Saturday, June 11, 2011

एकालाप

किसी के कमेन्ट का इच्छुक नहीं हूँ, सो कमेन्ट ऑप्शन हटा रहा हूँ.. मेरे करीबी मित्र अथवा कोई भी, कृपया इस बाबत फोन या ईमेल करके भी ना ही पूछें तो बेहतर होगा.. इसे एकालाप मान कर ही चलें, जिसमें किसी के दखल कि कोई आवश्यकता नहीं है मुझे.. हर किसी को अपना स्पेस चाहिए होता है, और हर किसी में मैं भी आता हूँ..

शनिवार का दिन है, दफ्तर में अकेला बैठा हुआ हूँ.. कोई मजबूरी नहीं, बहुत अधिक काम नहीं.. अगले हफ्ते शुक्रवार की छुट्टियों के इंतजामात करने के लिए आज दफ्तर में हूँ.. एक डिफेक्ट है, बहुत आसान सा, मगर उस पर ध्यान केंद्रित नहीं कर पा रहा हूँ.. उसे ऐसे ही छोड़ रखा है, पता है कि कितना भी दिमाग खराब करूँ, अब आज नहीं होने वाला है तो नहीं ही होगा, बाद में देखा जायेगा इसे.. घर जाने की भी इच्छा नहीं हो रही है..

चेन्नई एक ऐसा शहर है जहाँ आप कहीं भी चुपचाप अकेले बैठ कर समय गुजारने के बारे में नहीं सोच सकते हैं, हर जगह लोगों की रेलमपेल इतनी अधिक होती है और साथ में इतनी गर्मी की अगर वहाँ पंखा ना हो तो आप एक जगह टिक ही नहीं सकते, खासतौर से जब अकेले हों.. कुल मिलाकर एक ही जगह बचती है, समुद्र तट, और वहाँ भी जाने की इच्छा नहीं है.. घर जाना नहीं चाह रहा हूँ क्योंकि अभी किसी मित्र के साथ का इच्छुक नहीं हूँ..

चश्मे की दूकान पर जाना है, चश्मे का नया फ्रेम बनवाना है, पुराना इतनी बुरी तरह खराब हो गया है की आप उसकी तुलना किसी एंटीक पीस से कर सकते हैं, और ऊपर से बहुत सारे स्क्रैचेज चश्मे के शीशे पर.. बहुत दिनों से टाल रहा था, मगर आज सुबह घर से ठान कर निकला था की लौटते हुए आज नये के लिए ऑर्डर दे ही दूँगा.. मगर अब लग रहा है आज भी यह टल जायेगा.. दफ्तर से निकल कर उस चश्मे की दूकान के अलावा एक दो जगह और भी जाना था, मगर वहाँ जाने की भी इच्छा अब नहीं हो रही है.. तब जबकि जरूरी सभी कुछ है.. घडी की बैटरी खत्म हो गई है.. लैपटॉप की दूकान पर जाकर कुछ पूछताछ करनी है.. कुछ सामान किसी शौपिंग मॉल से जाकर लानी है.. ब्लाह.. ब्लाह.. ब्लाह.. ब्लाह..

कुछ दिन पहले एक अच्छी खबर पर मन इतना खुश था की कोई बेहद अजीज पास होता तो गले से लगाकर खुशी जाहिर कर देता.. चाहे घर के लोग या दोस्त.. कुछ लोगों को फोर करके खुशी बांटी, मगर आस पास कोई नहीं.. पिछले सात-आठ साल से अकेला रहने की वजह से अकेला रहने की इस कदर आदत हो चुकी है कि किसी का लगातार साथ मुझे घबरा सा देता है.. इस व्यवहार में कुछ बदलाव तब आया था जब अभी ढाई महीने घर पर लगातार रहा.. मगर फिर चार-पाँच महीने में वैसा ही होता जा रहा हूँ.. कई महीनों बाद सिगरेट पीने की बेवजह तलब सी लग रही है.. मन में आ रहा है की बीस सिगरेट वाला डब्बा खरीद कर एक ही बार में सारा पी जाऊं.. यू नो, चेन स्मोकिंग? आगे देखता हूँ तो लगता है कि समय कि रफ़्तार कितनी धीमी है, मगर पीछे मुड कर देखता हूँ तो लगता है कि इसकी रफ़्तार सी तेज कुछ भी नहीं, प्रकाश कि गति को भी ये मात दे दे.. हर वह बात जो बस कल की ही लगती है, दरअसल बरसों पुरानी बात हो चुकी होती है..

अभी दफ्तर से बाहर निकलूंगा भी तो ट्रैफिक इतनी अधिक होगी कि गाड़ी चलानी मुश्किल.. हद्द है, सडकों पर भी चैन नहीं.. ऊपर से T.Nagar से आने-जाने का रास्ता!! लोग ऐसे लुधके होंगे दुकानों में जैसे आज नहीं लेंगे तो सारा सामान हमेशा के लिए खत्म ही हो जायेगा..


ब्लाह.. ब्लाह.. ब्लाह.. ब्लाह..



Tuesday, May 31, 2011

मैं तुम में होना चाहता हूँ

कुछ समय इन खिड़कियों से झांकना चाहता हूँ,
इस इन्तजार में कि शायद तुम उस रास्ते से गुजरो अपनी उसी काली छतरी के साथ..

मैं उन रास्तों पे चलना चाहता हूँ,
इस यकीन के साथ के कि कल तुम यही से गुजरी थी..
और कल फिर गुजरोगी,
उसी नीले कपड़े में या शायद गुलाबी..

मैं वह पहाड़ हो जाना चाहता हूँ,
इस विश्वास के साथ के कभी
तुम जरूर अपनी उन छुट्टियों को जाया करने
यहाँ मुझसे मिलने जरूर आओगी..

मैं वह पहाड़ी नदी हो जाना चाहता हूँ,
इस उम्मीद के साथ के तुम
इसकी कल-कल सुनते हुए अपने नंगे पाँव इसमें रख कर
अपनी थकान जरूर भूल जाओगी..

मैं वह छोटा बच्चा हो जाना चाहता हूँ,
जिसे देख तुम मुस्कुरा उठो
थोड़ी देर के लिए खेलते हुए अपने गम भूल जाओ..

मैं वह हवाई जहाज हो जाना चाहता हूँ,
जिसे देखते हुए तुम सर ऊंचा करती हो..
वह ऊंचा सर,
गर्व सा ऊंचा सर सा ही कुछ दीखता है..

मैं वह तन्हा शहर हो जाना चाहता हूँ,
जिसमें भटकते हुए तुम्हे मंजिल ना मिले,
वह भटकाव अनंत हो ताकि अनंत समय तक तुम मुझमें रहो..

मैं वह मुस्कान बन जाना चाहता हूँ,
जो तुम्हारे होठों से हमेशा लगा रहे,
तुम्हारा ही एक हिस्सा बन कर..
तुम मुस्कुराओ तो मैं भी मुस्कुरा सकूँ..

मैं वह छोटा तुलसी पौधा हो जाना चाहता हूँ,
जिसे सींचते हुए एक नमी मेरे-तुम्हारे बीच हमेशा बनी रहे..
एक पवित्र बंधन जैसा ही..

मैं वह किताब हो जाना चाहता हूँ,
जिसकी कहानियां तुम रोज रात पढते-पढते सो जाया करती हो,
अपने सीने पर रखकर और उनके पात्र बनकर
मैं तुम्हारे ख्वाबगाह में बेखटक भटकना चाहता हूँ..

मैं बस तुम में हो जाना चाहता हूँ, कि कभी तुमसे जुदा ना हो पाऊं..

Tuesday, May 17, 2011

Space Complexity बनाम वो लड़की

Space Complexity का संगणक अभियांत्रिकी(अब कंप्यूटर इंजीनियरिंग का इससे अच्छा अनुवाद मैं नहीं कर सकता, आपको यही पढ़ना होगा.. समझे?) में बहुत महत्त्व है.. वैसे तो Time Complexity को आप Space Complexity का बड़ा भाई मान सकते हैं क्योंकि Time Complexity के पीछे-पीछे ही Space Complexity भी दौड़ा चला आता है.. बीच के उस युग को याद कर रहा हूँ, जी हाँ, यकीन मानिए जनाब, कंप्यूटर में एक साल को भी आप एक युग मान कर चल सकते हैं, जब मोबाईल तकनीक बाजार में अपने वजूद को लेकर संघर्ष में थी और कंप्यूटर के हार्ड डिस्क में इतनी जगह रहने लगी थी की 1GB का साफ्टवेयर भी इंस्टाल करने से पहले दुबारा सोचना नहीं पड़ता था.. उस युग में Space Complexity भी अपनी इज्जत खोकर कहीं सड़क किनारे भिखारी के से हालात में थी.. फिर Embedded Technology जैसे-जैसे जेबों में मोबाईल की शक्ल में समाने लगी वैसे-वैसे Space Complexity साफ्टवेयर के बाजार में फिर से पूरी इज्जत के साथ छाने लगी..



साधारण भाषा में Space Complexity किसी भी प्रोग्राम के कार्यान्वयन होते समय RAM में छेकने वाले कम से कम जगह लेने वाली प्रक्रिया को कार्यान्वयन करने वाले वाले कलन विधि(Algorithm) को कहते हैं.. रुकिए-रुकिए.. मैं मजाक में "साधारण भाषा" शब्द का प्रयोग नहीं किया हूँ.. दरअसल मैं इससे सरल भाषा में इसे नहीं लिख सकता, हाँ कभी आमने-सामने मुलाक़ात हो तो बोल कर जरूर समझा सकता हूँ.. ;)

अगर जरा अधिक अंदर घुसते हुए देखें तो किसी कलन विधि(पहले बताया था ना Alogorithm, अब दुबारा मत पूछना) T और इनपुट x के लिए DSPACE(T,x) बताता है डिस्क सेल की संख्या को जो अभिकलन(Computation) T(x) के दौरान होता है..
नोट - DSPACE (T) = O(f (n)) if DSPACE (T, x) = O(f (n)) with n = |x | (length of x).
नोट - DSPACE (T) अपरिभाषित है जब कभी T(x) हाल्ट नहीं करता..
(अब 'O' के बारे में सवाल जवाब ना ही किये जाएँ तो अच्छा है.. मैं यहाँ Time Complexity के बारे में लिखने नहीं बैठा हूँ..)


अब जरा इसके उदाहरण के ऊपर आते हैं.. पहले ही कहे देता हूँ कि ये मुक्तकछंद कविता सी दिखने वाली चीज मैंने गूगल से सर्च करके निकाला है.. मुझे C अथवा C++ का कोई भी प्रोग्राम किसी मुक्तकछंद से कम नहीं दिखता है.. कभी प्रेम रस में सराबोर तो कभी वीर रस में.. कभी कभी तो ऐसा लगता है जैसे for loop मानो ऐसा कह रहा हो जैसे for you.. जन्म-जन्मांतर का साथ हो.. continue के कार्यान्वित होने भर से ही एक उल्लास सा छा जाता है, कि यह कोड अभी छोड़ कर नहीं गया है, पुनः कार्यान्वित होगा.. break शब्द के आने मात्र से दिल टूटने का अहसास होने लगता है.. वहीं Stack Overflow हो कर प्रोग्राम के क्रैश होने की तुलना मैं मृत्यु से करना चाहूँगा..

उफ़.. मैं भी क्या बक-बक करने लगा.. फिलहाल तो आप यह मुक्तकछंद कविता के रूप में Space Complexity का एक उदाहरण पर गौर फरमाएं..
// note: x is an unsorted array
int findMin(int[] x) {
int k = 0; int n = x.length;
for (int i = 1; i < n; i++) { if (x[i] < x[k]) { k = i; }// IF END }// FOR LOOP END return k; }


क्या हुआ? इतनी अच्छी कविता है, कम से कम तारीफ़ के एक बोल-बचन तो बनते हैं यार!!

समझ सकता हूँ की आप अब तक बोर हो चुके होंगे.. तो कुछ और बात करें? Space Complexity से बात चली थी, सो उसी की बात करूँगा.. आप आगे पढ़ें..


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रात के बारह बज कर सैतालिस मिनट पर मोबाइल हल्का सा वाइब्रेट करता है, सोचता हूँ की शायद किसी ने GTalk पर पिंग किया होगा.. मोबाइल उठा कर देखता हूँ, एक SMS है..
swd

कुछ दिनों पहले तक ऐसे ही मैसेज "Swt drm" की शक्ल लिए होता था, चलो कुछ और जगह बची!!
सोचता हूँ कि "ये लड़की रातों की नींद खराब करके Sweet Dreams का मैसेज भेज रही है.." ख्यालों का घोडा कुछ और दौडाने पर ये पाता हूँ की "बड़का ना खुद IT Professional बनता फिरता हूँ.. Space Complexity का सही उपयोग तो यहाँ किया जा रहा है, वो भी एक Arts विषय की लड़की के द्वारा.. तिस पर भी बिना किसी Algorithm के.."


Note - हर कहानी में सच्चाई की तलाश अच्छी नहीं होती मित्र.. कहानी अक्सर सच एवं कल्पना के मिश्रण से ही तैयार होता है.. ;-)

Saturday, April 23, 2011

ये सिस्टम जो हमें भ्रष्ट होने पर मजबूर करता है

इस पोस्ट को पढ़ने से पहले आप इस लिंक को देख सकते हैं अगर आपने फेसबुक पर अपना कोई अकाउंट खोल रखा है तो.. इस लिंक को पढ़ने के बाद आप इस पोस्ट को अच्छे से समझ सकेंगे..

अभी कल ही की बात है, अजित अंजुम जी ने अपने फेसबुक पर Absolute Honesty कि बात की थी.. उनका सवाल कुछ यूँ था :
वहाँ मैंने लिखा था :
Prashant Priyadarshi मैं कहूँगा.. आपने जितनी बातें लिखी हैं कम से कम उस पर अभी तक तो खड़ा उतर ही रहा हूँ.

Prashant Priyadarshi मैं फिलहाल डंके की चोट पर यह कह रहा हूँ क्योंकि मेरी तनख्वाह अभी उतनी तो है ही कि मुझे वह सब करने की जरूरत पड़े.. और मौके भी मिले हैं.. मगर अभी तक तो मैंने किसी तरह का Tax नहीं मारा है और ना ही कोई फर्जी बिल दिखा कर पैसे निकाले हैं.



हो सकता है कि अजित जी के कुछ पैमाने रहे हों Absolute Honesty की, मगर मेरी समझ में उनके मुताबिक मैं भले ही Absolute Honesty की कसौटियों पर खड़ा उतर रहा हूँ मगर खुद अपनी ही नजर में नहीं.. मैं यहाँ बात करना चाहता हूँ कि किस-किस समय मुझे यह सिस्टम एवं समाज भ्रष्ट होने पर मजबूर किया था..

पहली घटना - एक दफे बैंगलोर में MG Road के पास मैं अपने दोस्त की मोटरसायकिल से गुजर रहा था, जब ट्रैफिक पुलिस ने मुझे हाथ देकर रोका.. पुरे दल-बल के साथ कम से कम 25-30 पुलिस वाले रहे होंगे.. जिसने मुझे हाथ देकर रोका था उसने मुझसे वाहन संबंधित सारे कागजात मांगे, जो मेरे पास थे और मैंने दिखाया.. उसे देखने के बाद उसने बोलना शुरू किया की "तुमने रेड लाईट तोडा(जबकि वहाँ कोई लाल बत्ती नहीं थी), तुम्हारी गाडी हाई स्पीड पर थी(मैं उस समय 30-35 से अधिक गति से नहीं जा रहा था), वन वे में उलटे तरफ से जा रहे थे(मैं सही था).." कुल मिलाकर लगभग ढाई हजार के जुर्माने कि बात की उसने.. उसने कहा की जाकर मजिस्ट्रेट से मिल लो(सनद रहे, कि सभी वहाँ मौजूद थे और सभी मिले हुए थे).. मजिस्ट्रेट का कहना था कि पहले थाने जाना होगा, इत्यादि-इत्यादि.. फिर एक पुलिस ने मुझे साईड ले जाकर मुझे कहा की 500 दे दो, तो तुम्हारे ढाई हजार बच जायेंगे और झंझट भी नहीं होगा.. मेरी चेन्नई जाने वाली बस छूट ना जाए इस कारण मैंने जो भी मेरे पास उस समय था वह ले दे कर वहाँ से पीछा छुडाना ही पसंद किया.. मैंने उस दिन 300 रूपये घूस दिए, जो अकारण ही थे.. यह लगभग ढाई साल पहले की घटना है..

दूसरी घटना - चेन्नई रेलवे स्टेशन के ठीक सामने वाले सिग्नल पर यू टर्न(U Tern) लेने की आज्ञा है.. लगभग साल भर पहले की घटना है.. U Tern लेने के लिए हरी बत्ती जल रही थी और मैंने U Tern लिया.. उसी वक्त मेरी गाड़ी बंद हो गई, और वापस शुरू करने में लगे 1-2 सेकेण्ड में ही ट्रैफिक पुलिस ने आकर मेरी गाड़ी की चाभी निकाल ली.. और फिर से वही सब शुरू हो गया जो बैंगलोर में हो चुका था.. तब भी मेरे पास सारे कागज़ थे, मगर पिछले बार के अनुभव से जो मैंने सीखा था वह यह की सीधा सौ की पत्ती पकड़ा दो, कम से कम दो सौ बचेंगे..

तीसरी घटना जो कई दफे घट चुकी है - अब जब कभी ट्रैफिक पुलिस हाथ देती है रोकने के लिए तो बिना रुके वहाँ से आगे बढ़ जाता हूँ, ऐसे दिखाते हुए की मैंने देखा ही नहीं कि उसने रूकने के लिए कहा था.. क्योंकि अंजाम मुझे पता है.. दीगर बात यह है कि मैं अपने सारे कागजात अब भी साथ रखता हूँ..

चौथी घटना - लगभग दस साल पहले कलकत्ता से दुर्गापुर जाते समय बिना टिकट यात्रा की थी.. वह यात्रा भी मजबूरीवश करनी पड़ी थी.. मुझे जल्द से जल्द दुर्गापुर पहुंचना था, और सबसे पहले आने वाली ट्रेन "कालका मेल" थी जिसका यात्री स्टेशन दुर्गापुर नहीं था, वह ट्रेन वहाँ अपने कर्मचारी बदलने के लिए रूकती थी.. जब मैंने कलकत्ता के टिकट खिडकी पर 'मेल' ट्रेन के लिए दुर्गापुर तक का टिकट माँगा तो उसने कहा कि आज सिर्फ एक ही 'मेल' ट्रेन वहाँ से होकर जाती है, मगर उसका स्टेशन वहाँ का नहीं है.. तुम्हें आगे तक का टिकट लेना होगा.. मेरे पास आगे के स्टेशन तक के देने के लिए पैसे नहीं थे, सो मैंने बहुत आग्रह किया की जनरल टिकट पर तो ट्रेन का नाम नहीं होता है.. आप कृपया टिकट दे दें.. अंततः टिकट नहीं मिलने की स्थिति में मैं बेटिकट यात्रा किया..

फिलहाल अपने इतने ही कुकर्म याद आ रहे हैं जब मैंने कानूनी रूप से कुछ गलत कार्य किया था.. कुछ किस्से हर किसी पास होंगे, यहाँ बांचे कि कब आपने मजबूरीवश कोई क़ानून तोडा हो अथवा भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया हो!!


Wednesday, April 20, 2011

नम्मा चेन्नई!!!!

मुझे कई लोग मिले हैं जो मुझे चेन्नई शहर से प्रेम करते देख मुझे ऐसे देखते हैं जैसे कोई अहमक हूँ मैं.. बहस करने वाले भी कई मिले हैं जो यह गिनाने को आतुर रहते हैं कि चेन्नई में क्या-क्या खराबियां हैं.. मेरे पास उनसे अधिक वजहें होती हैं इससे इश्क में डूबने के बजाये इसके की मैं इससे नफरत करूँ.. वैसे भी मुझे यह समझ में नहीं आता है कि कोई किसी शहर से नफरत कैसे कर सकता है? आप किसी शहर के उन लोगों से नफरत कर सकते हैं जो आपके लिए बुरें रहे हों.. आप शहर की गन्दगी से नफरत कर सकते हैं.. किसी शहर की गर्मी से नफरत कर सकते हैं.. मगर पूरे शहर से ही नफरत!! आश्चर्यजनक!! मेरे लिए भी कुछ शहर ऐसे हैं जहाँ की यादें हमेशा मुझे उदास ही करती हैं और अवसाद में धकेलने की कोशिश करती है, मगर फिर भी उन शहरों से नफरत तो कभी ना कर सका मैं.. हाँ कुछ उदासीन जरूर हो चुका हूँ उन शहरों से!!

चेन्नई एक ऐसा शहर है जिसने मुझे जिंदगी की पहली कमाई की पहली रोटी का बंदोबस्त किया, अब इतने बड़े अहसान को मैं भूल जाऊं, इतना अहसानफरामोश नहीं हो सकता हूँ मैं.. पटना मेरे रगों में रचा-बसा है, धीरे-धीरे यह शहर भी रगों में दौड़ने का अहसास जगाने लगा है.. पटना शहर की तरह इस शहर में उस लड़की का कोई निशान नहीं, यह भी एक अलग सुकून देता है, इस शहर में जिन्दा रहने को..

कई तरह के संघर्षों का साक्षी यह शहर, इसका नशा इतनी जल्दी नहीं उतरने वाला है.. अंतर्द्वंदों से लेकर ज़माने की लड़ाई तक.. यूँ तो जमाने से लड़ने का जज्बा पटना शहर से ही सीख कर चला था मगर खुद से लड़ने का तरीका इसी शहर के एकाकीपन ने सिखाया.. अकेले घर में बैठे-ठाले अचानक से बाईक उठाकर रात के तीन बजे माउंट रोड पर बिना मतलब का 30-40 km का चक्कर लगाना, सुनसान सड़क पर 90+ की रफ़्तार से भागना और अचानक से 20-25 की गति पकड़ कर चलना.. बिना किसी डर भय के की कुछ बुरा घट सकता है मेरे साथ.. सुरक्षा की यह भावना किसी और शहर में कभी नहीं मिली.. सिटी बसों को उन पतली गलियों से निकलते हुए भी आज तक कभी किसी बड़े दुर्घटना का गवाह बनते नहीं देखा.. हमारे घर वाली लगभग अनजान सी गली(गूगल मैप में जो एक पतली सी रेखा में अंकित है) में भी सुबह-सुबह नगरपालिका के कर्मचारियों को सफाई करते देखने का मौका उनकी कर्मठता को ही दर्शाता है..


मेरे रहने की जगह लाल लकीर में

कुछ बुरे अनुभव भी हुए हैं यहाँ मगर वह उन सारे अच्छे अनुभवों के सामने बहुत कम अनुपात में है.. वैसे भी बुरे अनुभव तो हर शहर के हैं, जहाँ कहीं मैं गया हूँ.. आजकल चेन्नई अपनी प्रसिद्द गर्मी के उफान पर है, ज्यों-ज्यों उमस वाली गर्मी बढती जा रही है, इसका नशा भी सर चढ़कर बोलने लगता है..



नोट : आज अचानक से इस वीडियो पर पहुँच गया, इसे देखते हुए जो ख्याल मन में आये उसे यहाँ लिख भी दिया..

Wednesday, April 06, 2011

जब लोग आपको भूलने लगें

अमरत्व प्राप्त किये व्यक्तियों को लोग भूलते नहीं हैं
सदियों तक जेहन में बसाये रखते हैं
समय की गर्द भी उसे
अनश्वर बनाये रखती है
जैसे
मुहम्मद इब्न 'अब्दुल्लाह
गौतम बुद्ध, राम अथवा महावीर इत्यादि

लोग आपको भूलने लगें उसके कुछ लक्षण
आप अचानक से अदृश्य हो जाते हैं
आपकी आवाज भी मौन हो जाती है
लोग गोष्ठियों में किसी को बुलाना भूलते हैं,
तो अक्सर वह आप ही होते हैं
आप अचानक से स्मृतिपटल से मिट गए होते हैं
स्पष्ट शब्दों में आप नकारे गए होते हैं

जब आप खुद को भी भूलने लगे
तभी समझें की हुआ है
आपका नवजन्म
कुछ नया करने को
समय चक्र को चीर कर, आगे बढ़ने को
आपने आज धारण किया है यह अनश्वर शरीर!!


Monday, April 04, 2011

विश्व कप के बाद, भारतीय टीम, सट्टाबाजार शिवसेना और पूनम पांडे

केवल भारतीय टीम के लिए ही न्यूड होगी पूनम पांडे.. यह सुनते ही शिवसेना एवं अन्य भारतीय संगठनों में गुस्सा व्याप्त हो गया.. विश्वसनीय सूत्रों से पता चला है की वे इसलिए कुपित हैं की सिर्फ भारतीय टीम ही क्यों? टीम ऐसे ही नहीं जीतती, जिताना पड़ता है, और इस तरह हर भारतीय भी उतना ही हकदार है इस कप का.. वे बार-बार यही सवाल पूछ रहे हैं की सिर्फ भारतीय टीम ही क्यों? वहीं यह खबर सुनते ही भारतीय टीम में खुशी व्याप्त हो गई है.. "द मोस्ट एलिजिबल बैचलरों" से सजी भारतीय टीम अभी से ही पास के एक ठर्रे से पाउच मंगवा चुकी है ऐसा सुनने में आया है..

लोग युवराज सिंह के कहे उस बात पर भी कयास लगा रहे हैं जब उन्होंने रवि शास्त्री के एक सवाल के जवाब में कहा था "I wish I could tell you, how we are going to celebrate." कहीं उनका इशारा पूनम पांडे की ओर तो नहीं था? उनके चेहरे कि सौम्य मुस्कान को भी लोग अब कुटिल साबित करने का प्लान बना रहे हैं.. वहीं वे खिलाड़ी जिनकी शादी हो चुकी हैं वे अपनी पत्नियों की चिरौरी कर रहे हैं की वे उन्हें भी उस समारोह में जाने दे..

सहवाग अपना रिलायंस फोन बंद रखने की योजना बनाये हुए हैं, उनका सोचना है की अगर ठीक उसी बक्त पर उनकी माँ का फोन आ गया तो? उनके पास तो वीडियो कॉल की सुविधा भी है जिस पर मैदान से वह अपनी माँ से आशीर्वाद लेते हैं.. वहीं सचिन परेशान हैं कि अपने बच्चों को क्या कह कर समझायेंगे? उनके लिए पत्नी से बड़ी समस्या अपने बच्चों की है.. धोनी ने कुछ भी कहने से साफ़ मन करते हुए कहा "No comments please."

श्रीसंत को हरभजन ने पहले प्यार से समझाया कि वहाँ बच्चों का आना मना है, और उनके ना मानने पर एक थप्पड़ फिर से जड़ दिया.. चूंकि यह सब परदे के पीछे की घटना है, सो श्रीसंत भी परदे के पीछे जा-जा कर अपने आंसू पोछ रहे हैं.. कोहली अपना वह क्रीम बार-बार मल रहे हैं जो उन्हें गोरा बनाती है.. कोहली इस बात से परेशान हैं की महीने भर लगातार मैदान पर खेलने की वजह से वह काले हो गए हैं.. उन्होंने BCCI के समक्ष यह बात उठाई है की सारे मैच रात में ही खेले जाएँ..

वहीं सट्टा बाजार में इस बात पर करोड़ों के सट्टे लग चुके हैं की पूनम पांडे कपड़े उतारेंगी या नहीं!! गोपनीय सूत्रों से पता चला है की सट्टा बाजार का भाव 0.57 का है की पूनम पांडे अपना वादा याद रखेंगी.. 1.83 का भाव इस पर है की वे भारत में ही ऐसा करेंगी.. वहीं 2.32 का भाव इस पर है की वे पेरिस में ऐसा करेंगी.. 5.18 का भाव इस पर है की वह किसी तीसरे देश में ऐसा करेंगी.. सट्टा बाजार के कुछ सटोरिये तो इस बात पर भी सट्टा लगाने को तैयार थे की कोई और ही यह कारनामा अंजाम ना दे दे, मगर पाकिस्तानी टीम की सलाह पर वे इस बात पर सट्टा नहीं लगाया गया..

Wednesday, March 30, 2011

क्रिकेट, फेसबुक और दीवाने लोग

पिछले एक-दो सालों से तुलना करने पर ब्लॉग पर लिखना आजकल बहुत कम हो गया है.. एक तरह से मेरे लिए इसका स्थान फेसबुक ने ले लिया है.. वहाँ ब्लॉग की तुलना में लोगों से वार्तालाप भी बेहद आसान है, और मेरे लिए किसी माइक्रो ब्लोगिंग से कम नहीं.. फिलहाल तो आज की इस जीत पर मेरे दोस्तों के जो कुछ अपडेट्स आये हैं उन्हें आपलोगों से बांटता हूँ.. कुछ मजेदार है, कुछ समझदार हैं और बाक़ी जीत की खुशी में बौराये हुए हैं.. :)

सबसे पहले शुरुवात करते हैं इस तस्वीर से जो सचिन फैन ग्रुप का स्क्रीनशॉट है.. इसका अपडेट खुद ही पढ़ें और यह ध्यान दें की सिर्फ 58 मिनट में इसे कितने लोगों ने लाईक(पसंद) किया है और कितने लोगों ने टिपियाया है..




अब आगे बढते हैं कुछ चुनिन्दा अपडेट्स की ओर :

Shakhon se toot jayen, wo patte nahi hai hum,
aadhiyon se keh do AUQAT mein rahein..

अफ़रीदी नें ११ बुरके मांगे हैं.....
बोल रहा है की हमको सरकारी बस में ही भिजवा दो.......

कोई मदद का हाथ आगे आए..... बेचारे को बुरका सप्लाई करो ना....

एक नस्लवादी टिप्पणी- पठार ने पठान को हरा दिया। इसे कोई भी न्यूज़ चैनल यूझ कर सकता है। फ्री में।


मेरा तो पटाखा भी फुस्स निकल गया इतना महँगा खरीदा था :(


यहाँ तो जश्न का माहौल है...दिवाली जैसा कुछ लग रहा है,अलग ही नज़ारा है....रात के साढ़े इग्यारह बजे ऐसा माहौल...मस्त है.. वैसे, आपके शहर का क्या हाल है?? :) :)

इस खुशी में कल आजतक, इंडिया टीवी, स्टार न्यूज़,आईबीएन सेवन, न्यूज़. सहारा समय, एनडीटीवी इंडिया बंद रहेगा। मित्रों ने आज काफी मेहनत की है। पूरे दिन किसी ने न्यूज़ चैनल नहीं देखा फिर भी लगे रहे। इसलिए बिना किसी से पूछे रवीश की रिपोर्ट के लेटरपैड पर इस छुट्टी का एलान करता हूं। इंग्लिश चैनल वाले अपना फैसला खुद करें
भारतीय भारत में हों या लन्दन में जीतने के बाद पगला ही जाते हैं :) यहाँ लोग कार में तिरंगा लगाकर नाच रहे हैं रोड पर


अब शनिवार को लंका दहन और सचिन के शतकों का सैकडा ...दोनों के साथ ..इस बार का विश्व कप अपना हुआ .....


Natraj phir champion !! Chak de !!!


What a Victory, What a Game. Superb


इंडियंस मुबारक हो.. पाकिस्तान मुंह बाहर रखो.


‎5 out of 5 teams India met Pak in WC, India have won...most occasions at the 50 over mark, people had backed Pakistan to win...every time India fought like tigers

Sachin is dancing like a sixteen year old boy at Mohali! #HumJeetGay


I forgive the Paki Team, I forgive the Paki fans, I forgive Ashish nehra, I forgive the umpires... I forgive them all,, I feel like Sachin Tendulkarr,,,,

yeyyyy....India ko gariyaana kaam aaya....jeet gaye...!!...fir se karna hoga final me :P
WC finals....yo baby...what a feeling!

bhaiyon koi inko wagah border chhor aao please....


The best one was :
Shiney Ahuja has been sentenced 7 years of Prison for a rape case,,,, God knows what will happen to Sehwag for what he did to Umar Gul...:P

अब एक सीरियस अपडेट भी इस खेल को लेकर जो भारत-पाकिस्तान के क्रिकेट खिलाड़ियों ने नहीं, बाजार और राजनीति के खिलाडियों ने खेला! यह भाईसाब मेरे मित्रों कि सूची में तो नहीं हैं मगर इनका यह अपडेट मुझे बहुत पसंद आया.

आज एक टी वी चैनल पर अयोध्या से भारत पाकिस्तान के मैच पर जनता का रुख जानने की न्यूज़ चल रही थी. यहाँ साधू संतो की बाईट चल रही थी, और ऊपर के तरफ यह फलैश चल रहा था, की संतो ने मुस्लिम भाइयों के साथ मैच देखा. अब हमारे समझ में यह नहीं आता की चैनल क्या कहना चाह रहा था. कहीं यह तो नहीं की कि अयोध्या के मुसलमान इस मैच में भारत के अलावा किसी और का समर्थन कर रहे हैं. यह है पत्रकारिता में दिमाग का स्तर.
और यह एक शानदार अपडेट मैच से पहले का मेरे मित्र द्वारा :

All support for India, sum encouragement for Pakistan team also:
I m the last ball at Sharjah. I invented the reverse swing. I mastered the multiple hat-trick.I am the Sultan of Swing. I am the Cornered Tiger. I am the fastest ball,the quickest hundred,the biggest six,the shattered stumps. I am the aggression,the passion,the unpredicta...

Thursday, March 24, 2011

एक थी महुआ घटवारन

वो जो महुआ घटवारन का घाट है न, उसी मुलुक की थी महुआ! थी तो घटवारन मगर सौ सतवंती में एक! उसका बाप दिन-दिहाड़े ताड़ी पीकर बेहोश पड़ा रहता था, उसकी सौतेली माँ थी साक्षात राक्षसनी.. महुआ कुंवारी थी, हरी-पुरी दुनिया में कोई ना था उसका!
दुनिया बनाने वाले,
क्या तेरे मन में समाई, तुने,
काहे को दुनिया बनाई, तुने,
काहे को दुनिया बनाई?

कैसे करूँ महुआ के रूप का बखान? हिरनी जैसी कजरारी आँखे, चाँद सा चमकता चेहरा, एड़ी तक लंबे रेशमी बाल.. जब वो मुस्कुराती, तो जैसे बिजली कौंध सी जाती.. भगवान जी ही ऐसा रूप भर सकते हैं माटी के पुतले में!!
काहे बनाए तूने, माटी के पुतले?
धरती ये प्यारी-प्यारी, मुखड़े ये उजले?
काहे बनाए तूने जीवन का खेला?
जिसमें लगाया जवानी का मेला...
लुकछुप तमाशा देखे, वाह रे तेरी खुदाई, तुने,
काहे को दुनिया बनाई?

जवान हो गई थी महुआ, फिर भी कहीं शादी ब्याह की बात नहीं चलायी गई.. सुबह शाम वह अपनी मरी माँ को याद करती रोती.. रात-दिन कलपता था बिचारी का मन.. मन समझती हैं ना आप?
तू भी तो तड़पा होगा, मन को बनाकर,
तूफां ये प्यार का मन में छुपा कर,
कोई छवि तो होगी आँखों में तेरी,
आंसू भी छलके होंगे पलकों से तेरी..
बोल क्या सूझी तुझको? काहे को प्रीत जगाई?
तूने, काहे को दुनिया बनाई?

एक दिन एक थका-प्यासा मुसाफिर पानी पीने नदी किनारे आया.. महुआ को देखते ही उसपे रीझ गया.. नादान महुआ भी उसे दिल दे बैठी.. जंगल के आग की तरह फैल गई इनके प्यार की बात.. सौतेली माँ भला कैसे देख सकती थी उनका सुख? उसने महुआ को एक सौदागर के हाथ बेच दिया.. रोती-छटपटाती महुआ चली गई सौदागर के साथ, बिछुड गई जोड़ी, महुआ का प्रेमी आज भी जैसे रोता है!!!
प्रीत बना के तूने, जीना सिखाया..
हंसना सिखाया, रोना सिखाया..
जीवन के पथ पर मीत मिलाए,
मीत मिला के तूने सपने जगाये..
सपने जगा के तूने काहे को दे दी जुदाई,
तूने, काहे को दुनिया बनाई..



Monday, March 14, 2011

एक पत्र मृत्युंजय से सम्बंधित


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मित्र,

तुम्हारी भेजी किताब पढ़ी.. अभी हाल फिलहाल में हिंदी साहित्य की कई किताबें पढ़ने का सौभाग्य मिला, मगर मृतुन्जय पढ़ने का एक अलग ही आनंद आया जो बाकी किताबों से सर्वथा भिन्न था.. मेरी जानकारी में महाभारत के दो पात्र सदा से ही आम जनों को लुभाते रहे हैं, श्री कृष्ण और कर्ण.. इनमें से श्री कृष्ण को तो भगवान का दर्जा दिया जा चुका है जिस कारण से यह बेहद स्वाभाविक है कि उन पर कई विद्वजनों ने आसक्ति में डूब कर कई ग्रन्थ रच डाले.. मगर कर्ण, यह एक ऐसा पात्र है जिसे महाभारत जैसे महाग्रंथ में भी उचित स्थान ना मिला था फिर भी उसके अनन्य भक्तों की कमी नहीं.. जहाँ श्री कृष्ण के ऊपर भक्तों के कृपा दृष्टि का प्रश्न है तो उसका उत्तर बेहद संक्षेप में दिया जा सकता है की वह तो भगवान थे, हैं और जब तक हिंदू धर्म एवं गीता का अस्तित्व रहेगा तब तक वे आम जनों के भगवान रहेंगे भी.. मगर कर्ण का क्या? वह तो एक ऐसा साधारण मनुष्य था जिसने अपने असाधारण कर्मों के कारण इतिहास में एक अलग स्थान प्राप्त किया.. एक ऐसा पात्र जिसने सदैव 'सूतपुत्र' सुनने का अपमान विष पीया, मगर अपने कर्मों से कभी डिगा नहीं.. अर्जुन को भी महाभारत के युद्ध से पहले गीता के उपदेश की जरूरत हुई थी.. मगर कर्ण!! वह यह सब जानते हुए भी की वह अपने सहोदर भाइयों पर अपने विष-वाण छोड़ने जा रहा है, वह अपने कर्मों से हटा नहीं, डिगा नहीं.. मात्र मित्रता का धर्म निर्वाह करता रहा..

"रश्मिरथी" को पढ़ने का एक अलग ही आनंद आया था, और इसे पढ़ने का आनंद भी अनोखा ही था.. कई दिनों के बाद एक ऐसी किताब पढ़ी जिसे एक बार शुरू करने के बाद जब तक खत्म नहीं कर दिया तब तक यह उत्कंठा बनी रही की आगे क्या होगा? सबसे आश्चर्यजनक बात तो यह है की यह उत्कंठा तब भी मन में उठी जबकि मैंने महाभारत ग्रन्थ के सभी खंड पढ़ रखे हैं, महाभारत धारावाहिक का एक-एक अंक मैंने एक बार से अधिक देखा है, बचपन में महाभारत की कहानियाँ कई खंडों में दादी, नानी, पापा, मम्मी एवं अन्य बड़ों से सुन रखा है.. फिर भी ऐसी उत्कंठा? आश्चर्यजनक था वह.. एक सम्मोहन सा छाया रहा जब तक की मैंने इसे समाप्त ना कर डाला..

कई प्रश्नों के उत्तर कितने साधारण तरीके से इस किताब में दे रखे हैं वह अतुलनीय एवं प्रशंसनीय है.. जैसे, किस तरह काल के प्रवाह में बह कर कर्ण ने कभी अपने महान कर्म उद्देश्य से भटक कर नीच कर्म भी किये.. जैसे, परशुराम से को भ्रम में रखना की वह ब्राह्मण पुत्र है और भृगु का वंशज है, जैसे वह आवेश में बह कर अपने उस अपमान को याद करता हुआ, जब द्रौपदी ने स्वयम्बर के समय कर्ण को सूतपुत्र कह कर उस प्रतिस्पर्धा से अलग रहने को कहा था, द्रौपदी का भरे कुरु सभा में अपमान कर बैठा जिसकी ग्लानी उसे कई वर्षों के बाद भी रही.. जिस पितामह भीष्म के प्रति उसके मन में सम्मान इस कारण जगा था जब शस्त्र दीक्षा प्राप्त करने के पश्चात भीष्म ने उसे महान धनुर्धर कह कर सुशोभित किये थे, मगर उसी पितामह भीष्म के प्रति मन के किसी कोने में भयंकर घाव भी लगा जब महाभारत रण से पहले उन्होंने उसे अर्धरथी कह कर बुलाया.. फिर उसी पितामह से जब वह शर-सैय्या पर मिलने पहुंचा तो उनके द्वारा कहे गए शब्द "अर्धरथी" का कारण जान कर वह पुनः नतमस्तक हो गया..

इस किताब की सबसे रोचक बात मुझे यह लगी की इसमें अलग-अलग पात्रों के मनोभावों को दर्शाया गया है.. कर्ण के जीवन में जो लोग महत्वपूर्ण थे उनके मुख से कहानी कही गई है.. कहानी की शुरुवात होती है कर्ण से.. कर्ण कैसे अचंभित है की सिर्फ उसे ही कवच-कुंडल मिले हैं दूसरों को क्यों नहीं? यहाँ तक की उसके छोटे भाई शोण तक को नहीं, ऐसा क्यों? अगले भाग में कुंती के मुख से कहानी को आगे बढ़ाया जाता है.. इसी तरह कर्ण की पत्नी वृषाली, छोटे भाई शोण, और श्रीकृष्ण के मुख से भी कहानी को बल मिलता है.. जिसमें कर्ण के पराक्रम के साथ-साथ उसके उलझे हुए जीवन का भी वर्णन है..

तारीफ़ बहुत हो चुकी, अब कुछ बातें करते हैं जो इसकी कमजोर कड़ी थी.. अंत श्रीकृष्ण द्वारा कही गई कहानी से किया गया है.. यह आवश्यक भी था क्योंकि कर्ण अपनी मृत्यु के बारे में नहीं बता सकता था, वह किसी अन्य के द्वारा ही कही जानी चाहिए थी.. उसके लिए श्रीकृष्ण से अधिक उपयुक्त पात्र कोई था भी नहीं, मगर मेरे विचार से शिवाजी सावंत जी ने यहाँ पूर्ण न्याय नहीं कर पाए.. अभी तक कि कहानी जो कसावट लिए हुए थी उसमें जैसे ढील दे दी गई हो.. जैसे कर्ण के धनुष की प्रत्यंचा ढीली कर दी गई हो..

एक और बात मुझे खटकी वह यह थी की पूरी कहानी तर्कपूर्ण ढंग से आगे बढाई गई थी, मगर जहाँ श्रीकृष्ण कि चर्चा शुरू हुई बस वहीं कुछ अलौलिक बातें जोड़ दी गई.. जैसे शिशुपाल वध के समय श्रीकृष्ण द्वारा अभूतपूर्व रूप धारण करना, जैसे जब वे कौरवों के पास संधि प्रस्ताव लेकर गए थे तब उनका वह अलौलिक रूप पुनः धारण करना.. कुछ कहानियाँ जो बचपन में सुन रखा था उसमें से जब उन चमत्कारिक चीजों में बदलाव किया जा सकता था तो निश्चय ही इन बातों में भी बदलाव करके कहानी सुनाई जा सकती थी.. जैसे लेखक कर्ण के रथ के पहियों को धरती द्वारा निगलने की जगह पर श्रीकृष्ण द्वारा उन्हें विवश करते दिखाना जिससे शल्य मजबूर हो जाएँ रथ को दलदल की तरफ ले जाने को.. उन्होंने ऐसे कई चमत्कारों को जो महाभारत में वर्णित है, तर्क के साथ लिखा है.. मगर श्रीकृष्ण के साथ!! पता नहीं, मुझे यह बात बेहद खटकी.. एक और घटना याद आ रही है, महाभारत के अनुसार जब कर्ण मृत्यु के मुख में खड़ा है और उस समय स्वयं देव उनके पास ब्राहमण रूप धारण कर दान मांगने आते हैं.. यहाँ भी लेखक ने बेहद तर्क के साथ एक साधारण ब्राहण को दिखाया है जो युद्ध में मारे गए अपने पुत्र को ढूंढते हुए विलाप कर रहा रहा है.. तब कर्ण अपने पुत्र को आदेश देते हैं कि वह उसके स्वर्ण जड़ित दांत तोड़कर उसे दान में दे दे जिससे वह अपने पुत्र का उचित रूप से दाह संस्कार कर सके..

अहा मित्र!! अगर तुम मुझे यह अनूठी किताब ना भेजी होती तो शायद मैं इस अपूर्व कृति को पढ़ने से शायद वंचित ही रह जाता.. वंचित ना भी रहता तो निश्चित रूप से कुछ वर्ष तो लग ही जाते.. वाह मित्र! वाह!!