Sunday, November 09, 2008

त्रिवेणी फिर कभी, आज यह कविता सही


कविता से पहले मैं अनुराग जी को धन्यवाद देना चाहूंगा कि उन्होंने मुझे त्रिवेणी संबंधित कुछ बढिया बाते बताई.. वैसे मैंने एक लिखी भी है मगर वो किसी और में डालूंगा.. पता नहीं वो त्रिवेणी ही है या कुछ और.. :)
परछाई

किसी परछाई का हाथ थामा है आपने?
मैंने थामा था एक बार..
कोरोमंगला कि तेज-भागती सड़कों पर..
हल्की बारिश कि बूंदों के बीच..
ट्रैफिक के हूजूमों में..
कभी ऑटो वाले को रुकने का
इशारा करते हुये..
तो कभी उसकी
खिलखिलाती हंसी के बीच..

अब भी उन सड़कों पर पहूंच कर,
अपने अस्तित्व का अहसास
खत्म सा महसूस होता है..
मानो पूरी दुनिया किसी परछाई में,
सिमट कर रह गई हो..
यह परछाई दिनो-दिन
और गहरी होती जाती है..
जैसे अमावस रात कि कालिमा..
फिर भी अच्छा लगता है,
उस परछाई का हाथ थामना...

9 comments:

  1. बहुत ही सुंदर लिखा है आपने। बधाई।

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  2. बहुत सुंदर कविता लिखी आपने ! शुभकामनाएं !

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  3. अच्छा है। ब्लॉगरी सब में अन्तस्थ कवि को स्वर देती है। लिखते रहो।

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  4. Wah..wa
    अच्छी रचना पीडी जी

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  5. बहुत खूबसूरत खयाल हैं. अक्सर लोग यह नहीं पहचान पाते कि जिस शख्स का उन्होंने हाथ थाम रखा है, वह जीता-जागता है या सिर्फ़ एक परछाईं...! अक्सर जुड़े हाथों के दरमियान ही सबसे जियादह फासले होते हैं.

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  6. यहाँ आने और सराहने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद.. :)
    वैसे कार्तिकेय जी ने बिलकुल सही फरमाया है.. "अक्सर जुड़े हाथों के दरमियान ही सबसे जियादह फासले होते हैं."

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