Monday, February 04, 2008

मायूसी भरे दिन

आज अपना भेजा खपा कर कुछ भी लिखने का मन नहीं कर रहा है पर समय भी तो काटना है। कमबख्त साफ्टवेयर बनाने वालों कि भी अजीब जिंदगी होती है। जब काम मिले तो इतना की अपनी झोली तो भड़े ही भड़े दुसरों कि झोली भी खीचने का मन करने लगे और जब काम ना हो तो बस भैया ठन ठन गोपाल।

हम तो भैया आज-कल ठन ठन गोपाल वालों की जमात में शामिल हैं। दिन भर सभी को ललचाई निगाह से देखते रहते हैं। किसी के पास कोई काम हो तो दे दो भाई, अब ब्लौग पढ कर जिंदगी नहीं कटती। सुबह सुबह आफिस आकर बस नेट पर ही अपनी पसंद कि चीजों को ढूंढकर समय बिताता हूं जैसे तैसे।

पिछले 1-2 महीनों से बस इसी हालत में जिंदगी काट रहा हूं। आज ही डा. महेश परिमल जी का ब्लौग पढ रहा था उसमें उन्होंने लिखा था की जब हम अपनी जिंदगी को बोझ समझने लगते हैं तभी ये जुमला इस्तेमाल करते हैं। अब वे तो बड़े ज्ञानी आदमी हैं, मैं अभी इस हालत में नहीं हूं की उनका कहा झुठला सकूं और मेरे साथ आजकल यही सच्चाई भी है।

हर दिन सुबह आफिस आना और चुपचाप बिना किसी काम के अपने क्यूबिकल में शाम तक बैठना मेरे लिये किसी जंग को जितने से कुछ अलग नहीं है। ना सो सकते हैं, ना कोई विडियो देख सकते हैं, ना कोई गाना सुन सकते हैं और ना ही कोई काम है। पर लाग इन टाइम और लाग आउट टाइम में कम से कम आठ घंटे का अंतर तो होना ही चाहिये। अब आप ही कहिये ये भी भला कोई बात है?

वो तो फिर भी मैं खुद को थोड़ा खुशकिस्मत समझता हूं की मैं अभी फिलहाल ऐसे टीम में हूं जहां आर्कुट और यूट्यूब कोछोड़कर कुछ भी बैन नहीं है, नहीं तो ब्लौग भी नहीं होता समय बिताने के लिये। ना गूगल पर रोज का समाचार ही पढ पाता।

खैर देखिये मायूसी का ये दौर कब रूकता है। कब मैं सुबह-सुबह उठूं और मुझे ये नहीं सोचना परे कि आज आफिस में क्या करूंगा। कब मुझे ये सोचने का मौका भी ना मिले कि आज का दिन कैसे काटूंगा। कई लोगों को तो ये किसी जैकपाट से कम नहीं लगता होगा की बैठे-बिठाये पूरा पैसा मिल जाता है, पर मुझे तो फिलहाल ये दिन किसी पहाड़ से कम नहीं लग रहा है। अब मुझसे और नहीं लिखा जाता। कोई मेरी हालात पर तरस तो खाओ।
बू हू हू हू............


9 टिप्पणी:

Dr.Parveen Chopra said...

Dear PD, take it easy! 'coz everyday comes with a bunch of opportunities. मुझे जहां तक याद है आप ने कुछ सुंदर से लिरिक्स किसी गीत के अपनी एक पोस्ट पर लिखे थे। चलिए, हम आप को व्यस्त रखने के लिए कुछ होम-वर्क देते हैं( नहीं, नहीं, आफिस वर्क)...आप बलोगिंग के क्षेत्र में कुछ ऐसा कर के दिखाएं जो अभी तक किसी ने नहीं किया हो और जिस पर हम सब को नाज़ हो और हमें भी बलोगिंग में नया करने की प्रेरणा मिले। चूंकि आप साफ्टवेयर का काम करते हैं तो आप को तो हिंदी बलोगिंग के लिए कुछ करना ही होगा। शुरूआत में चलिए हम सब को यह ही बताएं कि हम अपनी पोस्ट को कैसे आकर्षक बना सकते है..कोई आसान सा तरीका सुझाएं कि टैक्सट को कैसे हाईलाइट किया जाता है, कैसे तरह तरह के बुलेट मार्कस टैक्सट पर लगाये जाते हैं...ऐसी ही छोटी छोटी टिप्स हम से किसी पोस्ट के द्वारा शेयर करें। यह जो इस कमैंट बोक्स के नीचे आ रहा है कि you can use some HTML tags such as B, I and A ....यह सब मेरे जैसे लोगों के लिए काला अक्षर भैंस बराबर है। इस का मतलब समझाएँ। देखिए, पीडी , आप को कितने काम अभी करने हैं.....उदास होने की आप के पास फुर्सत ही कहां है। cheer up! god bless you!!

Gyandutt Pandey said...

आप कुछ लिखें और लोगों से सपोर्ट की अपेक्षा रखें तो ब्लॉग जगत पर डा. चोपड़ा जैसे लोग बड़ी आत्मीय टिप्पणी के साथ मिलते हैं। यह हिन्दी ब्लॉगरी की ताकत है।
आप वर्तमान मूड से बाहर आयें और मस्त रहें। यह कामना है।

सिरिल गुप्ता. said...

आपके पास काम नहीं? यहां सालों से जो काम के हालात बने हुये हैं, उन्हें आम क्या करें...

बस ये ख्वाहिश ही रह जाती है कि कभी थोड़ी फुर्सत मिले तो दिल से करीबी कुछ नई तकनीक सीखें, या प्रोजेक्ट बना लें.

रवीन्द्र रंजन said...

पीडी जी, मैंने कंप्यूटर की कोई शिक्षा नहीं ली लेकिन मुझे इसमें बहुत रूचि है। साफ्टवेयर की दुनिया भी मुझे बहुत लुभाती है। आपके पास तो बहुत से काम हैं। कुछ हमें भी बतायें साफ्टवेयर के बारे में। अपने ब्लाग के जरिये।

Udan Tashtari said...

जल्द ही बैंच से हटें...काम शुरु हो...शुभकामनायें..तब तक ब्लॉगिंग में ठकाठक मचाये रहें. :)

Kakesh said...

काश कोई हमें बोले कि काम नहीं करना है बस ऎसे ही पैसा मिलेगा.:-)

anuradha srivastav said...

सकारात्मक रुप से लें ..... शायद भविष्य निर्माण में अभी का चिन्तन काम आये।

Dr.Mahesh Parimal said...

प़शांत प़ियदर्शा जी
आपने अपने ब्लाग में मेरा जिक़ करते हुए मुझे बडा अादमी बताया है यह गलत है कभी बताउँगा तॊ आप आश्चर्य करेंगे बहुत ही छॊटा आदमी हूँ भई मेरा ब्लाग पढकर मेरे विचारॊं से सहमत हुए यही बहुत है इस दुनिया में हर आँख आँसुऒं का समुन्दर है कॊई इसे छिपा लेता है कॊई नहीं छिपा पाता बस यही है जिंदगी
महेश परिमल

Dr.Mahesh Parimal said...

प़शांत प़ियदर्शा जी
आपने अपने ब्लाग में मेरा जिक़ करते हुए मुझे बडा अादमी बताया है यह गलत है कभी बताउँगा तॊ आप आश्चर्य करेंगे बहुत ही छॊटा आदमी हूँ भई मेरा ब्लाग पढकर मेरे विचारॊं से सहमत हुए यही बहुत है इस दुनिया में हर आँख आँसुऒं का समुन्दर है कॊई इसे छिपा लेता है कॊई नहीं छिपा पाता बस यही है जिंदगी
महेश परिमल