Friday, December 19, 2008

कबाड़ी के कबाड़ से निकला यादों का पुलिंदा

अभी कुछ दिन पहले कबाड़खाना पर कुछ गीतों का दौर चल रहा था.. जिसमें सबसे पहले "वो गाये तो आफ़त लाये है सुर ताल में लेवे जान निकाल" सुनने को मिला.. उसमें आये कुछ कमेंट के बाद सिद्धेश्वर जी ने "दिल सख़्त क़यामत पत्थर सा और बातें नर्म रसीली सी" नामक पोस्ट दे मारी.. मुझे भी कुछ जोश आया और मैंने भी एक पोस्ट गीतों के ऊपर ही लिख डाली "पिया बाज प्याला, पीया जाये ना"..

मैंने सिद्धेश्वर जी को एक ई-पत्र भी लिखा.. जिसे लिखते हुये मैं पटना की गलियों फिर से पहूंच गया.. जब मैंने इन गीतों को पहली बार सुना था उस समय मैं तुरंत ही मैट्रिक पास किया था.. कैसेट खरीदने का जिम्मा भैया के हाथों में होता था.. भैया मुझसे बस दो साल बड़े हैं, मगर उस छोटी उम्र में भी ना जाने कहां से अच्छे गीतों कि समझ उनमें पैदा हो गई थी, जबकी हमारे घर में किसी को गीतों कि शिक्षा मिली हो ऐसी कोई बात नहीं थी..

कहां-कहां से ढूंढ कर कभी हुश्न-ए-जाना तो कभी पैगाम-ए-मुहब्बत तो कभी नुसरत कि कव्वालिया तो कभी म्यूजिक टूडे पर आने वाले संगीतों कि श्रृखला खरीद कर लाते थे.. हम दोनो भाई जब भी बाजार जाते थे तो भैया कैसेट कि दूकान पर लपक लेते थे और मैं किताबों कि दुकान पर.. मैं 15 साल का था उस समय और भैया 17 साल के.. मगर शायद ही कभी ऐसा हुआ हो की भैया का खरीदा हुआ कोई कैसेट बेकार या फालतू निकला हो..

जब 12 साल का था तब मैं पहली बार नुसरत को सुना था.. उन दिनों चक्रधरपुर में रहते थे जो कि अब झारखंड में है.. उसे शहर कहना ठीक नहीं होगा, एक छोटा सा कस्बा था वह.. वहां मेरी मौसी नानी रहती थी और मैंने अपने मामा जी के पास नुसरता का वह एल्बम "उनकी गली में आना जाना" सुना और उनसे हमेशा के लिये मांग कर लेता आया.. मुझे याद है कि घर में नुसरत को सुनना उस समय किसी को पसंद नहीं था.. शायद ये 1994 कि घटना है.. उन्ही दिनों बैंडिट क्वीन सिनेमा आयी थी और हमारे उम्र के लड़कों के मुंह से उस सिनेमा कि चर्चा भी एक पाप जैसा समझा जाता था.. उन दिनों मैं विक्रमगंज में पापाजी के साथ था और भैय, दीदी और मम्मी पटना में थे.. एक बार जब मैं घर पहूंचा तब देखा कि भैया बैंडिट क्वीन का कैसेट खरीद रखे हैं और घर में बस नुसरत ही छाया हुआ है.. मैं तो उसका दिवाना इस कदर था कि मेरे मित्र मुझे नुसरत ही कहा करते थे.. अब भी उस जमाने के मित्र कहीं पटना की गलियों में टकरा जाते हैं तो आदाब नुसरत साहब कह कर ही अभिवादन होता है.. अब घर में भैया भी उसे खूब सुनने लगे थे और उनकी दिवानगी कुछ ऐसी हो चुकी थी कि नुसरत साहब की मॄत्यु पर 2-3 दिन तक भैया चुपचाप थे..

अब जबकी नुसरत भैया के हिटलिस्ट में था और कैसेट खरीदना भी उन्हीं के जिम्मे तो एक एक करके भारत में उपलब्ध नुसरत की सभी कव्वालियां और पाश्चात्य संगीत भैया ने घर में सजा दिये.. मुझे याद है कि एक कैसेट उन्हें नहीं मिला था जिसे मैं अब भी ढ़ूंढ़ता हूं.. "Dead Man Walking".. सोचता हूं कभी मिले तो भैया को गिफ्ट कर सकूं.. कुछ दिनों बाद मुन्ना भैया भी पटना आ गये और पत्रकारिता के शुरूवाती दिनों के संघर्ष में जुट गये.. अक्सर वो घर आते थे, और भैया और मुन्ना भैया के बीच गानों को लेकर खूब बाते होती थी.. एक तरफ कैरम और दूसरी तरफ अच्छे कर्णप्रिय गाने.. और मम्मी अपना सर पीटती थी कि पढ़ाई-लिखाई से इस सबको कोई मतलब ही नहीं है.. :)

बस यही कहना चाहूंगा, "काश कोई लौटा दे वो सुकून, चैन से भरे दिन.. गुनगुनी जाड़े की दूप, रविवार कि सुबह, जब हम सभी भाई-बहन और पापा-मम्मी साथ थे.. हर शाम कैरम का दौर चलता था.. जिसमें मैं अक्सर हारा करता था भैया से.. मगर उन्हें कैरम में डर भी मुझ से ही लगता था, क्योंकि कैरम में वो बस मुझ से ही कभी हारा करते थे.. मगर अब ये नहीं हो सकता है.. चिड़ियों के बच्चे अब बड़े हो चुके हैं, अपना आशियां तलाशने को घर से उड़ चुके हैं.. मन में दुनिया को जितने का जज्बा लिये और सर पर पापा-मम्मी का आशीर्वाद लिये.."

तब तक के लिये आप बैंडिट क्वीन सिनेमा का नुसरत का यह गीत सुने..

सजना, सजना तेरे, तेरे बिना जिया मोरा नाहीं लागे ।
काटूं कैसे तेरे बिना बड़ी रैना, तेरे बिना जिया नाहीं लागे ।

पलकों में बिरहा का गहना पहना
निंदिया काहे ऐसी अंखियों में आए
तेरे बिना जिया मोरा नाहीं लागे ।।

बूंदों की पायल बजी, सुनी किसी ने भी नहीं
खुद से कही जो कही, कही किसी से भी नहीं
भीगने को मन तरसेगा कब तक
चांदनी में आंसू चमकेगा कब तक
सावन आया ना ही बरसे और ना ही जाए
हो निंदिया काहे ऐसी अंखियों में आए
तेरे बिना जिया मोरा नाहीं लागे ।।

सरगम खिली प्‍यार की, खिलने लगी धुन कई
खुश्‍बू से 'पर' मांगकर उड़ चली हूं पी की गली
आंच घोले मेरी सांसों में पुरवा
डोल डोल जाए पल पल मनवा
रब जाने के ये सपने हैं या हैं साए
हो निंदिया काहे ऐसी अंखियों में आए
तेरे बिना जिया मोरा नाहीं लागे ।।


गलती से नुसरत के गाये गाने के बजाये कुछ और पॉडकास्ट कर दिया था, मगर जो भी पॉडकास्ट हुआ था उसे भी मैं नहीं हटा रहा हूं क्योंकि वो भी शानदार गाया हुआ है.. वो सारेगामापा के किसी एपिसोड में किसी पाकिस्तानी गायक द्वारा गाया हुआ है.. फिलहाल आप दोनों ही गीतों के मजे लिजिये..
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20 comments:

  1. कोई लौटा दे मेरे बिते हुऐ दिन...:(

    और क्या कहें..

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  2. बेहतरीन पोस्‍ट भाई अभी साउन्‍ड कार्ड ठीक नही है, इस लिये गीन नही सुन सके।

    महाशक्ति

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  3. भाई हमें तो पता नहीं हुआ क्या है . दो चीजें पहले अति प्रिय थीं . एक गीत सुनना और दूसरा क्रिकेट कमेंट्री सुनना . अब एक का भी शौक नहीं रहा .

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  4. वे शुरुआती सकून के दिन कभी नहीं लौटते। सही है जीवन कभी वापस नहीं लौटता, यादों के सिवा।

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  5. बिते हुये दिन कभी नही लौटते ! गीत बहुत ही सुन्दर हैं !

    राम राम !

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  6. बहतरीन पीडी साहब.

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  7. carrom se to ham bhi purane dino me laut gaye...hamare yahan bhi jab sab bhai bahan jutt-te the to carrom ke bahut round hote the. accha raha yaadon ki galiyon se gujarna.

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  8. नही लौटते भाया ...तभी तो अनमोल है.....हम भी रोज इस यादो की टंकी में एक डुबकी लगा ही लेते है.....रिचार्ज होने में आसानी रहती है .....

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  9. jaade ki dopahar mein chhat par baithke puraane dino ko jab yaad karta hoon ek ajeeb si anubhootii hoti hai...Nusrat ji ka vaise main bhi fan hoon but utna zyaada suna nahi hai umko

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  10. जमाये रहो संस्मरण मित्रवर।

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  11. यह पोस्ट छुट जाती तो बहुत अफ़सोस होता ...आप कितने बदल गए हैं ...या जबरजस्ती ख़ुद को बदल रहें हैं

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  12. खुद को बदलने में ही भलाई है बाबू.. क्या करोगी.. बदलाव ही जीवन है.. बस यही कोशिश है कि आदतें ही बदले स्वभाव नहीं..

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  13. चलो भैया, कबाड़ ने आपको स्मॄतियों के कबाड़खाने तक की यात्रा करवाने मदद की, जानकर अच्छा लगा.

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  14. अतीत के पिंजरे में बैठा यादो का पंछी पर फडफडाता है । मन का बरगद उखड-उखड जाता है । ऐसे विवरण अपने साथ बहा ले जाते है ।

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  15. खामोशी के लम्हों में कभी अतीत की उन शामों को याद करने का अपना ही एक आनंद होता है जब दूर से किसी किसान के घर लौटते समय की तान सुनाई पड़ जाय या कोई चरवाहा अपनी बांसुरी की तान से भेड-बकरी को हांकता गुज़र जाता था।

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  16. सही कहा आपने भइया ..पर बदलने की भी एक सीमा होनी चाहिए ..वरना इन्सान ख़ुद से ही अनजान होकर रह जाता है

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  17. बेहद सुँदर गीत और यादेँ उससे भी अच्छी
    स स्नेह,
    - लावण्या

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  18. HR भाई साहब, ये आखिरी बार है जब मैं आपके स्पाम जैसे इस कमेन्ट को पब्लिश कर रहा हूँ.. अगर कोई लिंक दे भी तो एक ही, नहीं तो शायद मैं कहीं ना डिलीट कर दूँ..

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