी नजर सबसे पहले ययाति पर पड़ी और मैंने उसे ही उठा लिया और पापाजी से पूछा कि ये कैसी है, और उनका उत्तर सकारात्मक पा कर मैं उसे लेकर घर से निकल पड़ा। इधर कुछ दिनों से मुझे कुछ भी पढना नहीं भा रहा था, इसका क्या कारण था ये मुझे नहीं पता पर जब मैंने इसे पढना शुरू किया तो मेरे भीतर पढने की पूरानी भूख फिर से जाग उठी और मैंने इसे एक सुर में ही पढ डाला। इस किताब को पढने से और कुछ हुआ हो चाहे ना हुआ हो, पर एक आत्मिक सुख की प्राप्ति तो जरूर हुई। मन कई विचारों में उलझा हुआ था पर इस किताब को पढकर उसे सुलझाने में कुछ मदद मिली।

इसमे एक तरफ तो शर्मिष्ठा का त्याग था जिसके कारण वो ययाति से दूर अपने बच्चे पूरू को लेकर जंगल और पहाड़ों में भटकती रही तो दुसरी तरफ देवयानी का अहंकार, ऐसा अहंकार जिसके आगे वो किसी को कुछ भी नहीं समझती थी।

एक तरफ महाराज नहुश को मौत का भय सता रहा था तो दूसरी तरफ ययाति को मुकुलिका के अधरों का पान करने का नशा था, ययाति का उन्माद था, ययाति का उन्माद भरा विलाश था।

एक तरफ शुक्रचार्य का विनाश करने को तत्पर रहने वाला स्वभाव जो उन्हें हमेशा कठोर तपस्या करने के लिये प्रेरित करता था तो दूसरी तरफ कच का दुनिया को बचाने के लिये हमेशा तत्पर रहते हुये उसी के लिये कठोर तपस्या करते रहना।

एक तरफ देवयानी को नीचा दिखाने और अपनी इच्छा-लालसाओं को पूरा करने की धुन में अपने ही पुत्र से ययाति द्वारा यौवन कि भीख मांगना, तो दूसरी तरफ एक पुत्र का बिना किसी झिझक के अपना यौवन अपने पिता को सौंप देना तो वहीं दूसरे पुत्र का यह सब देख कर वहां से भाग जाना।

राजमहल के उन्माद से लेकर दासियों की करूण स्थिति भी। एक नवयुवक का उत्साह ययाति के रूप में दिखाया गया है जिसमें वो किशोरावस्था में ही अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा लेकर विश्व विजय को निकल पड़े थे। सुख और दुख कि अजीब परिभाषा भी, जिसके अनुसार जो अभी इस क्षण हमारे लिये सुख है वो संभवतया किसी और के लिये दुख का कारण हो। और जिसे हम दुख समझ रहें हैं वो यथार्थ मे किसी और को सुख देता हो। यथार्थ में हमें ये भी पता नहीं होता है की हम सुखी हैं या दुखी।

अंत में कुछ अपने बारे में बताना चाहूंगा, मैं अभी दिपावली में घर(पटना) चला गया था जहां मेरा समय बहुत अच्छे से व्यतीत हुआ और कुछ रोचक किस्से भी बने। उन किस्सों के साथ मैं जल्द ही आपके पास आऊंगा।

Friday, November 02, 2007

यादें तरह-तरह की

कुछ याद करने पर बहुत कुछ याद आता है। यादें अच्छी भी होती हैं और बुरी भी, पर यादें तो यादें होती हैं और उसे अच्छे बुरे का ज्ञान नहीं होता है। पर हां मेरी एक आदत बहुत बुरी है, मैं यादों को संजो कर रखता हूं। मुझसे कई लोग अक्सर कहते हैं, "बुरी यादों को भूल जाने में ही समझदारी होती है।" मैं कुछ कह नहीं पाता हूं डर लगता है की कोई नया तर्क सामने ना आ जाये जिसे पार पाना मेरे बस के बाहर हो। मैं बस सोच कर रह जाता हूं की यादें अच्छी हो या बुरी, हैं तो अपनी ही। तो अच्छी चीजों को याद रखना और बुरी चीजों को भूल जाना, ये कैसी बात हुई?

जब कहीं किसी बच्चे को साइकिल पर स्कूल जाते देखता हूं तो अपनी वो साइकिल याद आती है जिस पर बैठ कर मैंने उसे चलाना सीखा था, अपना वो स्कूल याद आता है जहां मैंने कई अच्छी तो कई गालियाँ भी सीखी। ये बात और है की गालियों को एक प्रवाह में देने का हुनर आज भी नहीं सीख पाया हूं।

जब कभी कहीं अमरूद बिकते देखता हूं तो वे पेड़ याद आते हैं जो हमारे सितामढी वाले घर में था। उन मीठे फलों की याद तो बहुत ही अच्छी है पर उन यादों को कैसे भूल जाऊं जो उन पेड़ों के कटने से तकलीफ पहूंचा गयी थी?

जब किसी छोटे बच्चे को अपनी माँ के साथ लाड़-दुलार करते देखता हूं तो एक अजीब सी सुखद अनुभूती होती है। पर उन दिनों को कैसे भूल जाऊं जब दिल्ली के मुनिरका गांव के एक छोटे से बंद कमरे में बैठ कर माँ को याद करते हुये पहली बार रोया था?

किसी युगल को सबसे छुप कर ठिठोली करते देखना तो अच्छा लगता ही है। पर उस दिन को कैसे भूल जाऊं जब खुद को दुनिया के सामने ठगा हुआ महसूस किया था?

ये सोचना तो अच्छा लगता है जब मैंने BCA की पांचवीं छमाही में अपने विश्विद्यालय में दूसरा स्थान प्राप्त किया था। पर उसे क्यों भूलूं जब मैं इंटर की परिक्षा में अनुत्तीर्ण हुआ था और जिसने जिंदगी के बहुत सारे सबक सिखाये थे?



ये भाग दौड़ की दुनिया कुछ भी सोचने का मौका नहीं देती है, और अगर आप अपने जीवन के पूराने पन्नों को पलटना चाहते हैं तो ऐसा लगता है जैसे ये दुनिया आपसे बहुत आगे निकल गयी है और फिर आप पूरानी चीजों को पीछे छोड़ कर आगे निकलना चाहते हैं। मगर यादें तो हमेशा ही साथ होती है।

आज मेरे मन में ये गीत चल रहा है जो यादों से जुड़ी हुई है आप लोगों को भी सुनाना चाहूंगा। मन को छू लेने वाले इस गीत को राहत फ़तेह अली खान ने अपनी आवाज से सजाया है।



मैं जहां रहूं, मैं कहीं भी रहूं..
तेरी याद साथ है..
किसी से कहूं, किसी से ना कहूं..
ये जो दिल की बात है..

कहने को साथ अपने, एक दुनिया चलती है,
पर छुप के इस दिल में तन्हाई पलती है..
बस याद साथ है, तेरी याद साथ है..

मैं जहां रहूं, मैं कहीं भी रहूं..
तेरी याद साथ है..

कहीं तो दिल में यादों की एक सूली गड़ जाती है..
कहीं हर एक तस्वीर बहुत ही धुंधली पर जाती है..
कोई नयी दुनिया के नये, रंगों में खुश रहता है..
कोई सब कुछ पा के भी, ये मन ही मन कहता है..

कहने को साथ अपने, एक दुनिया चलती है,
पर छुप के इस दिल में तन्हाई पलती है..
बस याद साथ है, तेरी याद साथ है..

कहीं तो बीते कल की जड़े दिल में ही उतर जाती है..
कहीं जो धागे टूटे तो मालाऐं बिखर जाती है..
कोई दिल में जगह नयी बातों के लिये रखता है..
कोई अपने पलकों पर यादों के दिये रखता है..

कहने को साथ अपने, एक दुनिया चलती है,
पर छुप के इस दिल में तन्हाई पलती है..
बस याद साथ है, तेरी याद साथ है..


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Monday, October 29, 2007

वो रिक्त स्थान

वो रिक्त स्थान,
जो तुम्हारे जाने से पैदा हुआ था,
वो आज भी,
शतरंज के ३२ खानों की तरह खाली है..

कई लोग चले आते हैं,
उसे भरने के लिये,
मगर उन खानों को पार कर,
निकल जाते हैं,
उसी तरह जैसे शतरंज की गोटीयां..

जीवन की बिसात पर,
जैसे-जैसे बाजीयां आगे बढती है,
रिक्त स्थान बढता जाता है,
उसी तरह जैसे शतरंज का खेल..

और वो रिक्त स्थान बढता जाता है,
तुम्हारे द्वारा छोड़ा हुआ,
रिक्त स्थान..


Friday, October 26, 2007

बैंगलोर-मैसूर यात्रा वर्णन (भाग दो)

मैं और विकास वहीं मैसूर में ठहर गये। वहां पहूंचते ही मैंने अपना हाथ-पैर धोया और बिस्तर पर लेट गया और थकावट ऐसी की लेटते ही नींद ने मुझे घेर लिया। अगले दिन हमलोग सुबह का नाश्ता खाकर बैंगलोर के लिये चल पड़े। इस बार हमदोनों ही रास्ते को जल्दी निपटाने के चक्कर में थे, सो बिना रूके लगातार लगभग 75KM मैंने बाईक चलाया। और जब हम आराम करने के लिए CCD में रूके तो मेरा पैर भी सीधा नहीं हो रहा था। हमने वहां कुछ खाया और वहां से विकास ने गाड़ी चलाने की कमान संभाली और सीधा बैंगलोर पहूंच कर ही दम लिया। चुकीं बैंगलोर के रास्ते हम दोनों के ही ज्यादा जाने पहचाने नहीं थे सो हम जिस रास्ते से मैसूर गये थे उस रास्ते में ना घुस कर दूसरे रास्ते से होते हुये शहर में हो लिये। अब हमारे पास रास्ता पूछ-पूछ कर घर पहुंचने के अलावा और कोई चारा नहीं था।



रास्ते में


मुझे बैंगलोर के रास्तों का विकास से ज्ञान था सो मैंने ये सोचा की अगर यहां से सीधा चंदन के घर का रास्ता पूछूंगा तो कोई भी सही-सही नहीं बता पायेगा। सो पहले लाल-बाग पहूंचा जाये, वहां से फोरम, वहां से बेलांदूर और वहां से मुझे चंदन के घर का रास्ता लगभग पता था। हमलोग पूछ-पूछ कर लाल-बाग पहूंचे और वहां से निमहंस के रास्ते से होते हुये फोरम पहूंच गये। लालबाग से फोरम का रास्ता मेरे लिये एक ऐसा रास्ता है जो जाना-पहचाना होते हुये भी अंजान सा है और वहीं कहीं मुझे कुछ ऐसे जाने-पहचाने मगर अनजान से चेहरे दिखे जिन्होंने यादों के कुछ ऐसे तारों को छेड़ दिया जिनसे अब बेसुरा सा राग निकलता है।



CCD के बाहर का नजारा


फोरम के पास पहूंच कर हमने सोचा की यहां आकर अपने उन दोस्तों से गालीयां नहीं खानी है जो वहीं आस-पास में रहते हैं, सो हमने उन्हें फोन करके बुला लिया और थोड़ी देर वहीं घुमे और उन्हें भी लेकर चंदन के घर पहूंच गये। इस बार रास्ते में तो बारिश नहीं हुई मगर बैंगलोर में आकर अगर बारिश में नहीं भींगे तो समझिये की बैंगलोर आना बेकार रहा। सो हमने फोरम से घर तक का रास्ता बारिश में भींग कर पूरा किया। और रात में वापस चेन्नई के लिये निकल लिये। मेरे पास बैंगलोर आने का तो टिकट था पर वापस जाने का टिकट नहीं मिल पाया था। मैंने सोचा की जेनेरल टिकट लेकर ट्रेन में बैठ जाउंगा और टिकट जांचकर्ता के आने पर उनसे टिकट बनवा लूंगा। यहां भी एक अच्छा अनुभव मिला जो ज्ञानदत्त जी के लिये भी रोचक होगा। मैं अपने इस अनुभव को अगले किसी पोस्ट में आपसे बाटूंगा। तब-तक के लिये अनुमति चाहूंगा।

Wednesday, October 24, 2007

बैंगलोर-मैसूर यात्रा वर्णन

५ गाडियाँ
१० लोग
रास्ता बंगलोर-मैसूर हाइवे
दूरी ३७५KM(चंदन की गाड़ी से मापी हुयी)

(सबसे पहले: ये पोस्ट कुछ ज्यादा ही लम्बी हो गयी है जिसके लिये मैं क्षमा चाहूंगा। पर मैं इसमें कुछ कांट-छांट नहीं सकता था।)
इस बार मेरे कुछ दोस्तों ने मैसूर में साप्ताहांत मनाने का सोचा था और उन्होंने बैंगलोर जाने के लिये रेल आरक्षण पहले ही करवा रखा था। मेरा पहले जाने का मन नहीं था पर अचानक से मैंने भी जाने का फ़ैसला कर लिया। अब टिकट कि व्यवस्था करना वो भी सप्ताहांत में और वो भी ऐसे समय में जबकि मैसूर का दशहरा जग-प्रसिद्ध हो, ये लगभग आसमान से तारे तोड़ कर लाने जैसा है। खैर ये आसमानी तारा मैंने नहीं मेरे ट्रेवेल एजेंट ने तोड़ा और अंततः मेरे हाथ में बस का टिकट दे दिया। बैगलोर मे पहले हम सभी को चंदन के घर पर एकत्रित होना था और वहां से मैसूर के लिये निकलना था। विकास और उसके साथ मेरे दो अन्य मित्र भी अहले सुबह चंदन के घर पहुंच गये और मैं वहां ठीक 7 बजे सुबह में पहुंचा। थोड़ी देर बाद शिरीष भी आ गया, फिर हमलोगों ने सुबह का नाश्ता बनाया और खा पी कर निकले। अभी तक हमलोग 6 थे और हमारे पास दो मोटरसाईकिल थी और एक स्कूटर था। आगे जाकर हमारे कालेज के समय के चार और मित्र जुड़ने वाले थे और उनके पास दो मोटरसाईकिल थी। यहां से हमारा सफर शुरू हुआ था मैसूर का।

मैं सबसे दाहिने तरफ विकास के साथ अपनी नई मूछों में



हमने लगभग 11:30 के समय में अपनी यात्रा शुरू की थी और हमारा सोचना था की ज्यादा से ज्यादा 4 घंटे लगेंगे हमें वहां तक पहुंचने में, पर हमलोग इतने आराम से जा रहे थे कि मैसूर पहुंचते-पहुंचते हमें शाम के 5:30 हो गये। रास्ते में कुछ दिलचस्प घटनाऐं घटी जिसके बारे में मैं यहां लिखना चाहूंगा।

शुरूवात में मैं चंदन की नई मोटरसाईकिल 'पल्सर' को चला रहा था और जहां से बैंगलोर मैसूर हाइवे शुरू होता है वहां मैं शिरीष के पीछे बैठ गया। कुछ दूर आगे जाकर हमने आर.वी.इंजीनियरिंग कालेज के सामने बहुत पूरानी कारों का जखीरा लगा हुआ था जो बहुत ही अच्छा लग रहा था, शायद किसी उत्सव के लिए सभी आए होंगे। हम उसकी तस्वीर नहीं ले पाये, हमें इसका डर था की कहीं हम पीछे ना हो जायें। 15-20 मिनट के बाद हल्की बारिश शुरू हो गयी और हमने एक जगह देख कर गाड़ियां रोक दी, अपना जैकेट और विंड चीटर निकाल कर पहने और फ़िर से गाड़ियां बदल कर आगे को बढ चले।

कुछ दूर आगे जाने पर हमें चिंता हुई की बाकि लोग हमसे आगे हैं या पीछे और फिर शुरू हुआ फोन करने का शिलशिला। कुछ लोग कह रहे थे की हम HP वाले पेट्रोल पंप के पास हैं, तो कुछ लोग CCD(Cafe Cofy Day) के पास, पर सबसे बड़ी मुसीबत यह थी की शिरीष को छोड़कर और किसी को मैसूर हाईवे के रास्तों का पता नहीं था। कुछ लोग आगे थे और कुछ लोग पीछे और हमें ये समझ में नहीं आ रहा था की हम आगे हैं या पीछे। खैर जो भी था, था बहुत ही मजेदार। :) इस तरह लोगों को ढूंढते-ढूंढते हमलोग अपना समय बरबाद करते चले गये।

अब तक खाना खाने का समय हो चुका था और हमलोग CCD से बहुत आगे आ चुके थे और आस-पास जो भी खाने का होटल जैसा दिख रहा था और वहां जो भी मिल रहा था उसका नाम भी हमने नहीं सुना था और जिसका नाम हमने सुना था (Curd Rice) वो हमे खाना नहीं था। इस तरह हम होटल को खोजते हुये आगे बढते चले गये। हमलोग चल रहे थे और मेरे पीछे बैठी मेरी मित्र अपनी फोटोग्राफी का शौक पूरा कर रही थी। तभी हल्की बारिश शुरू हो गयी और हमें ठंड भी लग रही थी। पास में एक छोटा सा कस्बा जैसा कुछ दिखा और हमलोगों ने वहां चाय ली और बारिश के रूकने पर फिर गाड़ियां और सवारियां बदल कर आगे को बढ चले।


रास्ते में


इस बार मैं श्तोदी की गाड़ी चला रहा था। थोडी दूर जाकर अचानक से बहुत तेज बारिश शुरू हो गयी, जिससे हम बच नहीं पाये। उस समय मेरे साथ मेरी एक मित्र पीछे बैठी हुयी थी और उसे बहुत तेज ठंड लग रही थी। मैंने देखा कुछ दूरी पर विकास रूक कर इंतजार कर रहा था और वहां बरिश से बचने के लिये एक जगह भी बना हुआ था। अब-तक हम लोग मैसूर से लगभग 25-30KM दूर थे। फिर भी हमें रूकना पड़ गया। हम आठ लोग वहां रूके हुये थे और हमारे दो मित्र आगे बढ चुके थे, और उनका कहना था की आगे बारिश बिलकुल भी नहीं हो रही थी। बारिश के कुछ कम होने पर हमलोग आगे बढ चले। फिर भी हमलोग लगभग पूरी तरह भींग चुके थे और मैसूर के हल्के ठंडे मौसम में हमें ठंड भी लग रही थी। उस समय एक पल के लिये हम ये भी सोचने लगे कि इससे अच्छा तो किराये की कोई गाड़ी लेकर आना चाहिये था। मगर एक बार मैसूर पहूंच कर इस तरह के सारे विचार हवा हो गये।

मुझे अभी भी याद है की कैसे मेरे पीछे बैठी मेरी मित्र मैसूर पहूंचने के उत्साह से लगभग चीख उठी थी। "Yes, we reached Mysoor. हमलोग आगये। वो देखो मैसूर लिखा हुआ है।" :)


रात के समय मैसूर का महल


वहां से हमलोग इंफोसिस कैंपस चले गये जहां हमारे कुछ मित्र हैं। वहीं खाना खाये। शिरीष भी पहले वहीं मैसूर के इंफोसिस कैंपस में था सो उसे मैसूर के रास्तों का पूरा ज्ञान था। फ़िर मैं और विकास ने उस रात वहीं विकास के ममेरे भाई के यहां रूकने का निर्णय किया और बाकी लोग मैसूर का महल देख कर वापस चले गये। अगले दिन शिरीष का जन्मदिन था, वे लोग वहां पहूंच कर उसके जन्मदिन का केक काटे, और पूरी तरह से थकावट से चूर होकर सो गये। मैं और विकास कैसे वापस लौटे इसकी कहानी कुछ और ही है जिसे मैं अगले पोस्ट में लिखूंगा।

Tuesday, October 23, 2007

अज्ञात कविता

आज यूं ही कुछ कविताओं की बातें रही थी तो मेरी एक मित्र ने मुझे एक कविता इ-पत्र के द्वारा भेजा, जो मुझे कुछ अच्छी लगी उसे यहां डाल रहा हूं। मगर पोस्ट करने से पहले मैं अपने मित्र का परिचय देना चाहता हूं। उसका नाम है नेहा। ये मेरे साथ MCA में थी और अभी Bangalore में कार्यरत है।
वैसे ये कविता उसकी भी लिखी हुई नहीं है, ये उसने कहीं पढी थी और उसे पसंद आयी थी सो उसने मुझे पढने के लिये भेजा था।

धुआं था धुन्ध थी दिखता नही था
तभी तो आपको देखा नही था....
मिला ना वह जिसे चाहा था मैंने
मिला है वह जिसे चाहा नही था....
मैं क्यों ना छोड़ देता शहर उनका
किसी के अश्क ने रोका नही था...
दर्द था तड़प थी प्यास थी जलन थी
सफर मे मैं कभी तनहा नही था...
वह दूर हैं मुझसे तो कुछ नही है पास
वह पास थे मेरे तो क्या कुछ नही था...(अज्ञात)



मैं इधर बहुत दिनों से ज्यादा कुछ अपने चिट्ठे पर नहीं लिख रहा था पर अभी मेरे पास बहुत सारा सामान परा है जिसे मैं बहुत जल्द ही आपके सामने रख दूंगा। 2-3 पोस्ट तो मेरे ड्राफ्ट में सुरक्षित है जिसे जल्द ही पोस्ट कर दूंगा।

Wednesday, October 17, 2007

फ़ुरसत के रात दिन


ये मनुष्य का प्राकृतिक गुण होता है कि जब उसके पास काम होता है तो वो चाहता है की कैसे ये काम का बोझ हल्का हो, और जब उसके पास कोई काम नहीं होता है तो वो चाहता है कि कोई काम मिले। आज-कल मैं भी कुछ ऐसी ही अवस्था से गुजर रहा हूं। पहले सोचता था कि कुछ काम का बोझ हल्का हो, और पिछला प्रोजेक्ट खत्म होने पर जब फ़ुरसत ही फ़ुरसत है तो सोचता हूं कि दफ़्तर में कुछ तो काम मिले। पहले मेरे कार्यालय जाने का समय सुबह 7-8 बजे के आस-पास था और वापस लौटने का समय कोई निश्चित नहीं था और आज-कल सुबह आराम से 10-11 बजे तक निकलता हूं और दोपहर में ही 3-3:30 तक वापस आ जाता हूं। सामान्य साफ्टवेयर प्रोफेसनल के बोल-चाल की भाषा में इसे बेंच पर बैठना कहते हैं। पहले सुनता था अपने दोस्तों से की मुझे अभी बेंच पर बैठा रखा है, कोई काम नहीं है, और मैं अक्सर उन्हें चिढाता था कि सही है, बैठे बिठाये पैसा मिल रहा है सो मस्ती करो। और जब खुद खाली बैठ रहा हूं तो परेशान हो रहा हूं। सबसे ज्यादा TCS कोलकाता में जो मेरे मित्रगण हैं, उन्हें बेंच पर बिठा रखा है।
अभी कुछ दिन पहले की बात है, मेरे पास कोई काम नहीं था और कोई कम्प्यूटर टर्मिनल भी नहीं मिला हुआ था। ट्रेनिंग रूम में बैठना हो रहा था। वहीं के एक कम्प्यूटर पर बैठ कर मैं ज्ञानदत्त जी का और सारथी जी का चिट्ठा पढ रहा था। तभी मेरी बात अपने सिस्टम एडमिनिस्ट्रेटर से हुई जो कुछ दिलचस्प थी। हमारी बातें कुछ यूं हुई थी:

System Admin : Hi this is sys admin. plz don't open restricted sites.
Myself : ok sir, but can you define the restricted sites?
System Admin : Yes, sure.. those sites which contains porn, online games, .exe downloads, online cricket scores, orkut etc...
Myself : Sir, i'm just reading some blogs.. and it don't have any restricted things..
System Admin : But blog is not allowed at office timing.. and this blog is in diff font, so i'm not able to understand anything..
Myself : I don't have any work thats y i'm reading blog..
System Admin : But this is not allowed this time..
Myself : sir, plz give me some work then i'll not open any blog..
System Admin : Ok da.. read your blog.. :)
Myself : Thank u sir... bfn..

यहां
ok da का मतलब तमिल में OK दोस्त होता है। वैसे मैं भी अपने छुट्टी वाले समय का इस्तेमाल खूब सो कर और पुरानी हिंदी सिनेमा देख कर कर रहा हूं। क्योंकि मुझे पता है की जब काम आयेगा तो छप्पड़ फाड़ कर आयेगा। तो क्यों ना फ़ुरसत के चार दिनों का जम कर इस्तेमाल कर लिया जाये। :D
वैसे ये मत पूछियेगा की चेन्नई में पुरानी हिंदी सिनेमा मुझे कहां से मिलती है, मैं कैसे ढूंढता हूं ये मैं ही जानता हूं।

Sunday, October 07, 2007

एक बीता हुआ कल

आज-कल ना जाने क्यों अकेलेपन का एहसास कुछ अधिक ही बढ गया है। कहीं भी जाऊं बस खुद को भीड़ में अकेला महसूस करता हूं। मुझे चेन्नई में दो जगहें बहुत अधिक पसंद है। मुझे पढने का बहुत अधिक शौक है और मुझे जो भी मिलता है वही पढ जाता हूं, चाहे वो तकनिक से संबंधित कोई जानकारी हो या फिर साहित्य से संबंधित या व्यवसाय से संबंधित, या फिर बच्चों वाली कामिक्स हो, मेरे पसंदिदा जगहों मे से पहली जगह तो किसी शापिंग मौल के लैंण्डमार्क नामक दुकान की किताबों वाला भाग होता है और दुसरी जगह समुद्र का किनारा।

मगर आज-कल वहां जाने पर खुद को और भी अकेला पाता हूं। शौपिंग मौल मे लोगों का दिखावापन अपने चरमसीमा पर होता है और हर कोई अपनी ही दुनिया में व्यस्त रहता है। ऐसा लगता है कि दिखावापन ही जीवन में सब कुछ है। अपने उम्र के लोगों को देखता हूं की कैसे हर दिन कपड़ों की तरह बाय फ्रेन्ड और गर्ल फ्रेन्ड बदलते रहते हैं। मैं शिव शैनिकों या बजरंग दलों के लोगों की तरह ये नहीं सोचता हूं की ये सब गलत है, मेरे नजर में हर किसी का अपना निजी जीवन है और उसे वो जीवन जीने का पूरा अधिकार है। लेकिन फिर भी ऐसे माहौल में ऐसा महसूस होना स्वभाविक है।

पर आज-कल समुद्र के किनारे भी एक सूनेपन का एहसास होता है। लोग कहते हैं कि "समय और लहरें किसी का इंतजार नहीं करते हैं", पर मुझे तो ऐसा लगता है कि लहरों का सारा समय इंतजार में ही निकल जाता है। हर वक्त वो किसी का इंतजार करती नजर आती है। मानों किसी से मिलने के लिये भागते हुये किनारे तक आती है और उसे ना पा कर वापस मायूस होकर लौट जाती है। लेकिन इंतजार तो हमेशा ही बना रहता है।

आफ़िस में मैं जिस प्रोजेक्ट पर काम कर रहा था वो कल खत्म हो गया और बहुत दिनों के बाद शनिवार को मैं जल्दी घर पहूंच गया, थोड़ी देर के बाद धिरे-धिरे दोस्तों की मंडली भी जमने लगी। उन लोगों ने ये विचार किया कि बेसंत नगर वाले समुद्र तट पर चला जाये, जो मेरे घर से थोड़ा ज्यादा दूरी पर है। मैं वहां जाना नहीं चाहता था, लेकिन फिर भी दोस्तों की इच्छा का सम्मान करते हुये चला गया। वहां पहूंच कर सभी लहरों के सथ खेलने में व्यस्त हो गये.. प्रियदर्शीनी तो जैसे नहाने का मन बना कर ही आयी थी और सीधे समुद्र में उतर गयी, और उसकी देखा-देखी चंदन, चंदन की बहन, संजीव, वाणी, प्रियंका, गार्गी और शिवेन्द्रा भी लहरों में अंदर तक चले गये। विकास का मूड कुछ ठीक नहीं लग रहा था और वो बाहर ही बैठ कर सारे सामानों का रखवाली करने लग गया। और मैं बस वहां खड़ा होकर अपने विचारों में डूब गया। कभी वहां लोगों को देखकर अच्छा लग रहा था और कभी एक अजीब सा भाव मुझे घेर ले रहा था जिसे व्यक्त करना मेरे लिये संभव नहीं है। घर की बहुत याद भी आ रही थी। पापाजी से बात करने का मन कर रहा था मगर वो अभी हैदराबाद में कोई मीटिन्ग अटेन्ड करने गये हुये थे सो उनसे बात करना संभव नहीं था। मैंने घर फोन लगाया। पहले भैया से बात हुयी, मैंने उन्हें बताया की कैसे आज हमारा प्रोजेक्ट प्रसेनटेशन हुआ जो की आशा से बहुत ही अच्छा रहा। फिर लहरों की आवाज से वो समझ गये की मैं समुद्र के किनारे हूं। उन्होंने पूछा की अकेले ही गये हो क्या? मैंने कहा अकेला ही समझिये, लेकिन कहने को तो बहुत सारे दोस्त हैं। कहीं मन नहीं लग रहा है। फिर मम्मी से बात हुयी, उन्हें पहले मैंने उलाहना दिया की बड़ा बेटा घर पर है तो छोटे बेटे कोभूल जाती हो तभी 2-3 दिनों से फोन नहीं कर रही थी। तो पता चला की पिछले चार दिनों से घर का फोने खराब पड़ा हुआ था। फिर इधर-उधर की बात करके बात खत्म हो गयी।

वापस घर पहूंच कर खाना खाने का मन नहीं कर रहा था, सर भी थोड़ा भारी लग रहा था। गार्गी भी उस समय घर पर ही थी। उसने खाने के लिये पूछा, मैंने झूठ कह दिया की मैं बाहर खा कर आ गया हूं नहीं तो वो पीछे पर कर कुछ ना कुछ खिला ही देती। फिर उसे बाम पकड़ा दिया, जिसे लगाते-लगाते ही मैं सो गया। उस बीच में विकास ने गार्गी को कुछ कहा जो मुझे कुछ बुरा लगा, लेकिन मैं उस बात को लेकर ज्यादा सोचा नहीं क्योंकि मुझे पता है की जब हमारा मन कहीं नहीं लगता रहता है उस समय हर बात को लोग उल्टे तरीके से ही सोचते हैं। और उस समय मैं भी कुछ वैसी ही उहापोह से गुजर रहा था।

इस तरह सैकड़ों-हजारों शनिवार में से एक और शनिवार गुजर गया।

Saturday, September 29, 2007

दो विपरीत अनुभव

पहला अनुभव

मैं चेन्नई में जहां रहता हूं वहां से कार्यालय जाने वाले रास्ते में 'बस' में बहुत ज्यादा भीड़ होती है। उस भीड़ का एक नजारा आप भी इस तस्वीर में ले सकते हैं। (चित्र के लिये आभार 'हिंदू' को)

मैं उस दिन अपने कार्यालय से जल्दी घर के लिये निकल गया था। मैं उस दिन अपने कार्यालय से जल्दी घर के लिये निकल गया था। 'बस' में अपने लिये जगह बनाने के लिये मैं 'बस' के पीछे वाले हिस्से में चला गया। वहां देखा एक बहुत ही बुजुर्ग, जो शायद मेरे दादा जी के उम्र के होंगें और जिन्हें चलने में भी परेशानी होती होगी, वहां खड़े हैं। मुझे वहां बैठे अपने उम्र के लोगों पर तरस आया की इनके पास इतना भी संस्कार नहीं है की खुद उठ कर उन्हें बैठने के लिये जगह दे दें। संस्कार कि बात अगर हटा भी दें तो इतनी मानवीयता तो होनी ही चाहिये। थोड़ी देर बाद मैंने देखा की आगे वाले एक जगह खाली हो रही थी और मैंने लपक कर उस जगह पर बैठ गया। और अपने बगल में खड़े एक सज्जन को कहा की उन्हें यहां बुला दें जिससे मैं उनको बैठने के लिये जगह दे सकूं। वो सज्जन अंग्रेजी नहीं समझ पा रहे थे और मुझे तमिल नहीं आ रही थी। खैर मैंने किसी तरह इशारों में उन्हें समझाया और अंततः वो समझ गये और उन्हें बुलाया। मैं वहां से खड़ा हो गया और उनको बैठने के लिये जगह दे दिया, उन्होंने मुझे तमिल में कुछ कहा जिसे मैं समझ नहीं पाया पर इतना जरूर अंदाजा लगा लिया की वो मुझे आशीर्वाद दे रहे हैं। फिर मैंने देखा कि वहां बैठे लोग मुझे ऐसे देख रहे थे जैसे मैंने कुछ गलती कर दी हो और उनकी नजरें मेरा उपहास कर रही थे। पर मुझे उन नजरों की कोई चिंता नहीं थी, और उनके उपहास भड़ी नजरों से मेरा सर गर्व से और ऊंचा हो गया।

दूसरा अनुभव

यहां मैंने पाया है कि चेन्नई में उत्तरी भारतीय लोगों के लिये एक बात बहुत आम है और वो यह है कि यहां अक्सर आपको ऐसे लोग मिल जायेंगे जो आपसे हिंदी में बात करेंगे और बतायेंगे की कैसे वो यहां आये थे और कैसे उनका सारा सामान चोरी हो गया और अब उनके पास खाने के लिये कुछ भी नहीं है। वो वापस कैसे जायेंगे इसका भी कुछ पता नहीं है। कुछ पैसों से अगर मदद मिल सके तो कर दें। वे सारे लोग आपको अच्छे कपड़ों मे सजे-धजे दिखेंगे और अगर आप चेन्नई में नये हैं तो आप जरूर उनके बहकावे में आकर ठगे जायेंगे।

उस दिन मेरे मित्र विकास के पापा आने वाले थे और मुझे उनको लेने रेलवे स्टेशन जाना था। उसके लिये मैंने यहां के मांम्बलम स्टेशन से लोकल लेकर चेन्नई सेंट्रल जाना मुनासिब समझा। जब मैं अपने कार्यालय से स्टेशन के रास्ते पर था तो मुझे ऐसा लगा जैसे मुझे कोई पूकार रहा हो। "भाई साहब आप हिंदी जानते हैं!" मैं ठिठक गया, सोचा शायद ऐसा कोई हो जिसे कहीं जाने का रास्ता या पता चाहिये होगा। और उसे सही सही कोई बता नहीं पा रहा होगा।
मैंने देखा एक आदमी अपनी बीबी और एक बच्चे के साथ था। वो बताने लगा की वो औरंगाबाद महाराष्ट्र का रहने वाला है और उसकी बात यहां कोई समझ नहीं पा रहा है, क्योंकि उसे अंग्रेजी ठीक से नहीं आती है। मैं उस समय जल्दी में था पर फिर भी रूक कर उसकी बात सुनने लगा की शायद कोई मदद कर सकूं। मगर वो भी वही बात दोहराने लगा जो मैं चेन्नई में आने के बाद कई बार सुन चुका हूं। और फिर मैं अपना मुंह बनाते हुये उसकी पूरी बात सुने बिना आगे बढ गया। पर आगे बढने के बाद मुझे ऐसा लगा जैसे मैंने कुछ गलत कर दिया हो, क्योंकि मुझे उसके बच्चे का चेहरा याद आया जो मासूमियत से भड़ा हुआ था और अपने पिता को देखे जा रहा था। उसे शायद पूरी उम्मीद थी की शायद इस बार कुछ बन सके। और वो कुछ भूखा भी लग रहा था। मुझे पहली बार ऐसा लगा की वो आदमी सही था। लेकिन मैं अब वापस पीछे नहीं जा सकता था नहीं तो मुझे बहुत देर हो जाती। मैंने अपने मन को समझाया कि अगर मैं उसकी मदद करना चाहता, तब भी नहीं कर पाता क्योंकि मेरे पास 7-8 रूपये चिल्लर के अलावा कुछ 500 के नोट थे। लेकिन मुझे पता है कि वो गलत तर्क है, क्योंकि अगर मैं उसकी मदद करना चाहता तो मेरे पास 3-3 कार्ड थे और वो रास्ता बड़े-बड़े डिपार्टमेंटल स्टोर से भड़ा हुआ था। अगर मैं चाहता तो कुछ खाने के लिये खरीद कर उसे दे सकता था।

अभी भी मैं सोचता हूं तो थोड़ी तकलीफ होती है कि किस तरह हमलोग ठगों से बचने के चक्कर में जरूरतमंदों से भी नजरें मोड़ लेते हैं।

Monday, September 24, 2007

कवि का निर्माण (व्यंग्य)

मैंने अक्सर लोगों को और अपने दोस्तों को कहते सुना है कि जब किसी का दिल इश्क़ में टूटता है तो वो कवि बन जाता है और कवितायें लिखने लगता है। मेरी भाभी मुझे अक्सर चिढाती भी हैं कि आपका दिल किसने तोड़ा कि आप कवितायें लिखने लग गये। और मेरे पास कोई जवाब नहीं होता है। मैं सोचने लगता हूं की किस-किस का नाम् लूं, कोई एक हो तो। जहां कोई खूबसूरत हसीना दिख जाती है बस दिल वहीं अटक जाता है। शायद जवानी की मस्ती ऐसी ही होती है। लेकिन मेरी बात को कोई गंभीरता से लेता ही नहीं है तो इसमें मेरी क्या गलती है? हर वक़्त उन्हें लगता है की मैं उनसे मजाक ही कर रहा हूं।

खैर मैं आया था कुछ रिसर्च वर्क करने और अपनी ही कहानी सुनाने बैठ गया। रिसर्च का विषय है "कवि का निर्माण"। अगर दिल टूटने से ही कोई कवि बन जाये या फ़िर मेरी तरह छोटी-मोटी कवितायें लिखने लगे तो, मुझे इस पर आश्चर्य होगा की हमारे महान भारत की पृष्टभूमि से जिन महाकवियों की उपज हुई है, वो कवि कैसे बने होंगें? बाल्मिकी से लेकर तुलसी दास तक और दिनकर से लेकर सुभद्रा कुमारी चौहान तक, सभी के पीछे एक दिल टूटने की कहानी होनी चाहिये। वैसे भी ये कहा गया है :

वियोगी होगा पहला कवि,
आह से उपजा होगा गान।
आंखों से बहकर चुपचाप,
बही होगी कविता अनजान।




मैं जहां तक तुलसी दास के बारे में जानता हूं, वो अपनी पत्नी की बातों से आहत होकर भगवान की खोज में निकल पड़े थे और स्त्रीयों के बारे में उनके विचार इस पंक्तियों से पता लग सकता है :

ढोल, गंवार, सूद्र, पशु, नारी।
ये सब तारण के अधिकारी।


हां तो मैं बोल रहा था की कुछ ना कुछ गड़बड़ तो जरूर होनी चाहिये इस सभी महान कवियों के पीछे। कम-से-कम एक रहस्य तो जरूर होनी चाहिये जिसकी खोज करके लोग PHD की डिग्री ले सकें। छोटी-मोटी कई कहानी ना होकर एक सॉलिड कहानी तो होनी ही चाहिये। वैसे अगर ये कहावत सही है की "सौ चोट सुनार की, एक चोट लुहार की", तो हमारे रोमान्टिक कहानियों के सुपर हीरो मजनू को इस कविता की दुनिया के सबसे पहुंचे हुये कवि का खिताब मिलना चहिये।

खैर मेरा रिसर्च अभी यही तक पर सीमीत है, अगर आप इस पर रिसर्च करके कुछ और तथ्य को सामने ला सकें तो बहुत कृपा होगी। शायद मैं इसी में PHD की डिग्री प्राप्त कर लूं!!!
:D

"सामर्थ्य और सीमा" के कुछ अंश

'टन-टन-टन' घड़ी ने तीन बजाये और चौंककर मेजर नाहरसिंह ने अपनी आंखें खोल दीं। अब मेजर नाहरसिंह को अनुभव हुआ कि रात के तीन बज गये हैं। दिन निकलने में कुल दो घण्टे बाकी हैं। कितनी तेजी के साथ यह समय बीत रहा है। इस समय को सेकण्ड, मिनट, घण्टे, दिन-रात, महीनों, वर्षों, सदियों, युगों और मन्वन्तरों में विभक्त किया है मानवों ने। अपनी सीमा को लेकर आने वाला यह अहम् और दर्प से युक्त मानव इस अखण्ड और निःसीम काल को सीमाओं में विभक्त करता चला आ रहा है। और एकाएक मेजर नाहरसिंह के अन्दर वाली ग्लानि जाती रही, उनके मुख पर एक हल्की मुस्कान आयी, "मुर्ख् कहीं के! इस समय को भी कोई विभक्त कर सका है? निःसीम की कहीं सीमा निर्धारित की जा सकती है? इस काल के उपर भला किसी का अधिकार है? असीम, अक्षय! यह काल हरेक को खा लेता है, इसकी क्षुधा का कोई अन्त नहीं है। इस काल से भला कोई लड़ सकता है या कोई लड़ सका है? इस काल को विभक्त करके उसे नापने का प्रयत्न करनेवाली यह घड़ी स्वयं काल का ग्रास बन जायेगी। राजभवन के कूड़े-खाने में न जाने कितनी टूटी हुई बीकार घड़ियां पड़ी थी, एक दिन यह घड़ी भी उसी ढेर में डाल दी जायेगी। इस घड़ी को बनाने वाला भी कितना मूर्ख था!"

और... और उसी समय उनका ध्यान उनके हृदय से आनेवाली टिक-टिक की आवाज पर गया। इस हॄदय-रूपी यन्त्र को किसने बनाया? क्या वह भी मूर्ख है? समस्त अस्तित्व मानव का इस हॄदय की धड़कन पर अवलम्बित है। न जाने कितने हॄदय पिण्ड कब्रों के अन्दर पड़े हैं। और फ़िर भी 'टिक-टिक' करनेवाले यह हॄदय-पिण्ड, इन्हीं के कारण से मानव का अस्तित्व है।
-भगवतीचरण वर्मा


Saturday, September 22, 2007

कल्पनायें

आज अपने एक मित्र से बात कर रहा था तो वो युं ही मज़ाक में बोली थी कि अब बस इमैजिनेट करते रहो, उस समय मन किसी और ही भंवर में फ़ंसा हुआ था और मन ही मन में ये कुछ शब्द उभर आये जो मैं यहां लिख रहा हूं।


असीमित इच्छाओं की उड़ान,
जैसे पंछियों का गगन में उड़ना,
मगर ये मानव मन की उड़ान,
कुछ अलग है उनसे..
जैसे,
निर्जीव 'औ' असीम कल्पनाऐं,
और उन कल्पनाओं के पीछे भागता मनुष्य,
कल्पनाओं को पीछे छोड़ता मनुष्य..
पर ये तो निर्जीव हैं!
बिलकुल भावनाओं की तरह..
पर फ़िर भी कल्पनाऐं
'औ' भावनाऐं पनपती हैं..
और उनके पीछे भागता है मनुष्य...

Wednesday, September 12, 2007

कुछ कविताऐं दोस्तों की तरफ़ से

मैंने आज का अपना ये पोस्ट अपने इंटरनेट के मित्रों के नाम किया है जो अपने आप में एक अनूठे व्यक्तित्व के स्वामी हैं। एक का नाम है वंदना त्रिपाठी और दूसरे हैं सजल कुमार। दोंनो ही अपने आप में कई खूबियों को समेटे हुये हैं। वंदना जी से मैं सबसे पहले दिसम्बर महीने में मिला था और सजल जी से मैं कब मिला मुझे याद नहीं है पर शायद अक्टूबर या नवम्बर में मिला था। इन दोनों ही से मेरी मुलाकात और्कुट पर हुई थी और वो भी सुपर कमांडो ध्रुव काम्यूनिटी में। वंदना जी की चर्चा मैं अपने इस ब्लौग पर पहले भी कर चुका हूं। उसे पढने के लिये यहां खटका दबाऐं।

य़े दोनों ही मेरे ऐसे मित्र हैं जिनसे बातें करते समय मुझे लगता ही नहीं है की मैं किसी ऐसे से बात कर रहा हूं जिससे मैं कभी मिला नहीं हूं। सजल जी की बातों से जहां मासूमियत झलकती है तो वंदना जी की बातो से परिपक्वता। दोनों ही के अपने-अपने तरीके हैं तो अपनी-अपनी पसंद भी। पर एक जगह जाकर दोंनो की पसंद मिल जाया करती है। वो ये की ये दोनों ही अच्छी कविताऐं लिखते हैं। जहां वंदना जी अंग्रेजी में कविता लिखने के हुनर में माहिर हैं तो सजल जी हिंदी और उर्दू की अच्छी समझ रखते हैं।

यहां लिखी हुई पहली कविता वंदना जी की लिखी हुई है और दूसरी कविता उसे उसी अंदाज में सजलजी के द्वारा अनुवाद किया हुआ है। इसके मौलिक रूप को पढने के लिये आप यहां खटका दबाऐं।

Today the wind is blowing so fast,

That I can remember the Memories of my past

I can feel the moisture of Your tears in the Air

I can feel the Fragnance of Your body here & there

All these sparkling stars in the Sky

Make Me to remember

The Serenity of Your Eyes

As the Wind kisses My Cheeks

I can remember

The Softness of Your lips

As these black clouds are Wandering without Fear

It's natural for Me

To image them as Your untied Hair

All these beautiful things make to feel that

I am not Alone

Somebody is always besides Me to shape My SOUL!!!

ये सजल जी के द्वारा किया हुआ अनुवाद है।

आज इन हवाओं में कुछ ऐसी गति है,

कि इनमे नज़र आती मेरे अतीत की प्रगति है,

हवाओं में तेरे

आँसूओं की नमी महसूस होती है,

तेरे बदन की खुश्बू यहीं कहीं महसूस होती है,

आकाश के ये चमकते सितारे याद दिलाते है

तेरे आँखों की शांत चंचलता,

जब हवा सहला जाती है मेरे गालो को,

मुझे याद आती है तेरे होंठो की कोमलता,

ये निर्भीक काले बादल स्वभाविक रूप से

तेरे खुले बालों कि भाँति नज़र आते है,

ये खूबसूरती का 'आलम' कराता है एहसास,

की मैं अकेली नही हूँ,

कोई हमेशा है पास,

और जो मेरी आत्मा को नये आयाम,

नये मायने दे रहा है..


सबसे बड़ी बात तो ये है कि ये दोनों ही पेशे से लेखक या कवि ना होकर इंजीनियर हैं। जहां सजल जी अभी अपनी पढाई पूरी भी नहीं किये हैं, वहीं वंदना जी अभी-अभी अपनी पढाई पूरी करके नोयडा में अपनी पहली नौकरी में गई हैं।

Tuesday, September 11, 2007

तुझसे नाराज़ नहीं जिंदगी

आज सुबह से ही मैं इस गीत को मन ही मन गुनगुना रहा था, सो सोचा क्यों ना आज इसे अपने ब्लौग पर चिपका ही दूं। वैसे मुझे इस सिनेमा के सारे गाने ही पसंद हैं और 'लकड़ी पे काठी' वाला गाना तो मेरे बचपन की याद से भी जुड़ा हुआ है पर इस गाने से कुछ और ही लगाव है। इस गाने में गुलजार ने जीवन के यथार्थ से भी हमारा परिचय कराया है तो वहीं 'हूजूर इस कदर भी ना' में जवानी की मचलती तरंगों को भी महसूस किया जा सकता है।
शेखर कपूर की इस फ़िल्म में उन्होंने पेश किया है एक उलझते गृहस्ती की उल्झने और वो कैसे एक दूसरे की समझ से ही सुलझ सकती है। नसिरूद्दीन साह, शबाना आजमी और साथ में जुगल हंसराज की अभूतपूर्व अदाकारी ने तो जैसे पूरे फ़िल्म में जान फ़ूंक दी है।

मुझे याद भी नहीं है की मैंने इस फ़िल्म को कितनी बार देखी है और मैं ये भी नहीं बता सकता हूं कि मैं इसे और कितनी बार देखूंगा। मैं पहले दूरदर्शन पर इसके आने का इंतजार करता था और अक्सर सहारा इंडिया पर इसे पा भी लेता था। पर उसमें बीच में आते ब्रेक के चलते फ़िल्म का मज़ा किरकिरा हो जाता था, फिर मैंने अंततः पूरे फ़िल्म का मजा लेने के लिये इसकी सीडी बाजार से खरीद ली।

तो चलिये इस गाने को पढते हैं और गुनगुनाते हैं। इस गाने को लिखा है गुलजार ने, इसके दो वर्जन हैं, पहला अनुप घोषल की आवाज में और दूसरा लता मंगेशकर की आवाज में।

इस गाने को यहाँ सुने...

Tujhse Naraaz Nahi...



तुझसे नाराज नहीं जिंदगी हैरान हूं मैं,
हैरान हूं मैं..

तेरे मासूम सवालों से परेशान हूं मैं,
परेशान हूं मैं..

जीने के लिये सोचा ही नहीं, दर्द संभालने होंगे..
मुस्कुराए तो, मुस्कुराने के कर्ज उतारने होंगे..
मुस्कुराए कभी तो लगता है, जैसे होंठों पे कर्ज रखा हो..

तुझसे नाराज नहीं जिंदगी हैरान हूं मैं,हैरान हूं मैं..
तेरे मासूम सवालों से परेशान हूं मैं,
परेशान हूं मैं..


जिंदगी तेरे गम ने हमें रिश्ते नये समझाये..
मिले जो हमें, धूप में मिले, छांव के ठंडे साये..
ला ला ला, ला ला ला ला...............

तुझसे नाराज नहीं जिंदगी हैरान हूं मैं,
हैरान हूं मैं..

तेरे मासूम सवालों से परेशान हूं मैं,
परेशान हूं मैं..

आज अगर भर आयी हैं, बूंदे बरस जाएगी..
कल क्या पता इन के लिये, आंखे तरस जाएगी..
जाने कब गुम हुआ, कहां खोया, एक आंसू बचा के रखा था..

तुझसे नाराज नहीं जिंदगी हैरान हूं मैं,
हैरान हूं मैं..
तेरे मासूम सवालों से परेशान हूं मैं,
परेशान हूं मैं..

Monday, September 10, 2007

अव्यवस्थित किस्से

जैसा कि मेरे इस लेख का विषय है, आपको मेरे इस लेख में कुछ भी व्यवस्थित रूप में नहीं मिलेगा। सो आपसे निवेदन है कि आप कृपया इसमें सामन्जस्य बिठाने की कोशिश ना करें। इसमें कोई भी घटना कहीं से भी किसी भी तरफ़ मुड़ सकती है, इसका दोष मुझे मत दिजीयेगा। हां मैं सिर्फ़ आपको इतना भरोसा दिलाता हूं की सारी घटनायें सही है और मेरे जीवन में इसका इतना महत्व तो है की मैं इसे भूलना नहीं चाहता।

मेरे कालेज का मुख्य द्वार

कई मित्रों का मानना है कि मैं गाना अच्छा गाता हूं और अक्सर मुझसे गाना गाने का आग्रह करते रहते हैं। एक अंधे को क्या चाहिये बस दो आंखें उसी तर्ज पर एक कवि या गवैये को क्या चाहिये बस एक श्रोता। और मैं भी आनंद सिनेमा के राजेश खन्ना कि तरह कभी खाने और गाने मे शरमाता नहीं हूं। खैर ये तो बस एक भूमिका थी, असल बात तो ये बताना था कि कैसे दोस्तो ने ये निर्णय किया था की रात के खाने के बाद सब बैठकर गाना गाना सिखेंगे। और मेरा सोचना था कि जूनियरों के उपर ये अत्याचार के अलावा और कुछ नहीं होगा। आखिर वे बोल भी क्या सकते थे और मेरे कमरे के आस-पास विकास, संजीव और नीरज को छोड़कर बाकी सभी जूनियर ही रहते थे। खैर हमने कभी इसे गम्भीरता से लिया नहीं तो बेचारों का पता नहीं क्या होता।


अर्चना बैंगलोर के फोरम मौल में

मैं आपको दूसरे दॄश्य में लिये चलता हूं। मैं चेन्नई में नया-नया आया था और नये जगह में नयी भाषा और नयी संस्कॄति में जल्दी रम नहीं पा रहा था सो उस दिन कहीं मन नहीं लग रहा था। उस दिन गूरूवार था और रात में मुझे पता चला की शुक्रवार को अर्चना बैंगलोर जाने वाली है। और मैने आनन-फ़ानन में बैंगलोर जाने का प्रोग्राम बना लिया। खैर, शुक्रवार को दफ़्तर ना जा कर मैं बैंगलोर के लिये निकल लिया। रास्ते में काटपाड़ी(अर्चना को वहीं से चढना था) से अर्चना का साथ मिल गया। फ़िर बैंगलोर पहूंचकर वहां से हम दोनों वाणी, प्रियंका और प्रियदर्शीनी के आफिस चले गये। शाम के समय हम दोनों और साथ में प्रियंका और प्रियदर्शीनी भी वाणी का इंतजार कर रहे थे। थोड़ी देर में वाणी हमलोगों को ढूंढते हुये हमलोगों के पास पहूंची तो अर्चना के मुंह से ठेठ बिहारी स्टाईल में अचानक ही ये निकल गया कि, "तुम हम लोग को उधर ढूंढ रही थी और हम लोग यहां खड़े होकर बतिया रहे थे।" उसके बाद हंसते हुये अपना माथा पिटते हुये बोली की ये मैं क्या बोलने लगी हूं, तुम लोगों के साथ रहते हुये मैं भी बिहारी भाषा बोलने लग गयी हूं। मुझे कोई बिहारी बॊय फ़्रेन्ड नहीं बनाना है जो तुम लोग मुझे ये सिखा रहे हो। दरअसल अर्चना बचपन से ही मुंबई और दिल्ली में रहती आयी थी और कालेज में आकर ही बिहार के लोगों के संपर्क में आयी थी और वो भी ऐसा की हमारे झुंड(झुंड इसलिये कहा क्योंकि हमारा ग्रुप था ही इतना बड़ा कि उसे ग्रुप नहीं कह सकते थे)में 1-2 को छोड़ कर सारे बिहार या झारखंड से ही थे।


वालपरई की खूबसूरत पहाड़ियां

तीसरे दॄश्य में आपको लिये चलता हूं वालपरई की खूबसूरत घाटियों में। ये तमिलनाडू में स्थित है और यहां चाय के कई बागान आपको मिल जायेंगे। ये एक बहुत ही खूबसूरत जगह है और किसी भी तरह से उंटी और मुन्नार(केरल) से कम नहीं है पर ज्यादा लोगों को इसकी जानकारी नहीं है शायद इसीलिये यहां पर्यटकों की ज्यादा भीड़-भाड़ नहीं है और इसका फायदा मुझ जैसे चंद पर्यटकों को मिल जाता है जो वहां कि अनछुई खूबसूरती देखने पहूंच जाते हैं। हमें वहां तक पहुंचते-पहूंचते रात के 10:30 से ज्यादा बज गये थे, और वहां होटल पहूंचते ही सभी थक कर चूर हो गये थे। फिर वाणी ने कहा की सुबह-सुबह कौन घुमने चलेगा मौर्निंग वाक पर? कोई तैयार नहीं हुआ, सभी सुबह की मीठी नींद खराब नहीं करना चाह रहे थे। बस मैं बोला की मैं उठ जाउंगा, पर तुम सोये मत रह जाना। और सुबह जब मैं उठा तो वहां की खूबसूरती देखता ही रह गया। चारों ओर बस पहाड़ीयाँ थी जो चाय के बागानों से ढकी हुयी थी। मैंने बस अपना कैमरा निकाला और धराधर फोटो लेना चालू कर दिया। फिर जाकर तैयार हो गया। इस बीच एक के बाद एक सभी उठने लगे और वहां की खूबसूरती को निहारने लगे। सबसे पहले अमित उठा और उठते ही चिल्लाया "अरे यार मस्त"। और उसने इस एक वाक्य को इतनी बार कहा की सभी कोई उठ कर एक बार जरूर चिल्लाते, "अरे यार मस्त"। फिर तो ये वाक्य हमारा उस यात्रा में पंचलाइन ही बन गया। कुछ भी अच्छा दिखा बस सभी बोल उठते, "अरे यार मस्त"। आज भी कुछ अच्छा दिखता है और अमित मेरे साथ होता है तो मैं एक् बार जरूर कहता हूं, "अरे यार मस्त" और उन पलों को याद कर लेता हूं।

आप सोच रहे होंगे की मैं मौर्निंग वाक पर गया की नहीं, तो जवाब ये है की वाणी सुबह-सुबह उठी और तैयार होकर फिर सो गयी। तमिलनाडू की उमस भरी गर्मी को झेलने के बाद कोई भी उस ठंढे वातावरण में सोने का मज़ा खोना नहीं चाहता था। :)

Wednesday, August 29, 2007

स्वप्न की चाह

ये कविता मैंने बहुत पहले लिखी थी और मुझे ये किसी बेकार तुकबंदी से ज्यादा कुछ नहीं लगी थी इसलिये अपने ब्लौग पर इसे नहीं डाला था। वैसे ये मुझे आज भी बहुत ज्यादा पसंद नहीं है फिर भी मैंने सोचा की अगर मैं अपनी अच्छी चीजें यहां डालता हूं तो मुझे अपनी खराब चीजों को भी सबके सामने रखना चाहिये। और इसी सोच ने मुझे इसे पोस्ट करने की प्रेरणा दी।

स्वप्न देखने कि इच्छा,
अब भी मन मे उठती है।
जब भी सपने देखता हूं,
मंजिल दूर नजर आती है।
इस तरह वो दिल को,
कुछ और दुखा जाती है।
सोचता हूँ कि जीवन
बस यूँ ही गुजर नही होती है।
और ये असीम इच्छाऐं,
कभी पूरी नही होती है।
फिर भी सपने देखने की चाह,
कभी खत्म नहीं होती है।
सपनों के इस दौर में,
हर दिन सपनों के बाजीगर मिलते हैं।
और हर दिन सपनों के मृगत्रिश्ना के,
छलावे दिखाई देती है।
अपने वज़ूद की तलाश में,
खुद अपनी लाश उठाये,
भटकता फिर रहा हूं गली-गली,
देखिये ये तलाश कब खत्म होती है।

Thursday, August 23, 2007

भाषा का ज्ञान और भाषा की समझ

मेरी समझ में भाषा का ज्ञान और भाषा की समझ दोनों में बहुत अंतर है। मेरी मातृभाषा हिंदी है जिसे मैं बचपन से बोलता आया हूं और मुझे इस भाषा से बहुत प्रेम भी है। मैं कुछ और भाषा भी समझ और बोल लेता हूं पर मेरी समझ में वो बस हिंदी का एक अनुवाद भर ही है जैसे अंग्रेजी और मैथिली। ऐसे कहने को तो मेरी मातृभाषा मैथिली है पर बचपन से ही मैं हिंदी में ही बोलता आया हूं और इसी कारण से मैं हिंदी को ही अपनी मातृभाषा का संज्ञा देता हूं।

मैं यहां विषय से थोड़ा भटक गया था, मेरी समझ में आप अपनी भावनाओं को उसी भाषा में सही तरह से उजागर कर सकते हैं जिस भाषा कि आपको समझ हो। जिस भाषा का आपको ज्ञान भर है उस भाषा में आप अपनी बात को बस दूसरे तक पहूँचा भर सकते हैं। मेरे कई मित्र ऐसे हैं जो अक्सर मुझसे पूछते हैं की मैं अपना सारा ई-मेल हिंदी में क्यों लिखता हूं, क्योंकि मेरी व्यवसायिक भाषा अंग्रेजी है। उसका उत्तर उन्हें मेरे इस चिट्ठे में मिल जायेगा। ये कुछ और नहीं मेरी अपनी भाषा से प्रेम भर है और बस यही कारण है मैं जो कुछ भी लिखता हूं उसकी लिपी देवनागरी होती है।


मेरे साथ जितने भी मेरे मित्र रहते हैं वे सभी अक्सर मेरी भाषा से आतंकित रहते हैं। कारण ये नहीं कि उन्हें ये भाषा आती नहीं है, वरन् ये कहा जाये की उन्हें भी ये भाषा उतनी ही आती है जितनी कि मुझे तो ज्यादा सही होगा, कारण ये है की आज के इस युग में वो इस तरह की भाषा के आदी नहीं हैं। उनमें से एक (विकास) के बारे में मेरा विचार तो ये है कि उसकी इस भाषा पर मुझसे ज्यादा पकड़ है। खैर, कभी-कभी मैं जानबूझ कर भी इस भाषा के भारी-भरकम शब्दों का प्रयोग भी करता हूं, बस उन्हें परेशान करने के लिये। :)

मैं इसी उम्मीद के साथ इस चिट्ठे को बंद कर रहा हूं की और लोग भी हमारे इस भाषा के

महत्व को समझे और ज्यादा से ज्यादा इस भाषा का प्रयोग करें क्योंकि प्रयोग करने से ही ये महान भाषा अपने शीर्ष पर पहूंच सकता है। प्रयोग से ही कोई भी भाषा महान बनती है। ये सही है की विदेशी भाषा का अच्छा ज्ञान होने से आप कई जगह सफल हो सकते हैं और इसीलिये विदेशी भाषा का ज्ञान भी होना बहुत जरूरी है, पर वो आपको महान नहीं बना सकती है। आपको और आपकी संस्कृति को महान बनाने का कार्य आपकी अपनी भाषा ही कर सकती है।

धन्यवाद

Saturday, August 18, 2007

एक कहानी बचपन की


मेरे पापाजी को पैर दबवाने का बहुत शौक है, खासकर खाना खाने के बाद। ये हम बच्चों कि बचपन से ही ड्युटी रहती थी की खाना खाने के बाद पापाजी का पैर दबाना है। और हर बच्चों की तरह हम भी बचते रहते थे की खाना खाने के बाद पापाजी के सामने नहीं पड़ना है, नहीं तो वो जिसे पहले देखेंगे उसे ही आज की ड्युटी करनी परेगी। लेकिन फिर भी कोई न कोई पकड़ में आ ही जाता था। फिर एक दिन पापाजी ने हम दोनों भाईयों के बीच अपना दोनो पैर बांट दिया, कि ये वाला पैर प्रशान्त दबाएगा और दुसरा वाला छोटू। और हमेशा एक कहानी सुनाया करते थे। यहां इतनी भुमिका बांधने के पीछे का कारण बस वही कहानी सुनाना था। मैं शर्त लगा कर कह सकता हूं कि आपको वो कहानी जरूर मजेदार लगेगी।


गुरूजी का पैर



एक गुरूजी थे, उनके दो चेले थे। ये जमाना गुरूकुल के समय का था जब बच्चे गुरूकुल पढने के लिये जाते थे और शिक्षा पूरी करके ही वापस घर लौटते थे। दोनों चेले अपने गुरूजी को बहुत मानते थे और उनक हर कहा मानते थे। जंगल जाकर लकड़ी काटते थे, गुरूकुल कि सफाई करते थे। गुरूजी का दिया हुआ हर कार्य करते थे और मन लगा कर पढाई भी करते थे। गुरूजी भी उन्हें बहुत मानते थे और तन-मन-धन लगा कर उनको शिक्षा देते थे।

गुरूजी कि एक आदत थी, दोपहर के समय जब सारा काम हो जाता था तो अपने दोनो चेले से पैर दबवाते थे, और वो दोनो भी पूरा दिल लगा कर अपने गुरूजी का पैर दबाते थे। गुरूजी भी मेरे पापाजी की ही तरह अपने दोनो पैरों को अपने चेले में बांट रखे थे। बायां पैर पहले चेले के हिस्से में था तो दायां पैर दूसरे चेले के हिस्से में।

एक दिन की बात है, पहला चेला बीमार पर गया। इतना बीमार की उठ भी नहीं सकता था। उस दिन गुरूजी ने दूसरे चेले को कह, "बेटा आज तो वो पहला वाला बीमार पर गया है, सो आज तुम ही मेरा दोनो पैर दबा दो।" इतना सुनना था की दूसरे चेले को गुस्सा आ गया। उसने सोचा की पहले वाले का पैर मैं क्यों दबाऊँ, और ये सोच कर वो एक बड़ा सा पत्थर उठाया और जब तक गुरूजी उसे रोकते तब-तक गुरूजी के बांये पैर को उस पत्थर से तोड़ दिया।

अब अगले दिन पहला वाला चेला ठीक होकर गुरूजी के पास पहुंचा और देखा की गुरूजी का बायां पैर टूटा हुआ है। वो गुरूजी से पूछ कि ये कैसे हुआ। गुरूजी ने उसे सब कुछ बताया। जब उसने सुना की दूसरे चेले ने उसका वाला गुरूजी का पैर तोड़ डाला है तो गुस्से से आग-बबूला हो गया और बदले की सोचने लगा कि कैसे इसका बदला लूं। फ़िर वो भी एक बड़ा सा पत्थर उठा कर लाया और गुरूजी का दायां पैर भी तोड़ डाला। अब गुरूजी बेचारे उन दोनों को कोसने के अलावा कर भी क्या सकते थे।



ये कहानी सुन कर हम सभी भाई-बहन बहुत खुश होते थे और मन ही मन सोचते थे की कितने बुद्धु चेले थे गुरूजी के। हम तो कभी भी ऐसा नहीं करेंगे।


अब ये तो मुझे पता नहीं की पापाजी क्या सोचकर ये कहानी सुनाते थे। पर आज वही कहानी एक याद बन कर दिल में बस गया है। आज हम सभी भाई बहन बड़े हो चुके हैं और भैया-दीदी की शादी भी हो चुकी है, पर उस समय जो हमलोग भागते फिरते थे की पापाजी का पैर दबाना परेगा, आज वही पैर दबाने को तरस जाते हैं। पता नहीं वो चरण देखने कब नसीब होंगे। आज पापा मम्मी पटना में अकेले हैं और मुझे पता है वहां पापाजी का पैर दबाने वाला भी कोई नहीं है!