Tuesday, February 24, 2009

एक लड़की के डायरी के पन्ने(पहली मुलाकात - भाग दो)

उन पांच सेकेण्ड में मैंने उसकी कई बातों पर गौर किया.. गर्मजोशी से हाथ मिलाना, हाथों पर सफेद रंग का बैंड, कार्गो जींस, नाईकी के जूते, टी-शर्ट, हाथों में कोई घड़ी नहीं, और भी ना जाने क्या-क्या.. इस बीच मैं उसे अपनी बातों में उलझाये रखी.. यहां का काम खत्म हुआ या नहीं? अभी तक की यात्रा कैसी रही? मुंबई वापस कब जाना है? वगैरह-वगैरह.. मैं उसके जवाबों की परवाह किये बिना लगातार उसकी बात सुने जा रही थी.. एक सवाल के जवाब ने मुझे आश्चरय में डाल दिया.. मैंने पूछा, "इतना लेट किया मैंने, आप तो मुझे गालियां दे रहे होंगे?" और उसने कहा,"हां!" मैं बिलकुल चौंक गयी, मेरे लिये यह उत्तर आश्चर्यजनक इसलिये था क्योंकि मैंने पहली ही मुलाकात में अभी तक इतने स्पष्टवादी व्यक्ति से नहीं मिली थी.. क्या कोई इस तरह भी उत्तर दे सकता है? कम से कम सामान्य शिष्टाचार तो इसकी इजाजत नहीं देता है.. मगर यह लड़का!! उफ्फ!!! नो कमेंट्स एज पर नॉउ अबॉउट इट.. इस बीच शायद वह भी यह महसूस कर चुका था कि मुझे यह पसंद नहीं आया, सो उसने भी अपनी बातों को ढ़कने की बेहतरीन कोशिश की जिसे मैंने अपने मुस्कान के साथ सहमती दे दी जैसे मैं कह रही हूं कि मैं समझ गयी..

बातें करते हुये हम उस शौपिंग माइल के अंदर चले गये.. मुझे समझ नहीं आता है कि लोग मॉल के पीछे इतने पागल क्यों होते हैं? आई जस्ट हेट मॉल्स.. पता नहीं भविष्य में मेरे यह विचार बदलते हैं या नहीं.. अभी से इस पर कुछ भी कहना ठीक नहीं.. हम दोनों ही कहीं बैठने के लिये जगह तलाश कर रहे थे और एक कॉफी शौप में घुस गये.. बरिस्टा नाम था उसका, शायद..

मैं कई तरह की स्मृतियों को संजोने में लगी हुयी थी और दूसरी चीजों की परवाह करनी छोड़ दी थी.. किसका फोन आ रहा था मेरे मोबाईल पर मुझे इसकी भी परवाह नहीं थी.. जाने क्यों मेरी प्राथमिकतायें बदल चुकी थी.. मैंने उस फोन को नजर अंदाज करते हुये उसे ऐसे देखने की कोशिश करने लगी कि उसे समझ में ना आये कि मैं उसकी एक-एक गतिविधि को गौर कर रही हूं.. फिर से फोन.. इस बार मैं फोन उठा लिया और उसकी ओर ध्यान से देखने लगी.. वह मेनू कार्ड पढ़ने व्यस्त था, और थोड़ी ही देर में काऊंटर पर उसका आर्डर देने और पैसे देने मे व्यस्त हो चुका था.. जब तक वह वापस आता तब तक मैंने फोन रख दिया.. अब उसकी बारी थी, कोई उसे फोन कर रहा था.. शायद उसकी मां थी.. रौंग गेस.. दीदी..

खैर जो भी हो, छोटी सी बात करके उसने फोन रख दिया और मुझे अपने दोस्तों और घर वालों की तस्वीरें अपने मोबाईल में दिखाने लगा.. इस चक्कर में मेरी अंगुली से उसकी अंगुली टच हो गई.. यह तीसरी बार ऐसा हुआ.. उफ्फ.. पता नहीं क्यों मैं यह गिनती गिने जा रही हूं.. फिर उसने मेरा मोबाईल पूरे अधिकार से ले लिया, बिना पूछे.. मैंने भी मना नहीं किया, जैसे उसे पता था कि मैं बुरा नहीं मानूंगी.. थोड़ी देर बस यूं ही हाथों में नचाता रहा और बाते भी करता रहा.. यहां आने में उसके साथ क्या क्या हुआ? ऑटो वाला कैसे बातें कर रहा था.. उसके ऑफिस में आजकल क्या चल रहा है.. मेरा काम कैसा चल रहा है.. अपने कालेज के किस्से.. एकेडमिक अचिवमेंट्स.. और भी ना जाने क्या-क्या...

फिर मेरे मोबाईल के कौंटैक्ट में जाकर अपने नाम "संजय जी" को बदल कर "संजू" कर दिया.. मैं अभी तक सोच में हूं कि मैंने कई महिनों का समय लिया मगर "संजय जी" को "संजूं" नहीं कर पायी वहीं उसे यह कैसे इतनी आसानी से कुछ ही सेकेण्ड में कर दिया.. बातें करते करते उसके पिछले प्यार पर पता नहीं कैसे बातों का रूख मुड़ गया.. उसने साफ तौर पर नकार दिया मगर मैंने उसकी आखों में अब भी उस प्यार की झलक देख ली.. पता नहीं क्यों, मुझे कुछ जलन का भी अहसास भी हुआ जो क्षणिक था.. क्योंकि उसके प्यार को लेकर उसकी आंखों में सच्चाई दिख रही थी.. पहला प्यार इतनी आसानी से पीछा नहीं छोड़ता है, और ना ही भुलाये भुलता है.. शायद यह सच है.. "खैर छोड़ो.." यह हम दोनों ही एक साथ बोले और दोनो ही हंस दिये..

एक लड़की के डायरी के पन्ने(पहली मुलाकात - भाग एक)

14 comments:

  1. हाँ मैंने पसंद पर भी क्लिक कर दिया ...ताकि ज्यादा लोगों तक पहुंचे

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  2. डायरी के पन्ने पढ़े जा रहे हैं....
    धन्यवाद.

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  3. पहला प्यार इतनी आसानी से पीछा नहीं छोड़ता है, और ना ही भुलाये भुलता है.. शायद यह सच है।

    शायद नही सच हैं। बस डायरी के पन्ने पलटे जाओ।

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  4. बहुत बढिया जी . हम भी पढे जा रहे हैं.

    रामराम.

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  5. प्रणाम
    उत्सुकता लगा कर छोड़ दिया की अब गए क्या होगा . पन्ने जरा जल्दी से पलटे.
    धन्यवाद

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  6. बढ़िया चल रहा है। आगे जानने की उत्सुकता बनी हुई है।
    घुघूती बासूती

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  7. bhawnao aur vicharo ka bahut achha sangum,wah bahut badhiya

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  8. हम्म बढ़िया आगे जानने की उत्सुकता रहेगी

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  9. दिलचस्प मुलाकात....खूबसूरत अंदाज़-ऐ - बयां...
    नीरज

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  10. इतना सुंदर लिखते हो भाई! अब तक कहाँ थे? बहुतों को विस्थापित कर दोगे। जिओ।

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  11. @ क्योंकि उसके प्यार को लेकर उसकी आंखों में सच्चाई दिख रही थी.. पहला प्यार इतनी आसानी से पीछा नहीं छोड़ता है, और ना ही भुलाये भुलता है.. शायद यह सच है..





    ******बहुत बढीया। सुन्दर॥

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  12. "mumbai" fir se aana kab hoga?...bhram mein daalne ki koshish

    bahut chhoo gaya ye post aapka...umeed hai is baare mein kabhi khulke baat hogii :)

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