Showing posts with label दीपावली. Show all posts
Showing posts with label दीपावली. Show all posts

Saturday, November 08, 2008

"कैसी रही दीपावली?"

दीपावली बीत जाने के बाद इस यक्ष प्रश्न ने कई बार रास्ता घेरा तो कईयों से मैंने भी यही पूछा.. दीपावली बीते कई दिन हो गये और अब तो छठ भी बीत गया है, मुझे पता है कि कैसे अगले साल कि दीपावली आ जायेगी ये भी पता नहीं चलेगा.. जो याद रह जायेगा वो बस यह कि पिछली दीपावली कैसी थी.. फिर से मैं किसी से पूछूंगा कि "कैसी रही दीपावली?" और कुछ लोग मुझसे भी यही प्रश्न करेंगे..

चलिये मैं आपको बताता हूं कि कैसी रही मेरी दीपावली..

जब आप घर से 2500 किलोमीटर दूर अकेले, अपने दोस्तों के साथ होते हैं और कोई खास पर्व आपके सामने होकर गुजर जाता है तो यह पल बहुत चुभते हैं.. बस वैसी ही रही मेरी भी दीपावली.. बचपन को याद करके नौस्टैल्जिक भी खूब हुआ.. मुझे याद आ रहा था कि कैसे मैं घर के सबसे छोटे सदस्य कि भूमिका बखूबी निभाता था.. मिठाई और पटाखों कि लंबी सूची बनाता था.. कई बार घर के लोग मना भी करते थे कि इतने पटाखे मत लो.. ये बस पैसे कि बरबादी है.. मगर अधिकतर मेरी मांगे पूरी हो ही जाती थी.. जो मांगें पूरी नहीं होती थी उनके बारे में मैं सोचता था कि बड़ा होकर खूब मस्ती करूंगा.. जैसे बड़े होने पर लोगों के पास पैसे अपने आप आ जाते हैं.. अब दुनिया की नजर में बड़ा भी हो चुका हूं, पैसे भी कमाने लग गया हूं.. मगर ना जाने कहां से एक संकोच कि दिवार भी खड़ी हो गई है.. पैसे आने पर उसे बचाने का भी सोचने लगा हूं.. यह बात और है कि कुछ बचता नहीं है.. :)

सबसे ज्यादा तब अखरा जब मन में पटाखे खरीदने कि इच्छा भी नहीं हुई.. डर सा गया.. कहीं यह बड़ा होने कि निशानी तो नहीं है? कहीं मैं बड़ा तो नहीं हो गया हूं? बचपन तो बचपन, 20 साल का होने के बाद भी चुटपुटिया चलाने वाली पिस्तौल हर दीपावली पर खरीदना नहीं भूलता था.. अपने अपार्टमेंट के कुछ बच्चों को उसे चलाता देख अच्छा लगा.. लगा जैसे कि बचपन अब भी वैसा ही है जैसा आज से 20 साल पहले हुआ करता था..

पिछले साल कि दीपावली भी याद आई, जब मैं 3 साल के बाद दीपावली में घर पर था.. मगर मेरे लिये वो दीपावली इसलिये खास थी क्योंकि भैया कि शादी के समय मैंने नयी-नयी नौकरी करनी शुरू कि थी जिस कारण छुट्टी नहीं मिल रही थी और मैं बिलकुल मेहमान कि तरह 2 दिनों के लिये घर गया था.. भाभी से ठीक से बाते भी नहीं कर पाया था.. अब उसके बाद पहली बार घर जा रहा था और वो भी दीपावली मे.. अब मुझसे ज्यादा खुश और कौन हो सकता था?

यूं तो मैं पूजा-पाठ से कोशों दूर रहता हूं मगर पिछले साल दीपावली में पूजा के समय आरती बहुत मन से गाया था.. आरती गाने के पीछे कारण श्रद्धा नहीं बल्की गीत था जो मैं गा रहा था.. उस आरती वाले विडियो का प्रयोग इस दीपावली में बखूबी हुआ.. घर में बस शिवेन्द्र ही था जिसके हिस्से पूजा-पाठ करने कि जिम्मेदारी थी, मगर उसे लक्षमी-आरती याद नहीं थी और उस खाली स्थान को मेरे गाये पिछले साल के आरती वाले विडियो से भरा गया..

अक्सर घर में साफ सफाई चलती ही रहती है खासकर तब से जब हमारे घर में खटमलों ने हमला बोला था मगर अब हम उस हमले को पूरी तरह से नेस्तनाबूत कर चुके हैं.. :) मगर उस दिन पूरे घर कि सफाई सुबह उठ कर मैंने और मेरे मित्रों ने कि.. अपना घर सजाने के लिये ना जाने कितने ही मकड़ियों का घर उजाड़ दिया.. दोपहर में अफ़रोज़ भी आ गया.. घर में गैस पिछले 2-3 दिनों से नहीं था और किसी के पास ऑफिस से उतना समय नहीं मिल रहा था कि गैस भराया जाये, सो यह काम भी उसी दिन करना था.. उत्तर भारत में दीपावली के दिन लोग अपनी दुकानें खुला रखते हैं और उनके बीच यह मान्यता है कि दुकान जितना चलेगा, लक्ष्मी उतना ही घर में आयेगी.. मगर उसके ठीक उलट यहां लोग अपनी दुकाने बंद किये हुये थे.. घर के पास वाले जिस होटल में हम खाते हैं, वो भी बंद था सो दुसरे होटल में जाना परा.. गैस वाले ने गैस तो रख ली मगर बोला कि आज ही दे पाना संभव नहीं होगा.. सो उस दिन बिना गैस के ही काम चलाना पड़ा..

सांझ ढलते-ढलते प्रियंका भी घर आ गयी.. फिर शिवेन्द्र और प्रियंका जाकर कुछ दिये और मोमबत्ती का इंतजाम भी कर आये.. थोड़ी देर बाद प्रियंका अपने घर पूजा करने चली गयी.. रात में जितनी थोड़ी सी गैस बची हुयी थी उससे मैगी बनाई फिर सो गये.. जहां फोन पर बधाईयां देनी थी वह भी दे डाला मगर बाहर से फोन कम ही आये, क्योंकि उत्तर भारत में दीपावली अगले दिन था..

अब सोचता हूं तो लगता है कि कैसे किसी पर्व-त्योहार पर पापा-मम्मी हमारी लगभग हर मांग पूरी करते थे? उनके पास कोई कुबेर का खजाना तो था नहीं.. वही बंधा-बंधाया वेतन मिलता था.. पांचवे वेतन आयोग के आने से पहले तो बहुत ही कम हुआ करता था.. अब पाता हूं कि हमारी हर मांग को पूरा करने के लिये वो कहीं ना कहीं अपने भविष्य कि योजनाओं में कटौती करते रहे होंगे.. क्योंकि अब समझ गया हूं, बड़े होने पर पैसा अपने आप नहीं चला आता है.. उसके लिये मेहनत करनी होती है..

अभी मैं सोच रहा था कि डा.अनुराग जी जैसे ही कोई त्रिवेणी हम भी अंत में लगाते हैं.. कुछ अजीब सा बन पड़ा जो मैं नहीं लिखने वाला हूं.. उम्मीद है डा.साहब ही अब इसका इलाज करेंगे.. :D