Saturday, November 08, 2008

"कैसी रही दीपावली?"

दीपावली बीत जाने के बाद इस यक्ष प्रश्न ने कई बार रास्ता घेरा तो कईयों से मैंने भी यही पूछा.. दीपावली बीते कई दिन हो गये और अब तो छठ भी बीत गया है, मुझे पता है कि कैसे अगले साल कि दीपावली आ जायेगी ये भी पता नहीं चलेगा.. जो याद रह जायेगा वो बस यह कि पिछली दीपावली कैसी थी.. फिर से मैं किसी से पूछूंगा कि "कैसी रही दीपावली?" और कुछ लोग मुझसे भी यही प्रश्न करेंगे..

चलिये मैं आपको बताता हूं कि कैसी रही मेरी दीपावली..

जब आप घर से 2500 किलोमीटर दूर अकेले, अपने दोस्तों के साथ होते हैं और कोई खास पर्व आपके सामने होकर गुजर जाता है तो यह पल बहुत चुभते हैं.. बस वैसी ही रही मेरी भी दीपावली.. बचपन को याद करके नौस्टैल्जिक भी खूब हुआ.. मुझे याद आ रहा था कि कैसे मैं घर के सबसे छोटे सदस्य कि भूमिका बखूबी निभाता था.. मिठाई और पटाखों कि लंबी सूची बनाता था.. कई बार घर के लोग मना भी करते थे कि इतने पटाखे मत लो.. ये बस पैसे कि बरबादी है.. मगर अधिकतर मेरी मांगे पूरी हो ही जाती थी.. जो मांगें पूरी नहीं होती थी उनके बारे में मैं सोचता था कि बड़ा होकर खूब मस्ती करूंगा.. जैसे बड़े होने पर लोगों के पास पैसे अपने आप आ जाते हैं.. अब दुनिया की नजर में बड़ा भी हो चुका हूं, पैसे भी कमाने लग गया हूं.. मगर ना जाने कहां से एक संकोच कि दिवार भी खड़ी हो गई है.. पैसे आने पर उसे बचाने का भी सोचने लगा हूं.. यह बात और है कि कुछ बचता नहीं है.. :)

सबसे ज्यादा तब अखरा जब मन में पटाखे खरीदने कि इच्छा भी नहीं हुई.. डर सा गया.. कहीं यह बड़ा होने कि निशानी तो नहीं है? कहीं मैं बड़ा तो नहीं हो गया हूं? बचपन तो बचपन, 20 साल का होने के बाद भी चुटपुटिया चलाने वाली पिस्तौल हर दीपावली पर खरीदना नहीं भूलता था.. अपने अपार्टमेंट के कुछ बच्चों को उसे चलाता देख अच्छा लगा.. लगा जैसे कि बचपन अब भी वैसा ही है जैसा आज से 20 साल पहले हुआ करता था..

पिछले साल कि दीपावली भी याद आई, जब मैं 3 साल के बाद दीपावली में घर पर था.. मगर मेरे लिये वो दीपावली इसलिये खास थी क्योंकि भैया कि शादी के समय मैंने नयी-नयी नौकरी करनी शुरू कि थी जिस कारण छुट्टी नहीं मिल रही थी और मैं बिलकुल मेहमान कि तरह 2 दिनों के लिये घर गया था.. भाभी से ठीक से बाते भी नहीं कर पाया था.. अब उसके बाद पहली बार घर जा रहा था और वो भी दीपावली मे.. अब मुझसे ज्यादा खुश और कौन हो सकता था?

यूं तो मैं पूजा-पाठ से कोशों दूर रहता हूं मगर पिछले साल दीपावली में पूजा के समय आरती बहुत मन से गाया था.. आरती गाने के पीछे कारण श्रद्धा नहीं बल्की गीत था जो मैं गा रहा था.. उस आरती वाले विडियो का प्रयोग इस दीपावली में बखूबी हुआ.. घर में बस शिवेन्द्र ही था जिसके हिस्से पूजा-पाठ करने कि जिम्मेदारी थी, मगर उसे लक्षमी-आरती याद नहीं थी और उस खाली स्थान को मेरे गाये पिछले साल के आरती वाले विडियो से भरा गया..

अक्सर घर में साफ सफाई चलती ही रहती है खासकर तब से जब हमारे घर में खटमलों ने हमला बोला था मगर अब हम उस हमले को पूरी तरह से नेस्तनाबूत कर चुके हैं.. :) मगर उस दिन पूरे घर कि सफाई सुबह उठ कर मैंने और मेरे मित्रों ने कि.. अपना घर सजाने के लिये ना जाने कितने ही मकड़ियों का घर उजाड़ दिया.. दोपहर में अफ़रोज़ भी आ गया.. घर में गैस पिछले 2-3 दिनों से नहीं था और किसी के पास ऑफिस से उतना समय नहीं मिल रहा था कि गैस भराया जाये, सो यह काम भी उसी दिन करना था.. उत्तर भारत में दीपावली के दिन लोग अपनी दुकानें खुला रखते हैं और उनके बीच यह मान्यता है कि दुकान जितना चलेगा, लक्ष्मी उतना ही घर में आयेगी.. मगर उसके ठीक उलट यहां लोग अपनी दुकाने बंद किये हुये थे.. घर के पास वाले जिस होटल में हम खाते हैं, वो भी बंद था सो दुसरे होटल में जाना परा.. गैस वाले ने गैस तो रख ली मगर बोला कि आज ही दे पाना संभव नहीं होगा.. सो उस दिन बिना गैस के ही काम चलाना पड़ा..

सांझ ढलते-ढलते प्रियंका भी घर आ गयी.. फिर शिवेन्द्र और प्रियंका जाकर कुछ दिये और मोमबत्ती का इंतजाम भी कर आये.. थोड़ी देर बाद प्रियंका अपने घर पूजा करने चली गयी.. रात में जितनी थोड़ी सी गैस बची हुयी थी उससे मैगी बनाई फिर सो गये.. जहां फोन पर बधाईयां देनी थी वह भी दे डाला मगर बाहर से फोन कम ही आये, क्योंकि उत्तर भारत में दीपावली अगले दिन था..

अब सोचता हूं तो लगता है कि कैसे किसी पर्व-त्योहार पर पापा-मम्मी हमारी लगभग हर मांग पूरी करते थे? उनके पास कोई कुबेर का खजाना तो था नहीं.. वही बंधा-बंधाया वेतन मिलता था.. पांचवे वेतन आयोग के आने से पहले तो बहुत ही कम हुआ करता था.. अब पाता हूं कि हमारी हर मांग को पूरा करने के लिये वो कहीं ना कहीं अपने भविष्य कि योजनाओं में कटौती करते रहे होंगे.. क्योंकि अब समझ गया हूं, बड़े होने पर पैसा अपने आप नहीं चला आता है.. उसके लिये मेहनत करनी होती है..

अभी मैं सोच रहा था कि डा.अनुराग जी जैसे ही कोई त्रिवेणी हम भी अंत में लगाते हैं.. कुछ अजीब सा बन पड़ा जो मैं नहीं लिखने वाला हूं.. उम्मीद है डा.साहब ही अब इसका इलाज करेंगे.. :D

Friday, November 07, 2008

आज मेरा चिट्ठा तर गया!! :)

मेरी एक बहुत अच्छी मित्र है, मगर उसे मेरे अपने चिट्ठे पर कुछ निजी बातों को लिखना अच्छा नहीं लगता है सो शायद ही मैं कभी अपने चिट्ठे पर उसकी चर्चा किया हूं.. उसकी बातों का जिक्र मेरे चिट्ठे पर कुछ-एक बार हुआ है, मगर वो मेरी कलम से नहीं बल्की मेरे मित्र विकास कि कलम से.. अभी वो यू.एस.ए. में है, अपने ऑफिस के काम के चलते.. ढ़ाई महीने के लिये गयी हुई थी जो अब पूरा होने को आ रहा है.. आज सुबह उसने मेरे चिट्ठे पर पहली बार एक कमेंट किया.. सबसे पहले तो वो कमेंट देखकर बहुत खुशी हुई, मगर जल्द ही वो खुशी आश्चर्य में बदल गया.. मुझे तो कभी लगता भी नहीं था कि वो मेरे चिट्ठे को पढ़ती भी होगी.. वैसे ये भरोसा उसका कमेंट पढ़ने के बाद भी नहीं है :).. क्योंकि यह भी हो सकता है कि चूंकि मैंने पिछले दो पोस्ट दोस्तों के साथ बिताये पलों पर लिखा था सो उसे पढ़ने आयी हो.. वैसे उसे उसकी जरूरत नहीं थी क्योंकि मैंने अपने लगभग सभी मित्रों को वो लेख ब्लौग पर पोस्ट करने से पहले ही मेल कर दिया था.. सो अब वो पहले कि खुशी और बाद का आश्चर्य, दोनों मिलकर आश्चर्यमिश्रित खुशी में बदल गयी..

वैसे मुझे उसे जो भी लिखना था वो मैंने उसे और अपने दोस्तों को मेल करके लिख दिया है, मगर फिर भी मैं उसके कमेंट का उल्लेख अपने चिट्ठे पर करना चाहता था सो यह पोस्ट भी ठेल दिया.. :)

उसने कमेंट किया था -
Vani said...
2nd aur last snap bahut hi achha hai, per mujhe 2nd wala bhaut hi achha laga...tum sab ki yaad aa gayi...missing my friends:-(

मेरा उसे कहना है - अरे वाणी, टेंशन काहे को लेती हो.. एक हफ्ते में तुम फिर से चेन्नई में रहोगी.. फिर कभी हो आयेंगे.. :)

यहां वाणी ने अपने कमेंट में इस चित्र के बारे में लिखा था..

इसमें सबसे आगे विकास है उसके पीछे प्रियंका और उसके पीछे मैं हूं.. चित्र उतारने का काम शिवेन्द्र का था..

सन् 2006 नवम्बर में मैंने अपना चिट्ठा शुरू किया था.. उस समय बस मैं अपनी कवितायें ही लिखा करता था जो महीने-दो महीने में एक बार कुछ लिख देता था.. अपने ब्लौग पर अहसान कर देता था.. :) दिसम्बर की छुट्टियों में वाणी ने मेरा चिट्ठा अपने भैया को दिखाई, और उन्होंने मेरी कविताओं कि काफी तारीफ भी की.. वो तारीफ उस समय मेरे ब्लौग के लिये बहुत जरूरी था.. और जाने अनजाने में वाणी ने मुझे और लिखने के लिये प्रेरित भी किया.. आज भैया से संपर्क हुये बहुत दिन हो गये हैं.. इस बीच मुझे यह भी पता नहीं कि अब वो मेरा चिट्ठा पढ़ते भी हैं या नहीं.. खैर वाणी आये तो पूछता हूं..

हो सकता है कि वाणी को मेरा उसके बारे में यह सब लिखना अच्छा ना लगे.. मगर मेरे मन में जो भावनायें थी उसे तो मैंने लिख दिया.. अब चलता हूं.. :)

चेन्नई समुद्र तट पर सूर्योदय

रात में घर जाते जाते प्रियंका याद दिलाना नहीं भुली कि सुबह 3.30 का अलार्म लगा कर मुझे जगा देना.. उसके जाने के बाद विकास सोच में डूबा हुआ था कि कल का दिन कितना हेक्टिक रहेगा.. सुबह सुबह जल्दी उठना फिर देर रात में फैशन सिनेमा देख कर वापस लौटना और फिर अगले दिन सोमवार को फिर सुबह-सुबह ऑफिस जाना.. असल में हमारे यहां सुबह सबसे पहले विकास को ही ऑफिस जाना होता है..

विकास ने मुझसे पूछा, "ये सनराईज देखने का आईडिया किसका था?"

मैंने मुस्कुरा कर कहा, "I was the culprit.." वो कुछ बोला नहीं.. बस मुस्कुरा कर रह गया.. फिर खाना खा कर सभी सोने चले गये..

अगली सुबह 3.40 मे अलार्म से मेरी नींद खुली.. मैंने प्रियंका को फोन करके जगाया और नित्यक्रिया करने के लिये चला गया.. लौट कर पहले शिव को और फिर विकास को जगाया.. प्रियंका के आते-आते 4.40 हो गये और हमे निकलते-निकलते 5.20.. मेरे मित्र अमित के भाई कि बाईक हमारे अपार्टमेंट में ही पार्क थी और वो बैंगलोर गया हुआ था.. सो उसके बाईक का भरपूर इस्तेमाल हुआ.. प्रियंका कि गाड़ी पर विकास बैठा और मेरे साथ बाईक पर शिव और हम निकल परे मैरिना बीच कि ओर.. प्रियंका ने ही बताया था कि मैरिना बीच का सूर्योदय ज्यादा प्रसिद्ध है..

सुबह का समय था और पहली बार चेन्नई में ठंढक का अहसास भी हुआ.. शिवेंद्र मेरे पीछे सिमट कर बैठा हुआ था.. ठंढ मुझे भी लग रही थी मगर बाईक चलाने का मेरा जुनून और उसका लुत्फ़ लेने कि मेरी आदत उस ठंढ को पीछे छोड़ बस हवा से बाते कर रहा था.. सुबह ट्रैफिक बस नाम मात्र का ही था.. जो लोग भी दिख रहे थे वो सुबह के जौगिंग के लिये ही जा रहे थे.. हमलोग 6 बजने से पहले ही वहां पहूंच गये थे.. अभी तक हल्की लालिमा आकाश में दिखने लगी थी.. मैरिना बीच हमेशा कि तरह ही गंदा था..

"शायद यहां भी छठ पूजा हुआ लगता है.. कुछ ऐसा ही लग रहा है.." किसी ने मजाक किया..

"सुनामी... $%^&#@ सुनामी..." कोई चिल्लाया जब मैं पानी में था.. मैं पलट कर देखा कि एक और आदमी हमारे बीच वहां था.. बाद में समझ में आया कि वो मानसिक रूप से विक्षिप्त था..(यहां $%^&#@ को आप तमिल माने जो मुझे समझ में नहीं आया)

मुझे लग रहा था कि जैसे एक बार पांडिचेरी में हमलोग सूर्योदय का इंतजार करते रह गये थे और बाद में पता चला था कि बादलों के भीतर सूर्योदय हो भी चुआ है और हमें दिखा भी नहीं, कहीं वही बात यहां भी तो नहीं होने वाली है? कुछ-कुछ ऐसा ही लग भी रहा था.. ठीक जहां से सूर्योदय होना था वहीं बादल लगे हुये थे.. सूर्योदय तो नहीं ही दिखा मगर सूर्योदय के बाद वाला दृष्य नजर आ गया.. सभी खुश.. चलो आना सफल रहा.. इस मस्ती के पल में थोड़ी देर के लिये मैं थौटिंग मोड में भी पहूंच गया और पानी के बीच खड़ा होकर सोचने लगा कि ना जाने कितने शहरों में कितनी ही इमारतें सूर्योदय को निगल जाती है.. सोचा कि पिछली बार मैंने सूर्योदय कब देखा था तो मुझे महीना भी याद नहीं आया.. एक बात और भी पता चली, वो यह कि सूर्योदय से ठीक पहले जो समुद्र शांत दिख रहा था उसकी लहरें अचानक से ही सूर्योदय होने बाद तेज हो गयी..

फिर वापसी.. आते समय कैथेड्रल रोड पर एक फ्लाई ओवर था, जिस पर चढते समय ना जाने क्यों मुझे स्पीड बढाने का मन किया.. जो पहले 40 के औसत से चल रहा था वो अचानक 60-70-80-90 से होते हुये 98 पर पहूंचा मगर उससे ज्यादा नहीं बढाया क्योंकि ये भी ख्याल आया कि हम शहर के बीच चल रहे हैं, ना कि किसी हाईवे पर.. वैसे स्पीड बढाते समय शिवेन्द्र कि गालियां खाने का भी अलग ही लुत्फ़ है.. :)

सारे फोटो प्रियंका के N-96 से लिये हुये.. उसने मुझे कहा था कि कैमरा चार्ज कर लेना, मैंने चार्ज भी किया.. मगर मेरे कैमरे में ही कुछ दिक्कत आ गयी जिसके कारण मैं फोटो नहीं ले पाया.. मगर उसके मोबाईल कैमरे से भी अच्छी तस्वीरें आई.. :)

Wednesday, November 05, 2008

हम भाग जायेंगे यहां से

"हम भाग जायेंगे यहां से.." खिजते हुये प्रियंका ने कहा..

"हां! तुम तो बैंगलोर भाग ही रही हो.."

"नहीं! मन नहीं लग रहा है.. हम अभी भाग जायेंगे.."

"अच्छा रहेगा कि चलो कहीं घूम कर आते हैं.. क्या बोलती हो? समुद्र तट कैसा रहेगा?"

"हां.. चलो.."

विकास से पुछा, मगर उसे काम था और उसकी एक मित्र भी आई हुई थी सो साथ नहीं चलने कि स्थिति में था.. फिर थोड़ी देर में हमारा प्लान बदल गया..

"चलो पहले सत्यम चलते हैं.. वहां मूवी का टिकट देखते हैं.. उसके बाद समुद्र तट जायेंगे.." प्रियंका ने कहा..

"ठीक है.. चलो.."

प्रियंका गाड़ी चला रही थी और मैं पीछे बैठा हुआ था.. उस समय मैं गाड़ी चलाने के मूड में नहीं था, सो चलाने का ऑफर भी नहीं किया.. बस आराम से पीछे बैठा रहा.. उस समय लगा कि घर में जब होता हूं तो भैया हमेशा पीछे क्यों बैठते हैं.. बाईक चलाने का अपना अलग ही लुत्फ़ होता है मगर पीछे बैठने का मजा भी अलग ही होता है..

शनिवार रात का गोलमाल रिटर्न्स का टिकट मिल रहा था.. मगर वो किसी को नहीं देखना था.. फिर पता चला कि रविवार कि रात फैशन का टिकट मिल रहा है.. विकास को फोन किया, वो चलने को तैयार था.. अफ़रोज़ को फोन किया, उसने फोन नहीं उठाया.. शिवेंद्र को फोन ही नहीं किया, पता था कि वो कहेगा कि नहीं जाना है.. सो उससे बिना पूछे ही उसका भी टिकट ले लिये.. :)

"अब कहां चलें? सी बीच?" प्रियंका ने पुछ..

"चलो स्पेंसर प्लाजा चलते हैं, यहीं पास में है.. मुझे एक स्पोर्ट्स शू लेने का बहुत दिन से मन कर रहा है.. वहां एडिडास के शोरूम में डिस्काऊंट तो चल रहा होगा ना?"

"पता नहीं.. चल कर देख लेते हैं.."

फिर से प्रियंका गाड़ी चलाने लगी और मैं पीछे आराम से बैठ गया.. तभी सामने एक फ्लाईओवर दिखा.. मैंने पूछा, "ये रास्ता किधर जाता है?"

"पता नहीं.. चलो चल कर देख लेते हैं.."

फ्लाईओवर से उतरने पर पता चला कि हम रायपेट्टाह पहूंच गये हैं.. रास्ता मुझे कुछ जाना पहचाना लग रहा था मगर बिलकुल सही पता नहीं चल रहा था कि हम कहां हैं.. फिर भी आगे बढते चले गये.. मुझे बस दिशा ज्ञान था कि समुद्र तट जिस दिशा में है हम उसी दिशा में बढ रहे थे.. थोड़ी देर बाद पता चल ही गया कि हम उसी रास्ते पर हैं जिस इलाके में पहले मैं रहता था.. दिल खुश हो गया.. बहुत दिनों बाद इधर आना हुआ था.. उत्साह के साथ प्रियंका को बताना शुरू कर दिया कि देखो ये क्या है तो वो क्या है.. पता नहीं मन ही मन में कितनी गालियां दी होगी मुझे, मगर सामने कुछ बोली नहीं.. :)

उसने पूछा, "ईगा थियेटर कहां है?"

"चलो वो भी आज दिखा ही देता हूं.." फिर मैं उसे रास्ता बताने लगा.. माऊंट रोड से होते हुये चेन्नई सेंट्रल रेलवे स्टेशन.. फिर वहां से पूनामल्ली हाई रोड पकड़ कर चेटपेट से होते हुये मैंने उसे ईगा थियेटर दिखाया.. ईगा थियेटर कि खूबी यह है कि चेन्नई में बस यही इकलौता सिनेमा हॉल है जहां सिर्फ हिंदी सिनेमा लगती है.. रास्ते में हमने अमरूद भी खरीदा जिसे मैं आराम से पीछे बैठ कर खाया..(पीछे बैठने का फायदा अब समझ में आया? :))

बीच ट्रैफिक में प्रियंका को दौड़ा पड़ने लगा.. :) कहती है, "मुझे चिल्लाने का मन कर रहा है.."

"हां, चिल्लाओ.. लोग तुम्हें तो कुछ नहीं कहेंगे.. मुझे ही मारेंगे.. अब लड़की के पीछे बैठा हुआ हूं और लड़की चिल्लाने लगे तो और क्या होगा?"

"नहीं मुझे चिल्लाना है.."

"ठीक है चिल्लाओ.."

और लगी वो चिल्लाने.. खैर अच्छी बात तो यह थी कि ट्रैफिक की आवाज में उसकी आवाज दब गई थी और किसी ने नहीं सुनी.. घड़ी में देखा तो 8 बजने जा रहे थे.. हम लगभग 30-35 किलोमीटर घूम चुके थे.. अभी तक अन्ना नगर का सिग्नल भी नहीं आया था जहां से हमें सी.एम.बी.टी. से होते हुये वडापलनी, अपने घर जाना था..

"आज रात 10.30 में सी-बीच चलोगे?" उसने पहले पूछा.. फिर झिझकते हुये कहा, "इतनी रात जाना ठीक रहेगा?"

"नहीं.. रात के समय सी-बीच पर कैसा माहौल रहता है वो मुझे नहीं पता.. मैरिना बीच का मुझे पता है कि वो रात में जाने लायक नहीं है.. बेसंत नगर बीच का मुझे पता नहीं.." थोड़ी देर के लिये शांति सी छा गयी.. वो चुप थी और ट्रैफिक का शोर बढ गया था.. मुझे लगा कि उसे सी-बीच जाने का बहुत मन है.. सो मैंने आगे कहा, "चलो कल सुबह सूर्योदय देखने चलते हैं.. क्या कहती हो?"

बस फिर क्या था.. प्रियंका खुश.. :) "हां हां.. ये ठीक रहेगा.. कल सुबह मुझे 3.30 मे उठा देना और अभी किसी को मत बताना.. सरप्राईज देंगे सभी को.."

मैंने कहा, "सभी को पहले ही बता दो, नहीं तो पता चलेगा कि सुबह-सुबह हमे सरप्राईज मिल रहा है और कोई नहीं गया.." और बस, हमारा प्लान पक्का हो गया.. फिर यूं ही बातें होती रही और प्रियंका बेहद भयंकर वाले ट्रैफिक में से बहुत कुशलता के साथ गाड़ी निकालते हुये घर पहुंचा दी..

अगले भाग में समुद्र तट का सूर्योदय..

Monday, November 03, 2008

The Devil Wears Prada और Fashion


अभी हाल-फिलहाल में मैंने फ़ैशन विषय के ऊपर दो सिनेमा देखी है.. पहला सिनेमा The Devil Wears Prada और दुसरा Fashion.. The Devil Wears Prada के साथ मैंने दीपावली कि रात गुजारी थी और Fashion मैं कल देर रात देख कर आया.. दोनों ही सिनेमा फैशन इंडस्ट्री के ऊपर बनाया गया है..

चलिये सबसे पहले बात करते हैं The Devil Wears Prada के बारे में.. यह सिनेमा सन् 2006 में आई थी.. इसमें Anne Hathaway ने Andrea "Andy" Sachs का किरदार निभाया है जो तुरत कॉलेज से पास होकर नौकरी कि तलाश में भटकते हुये न्यूयार्क जाती है और उसे वहां उसे काम मिलता है एक बेहद प्रसिद्ध फैशन मैगजिन के एडिटर Miranda Priestly की को-असिस्टेंट का.. इस सिनेमा में Miranda Priestly का किरदार निभाया है Meryl Streep ने..



इसमें कुछ ऐसा दिखाया था कि Anne Hathaway एक साधारण सी लड़की है जिसका अपने ब्वायफ़्रेंड के साथ लिव-इन रिलेशन है.. साधारण से कपड़े पहनती है और फैशन रिपोर्टिंग इंडस्ट्री में दूसरे लोगों से कुछ अलग हट कर सोचती है.. जैसे-जैसे समय बीतता जाता है वैसे-वैसे उसे समझ में आने लगता है कि यहां खुद के सोचने-समझने से कुछ नहीं होता है.. बस जो बॉस कहे उसे किसी भी हालत में पूरा करना ही एक मात्र कर्तव्य है.. इसी बीच पेरिस फैशन वीक आता है जिसमें जाने के लिये Anne Hathaway के साथ काम करने वाली उसकी एक सिनियर बहुत पहले से उत्साहित थी, मगर Miranda उसे ना ले जाकर ये ब्रेक Anne Hathaway को देती है.. वहां जाने से पहले भी उसके भीतर काफी अंतर्द्वंद चलता है क्योंकि उसे पता था कि उस फैशन वीक का महत्व उसके साथ काम करने वाली उसकी मित्र के लिये कितना महत्वपूर्ण था.. मगर सफलता प्राप्त करने का लालच उसके अंतर्द्वंद पर विजय पाता है.. पेरिस जाकर उसे इस इंडस्ट्री कि सच्चाई का पता चलता है.. जिसके बाद वो सब छोड़कर वापस न्यूयार्क अपने ब्वायफ़्रेंड के पास आ जाती है और फैशन रिपोर्टर से एक साधारण रिपोर्टर बन जाती है..


अब बात करते हैं फैशन सिनेमा की.. मेरे एक मित्र के शब्दों में, "बड़े पर्दे पर FTV देखना हो तो यह सिनेमा देख लो.." मधुर भंडारकर ने काफी मेहनत कि है इस सिनेमा पर मगर फैशन इंडस्ट्री के चमक दमक दिखाने के चक्कर में वो मूल कहानी से कई बार भटकते से नजर आये.. कई बार मुझे ऐसा लगा कि मधुर भंडारकर The Devil Wears Prada का नकल उतार रहे हैं.. उदाहरण के तौर पर इस सिनेमा में एक डायलॉग जब प्रियंका को किट्टू गिडवानी बताती है कि किस तरह तुमने पिछले मॉडल को रिप्लेस किया है शो स्टॉपर के जगह पर.. बिलकुल वैसे ही जैसे कि The Devil Wears Prada में Anne Hathaway कि बॉस उसे बताती है कि तुमने कैसे आगे बढने के लिये अपने साथी को पीछे धकेल दिया..

सच कहूं तो मेरे पास इस सिनेमा के बारे में ज्यादा कुछ कहने के लिये है भी नहीं.. मगर इतना तो जरूर है कि दोनों ही सिनेमा एक संदेश दे रही है कि कभी भी सफलता पाने के लिये खुद को नहीं खोना चाहिये.. इस सिनेमा को देखते हुये मुझे एक लड़की का भी ख्याल आया था जिसके लिये अचानक कैरीयर सबसे महत्वपूर्ण हो गया.. बाकी सारे रिश्ते पीछे छूट गये.. सिनेमा देखते हुये सोच में भी पड़ गया कि काश असल जिंदगी में भी सिनेमा के रंग भर जाते और हर अंत एक खुशनुमा सुबह लेकर आये..

Wednesday, October 22, 2008

भैया के जन्मदिन पर ओ गदही बोलने वाली चिड़िया के नाम एक पोस्ट और

कल रात घर पर फोन से बातें हुई.. बातें शुरू होते ही बातों का रूख अचानक से मेरे चिट्ठे की ओर घूम गया.. एक एक करके सभी "एक चिड़िया जो ओ गदही पुकारती थी" वाले पोस्ट पर अपने विचार व्यक्त करने लगे.. यूं तो मुझे पता है कि मेरे हर पोस्ट को मेरे घर में सभी पढते हैं मगर मेरे उस पोस्ट पर कल पहली बार भैया कमेंट करने कि कोशिश भी किये जिसमें असफल रह गये(नेट कनेक्शन कि कुछ दिक्कत थी उन्हें) और आज फिर से उन्होंने कोशिश कि और उनका कमेंट कुछ यूं था.. सच कहूँ तो मुझे लगता है कि जब भी मैंने आपका कोई स्तम्भ पढा है तो मुझे उसमें कुछ ना कुछ खामियाँ ही नज़र आयी, इसमें भी है जैसे कि सीतामढी होता है ना कि सितामढी, पर आपने इतने दिल से लिखा है कि आँखें नम हो गयी। अचानक ही लगा कि मैं 20 साल पीछे चला गया हूँ, वही सब कुछ आँखों के सामने आ गया।

उन्होंने सच ही लिखा है.. इससे पहले जो कुछ भी मैं लिखता था उसमें बस मेरी यादें जुड़ी रहती थी मगर उस पोस्ट में बस मेरी ही नहीं पापा-मम्मी, भैया-दीदी, सभी कि यादें जुड़ी हुई थी.. तभी पापाजी से मैंने पूछा कि आप कितने दिनों के लिये चक्रधरपुर गये थे? उन्होंने कहा शायद 2-3 महीनों के लिये.. तभी पीछे से मम्मी कि आवाज आयी कि नहीं बस 1 महीने में ही लौट आये थे.. मेरे मन में यह बात आयी कि सच में जब इंतजार का लम्हा बहुत लम्बा हो जाता है तब एक-एक दिन महिनों कि तरह गुजरता सा मालूम होता है..

उस पोस्ट पर कुछ यादगार कमेंट्स भी आये जिनकी चर्चा अगर मैं यहां नहीं करूं तो यह मेरे पाठकों के साथ अन्याय ही होगा.. डा.अमर कुमार जी ने तो पूरी एक कविता और एक पोस्ट ही उस पर ठेल दी.. मैंने पापाजी को कहा था कि वो कविता मैं उन्हें मेल करूंगा मगर आज फिर से उसे यहीं डा.साहब से पूछे बिना ही अपने पोस्ट पर डाल रहा हूं.. मैं उम्मीद करता हूं कि वो से अन्यथा नहीं लेंगे..

आहः पुछरू, निमिष मात्र में
तुमने मुझे कहाँ से कहाँ पहुँचा दिया,
सीतामढ़ी के आगे का स्टेशन रीगा,
उसके बगल ही में सुगर फ़ैक्टरी,
आहः पुछरू,जीते रहो !

ठीक उसके पीछे एक गाँव उफ़रौलिया,
जिसकी पगडंडियों पर ऊँगली पकड़ कर चलते हुये,
अपने बाबा से मिलती संस्कार शिक्षा...
सबकुछ अब जैसे बिखरा हुआ है, वहाँ !
आहः पुछरू,जीते रहो !

आधा गाँव तो कलकत्ता कमाने पहुँचा
बाकी को पटना मुज़फ़्फ़रपुर राँची ने निगल लिया।
बचे फ़ुटकर जन छिटपुट शहरों में हैं,
एक नाम उफ़रौलिया को जीते हुये ...
आहः पुछरू,जीते रहो !

कसमसाते हुये, लाल टोपी को कोसते हुये
उफ़रौलिया की गलियों में विचर रहेः हैं
उम्र की इस ठहरी दहलीज पर
उस माटी में लोटते हुये
आहः पुछरू,जीते रहो !

पर मैं भी कितना स्वार्थी हूँ कि
यह सब याद करते करते जाने कहाँ खो गया
और तुम्हारी गदहिया पर
कोई प्रतिक्रिया भी नहीं दी ..
आहः पुछरू,जीते रहो !

यह मेरे पोस्ट का सौभाग्य ही है जो किसी और को भी यादों कि गलियों में भटका गया.. आपका बहुत बहुत धन्यवाद डा.साहब..

उस पोस्ट को पढने के बाद ज्ञान जी भी यादों कि गलियों में ही भटकते पाये गये.. उन्हें बचपन में गाया गया यह गीत याद हो आया..
तीसी क तेल
भांटा क फूल
हम तुम अकेल
जूझैं बघेल!


नीतिश राज जी ने कहा - पुराने दिनों की याद ताजा कर दी आपने प्रशांत। बहुत ही अच्छा लिखा है। साथ में एक बात और लगता है आपके पिताजी के ट्रांस्फर के कारण आप भी कई जगह देख चुके हैं। उसके ऊपर भी लिखिएगा कभी यदि मौका लगे तो जगहों के बारे में।

मेरा कहना है - नीतिश जी, मैं जरूर लिखूंगा.. आखिर कभी ना कभी यह पोटली भी तो खुलनी ही चाहिये..

दिनेश जी का कमेंट भी दिल को छू गया.. उन्होंने लिखा - यह वही चिड़िया है फिर से जनम पा कर आप के पास चली आयी है। पुराने दिनों की याद दिलाने।

अनिल जी, जितेन्द्र जी, लवली, ताऊ जी, दीपक जी, अनुराग जी, भूतनाथ जी, अनुप शुक्ल जी ने भी इसे सराहा.. सभी को यह यादें कहीं ना कहीं खींच कर अपने साथ लेती चली गई..

पूजा जी ने देर से मगर लिखा - यादों की गलियों से गुजरना अच्छा लगा. चिट्ठी के बारे में मेरा भी यही ख्याल है, हाथ के लिए ख़त में एक खास अपनापन होता है. शब्दों पर उँगलियाँ फेर मन लिखनेवाले के पास पहुँच जाता है. बिल कुल दिल से आपने लिखा है. मुझे भी अपना बचपन और गाँव याद आ गया. आज के इस भाग-दौड़ की दुनिया में अगर किसी को किसी कि याद दिला कर दो पल के लिये चैन कि दुनिया में मैं लौटा ले गया.. अब इससे बड़ी खुशी मेरे लिये और क्या हो सकती है?


आज मेरे लिये एक और बड़ी खुशी कि बात है.. आज मेरे भैया सुस्मित प्रियदर्शी का जन्मदिन भी है.. आप भी लगे हाथों उन्हें बधाईयां देते जाईये.. :)

Tuesday, October 21, 2008

२४ घंटे, जो ख़त्म होता सा ना दिखे (भाग दो)

अमित की कलम से
यहां भाग एक है

अंततः उसने मुझे पैसा वापस कर ही दिया और मैं बस से उतर गया.. अब तक हद हो चुकी थी.. मैं वापस बस स्टैंड आया इस आशा में कि कोई ना कोई बस मिल ही जायेगा और् आश्चर्यमिश्रित खुशी के साथ मैंने पाया कि एक बस थी भी वो भी AC बस.. मैंने फिर एक दौड़ लगायी और पहुंचा उसके कंडक्टर के पास..

मैंने उससे पुछा, "अंकल, एक सीट दे दो.." उसने मुझसे पैसे मांगे और मैंने दे दिये.. अरे ये क्या!! उसका टिकट मशीन ने काम करना बंद कर दिया.. NOT AGAIN.. 30 मिनट उसने भी कोशिश की.. पर वो ठीक नहीं हुआ.. अब तक रात के 12.15 हो चुके थे.. अंत में वह कंट्रोल रूम गया और उसे ठीक करके ले आया.. Fianlly I got the ticket और मैं बस में बैठ गया और बस चल पड़ी.. एक बात यहां ये अच्छी थी की यह बस अपने समय से 2 घंटे देरी से चल रही थी इसलिये मुझे यह बस मिल गयी..

खैर मैं बस में बैठ गया.. अब तक कि सारी बातें दिमाग में घूम रही थी और मैं सोच रहा था कि अब सब ठीक हो गया है.. पर किसे पता? मेरी किस्मत का? पता नहीं किसका चेहरा मैंने सुबह-सुबह देखा था..

हां तो अंततः मैं बस में चढ ही गया.. और बस लगभग 12.30 में खुल गयी.. अब मैंने सोचा कि चलो अब तो कुछ नहीं होगा और मैंने अपना आई-पॉड कान में डाला और सोने कि कोशिश करने लगा.. पर नींद आती तब ना? वही सारी बात दिमाग में घूम रही ती.. वही सब सोचते सोचते आंख लग गयी.. जब आंख खुली तो मैं इलेक्ट्रोनिक सिटी में आ चुका था.. मतलब बैंगलोर में घुस चुक थ.. थोड़ा सुकून मिला कि चलो बैंगलोर फहूंच गया.. लगभग 7.30 सुबह में मैजेस्टिक(बैंगलोर का प्रमुख बस अड्डा) भी पहूंच ही गया..

नया दिन नई शुरूवात.. अब कल की सारी बातें भूतकाल में जा चुकी थी.. और बैंगलोर पहूंचते ही मुझे काफी सुकून मिला.. काफी रिलैक्स महसूस करता हूं.. मैं लोकल बस स्टैंड कि तरफ बढ गया.. लोकल बस लेने के लिये.. मुझे यहां से बनसंकरी थर्ड स्टेज जाना था.. बस मिल गई.. मैं बैठ गया.. और बस चल भी पड़ी.. मैजेस्टिक से बनशंकरी बस 25-30 मिनट लगते हैं.. सो 8.10 के लगभग मुझे घर पर होना चाहिये था.. पर होनी को कुछ और ही मंजूर था.. और मेरा बैड लक अभी तक चालू था.. लगभग 5 मिनट चलने के बाद ही बस के गियर ने काम करना बंद कर डिया.. बेचारे ने बहुत कोशिश की.. पर कैसे ठीक होता मैं जो थ बैठा हुआ उस बस में.. मुझे मन में काफी हंसी आई.. खैर बस से उतर गया.. सोचा औटो ले लूं.. पर यह सोच कर कि औटो में क्यों पैसा बरबाद करूं.. सो वापस बस स्टैंड जाकर दूसरी बस ले लेता हूं.. मैं वापस बस स्टैंड गया.. पर अफ़सोस कोई बस नहीं थी.. सिर्फ एक ही नंबर 45B सीधे वहां तक जाती है और वो बस नहीं थी.. खैर कोई बात नहीं, मैंने ये सोच कर एक डूसरे नंबर की बस में बैठ गया जो बनशंकरी के पास मुझे उतार देती और वहां से मैं औटो ले लेता.. यह सोचकर मैं बैठ गया उसमें..

And thanks to God अब इस बस में कुछ नहीं हुआ और उसने मुझे BDA COMPLEX जहां मुझे उतरना था, उतार दिया.. अब बारी थी औटो लेने की.. 4-5 औटो खड़े थे.. मैंने एक-एक करके पूछा.. जिसने सबसे कम बोला मैं बैठ गया और औटो चल पड़ी.. मुश्किल से 15 मिनट का रास्ता था यहां से लेकिन लगभग 7-8 मिनट के बाद औटो रुक गयी.. मैंने पूछा क्या हुआ भाई? उसने कहा कि कुछ नहीं सर गैस खत्म हो गया है..(Not again) अभी चेंज करता हूं.. जान में जान आयी की उसके पास एक्स्ट्रा सिलेंडर था.. और वो उतर कर पीछे चला गया सिलेंडर बदलने.. काफी समय हो गय मगर वह वापस नहीं आया.. मैं भी उतर गया देखने के लिये कि इतना समय क्यों लग रहा है.. पीछे देखा.. That was Unbelievable.. I was just Shocked.. औटो वाला नीचे जमीन पर पड़ा था.. और उसके मुंह से कुछ लिक्विड निकल रहा था या कहें तो थूक निकल रहा था.. पूरा शरीर उसका बुरी तरह हिल रहा था.. मैं घबरा गया.. मुझे समझ में नहीं आया कि मैं क्या करूं.. ऐसा मेरे साथ दूसरी बार हो रहा था.. पहली बार कब हुआ था ये कहानी फिर कभी..

आस पास कोई था भी नहीं.. सुबह का समय था.. मैंने उसे हिलाया डुलाया.. लेकिन सब बेकार.. उसका कांपना लगातार जारी रहा.. अब तक मुझे ये समझ में आ चुका था कि इसे मिरगी का दौरा पड़ा है.. लेकिन मैं क्या करूं कुछ समझ में नहीं आ रहा था.. मेरे पास जो पानी था मैंने उसके चेहरे पर डाल दिया लेकिन कोई असर नहीं हुआ.. तब तक एक अंकल आते दिखे.. जौगिंग कर रहे थे वो.. मैंने उनसे मदद मांगी और उन्होंने बताया कि Epilepsy का केश है.. and see the Coincedence अरे नहीं वो डा.नहीं थे.. लेकिन उनका बेटा डाक्टर था.. उन्होंने मेरे फोन से अपने बेटे को कॉल किया.. उसने क्या कहा मुझे नहीं पता लेकिन उसके बाद अंकल ने उसे गोबर सुंघाया.. तब तक उनका बेटा भी आ गया.. और औटो वाले को होश भी आ गया थ..

उनके बेटे ने उसे कुछ टैब्लेट्स दीया.. फिर वो लोग कन्नड़ में आपस में बात करने लगे.. मुझे काफ़ी थैंक्स बोला.. औटोवाले ने तो हद ही कर दिया था.. फिर मैंने कहा यार मैं अब जाता हूं.. अब तक वो पूरी तरह नॉरमल हो चुका थ.. लेकिन औटोवाले ने बहुत जोर दिया कि वो मुझे घर तक छोड़ देगा.. और काफ़ी मना करने के बाद भी वो नहीं माना.. और एक बार फिर मैं औटो में बैठा और घर के तरफ निकल पड़ा.. वो अंकल और उनके बेटे ने भी काफी आभार प्रकट किया..

रास्ते भर औटो वाला थैंक्स बोलता रहा और बताया कि उसे कभी-कभी ये प्रोबलेम होती रहती है.. खैर लगभग 9.30 में मैं घर पहूंच गया.. जब औटो वाले को पैसा देने लगा तो उसने इंकार कर दिया लेने से.. लेकिन अंततः मैंने उसे पैसा दे ही दिया और मैं घर पहूंच गया..

तेरे मेरे प्यार का ये रिश्ता कभी ना टूटे

नुसरत के गानों कि खूबी या खराबी जो कहना चाहें वह नाम दे सकते हैं.. वह यह कि जिसे उनका गाना अच्छा लगता है वह किसी और के गाये उसी गीत को कभी पसंद नहीं कर सकता है और जिसे उनके गाने अच्छे नहीं लगते हैं वह किसी भी हालत में उनकी आवाज नहीं सुन सकता है.. अब सुफ़ियाने गानों कि यह खूबी होती है कि जो भी चाहे वह उस गाने को अपनी आवाज और अपनी धुन से सजा सकता है.. यही कारण है कि एक ही गाने कई कई बार, कितने ही गायकों द्वारा और कितने ही अलग धुनों में आपको मिल सकता है.. मगर जिसने एक बार नुसरत की आवाज में कोई गीत सुन लिया, बस.. उसे कोई और आवाज सुहा ही नहीं सकती..

खैर आज मैं बात करता हूं सलाम नाम अलबम के ही अनसुने मगर खूबसूरत नगमों कि जो पिया रे कि जैसे शानदार गीत के सामने छुप सा गया था मगर यह सभी अपने आप में अनमोल नगीने से कम नहीं थे.. यह गीत भी रोमांस के रंग में डूबा हुआ एक बेहतरीन नगमा है जिसमे नुसरत के सुफियाने अंदाज और पाश्चात्य संगीत पर नुसरत के पकड़, दोनों को ही दिखाता है.. इसके बोल कुछ यूं हैं - "मेरे हाथ में, तेरा हाथ हो".. एक कल्पना जिसमें प्रेमिका का हाथ अपने हाथों में आने कि कल्पना में प्रेमी डूबा हुआ है और फिर उसे सारा जमाना अपना लगने लगता है.. इस अहसास को लिखा नहीं जा सकता है इसे बस सुन कर महसूस किया जा सकता है.. सो आप भी इसे महसूस करें..





मेरे हाथ में, तेरा हाथ हो..
महकी हुई, हर रात हो..
हो.. प्यार से जो दिल मिले सपने हैं खिले-खिले..
तेरे मेरे प्यार का ये रिश्ता कभी ना टूटे..
हमसे जमाना चाहे रूठे..

मेरे हाथ में, तेरा हाथ है..

हो.. दिल तुम्ही हो.. मेरी मंजिल तुम्ही हो..
दुनिया को भूल जाऊं मैं तेरे प्यार में..
हो.. दिल तुम्ही हो.. मेरी मंजिल तुम्ही हो..
दुनिया को भूल जाऊं मैं तेरे प्यार में..
सामने बिठा के तुझे प्यार करूं..
पूजा मैं तुम्हारी मेरे यार करूं..
देखे ये जमाना..
ओ मेरी जाने जाना..
संग रहना अपना..

तेरे मेरे प्यार का ये रिश्ता कभी ना टूटे..
हमसे जमाना चाहे रूठे..

मेरे हाथ में, तेरा हाथ है..

मेरे मन में..
ओ दिलबर तन बदन में..
आग लगाने लगी ठंढी ठंढी ये हवा..
ओ..मेरे मन में..
ओ दिलबर तन बदन में..
आग लगाने लगी ठंढी ठंढी ये हवा..
अंखियों में है नशा सा ये छाने लगा..
प्यार भड़ा दिल बहकाने लगा..
दिल है बेकाबू..
चल गया जादू..
आ गले लग जा..

तेरे मेरे प्यार का ये रिश्ता कभी ना टूटे..
हमसे जमाना चाहे रूठे..

मेरे हाथ में, तेरा हाथ है..

प्यार से जो..
मांगे तू जां मेरी..
जान क्या है तुम पे जमाना सारा वार दें..
प्यार की ऊमंगो को जगाया तूने..
जब से है अपना बनाया तूने..
ये चेहरा तुम्हारा..
है जीने का सहारा..
और कहूं मैं क्या?

तेरे मेरे प्यार का ये रिश्ता कभी ना टूटे..
हमसे जमाना चाहे रूठे..

मेरे हाथ में, तेरा हाथ है..
हो.. प्यार से जो दिल मिले सपने हैं खिले-खिले..


Sunday, October 19, 2008

नुसरत का एक गीत, जो मदहोश कर दे

आपने नुसरत का गीत पिया रे तो सुना ही होगा.. कई रियलिटी शो और म्यूजिक चैनल पर कई बार दिखाया जा चुका है.. आजकल इंडियन आयडल में भी १० गायकों में से १ तो ऐसा निकल ही जाता है जो यह गीत गाता है.. मगर क्या आपने इस अलबम के बाकी गीतों को सुना है? इस अलबम के बाकी गीत मुझे कई मायनो में पिया रे से कहीं आगे लगते हैं.. जिसमे से दो गीतों का मैं खास तौर पर कायल हूँ.. पहला गीत ओ जानेमन, ओ जानेजां.. हो कभी, मेहरबां.. और दूसरा गीत ये शाम, फिर नहीं आएगी..

सबसे पहले मैं चर्चा करना चाहूँगा ओ जानेमन गीत की.. यह धुन इस अलबम के भारत में आने से पहले ही एक सिनेमा में रिलीज हो चुकी थी.. जिसे सोनू निगम ने गाया था और उसका धुन नुसरत ने ही दिया था.. उसके बोल थे एक दिन कहीं, हम दो मिले.. और तीसरा कोई न हो.. इन दोनों गानों कि सबसे बड़ी खूबी यह थी कि दोनों ही गीत अपने आप में लाजवाब थी.. जीतनी खूबसूरती से नुसरत ने इसे गाया था, सोनू निगम ने भी इससे पूरा इन्साफ किया.. तू मेरा दिल, तू मेरी जान भी इसी धुन पर है जिसमे आप सूफियाना अंदाज देख सकते हैं.. जो मेरा सबसे पसंदीदा है..

अभी थोडी जल्दी हो रही है और गीत भी नेट पर नहीं मिल रहे हैं सो फिलहाल आप यह गीत सुनिए.. बाकि बाते बाद में करते हैं.. :)

गीत! सूफियाना अंदाज में..

तू मेरा दिल, तू मेरी जान..
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यह दूसरा गीत जो इतने रोमांटिक अंदाज में गाया गया है जिसे सुन कर कोई भी मदहोश हो जाए.. इसके एक एक शब्द से रोमांस झलकता सा नजर आता है.. सच कहूँ तो इस गीत को सुनने के पहले मैं कभी सोच भी नहीं सकता था की नुसरत इस तरह के गीत भी गा सकते हैं.. इसमे नुसरत ने संगीत की एक नयी ऊंचाईयों को छुवा है.. अपने आस पास के कई लोगो में मैंने पाया है की वह नुसरत को पसंद नहीं करते हैं जिसके पीछे सबसे बड़ा कारण होता है उसकी भाड़ी आवाज.. मगर इस गीत में उसने अपने भाड़ी आवाज को बेहद कोमलता से अपनी आवाज से सजाया है.. इसे आप भी सुने और अपनी राय बताये..


ये शाम फिर नहीं आयेगी..
ये शाम फिर नहीं आयेगी..

कुछ ना कहा तो,
कुछ ना सुना तो,
यूँ ही ढल जायेगी..

ये शाम फिर नहीं आयेगी..
ये शाम फिर नहीं आयेगी..

आज ही कर लो दिल कि बात,
कल पछताओगे..
आज अगर तुम पास ना आये,
फिर कब आओगे?
ये पल बीत गया तो जानम,
कहाँ जाओगे?
तन्हाई का दर्द कभी तुम,
सह ना पाओगे..

ये शाम फिर नहीं आयेगी..
ये शाम फिर नहीं आयेगी..

दिलरुबा.. ओ मेरे दिलरुबा..
क्या किया, ये तुमने क्या किया..
दिल मेरा, क्यों कहाँ खो गया..
पल में क्यों, तेरा ही हो गया..
जाने क्या नशा है तेरी आँखों में..
जादू सा भरा है तेरी बातों में..
सांसे तेरी महकी मेरी सांसो में..
तेरी ही झलक मेरी आँखों में..
तेरे सिवा है क्या?
दुनिया में मेरी जान..
तू है मेरी जिन्दगी.. पास आ...

ये शाम फिर नहीं आयेगी..
ये शाम फिर नहीं आयेगी..

आज हम ए सनम आज हम..
भूल कर दुनिया के रंजो गम..
ये कसम.. कसम है प्यार की..
साथ हो.. साथ हो हर कदम..
यूँ ही तेरी आँखों में मेरी आंखे हों..
छोटी-छोटी प्यार भरी बातें हो..
भींगी-भींगी रंग भरी शाम हों..
जागी-जागी यादें तेरी रातें हो..
तेरे सिवा है क्या?
दुनिया में मेरी जान..
तू है मेरी जिन्दगी.. पास आ...

ये शाम फिर नहीं आयेगी..
ये शाम फिर नहीं आयेगी..

कुछ ना कहा तो,
कुछ ना सुना तो,
यूँ ही ढल जायेगी..

ये शाम फिर नहीं आयेगी..
ये शाम फिर नहीं आयेगी..

Saturday, October 18, 2008

एक खास मित्र का परिचय

ज्ञान जी के चिट्ठे पर कुछ दिन पहले पढा था कि अगर किसी चिट्ठाकार को विश्वनाथ जी जैसे 3-4 पाठक मिल जायें तो उनका चिट्ठाकारी जीवन सफल हो जाये.. कुछ उसी तर्ज पर मैं कहना चाहता हूं कि अगर मनोज जैसा एक मित्र भी गलती से किसी को जीवन में मिल जाये तो उसका जीवन सफल हो जायेगा.. कुछ दिन पहले मैंने अपने मित्र मनोज कि लिखी हुई एक कविता ठेली थी, जिसके बाद ज्ञान जी ने टिपियाया था कि "सुन्दर। मनोज के परिचय में कुछ पंक्तियों की अपेक्षा थी।" मैंने उस पोस्ट में उसके बारे में कुछ भी नहीं लिखा था क्योंकि वह पोस्ट बस उस कविता के लिये समर्पित कर रखा था.. अगर वहां मैं मनोज के बारे में लिखता तो यह उस पोस्ट और मनोज के बारे में लिखी गई यह पोस्ट, दोनो के ही साथ नाइंसाफी होती..

ग्रैजुएशन मे नया नया एडमिशन लिया था.. कक्षा बहुत कम जाता था.. उस समय का उपयोग आवारागर्दी कि लम्बी कहानियां लिखने में करता था या फिर बस कुछ फालतू के कार्यों के लिये.. कक्षा ना जाने के पीछे सबसे बड़ा कारण यह था कि जो कुछ भी सिलेबस में था उसमें मुझे लगता था कि मेरे लिये कुछ भी नया नहीं है.. मित्रों कि संख्या भी बहुत सीमित थी.. अगर कभी गलती से सुबह वाले क्लास से कुछ समय पहले पहूंच गया तो मनोज को पहले से वहां पाता.. कुछ औपचारिकता होती और बस इतना ही.. धीरे-धीरे औपचारिकता मित्रता में बदलने लगी.. एक ही कक्षा में थे सो आपस में पढाई को लेकर होड़ भी लगती, मगर हमेशा मित्रवत प्रतिस्पर्धा ही रही..

हमारी मित्रता कैसे प्रगाढ मित्रता में बदली यह पता नहीं.. क्योंकि ऐसा किसी एक दिन में नहीं होता है.. इसके ऐसा होने के लिये एक-एक पल के हजार लम्हों के संयोग की जरूरत होती है.. सुख-दुख में बराबर की भागीदारी होने की जरूरत होती है.. अब अपने जिंदगी रूपक डायरी के पुराने पन्नों को पलटता हूं तो लगता है कि हमेशा उसने मेरा साथ मुझसे ज्यादा दिया.. इस मामले में मैं कहीं दूर तक नजर भी नहीं आता हूं.. शायद यही एक ऐसा कारण है जिसके कारण मैं इससे इतना ज्यादा जुड़ा हुआ हूं..

मेरा ऐसा मानना है कि अगर आपके जीवन में कोई ऐसा व्यक्ति आता है जो बिना किसी स्वार्थ के और बिना किसी वजह के आप पर सब कुछ लुटाने को तैयार रहता है और आप उस व्यक्ति को सही समय पर नहीं पहचान पाते हैं और उसे खो देते हैं, तो यहां खोने के लिये उस व्यक्ति के लिये कुछ भी नहीं होता है.. अगर कुछ खोते हैं तो आप ही.. और सबसे बड़ी बात तो यह है कि ऐसा व्यक्ति आपके जीवन में एक ही बार आता है.. हो सकता है कि उससे अच्छे लोग आपको मिल जायें जो कि अपने आप में एक मिशाल हो.. बहुत अच्छे मित्र भी आपको मिल जायें.. मगर बिना किसी स्वार्थ के आपके लिये कुछ भी और किसी भी हद तक करने को तैयार रहने वाला मित्र आपको एक ही बार मिलता है..

मेरे लिये अच्छी बात तो यह है कि मैंने अपने जीवन में ऐसे व्यक्ति कि पहचान सही समय पर कर ली.. अपने कुछ मित्रों कि तरह देरी नहीं कि..

यह पोस्ट मैं यहीं खत्म करता हूं.. इसके बारे में मैं समय-समय पर लिखता रहूंगा.. क्योंकि एक पोस्ट पूरा नहीं है इसके लिये.. सही कहूं तो मैं इसके बारे में जितने पोस्ट चाहूं उतने लिख सकता हूं.. हजारों उन लम्हों के बारे में जो हमने साथ बिताये.. खुशी के मौके.. गम का शमां.. गंगा किनारे बिताये गये क्षण.. आवारागर्दी करते हुये पटना की सड़कों कि खाक छानने का समय.. नाला रोड, मछुवा टोला, राजाबाजार, राजेन्द्रनगर, कंकड़बाग, बोरिंग रोड, शास्त्रीनगर और भी ना जाने कहां कहां.. क्लास में कि गई शैतानियां.. दिल्ली में गुजारे गये गये खुशगवार पल.. तो वहीं बिताये गये मायूस पल भी.. सिर्फ शीर्षक ही लिखूं तो 2-3 पोस्ट बन जायेंगे..

चलिये यह फिर कभी..