आज फिर मैं अपनी यायावरी पर निकल गया.. मेरा सोचना है की यायावरी का असली मजा अकेले ही यायावरी करने में आता है.. अगर आपको भरोसा ना हो तो कभी आप भी करके देखिये, मेरा दावा है की आप भी मुझसे सहमत होंगे.. हर बात पर आप बारीक नजर डालेंगे जितना आप उस समय कभी नहीं डाल सकते हैं जब कोई आपके साथ हो.. हर चीज को एक अलग ही नजरिये से देखेंगे..
मेरा सोचना है की अगर आप अकेले जीवन के मजे लेना सिख लिए हैं तो आपको इस दुनिया से कोई शिकायत नहीं रह जायेगी.. अकेलापन ही आपका सच्चा साथी है जो कभी आपका साथ नहीं छोड़ता है..
आज जो मैंने देखा उसे आप मेरी नजर से देखिये..
1. ढेर सारे लोग नए-नए फैसनेबल कपडे पहने हुए और दूसरों को ऐसे देखना जैसे उसकी साडी मेरी साडी से सफेद क्यों? (आज मैं चेन्नई के सबसे बड़े शौपिंग मॉल स्पेंसर प्लाजा गया था)
2. एक देहाती जोड़े को एस्केलेटर पर चढ़ते हुए देखना.. शायद महिला के लिए ये पहला अनुभव था एस्केलेटर पर चढ़ना.. पति उसका हाथ पकर कर चढ़ने लगे तो वो महिला घबरा कर वापस आ गयी और पति देव ऊपर चढ़ गए.. वो महिला सीढ़ी से ऊपर चढ़ना चाह रही थी मगर पति जी वापस आकर फिर से उसका हाथ पकर कर ऊपर ले जाना चाहे और वो महिला घबरा कर अपने पति से लिपट गयी मगर तभी उसे ध्यान आया की वो एक भीड़ भरे जगह पर है और ये जान कर उसका शर्म से दोहरा होते जाना..
उसके बगल से एक व्यक्ति जो टी-शर्ट और थ्री-फोर्थ पहने हुए था उन्हें देखकर ऐसे तन कर उतर रहा था जैसे वो बिना डरे एस्केलेटर पर चढ़ कर कोई बहुत ही महान काम कर रहा है.. :)
3. एक डार्ट से निशाने लगाने का कम्पीटिशन होना जिसे एक बच्चे ने पूरा कर दिखाया और बांकी सारे बरे लोग उसका मुंह देखते रह गए.. क्योंकि कोई भी बड़ा आदमी उसे पूरा नहीं कर पाया..
4. एक बहुत बड़े किताब की दूकान में जाने पर वहां एक भी हिंदी की किताब का ना दिखना.. अधिकतर अंग्रेजी की किताब का होना और कुछ तमिल की किताबें.. बस.. ऊपर से सभी किताब कम से कम २५० रूपये का होना..
5. उसी दूकान में हिंदी सिनेमा की ज्यादा सीडी होना.. जो ये साफ दिखाता है की हिंदी सिनेमा का चलन तमिलनाडू में भी बहुत है.. और दूसरी बात ये की लोग हिंदी नहीं पढना चाहते हैं पर हिंदी सिनेमा देखना चाहते हैं..
नोट : मेरी अगली पोस्ट में यूनुस जी ने मुझसे ज्यादा मेहनत की है जो अभी मेरे ड्राफ्ट में परा है.. उसके बाद मैं कब लिखूंगा मुझे पता नहीं.. जब अपनी बात नहीं कह पाने की कुंठा से ग्रस्त हो जाऊँगा तब लिखूंगा.. या फिर उस कुंठा की वजह से अवसाद ग्रस्त हो जाऊं और फिर से ना लिखूं.. देखिये.. मैं चिट्ठाकारों की दुनिया को अलविदा भी नहीं कह रहा हूँ.. बस अवकाश पर जा रहा हूँ.. पर मैं यहाँ सारे चिट्ठों को पढता भी रहूँगा और उन पर टिपियाता भी रहूँगा.. ज्ञान जी की भाषा में कहूं तो "मेरे होने का दस्तावेजी प्रमाण बन रहा है यह ब्लॉग" क्योंकि जो मैं किसी से नहीं कह पाता हूँ उसे अपने ब्लौग पर डाल देता हूँ..
Keyword : Yayavari, Human Mind, Chennai spencer plaza
मेरा सोचना है की अगर आप अकेले जीवन के मजे लेना सिख लिए हैं तो आपको इस दुनिया से कोई शिकायत नहीं रह जायेगी.. अकेलापन ही आपका सच्चा साथी है जो कभी आपका साथ नहीं छोड़ता है..
आज जो मैंने देखा उसे आप मेरी नजर से देखिये..
1. ढेर सारे लोग नए-नए फैसनेबल कपडे पहने हुए और दूसरों को ऐसे देखना जैसे उसकी साडी मेरी साडी से सफेद क्यों? (आज मैं चेन्नई के सबसे बड़े शौपिंग मॉल स्पेंसर प्लाजा गया था)
2. एक देहाती जोड़े को एस्केलेटर पर चढ़ते हुए देखना.. शायद महिला के लिए ये पहला अनुभव था एस्केलेटर पर चढ़ना.. पति उसका हाथ पकर कर चढ़ने लगे तो वो महिला घबरा कर वापस आ गयी और पति देव ऊपर चढ़ गए.. वो महिला सीढ़ी से ऊपर चढ़ना चाह रही थी मगर पति जी वापस आकर फिर से उसका हाथ पकर कर ऊपर ले जाना चाहे और वो महिला घबरा कर अपने पति से लिपट गयी मगर तभी उसे ध्यान आया की वो एक भीड़ भरे जगह पर है और ये जान कर उसका शर्म से दोहरा होते जाना..
उसके बगल से एक व्यक्ति जो टी-शर्ट और थ्री-फोर्थ पहने हुए था उन्हें देखकर ऐसे तन कर उतर रहा था जैसे वो बिना डरे एस्केलेटर पर चढ़ कर कोई बहुत ही महान काम कर रहा है.. :)
3. एक डार्ट से निशाने लगाने का कम्पीटिशन होना जिसे एक बच्चे ने पूरा कर दिखाया और बांकी सारे बरे लोग उसका मुंह देखते रह गए.. क्योंकि कोई भी बड़ा आदमी उसे पूरा नहीं कर पाया..
4. एक बहुत बड़े किताब की दूकान में जाने पर वहां एक भी हिंदी की किताब का ना दिखना.. अधिकतर अंग्रेजी की किताब का होना और कुछ तमिल की किताबें.. बस.. ऊपर से सभी किताब कम से कम २५० रूपये का होना..
5. उसी दूकान में हिंदी सिनेमा की ज्यादा सीडी होना.. जो ये साफ दिखाता है की हिंदी सिनेमा का चलन तमिलनाडू में भी बहुत है.. और दूसरी बात ये की लोग हिंदी नहीं पढना चाहते हैं पर हिंदी सिनेमा देखना चाहते हैं..
नोट : मेरी अगली पोस्ट में यूनुस जी ने मुझसे ज्यादा मेहनत की है जो अभी मेरे ड्राफ्ट में परा है.. उसके बाद मैं कब लिखूंगा मुझे पता नहीं.. जब अपनी बात नहीं कह पाने की कुंठा से ग्रस्त हो जाऊँगा तब लिखूंगा.. या फिर उस कुंठा की वजह से अवसाद ग्रस्त हो जाऊं और फिर से ना लिखूं.. देखिये.. मैं चिट्ठाकारों की दुनिया को अलविदा भी नहीं कह रहा हूँ.. बस अवकाश पर जा रहा हूँ.. पर मैं यहाँ सारे चिट्ठों को पढता भी रहूँगा और उन पर टिपियाता भी रहूँगा.. ज्ञान जी की भाषा में कहूं तो "मेरे होने का दस्तावेजी प्रमाण बन रहा है यह ब्लॉग" क्योंकि जो मैं किसी से नहीं कह पाता हूँ उसे अपने ब्लौग पर डाल देता हूँ..
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