Monday, December 10, 2007

मानवाधिकार दिवस और मेरी दीदी

आज 10 दिसम्बर है, आज मानवाधिकार दिवस है, आज मेरी दीदी का जन्मदिन है। अब चूंकि आज मानवाधिकार दिवस के दिन मेरी दीदी का जन्म हुआ है तो ये स्वभाविक है की जब भी अपने अधिकारों को लेकर दीदी कुछ कहती तो बस हम दोनों छोटे भाई चिढाना चालू कर देते कि मानवाधिकार दिवस के दिन पैदा हुई है सो हर समय उसी की बातें करती रहती है।

बात उन दिनों कि है जब भैया अपनी पढाई के लिये घर से बाहर निकल गये थे, पापाजी भी पटना से बाहर पदस्थापित थे और घर में बस मम्मी, दीदी और मैं था। दीदी को हर दिन मैं मैनेजमेंट क्लास के लिये छोड़ने जाता था और घर लौटने पर एक दूसरे को घंटो बैठ कर अपने-अपने कालेज के किस्से सुनाते थे। दीदी को कालेज छोड़ने का मेरा यह क्रम लगातार दो सालों तक चलता रहा, चाहे कितनी भी ठंड हो या वर्षा हो रही हो, या फिर हम दोनों के बीच झगड़ा ही हुआ हो। मगर मेरा यह क्रम कभी भी नहीं टूटा।

किसी भी समझदार परिवार की तरह मेरे घर में भी दीदी की इच्छाओं का सबसे ज्यादा ख्याल रखा जाता था और जब तक हम दोनों भाई छोटे थे तब तक हम दोनो ही इससे बहुत ज्यादा चिढते थे। और उस पर भी कभी-कभी जब दीदी महिला अधिकारों की बाते करती थी तो लगता था की पुरूष अधिकार की रक्षा संबंधी कोई संघटन क्यों नहीं बनाया जाता है। :)

दीदी के भीतर बौद्धिक क्षमता कूट-कूट कर भरी हुई है। उनमें तार्किक शक्ति और बौद्धिक क्षमता का सामंजस्य अद्भुत है।

मैं कभी भी पाप-पून्य और भूत-भगवान को नहीं माना हूं, पर मुझे लगता है कि मैं सच में बहुत नसीब वाला हूं जो मुझे ऐसी दीदी मिली। दीदी मुझसे 3 साल बड़ी है और जब मैं छोटा था तब हमारे बीच जब कभी भी झगड़ा होता था तो मैं दीदी को बहुत मारता भी था। पर दीदी उस समय भी, जब उनमें शारीरिक शक्ति मुझसे बहुत ज्यादा थी, कभी मुझपर हाथ तक नहीं उठाया। उल्टा जब दीदी को रोता देख कर पापाजी मुझे मारने आते थे तब मुझे उनसे मुझे बचाती ही थी।

आज दीदी जयपूर में मेरे जीजाजी और मेरी दो भांजीयों के सथ रह रही है। और उनका गृहस्थ जीवन बहुत सुखी है। और मैं इतनी दूर हूं उनसे की वहां जाने का सोचने के लिये भी दो महिने पहले से ही योजना बनानी पड़ती है।

मैं इस चिट्ठे से अपनी दीदी को बस इतना ही कहना चाहूंगा कि, "दीदी, आप मेरा मार्गदर्शन हमेशा करते रहना। जब भी मैं कहीं भटकने लगूं तो मुझे सही राह दिखाना। और अगर अगले जन्म जैसी कोई चीज भी होती है तो हर जन्म में मेरी दीदी बन कर मुझपर अपनी ममता बिखेरते रहना।"



सन् 2002 का पटना संजय गांधी जैविक उद्यान में लिया गया चित्र.. जिसमें पापा, मम्मी, दीदी और मैं हूं..

9 comments:

  1. hi.. I am Manoj Kumar. i have read this and i like it very much.. such type can be write only by the unique person and prashant is also an unique person...

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  2. यादों की गठरी से अच्छा समान निकला आपने.
    पढ़ कर अच्छा लगा.
    आपकी दीदी और उनके परिवार के लिए शुभकामनाएं.

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  3. अच्‍छा है । दीदी को जन्‍मदिन मुबा‍रक ।

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  4. अविनाशDecember 10, 2007 7:25 PM

    जन्‍मदिन मुबारक स्‍वीटी।

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  5. दीदी को जन्‍मदिन मुबा‍रक पढ़ कर अच्छा लगा

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  6. बहुत अच्छा, बहुत स्नेह झलकता है इस पोस्ट से। आपकी दीदी को भी स्नेह।

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  7. ""दीदी, आप मेरा मार्गदर्शन हमेशा करते रहना। जब भी मैं कहीं भटकने लगूं तो मुझे सही राह दिखाना। और अगर अगले जन्म जैसी कोई चीज भी होती है तो हर जन्म में मेरी दीदी बन कर मुझपर अपनी ममता बिखेरते रहना।""

    आपकी दीदी भाग्यशाली हैं जो आप जैसे भैया मिला, एवं आप भाग्यशाली हैं जो आपको ऐसी दीदी मिली. ईश्वर कर हर परिवार में ऐसा ही हो.

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  8. Acha laga aapke blog ko padhkar. Parivarikta mein racha-basa blog hai. Bhid se hat kar. Aisi hi mithi yaaden bantte rahiye. (Abhishek Mishra)

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  9. धरोहर जी, अच्छा लगा जो आप मेरे चिट्ठे पर आये और इतना पुराना पोस्ट भी उठा कर पढने के साथ टिपण्णी भी किये.. धन्यवाद

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