Friday, June 13, 2008

जब अल्लाह मेहरबान तो गधा पहलवान(भाग 3)

कैंपस सेलेक्सन के दिनों में हर दिन एक नई अफवाह सुनने को मिलता कि आज ये कंपनी आने वाली है.. प्राईवेट कालेज होने के कारण कालेज प्रशासन कभी सही खबर का खुलासा नहीं करती थी.. हर दिन उड़ते-उड़ते खबर मिलती थी कि आज शाम तक या कल सुबह तक फलाना कंपनी आ रही है और ये खबर ना सिर्फ उनके लिये महत्वपूर्ण होता था जिनका कैंपस सेलेक्सन नहीं हुआ था बल्की वे भी खुश होते थे जिनका कैंपस हो चुका था.. कारण के ,सभी अपने साथ-साथ अपने सभी दोस्तों को भी नौकरी के साथ देखना चाहते थे.. सबसे बरी बात तो ये थी कि कैंपस के समय में क्या दोस्त और क्या दुश्मन.. बस पूरी कक्षा एक थी.. जिनसे कोई मदद कि उम्मीद भी नहीं कर सकते थे वे भी हर समय मदद के लिये तैयार रहते थे.. हां, अपवाद हर जगह होता है और यहां भी थे.. कुछ ऐसे भी थे जो कैंपस सेलेक्सन के साथ ही बदल गये थे.. अपने पास कि एक नयी दुनिया को पहचानने का ये मौका था सभी के लिये.. सफलता के साथ लोगों को बदलते देखने का ये एक अलग अनुभव था.. जिंदगी हर रोज कुछ नया सिखाती है और ये सबक कुछ ज्यादा ही कठोर था..

(पिछले भाग से जारी...)
आई.बी.एम. में भले ही मेरा सेलेक्सन नहीं हुआ था मगर मेरे कई प्रिय मित्रों जैसे चंदन, वाणी, प्रियंका, प्रियदर्शीनी का सेलेक्सन आई.बी.एम. में हो गया था.. सच कहूं तो मन थोड़ा उदास तो था मगर ये उदासी अपने उन मित्रों के चेहरे कि खुशी के सामने बहुत कम थी.. बस ये अफसोस रह गया कि अगर मैं भी इसमें सेलेक्ट हो गया रहता तो इन्हीं के साथ आफिस में भी कुछ दिन और गुजारने का मौका मिल जाता..

मेरे लिये अगली कंपनी थी एच.पी... हम सारे लोग, जो बचे हुये थे, पूरे जोर शोर के साथ उसका रिटेन देने के लिये गये.. वहां पी.पी.टी.(प्री प्लेसमेंट टॉक) में ही कुछ नकारात्मक बातें उभर कर आ गई थी.. फिर भी सभी परीक्षा दिये.. हमारे वे सभी मित्र जिनका सेलेक्सन किसी और कंपनी में हो चुका था वो परीक्षा भवन के बाहर चक्कर लगाते रहे.. और ये सिलसिला लगभग पूरे सेमेस्टर चला.. जब मैं नहीं बैठता था तब मैं भी बाहर चक्कर लगाता रहता था.. मन में ये सोचते हुये कि इस बार सभी दोस्तों का कहीं ना कहीं सेलेक्सन हो जाये.. जब एच.पी. का रिजल्ट आया तब हमने पाया कि वो बस एम.टेक. के विद्यार्थियों का ही सेलेक्सन किये थे.. किसी भी बी.टेक. या एम.सी.ए. के विद्यार्थी रिटेन के बाद साक्षात्कार के लिये नहीं चुने गये थे.. चूंकि पेपर बहुत ही आसान था सो सभी ये उम्मीद लग कर बैठे थे कि इंटरव्यू के लिये तो हम चुन ही लिये जायेंगे.. बाद में पता चला कि उन्होंने बी.टेक. और एम.सी.ए. के विद्यार्थियों का पेपर चेक ही नहीं किया था..

वैसे मैं जब बाहर आया था तब मेरा सोचना दूसरों से कुछ अलग था और मैंने बहुत ज्यादा उम्मीद नहीं लगा रखी थी.. क्योंकि पेपर बहुत आसान आया था और मेरा मानना था कि कट-ऑफ बहुत ऊपर जायेगा.. ये कुछ बातें मैंने उस समय सीखी थी जब मैं बैंक पी.ओ. कि तैयारी करता था.. उस समय मैंने जाना था कि किस प्रश्न को कब हल किया जाये और किस प्रश्न को कब छोड़ दिया जाये.. मेरा किसी बैंक में तो नहीं हुआ(क्योंकि मैं एम.सी.ए. करने वेल्लोर आ गया था), मगर उस समय कि गई तैयारी का फायद मुझे अभी तक मिल रहा है.. कहते हैं न, परिश्रम कभी निष्फल नहीं जाता है..

मेरे लिये अगली कंपनी पटनी कंप्यूटर साल्यूसन PCS थी.. इसमें मैं और मेरे कई और साथी रिटेन के लिये बैठे.. सभी अपने लिये एक व्यूह तैयार करके आये थे और जिहोंने व्यूह नहीं बनाया था वो परीक्षा हॉल में आकर किसी ना किसी व्यूह में शामिल हो गये.. व्यूह कुछ ऐसा कि थोड़ा-थोड़ा सभी उस तरह के प्रश्न हल करेंगे जिसे हल करने में उन्हें महारत हाशिल है और उसे सभी से बांट लिया जायेगा.. मेरे पास पहले से कोई इस तरह की योजना नहीं थी मगर वहां पहूंचकर और ये माहौल देखकर अपने लिये मैं भी व्यूह तैयार करने लगा.. आमतौर पर कई कंपनी इस तरह की परीक्षा में कालेज प्रशासन का सहयोग नहीं चाहती है और किसी तीसरे पक्ष पर ज्यादा भरोसा करती है.. पी.सी.एस. ने भी माईंड ट्रैक नामक तीसरी कंपनी पर भरोसा किया था जो इस तरह के काम में एक्सपर्ट मानी जाती है..

मैं भी अपने कुछ चुनिंदा दोस्तों के साथ व्यूह बना कर बैठ गया.. मगर ठीक परीक्षा शुरू होने से पहले मुझे जगह बदल देने के लिये कहा गया और मुझे दूसरे छोड़ पर बैठ जाने के लिये कहा गया.. पहले तो लगा कि ये मेरे साथ ठीक नही हुआ, मगर फिर ये भी ख्याल आया कि पहले भी मैं अपने भरोसे ही आया था और फिर से अपने भरोसे ही परीक्षा दूंगा.. उस परीक्षा में खूब चोरी चली और किसी को भी उससे ऐतराज नहीं था.. ना लड़कों को और ना ही कालेज प्रसाशन को..

(क्रमशः...)


ELECTRIFYING PERFORMANCE: VIT University students perform at a Western music programme at `Riviera '07' in Vellore on Monday. — Photo: D. Gopalakrishnan
साभार द हिंदू


15 comments:

  1. And also we ensure that when we enter in this specific blog site we see to it that the topic was cool to discuss and not a boring one.

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  2. Your blog is very creative, when people read this it widens our imaginations.

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  3. कितनी कड़ियाँ हैं और?
    ऐसा महसूस हो रहा है कि कोई टीवी सीरियल देख रहा हूँ।
    लगे रहिए।
    टिप्पणी बाद में करेंगे।
    शुभकामनाएं

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  4. पहलवानी वाकई मुश्किल है ना असल जिंदगी मे ....वो भी पेन से ?

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  5. जारी रहिये..बढ़िया चल रहा है.

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  6. पुराणिक जी से उधार टिप्पणी - जमाये रहिये।

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  7. तीन रील निकल गयीं, अब तक पता नहीं चला कि ये कौन पहलवान गधा है जो इस स्टोरी का नायक है. इसकी एंट्री कब होगी?

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  8. हम भी इँतज़ार कर रहे हैँ ..
    जानते हैँ ये सफर
    आसाँ तो नहीँ रहा होगा -

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  9. maza aata hai...aapka blog padhne mein. sunate rahiye aise hi apni zindjgi ki daastaan..

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  10. प्रशांत, इस तरह के अनुभव से बहुत सारे लोगों को सीखने को मिलेगा....अगली कड़ी का इंतजार है.

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  11. सच मामला जम भी गया है और लोहा पुरी तरह गरम हो चुका है.
    उम्मीद है अगली कड़ी में हतौडा जरुर पड़ेगा.

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  12. bhaiyya aap kitna mast likhte ho!!achcha laga Vit ke baare mein padh ke

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  13. आप सभी का बहुत बहुत धन्यवाद..

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