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Tuesday, April 06, 2010

मां रेवा तोरा पानी निर्मल, खलखल बहतो जायो रे!!


अभी कुछ दिनों पहले रविश जी ने फेसबुक पर "इंडियन ओशन" के एक गीत "मां रेवा" का जिक्र करते हुये कहा था "मां रेवा...तेरा पानी निर्मल..कल कल बहतो जाए...इंडियन ओशन का जब यह गाना सुनता हूं तो मां रेवा हलक के भीतर उतरने लगती है। नर्मदा के दीदार की तमाम ख्वाहिशें मचलने लगती हैं। इंडियन ओशन का संगीत सकारात्मक उन्माद पैदा करता है।"

उनका लिखा यह पढ़ते ही यह गीत सीधा दिल तक उतर आया.. अपने लैपटॉप के हार्डडिस्क में खूब ढ़ूंढ़ा मगर कमबख्त जाने कहां गुमा हुआ सा बैठा था कि नहीं मिला.. फिर इंटरनेट महाराज ने मुझ पर असीम कृपा दिखाई और मैंने यह गीत डाउनलोड करके अपने मोबाईल में डाल लिया..

ईश्वर जैसी चीजों को मैं हमेशा से ही नकारता रहा हूं, मगर मानता रहा हूं कि विश्व कि किसी भी सभ्यता के शुरूवाती क्षणों में लोग प्रकृति की ही पूजा किया करते थे.. वे हर उन चीजों को पूजते थे जिसे वह जीवन के लिये जरूरी मानते थे.. हमारी भारतीय संस्कृति में भी हम नदियों को मां और पर्वतों को पिता का दर्जा देते आये हैं..

मैंने कभी मां नर्मदा को देखा नहीं है.. बचपन उत्तर बिहार के लखनदेई नदी और चक्रधरपुर के पहाड़ी नदी के किनारे बीता है और किसोरावस्था से जवानी की दहलीज तक पांव रखते हुये मां गंगे को नजदीक से देखा हूं, सो यह गीत सीधा दिल को चीर कर अंदर तक घुसता प्रतीत होता है.. रविश जी सच ही इसे एक सकारात्मक उन्माद का नाम दिये हैं.. एक ऐसा उन्माद जो आपको प्रकृति की ओर खिंचता है..

मां रेवा तोरा पानी निर्मल,
खलखल बहतो जायो रे..
मां रेवा!!!

अमरकंठ से निकली है रेवा,
जन-जन कर गयो भाड़ी सेवा..
सेवा से सब पावे मेवा,
ये वेद पुराण बतायो रे!!

मां रेवा तोरा पानी निर्मल,
खलखल बहतो जायो रे..
मां रेवा!!!


शाम तक इसे पॉडकास्ट करता हूं..


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बाद में जोड़ा गया..