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Thursday, December 18, 2008

सौ में सौ से ज्यादा नंबर कैसे लायें?

मैंने कुछ दिन पहले अपने कालेज के दिनों का एक पोस्ट लिखा था कि कैसे साफ्टवेयर इंजिनियरिंग पेपर हमे परेशान कर रखा था.. खैर पहला इंटरनल निकल चुका था और उसमें हम सभी फेल हो चुके थे.. अब सुनते हैं आगे का किस्सा..


जब हमने अपनी-अपनी कॉपी देखना शुरू किया तब पता चला कि कॉपी चेक करने वाली मैम को हूबहू किताबी भाषा चाहिये थी और जिसने भी किताबी भाषा का प्रयोग बखूबी किया था बस वही पास हुआ था.. अब जबकी समझ में आ ही गया था तो हम सभी खुद को भरोसा दिला रहे थे, "बेटा तू भी रट्टा मार सकता है.. जो कभी नहीं किया उसे आज कर ही डालो.. मतलब रट्टा मारो.." विकास ने तो यहां तक एलान कर दिया कि दूसरे इंटरनल में जो भी 45 से ज्यादा नंबर ले आयेगा वो साला रट्टू तोता होगा.. वैसे हमने बाद में अपने बीच एक रट्टू तोता को भी पाया, जिसके बारे में मैं बाद में बताता हूं..

जिंदगी में पहली बार मुझे अपने भीतर छुपी इस कला का भी पता चला कि मैं भी रट्टा मार सकता हूं.. दूसरों का तो पता नहीं मगर मैं और विकास दूसरे इंटरनल के 15-20 दिन पहले से ही रट्टा मारना शुरू कर दिये.. हर दिन और कुछ पढ़े चाहे ना पढ़ें मगर एक-दो पन्ने की साफ्टवेयर इंजिनियरिंग जरूर हो जाया करती थी..


यूं ही करते-कराते दूसरा इंटरनल वाला दिन भी आ गया.. उस रात सभी की हालत पहले से भी खराब हो रही थी.. खासतौर पर शिवेन्द्र, रूपेश और संजीव की.. क्योंकि हम सभी रट्टा मारने में सबसे बड़े फिसड्डी थे सो जहां रट्टा मारने की बात आई वहां हालत खराब होनी ही थी.. कुल मिलाकर सबसे अच्छे हालत में विकास था और उसके बाद मैं.. अगली सुबह शिवेन्द्र ने परिक्षा हॉल जाने से मना कर दिया कि नहीं मैं नहीं जा रहा हूं, अगले सेमेस्टर में फिर से यह पेपर दे दूंगा.. उसकी हालत लगभग नर्वस सिस्टम फेल होने जैसी हो चुकी थी.. हम लोग किसी तरह समझा-बुझा कर उसे ले गये कि कुछ भी नंबर आये, मगर चलो और परिक्षा दे ही दो..

परिक्षा देते समय जितना कुछ पढ़ा था, लगा जैसे सब भूल गया हूं.. खैर कुछ दिन बाद नंबर भी आये और हममे सबसे ज्यादा विकास को ही आये.. पूरे 46, पचास में.. उसी ने कहा था कि जिसका 45 से ज्यादा आयेगा वो होगा पक्का रट्टू तोता और उसने खुद को रट्टू तोता साबित कर ही दिया.. मेरे आये थे 28 या 29.. रूपेश का याद नहीं है मगर शिवेन्द्र और संजीव फिर से पास नहीं कर पाये थे.. पास मार्क 25 था..


फिर सेमेस्टर परिक्षा ने भी दस्तक दे ही दिया.. साफ्टवेयर इंजिनियरिंग शायद अंतिम पेपर था.. जब मैं परिक्षा भवन से बाहर निकला तब मुझे पूरा भरोसा था कि मैं पास तो हो ही जाऊंगा, विकास को सोचना ही नहीं था कि पास होगा या नहीं.. उसे तो अच्छे नंबर की चिंता थी.. शिवेन्द्र और संजीव सोच रहे थे कि अगले सेमेस्टर में फिर से देने कि तैयारी करनी परेगी..


क्लास रूम कि एक तस्वीर, क्लास खत्म होने के बाद का

जब मैं परिक्षा दे कर बाहर आया था तब मुझे पूरा भरोसा था की मैं पास हो जाऊंगा मगर जैसे-जैसे मैं होस्टल की ओर बढ़ रहा था वैसे-वैसे मुझे पता चल रहा था कि मैंने इसका उत्तर गलत लिखा है, तो उसका उत्तर गलत लिखा है.. फिर जोड़-घटाव करके देखा तो पाया जितना मैंने सही लिखा है उसमें अगर पूरे नंबर मिल गये तभी पास होऊंगा, नहीं तो मुझे भी तैयारी शुरू करनी ही चाहिये..

अगले सेमेस्टर की नई सुबह.. रिजल्ट आने से पहले एक दिन मैं और विकास कालेज कैंपस में घूम रहे थे और आने वाले रिजल्ट के बारे में बात कर रहे थे.. ऐसे ही जोड़कर देखा तो पाया कि विकास को अगर पूरे सौ नंबर आते हैं तो उसका 'A' ग्रेड बनेगा और 'S' ग्रेड आने के लिये उसे 108 नंबर चाहिये.. और संयोग ऐसा कि उसी शाम रिजल्ट आया.. नेट पर हमने चेक किया तो पता चला कि विकास के 'S' ग्रेड हैं.. और जिसके पास होने की कोई उम्मीद नहीं थी वह भी पास कर गया है.. कुल मिलाकर हमने यही निष्कर्स निकाला की सभी को ग्रेस नंबर मिले हैं इसी कारण सिर्फ विकास ही नहीं और भी कुछ विद्यार्थियों के सौ से ज्यादा नंबर आये थे.. ऐसा ही कुछ सेकेण्ड सेमेस्टर में माईक्रोप्रोसेसर के पेपर में भी हुआ था..


क्लास के बाहर का गैलरी

तो ऐसे हमे सौ में सौ से ज्यादा नंबर भी मिलते थे.. मगर मुझे कभी नहीं मिला.. ;) जब विकास का नंबर देखा था तब मुझे बचपन में कही पापा की बाता याद हो आयी.. वो परिक्षा के समय आशीर्वाद देते थे कि ऐसा लिखना कि मास्टर बोले बेटा कमाल लिखा है सो इसे सौ में एक सौ आठ दे दूं.. :D

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मेरे पिछले पोस्ट पर मेरे कालेज के छोटे भाई क्षितिज ने कमेंट किया था और पूछा था की भैया आपको भी कहां से इस साफ्टवेयर इंजिनियरिंग कि याद आ गयी? उसका जवाब है, "क्या बताऊं भाई, कालेज में पीछा तो छूटा मगर उस दिन मुझे एक ट्रेनिंग लेने के लिये रिस्क एनालिसिस पढ़कर डाक्यूमेंट बनाना पर रहा था.. सो बरबस ही उसकी याद हो आयी.. अब समझ में आ गया है कि इससे जीवन भर पीछा नहीं छूटने वाला है..":)

आप कभी क्षितिज के ब्लौग पर जाईये और उसकी नज्में पढ़िये.. बहुत शानदार लिखता है.. मगर उसे ज्यादा पाठक कभी नहीं मिलते हैं.. सच कहूं तो इतना बढिया नज्म मैं लगातार कभी नहीं लिख सकता हूं..

Wednesday, September 24, 2008

शिव जी कि खुशी का राज

आजकल शिव जी बहुत खुश दिखाई दे रहे हैं.. आखिर हो भी क्यों ना? घर में लैंड लाईन कनेक्शन जो लग गया है.. अरे भाई, माना की यह कनेक्शन बी.एस.एन.एल. का नहीं है, एयरटेल का है.. पर क्या हुआ, आखिर है तो लैंडलाईन ही ना.. अब बिहार के लोगों को क्या पता चलेगा कि चेन्नई में एयरटेल और बी.एस.एन.एल. के नंबरों में अंतर क्या होता है, वो तो बस यही देखेंगे कि लैंड लाईन है या नहीं? अब कोई भी लड़की वाले उसके लिये रिश्ता लेकर आयेंगे तो रिश्ता शिव को पसंद होने पर भी उसे तोड़कर नहीं जायेंगे.. आखिर हम भी अब लैंड लाईन वाले हो गये हैं..

ये वाकया कुछ ऐसा है कि हम लोगों ने अभी घर में ब्रॉडबैंड कनेक्शन लिये हैं.. और उसी कनेक्शन के लिये हमने एयरटेल का लैंड लाईन भी लगवाया है.. चलो भाई, ब्रॉडबैंड कनेक्शन के बहाने अब हम भी लैंड लाईन वाले हो गये हैं.. और सबसे ज्यादा शिव खुश है इस बात पर..

वैसे भी आज-कल शिव पर खुशियों का पहाड़ टूट पड़ा है.. ऑफिस में उसकी टीम सिनेमा देखने का प्लान बना रही है और इस शुक्रवार को देखने भी जा रही है.. अब सिनेमा तो सिनेमा है.. कला को भला कोई जाति-पाती, धर्म-भाषा में बांध कर रख सका है भला? सो उन्होंने विचार किया कि तमिल सिनेमा देखने में भी कोई बुराई नहीं है.. और बन गया प्लान तमिल सिनेमा देखने का.. शिव बहुत खुश है कि इस शुक्रवार को तमिल सिनेमा देखने जा रहा है..

एक और खुशी इस कारण से है कि अभी वो घर जा रहा है.. अब कोई घर जाकर खुश क्यों ना हो भला? मगर उसकी खुशी दोगुनी तब हो गई जब उसने सुना कि उसके ऑफिस की टीम छुट्टियां मनाने ऊंटी जा रही है.. और वो भी तब जब वो अपने घर में होगा.. अब अपने टीम के साथियों को खुश देखकर, जिनके साथ आज-कल वो अपना सबसे ज्यादा समय बिताता है, शिव भला खुश क्यों ना हो? इसे ही कहते हैं टीम स्पिरीट..

शिव तो बेचारा शर्मीला प्राणी है.. अपने जबान से कुछ ना कहेगा.. मगर आप सभी भी उसकी इन खुशियों में शामिल होकर उसे बधाईयां देते जाये.. वो कहते हैं ना खुशियां बांटने से बढती है.. तो उसकी इस तिगुनी खुशी को छः गुनी या फिर साठ गुनी कर दें..

अरे सोच क्या रहे हैं? बस अभी से चालू हो जायें..

इसे पढने वाले यह ना समझ लें कि मैं शिव कुमार मिश्र जी के बारे में लिख रहा हूं.. यह तो हैं हमारे पुराने मित्र शिवेन्द्र कुमार गुप्ता जी..