Wednesday, April 02, 2008

छुट्टियों का एक और दिन---पार्ट 1

9 मार्च की सुबह जब मैं ट्रेन की खिड़की का पर्दा हटा कर देखा तो आरा दिखने लगा था.. मुझे ऐसा लगने लगा की जैसे पटना की खुश्बू मेरे सांसों में आने लगी है.. वैसे मैं ये जानता हूं की कि ये सब बस कहने की बातें हैं, मगर क्या कहूं दिल नहीं मानता.. जैसे-जैसे पटना पास आता जा रहा था वैसे-वैसे बेचैनी बढती जा रही थी.. लग रहा था की थोड़ी और जल्दी क्यों नहीं आ रहा है.. ट्रेन जो कि रात में 2 घंटे लेट थी वो भी सही समय पर हो गई थी, मगर फिर भी मन में लग रहा था की मैं लेट हूं.. शायद इसका कारण् ये हो कि मैं जब दिल्ली में रहता था तब के और अब के ट्रेन के समय में बहुत अंतर आ गया है..

दानापूर से गुजरते हुये मैंने सोचा की क्या भैया को तंग करूं, जबकी उन्होंने कहा था की जब दानापूर से गुजरोगे तब मुझे फोन कर देना.. मैं लेने आ जाउंगा.. खैर अंततः मैंने भैया से मिलने के लालच से और औटो के धक्के के बदले भैया को ड्राईवर बना कर घर जाना ज्यादा पसंद किया;) और भैया को फोन कर ही दिया.. बाद में पता चला कि भैया तो फोन के बाद भी आने के मूड में नहीं थे मगर भाभी ने उन्हें धमका कर रखा था की एक ही तो भाई है आपका और आप उन्हें भी लाने नहीं जाना चाहते हैं? ऐसे ही मैं अपनी भाभी को अपनी प्यारी-प्यारी भाभी नहीं कहता हूं.. :D


मुझे सबसे ज्यादा खुशी और आश्चर्य इस बात का हुआ की भैया के साथ-साथ पापाजी भी आये हुये थे मुझे लेने के लिये जो साधारनतया नहीं आते हैं..

अगले अंक में तनुजा की शादी, और स्नेहा की छोटी बहन खुश्बू का मेरे घर आना और मेरा उसके साथ उसके कालेज जाना जहां से मैंने भी BCA किया है.. और साथ में ढेर सारी तस्वीरें भी.. :D

2 comments:

  1. ऐसे ही खुशी मिलती रहे।

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  2. चलिये जी, पटना की रिपोर्टिंग करते रहियेगा।

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