Wednesday, October 13, 2010

परिभाषा


हर किसी कि उम्र में उसके हिस्से का संघर्ष छिपा होता है.. वह दिन याद आता है, जब दुनिया के साथ संघर्ष के सिलसिले की शुरुवात नहीं हुई थी तब सोचता था.. चौंधिया कर किसी दूसरे के किस्सों को सुनता था.. गुनता था.. व आह्लादित हुआ करता था.. जैसे कितने बड़े और महान आदमी के बीच बैठने का सौभाग्य मिला हो.. कुछ समय बीता.. अपना भी दिन आया, अपने हिस्से के संघर्ष को जीने का.. फिर अपना किस्सा भी कुछ अपनों की बीच भूंकना शुरू किया गया.. आज भी वह संघर्ष का सिलसिला चल रहा है.. फर्क सिर्फ इतना आया है कि अब भूंकना बंद हो चुका है.. अब ये संघर्ष वैसी ही बात लगती है जैसे दिनचर्या.. जैसे खाते हैं, जैसे सोते हैं, जैसे हगते हैं, जैसे मूतते हैं.. वैसे ही संघर्ष भी कर लेते हैं यार..

अब शांतचित होकर सोचता हूँ, देखता हूँ, तो पाता हूँ कि हर किसी ने अपने हिस्से के संघर्ष को जिया है.. जरूरी नहीं की सभी का संघर्ष आर्थिक ही हो.. किसी का मानसिक, तो किसी का शारीरिक भी होता है.. ये दुनिया किसी को भी बख्सती नहीं है.. अपने ठोकर पर लेकर चलती है.. ऐसी दुनिया जहाँ हर किसी को, हर खुशी की कीमत चुकानी होती है.. जितनी छोटी खुशी, आपके औकात के हिसाब से उतनी ही कम कीमत.. जितनी बड़ी खुशी, आपके औकात के हिसाब से उतनी ही अधिक कीमत.. बिसात बिछी हुई है, बस हर कोई आपके दांव के इन्तजार में खड़ा सा दिखता है.. वो भी तो कहीं खड़ा है, किसी और के चाल के इन्तजार में.. बस शह औ मात!!

रात के इस पहर में अपने दो बजिया बैराग्य को डांट-डपट कर, गरिया कर, मैं अपनी बकवास कर चुका, आपका क्या अनुभव रहा है इस बाबत?

इस नींद को भी मुझी से दुश्मनी क्यों है भला? सोने जाओ तो आती नहीं.. ना सोने के समय, बेसमय आ धमकती है.. रात-बिरात आँख मूंदे ही हिसाब-किताब बिठाने लगता है.. ये तेरा कहाँ, ये तो मेरे हिस्से का गपक गया.. अपने जो दूसरे के हिस्से का गपक गया था उसका हिसाब कोई नहीं.. तेरा.. मेरा.. इसका.. उसका.. किसका? खैर!!!

10 comments:

  1. ये दुनिया किसी को भी बख्सती नहीं है.. यही पूरा सार है.

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  2. veri gud bhut khub. akhtar khan akela kota rajsthan

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  3. क्या बताएं ? हमको तो नींद छोडती ही नहीं थी ....तो हमने भी उसे तरसाना छोड़ दिया है !!!

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  4. "आज भी वह संघर्ष का सिलसिला चल रहा है.. फर्क सिर्फ इतना आया है कि अब भूंकना बंद हो चुका है.. अब ये संघर्ष वैसी ही बात लगती है जैसे दिनचर्या.. जैसे खाते हैं, जैसे सोते हैं, जैसे हगते हैं, जैसे मूतते हैं.. वैसे ही संघर्ष भी कर लेते हैं यार."

    वैसे मैं युहीं नहीं मानता की तुममे और मुझमे कुछ सिमीलैरीटी है... :)

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  5. वैसे मैं युहीं नहीं मानता की तुममे और मुझमे कुछ सिमीलैरीटी है... :)


    हां और वो ये भी है कि तुम दुन्नो हमें बहुत प्रिय हो ...
    परसांत बच्चा ..एक ठो सबसे बडका संघर्ष तो शादीए है ..चलो आने वाला है टाईम भी तुम्हारा

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  6. very nicely written....
    bahut khub...

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  7. दुख सबके हिस्से में बराबर ही आता है, प्रसन्न वही रहता है जो उन्हे सम्हाल लेता है।

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  8. jeene ke liye socha hi na tha, dard sambhalane honge
    muskuraoon to, muskurane ke karz utaarne honge
    muskuraoon kabhi to lagata hai
    jaise hontonn pe karz rakhaa hai
    tujhase naraz nahi aye jindagi.....

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  9. लेखन के लिये “उम्र कैदी” की ओर से शुभकामनाएँ।

    जीवन तो इंसान ही नहीं, बल्कि सभी जीव जीते हैं, लेकिन इस समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, मनमानी और भेदभावपूर्ण व्यवस्था के चलते कुछ लोगों के लिये मानव जीवन ही अभिशाप बन जाता है। अपना घर जेल से भी बुरी जगह बन जाता है। जिसके चलते अनेक लोग मजबूर होकर अपराधी भी बन जाते है। मैंने ऐसे लोगों को अपराधी बनते देखा है। मैंने अपराधी नहीं बनने का मार्ग चुना। मेरा निर्णय कितना सही या गलत था, ये तो पाठकों को तय करना है, लेकिन जो कुछ मैं पिछले तीन दशक से आज तक झेलता रहा हूँ, सह रहा हूँ और सहते रहने को विवश हूँ। उसके लिए कौन जिम्मेदार है? यह आप अर्थात समाज को तय करना है!

    मैं यह जरूर जनता हूँ कि जब तक मुझ जैसे परिस्थितियों में फंसे समस्याग्रस्त लोगों को समाज के लोग अपने हाल पर छोडकर आगे बढते जायेंगे, समाज के हालात लगातार बिगडते ही जायेंगे। बल्कि हालात बिगडते जाने का यह भी एक बडा कारण है।

    भगवान ना करे, लेकिन कल को आप या आपका कोई भी इस प्रकार के षडयन्त्र का कभी भी शिकार हो सकता है!

    अत: यदि आपके पास केवल कुछ मिनट का समय हो तो कृपया मुझ "उम्र-कैदी" का निम्न ब्लॉग पढने का कष्ट करें हो सकता है कि आपके अनुभवों/विचारों से मुझे कोई दिशा मिल जाये या मेरा जीवन संघर्ष आपके या अन्य किसी के काम आ जाये! लेकिन मुझे दया या रहम या दिखावटी सहानुभूति की जरूरत नहीं है।

    थोड़े से ज्ञान के आधार पर, यह ब्लॉग मैं खुद लिख रहा हूँ, इसे और अच्छा बनाने के लिए तथा अधिकतम पाठकों तक पहुँचाने के लिए तकनीकी जानकारी प्रदान करने वालों का आभारी रहूँगा।

    http://umraquaidi.blogspot.com/

    उक्त ब्लॉग पर आपकी एक सार्थक व मार्गदर्शक टिप्पणी की उम्मीद के साथ-आपका शुभचिन्तक
    “उम्र कैदी”

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  10. नींद तो कमबख्त दिनभर आती है पर जब सोने जाओ तो नहीं आती.
    और ये ऊपर वाली टिपण्णी में 'सार्थक' शब्द छुट गया लगता है. मेरे यहाँ वाली टिपण्णी में तो सार्थक भी है :) तुम्हारी पोस्ट लेखन मेरी पोस्ट सार्थक लेखन :-P

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