Thursday, August 28, 2008

क्या मम्मी!! कहां फंसा दी??

क्या मम्मी!! कहां फंसा दी?? कितने अच्छे से आराम से था.. अब तो जिसे देखो आता है.. चारो ओर घेरा डाल कर घूरता है.. इतने मूरख लोग हैं ये सभी, इतने बड़े हो गये हैं और अभी तक ठीक से बोलना भी नहीं आता है.. पता नहीं किस भाषा का प्रयोग करते हैं? कितने जाहिल गंवार लोग हैं.. आते ही अलेलेले.. आ आ आ आ.. और भी पता नहीं कितने तरह के अंट संट आवाजें निकालते हैं.. इससे अच्छा तो मैं हूं, कितना आराम से ऊंऊं करता रहता हूं.. मम्मी, तुम भी उन्हीं की भाषा बोलती हो.. कभी तो ठीक से बोला करो.. मेरी तरह.. ऊं ऊं.. :)


आराम से सोता हुआ मेरा बच्चा.. :)


ब्यूटी एंड बीस्ट.. मेरे हाथ के सामने मेरे बच्चे का हाथ.. :)

Monday, August 25, 2008

गिरीधर गोपाल आयो मोरे अंगना

मैं जिस कारण से यहां पटना आया हुआ हूं वो कल सफल हो गया.. कल मेरे अंगना स्वयं गिरीधर गोपाल पधारे.. मेरी भाभी ने कल एक बहुत ही प्यारे बच्चे को जन्म दिया.. बहुत इंतजार कराया हमारे गोपाल ने.. मेरे भैया चित्रगुप्त पूजा के दिन इस धरती पर आये थे और उनमें जन्मजात विलक्षण प्रतिभा थी.. ठीक वैसे ही मैं भैया को बोल रहा हूं की बाल गोपाल आये हैं तो अब आप ही अपने बाल गोपाल और उसकी गोपियों को संभालियेगा.. :)

फिलहाल आप इसकी तस्वीर से संतुष्टी करें.. इसके बारे में फिर कभी.. वैसे भी अब इसके पोस्ट से मेरा चिट्ठा आपको भड़ा मिलेगा.. :)



Thursday, August 21, 2008

बिहारी, भिखारी और पटियाला दी नारी

- आप उत्तर भारत के किस हिस्से से हैं?

- यूं तो मैं पंजाब, पटियाला से हूं मगर पिछले 25 सालों से पापा दिल्ली में बस गये थे..

- तो फिर चेन्नई में कहां से आ गई आप?

- नौकरी जहां खींच लाया वहां चली आई.. आप कहां से हैं?

- मैं बिहार, पटना से..

- आप यहां कैसे?

- पढाई तमिलनाडु में ही हुई सो नौकरी भी यहीं कर ली..

बातें कुछ और आगे बढी तो दिल्ली की भी बात आई.. मैंने बस यूं ही कह दिया

- मैं भी कुछ दिन दिल्ली में रहा हूं..

एक कुटिल मुस्कान के साथ जवाब आया
- अपके यहां से तो हर कोई दिल्ली ही भागता है..

- अच्छा? आपने तो नई बात बतायी..

- आप भी तो वहीं आये थे..

- वैसे अगर मैं भूला नहीं हूं तो आप पटियाला से हैं? सही कहा?

- हां!!

- आपको पटियाला से चेन्नई आने की क्या जरूरत पर गई?

- अब क्या कहूं, पति यहीं नौकरी करते थे सो मैं भी यहां आ गई.. नौकरी जिसे देखो उसे इधर से उधर भगाती रहती है..

- बिलकुल सही कहा आपने.. बिहारियों को भी यही नौकरी दिल्ली भगाती है.. जैसे आप यहां आये हैं..

अब उनका चेहरा देखने लायक था.. मैंने आगे कहा ये सोचकर की अब उन्हें बुरा लगे या भला ये उन्हें सुनना ही चाहिये..
- आप भी तो पटियाला छोड़कर पहले दिल्ली भागी, फिर वहां से चेन्नई भाग आयी.. मगर फिर भी आपको इससे दिक्कत आती है की बिहारी दिल्ली क्यों जाते हैं? जब इतनी ही दिक्कत आपको है तो आपको वापस पटियाला ही चले जाना चाहिये और वहीं कोई बड़ी सी साफ्टवेयर कंपनी खुलने के लिये इंतजार करनी चाहिये.. वैसे भी हमलोग अधिकतर अपने देश में ही भागते हैं, आपलोग तो देश ही छोड़कर भाग जाती है नौकरी और पैसे के लिये..
और उनका जवाब सुने बिना ही मैं वहां से चला गया..

ये संवाद मेरे साथ मेरी कंपनी में काम करने वाली एक महिला के साथ मेरा हुआ था जो मेरी कंपनी में किसी दूसरे टीम में टीम लीडर है.. कल जब मैंने ये समाचार(बिहारी नहीं हैं भिखारी-नीतिश कुमार) पढा तब अचानक ही मुझे ये घटना याद हो आयी..

Wednesday, August 20, 2008

कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता

यूं तो यह एक हिंदी सिनेमा का एक गीत भर है मगर मानो पूरे जीवन-दर्शन को अपने मे समेटे हुआ है..

कल रात नींद नहीं आ रही थी.. रात काफी हो चुकी थी.. सो कोई बात करने को भी नहीं था.. नेट पर घूम-घूम कर बोर भी हो चुका था.. बस यूं ही अपना मोबाईल उठा कर कांटैक्ट लिस्ट के सभी नंबर को पलटने लगा.. पाया ढेर सारे नंबर अब मेरे किसी काम का नहीं है फिर भी वो मेरे मोबाईल में अपनी जगह बनाये हुआ है.. मुझे एक समय बिताने का साधन मिल गया.. एक एक करके सभी नंबर को चेक करना और अगर किसी काम का ना हो तो बस उसे डिलीट करना.. एक काम मिल चुका था मुझे.. एम. ॠंखला वाले नंबरों को देखते हुये अचानक से मुझे एक ऐसा नंबर मिला जिसे देखकर मैं जैसे फ्लैश बैक में चला गया..

लगभग दो महीने पहले की बात है.. शाम होने वाली थी.. आफिस में बैठा काम कर रहा था तभी जीटॉक पर मेरे एक जूनियर ने पिंग किया.. "sir, maroof expired.."
अचानक से एक झटका सा लगा.. पहले तो मुझे लगा की कहीं वो मजाक ना कर रहा हो.. मैंने उसका नंबर लिया और उसे फोन किया.. वो बेचारों सी हालत में था.. ना बोला जा रहा था और ना ही रोया जा रहा था.. आफिस में बैठ कर वो और कर भी क्या सकता था? खबर सही थी.. मारूफ़ यूं तो कालेज में मेरा जूनियर था मगर चूंकि मेरे पापाजी के घनिष्ठा मित्र का पुत्र था और उम्र में मुझसे बड़ा भी, सो मैं हमेशा उससे मित्रवत व्यवहार ही रहा था.. मैं चुपचाप अपनी कुर्सी पर बैठ गया.. हार्ड ए.सी. में भी पसीने से भींग गया..

अभी कुछ ही दिनों में आई.बी.एम. ज्वाईन करने वाला था.. घर में सबसे बड़ा होने के कारण सबसे अधिक जिम्मेवारी भी उसी के उपर था.. बाद में जब अगले दिन पापाजी जब उसके जनाजे से वापस लौटे तब पता चला की अचानक से सुबह के समय सांस रूक गई और मां के गोद में ही शायद दम निकल गया.. पिछली बार जब पता चला था तो आंटी की हालत ठीक नहीं थी.. बस दो दिन पहले ही वो बैंगलोर से पटना वापस लौटा था.. शायद मौत उसे पटना लेकर खींच लाया था..

सोचा की मारूफ़ के जाने के बाद पहली बार पटना आया हूं.. मुझे लगा की मुझे जाना चाहिये उसके घर.. मगर मैं नहीं जा रहा हूं.. ना तो जाने का मन ही है और ना ही हिम्मत..

Tuesday, August 19, 2008

क्या शामें भी उदास होती हैं?

यार ये भाषा तुम अपने ब्लौग के लिये ही बचा कर रखा करो.. कभी शाम को भी भावनाओं से भर कर उदास कर डालते हो, तो कभी गुल्लक से तस्वीरें निकाल लेते हो.. कभी तो तुम्हारे यादों के भी पर निकल आते हैं, तो कभी मुस्कुराहट चारपाई के नीचे झांकती सी दिखती है तुम्हें.. ये सब हमारे समझ के बाहर की चीजें हैं.. अक्सर मुझे ये उलाहना अपने कुछ मित्रों से सुनने को मिल जाया करती है.. आज ये लिखने बैठा तो बरबस ही ये याद हो आया.. :)

जब कभी उदास शाम का जिक्र आता है तो कुछ जगहें दिलो-दिमाग से नहीं निकल पाता है.. जहां दीन-दुनियां से बेफिक्र ना जाने कितने ही उदास शामें बिताया हूं.. "मैं और मेरी तन्हाई" जैसी हिंदी सिनेमा मार्का डायलॉग भी याद आ जाती है.. पहली बार घर से बाहर आने का गम और उस पर हर दूसरे दिन नौस्टैल्जिक हो जाना.. कभी घर की याद आना तो कभी दोस्तों की.. कुछ दोस्त साथ में भी थे.. जिसमें एक खासमखास मित्र भी था.. मनोज.. उसकी सबसे बड़ी खूबी यह की वो मुझे हद से ज्यादा मानता था.. यहां तक की मैं ये दावा कर सकता हूं की मेरे घरवालों को अगर चोड़ दिया जाये तो उससे ज्यादा मुझे कोई भी नहीं मान सकता था.. मगर अपनी आदत से मजबूर.. जब भी कुछ बुरा लगे तो बस अपने भीतर ही दबा कर बैठ जाओ.. किसी की याद आये तो और भी ज्यादा अकेलेपन की तलाश में निकल जाना..

अक्सर जे.एन.यू. के पुस्तकालय से अपना बस्ता संभालकर बाहर निकलते हुये रात के 8-9 बज जाया करते थे.. पुस्तकालय के कैंटीन में ही आठ रूपये का मशाला दोसा खाकर निकल पड़ता था.. मन में एक संकल्प की कुछ बनना है और घर की याद भी बहुत आती थी.. घर जाना भी नहीं चाहता था और घर की याद भी बहुत आती थी.. कमोबेश सांप-छछूंदर जैसी स्तिथी बन गयी थी.. सबसे ज्यादा मम्मी की याद आती थी.. कभी उनसे अलग जो नहीं हुआ था इससे पहले..

पुस्तकालय से निकल कर घर जाने की इच्छा नहीं होती थी.. लगता था की वापस जाकर फिरसे सिगरेट का धुवां जो किसी और के मुंह से निकल कर मेरे भीतर घुसे, इससे तो अच्छा थोड़ी देर और यहीं कहीं बिता लिया जाये.. एक बार फिर से अकेलेपन की तलाश.. मुझे खुद कभी समझ नहीं आया अभी तक, मैं अकेलेपन में क्या तलाशता हूं.. कदम बिना किसी से कुछ पूछे अपनेआप PSR हिल की ओर निकल जाते थे.. वहीं एक पत्थर पर बैठ कर ना जाने क्या-क्या सोचता हुआ.. कभी अतीत में झांकता तो कभी भविष्य की ओर मुंह ताकता.. एक लड़की की याद भी बहुत सताती थी.. ऐसा लगता था जैसे वो जगह(PSR हिल ) हर समय गुलजार ही रहता हो.. अधिकतर जोड़े किसी रोमांटिक स्थान के तलाश में वहां पाये जाते थे, कुछ लड़के उन जोड़ों को घूरने के लिये आते थे तो कुछ मुझ जैसे अकेलेपन की तलाश में वहां भटक जाते थे..

उदास शामों की सिलवटें अक्सर,
अपना निशान छोड़ जाती हैं..
जाने क्यों? कुछ शाम उदास होती हैं और,
कुछ शाम उदास कर जाती हैं..

Sunday, August 17, 2008

ये कोई ब्लौगर मीट नहीं, बस यारों की महफ़िल थी

13 की शाम लगभग 3 बजे तक मेरा सारा कार्यक्रम तय हुआ.. अचानक से घर जाने का प्लान बनने से अचानक से ही दिल्ली जाना तय हुआ था.. मैंने लगभग 1-2 महीने पहले पंगेबाज जी से कहा था कि मैं जब कभी भी दिल्ली जाऊंगा तो उनसे जरूर मिलूंगा.. मैंने बस उनका नंबर घुमाना शुरू कर दिया.. उनका नंबर नहीं लगा.. तभी मेरे जीटॉक की गुलाबी बत्ती जगमगाने लगी.. मैंने देखा पंगेबाज जी ही थे मुझे पिंग करने वाले.. वो कुछ और ही बात कर रहे थे मगर मैं सीधा उनसे बोला की आपका नंबर मिला रहा हूं मगर नहीं लग रहा है.. तुरत उन्होंने मुझे अपना नंबर फिर से भेजा.. अबकी बार उनका नंबर लग गया.. मैं पहले तो बात करने में कुछ संकोच कर रहा था मगर उनसे बात करके अच्छा लगा, उनसे बात करके ही मुझे लगा की बहुत ही उर्जावान व्यक्तित्व के मालिक होंगे जो अगले दिन सच भी निकला..

उनसे बात करने पर पता चला की अगले दिन अजित वडनेकर जी भी भोपाल से आ रहे हैं.. उन्होंने मुझे सीधे ब्लौगवाणी के कार्यालय में आने को कहा और साथ ही ये भी बताया की आलोक पुराणिक जी भी आ रहे हैं.. मुझे उस समय जी.विश्वनाथ जी की बात याद आ गई, जब मैं उनसे बैंगलोर में मिला था तब उन्होंने मुझसे बस यूं ही पूछा था की इससे पहले कितने ब्लौगर से मिल चुके हो? और मेरा उत्तर था की अभी तक तो बस आप ही हैं.. वो हंसते हुये कहे की मैं ब्लौगर कहां हूं, मैं तो बस टिप्पणियां ही करता हूं..

सुबह की फ्लाईट से लगभग 2 घंटे और 20 मिनट की दूरी तय करके दिल्ली में उतरा और पंगेबाज जी को फोन किया, ब्लौगवाणी कार्यालय का पता लिया और आधी दूरी बस और आधी दूरी ऑटो रिक्से से तय करके अपने नियत जगह पहूंचा.. थोड़ी देर में पंगेबाज जी भी मुझे लेने लिये वहां आ गये थे.. सच पूछा जाये तो मुझे सबसे ज्यादा उत्सुकता मैथिली जी और सिरील जी को देखने की थी, क्योंकि कभी उनकी तस्वीर तक मैंने नहीं देखी थी..

हवाई जहाज से बादलों के ऊपर ली हुई तस्वीर

जब मैं वहां पंगेबाज जी के साथ पहूंचा तो वहां अजित जी, मैथिली जी और सिरील जी थे.. कुछ इधर-उधर की बातें हुई.. हम लोगों के लिये ब्लौगवाणी स्पेशल पेस्ट्री :)और छोले-भटूरे नाश्ते में था.. थोड़ी देर में पता चला की मसीजिवी जी और राजेश रोशन जी भी आ रहे हैं.. 11 बजे के लगभग सभी लोग आ गये.. अच्छा लगा सभी से मिलकर.. ज्यादा विस्तार से मैं नहीं लिख रहा हूं, क्योंकि मैंने शीर्षक में ही लिख रखा है की ये कोई ब्लौगर मीट नहीं थी बस यारों की महफ़िल थी.. बस यही एक कारण है की मैं कोई तस्वीर भी नहीं लगा रहा हूं.. नहीं तो एक अच्छे चिट्ठाकार वाला सारा गुण मुझमें है और मैं इस एक पोस्ट का 10 पोस्ट लिख सकता हूं.. उस दिन पता चला की शिव कुमार मिश्र जी भी आने वाले हैं.. उनसे ना मिलने का अफ़सोस बस दिल में बाकी रह गया.. :)

Friday, August 08, 2008

Deleted Post

पंगेबाज जी की सलाह पर ये पोस्ट हटाया जा रहा है..

Thursday, August 07, 2008

जन्मदिन के बीते पांच साल

2003
कुछ ही दिन पहले मुनीरका शिफ्ट हुआ था.. पहली बार घर से बाहर था अपने जन्मदिन पर.. मन बहुत उदास था और घर की भी बहुत याद आ रही थी.. रात के खाने के समय सभी मित्रों ने पार्टी के लिये हल्ला करना शुरू कर दिया.. मैंने मना कर दिया.. मगर रात का खाना तो खाना ही था सो चल दिये जे.एन.यू. कैंपस में.. टेफ्ला की ओर.. जहां लगभग हर दिन रात के समय आलू के पराठे और रायता खाता था.. सभी उदास मन से चले की एक पार्टी हाथ से चला गया.. वहां पहूंच कर जब सभी अपने अपने खाने का आर्डर करने वाले थे तो मैंने सभी से कहा, जिसे जो खाना है और जितना खाना है मंगा लो और इसे ही पार्टी समझ लेना.. एक साल पहले की बात याद आ रही थी.. कैसे मम्मी माथे को चूम कर आशीर्वाद दी थी.. पापा गोपालगंज में थे.. मन बहुत मायूस सा हुआ जा रहा था मगर दोस्तों को मायूस नहीं करना चाह रहा था..

2004
बस एक सप्ताह पहले ही वी.आई.टी. में एम.सी.ए. के कोर्स में प्रवेश लिया था.. कालेज में पार्थो और शिवेन्द्र को छोड़ किसी को पता नहीं था की आज मेरा जन्मदिन था.. ये दोनो मेरे बी.सी.ए. के साथी थे सो इन्हें पता था.. जहां तक मुझे याद है शायद विकास को भी इस बाबत पता था.. कालेज में जिन सभी से मेरी 4-5 दिनों की दोस्ती थी वे सभी 5 अगस्त को तिरूपति के लिये निकल चुके थे.. उन्हें 7 की रात को लौटना था.. अब बस शिवेन्द्र को ही पता था इसके बारे में और वो भूल चुका था.. जब शाम में तनुजा का फोन शिवेन्द्र के सामने आया और उसने मुझे बधाई दी तब जाकर शिवेन्द्र को याद आया और उसने भी मुझे बधाईयां दी.. उस दिन भी घर की बहुत याद आई.. पूरा दिन यूं ही मायूसी में गुजर गया..

2005
एक दिन पहले(6 अगस्त को) मैं पूरा दिन बैंगलोर में स्वाति प्रिया के साथ था जो मेरी बी.सी.ए. के समय की मित्र थी और रात की ट्रेन पकर कर 7 की सुबह वेल्लोर आ गया था.. मेरे भैया जो आने वाले थे.. हमारी पीढी में सभी भाई बहनों में सबसे बड़े भैया हैं प्रभास रंजन, जिन्हें हम बच्चे बाउ भैया कहते हैं.. वो उस समय कोच्ची में पोस्टेड थे.. बस मेरा जन्मदिन मनाने के लिये वो कोच्ची से 10 घंटे की यात्रा करके वेल्लोर आये थे.. पूरा दिन बस मित्रों और भैया के साथ बिताया.. आज भी याद है की गार्गी को कैसे तंग किया था उस दिन.. कुल मिलाकर मैं बहुत खुश था उस दिन..

2006
कैंपस सेलेक्शन नया नया हुआ था.. जिंदगी दोराहे के भटकाव से निकलना चाह रही थी, मगर फिर उसी मोड़ पर खड़ी हो जाती थी.. उसी दिन काग्निजेंट में सेलेक्ट हुये मेरे मित्रों की सैलेरी भी बढने की खबर आई थी और उनका फंक्शन भी था.. दोपहर के समय जब मैं खाना खाने के लिये होस्टल की ओर बढ रहा था तभी अचानक मेरे दोस्तों ने मुझे पकर कर कैंटीन की ओर ले चले.. वहां देखा की पूरे दोस्तों का हूजूम है.. गार्गी, विकास, चंदन, संजीव, शिवेन्द्र, पार्तो, प्रियर्दर्शीनी, वाणी, अमित, विष्णु.. नीता, अर्चना और प्रियंका भी थोड़ी देर में आ गये.. केक काटा गया, खाया गया और लगाया भी गया.. फिर सभी पार्टी के लिये हल्ला करने लगे.. उस समय तक तो मैं इस सबके लिये तैयार भी नहीं था, मगर संयोग से मेरी जेब में ए.टी.एम. कार्ड था और बगल में ही एस.बी.आई. का ए.टी.एम. भी था.. सो मैंने उसी समय पार्टी दे दिया.. उस पार्टी से मैंने एक गलत चलन शुरू कर दिया था.. लोगों को आईसक्रीम भी खिला दी थी(नीता के कारण :)).. पार्टी के बाद मैं, वाणी, नीता और अर्चना पूरे कालेज कैंपस में फोटो सेशन करते रहे.. बाद में प्रियंका भी हमारे साथ आ गई..

2007
चेन्नई वाले इस घर में शिफ्ट हो चुका था.. 6 अगस्त की शाम को एक एस.एम.एस. आया जिसने मुझे थोड़ा आश्चर्य में डाल दिया.. वो मेरी आभासी दुनिया की मित्र वंदना का था(जिसके बारे में मैं यहां लिख चुका हूं).. फिर मैं जल्दी ही सो गया.. रात बारह बजे विकास ने उठाया और मैंने पाया की केक का इंतजाम कर रखा है.. मोमबत्ती कुछ ऐसा की जितना भी बुझाओ फिर से जल उठता था.. उस समय विकास, शिवेन्द्र और विशाल रहते थे मेरे साथ.. केक काटने के बाद एक और सरप्राईज गिफ्ट मिला.. कामिक्स!! :) जो चेन्नई में नहीं मिलते हैं और संजीव ने रांची से भेजा था.. फिर अगले दिन ऑफिस चला गया.. शाम में वापस आया तो मेरे साथ काम करने वाली दो लड़कियां भी मेरे साथ मेरे घर आई जो उस समय घर के पास ही रहती थी.. नदिया और मुरुगेश्वरी.. फिर पास के ही एक रेस्टोरेंट में जाकर एक छोटी सी पार्टी दी.. बस... 1 दिन पहले मैंने एक नया कैमेरा खरीदा था, उसका भी जम कर प्रयोग किया था.. कुल मिला कर ठीक-ठाक था..

2008
सबसे पहले - अभी शाम के पांच बजे हैं और अभी तक मुझे आर्कुट पर बधाई संदेश देता हुआ 100 से ज्यादा स्क्रैप आ चुके हैं.. 25 के लगभग मेल मिल चुके हैं और जहां कहीं से फोन आ सकते थे वहां से फोन भी आ चुके हैं(2 लोगों को छोड़कर).. रात में शुरूवात हुई वंदना से जो 12 से पहले ही हो चुकी थी.. फिर भैया-भाभी.. फिर अमित.. फिर नीरज.. फिर निधि.. फिर चंदन.. फिर तो कतारे लग गई.. सभी का नाम लेने लगूंगा तो आप सभी बोर हो जायेंगे.. :)
अभी आफिस में बैठा हुआ हूं.. कुछ करने का मन नहीं कर रहा है.. कंप्यूटर स्कीन पर नजर जमाने और पिछले दो दिनों से नींद पूरी ना हो पाने के कारण से आंखों में जलन भी हो रही है.. मगर कुछ कर नहीं सकते हैं.. आज शाम का कोई प्लान दिखता नजर नहीं आ रहा है.. ऐसा लग रहा है आज की शाम भी यूं ही उदासी में गुजर जायेगा.. घर की याद भी बहुत आ रही है..

Wednesday, August 06, 2008

कुछ लोग असफल भी रह जाते हैं जीवन में

घर पहूंच कर घड़ी देखा.. रात के 12 बजने में बस 5 मिनट ही बचे थे.. अच्छे से काम करने के बाद प्रोत्साहन के बदले भाषण मिलने से मन कुछ खराब हो चुका था.. हाथ मुंह धो कर पानी पीने रसोई में गया तो शिवेन्द्र अपने लिये खाना निकाल रहा था.. बहुत खुश होकर बताया की पिछले रविवार को वो जिस साक्षात्कार में गया था वहां उसका चयन हो गया है, मगर पैसे की बात इस शनिवार को होगा.. बहुत खुशी हुई सुन कर मगर उत्साह नहीं आया.. शायद ऑफिस का असर था.. बिस्तर पर लेटकर टी.वी. चला दिया.. पोगो पर टॉम एण्ड जेरी दे रहा था.. शायद 10 से ज्यादा बार वो कार्टून देख चुका था सो हंसी नहीं आई, कुछ आफिस का भी असर था.. शिवेन्द्र देख कर हंस रहा था सो चैनल नहीं बदला..

थोड़ी देर बाद सोचा की वंदना को फोन कर लूं.. कहीं सो तो नहीं गई होगी? चलो एक बार ट्राई करके देखते हैं.. "भारत हमको जान से भी प्यारा है" वाला कॉलर ट्यून सुना.. 10 सेकेण्ड बाद मैंने फोन काट दिया.. सो गई होगी.. सुबह 5 बजे वाला शिफ्ट जो चल रहा है.. फिर से टी.वी. देखने लगा.. कुछ समझ में नहीं आ रहा था की क्या दे रहा है.. मगर करने को भी तो कुछ नहीं था.. थोड़ी देर बाद मोबाईल पर गाना बजने लगा.. जेनिफर लोपेज का कोई गीत.. लगभग 5 सेकेण्ड बाद समझ में आया की किसी का फोन आया है.. देखा तो वंदना का ही था.. नींद में थी.. बस गुड नाईट बोल कर सो गई..

समय देखा तो 1 बजने को था.. नींद भी आ रही थी.. जल्दी ही सो गया.. सुबह जल्दी नींद खुल गई.. 6 बजे ही.. 6.45 में घर फोन किया.. पापाजी उठाये.. कॉलर आई.डी. में मेरा नंबर देख चुके थे.. बहुत प्यार से बोले "बहुत जल्दी ऊठ गये?"

"हां नींद जल्दी खुल गई.."

"अभी मैं जल्दी में हूं.. अलवर जाना है.."

"हूं!!"

"पता है कहां है अलवर?"

"नहीं.."

"जहानाबाद से अलग हुआ जिला है.. नक्सल प्रभावित क्षेत्र.. जहां एम.सी.सी. और रणवीर सेना के बीच हमेशा कुछ ना कुछ चलता रहता था.."

"अच्छा.."

"लो.. मम्मी से बात करो.."

"हेलो!! मम्मी? कैसी हैं?"

"ठीक हैं.. बरा जल्दी उठ गया?"

"हां.. नींद नहीं आ रही थी.."

"कल रात खाना खाया था?"

"हां.. ऑफिस में खाकर आये थे.. भाभी कैसी हैं?"

"बिलकुल ठीक है.. और कल क्या करना है?"

"कल!! क्या है कल?"

"अरे, बर्थडे है न तुम्हारा.. बर्थडे पर क्या करना है?"
ना जाने क्यों पाश याद आ गये.. मगर मम्मी को उनसे क्या काम.. उन्हें क्या समझाऊं की पाश के शब्दों में सपनों का मर जाना क्या है.. बोला, "करना क्या है.. सुबह ऑफिस जाऊंगा और लेट नाईट वापस आ जाऊंगा.."

"अरे घुमेगा नहीं? दोस्तों को पार्टी नहीं देगा? कल खुशी का दिन है.."

"मुझे तो सबसे मनहूस दिन लगता है.."

"अरे ऐसा नहीं कहते हैं.." मन में आया की मम्मी फिर से वही संघर्ष वाली बात कहेगी.. वो कही और मैं मुस्कुरा दिया.. सोचा की काश मम्मी मुझे मुस्कुराते हुये देख पाती.. "तुम बहुत संघर्ष करके यहां तक पहूंचे हो तो आगे भी जाओगे.. कुछ लोगों को आसानी से सफलता मिल जाती है और कुछ को संघर्ष करना परता है.."

मन में एक बात आयी.. और कुछ लोग असफल ही मर भी जाते हैं.. संघर्ष करते करते.. मगर कुछ बोला नहीं.. बस "हूं" कह दिया..

"ठीक है मम्मी, फोन रखता हूं.."

टी.वी. चला दिया.. फिर से टॉम एण्ड जेरी दे रहा था.. लगा की कहीं ये भी तो हंस कर मेरा मजाक नहीं उड़ा रहें हैं?

भ्रम के साथ जीना भी अच्छा होता है.. कभी-कभी..

समय बीतने के साथ-साथ मेरा ये भ्रम टूटता जा रहा है की "I'm the best".. मेरे साथ रहने वाले मेरे दोस्तों को भी अगर ये भ्रम था तो वो भी टूटता जा रहा है की "Prashant is the best"..

घर जाता हूं तो लगता है जैसे दोस्तों का साथ धीरे-धीरे, बिना कुछ कहे, एक मूक सहमति के साथ छूटता जा रहा है.. आफिस आता हूं तो चाहे जितना भी काम कर लो.. 8 घंटे के बदले 14 घंटे काम कर लो.. जितना काम हर हफ्ते दिया जाता है उससे ज्यादा काम कर लो, फिर भी बॉस का बस यही कहना होता है की "I'm not satisfied with your work"..

कभी-कभी सोचता हूं की अच्छा ही है जो पापा-मम्मी कभी पलट कर मेरे पास नहीं आते हैं.. कम से कम उन्हें तो ये भ्रम बना होता है की "मेरा नालायक बेटा अब लायक हो गया है.. अभी भी यही सोचते हैं की Prashant is the best.."

भ्रम के साथ जीना भी अच्छा होता है.. कभी-कभी....

Tuesday, August 05, 2008

बाकी जो बचा सो महंगाई मार गई

अभी मैं जिस फ्लैट में रह रहा हूं उसमें पिछले साल मैं और मेरे दो मित्र शिफ्ट हुये थे.. उस समय हमारे कालेज का एक मित्र विशाल अपनी एक मित्र के साथ पहले से ही रह रहा था.. कुछ दिनों बाद विशाल की मित्र की शादी हो गई और वो अपने पति के साथ उसके शहर में शिफ्ट हो गई..

उस समय की बात है, हम बस 6500 किराया देते थे.. विशाल मार्च में इस घर में शिफ्ट हुआ था.. बाद में विशाल की नौकड़ी पुणे में लग गई और वो बेहतर कैरीयर के लिये पुणे चला गया और फिर उसी समय मेरे कालेज के समय का रूममेट अमित की नौकड़ी चेन्नई में ही लग गई और विशाल की जगह उसने ले ली..

फिर पिछले साल के अंत में हमारे मकान मालिक ने घर खाली करने का हिंट दे दिया.. असल में हमारे अपार्टमेंट में बैचलरों के लिये कोई जगह नहीं है इसी बात का बहाना वो दे रहे थे जबकी यहां तो सबसे बरी बात ये थी की हम चारों समय से किराया दे देते हैं और आज तक कभी कोई हल्ला-हंगामा या शोर-शराबा नहीं नहीं करते हैं.. बस अपने काम से काम.. फिर हमने 8000+350 मेंटेनेंस पर बात तय कर ली..

अभी 4-5 दिन पहले की बात है, फिर से हमारे मकान मालिक ने किराया बढाने की बात की और इस बार उसका कहना था की कुछ ब्रोकर 12000 तक दिलवाने को तैयार हैं, सो कम से कम 10000+350 मेंटेनेंस तो चाहिये ही.. कल मेरे मित्र विकास ने जाकर बात की और बात तय हुई 10000 पर, मेंटेनेंस के साथ..

मतलब कुल 1 साल के भीतर 6500 से किराया बढकर 10000.. पूरे 3500 रूपये का इजाफा.. हमारे ठीक सामने वाले घर(जो बिलकुल हमारे घर जैसा ही है) का किराया 12000 के करीब है.. ये सुन कर अच्छा लगता है की अभी भी उतना ज्यादा किराया नहीं दे रहे हैं.. मगर साथ ही ये भी लगता है कि उसका घर अच्छी तरह से फर्निस्ड है इसलिये उसका किराया थोड़ा ज्यादा है.. इस घर का 8500 तक ही ठीक है..

जब चेन्नई आया था तब सभी कहते थे की चेन्नई, बैंगलूरू, दिल्ली और मुम्बई के अपेक्षाकृत सस्ता शहर है.. मगर अभी देखते हैं तो पाते हैं की बैंगलूरू वाले मित्र यहां से ज्यादा सस्ते में रह रहें हैं.. चेन्नई में महंगाई दर आसमान छूता जा रहा है..

इस चित्र में लाल बिंदू वाला जगह हमारे रहने वाले स्थान को दिखाता है

Monday, August 04, 2008

नये ब्लौगवाणी की कुछ खामियां

आज बहुत दिनों बाद ऑफिस में कुछ फुरसत से बैठा तो मैंने ब्लौगवाणी के नये संस्करण के साथ छेड़-छाड़ शुरू कर दी.. मैंने पाया की इसे बहुत ही अच्छे तरीके से डिजाईन किया गया है मगर साथ ही इसमें अभी भी कुछ खामियां हैं.. उदाहरण के तौर पर आप ये तस्वीर देखिये..



इसमें लाल रंग के घेरे में आपको मेरी तस्वीर दिखाई देगी मगर सारे ब्लौग पोस्ट बाल किशन जी के दिख रहे हैं.. दर असल आज सबसे पहले मैंने बाल किशन जी के पुराने पोस्टों को ब्लौगवाणी की सहायता से खोला था और फिर अपने पुराने पोस्टों को देखने की इच्छा भी हुई.. शायद मेरे पुराने पोस्टों की जगह ये मेरे कंप्यूटर के कुकी से बालकिशन जी के पोस्टों को निकाल कर दिखा रहा है..

एक और खामी मुझे नये ब्लौगवाणी में नजर आयी, वो यह की एक ही आई.पी. पते से आपको यह दो-दो बार आपको "अपनी पसंद" चुनने का मौका दे रहा है.. एक बार तो मुख्य पृष्ठ से और दुसरी बार आप उस लेखक के पुराने पृष्टों से.. आप पुराने पृष्टों पर जायें और उपर दिये गये चित्र में हरे रंग से घेरे हुये गोले वाले जगह पर क्लिक कर दें.. बस ये दो दो बार पसंद की श्रेणी में आ जायेगा..

अभी तक मुझे ये दो खामी दिखी है नये ब्लौगवाणी में.. उम्मीद करता हूं की मैथिली जी या सिरिल जी जल्द ही इसका कोई उपाय निकालेंगे.. मेरे पास उनका कोई ई-पता नहीं है, नहीं तो पोस्ट करने के बदले मैं उन्हें सीधे मेल कर देता..

एक आग्रह भी करना है उनसे.. मैंने पिछले सप्ताह एक नया चिट्ठा शुरू किया है जिसे अभी तक ब्लौगवाणी पर जगह नहीं मिली है.. कृप्या इसे भी ब्लौगवाणी में जगह दें जिससे ये अधिक से अधिक लोगों तक पहूंच सके.. उस चिट्ठे का नाम है : हम बड़े नहीं होंगे, कॉमिक्‍स-जिंदाबाद

धन्यवाद

संकोच मित्रों से, मित्रता दिवस पर

परसो शनिवार की सुबह मेरे मित्र(विकास, शिवेन्द्र और वाणी) कालेज (वेल्लोर) जाने की तैयारी में थे जो चेन्नई से 120 किलोमीटर की दूरी पर है.. साथ में मुझे भी जाना था.. मगर सभी को नींद कुछ ज्यादा ही आ रही थी सो इस प्लान को आगे बढा दिया गया और बात हुई रविवार कि.. मुझे रविवार को कुछ सामान खरीदना था सो मैंने मन होते हुये भी अपनी ना जाने की असमर्थता जता दी..

जब मैं कालेज में था तब मुझे वेल्लोर में सी.एम.सी. के सामने एक बंगाली होटल का रसगुल्ला बेहद पसंद था और बिना किसी कारण के भी मैं अक्सर वहां जाकर 4-5 रसगुल्ले खाकर आ जाया करता था.. वेल्लोर सी.एम.सी. मेरे कालेज से लगभग आधे घंटे की दूरी पर है.. आधा घंटा जाना और आधा घंटा आना भी उस रसगुल्ले के लिये अखरता नहीं था..

जब मेरा ना जाना तय हो गया तब मैंने सोचा की विकास को बोल दूं कि अगर उस तरफ जाओगे तो मेरे लिये रसगुल्ले लेते आना.. और मुझे पता था की वे लोग उधर जायेंगे ही.. मगर ना जाने क्या सोचकर संकोच कर गया.. मन में एक बात आयी की कहीं वो मना ना कर दे.. कहीं ये ना कह उठे की "जिसे खाना है वो चले.." दूसरी बात.. वाणी की स्कूटी मेरे घर पर ही लगी हुई थी और शाम में मुझे शॉपिंग करने जाना था.. सोचा की क्यों ना उससे स्कूटी की चाभी ले लूं.. आने जाने में काफी आराम हो जायेगा.. मगर इस बार भी संकोच कर गया.. ना जाने क्या सोचकर..

खैर मैं इस संकोच का कारण जानने को उत्सुक नहीं हूं.. संकोच के कुछ कारण मुझे पता है और कुछ नहीं.. बस मेरे मन में एक बात आयी थी जिसे मैंने बस यूं ही लिख दिया..

Saturday, August 02, 2008

प्रतिशोध की ज्वाला

हर पीढी का अपना एक नायक होता है.. जैसे मुझसे 10-15 साल पहले वाली पीढी के लोगों के लिये वेताल और मैंड्रेक नायक हुआ करते थे.. उस समय भारत में इंद्रजाल कामिक्स का प्रभुत्व हुआ करता था.. सो उस पीढी के नायक भी उसी प्रकाशन से छपने वाली कामिक्स की हुआ करती थी.. ठीक वैसे ही मेरी पीढी के लिये नायक ध्रुव और नागराज जैसे हीरोज हैं.. जब पढना अच्छे से सीख गया था उसी समय ये सभी नायक राज कामिक्स नामक प्रकाशन से छपना शुरू हुये थे जो अभी तक प्रकाशित हो रहे हैं.. आगे पढने के लिये आप इस ब्लौग पर जायें..


आज मैं लेकर आया हूं आपलोगों के सामने एक कामिक्स.. जिसका नाम है "प्रतिशोध की ज्वाला".. इसे डाउनलोड करने और इसके बारे विस्तारपूर्वक जानने के लिये आप "हम बड़े नहीं होंगे, कॉमिक्‍स-जिंदाबाद" नामक ब्लौग पर जायें..

Friday, August 01, 2008

बचपन के वे जादुई दिन

बचपन!! हर दिन कुछ जादू जैसा होता था.. पेड़ पर पके हुये अमरूद देखो तो लगता था जैसे जादू है.. किसी के पास गुलेल देखो तो जादू.. भड़ी दोपहरी में दिन भर धूप में खेलना भी एक जादू.. कोई नया सिनेमा देखो तो जादू.. रेडियो, विविध भारती पर नये सिनेमा के गीत भी एक जादू.. और जहां किस्सो कहानियों की बात आती थी तो वो खुद ही एक जादू सा लगता था.. कभी दादी-नानी की कहानियां, तो कभी किसी दोस्त से सुनी हुई कहानी, जो वो अपने दादी-नानी से सुन कर सुनाते थे..

हंसते खेलते कब ठीक से पढना और समझना शुरू किया कुछ याद नहीं.. मगर जब से ऐसा हुआ तब से किस्सो और कहानियों की किताबें भी उसी जादू का एक अंग बन गये थे.. चंपक से चाचा चुधरी, नंदन से नागराज, पलाश से फैंटम(वेताल), मैंड्रेक, सुपर कमांडो ध्रुव, बालहंस, चंदामामा, सुमन सौरभ, ग्रीन एरो, सुपरमैन, बैटमैन, बांकेलाल, तौसी, अमर चित्र कथायें, बहादुर, और भी ना जाने क्या-क्या..

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ये चिट्ठा मैंने आज ही शुरू किया है.. वैसे तो इसकी नींव कुछ दिनों पहले ही मैंने रख दी थी मगर इमारत आज खड़ा कर रहा हूं.. :)

इस चिट्ठे को बनाने का उद्देश्य बस इतना ही है कि हम सभी के भीतर जो भी बच्चा है उसे फिर से बाहर लेकर आऊं.. कुछ दिनों पहले ही पता चला था की युनुस जी, शास्त्री जी, दिनेश जी और उनके जैसे ही ना जाने कितने लोग हैं जो अभी भी मन के भीतर एक कामिक्स पढने की जिज्ञासा लेकर अभी भी अपने भीतर के बच्चे को जिंदा किये हुये हैं.. अभी कुछ दिन पहले की बात है.. मैं युनुस जी से कामिक्स के उपर ही चर्चा कर रहा था और उन्होंने मुझे ये चिट्ठा बना डालने का सुझाव दे डाला.. साथ ही ये भी कहा की इसे कंम्यूनिटि चिट्ठा रखा जाये.. अगर आप लोगों में से भी किसी की ये इच्छा है की अपने भीतर के बच्चे को बाहर लाकर अपने बीते हुये दिन, जिसमें बस कहानियां और कामिक्स ही था, को अपने शब्दों से सजायें तो आपका हार्दिक स्वागत है इस चिट्ठे पर.. बस आप मुझे इस पते पर मेल करें prashant7aug@gmail.com .. अपनी सही पहचान के साथ.. अगर आप अपने छद्म रूप में लिखना चाहते हैं तो आप मॉडेरेटर के रूप में यहां पोस्ट नहीं कर सकते हैं, मगर आप अपने छद्म नाम के साथ मुझे अपना पोस्ट मेल करें वो पोस्ट मैं आपके छद्म नाम के साथ प्रकाशित करूंगा..