कल रात सोने से पहले मुझे इस ब्रह्मज्ञान का पता चला की मैं पागल हूं और आज जब मैंने अपने ब्लौग पर टिप्पणीयां देखी तो मन खुश हो गया की चलो एक पागल के पागलपने से भरे हुये बातों को भी लोग पढते हैं और लगे हाथों टिप्पणीयां भी करते हैं। डा. साहब कि बातों को मान कर अपने तकनीक संवाद नामक ब्लौग को फिर से जीवंत करने की इच्छा हो गई जिसे मैं तब तक के लिये टालना चाह रहा था जब तक कि मैं घर पर नेट कनेक्सन ना ले लूं।
खैर चलिये आज पहले मेरी ये कविता पढिये और मुझे गरियाईये इतनी बेकार सी पागलपने से भड़ी कविता पढाने के लिये। :D
मैं पागल हूं,
क्योंकि मैं सोचता हूं..
मैं पागल हूं,
क्योंकि मैं पूरे समाज को,
एक चश्में से देखने की कोशिश करता हूं..
मैं पागल हूं,
क्योंकि मैं अंग्रेजी को,
अपना सब कुछ मानने वाले समाज में,
भी हिंदी बोलना चाहता हूं..
मैं पागल हूं,
क्योंकि मैं अपना समय बरबाद होने की चिंता छोड़कर,
दूसरों की मदद करना चाहता हूं..
मैं पागल हूं,
क्योंकि मैं महाराष्ट्र या गुजरात नहीं,
बिहार जाना चाहता हूं..
मैं पागल हूं,
क्योंकि मैं किसी जलसे में,
किसी के कपड़े फाड़ने के पक्ष में नहीं हूं..
मैं पागल हूं,
क्योंकि ऐसे लोगों को दुनिया,
पागल ही कहती है..
और मैं खुश हूं,
क्योंकि मैं पागल हूं..
Tuesday, February 05, 2008
मैं पागल हूं
द्वारा PD at 12:20:00 AM
चिप्पी: आज-कल, मानव मन, व्यंग्य, स्वप्न की चाह, हिंदी
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5 टिप्पणी:
आज समाज को आप जैसे पागलों की सख्त जरूरत है प्रशांत जी.
तभी देश को विभक्त करती ताकतों से बचाया जा सकता है.
धन्यवाद.
यदि यह सब पागलपन है तो मुझे खुशी है कि आप पागल हैं । हो सके तो अपने कुछ मित्रों को भी पागल कर डालिये ।
घुघूती बासूती
god bless you, always!
इन पागलों के दिमागों में खुशियों के लच्छे हैं.
हमें पागल ही रहने दो कि हम पागल ही अच्छे हैं!!
बहुत ही खूबसूरत है आपका यह पागलपन
ईश्वर हर आदमी को आपकी तरह पागल बनाए
और पागलखाना अपन के जयपुर में हो
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