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Thursday, April 04, 2013

अतीतजीवी

ख़्वाब देखा था, ख़्वाब ही होगा शायद. अक्सर ख़्वाबों में कई दफ़े देखा है उनको अपने पास. बेहद क़रीब. इतना जैसे कि हाथ बढ़ाओ और उन्हें छू लो.

वो आये और आकर चले गए. ऐसे जैसे आये ही ना हों. मगर वो आये थे, इसका गवाह मेरे घर में बसे उनकी खुश्बू दे रहा है. ढेर सारे आशीर्वाद और ममत्व की खुश्बू. कुछ जूठे बर्तन, कुछ चाय के लिए लाया दूध, चायपत्ती कि एक डिब्बी जो अमूमन मेरे घर में नहीं रहती है, उनकी लायी कुछ मिठाइयाँ, चंद तस्वीरें जो मेरे कैमरे में बंद है, जाते समय उनके चेहरे कि मायूसी, जाते वक्त कि उनकी डबडबाई आँखें, पापा का लाल वाला चप्पल जो मेरे लिए छोड़ गए, उनके बिस्तर कि सिलवटें, घर में मौजूद मम्मी के कुछ लम्बे बाल....

कुछ कहते हुए पापा के चेहरे पर ख़ुशी बेसुमार थी. मुझे नहीं पता कि क्या कह रहे थे, मैं तो सिर्फ उनके चेहरे पर चढ़ते-उतरते भाव को ही देख रहा था. उनकी आँखें कभी छोटी, कभी बड़ी हो रही थी. हल्के झुर्रियों वाले चेहरे पर कई भाव आ जा रहे थे. अकचका कर अचानक वो मुझसे पूछते हैं, क्या देख रहे हो? मुझे खुद नहीं पता कि मैं क्या देख रहा था. बस मुस्कुरा भर दिया. होली का पर्व तो बीत चुका था, उल्लास का पर्व अब मनाया जा रहा था. देखा कि उनके गले के पास वाला वो काला मस्सा अभी भी वैसा ही है.

मम्मी के बालों को देखा, जो सामने से अब लम्बे हो गए थे. चेहरे पर कि मांसपेशियां जो पहले तनी रहती थी, अब ढुलक चुकी हैं. पहले तनाव में हमेशा दिखने वाले चेहरे पर अब हमेशा सौम्य सी मुस्कान दिखती रही. अभी बीते कुछ दिनों में अपने कुछ करीबी मित्रों की माँओं से मिलने का मौका मिला था, उन सबके बारे में सोचता हूँ. सब एक सी ही लगती प्रतीत होती हैं. लगता है जैसे एक उम्र के बाद सभी माँओं कि शक्लें एक सी ही हो जाती है. वही वात्सल्य भाव से सराबोर.

पहली रात खाना खाने के बाद पापा/मम्मी को किचेन के सिंक कि ओर बढ़ते देख चिल्लाता हूँ, ऐसे ही रख दीजिये, मैं साफ़ कर दूंगा. वे भी सिर्फ "हूँ" कहकर सिंक में छोड़ दिए. अगली सुबह उनसे थोड़ी देर से जगा तो पाया कि सारे बर्तन साफ़ हैं. अगली रात सारे बर्तन साफ़ करके सोया.

पहली सुबह पापा के फोन से नींद खुली, पता चला कि कहीं गए थे सुबह-सुबह और रास्ता भटक गए. मैं और मम्मी देर तक इस पर हँसते रहे. वापस घर आकर पापा भी हँसते रहे. लगा जैसे पूरा घर खुश है, दीवार और खिड़की पर टंगे परदे भी हंस रहे थे. लगा जैसे घर मुझे घूर रहा है, इतने कहकहे उसने अभी तक एक साथ नहीं देखे थे कभी.

शाम में पापा को लेकर बैंगलोर कि कुछ गलियाँ, कुछ मौसम, कुछ फैशन दिखलाता रहा. उन्हें मेरी बाईक पर बैठने में डर लगता है, पीछे का सीट कुछ ऊंचा है किसी भी स्पोर्ट्स बाईक की तरह इसलिए. फिर भी बिना ना-नुकुर किये मेरे साथ भटकते रहे, इस भरोसे के साथ कि बेटे के साथ हूँ तो क्या डर? और मैं सोच रहा था बचपन से लेकर अभी तक मैं भी तो अपने हर डर पर उनके साथ इसी तरह काबू पाना सीखा हूँ. घर आया तो देखा घर कुछ अधिक व्यवस्थित है, मम्मी काफी कुछ ठीक कर रखी थी.

सोमवार कि सुबह साढ़े आठ बजे तब वे जा चुके थे. पीछे छोड़ गए थे ढेर साडी हिदायतें. ऐसी हिदायतें जिनकी या तो जरूरत नहीं थी, या फिर वे भी जानते थे कि मैं वे सब चीजें पहले से ही करता हूँ, और जो नहीं करता वो आगे भी नहीं करूँगा. मैं उन्हें टैक्सी में बिठा कर वापस आकर घर के हॉल में लगे कुर्सी पर बैठ निर्वात में ताकता रहा. साढ़े नौ बजे अपने तक उसी अवस्था में बैठा सोचता रहा कि क्या वे वाकई यहाँ थे? फिर उठा बेमन से और वापस किसी यांत्रिक मानव कि तरह सारे कार्य करने लगा.

Monday, December 26, 2011

हैप्पी बर्थडे पापाजी

कुछ साल पहले आपको एक खत लिखा था, आपको याद है पापा? ई-मेल किया था आपको? आपने कहा था की इसका जवाब आप मुझे डाक से भेजेंगे.. लगभग तीन साल होने आ रहे हैं, अभी भी इन्तजार कर रहा हूँ उस खत का.. शायद आपको याद भी नहीं हो!!

दसवीं में खराब अंक लाने के बाद भी जब नहीं पढता था तब आपने कहा था, "जितना इस मकान का किराया देता हूँ, उतना भी अगर तुम महीने में कमा लोगे, इसकी उम्मीद नहीं है मुझे.." आपकी उस बात ने मुझे हौसले और आत्म-सम्मान की शिक्षा दी.. मैं जानता हूँ की आपको वह भी याद नहीं!!

छोटे में आप जान बूझ कर मुझसे हर खेल में हार जाते थे और मैं बहुत खुश.. बहुत बाद में ये समझ में आया की आप जान कर हारते थे.. मैं ये भी जानता हूँ कि आपके लिए शायद यह सब उतने महत्व का विषय नहीं होगा जिसे क्रमवार याद रखा जाए, मगर मुझे याद है पापाजी.. कह सकता हूँ की वे सब घटनाएं लगभग क्रमवार याद हैं मुझे.. याद है पापाजी, आप क्रिकेट में बौलिंग करते समय थ्रो फेकते थे? ठीक विकेट को निशाना बना कर?

मैं जानता हूँ कि आप समझते हैं और भरोसा भी करते हैं की मैं झूठ नहीं बोलता हूँ, भले ही कितना भी गलत काम किया रहूँ या फिर उसकी सजा कुछ भी हो.. भले ही सच भी ना कहूँ, मगर झूठ नहीं बोलता हूँ.. बहुत अपराधबोध के साथ कह रहा हूँ, आप गलत थे.. लगभग बीस-बाईस साल पहले, डुमरा वाले घर में, सोफे के गद्दे पर कलम से मैंने ही लिखा था पापा और नकार दिया था की मैंने वह नहीं लिखा है.. बाद में भैया को मेरे बदले डांट मिली थी.. देखिये, आप ये भी भूल गए हैं ना? शायद भैया को भी याद नहीं होगा.. सौरी भैया!!

उन्नीस सौ सतासी-अठासी की बात होगी शायद, आपसे झूठ बोल कर कुछ कॉपी(नोटबुक) खरीदवाया था कि मुझे जरूरत है, और उसे अपने मित्र जितेन्द्र को दे दिया था, जिसके पास कॉपी खरीदने के पैसे नहीं थे.. पहली या दूसरी कक्षा में था तब.. मैं हर उस रात को झूठ बोलता रहा हूँ जिस रात पैसे की कमी के कारण या साधनों की कमी के कारण खाना नहीं खाया.. जानता था कि आपको तकलीफ होगी.. अब आगे से मेरी कही हर बात पर भरोसा मत कीजियेगा पापा!! मैं भी झूठ बोल सकता हूँ..

मेरी सबसे बड़ी कमजोरी यही रही है कि मैं कुछ भूलता नहीं हूँ..

मैं जानता हूँ, आपके तीनों बच्चों में सबसे नालायक और नकारा संतान हूँ मैं.. रेशम की चादर में टाट का पैबंद सा.. मैं भी अपनी जिंदगी की एक तिहाई से अधिक उम्र गुजार चुका हूँ, फिर भी एक भी क्षण ऐसा याद नहीं आता है जिस पर आप अपने उन दोनों बच्चों से भी अधिक गर्व का अनुभव किये होंगे. इन सब के बावजूद मैं जानता हूँ, आप कहें ना कहें, आपने सबसे अधिक प्यार मुझ पर ही लुटाया है.. कई लोगों से सुना है कि बच्चों में जो सबसे मजबूत होता है उसे बाप का प्यार अधिक मिलता है और जो कमजोर उसे माँ का, उनसे कुछ कहता नहीं हूँ, जमाने से बेमतलब की बातों पर बहस क्या करना? मगर अपने अनुभव से मैं कह सकता हूँ की वे झूठ कहते हैं..

कुछ साल पहले किसी बात पर मैंने कहा था कि आज अगर मेरी आखिरी इच्छा पूछी जाए तो वह यही होगी की मेरे पापा मुझे एक बार गले लगा लें.. साल-दर-साल बीतने के बाद आज भी इसमें कोई बदलाव नहीं आया है पापा!!

समय बीतने के साथ कुछ अधिक ही विद्रोही स्वभाव का होता जा रहा हूँ.. बाहरी संसार के लिए शायद थोड़ा कठोर भी हूँ.. मगर मैं जानता हूँ की आपकी मुझे पहले भी जरूरत थी और आज भी है और हमेशा रहेगी.. आठ साल से अधिक हो चुके हैं घर से निकले हुए मुझे, ऐसा लगता है जैसे बड़ा हो कर कोई पाप कर दिया हूँ, आपलोगों ने ऐसे ही छोड़ रखा है, कभी देखने भी नहीं आते हैं की वो बेटा जिसे पलकों पर बिठाए रखते थे, वो कैसे रह रहा है. अपनी जिंदगी कैसे जी रहा है? आई मिस यू टू मच पापा.. प्लीज आ जाईये ना.. प्लीज!!! ऐसा कौन सा जरूरी काम है आपके लिए जो मुझसे अधिक महत्वपूर्ण है!! बस एक बार आ जाईये ना..... प्लीज!!!!!!!

Sunday, May 09, 2010

माँ से जुडी कुछ बातें पार्ट 1

मैंने मम्मी से बचपन में कभी राजा-रानी या शेर-खरगोश कि कहानी नहीं सुनी.. या शायद कोई भी कहानी नहीं सुनी है.. जब से होश संभाला, मैंने उन्हें डट कर मेहनत करते पाया.. पूरे घर को एक किये रहती थी.. और उस एक करने के चक्कर में हम बच्चे उनसे डरे सहमे रहते थे.. किसी बात पर गुस्सा होकर किसी से २-४ दिन या शायद १२-१३ घंटे बात नहीं करती थी.. शायद इसलिए क्योंकि मुझे याद नहीं, वह उम्र कुछ याद करने कि थी भी नहीं और उस उम्र कि बाते अक्सर किसी को याद रहती भी नहीं है.. उनके किसी से बात ना करने के समय अक्सर हम बच्चों को उनके पास भेजा जाता था.. मनाने के लिए नहीं, बस यूँ ही.. और उसमे भी प्राथमिकता मेरे ऊपर ही अधिक होती थी (छोटा होने कि वजह से).. उनके गुस्से कि वजह अक्सर क्या होती थी मुझे नहीं पता, और ना ही मैंने कभी माँ से इस बाबत पूछा है.. मगर अंदाज से बता सकता हूँ कि एक संयुक्त परिवार का सारा बोझ अकेले ढोना ही वह वजह हो सकती थी.. अब इससे अधिक मुझे और कुछ याद नहीं है, आखिर मैं उस समय ४-५ साल से अधिक का नहीं था.. हाँ मगर यह बात जरूर थी कि हम बच्चे माँ से अधिक पिता कि गोद में समय बिताते थे.. पापा जी का गोद हम सभी के लिए सबसे अधिक सुरक्षित जगह हुआ करती थी..

कभी कभी अंतर्मन में बसी हुई कुछ बीती बातें किसी सिनेमेटिक सीन कि तरह फ्लिक करके निकल जाती है.. जिसमे मैं मम्मी कि गोद में बैठ उनसे कुछ उटपटांग बाते पूछता रहता हूँ, वे बाते क्या थी यह नहीं दिखता है.. शायद वैसी ही बाते होंगी जैसे कि दीदी कि बिटिया दीदी से सवाल पूछती है, या फिर भैया का बेटा कुछ और महीने बाद भाभी से वैसे ही प्रश्न पूछे..

जब घर से पहली बार अपनी दुनिया तलाश करने बाहर निकला तब मेरे साथ कुछ अजीब से संयोग बनते गए.. जब पहली बार दिल्ली जा रहा था तब पटना में घर में कोई नहीं था, सभी मुझे कुछ दिन रुक कर जाने के लिए कह रहे थे और मैंने किसी कि ना सुनते हुए अपना सामान बाँधा और निकल गया अपनी जमीन तलाशने.. घर कि चाभी सामने पड़ोस में रहने वाली भाभी को दे दिया.. फिर उसके बाद जब भी घर(पटना) आता तो वहाँ कोई नहीं होता था.. मैं उन्ही पड़ोस वाली भाभी से चाभी लेता, कुछ घंटे आराम करता और गोपालगंज के लिए निकल लेता जहाँ पापा उस समय पोस्टेड थे.. ऐसे ही होते-होते लगभग एक साल निकल गए.. मेरा दिल्ली-पटना-गोपालगंज आना जाना चलता रहा.. मुझे याद है, पहली बार माँ को याद करके दिल्ली के उस एक छोटे से कमरे में रोया था, जिसे लोग बरसाती के नाम से दिल्ली में जानते हैं..

फिर एक दिन अचानक से VIT से MCA के प्रवेश के लिए बुलावा आ गया, और जिंदगी में पहली बार हवाई जहाज कि यात्रा भी कि.. मन में अजीब से ख्यालात भी चलते रहे थे उस ढाई घंटे कि हवाई यात्रा में.. कम से कम उत्साह तो कहीं भी नहीं था.. थोडा सा डिप्रेशन और घबराहट के साथ-साथ मन में यह भी चल रहा था कि पापाजी के मेहनत से कमाए दस हजार इस बेकार कि हवाई यात्रा में खर्च हो रहे हैं.. डिप्रेशन इस बात की थी कि मैं घर जाने और मम्मी से मिलने के लिए छटपटा रहा था.. और घबराहट इस बात की थी कि मेरे पास कुछ भी सामान नहीं है, नई जगह होगी, नई भाषा के साथ-साथ नए लोग भी होंगे.. कैसे सब ठीक से कर पाऊंगा? अंग्रेजी ठीक से बोल नहीं पाता था उस समय, और ऐसे शहर में अकेला जा रहा था जहाँ अंग्रेजी ही एकमात्र माध्यम था बातचीत का.. थोड़ी बहुत उन दिनों भैया से भी शिकायत थी कि कम से कम वही तो मेरे साथ चलते, मगर बाद में समझ आया कि वो भी अपना कैरियर बनाने में उस समय उलझे हुए थे..

खैर, प्रवेश ले लिया और कक्षा शुरू होने में ५-६ दिन थे.. मैंने निर्णय लिया कि वापस पटना जाऊं और मम्मी से मिलने के साथ-साथ अपने जरूरी सामान भी लेता आऊंगा.. रेल से २ दिन वापस पटना आना और २ दिन वापस कालेज जाने को छोड़कर सिर्फ एक या डेढ़ दिन हाथ में थे.. घर फोन करने पर पता चला कि कुछ जरूरी चीजों के कारण पटना में कोई नहीं रहेंगे, और चाभी बगल वाली भाभी के पास रहेगा..

जारी...

Friday, December 19, 2008

कबाड़ी के कबाड़ से निकला यादों का पुलिंदा

अभी कुछ दिन पहले कबाड़खाना पर कुछ गीतों का दौर चल रहा था.. जिसमें सबसे पहले "वो गाये तो आफ़त लाये है सुर ताल में लेवे जान निकाल" सुनने को मिला.. उसमें आये कुछ कमेंट के बाद सिद्धेश्वर जी ने "दिल सख़्त क़यामत पत्थर सा और बातें नर्म रसीली सी" नामक पोस्ट दे मारी.. मुझे भी कुछ जोश आया और मैंने भी एक पोस्ट गीतों के ऊपर ही लिख डाली "पिया बाज प्याला, पीया जाये ना"..

मैंने सिद्धेश्वर जी को एक ई-पत्र भी लिखा.. जिसे लिखते हुये मैं पटना की गलियों फिर से पहूंच गया.. जब मैंने इन गीतों को पहली बार सुना था उस समय मैं तुरंत ही मैट्रिक पास किया था.. कैसेट खरीदने का जिम्मा भैया के हाथों में होता था.. भैया मुझसे बस दो साल बड़े हैं, मगर उस छोटी उम्र में भी ना जाने कहां से अच्छे गीतों कि समझ उनमें पैदा हो गई थी, जबकी हमारे घर में किसी को गीतों कि शिक्षा मिली हो ऐसी कोई बात नहीं थी..

कहां-कहां से ढूंढ कर कभी हुश्न-ए-जाना तो कभी पैगाम-ए-मुहब्बत तो कभी नुसरत कि कव्वालिया तो कभी म्यूजिक टूडे पर आने वाले संगीतों कि श्रृखला खरीद कर लाते थे.. हम दोनो भाई जब भी बाजार जाते थे तो भैया कैसेट कि दूकान पर लपक लेते थे और मैं किताबों कि दुकान पर.. मैं 15 साल का था उस समय और भैया 17 साल के.. मगर शायद ही कभी ऐसा हुआ हो की भैया का खरीदा हुआ कोई कैसेट बेकार या फालतू निकला हो..

जब 12 साल का था तब मैं पहली बार नुसरत को सुना था.. उन दिनों चक्रधरपुर में रहते थे जो कि अब झारखंड में है.. उसे शहर कहना ठीक नहीं होगा, एक छोटा सा कस्बा था वह.. वहां मेरी मौसी नानी रहती थी और मैंने अपने मामा जी के पास नुसरता का वह एल्बम "उनकी गली में आना जाना" सुना और उनसे हमेशा के लिये मांग कर लेता आया.. मुझे याद है कि घर में नुसरत को सुनना उस समय किसी को पसंद नहीं था.. शायद ये 1994 कि घटना है.. उन्ही दिनों बैंडिट क्वीन सिनेमा आयी थी और हमारे उम्र के लड़कों के मुंह से उस सिनेमा कि चर्चा भी एक पाप जैसा समझा जाता था.. उन दिनों मैं विक्रमगंज में पापाजी के साथ था और भैय, दीदी और मम्मी पटना में थे.. एक बार जब मैं घर पहूंचा तब देखा कि भैया बैंडिट क्वीन का कैसेट खरीद रखे हैं और घर में बस नुसरत ही छाया हुआ है.. मैं तो उसका दिवाना इस कदर था कि मेरे मित्र मुझे नुसरत ही कहा करते थे.. अब भी उस जमाने के मित्र कहीं पटना की गलियों में टकरा जाते हैं तो आदाब नुसरत साहब कह कर ही अभिवादन होता है.. अब घर में भैया भी उसे खूब सुनने लगे थे और उनकी दिवानगी कुछ ऐसी हो चुकी थी कि नुसरत साहब की मॄत्यु पर 2-3 दिन तक भैया चुपचाप थे..

अब जबकी नुसरत भैया के हिटलिस्ट में था और कैसेट खरीदना भी उन्हीं के जिम्मे तो एक एक करके भारत में उपलब्ध नुसरत की सभी कव्वालियां और पाश्चात्य संगीत भैया ने घर में सजा दिये.. मुझे याद है कि एक कैसेट उन्हें नहीं मिला था जिसे मैं अब भी ढ़ूंढ़ता हूं.. "Dead Man Walking".. सोचता हूं कभी मिले तो भैया को गिफ्ट कर सकूं.. कुछ दिनों बाद मुन्ना भैया भी पटना आ गये और पत्रकारिता के शुरूवाती दिनों के संघर्ष में जुट गये.. अक्सर वो घर आते थे, और भैया और मुन्ना भैया के बीच गानों को लेकर खूब बाते होती थी.. एक तरफ कैरम और दूसरी तरफ अच्छे कर्णप्रिय गाने.. और मम्मी अपना सर पीटती थी कि पढ़ाई-लिखाई से इस सबको कोई मतलब ही नहीं है.. :)

बस यही कहना चाहूंगा, "काश कोई लौटा दे वो सुकून, चैन से भरे दिन.. गुनगुनी जाड़े की दूप, रविवार कि सुबह, जब हम सभी भाई-बहन और पापा-मम्मी साथ थे.. हर शाम कैरम का दौर चलता था.. जिसमें मैं अक्सर हारा करता था भैया से.. मगर उन्हें कैरम में डर भी मुझ से ही लगता था, क्योंकि कैरम में वो बस मुझ से ही कभी हारा करते थे.. मगर अब ये नहीं हो सकता है.. चिड़ियों के बच्चे अब बड़े हो चुके हैं, अपना आशियां तलाशने को घर से उड़ चुके हैं.. मन में दुनिया को जितने का जज्बा लिये और सर पर पापा-मम्मी का आशीर्वाद लिये.."

तब तक के लिये आप बैंडिट क्वीन सिनेमा का नुसरत का यह गीत सुने..

सजना, सजना तेरे, तेरे बिना जिया मोरा नाहीं लागे ।
काटूं कैसे तेरे बिना बड़ी रैना, तेरे बिना जिया नाहीं लागे ।

पलकों में बिरहा का गहना पहना
निंदिया काहे ऐसी अंखियों में आए
तेरे बिना जिया मोरा नाहीं लागे ।।

बूंदों की पायल बजी, सुनी किसी ने भी नहीं
खुद से कही जो कही, कही किसी से भी नहीं
भीगने को मन तरसेगा कब तक
चांदनी में आंसू चमकेगा कब तक
सावन आया ना ही बरसे और ना ही जाए
हो निंदिया काहे ऐसी अंखियों में आए
तेरे बिना जिया मोरा नाहीं लागे ।।

सरगम खिली प्‍यार की, खिलने लगी धुन कई
खुश्‍बू से 'पर' मांगकर उड़ चली हूं पी की गली
आंच घोले मेरी सांसों में पुरवा
डोल डोल जाए पल पल मनवा
रब जाने के ये सपने हैं या हैं साए
हो निंदिया काहे ऐसी अंखियों में आए
तेरे बिना जिया मोरा नाहीं लागे ।।


गलती से नुसरत के गाये गाने के बजाये कुछ और पॉडकास्ट कर दिया था, मगर जो भी पॉडकास्ट हुआ था उसे भी मैं नहीं हटा रहा हूं क्योंकि वो भी शानदार गाया हुआ है.. वो सारेगामापा के किसी एपिसोड में किसी पाकिस्तानी गायक द्वारा गाया हुआ है.. फिलहाल आप दोनों ही गीतों के मजे लिजिये..
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Saturday, October 18, 2008

एक चिड़िया जो ओ गदही पुकारती थी

मुझे उस चिड़िया का नाम पता नहीं है जो ओ गदही पुकारती थी.. हम तीनों भाई-बहन बहुत छोटे थे उस समय.. मैं छठी कक्षा में था, भैया आठवीं में और दीदी नौंवी में.. पापाजी हम तीनों को अलग-अलग नामों से पुकारते थे.. मुझे पुछरू(अब इस नाम से पुकारे गये जमाना बीत गया है), भैया को नकपिच्चू और दीदी को गदही.. इस नाम से पुकारे जाने पर पूरे जन्म भर का प्यार उमर आता था..(शायद अब भी पुकारे जाने पर वही एहसास रहे.).. दो कमरे और एक ड्राईंग रूम के अलावा दो लैट्रिन-बाथरूम, एक बाल्कनी, रसोई घर, डायनिंग हॉल और एक छोटा सा बगीचा हुआ करता था.. हम सभी सितामढी में रहते थे.. कुछ धुंधली सी यादें जानकी मंदिर कि भी है जिसके बारे में मान्यता है कि सीता जी का जन्म वहीं हुआ था..

बगीचे में 5-6 अमरूद के पेड़ थे, कुछ पपीते के और केला के पेड़ों का एक समूह भी जिसे बहुत छोटे में मैंने ही लगाया था और जब सूखने लगा था तब गुस्से से काट भी दिया था.. मगर बाद में चाचाजी ने उस कटे हुये पेड़ को फिर अच्छे से लगाया तो वह लग गया.. शायद 5-6 साल का रहा हो ऊंगा उस समय.. एक खास तरह कि चिड़िया अक्सर उन्हीं पेड़ों में से किसी पर आकर बैठती थी और "टू नी नी" जैसी आवाज निकालती थी.. एक दिन दीदी को पापाजी ने बताया कि वह ओ गदही पुकार रही है.. मतलब तुम्हें बुलाती है.. बचपन का मासूम मन भी इसे मान लिया.. वैसे भी दीदी किसी आम लड़की कि तरह चिड़िया जैसे उड़ना चाहती थी.. हवाओं को अपने मुट्ठी में बंद कर उड़ाना चाहती थी.. जमाने कि फिक्र से बेफिक्र..

ठीक-ठीक याद नहीं है पर शायद 1992-93 में पापाजी का तबादला चक्रधरपुर, जो बिरसा मुंडा कि कर्मभूमी रह चुकी है और अब झारखंड में है, हो गया.. पापाजी 2-3 महीने या शायद 3-4 महीने के लिये हमलोगों को वहीं छोड़कर वहां चले गये.. हो सकता है 1-2 महीने के लिये ही गये हों मगर वही सालभर से कम नहीं था मेरे बालमन के लिये.. सो अभी तक बस इतना ही याद है कि बहुत दिनों तक नहीं आये थे.. फोन का जमाना उस समय तक हमलोगों के लिये नहीं आया था.. सारा काम चिट्ठियों से ही होता था जो महिने में 2-3 ही मिलते थे.. वो चिड़िया भी लगता था उन्हीं के साथ चली गयी थी.. उसने भी आना कम कर दिया था.. जब कभी ओ गदही जैसी आवाज आती हम दौड़ पड़ते बगीचे कि तरफ.. लगता जैसे पापाजी का संदेश लेकर आयी हो..

सितामढी के बाद कभी भी उस चिड़िया कि आवाज नहीं सुनी.. मैं सोचता था कि कहीं वो भी तो विलुप्त नहीं हो गयी होगी? आज सुबह-सुबह लगभग 5.30 में एक फोन के आने से नींद खुल गई.. बाहर बालकनी में आया तो ठंडी हवा चल रही थी.. आसमान में बादल छाये हुये थे.. तभी कहीं से वही आवाज सुनी.. "ओ गदही" या कह सकते हैं "टू नी नी".. लगा कि बस हम इंसानों की भाषा ही बदलती है.. पंछी-जानवरों कि भाषा हर जगह एक जैसी ही होती है.. लगा जैसे कि वही बचपन फिर से लौट आया है.. मन ख्यालों में डूब गया.. लगा जैसे पापाजी अभी कहेंगे कि देखो स्वीटी, तुम्हें ये चिड़िया "ओ गदही" बुला रही है..

भले ही अब हर दिन घर बात हो जाती है.. जब जिससे संपर्क में आना चाहूं आ सकता हूं.. चौबिसों घंटे मोबाईल भी साथ होता है.. ई-पत्रों से सुविधा और भी बढ गयी है.. मगर उस हाथ के लिखे पत्रों कि महत्ता खत्म नहीं हो सकती है.. उसकी छुवन से वो अहसास कभी नहीं जा सकता है.. हस्तलिपी से आप पल भर में किसी को पास पा सकते हैं.. कुछ दिन पहले मैंने पापाजी को एक ई-पत्र लिखा था जिस पर उन्होंने कहा था कि मैं तुम्हें इसके जवाब में सेन्ड नहीं पोस्ट करूंगा.. 10 दिन हो गये हैं.. अभी तक मुझे मिला नहीं है.. या तो पापाजी भूल गये भेजना या फिर कहीं रास्ते में अटका होगा.. पता नहीं.. खैर अगर भूल गये होंगे तो मेरा यह पोस्ट पढकर याद आ जायेगा..

Sunday, September 14, 2008

सच में मम्मी, कहां फंसा दी

कुछ दिन पहले मैंने अपने एक पोस्ट में अपने भतीजे के जन्म पर एक पोस्ट लिखा था की क्या मम्मी कहां फंसा दी.. वो पोस्ट बस एक मजाक भर में लिखा हुआ था.. खुशियों से भरा हुआ.. मगर कभी-कभी सच में लगता है की क्या मम्मी कहां फंसा दी जन्म देकर.. हर दिन एक नयी चुनौती का सामना करना पड़ता है.. नये अंतर्द्वंद सामने आते हैं.. हर समस्या को हम उचित तरीके से हल नहीं कर पाते हैं तो कुछ समस्याओं का समाधान हमारे बस के बाहर की चीज लगती है, जो होती भी है.. कभी कुछ ना कर पाने का दर्द होता है तो कभी कुछ करने पर भी खोने का डर लगा रहता है..

अगर मैं अपने जीवन के अबतक के बीते हुये सालों पर गौर करता हूं तो पाता हूं की मैं जितना पाने के लायक हूं उतना मुझे कभी मिला नहीं है.. खासतौर पर मैं जो कुछ भी पाने के लिये जी-तोड़ मेहनत करता हूं वो मुझे कभी नहीं मिला है.. जिस किसी से बहुत ज्यादा लगाव होता है, वो मेरे जीवन में क्षणभर से ज्यादा नहीं रहता है.. चाहे वो कोई भौतिक पदार्थ हो या कोई मित्र हो या कोई अपना..

कुछ चीजें इतनी अधिक तकलीफ पहूंचाती है जो मेरे सहनशक्ति से बाहर लगता है.. तब मन में ये जरूर लगता है की क्या मम्मी कहां फंसा दी.. पापा-मम्मी से बहुत ज्यादा लगाव है मुझे, मगर उनसे इतनी दूर हो गया हूं कि जब कभी मुझे उनके साथ की जरूरत होती है तब कभी उन्हें अपने पास नहीं पाया हूं.. स्वभाव कुछ ऐसा मिला है कि अपनी बात अपने भीतर ही रख लेता हूं, किसी से मन की कुछ बात कहना भी चाहूं तो कह नहीं पाता हूं.. कई बार ये भी महसूस हुआ है की अंदर ही अंदर घुटा जा रहा हूं..

कहने को तो ब्लौगिंग एक ऐसा संसार है जहां आप अपने मन की बात बिना किसी सोच-संकोच के रख देते हैं, लिख देते हैं.. मगर हिंदी ब्लौगिंग का चरित्र अंग्रेजी ब्लौगिंग से अलग है.. यहां हम सभी सार्वजनिक होते हैं.. अब ऐसे हालात में अपने मन की बात को सार्वजनिक करना भी उचित नहीं होता है.. किसी सीमा में रहकर ही अपने मन की बात लिखता हूं.. सच कहूं तो मैं अभी भी अंदर ही अंदर घुट रहा हूं.. क्या करूं, कहां जाऊं कुछ समझ में नहीं आ रहा है..

जाता हूं मम्मी से बात करने.. उन्हें कहने.. उनसे पूछने.. कि क्या मम्मी कहां फंसा दी जन्म देकर..

कुछ दिनों से ब्लौगजगत से बिलकुल बाहर हो चला था.. अपने कुछ निजी कारणों से.. अपने अगले पोस्ट में बताता हूं यहां चेन्नई में किये गये बाढ सहायता कार्यों के बारे में..

Wednesday, June 25, 2008

अब मैं बड़ा हो गया हूँ माँ..


जो आप नहीं कर पाई,
वो दुनिया ने कर दिखाया..
अब मैं बड़ा हो गया हूँ माँ..

कुछ अच्छा लगता है तो
मुस्कुरा देता हूँ..
कुछ बुरा लगता है तो
मुस्कुरा देता हूँ..
अब मैं बड़ा हो गया हूँ माँ..

वो अछूत सी लगने वाली सब्जी,
भी अब खा लेता हूँ..
रात में अब चावल से भी
परहेज नहीं है..
अब मैं बड़ा हो गया हूँ माँ..

कोई अब पूछता नहीं,
की कहाँ जा रहे हो..
कोई अब पूछता नहीं
की किससे मिल के आ रहे हो..
अब मैं बड़ा हो गया हूँ माँ..

कोई अब पूछता नहीं
की खाना खाए या नहीं..
कोई अब पूछता नहीं
की खाए तो क्या खाए..
अब मैं बड़ा हो गया हूँ माँ..

कोई दोस्त अब कहीं
बुलाते नहीं..
उनके साथ ना जाने पर
पहले जैसे कुछ सुनाते नहीं..
हर पल ये अहसास दिलाते हैं..
अब मैं बड़ा हो गया हूँ माँ..

कुछ मिलने पर ना अब वो
पहले सा उत्साह आता है..
ना कुछ खोने पर आँखें
नम होती है..
अब मैं बड़ा हो गया हूँ माँ..

जिसकी चाहत बचपन से थी,
बड़ा होने की..
अब वो नहीं चाहता हूँ..
पर क्या करूं माँ..
अब मैं बड़ा हो गया हूँ माँ..

ये कविता मैंने बहुत पहले लिखी थी.. मदर्स डे पर.. मुझे याद है, मम्मी बहुत भावुक हो गई थी इसे पढ़कर..

Tuesday, April 22, 2008

Marriage Anniversary

आज मेरे पापा-मम्मी का वैवाहिक वर्षगांठ है..

इससे ज्यादा मुझे कुछ नहीं कहना है आज..

मुझे उनकी बहुते याद आ रही है..

I am missing You Papa-Mummy... :(