Thursday, September 18, 2008

अनुभव के साथ कूपमंडुकता भी आती है

बहुत पहले मेरे बॉस ने मुझे कहा था की, "Experiance brings stupidity." वो उस समय अपनी तुलना मुझसे कर रहे थे.. उन्होंने कहा था कि अनुभव के साथ सोचने की दिशा ही बदल जाती है.. लोग सोचने लगते हैं कि जैसा उनके साथ हुआ था वही सही है, भले ही वो सबसे ज्यादा गलत हो.. ये कुछ ऐसा ही है जैसे कोई अंधविश्वास.. किसी समय कोई व्यक्ति घर से बाहर कहीं जा रहा होगा, उसी समय उसे छींक आ गई होगी, और बाद में उसका सारा काम खराब हो गया होगा.. बस उसी से ये माना जाने लगा होगा की जाते समय छींक आने से काम खराब हो जाता है..

आज सुबह बहुत देर से बिस्तर छोड़ा.. जब आंख खुली तब घर से मेरे सारे मित्र अपने-अपने ऑफिस जा चुके थे.. घड़ी में देखा तो 10.20 हो रहा था.. रात में 4 बजे के बाद ही नींद आई थी.. हड़बड़ी में उठा और जल्दी से तैयार हुआ.. फिर समय देखा तो 10.40 हो रहे थे.. सोचा कि 10 मिनट मेल चेक कर ही सकता हूं.. कंप्यूटर ऑन करके मैंने जी-मेल खोला.. दिनेश राय जी का पत्र आया हुआ था, जिसमें उन्होंने लिखा था की उन्होंने मेरा ई-पता अपने बेटे को दिया है जो अभी एम.सी.ए. के पांचवीं सेमेस्टर में है.. एक पत्र उनके बेटे वैभव राय द्विवेदी का भी था.. जिसमें उसने कुछ सलाह मांगी थी..

मैं सोच में पर गया.. अभी कितना खुला आसमान है उसके सामने.. जिधर चाहे और जिस तकनीक में चाहे, वो खुद को ढाल सकता है.. चाहे डॉट नेट हो या जावा या फिर ओपेन सोर्स.. मगर यही एक-दो साल के अनुभव के बाद वो जिस तकनीक में काम करता होगा उसमें थोड़ा बंध कर रह जायेगा.. जिस स्थिति में मैं अभी हूं.. मगर फिर भी कुछ हद तक किसी नये तकनीक में काम कर सकता हूं.. मगर यही अगर 3-4 साल का अनुभव हो जाने पर क्या होगा.. टाईप्ड होकर रह जायेंगे.. जिस तकनीक में काम करते होंगे बस वही सूझेगा.. किसी और तकनीक के बारे में तो सोच भी नहीं सकेंगे.. और अगर किसी और तकनीक में काम करना पड़ा तो बहुत मुश्किल होगी उसे सीखने में..

खैर वैभव ने मुझसे कुछ प्रश्न पूछे हैं.. मैं चलता हूं उसे उसका उत्तर देने.. आप लोगों से फिर मिलता हूं..
---अलविदा..

12 comments:

  1. आज जमाना बहुत तेज गति से बदल रहा है। एक वस्तु या पद्घति का अनुभव होने पर भी नया ज्ञान अत्यन्त आवश्यक है। उसे लगातार सीखते रहना ही किसी व्यक्ति को उस के प्रोफेशन में टिकाए रख सकता है।
    हमारे प्रोफेशन में तो नए कानून आते रहते हैं और पुरानों में संशोधन होते रहते है। इस के अलावा रोज उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय निर्णयों में परिस्थितियो में कानून का नया विश्लेषण करते हैं। नये का अध्ययन न होने पर तो एक वकील बिलकुल बेकार हो जाता है। केवल अनुभव और वक्तृता कला से काम नहीं चलेगा। उसे नया तो सीखना ही पड़ेगा। मैं सोचता हूं कि आप के प्रोफेशन में कुछ न कुछ नया सीखते ही रहना पड़ेगा। अन्यथा केवल अनुभव से तो प्रोफेशनल बहुत पीछे छूट जाएगा।

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  2. don't worry about being typed. programming is all about fundamentals. once you've got those you can program in any language with basic study. that's what my experience says.

    I started with Delphi, moved to VB3, then to various versions till VB6. Then to VB.Net, PHP, Javascript. Now I work in C#.

    If you were to ask me to work in Java (which I've done a little of, by the way). I could probably migrate entirely in 2 months.

    I believe all the programmer needs are: -

    - Strong fundamentals.
    - Comprehensive reference (the Internet)

    And we are made :)

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  3. दिनेश जी से सहमत हूँ.

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  4. बदलते जा रहे हैं अम भी दुनिया को बदलने में
    नहीं बदली अभी दुनिया!तो दुनिया को अभी बदला
    फ़िराक़ गोरखपुरी

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  5. main bhi dinesh ji se sahmat hoon...seekhna kabhi khatm nahi hota.

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  6. प्रशांत ........ द्रिवेदी जी बात की गाँठ बाँध लो....

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  7. Sir, Thanks for this .But I want to say that if a developer have a working knowledge of a language like c,c++ then he can easily grasped the new new trend because the basics of each language is same .The change is only in their working.

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  8. सबसे पहले.. मेरे किसी पोस्ट पर जितने भी कमेंट आते हैं इस पर उससे कम आये हैं पर मुझे ज्यादा अच्छा लग रहा है कि सार्थक टिप्पणियां की गई हैं..

    दिनेश सर कि बात से मैं भी पूरी तरह सहमत हूं.. मगर आप सभी लगता है कि मेरे पोस्ट का गलत मतलब लगा लिये हैं.. अब आज ही मेरे एक मित्र ने कहा(वो मेरी कक्षा का टॉपर भी था और बहुत पढाकू भी) कि यार, जॉब के बाद भी पढते-पढते तंग आ गया हूं.. :)

    खैर चलिये अब अपना अनुभव बांटता हूं आप सभी से.. मैं जिस प्रोजेक्ट पर काम कर रहा हूं, उसके क्लाईंट पिछले 15-20 सालों से इसी तकनीक पर काम कर रहे हैं.. इसका नाम है ProvideX.. उस समय वो आब्जेक्ट ओरियेंटेड से संबंधित कोडिंग नहीं करते थे.. आजकल इस प्रोडक्ट के नये वर्सन पर मैं काम कर रहा हूं.. पुराने कोडिंग स्टाईल को बदल कर आब्जेक्ट ओरियेंटेड स्टाईल का कोड लिख रहा हूं.. मगर क्लाइंट को कुछ भी समझ में नहीं आता है.. क्योंकि उन्हें आब्जेक्ट ओरियेंटेड तकनीक का ज्ञान नहीं है.. मैं 1-2 बार KT(knowledge Transfer) भी दे चुका हूं उन्हें इस पर.. मगर वो लोग बिलकुल टाईप्ड हो चुके हैं..

    सच्चाई तो यह है कि कालेज और जॉब में सबसे बड़ा अंतर तो यही हो जाता है.. कालेज में 6 महीने मिलते थे कोई नई भाषा जानने के लिये.. मगर यहां तो 1-2 हफ्ते की ट्रेनिंग देकर किसी एक्सपर्ट की तरह काम लिया जाता है.. पहले के मुकाबले ज्यादा जल्दी सीख भी जाता हूं.. हां मगर मेरे साथ क्या हो रहा है मैं ये भी बताता हूं.. मैं कालेज के समय में डाटाबेस के गिने चुने छात्रों में से था जिसने अपनी लैब परीक्षा पूरे नंबर से पास की थी.. मेरा उसके कमांड्स-क्वेरीज पर पूरा नियंत्रण था.. मैं SQL पर पिछले 1 साल और 1-2 महीने से काम नहीं किया हूं.. और अब हालत ये है कि साधारण कमांड्स को छोड़ ज्यादा कुछ याद ही नहीं आता है.. हां मगर ये भी बात है कि अगर जरूरत हुई तो 1-2 घंटे से ज्यादा का समय नहीं लगने वाला है..

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  9. मैं 1-2 बार KT(knowledge Transfer) भी दे चुका हूं
    उन्हें इस पर.. मगर वो लोग बिलकुल टाईप्ड हो चुके हैं..

    आपकी प्रति टिपणी से बात सपष्ट हो पाई है वरना
    आदरणीय द्विवेदी जी की टिपणी का समर्थन ही सही है !

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  10. दिनेश जी की बात सही है और सिरिल जी ने भी सही कहा ..पर कुपमंडूता या अक्रमंयता यह सोंचने का विषय है

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  11. मेरा मानना है कि अनुभव की वजह से लोग टाईप्ड नहीं होते.

    ऐसा भी नहीं है कि एक ही काम को बार-बार करने से टाईप्ड हो जाएँ. अगर मुझे एक ही काम भी बार-बार करना पड़े तो मैं हमेशा अपने करने के तरीके में बदलाव लाने की कोशिश करूंगा जिससे पूरे प्रोसेस को इम्प्रूव कर सकूं. ज़रूरी यह नहीं है कि मैं हमेशा बदलाव खोजने की कोशिश करूं, लेकिन ज़रूरी यह है कि बदलाव के हिसाब से ख़ुद को ढाल लिया जाय.

    अगर अनुभाव इंसान को टाईप्ड बनाता तो दुनियाँ के ढेर सारे प्रोफेशनल, वे चाहे, डॉक्टर हों, इंजिनियर हों या फिर वकील हों, उनका अनुभव के साथ-साथ उनका विकास रुक जाता.

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