Monday, January 12, 2009

एक कला और सिखला दो

सपने बुनने कि कला,
तुमसे सीखा था मैंने..
मगर यह ना सोचा,
सपने मालाओं जैसे होते हैं..
एक धागा टूटने से
बिखर जाते हैं सारे..
बिलकुल मोतियों जैसे..
वो धागा टूट गया या तोड़ा गया?
पता नहीं!!
लेकिन सपने सारे बिखर गये..
बिखरे सपनो को फिर कैसे सजाऊं,
तुमने यह नहीं बताया था..
खुद से इस कला को कैसे सीखूं?
आ जाओ तुम,
सिर्फ एक बार..
एक कला और सीखनी है तुमसे..

10 comments:

  1. मतलब कि कलाएं सीखते रहना जरूरी है जी!!


    अच्छा भावः प्रदर्शन !!

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  2. सुंदर भाव ..नाजुक कविता ...बधाई

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  3. कविता निस्सन्देह बहुत अच्छी है।

    एक धागा टूट जाने पर मनकों को दुबारा माला में गूंथने के लिए धागा नया लेना होता है।

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  4. बहुत लाजवाब अभिव्यक्ति.

    रामराम.

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  5. सुन्दर। जिसे सपने बुनने की कला आ गयी, उसे मानो सृजन की कला आ गयी।

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  6. बहुत सुंदर भाव सपने ही नई राह की तरफ़ ले जाते हैं ..

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  7. दिल से लिखते हैं जनाब...एक बार उन्हें भी सुना दीजिए। विश्वास कीजिए वे खुद ही पास आकर इस माला के मोतियों को वापस माला में बदल देंगी।

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  8. हम क्या सिखायें, खुद ही इस जुगत में जिन्दगी गुजारे दे रहे हैं. सब समय सिखा देगा, नो टेन्शन.

    इस बहाने रचना बेहतरीन बन पड़ी है, बधाई.

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  9. ये माला कौन की जुगाड़ लाये??

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