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Thursday, April 16, 2015

डिस्क ब्रेक

वो जमाना था जब डिस्क ब्रेक नाम की चीज नई हुआ करती थी. उसी ज़माने में हमारे एक मित्र ने सेकेण्ड हैण्ड CBZ खरीदी दिल्ली जाकर. पटना में शायद सेकेण्ड हैण्ड उपलब्ध नहीं थी और अगर थी भी तो बेहद महँगी. याद है हमें की उस दिन खूब बारिश हो रही थी फिर भी हम घर से कोई बहाना बना कर निकल लिए थे उसकी बाईक देखने. बाईक देखने का अड्डा, या यूँ कहें की हम दोस्तों का अड्डा, नाला रोड में एक दोस्त का घर था..और बारिश की वजह से नाला रोड उस समय नदी रोड बना हुआ था..घुटने से बस कुछ ही कम पानी. अब उस समय तक स्कूटर चलाने में उस्ताद हो चुके थे सो उस पानी में भी हेला दिए हम स्कूटर को..पता था की सायलेंसर से ऊपर तक पानी हो तो कितना एक्स्लेरेटर देना पड़ता है.. 

दोस्त का घर भी नाला रोड में ऐसी जगह पर की वहीं का वहीं पटना का पूरा नजारा एक ही बार में दिखा दे.. कदमकुवां के तरफ से नाला रोड में घुसते ही एक तरफ ठेले वाले उस दो लेन वाली सड़क में घुसे हुए मिलते, वहीं दसेक रिक्शा वाले भी घुसाए रहते..साथ में हम जैसे नए खून और लहरियाकाट एक्सपर्ट अपना हुनर दिखाते हुए अपनी गाडी घुसाए रहते. वहीं बगल से अधेड़ उम्र के कोई अंकल जी अपने चेतक को धीरे-धीरे निकालते हुए ऐसे चलते रहते जैसे की अगर थोड़ा सा भी और तेज चलेंगे तो एक्सीडेंट हो जाएगा, और उनके पीछे ट्रैफिक का पूरा हुजूम..साथ में बड़ी छोटी सभी कारें अपना ख्याल खुद रखते हुए बच-बचा कर निकलने की जुगत में.. खैर उस दिन ये सब नहीं था. बारिश से पटना बेहाल था.

अब हम अपने अड्डे पर बैठ कर इन्तजार कर रहे थे की वो दोस्त अपनी गाडी लेकर आये तो हम भी थोड़ा हाथ आजमा कर देखें..उस ज़माने में हमारा एकमात्र बॉडी बिल्डर दोस्त अपनी गाडी पर बैठ शान से आया..आते ही ये दिखाया की इसका सायलेंसर कितना ऊपर है की पानी घुसिए नहीं सकता है.. हम भी एक-एक पार्ट पुर्जा देखकर पुलकित हो रहे थे..उसकी गाडी चलाने की हिम्मत नहीं हो रही थी मगर..एक तो बारिश, दूसरा नाला रोड का नदी रोड हुआ जाना, तीसरा की उतनी भारी गाड़ी कभी चलाये नहीं थे तब तक. उसने अपनी गाडी दिखाते हुए बताया की ये डिस्क ब्रेक है..कितनी भी तेजी से गाड़ी चल रही हो लेकिन अगर यह दबाया जाए तो बिना फिसले जहाँ का तहाँ रुक जाए, ऐसी खूबी है इसमें. हम भी आँखें फाड़ कर ये सब सुनते रहे आश्चर्य से.. फिर मन हुआ की बारिश रुकी हुई है और कालेज के कुछ काम से हड़ताली मोड़ जाना था हम टीम लोगों को, सो हम चल निकलें..

रास्ते में गीले सड़क पर ही हमारा वो दोस्त दो-तीन बार डिस्क ब्रेक का करिश्मा दिखाता रहा की देखो बिलकुल नहीं फिसलता है और पीछे से हम स्कूटर पर बैठे सोचते रहे की कभी हम भी डिस्क ब्रेक वाली बाईक खरीदेंगे. थोड़ी दूर जाने पर पहले जहाँ 'उमा सिनेमा' हुआ करती थी उससे थोड़ा सा आगे और एग्जीविशन रोड से थोड़ा सा पहले उसे ट्रैफिक की वजह से ब्रेक लगाना पड़ा..ब्रेक लगते ही बाईक फिसली और सीधे सड़क पर धड़ाम.. हम पीछे से सकपका कर देखे की 'ले लोट्टा, ई का हो गया'? गाडी कैसे फिसल गई? अपना स्कूटर साईड में लगाये, दोस्तों को उठाने से पहले उस गाडी को उठाये, आखिर नई गाडी जो थी भले ही सेकेण्ड हैण्ड.. जब तक सड़क के किनारे लाते, वहां एक ठेले पर बैठे ठेले के मालिक ने बीड़ी सुलगाते हुए कहा, "भोरे से आप अठवाँ आदमी हैं हियाँ गिरने वाले, भोर में हईजे एक ठो मोपेड गिरा था और उसका पूरा तेल रोडवे पर हेरा गया था.." अब हम लगभग पेट पकड़ कर हँसते हुए बोले, "और आप का कर रहे हैं? भोरे से बीड़ी फूंकते खाली गिन रहे हैं का? की एक..दू..तीन..चार......"

Tuesday, October 15, 2013

बाथे नरसंहार के ठीक बाद

जिस रात यह घटना घटी उससे एक दिन बाद ही मुझे PMCH के इमरजेंसी वार्ड में एक डाक्टर से मिलना तय हुआ था. सोलह-सत्रह साल की उम्र थी मेरी. सुबह जब PMCH के लिए निकला था तब तक मुझे इस घटना की जानकारी नहीं हुई थी. अस्पताल पहुँच कर मुझे पता था की इमरजेंसी वार्ड में किस डाक्टर से और कहाँ मिलना है. मगर वहां पहुँच कर एक डर सा मन में बैठ गया. हर तरफ सैकड़ों की संख्या में पुलिस थी. पुलिस से मुझे कभी वैसा भय नहीं रहा है जैसा भय आम जनों के बीच घुला मिला है. कारण शायद यह हो सकता है की घर में पापा की नौकरी की वजह से पुलिस का आना-जाना और उनकी सुरक्षा व्यवस्था में लगी पुलिस का होना. मगर वहां इतनी अधिक पुलिस देख कर मन में भय समां गया. फिर भी हिम्मत करके इमरजेंसी वार्ड के दरवाजे पर गया तो पाया की वहां दरवाजे पर भी भारी सुरक्षा व्यवस्था थी. और किसी को भी अंदर नहीं जाने दे रही थी. मैं किसी तरह उन डाक्टर का नाम लेकर और कुछ और बहाने बना कर अंदर जा घुसा. मेरे साथ आये पापा के स्टाफ को पुलिस ने अंदर नहीं जाने दिया. शायद मैं लगभग बच्चा ही था इसलिए मुझे जाने दिया हो. अंदर पहुँचते ही सबसे पहले हॉल आता है, वहीं कम से कम तीस-चालीस लाशें रखी हुई थी. मुझमें आगे बढ़ने की हिम्मत नहीं थी फिर भी यह सोच कर की जब यहाँ आया ही हूँ तो उस डाक्टर से मिल ही लूँ, और उनके कमरे की तरफ आगे बढ़ गया. उनके कमरे की तरफ जाते हुए कई लोग बिस्तर पर बेसुध हुए दिखे जो जिन्दा तो थे, मगर गोलियों से छलनी, और इलाज के लिए अपनी बारी का इन्तजार कर रहे थे. शायद इतने लोगों का एक साथ इलाज संभव नहीं रहा हो उस वक़्त. आगे बढ़ने की हिम्मत भी टूट चुकी थी. किसी तरह बाहर वापस आया और घर चला गया. मगर कई सालों तक वह भयावह दृश्य आँखों के सामने घूमता रहा.

अभी जिस दिन सभी अपराधियों को हाईकोर्ट द्वारा बरी करने की खबर आई थी तो यह सब आँखों के सामने घूम गया. साथ ही यह भी भरोसा हो चला की उन्हें किसी ने गोली नहीं मारी. वे तो आसमान से बरसती गोलियों के शिकार हुए थे. उनका हत्यारा कोई नहीं.


Friday, May 17, 2013

बयार परिवर्तन की

बिहार की राजनीति में रैलियों का हमेशा से महत्व रहा है और अधिकांश रैलियों में सत्ता+पैसा का घिनौना नाच एवं गरीबी का मजाक भी होता रहा. इस बार आया "परिवर्तन रैली".

आईये जानते हैं कि परिवर्तन किसे कहते हैं?
१. लालू-नितीश ने साथ-साथ ही राजनीति कि शुरुवात की थी. जब जे.पी. इसी गांधी मैदान जन को संबोधित करते हुए में इंदिरा गांधी को तानाशाह कहते थे तब ये दोनों साथ-साथ तालियाँ भी बजाते थे. और अभी पिछले कई सालों से सत्ता के पीछे भागते हुए एक दूसरे के विरोध में राजनीति कर रहे हैं. यह है परिवर्तन!

२. इंदिरा कि तानाशाही के खिलाफ जिन्होंने अपनी राजनीति शुरू की, वही तानाशाही इन्होंने सत्ता में आने के बाद अपनाई. इसी तानाशाही ने इंदिरा को डुबाया. फिर लालू को. अब समय नितीश के इन्तजार में है. यह है परिवर्तन!

३. कर्पूरी ठाकुर के समय में भाई-भतिजाबाद के खिलाफ राजनीति करने वाले लालू आज ख़म ठोक कर अपने बेटे को राजनीति में पेश करते हैं और नितीश से भी गरजकर पूछते हैं कि "तुम्हारा बेटा क्या कर रहा है आजकल?" यह है परिवर्तन!

४. जिस कांग्रेस के खिलाफ इन दोनों ने अपनी राजनीति शुरू की थी, काफी समय तक उसी कांग्रेस के साथ सत्ता का सुख लालू भोग चुके हैं और अब नितीश इन्तजार में हैं, कि भाजपा से अगर मोदी की वजहों से अलग होना पड़े तो कांग्रेस की नाव पर सवार हो सकें. यह है परिवर्तन!

५. ये वही लालू हैं जो बिहार में अभी गुंडा राज बता रहे हैं और सहाबुद्दीन कि बड़ी सी तस्वीर अपने हर होर्डिंग पर लगा रखे हैं. ना तो लालू अपने समय के गुंडाराज में झाँकने को तैयार हैं और ना नितीश आँख खोल कर देखने को तैयार हैं अभी के लौ-एंड-आर्डर की परिस्थियों को. यह है परिवर्तन!

ऐसे जाने कितने प्रश्न हैं जो समय इनसे पूछेगा, और ये दोनों बेशर्मी से खींसें निपोरेंगे. ये बिहार का दुर्भाग्य है जो उसकी जनता के पास इनसे बेहतर कोई विकल्प नहीं है.

आखिर कहा भी गया है, एकमात्र परिवर्तन ही अपरिवर्तनीय है!!

मैं तो कहता हूँ लखनऊ की तर्ज पर पटना में भी एक परिवर्तन चौक बना ही दिया जाए, ठीक हड़ताली चौक के आस-पास, सचिवालय के निकट. जहाँ से ऐसे झूठे परिवर्तन की बयार बहाने में इन्हें मदद मिल सके. एक हड़ताली चौक तो है ही पहले से. जनता वहां सही-गलत मुद्दे पर हड़ताल करेगी, और ये लोग वहां से परिवर्तन की बयार बहा सकेंगे.


यह तस्वीर राकेश कुमार सिंह जी के फेसबुक प्रोफाईल से ली गई है. उन्होंने यह तस्वीर इस रैली के समय पटना में रहते हुए ली थी. वहां इस तस्वीर के साथ वह कहते हैं -
"ई बाला होरडिंग देख के बहुत खटका मन में. जो अदमी सज़ायाफता मुजरिम है. लूट और मडर जैसन अभियोग में जेल में बंद है, उ समूचा पटना में टंगाए मिले. देखिए चच्‍चा तनि ई होरडिंगबा को. हाथ में लालटेन लिए, बुरखा वाली औरत! माने मुसलमान भोटर के रिझावे खातिर एतना खेल! पूछे नेता लोग से त कुछ छोटका सब त अलबला आ तिलमिला गए. बाकी, एक ठो जिम्‍मेदार नेताजी आफ द रिकाड कहे कि गलती हो गया. आगे से धेयान रखा जाएगा. "

Sunday, November 06, 2011

कहाँ जाईयेगा सsर? - भाग ३

दिनांक २३-११-२०११

सबसे पहले - मैंने गिने-चुने लोगों को ही बताया था कि मैं घर, पटना जा रहा हूँ.. घर वालों के लिए पूरी तरह सरप्राईज विजिट.. अब आगे -

मेरे ठीक बगल में एक लड़का, जिसकी दाढ़ी के बाल भी अभी ठीक से नहीं निकले थे, बैठा हुआ था.. वो काफी देर से मेरे DELL Streak को बालसुलभता से देख रहा था.. मगर बात नहीं कर रहा था.. अजनबियों से बात ना करने की सीख सबसे अधिक फ्लाईट में ही निभाई जाती है, जिसकी वजह से ही मुझे फ्लाईट की यात्रा सबसे उबाऊ यात्रा लगती है.. खैर, मैं ही बात शुरू की, और बात शुरू होने पर सबसे पहले उसने मेरे मोबाईल के बारे में ही पूछा.. बात आगे बढ़ने पर पता चला की वह दिल्ली के किसी स्कूल में बारहवीं का छात्र है और दिवाली कि छुट्टियाँ मनाने बिहारसरीफ जा रहा है.. मैंने आश्चर्य से पूछा की इतनी रात गए तुम पटना से बिहारसरीफ कैसे जाओगे तो उसने बताया की मम्मी आई हुई है उसे लेने के लिए.. उस वक्त मैं सोच रहा था कि 16-17 साल का यह लड़का दिल्ली से पटना कि यात्रा फ्लाईट से पूरी कर रहा है, और वह भी दिवाली के वक्त जब दिल्ली से पटना की फ्लाईट दस हजार से ऊपर चल रही है.. अधिक वक्त नहीं बीता है, बामुश्किल दस-पन्द्रह साल.. मगर हमारे समय में मैंने अपने किसी भी मित्र को थर्ड एसी में भी यात्रा करते नहीं देखा था उस उम्र तक..

किन्ही वजहों से फ्लाईट कुछ देर हो चुकी थी और शायद रनवे खाली ना होने के कारण से लगभग आधे घंटे और तक रात के समय पटना देखने का मौका मिलता रहा.. कुछ देर में ही पटना में फ्लाईट लैंड कर चुकी थी.. मैं अपना सामान लेकर बाहर निकल रहा था तभी अभिषेक का फोन आया, मैं उससे बाते करते हुए बाहर आया और सारे टैक्सी-ऑटो वाले मेरे कानों के पास आकर चिल्लाने लगे "कहाँ चलिएगा सsर?" पहली बार उन्हें इशारों से बताया की रुको, अभी फोन पर बात कर रहा हूँ.. वे चुप नहीं हुए तब दुबारा बताया.. फिर भी वे चुप नहीं हुए तो खीज कर अभिषेक को होल्ड पर रख कर लगभग उन पर चिल्लाने ही जा रहा था कि अंतरआत्मा से आवाज आई "शांत गदाधारी भीम, शांत" और उनसे पूछा, "पहले फोन पर बात तो खत्म करने दो दोस्त".. वे भी एक अच्छे दोस्त की तरह बात एक बार में ही मान गए.. :)

अभिषेक से बात करके मूड फ्रेश हो चुका था.. अब उन ऑटो-टैक्सी वालों से बात करने की बारी थी..
- कहाँ जाईयेगा सsर? चलिए ना टैक्सी में ले जायेंगे..
- नहीं-नहीं.. टैक्सी नहीं, ऑटो नहीं है क्या?

यह सुनते ही दो बंदे बीच में कूद पड़े और पहला वाला निराश हो कर दूसरे ग्राहक की तलाश में निकल लिया..
- हाँ हाँ, चलिए ना..
- तुम क्या ले जाओगे, सsर हमरे साथ चलेंगे.. कहाँ जाईयेगा?
- लाल बाबू मार्केट, शास्त्रीनगर..
- चलिए ना..
"चलिए ना"
बोलकर मेरा सामान पकड़ने लगा.. मैंने रोककर पूछा "कितना लोगे?" और साथ ही इस शहर से अनजान बनने का नाटक करते हुए अगला सवाल भी रख दिया "कितनी दूर है? जादे है का?"
- साढ़े तीन सौ..
उसका कहना था और मेरी हंसी छूट गई..
- साढ़े तीन किलोमीटर का साढ़े तीन सौ..
- सsर, जब जानते हैं त काहे पूछते हैं?

झेंपते हुए वो बोला.. खैर, खूब मोल-मोलाई(मोल-भाव) हुआ और पचास रूपया में वह तैयार हो गया.. :)

Saturday, November 05, 2011

यह लठंतपना शायद कुछ शहरों की ही बपौती है - भाग २

जब कभी भी इन रास्तों से सफ़र करने का मौका मिला हर दफ़े एक अजब सा लठंतपने को देखने का मौका भी मिला, मगर उसी लठंतपना का ही असर बाकी है जो मुझे पटना की ओर खींचता है.. चेन्नई से देल्ली तक का सफ़र वही आराम से और सुकून भरा था, मगर देल्ली से!! सुभानल्लाह.. दिल्ली उतर कर मुझे दूसरी फ्लाईट पकडनी थी.. दिल्ली में फ्लाईट डोमेस्टिक एयरपोर्ट पर लैंड किया, और मुझे वहाँ से टर्मिनल 3 पर जाना था.. समय पास में लगभग तीन घंटे का था.. एयरपोर्ट बस सर्विस का लाभ उठाया और पहुँच गया वहाँ.. टिकट लेने से लेकर चेक-इन तक हर काम समय पर और ठीक तरीके से मुकम्मल हुआ.. अब समय था उस लठंतपने का सामना करने का.. जिस दरवाजे से फ्लाईट पकड़ने था वहाँ कतार का कोई अत पता नहीं था.. फिर मैंने ध्यान दिया तो पाया की कुछ शहरों के लिए जाने वाली उड़ान के लिए कतारों का कोई मतलब ही नहीं था, मानों हम सब इन बातों से ऊपर उठ चुके हों.. :) उन शहरों का नाम नहीं लूँगा, मगर यह जरूर बताना चाहूँगा की उनमें हर एक नाम उत्तर भारत का ही है..

एक मजेदार घटना, जो ठीक अभी अभी घटी.. "एक जानकारी - हवाई जहाज के उड़ान भरते समय सभी सीटों को सीधा कर लेने के लिए कहते हैं.." अब घटना - मेरे ठीक पीछे वाले महाशय को एयर होस्टेज दो दफ़े समझा कर गई की अपनी सीट सीधी कर लें.. तीसरी बार का मौका उन्होंने नहीं दिया और खुद ही सीट सीधा कर लिया.. अब जब हमारा जहाज उड़ान भर चुका था तब मैंने अपनी सीट को हल्का पीछे की ओर झुका लिया.. ओ भाईसाब!! मत पूछिए, किसी स्कूली बच्चे की तरह उनका व्यवहार हुआ.. तुरंत टीचर को, मेरा मतलब एयर होस्टेज को बुलाकर शिकायत की गई.. तब उसने उन्हें कहा की आप भी अपनी सीट अब झुका सकते हैं.. भाईसाहब ने कुछ कहा तो नहीं, मगर उनका चेहरा देखने लायक ही होगा, चूँकि वो मेरे ठीक पीछे बैठे थे सो मैंने पीछे मुड कर उनका चेहरा देखना मुनासिब नहीं समझा..

शीघ्र ही पटना की सीमा रेखा को भी हवाई जहाज छूने लगा.. पटना की सडकों की रोशनी को देखते ही लगभग चीख पड़े वह "पटना में ढुक गए".. उनके बगल में बैठे उनके साथ के लोग उन्हें शांत कराये की भाई, इतना एक्जाईटेड(एक्साईटेड) क्यों हो रहे हैं!! शुक्र मना रहा हूँ की वे इसे नहीं पढ़ रहे हो.. वो मेरे ठीक पीछे बैठे हैं.. :)

खैर उतरते समय मैंने उनका शक्ल देखा तो पाया की सत्तर के आस-पास की उम्र रही होगी उनकी..

Friday, November 04, 2011

एक सफ़र और जिंदगी में - भाग १

दिनांक २३-११-२०११



अभी चेन्नई से दिल्ली जाने वाली हवाई जहाज में बैठा ये सोच रहा हूँ की दस महीने होने को आये हैं घर गए हुए और आज जाकर वह मौका मिला है जब बिना किसी को बताए जा रहा हूँ.. मगर जाने क्यों मन बेहद उदास सा हुआ जा रहा है.. इस उदासी की वज़ह भी पता नहीं.. हाँ यह तो यक़ीनन कह सकता हूँ की अवसाद कि कोई रेखा मन में कहीं नहीं है, मगर जितना उत्साह जरूरी है वह नहीं आ पा रहा है.. फिलहाल गाना सुनते हुए यह टाईप कर रहा हूँ जिसमें एक पंक्ति जो अभी चल रही है - "देखूं, चाहे जिसको, कुछ-कुछ तुझ सा दिखता क्यों है.. जानू, जानू ना मैं, तेरा मेरा रिश्ता क्यों है.. कैसे कहूँ, कितना बेचैन है दिल मेरा तेरे बिना.." शायद पिछले पांच-छः दिनों से ठीक से नींद पूरी नहीं कर पाया था इसलिए मन और शरीर दोनों ही थका हुआ सा है.. यही हो तो अधिक अच्छा हो.. खैर.. अभी तो सफ़र की शुरुवात हुई है, उम्मीद है यह जिंदगी के सफ़र सा मायूस सफ़र ना साबित हो.. आमीन!!!!!

Tuesday, January 18, 2011

कुछ और किस्से केशू के

हो सकता है कि आज के जमाने में किसी को यह अतिश्योक्ति लगे, मगर हमारे घर में अभी तक यह लगभग किसी नियम के तहत चलता आ रहा है कि रात में सोने से पहले माता-पिता का चरणस्पर्श करके ही हम सोने जाते हैं.. इसका सबसे बड़ा फायदा बचपन से ही मुझे यह दिखा है कि अगर किसी तरह कि अगर किसी तरह कि नाराजगी रही हो माता-पिता की तरफ से अथवा हम बच्चों कि तरफ से तो वह कभी भी अगले दिन तक नहीं खींचता था.. रात में जब आशीर्वाद लेने के लिए हम जाते थे तब वहीं उसका निपटारा हो जाया करता था.. अभी भी हम हर रात को आशीर्वाद लेने जाते हैं, मगर बच्चा 'फर्स्ट' होने के लिए सबसे पहले भागता था, सबसे पहले 'पाम'(प्रणाम) उसे ही जो करना होता था दादा-दादी को..

पापा-मम्मी के कमरे में आज भी मच्छरदानी का प्रयोग होता है.. बाकी हम लोग उसका प्रयोग करना बंद कर चुके हैं.. पापा का कहना है कि 'जो मच्छरदानी नहीं लगाता है वो हमको गंवार लगता है' और हमारा कहना है कि 'जो मच्छरदानी लगाता है वो हमें' :).. खैर जो भी हो, मगर चूंकि हमलोग उसका प्रयोग नहीं करते हैं सो बच्चे को भी उसके भीतर अजीब सा बंधन लगता है, और यह एक बहुत बड़ा कारण है कि वह रात में अपने दादा-दादी के पास कभी नहीं सोया है.. अभी एक दिन मैं मच्छरदानी में घुस कर, बच्चे को चिढा-चिढा कर पापा-मम्मी पर 'लार छिड़िया' रहा था, और बच्चा इतना अधिक स्वत्वबोधक(Possessive) कि मच्छरदानी में सब बंधा-बंधा होने के बावजूद अंदर घुस कर मुझसे कुस्ता-कुस्ती करने लगा और अंततः जब तक मैं बाहर नहीं निकल गया तब तक वह वहाँ से हटा नहीं..

बच्चे को हर दिन सुबह होने पर 'दारू' चाहिए होता था.. नहीं, यह पी कर तल्ली होने वाला दारू नहीं है, यह तो घर साफ़ करने वाला 'झाड़ू' है.. सुबह उठने पर जैसे ही उसका 'भक्क' टूटता था वैसे ही वह 'दारू-दारू' की रट लगा देता था, और जब तक 'दारू' उसके हाथ ना लगे तब तक उस बालकनी का दरवाजा पिटता रहता जिस बालकनी में 'दारू' रखा होता है.. दिन में और किसी भी समय वह 'दारू' की तलाश नहीं करता था, सिर्फ सुबह ही!! बच्चे को पता था कि सुबह के समय घर कि सफाई होती है.. हमारे यहाँ काम करने वाली को वह 'उवा' (बुवा) और उसकी बहन को 'उप्पा'(रूपा) बुलाता था.. नए जगह पर एक नयी काम वाली को देख कर बहुत देर तक परेशान रहा और फिर अपनी मम्मा से 'मम्मा उवा-उप्पा' का पता पूछता रहा..

कपड़े पहनने में उसके नखरे बड़े.. लेकिन जैसे ही किसी से सुन लिया 'तंदा-तंदा'(ठंढा), वैसे ही अपनी लाल वाली बन्दर टोपी लेकर पहुँच जाता.. अगर किसी ने 'तंदा-तंदा' नहीं बोला तो फिर कोई भी टोपी पहनाओ, तुरंत उतार फेंकता था.. उसे सबसे अधिक भय अपने छोटे पापा से ही था और अभी भी है, कि वो उसका पैंट (जो कि लगभग मेरे मोजा के बराबर आता है), उसका शर्ट, उसका 'छोक्छ'(शोक्स), उसका जैकेट, सब पहन लेंगे.. कम से कम इसी डर से चुपचाप बिना शोरगुल किये और बिना किसी को मेहनत कराये पहन लेता था.. पता नहीं भाभी अब भी उसे मेरा ही डर दिखा कर यह सब पहनाती होंगी या अब कुछ नयी बात हो चुकी होगी!!!!

कल रात भैया-भाभी और बच्चे के साथ मैंने Video Chatting की और सुबह पापा-मम्मी को चिढाया इस बाबत.. :) कम से कम इसी बहाने उनमें यह तकनीक सीखने की ललक तो पैदा हुई..

केशू अपने नए वाले घर में अपने बलखाती जुल्फों के साथ :)


काफी दिन हो गए पटना आये हुए, अब जाने का दिन भी नजदीक आ रहा है.. हर दिन पापा को चिढाता हूँ "अब बस चौदह दिन बचे हैं", "अब बस बारह दिन बचे हैं".. पापा कल तक बोलते थे कि "काहे याद दिलाता है, तुमको जब जाना है जाओ ना?" मगर जब आज वही बात मैंने उन्हें याद दिलाई तो बोले कि "अच्छा हुआ जो पहले से याद दिला रहा था, चोट कम लगेगी तुम्हारे जाने की.." :(

Friday, January 07, 2011

बच्चा!!!

दीदी की बड़की बिटिया का जन्म हमारे यहाँ ही हुआ था, और बचपन में दीदी कि छुटकी बिटिया के मुकाबले मैं बड़की के ही अधिक संपर्क में रहा। उसके पैदा होने पर उसे हाथ में लेकर देखा था, मेरी हथेली में उसका पूरा धड़ और उसका सर मेरी अँगुलियों के सहारे से आराम से टिक जाता था। लगभग यही हाल भैया के बेटे का भी था। वो भी मेरी हथेलियों से बाहर नहीं निकल पाता था। दीदी कि बड़की बिटिया जब दो-ढाई साल कि हुई तब तक शैतानी उसकी शुरू हो चुकी थी, उसे शैतानी कम और नटखटपना अधिक कहा जाए तो ही ठीक रहेगा। इसी बीच पता नहीं कब मैं उसे अपना बेसबैट दिखा कर उसे बोल दिया कि बदमाशी करोगी तो इसी मोटा वाला डंडा से पिटाई लगेगी। मैं तो भला बोल दिया और वापस चेन्नई लौट आया, मगर घर में अब सभी उसे उसकी बदमाशी पर डराना शुरू कर दिए, "पछान्त! मोटा वाला डंडा लाना!!" मामा मुफ्त में बदनाम हुए। यूँ तो भैया का बेटा बहुत ही सीधा और बहुत ही अधिक नटखट है लेकिन इस बार मैंने देखा कि अगर उसकी कोई जिद्द पूरी ना हुई तो बस! सीधा जमीन पर 'ओंघराना' चालू। अब ठंढ के इस मौसम में उसे जमीन पर 'ओंघराने' से बेहतर उसकी जिद्द मान लेना लोगों ने भला समझा और यह देख कर वह उसे रामवाण!! फिर से मेरा वही नुस्खा काम आया, एक डंडा पास में रखना, जैसे ही ओंघराए वैसे ही वो डंडा दिखाना, फिर उसका मुंह बिसुराना, और जमीन से उठाकर मोटे से कालीन पर जाकर लेट जाना जिस पर ठंढ का कोई असर ना हो!! जिस दिन वह गया उसके अगले दिन सबसे पहले मैं वह डंडा अपनी नजर से दूर किया, बहुत याद दिलाता था उसकी!!

३ जनवरी की सुबह देर से उठा। अक्सर हर रोज अधिकतम साढ़े आठ से नौ के बीच उठ जाता था, बच्चे के जागने का समय सवा आठ से साढ़े आठ के बीच का होता था, और जैसे ही भक्क टूटे, बस वो, उसका सायकिल और उसके पीछे खाने का कटोरी लेकर भागती उसकी मम्मी! इसी धमाचौकड़ी में हर दिन नींद खुलती थी, अगर इससे नींद ना खुले तो बच्चा कमरे में आकर 'पापा-पापा...मोsss' करके डराने आ जाता। उसकी समझ में उसके 'मोssss' करके डराने से दुनिया के किसी भी शख्स का डरना जरूरी है, कम से कम अभी तक उसका यह विश्वास किसी ने नहीं तोड़ा। अब कोई इतने प्यार से डराए तो भला नींद कैसे ना टूटे? अगर वो डराने नहीं आया तो उसकी मम्मी/मेरी भाभी आकर मेरा कंबल जबरदस्ती खींच ले जाती थी। ३ जनवरी को जब बिस्तर छोड़ा तब तक साढ़े दस बज चुके थे, पापा-मम्मी मिलकर बच्चे से जुडी लगभग हर चीज कहीं ऐसी जगह ठिकाने लगा चुके थे जहाँ वह सुरक्षित भी रहे और नज़रों से दूर भी।

इस बच्चे के लिए आजकल हर कोई 'पापी' है। कभी "पापा पापी ऐ?" सवाल पूछता है, तो कभी "मम्मा पापी ऐ?" का सवाल! उसके इस पापी के अंतर्गत वो हर कोई आता है जिस पर यह पूरा हक जमाता है। जैसे डैडी, दादा, दादी, बुवा, हर कोई। जो कोई भी उसका अपना हो...बच्चा 'पानी' को 'पापी' बोलता है, और बहुत मासूमियत से "पापा पापी ऐ?" का सवाल आकर पूछता था। उस समय तो मैं उसे बोलता था, "तू पापी, तेरा पूरा खानदान पापी", मगर आज बहुत दिनों बाद फोन पर उससे यही सुनकर बहुत खुशी हुई। "पापा पापी ऐ"....

उसका 'उम्मा' भी गजब का था। 'उम्मा' मतलब 'चुम्मा'। अगर कोई चाहता है कि बच्चा खुद उसे 'उम्मा' करे तो उसके लिए बेहद आसान तरीका यह है कि उसका होंठ छू कर अपने होंठ पर सटा ले, बस इतना ही काफी है। उसे लगता है कि उसका 'उम्मा' अब उसके पास नहीं है, कोई और लेकर भाग गया, अब क्या है, वो पूरे घर में दौड़ेगा पीछे-पीछे, अपना 'उम्मा' वापस लेने के लिए, और तब तक पीछा नहीं छोडेगा जब तक की वो अपने होंठ से होंठ सटा ना ले! ये उसका 'उम्मा' वापस लेने का तरीका है। ये बात सिर्फ 'उम्मा' तक ही नहीं था, 'सू-सू' करके पैंट पहनने में बहुत नखरे करता था, एक बार मैं उसका 'सू-सू' 'कुवा'(कौवा) को दे दिया तब से तुरत अपना पैंट पहन कर बताता था, 'नई ऐ'। मतलब अब आप नहीं ले सकते हो। उसका मुंह, नाक, कान, सबका यही किस्सा। हर चीज को 'कुवा' से बचाता फिरता था। इधर घर आने पर मैंने बहुत बड़े-बड़े मूंछ बढ़ा रखे थे, जिस दिन उसे काटे उस दिन बहुत देर तक ढूँढता रहा, जब मैंने उसे बताया कि मेरा मूंछ 'कुवा' ले गया, तब बहुत खुश...कि पापा का मूंछ भी कुवा ले जा सकता है, अकेला मैं ही नहीं हूँ।

हर किसी बच्चे कि तरह वो हर किसी पर सिर्फ और सिर्फ अपना ही हक समझता है। उसकी दादी, मेरी मम्मी, की गोद में जब कभी सर रखूं तो झट से आ जाता। पहले प्यार से समझाता "नई पापा, नई!" अगर मैं नहीं मानता तो मुझसे कुश्ती होती उसकी, कभी हाथ पाकर कर खींचता, कभी आकर नखरे मारता। अंत में ब्रह्मास्त्र तो था ही उसके पास, एक बार भोमियाना शुरू हुआ नहीं की अब क्या मजाल कि कोई भी वहाँ बैठा रह सकता है?

जिस दिन मैं पटना आया था उस दिन उसके मन में बैठ गया था कि छोटे पापा उसके लिए 'बौल' ला रहे हैं। मैं इधर नहाने गया, और उधर वो मेरे सारे सामान को पलटने लगा। जब कहीं बौल नहीं मिला तो भोमियाने लगा। नहाने के बाद जब मैं वापस आया और उसे लेकर जब तक बाजार से बौल खरीद ना दिया, तब तक बच्चे को तसल्ली नहीं। पता नहीं इतने दिनों बाद भी देखकर पहचान कैसे गया था, या शायद अहसास हो गया होगा कि कोई अपना ही है, पता नहीं कैसे!! आज सुबह घर की साफ़-सफाई के समय फिर घर के किसी कोने से एक बौल निकलकर बाहर आ गया!!!!

उसे मौसी बोलना भी नहीं आता था। उसकी मौसी हमेशा 'तार'(कार) से आती थी, और 'तार' 'पों-पों' करता है, सो उसने अपनी मौसी का नाम ही 'पों-पों' रख दिया। बच्चे के दादा एक-दो बार उसके इस मौसी को 'पों-पों' बोलने पर नापसंदगी जाहिर कर चुके थे, सो बच्चा समझता था कि दादाजी गुस्सा हो जायेंगे। अब जैसे ही उसने अपनी मौसी को 'पों-पों' बोला और देखा कि किसी ने उसकी इस बात पर ध्यान दिया है कि तुरत पलट जाता था 'तार पों-पों, ऊ नई'!! और मैं भैया-भाभी को उलाहना देता कि बच्चे ने दुनियादारी का पहला सबक सीख लिया, झूठ बोलना!!

आज मुझे सुनाया कि उसका नाम 'छाछ्वत'(शाश्वत) है और उसके डैडी का नाम 'छुछमित'(सुस्मित) है!!!

सबकी अपनी-अपनी माया!!!

लग रहा है जैसे घर भाँय भाँय कर रहा है। दिन भर घर में एक उत्पात जैसा मचाये रखने वाला लड़का!! भैया की शादी के समय वह लखनऊ में थे, और इधर शादी हुई और भैया का पोस्टिंग पटना हो गया। पापा-मम्मी भी खुश, भैया-भाभी भी खुश। देखते ही देखते साढ़े तीन साल भी निकल गए। एक बच्चा भी आ गया। पापा रिटायर भी इसी बीच हुए। मम्मी को दिन भर घर में अकेले रहने की आदत जो हो चुकी थी वह भी खत्म हो चुका था। अब कहीं भी जाओ, कोई ना कोई घर में रहता जरूर था। पापा-भैया दफ्तर गए तो मम्मी के लिए भाभी, और भाभी के लिए मम्मी। पापा रिटायर हुए तब तक बच्चे का आगमन घर में हो चुका था, सो दिन भर बच्चे के साथ लगे रहने में रिटायर होने कि तकलीफ से भी गुजरने का मौका नहीं मिला। दिन भी उड़ता ही चला गया। एक टिपिकल सास-बहु वाला तकरार पिछले तीन-साढ़े तीन साल में कभी नहीं हुआ। कुल मिलाकर एक आईडियल परिवार, जिसे देख कर जलने वाले भी खूब।
मूलधन से अधिक प्यारा सूद होता है – एक पुरानी कहावत।

मैंने बहुत सारी महिलाओं को झूठे आंसू बहाते देखा है। अधिकांशतः अपने रिश्तेदारों में ही। जो जैसे ही घर में घुसो नहीं कि बस्स!! लग गए टप-टप लोर चुवाने। घर से बाहर निकलो नहीं की फिर वही “आही रे बौवा!! जा रहल छी!!” और भोकार पार कर रोना चालू। और मुझे इससे सख्त नफरत है। थोड़ा मुंहफट भी हूँ, सो एक-दो बार टोक दिया ऐसा ही था तो उस समय वैसा क्यों बोल या कर रही थी, सो अब कम से कम मेरे सामने कोई झूठा लोर नहीं चुवाता है। पता नहीं यह जन्मजात गुण होता है या फिर सीखने वाली कला, कि जब चाहो तब आँख में आंसू भरकर रो लो!! लेकिन भाभी को मैंने देखा कार में चुपचाप अकेले में रोते हुए। बगल में सिर्फ मैं बैठा हुआ था, और वो झूठी कोशिश कर रही थी अपने आंसू छुपाने की। कोई दिखावटीपन नहीं, कोई आवाज भी नहीं, आवाज करने से कार के बंद सीसे में सभी सुन लेंगे शायद। मैंने भी कुछ टोका-टाकी नहीं किया। बस ये सोच रहा था कि कितनी बहु होती है जो अपने सास-ससुर के लिए रोती हैं? जवाब भी पता था कि जब बहु को बेटी जैसा प्यार मिले तो ऐसा हर घर में होगा।

सूद के अधिक प्यारे होने का कारण अब समझ में आ रहा है। अपने बच्चे के समय लोग दुनियादारी-कामकाज में उलझे रहते हैं। बच्चों से प्यार रहने के बावजूद उतना समय नहीं दे पाते हैं। ऊपर से कभी कभार बच्चों से सख्ती भी बरतनी पड़ती है, अनुशासन सीखाने के लिए। मगर पोते-पोती, नाती-नतिनी के समय लोग या तो रिटायर हो चुके होते हैं या फिर उसके करीब पहुंचे होते हैं। अब सारा समय उन्हीं बच्चों के साथ गुजरता है, लोग बाग शुरुवाती दिनों में उसी बच्चे में अपने बच्चे का बचपना ढूंढते हैं और बाद में बुरी तरह रम जाते हैं। अपने बच्चों से भी अधिक प्रेम भाव आ जाता है। ये मोह माया कि जकड़न बेहद बुरी होती है, ये जानते हुए भी लोग उसमें जकड़ते चले जाते हैं। बच्चा पैदा होता है तो माँ-बाप, बड़ा होने पर पति-पत्नी, कुछ दिनों बाद बच्चे, फिर नाती-नतिनी और पोते-पोतियां, और अगर उम्र फिर भी बाकी हो तो उनकी शादी के सपने भी संजोना। कोई तोड़ नहीं है इस माया जाल का।

ये तो बात रही बड़ों कि माया की! उस दो-ढाई साल के बच्चे की माया भी कम नहीं थी। सुबह उठते ही सबसे पहले उसे दादा चाहिए। उस समय अपने माँ-बाप की गोद भी नहीं सुहाती थी। उस समय बालकनी से दिखने वाले सभी कारों पर सिर्फ उसका और उसके दादा का ही आधिपत्य वह समझता था, उन कारों को देखने का अधिकार वह किसी और को कभी नहीं देता था। कुछ दिन पहले तक उसके लिए ‘तू’(टू) ही सबसे बड़ी संख्या थी, बाद में उसके शब्दकोष में कुछ और इजाफा हुआ, एक नया शब्द जुड़ा ‘बिग’!! पहले उसका अपना जो कुछ भी था वह ‘वन’ था, और वन बोलना उसे आता नहीं था। ऐसे में ‘तू नई’ या फिर अपनी छोटी सी तर्जनी दिखाना भर ही उसके लिए वह होता था। अब नए नए शब्द सीखने के बाद उसके पास जो कुछ भी है वह ‘बिग’ है। अपने दादा ‘बिग दादा’, अपनी दादी ‘बिग दादी’, अपनी नानी 'बिग नानी', अपने नाना 'बिग नाना', अपने छोटे पापा ‘बिग पापा’, अपना सायकिल ‘बिग सायकिल’!! बाकी दुनिया ‘टू’! माने 'स्माल'!! अब तक वो ‘तू’ से ‘टू’ तक का सफर भी तय कर चुका था। और हर ‘बिग’ पर उसका एकाधिकार था। उसके जाने वाले दिन ही एक नया शब्द उससे सुना ‘ईरी’ माने थ्री।

“आत नई ऐ”, “आत आ गया”। यह उसका नया खेल था। ठंढ के इस मौसम में जब कभी वो कंबल के भीतर घुसा होता था तब अपने हाथ हो कंबल के भीतर घुसा कर यह खेल खेलता रहता था। भोली सी मुस्कान, चेहरे पर शरारत, और तोतली बोली, ऊपर से यह खेल। भैया ही सिखाएं हैं उसे ये सब। मुझे याद है, बचपन मए ठंढ के मौसम में भैया और मैं तक़रीबन ऐसा ही खेल खेला करते थे, सोने से पहले कम से कम आधे घंटे के लिए तो जरूर। उस खेल का नाम था “भूत-भूत”, इस खेल के नियम का पहला नियम यह कि कोई नियम नहीं। अचानक दोनों में से कोई भी एक बोलता “भूत आ गया” और दोनों ही रजाई के भीतर सर छिपा लेते, फिर कोई भी एक बोलता “भूत चला गया” और दोनों ही रजाई से अपना चेहरा धीरे से बाहर निकाल लेते। ‘बौवा’ ने भी पहले अपने डैडी से यही खेल सिखा और उसके लिए उस खेल का नाम “भाकौंवा-भाकौंवा” था, बाद में उसने खुद ही “आत नई ऐ” नाम का खेल इजाद कर लिया।

हमारे घर के हर कमरे में दो सफ़ेद रौशनी देने वाला बल्ब लगा हुआ है और कहीं कहीं ट्यूबलाईट भी। मगर दो बल्ब तो जरूर से जरूर है। अब ऐसे में अगर किसी कमरे में सिर्फ एक बत्ती जल रही हो तो बच्चा आकर परेशान-परेशान कर देता "तू आईत!! तू आईत" की रट लगा देता, और जब तक उसका "तू आईत" नहीं जलता तब तक "तू आईत!! तू आईत!!" रटता रहता।

जब कभी मैं ‘लाई’ (भूजे हुए चूड़े, या मुरही जैसी चीजों को गुड के साथ मिलाकर बनाया गया लड्डू जैसा खाद्य पदार्थ) खाने के लिए जाता था तब बच्चा मेरे पीछे भाग कर आता था ‘आई’ मांगने। मैं पूछता कौन सा लाई, ‘ऐ वाला’ मुरही वाले के तरफ दिखा कर बोलता था। ‘वन’ चाहिए या ‘टू’ (सनद रहे वो हर बात पर टू बोलता है), वो अपनी तर्जनी उठा कर ‘वन’ दिखाता था, उसे ‘वन’ बोलना नहीं आता ना!! मैं उसे बोलता कि मुंह से बोलो तब दूँगा, फिर वह बोलता ‘टू नई’, मतलब वन!! “बिग चाहिए या स्माल?” अब जबकि उसे हर चीज ‘बिग’ चाहिए होती थी, मगर अभी वो बोलता ‘बिग नई’! क्योंकि ‘बिग’ वाला लाई वो खा नहीं पाता था।

हमारी माया तो वो था मगर उसकी माया उसके खिलौने ही तो थे। अधिकाँश खिलौने भैया के जाने वाले सामान के साथ बंधवा दिए थे। कुछ बाक़ी थे, जिसमें से कुछ या तो जाने के हालत में नहीं थे, या फिर सामान के यहाँ से जाने के बाद ख़रीदे गए थे, या फिर मैंने रुकवा लिए थे कि पन्द्रह दिन कैसे रहेगा यह यहाँ इनके बिना – वहाँ जाकर नया ले लेगा। इसमें उसकी सबसे प्यारा तीन पहिये वाली सायकिल, जिसे वह किसी को नहीं, अपने दादा अथवा डैडी को भी नहीं, छूने देता था और दिन भर उस सायकिल पर ‘पीं...पीं...’ की आवाज मुंह से निकालते हुए दौड़ता था। अगर बदमाशी कर रहा हो, या उसका ध्यान कहीं और भटकाना हो तो बस इतना ही कह दो कि कोई उस सायकिल पर बैठ रहा है या छू भी रहा है तो बस्स!!! सब कुछ छोड़ कर अपने सायकिल की सुरक्षा में लग गया। उस दिन मेरे भतीजे प्रेम कि वाह-वाही हो रही थी, मगर अब घर भर में मुझे कोसा जा रहा है। जब जब किसी को वह सायकिल नजर आती है, एक बार मुझे मन भर कोस लिया जाता है!! "यही लड़का के कारण सायकिल यहाँ है, इसे देख कर याद अधिक आती है!!"

फिलहाल तो उसकी सब माया धरी रह गई सी लगती है, और वो अहमदनगर पहुँच चुका है, कुछ नया सीखने, नयी दुनिया से परिचय लेने!!

पापा-मम्मी के लिए लिए तो फिलहाल वही बच्चा सबसे बड़ी माया था!!!!! आज शाम में एक कार नीचे में बैक कर रहा था, उससे निकलने वाली आवाज सुन कर बच्चा दौड कर खिडकी के पास जाकर अपने अंगूठे और तर्जनी को उसकी आवाज पर सिंक्रोनाइज करके “तार पों पों..पों पों” बोलता था, लगा जैसे कि बच्चा उधर ही कहीं खिडकी से झाँक रहा है!! जिस दिन वो गया उस दिन रात में पहली बार पापा को रोते देखा। २ जनवरी २०११!!!

ऊपर तस्वीर में पटना एअरपोर्ट पर पापा के साथ भैया-भाभी और बच्चा। बच्चा भी समझ गया है कि कुछ गडबड है, सो सहमा हुआ चुपचाप मुरझाया सा चेहरा लेकर गोद में बैठा हुआ है!!

Monday, December 20, 2010

केछू पप्प!!

भैया का बेटा.. उम्र दो वर्ष, तीन माह.. मुझे छोटे पापा बोलने कि कोशिश में मात्र पापा ही बोल पाता है, छोटे पापा शब्द उसके लिए कुछ अधिक ही बड़ा है.. इस गधे को, अजी बुरा ना माने मैं अक्सरहां प्यार से गधा-गधी बुलाता ही रहता हूं, अपने छोटे पापा उर्फ़ पापा से बहुत परेशानी है.. परेशानी कि हद भी बिलकुल हद्द तक है.. अब देखिये इसकी परेशानी -

१. पापा बैठे हैं तो भला बैठे क्यों हैं? (मैं कहाँ बैठूँगा? जी हाँ, जहाँ मैं बैठूँगा उसे उसी वक्त वहीं बैठना होता है..)
२. पापा खड़े हैं तो भला खड़े क्यों हैं? (अब पापा जहाँ खड़े हैं वहीं मैं भी खड़ा रहूँगा.. पापा को हटाओ वहाँ से..)
३. पापा घूम रहे हैं तो घुमते क्यों हैं? (पापा नहीं घूमेंगे, मैं घूमूँगा..)
४. पापा खाना क्यों खा रहे हैं? (पापा घर का सारा खाना खा लेंगे.. उन्हें खाने के लिए कुछ मत दो..)
५. पापा पानी क्यों पी रहे हैं? (पापा सारा पानी पी जायेंगे, तो मैं क्या पियूँगा? उन्हें मत दो पानी पीने के लिए..)

मुझे तो इसी बात का संतोष है कि चलो इसे कम से कम अभी ये तो पता नहीं है कि पापा सांस भी लेते हैं.. नहीं तो इसे आपत्ती होगी कि पापा सारा हवा खतम कर देंगे.. फिर मैं कैसे सांस लूँगा?

नखरे इतने हैं इस लड़के के कि मत पूछो.. ऐसे दादी के पास नहीं जाएगा, क्योंकि दादी गोद में लेकर घुमाती नहीं है.. लेकिन अगर इसके छोटे पापा इसकी दादी के पास जाकर बैठ जायेंगे तो इसके तन-बदन में आग लग जाती है.. "पापा पप्प.. केछू आं!! पापा पप्प.. केछू आं!! पापा नै, केछू आं!!(पापा को भप्प कर दिया, और केशू बैठेगा वहाँ.. पापा नहीं, केशू हाँ!!)"

कैसे केशू अपने पापा को 'पप्प' करता है उसका एक नमूना इस वीडियो में आप देख सकते हैं.. कभी कभी बेचारा शरमा शरमा कर भी 'पप्प' करता है..



उसके पापा और उसके बीच के वार्तालाप का एक हिस्सा आप को पेश करता हूं..
सीन 1 :
- केशू, पता है तुमको?
- आं!!
- अरे, ये तो पापा को भी नहीं पता है.. तुमको क्या पता है?
- आं!!

सीन 2 :
- केशू, पता नहीं तुमको?
- नई..
- पापा को भी नई पता है बेटा!!(उदास वाला शक्ल बना कर)
- नई.. ऊंहेंहेंहें..(ठुनकना चालू, कि पापा बताओ)

सीन 3 :
भोरे भोरे, जब केशू का उन्घी भी नहीं टूटा रहता है, भाकुवाया रहता है, तब उसे कार दिखा कर बहलाया जाता है.. पड़ोस के घर में खड़े कार.. तू तार(टू कार).. अगर आपको वो किस्सा होगा तो आप भी इस 'टू' का रहस्य जान जायेंगे.. अगर नहीं जानते हैं तो इस पन्ने से घूम आयें..
तो मुआमला आज भोरे का ही है.. आज भोरे टू कार नहीं, फोर कार लगी हुई थी.. अब केशू को पापा के साथ कार नहीं देखनी थी.. उसे तो दादा के साथ देखनी थी कारें..
- हम भी देखेंगे फोर कार..(केशू के पापा कि आवाज)..
- नई..
- आं.. पापा आं, केशू नई!!
- ऊंहेंहेंहें...
- अच्छा, पापा नई देखेंगे फोर कार.. केशू देखेगा..
अभी भी हम तीन बालकनी में खड़े हैं.. कार कि ओर तीनों ही देख रहे हैं.. मगर कार सिर्फ केशू और उसके दादा ही देख रहे हैं.. उसके पापा नहीं.. उसे डर है कि पापा कहीं सारे कार को देखकर खतम ना कर दें..

सीन 4 :
आज केशू अपने खिलौना गिटार पर सू-सू कर दिया.. उसके पैंट में उसका सू-सू लगा हुआ है उसकी चिंता नहीं.. मगर पहले उसके गिटार को पहले साफ़ करो..
सू-सू करने के बाद उसकी एक समस्या और भी रहती है.. कहीं उसके पैंट बदलने के बीच में उसका छू-छू उसके पापा कुवा(कौवा) को ना दे दें..

चलिए, इस अलिफलैला के किस्से और भी हैं सुनाने को.. अभी तो हम सुनते ही रहेंगे इन किस्सों को.. :)

Thursday, November 04, 2010

केछू अब बला औल समझदार हो गया है

केशू से पूछे गए कुछ सवाल के जवाब (केशू के बारे में जानने के लिए यहाँ देखें):

प्रश्न : केछू के पास कितना हाथ है?
उत्तर : टू!
प्रश्न : केछू के पास कितना पैर है?
उत्तर : टू!
प्रश्न : केछू के नाक में कितना छेद है?
उत्तर : टू!
प्रश्न : केछू के कितने आईज हैं?
उत्तर : टू!
प्रश्न : केछू कि कितनी दीदी है?
उत्तर : टू!
प्रश्न : केछू के पास कितने कान हैं?
उत्तर : टू!


ये तो सामान्य ज्ञान कि बातें थी.. अब जरा केशू से गणित के सवाल पूछ कर देखा जाए..

प्रश्न : एक और एक कितने होते हैं?
उत्तर : टू!
प्रश्न : टू इन टू वन कितना होता है?
उत्तर : टू!
प्रश्न : फोर बाई टू कितना होता है?
उत्तर : टू!
प्रश्न : थ्री माइनस वन कितना होता है?
उत्तर : टू!


तो देखा आपने, केशू दो साल कि उमर में ही कितना होशियार हो गया है? सारे सवाल के सही जवाब.. हो सकता है कि आपके पास अपने भविष्य के लिए कोई प्लान ना हो, मगर इसने पूरी प्लानिंग कर रखी है अभी से ही.. चलिए अब इससे उस पर सवाल पूछते हैं..

प्रश्न : केछू कितनी शादी करेगा?
उत्तर : टू!
प्रश्न : केछू के कितने बच्चे होंगे?
उत्तर : टू!
प्रश्न : केछू कितना कार खरीदेगा?
उत्तर : टू!




फोटो में - केशू. एक मिठाई खाने के बाद टू वाला मिठाई खाने जा रहा है.. :)

और हाँ, एक बात तो बताना ही भूल गया.. केशू अभी बच्चा है, सो ज्यादा कोमप्लिकेटेड सवाल पूछ कर उसे कन्फूजियायियेगा मत.. :) वो तो बात ये है कि केशू इतना ईमानदार है कि अपना जवाब कभी भी नहीं बदलता है.. केशू हमेशा सही उत्तर देता है, बस सवाल पूछने वाला समझदार होना चाहिए.. :)
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एक सिनेमा का एक दृश्य याद आ रहा है.. कादर खान(शायद वही थे) एक बकरी को दिखा कर बोल रहा था कि ये बकरी बोलती है.. कुछ सवाल भी उसने बकरी से पूछा जिसका सही जवाब मिला.. मसलन :

प्रश्न(बकरी से) : यहाँ बकरी कौन है?
उत्तर : मेएएए!!!
प्रश्न : अप्रैल के बाद कौन महीना आता है?
उत्तर : मेएएए!!! :)

Saturday, October 23, 2010

किस्सों में बंधा एक पात्र

हर बार घर से वापस आने का समय अजीब उहापोह लिए होता रहा है, इस बार भी कुछ अलग नहीं.. अंतर सिर्फ इतना की हर बार एक-दो दिन पहले ही सारे सामान तैयार रखता था आखिर में होने वाली हड़बड़ी से बचने के लिए, मगर अबकी सारा काम आखिरी दिन के लिए ही छोड़ दिया.. साढ़े बारह बजे के आस-पास घर से निकलना भी था और आठ साढ़े आठ से पहले मैं जग नहीं सकता ये भी पता.. कुल मिला कर मैं मानसिक तौर पर इस बात के लिए तैयार था कि कुछ ना कुछ मैं छोड़ कर ही आऊंगा..

"अब ये क्या है?" माँ कुछ दे रही थी, तीन-चार पन्नियों में अच्छे से जकड़ा हुआ एक पैकेट.. "काजू-किशमिश का पैकेट है.. तुम्हे अच्छा लगता है, और मुझे पता है कि तुम खरीदता नहीं है वहाँ.." यही कुछ जवाब आया.. पिछली दफे मैं हर ऐसे किसी पैकेट पर ऐतराज जताता रहता था जिसे मैं चेन्ना में आसानी से खरीद सकता हूँ, मगर अबकी मैं अन्य दिनों कि अपेक्षा चुपचाप सब रखे जा रहा हूँ.. अपना लगभग खाली सा बैग टटोलता हूँ, याद आता है कि आते समय पापा कि कई किताबें याद करके लेता आया था.. कुछ सामान भी था जैसे दीदी की साडी, बच्चों कि कुछ चीजें, एक अन्य मित्र के लिए कांचीपुरम की साडी.. अब बैग लगभग आधा से अधिक खाली है.. हाँ, जितनी किताबें लेकर आया था, लगभग उतनी ही पुनः लेते जाना है.. उसे कंधे पर टांगने वाले बैग में रख लूँगा.. इस बैग को कार्गो में भेजना है, जिसका वजन अधिक नहीं होना चाहिए.. वैसे भी किताबों का वजन कुछ अधिक ही होता है, चाहे दिमाग पर हो या कन्धों पर.. "बगल में एक डब्बा भी रखा हुआ है, उसे भी रख लो.." एक और संवाद, "अब क्या है इसमें?" "मखाना भूंज कर, पीस कर रखा हुआ है.. वहाँ ये नहीं मिलता होगा, खीर बना कर खाना.." मैं थोड़ी सी जगह बनाता हूँ और उसे भी रख लेता हूँ.. आलमीरा से एक शर्ट निकालता हूँ.. पास मौजूद हर चीज से कोई ना कोई किस्सा जुड़ा होता है, कई लोग अपना पात्र निभा चुके होते हैं उन किस्सों में.. उस शर्ट से भी जुड़े कुछ किस्से याद आते हैं.. कुछ-कुछ पुराने जमाने के सिनेमा कि तरह बैक्फ्लैश के कुछ सीन आँखों के सामने से गुजर कर थम जाता है.. कुछ साल पुराने किस्से.. वे किस्से जो आज भी मेरे भीतर कहीं पैठ जमाये हुए हैं, फिर से उस किस्से में अपना पात्र याद नहीं करना चाहता हूँ सो वापस रख देता हूँ..

नाश्ते के लिए पूछा जाता है, मैं मना कर देता हूँ.. कहता हूँ कि एक ही बार खाना खाकर एयरपोर्ट के लिए निकलूंगा.. वापस जाने का उद्देश्य सोचते हुए घर में टहलता हूँ.. पापा मम्मी के कमरे में जाता हूँ.. पापा नाश्ता करके नींद में हैं.. उनके बगल में लेट कर उनके गोद में समाने की असफल कोशिश करता हूँ.. याद आता है कि अब उनसे भी एक-दो इंच लंबा हो चुका हूँ, मगर उनके सामने जाता हूँ तो हमेशा मुझे वही पापा याद आते हैं जो बचपन में दिन भर मुझे गोद में उठाये घुमते थे.. कई किस्से आँखों के सामने घूम जाते हैं.. मुझे वह पापा याद आते हैं जिनके मातहत कर्मचारी उन्हें हम बच्चों के साथ हंसी-ठिठोली करते देख सदमे कि स्थिति में आ जाया करते थे, उन्होंने सपने में भी ये कभी नहीं सोचा था कि इतने कड़क साहब का यह रूप भी हो सकता है.. कुछ उससे पुराने किस्से भी नज़रों के सामने घूमने लगते हैं जब गाँव जाने पर भैया-दीदी कहीं और निकल जाते थे मगर मैं पापा या मम्मी को छोड़ कर कहीं नहीं जाता था और अब हालात कुछ ऐसे हैं कि पापा-मम्मी से सबसे अधिक समय तक अलग रहने का रिकार्ड सा बनाते हुए इतनी दूर फिर से निकल जाना है.. जीवन का लक्ष्य क्या है? क्या पैसे कमाना ही 'कुछ' या 'सब कुछ' है? कहीं मैं किसी मृगमरीचिका के पीछे तो नहीं भागा जा रहा हूँ? कहीं हम सभी किसी मृगमरीचिका के पीछे तो नहीं भाग रहे हैं? कुछ प्रश्न मन में आते हैं, जिनका कोई उत्तर ना पाकर मैं खीज उठता हूँ, और उन्हें नजरअंदाज ना करते हुए भी नजरअंदाज कर देता हूँ.. पापा को नींद में कसमसाते हुए देखकर उनकी गोद में समाने कि अपनी असफल कोशिशों को मुल्तवित कर देता हूँ.. धीरे से उनका हाथ लेकर अपने गाल पर रखता हूँ.. एक किस्सा फिर कहीं नज़रों के सामने घूमने लगता है.. बचपन में भैया के एक मित्र 'रॉबिन्सन हैम्ब्रम' जब पहली दफे हमारे चक्रधरपुर वाले घर में पापा से मिले थे तब बाद में आश्चर्य से बोले थे, "अंकल का हाथ कितना बड़ा है!!" मैं पापा का बायां हाथ अपने दाहिने हाथ में लेकर अपने हाथ से नापता हूँ.. कुछ मिलीमीटर का फर्क अब भी है, अंतर सिर्फ इतना है कि अब मेरा हाथ बड़ा है.. मैं धीरे से उनके हाथ को चूमता हूँ.. और रख देता हूँ..

बचपन में माँ कहती थी, "तुम खा लिए तो मेरा पेट भर गया.." मुझे आश्चर्य होता था.. अहा!! ये कैसा जादू है? जो मेरे खाने से माँ का पेट भर जाता है? मुझे महाभारत का वह किस्सा याद आता है जिसमें भगवान कृष्ण ने मात्र एक चावल के दाने से सभी ऋषि-मुनियों को तृप्त कर दिया था.. हकीकत का ध्यान बड़े होने पर ही आया.. "मिथकें भी भला कभी सच होती है क्या?" जिस दिन घर में पलाव बनता था उस दिन हम सभी भाई-बहन आपस में लड़ते थे माँ के साथ खाने के लिए, वो काजू-किशमिश चुन कर हम लोगों के लिए अलग रख देती थी.. कहती थी कि उन्हें अच्छा नहीं लगता है ये.. सच कहूँ तो मुझे आज भी नहीं पता कि माँ को खाने में क्या अच्छा लगता है? शायद पापा को पता हो.. मगर हमारी हर एक पसंद-नापसंद का ख्याल तब भी रखती थी, और आज भी रखती है.. अब जब हम भी ख्याल रखने के हालत में आ चुके हैं तब भी मुझे सिर्फ इतना ही पता है कि उन्हें 'वेनिला फ्लेवर' का आइसक्रीम बेहद पसंद है.. शायद भैया को इससे अधिक पता हो, उन्हें उनके साथ समय बिताने का अधिक मौके मिले हैं..

मैं वापस उस बड़े वाले हॉल में आता हूँ जिसमे मुझे हर चीज बड़ी-बड़ी दिखती है.. टीवी बड़ा.. सामने टंगे हुए फोटो बड़े-बड़े.. हम सभी की तस्वीर वह टंगी हुई है.. माँ भी बड़े वाले सोफे पर आराम से बैठी हुई है.. उनके पास जाता हूँ.. पास जाकर जमीन पर बैठ कर अपना सर उनके गोद में रख लेता हूँ.. माँ के हाथ को अपने गालों पर महसूस करता हूँ.. बचपन के किये एक जिद्द कि याद हो आती है.. कितना छोटा था, यह अब याद नहीं.. मगर यकीनन मैं बहुत ही अधिक छोटा रहा होऊंगा, क्योंकि बेहद धुंधली सी याद बाकी है.. माँ अपने घर के काम को लेकर हैरान-परेशान सी थी और मैं जिद्द पकड़े बैठा था कि खाना खाऊंगा तो माँ के गोद में ही बैठ कर.. मेरी वह जिद्द पूरी भी हुई, उनके सारे जरूरी कामों को छोड़कर.. उनके गर्भ में समाने कि इच्छा होती है, जिससे उनसे दूर ना जा सकूं.. चूंकि पता है कि यह एक असफल कोशिश ही होगी, सो कोशिश ही नहीं करता हूँ.. रोने कि असीम इच्छा होती है, मगर नहीं रोता हूँ.. यह एक कष्टप्रद स्थिति होती है जब आपको कुछ करने कि असीम इच्छा हो और आप ना कर पायें.. एक बेचैनी, छटपटाहट की धार भीतर ही कहीं घाव करती एवं कुरेदती रहती है.. समय देखता हूँ, समय होने ही जा रहा है.. धीरे से वहाँ से उठ जाता हूँ.. खाना लेता हूँ, खाता हूँ और निकल जाता हूँ मुस्कुराते हुए चेहरे के साथ.. मैं अपनी पहचान खोता जा रहा हूँ, जिंदगी एक नया पाठ सीखा रही है.. एक ओढ़ी हुई मुस्कराहट जो अब कभी-कभी लगता है मेरी नई पहचान ही बनती जा रही है..

इन सब बातों को बीते हुए लगभग डेढ़ महीना होने को आ रहा है.. देखिये मम्मी, घर से लाया काजू खत्म होने के बाद मैंने फिर खरीद लिया है.. रात के, नहीं-नहीं.. सुबह के साढ़े चार बजने जा रहे हैं.. मेरी माँ मुझसे नाराज है, पापा तटस्थ मुद्रा लिए हैं, और मैं बहुत उदास हूँ.. कारण बता कर दुनिया के सामने नंगा नहीं होना चाहता.. पापा-मम्मी, I Love You Too Much..

इस लेख से कमेन्ट का ऑप्शन स्वेच्छा से हटाया गया है..

Wednesday, October 20, 2010

पटनियाया पोस्ट!!

किसी शहर से प्यार करना भी अपने आप में अजीब होता है.. मुझे तो कई शहरों से प्यार हुआ.. सीतामढ़ी, चक्रधरपुर, वेल्लोर, चेन्नई, पटना!!! पटना इन सबमें भी कुछ अव्वल दर्जे का.. सोलह हजार पटरानियों में रुक्मणि जैसा रुतबा!! जवानी के दिनों में हौसलाअफजाई से लेकर आवारागर्दी तक.. सब जाना पटना से.. अब लगभग सात-आठ साल से पटना से बाहर रहने के कारण कई जगहों के नाम बिसरता जा रहा हूँ, मगर उन गलियों के नक्शों को कौन मिटाएगा जो अंदर तक कहीं खुदी हुई है?

उस शहर से पहली मुलाक़ात बचपन में कभी हुई थी, कब, यह अब याद भी नहीं.. सीतामढ़ी से पटना तक गया था, पापा के साथ टंगके, सरकारी गाडी से जो किसी सरकारी काम से जा रहे थे.. गांधी सेतु पुल के ऊपर से गुजरने में अजीब सा सुखद अहसास अब भी याद है.. बिहार में एक कहावत बहुत प्रसिद्द है "उप्पर से फीट-फाट, अंदर से मोकामा घाट".. इस कहावत कि आत्मा को मेरी पीढ़ी से एक पीढ़ी ऊपर वाले लोग ही समझ सकते हैं.. वे लोग जो गाँधी सेतु पुल से बहुत पहले के थे.. या दीगर बात है कि अगली बार पटना आते समय बिहारसरीफ़ और नवादा से गुजरा था..

बोरिंग रोड, राजीव नगर, रुकुनपुरा, खाजपुरा, मछुवाटोली, पत्थर की मस्जिद, दरभंगा हाउस, पटन देवी, नाला रोड, कदमकुवां, राजेन्द्र नगर, शास्त्रीनगर, गाय घाट, राजापुल.. इन सबसे पहचान के बहुत पहले कि बात थी वो.. सर्पेंटाइन रोड को तो बहुत बाद तक मैं उस पंचमंदिर वाले सड़क के नाम से ही पहचानता था.. उसका नाम तक मालूम ना था मुझे..

नाला रोड वाला वह मित्र अभी भी मुझे चिढाते हुए चिढता है, जिसे अब भी यही लगता है कि उसके घर के सामने से रिक्शे से गुजरने वाली हर लड़की उसे ना देख कर मुझ पर नजर रखती थी.. यह शहर वह शहर है जहाँ मेरी आवारागर्दी के किस्से भी मेरे साथ ही जवान हुए थे.. मेरा कोई भी पुराना मित्र मेरी गवाही दे सकता है कि उन आवारागर्दी के दिनों में भी कभी किसी लड़की से छेड़खानी मैंने ना की थी, मगर चंद मित्र ही उस गवाही में यह जोड़ सकते हैं की राजेन्द्र नगर रोड नंबर दो में पहली बार किसी लड़की के घर का पता जानने के लिए उसके रिक्शे को अपनी स्कूटर के रफ़्तार से कैसे सिंक्रोनाइज़ किया था, जिसके घर के आगे एक तख्ती लगी हुई थे "सावधान! यहाँ कुत्ते रहते हैं!!" आखिरी दफे अगस्त के पटना यात्रा में जब अपने उस नाला रोड वाले मित्र के घर गया था, तब बैंगलोर से फोन पर मेरे मित्र ने नौस्टैल्जिक होते हुए पूछा था, "अबे साले, अभी भी लड़कियां तुझे देख रही थी या मेरे छोटे भाई को?"

कुछ हंसी-हंसी में : मेरी एक कालेज की मित्र पटना के अपराधीकरण के कारण अक्सर कहती थी, "मैं पटना सिर्फ तभी जाउंगी जब तुमलोग शादी करोगे, सुना है बहुत अपराध होता है वहाँ!!" और मेरा पटनिया मित्र उसे और भी डराते हुए कहता था, "अरे पटना के बारे में तो पूछो ही मत.. वहाँ जैसे ही सड़क पर आओगी वैसे ही चारों तरफ गोलियाँ ही चलती मिलेगी.. हमलोग तो झुककर-बचकर निकल जाते हैं.." :)

मेरे साथ एक अजीब विडम्बना रही है अब तक.. जो चाहा वो ना मिला, जो मिला वह चाहने से कहीं बढ़कर.. संतुष्टि कभी ना हो पाती है.. यह कुछ-कुछ वैसा ही है जैसे माँ को बदलकर दूसरी माँ सामने रख कर कोई बोले कि यह पहले वाली से भी अच्छी है.. इश्क किया पटना से, भटक रहा हूँ भारत भर के बड़े शहरों में..

गाय घाट के किनारों पर बैठ कर गंगा की परती जमीन को देखते हुए हाजीपुर में फैले हुए कई किलोमीटर तक केले के खेत.. चिनिया केला.. पटना से दरभंगा जाते हुए बस में, चिनिया केला.. उस परती जमीन में कई प्रकार के पक्षियों से लेकर क्रिकेट खेलते बच्चे और मछुवारे अपनी नावों के साथ..

पटना का जिक्र हो और गाँधी मैदान के साथ-साथ पुस्तक मेले और दसहरा और छठ पूजा में साफ़-सुथरी सड़क का जिक्र ना हो तो पटना के साथ नाइंसाफी जैसा महसूस होता है.. मगर जिक्र किसका करूं? बरसात के मौसम में झील जैसा सीन क्रियेट करता हुआ गांधी मैदान का? या फिर एक ही मैदान में कम से कम बीस क्रिकेट टीम को एक साथ पूरे स्पेस के साथ क्रिकेट खेलते हुए बच्चों और जवानों का? या फिर उसी मैदान के किसी कोने में नशे में धुत्त ताश के पत्तों से दांव पर सबकुछ हारते लोगों का? या फिर एक ही मैदान में एक साथ चलते दो-तीन मेले के बावजूद आधे मैदान में राजनीति के दांव लगाते कुछ नेताओं का? शुरू के दिनों में विश्व पुस्तक मेला पटना में दो साल में एक बार लगता था जो बाद में बदलकर हर साल लगने लगा.. उसके चक्कर लगाते हुए कई दफे पूरी पुस्तक ही पढ़ जाना.. कामिक्स वाले स्टाल में बच्चों के साथ अपनी उस क्रमशः के बाद वाली कामिक्स ढूँढना.. दसहरा के समय डाक बंगला चौराहे को घेर कर दो-तीन किलोमीटर तक गाड़ियों का प्रवेश निषेध करने के बावजूद लाखों की भीड़ देखना.. मौर्यालोक के पहले मंजिल से देखने पर ऐसा महसूस होना जैसे विशाल नरमुंडो का झुण्ड चला आ रहा हो.. यूँ तो वह शहर गंदगियों में डूबा रहता है और लोग नगरपालिका को गालियाँ देते नजर आते हैं, मगर छठ पूजा के समय वही शहर के लोग पूरे शहर को उसकी सडकों समेत नहलाकर, झाडू लगाकर साफ़ किये रखते हैं.. पोस्टल पार्क कि खुरपेंच गलियों से निकलना किसी भी नए के लिए आसान ना हो..

मुझे बुरी यादें कभी परेशान नहीं करती है, बुरी यादें मुझे ढाढस बंधाती है.. हौसला देती है.. कुछ और अच्छा, कुछ और नया करने को.. वहीं अच्छी यादें मुझे अक्सर अवसाद में धकेलती है.. अंदर ही अंदर कुछ शूल सा चुभता महसूस होता है.. अच्छी यादाश्त से बुरी शै और कुछ नहीं होती है शायद..

कहीं और जाने से पहले एक चक्कर यहाँ भी लगा लें..

Tuesday, September 07, 2010

मेरे घर के बच्चों को डराने के नायाब नुस्खे

बात अधिक पुरानी नहीं है.. इसकी शुरुवात सन 2004 के कुछ साल बाद हुई, जब दीदी कि बड़ी बिटिया को यह समझ आने लगा कि डरना क्या होता है.. फिर शुरू हुई यह दास्तान.. मेरी आवाज गूंजने लगी घर में, "अरे, मेरा मोटा वाला डंडा और रस्सी लाना जरा.. अभी सोमू को बाँध कर पिटाई करते हैं.." (दीदी कि बिटिया को ननिहाल में दिया गया नाम सोमू है..) यह दीगर बात है कि ना तो कभी उसे रस्सी से बाँधा गया और ना ही कभी मोटा वाला डंडा से पिटाई हुई.. कुछ दिनों के साथ के बाद वो प्यारी बिटिया अपने घर चली गई.. मगर उसे वो रस्सी और डंडा भुलाए भी ना भूल पायी.. उसे समझ में आ गया था जिसकी लाठी, उसी की भैंस.. अब वो दीदी और पाहुनजी को हूल देने लगी "पछांत, मोटा बाला डंडा और रच्छी लाना, अभी पिटाई करते हैं".. मेरे लिए तो इतना ही काफी था कि मोटा वाला डंडा के भय से ही सही, कम से कम पछांत मामू उसे याद तो रह गए..

कुछ समय बाद दीदी कि छोटी बिटिया भी हुई.. और उसकी सोमू दीदी उसके बदमाशी करने पर उसे भी पछांत मामू के डंडा से ही डराती रही.. छोटी बिटिया के साथ अधिक समय गुजारने का मौका कभी नहीं मिला.. मेरे लिए वो अप्पू से गप्पू कब बन गई, मुझे भी पता नहीं चला.. सभी के लिए अप्पू, और मेरे लिए गप्पू.. दोनों गाल खूब फुले हुए.. देखते ही खींचने का मन करने लगे, कुछ ऐसा..

इस बार के पटना यात्रा में कुछ अधिक समय गुजारने का मौका मिला जिसे मेरे बुखार ने बर्बाद कर दिया.. किसी को गोद नहीं ले सकता हूँ, कहीं उसे भी बुखार ना हो जाए.. मगर दूर से तो डरा ही सकता हूँ.. है कि नहीं?? :)

कुछ दिनों बाद एक और बच्चे का आगमन हुआ घर में.. भैया-भाभी को बेटा और मुझे भतीजा मिला.. पापा-मम्मी अब नाना-नानी के अलावा दादा-दादी भी बन गए.. उधर दीदी-पाहुनजी का भी प्रोमोशन हो गया इन रिश्तों में.. 24 अगस्त को भैया के बेटे केशू का दूसरा जन्मदिन था..



अब जन्मदिन बच्चों का हो और बैलून ना आये, ये भी कभी होता है भला? नहीं ना!! तो ढेर सारे बैलून भी आये.. और मैंने ऐसे ही मस्ती में एक बैलून फोड़ दिया.. तीनों बच्चे हैरान-परेशान.. ये क्या आवाज किया.. सोमू रानी अब साढ़े छः साल कि थी, सो तुरत समझ गई कि बैलून फूटा.. गप्पू रानी को बताया गया कि बैलून फूटा.. और केशू लाला सोच में कि हुआ तो आखिर क्या हुआ? फिर उसे इतना ही समझ में आया कि बैलून से खेलने पर वो फूट जाता है और उससे डरावनी आवाज आती है..

अब तीनों बच्चों को इकठ्ठा करके, एक बैलून हाथ में लेकर खेलने पर तीनों कि प्रतिक्रिया के बारे में सुने :
सोमू बिना कुछ बोले अपने कान पर हाथ रख कर इन्तजार में रहती कि बैलून अब फूटा तो तब फूटा..

गप्पू बिटिया बिना किसी भाव को चेहरे पर लाये कुछ वाक्य लगातार बोलने लगती है, "मामू.. बैलून मत फोडो मामू.. प्लीज मामू.. बैलून मत फोडो मामू.. हम्फ(लंबी सांस लेने कि आवाज).. मामू.. बैलून मत फोडो मामू.. प्लीज मामू.. बैलून मत फोडो मामू.." यह मंत्र जाप तब तक चलता है जब तक कि उसके मामू, यानी मेरे हाथ से बैलून ना निकल जाए..

अब बचा सबसे छोटा बच्चा.. केशू.. वो तो जैसे ही अपने छोटे पापा के हाथ में बैलून देखता है वैसे ही दहाड़े मर-मर कर रोना चालू.. शुरू शुरू में तो किसी के भी हाथ में बैलून देख कर रोता था, बाद में उसकी समझ में आ गया कि बैलून से खेलते तो सभी हैं मगर फोड़ने का काम बस छोटे पापा का ही है..

कुछ और भी किस्से हैं जिसे मैं संभाल कर लेता आया हूँ.. मौका मिलते ही सुनाता हूँ.. :)

Sunday, May 09, 2010

माँ से जुडी कुछ बातें पार्ट 1

मैंने मम्मी से बचपन में कभी राजा-रानी या शेर-खरगोश कि कहानी नहीं सुनी.. या शायद कोई भी कहानी नहीं सुनी है.. जब से होश संभाला, मैंने उन्हें डट कर मेहनत करते पाया.. पूरे घर को एक किये रहती थी.. और उस एक करने के चक्कर में हम बच्चे उनसे डरे सहमे रहते थे.. किसी बात पर गुस्सा होकर किसी से २-४ दिन या शायद १२-१३ घंटे बात नहीं करती थी.. शायद इसलिए क्योंकि मुझे याद नहीं, वह उम्र कुछ याद करने कि थी भी नहीं और उस उम्र कि बाते अक्सर किसी को याद रहती भी नहीं है.. उनके किसी से बात ना करने के समय अक्सर हम बच्चों को उनके पास भेजा जाता था.. मनाने के लिए नहीं, बस यूँ ही.. और उसमे भी प्राथमिकता मेरे ऊपर ही अधिक होती थी (छोटा होने कि वजह से).. उनके गुस्से कि वजह अक्सर क्या होती थी मुझे नहीं पता, और ना ही मैंने कभी माँ से इस बाबत पूछा है.. मगर अंदाज से बता सकता हूँ कि एक संयुक्त परिवार का सारा बोझ अकेले ढोना ही वह वजह हो सकती थी.. अब इससे अधिक मुझे और कुछ याद नहीं है, आखिर मैं उस समय ४-५ साल से अधिक का नहीं था.. हाँ मगर यह बात जरूर थी कि हम बच्चे माँ से अधिक पिता कि गोद में समय बिताते थे.. पापा जी का गोद हम सभी के लिए सबसे अधिक सुरक्षित जगह हुआ करती थी..

कभी कभी अंतर्मन में बसी हुई कुछ बीती बातें किसी सिनेमेटिक सीन कि तरह फ्लिक करके निकल जाती है.. जिसमे मैं मम्मी कि गोद में बैठ उनसे कुछ उटपटांग बाते पूछता रहता हूँ, वे बाते क्या थी यह नहीं दिखता है.. शायद वैसी ही बाते होंगी जैसे कि दीदी कि बिटिया दीदी से सवाल पूछती है, या फिर भैया का बेटा कुछ और महीने बाद भाभी से वैसे ही प्रश्न पूछे..

जब घर से पहली बार अपनी दुनिया तलाश करने बाहर निकला तब मेरे साथ कुछ अजीब से संयोग बनते गए.. जब पहली बार दिल्ली जा रहा था तब पटना में घर में कोई नहीं था, सभी मुझे कुछ दिन रुक कर जाने के लिए कह रहे थे और मैंने किसी कि ना सुनते हुए अपना सामान बाँधा और निकल गया अपनी जमीन तलाशने.. घर कि चाभी सामने पड़ोस में रहने वाली भाभी को दे दिया.. फिर उसके बाद जब भी घर(पटना) आता तो वहाँ कोई नहीं होता था.. मैं उन्ही पड़ोस वाली भाभी से चाभी लेता, कुछ घंटे आराम करता और गोपालगंज के लिए निकल लेता जहाँ पापा उस समय पोस्टेड थे.. ऐसे ही होते-होते लगभग एक साल निकल गए.. मेरा दिल्ली-पटना-गोपालगंज आना जाना चलता रहा.. मुझे याद है, पहली बार माँ को याद करके दिल्ली के उस एक छोटे से कमरे में रोया था, जिसे लोग बरसाती के नाम से दिल्ली में जानते हैं..

फिर एक दिन अचानक से VIT से MCA के प्रवेश के लिए बुलावा आ गया, और जिंदगी में पहली बार हवाई जहाज कि यात्रा भी कि.. मन में अजीब से ख्यालात भी चलते रहे थे उस ढाई घंटे कि हवाई यात्रा में.. कम से कम उत्साह तो कहीं भी नहीं था.. थोडा सा डिप्रेशन और घबराहट के साथ-साथ मन में यह भी चल रहा था कि पापाजी के मेहनत से कमाए दस हजार इस बेकार कि हवाई यात्रा में खर्च हो रहे हैं.. डिप्रेशन इस बात की थी कि मैं घर जाने और मम्मी से मिलने के लिए छटपटा रहा था.. और घबराहट इस बात की थी कि मेरे पास कुछ भी सामान नहीं है, नई जगह होगी, नई भाषा के साथ-साथ नए लोग भी होंगे.. कैसे सब ठीक से कर पाऊंगा? अंग्रेजी ठीक से बोल नहीं पाता था उस समय, और ऐसे शहर में अकेला जा रहा था जहाँ अंग्रेजी ही एकमात्र माध्यम था बातचीत का.. थोड़ी बहुत उन दिनों भैया से भी शिकायत थी कि कम से कम वही तो मेरे साथ चलते, मगर बाद में समझ आया कि वो भी अपना कैरियर बनाने में उस समय उलझे हुए थे..

खैर, प्रवेश ले लिया और कक्षा शुरू होने में ५-६ दिन थे.. मैंने निर्णय लिया कि वापस पटना जाऊं और मम्मी से मिलने के साथ-साथ अपने जरूरी सामान भी लेता आऊंगा.. रेल से २ दिन वापस पटना आना और २ दिन वापस कालेज जाने को छोड़कर सिर्फ एक या डेढ़ दिन हाथ में थे.. घर फोन करने पर पता चला कि कुछ जरूरी चीजों के कारण पटना में कोई नहीं रहेंगे, और चाभी बगल वाली भाभी के पास रहेगा..

जारी...

Saturday, April 17, 2010

दो बजिया वैराग्य पार्ट थ्री


कल दीदी का फोन आया, तक़रीबन रात साढ़े दस बजे के आस पास.. अक्सर जब भी फोन करती है तो उसका समय दस से ग्यारह के बीच ही होता है.. बहुत खुश होकर फोन कि थी और सिर्फ एक सूचना देकर एक मिनट से भी कम समय में फोन रख दी.. बोली कि मैंने आखिर अपना इमेल बना ही लिया है और आपको(सबसे छोटा होने के बाद भी सभी मुझे घर में 'आप' ही कहते हैं.. क्यों, कारण फिर कभी) मेल भी कर दिए हैं.. इससे पहले शायद 2001 के लगभग दीदी Rediff पर अपना इमेल यूज करती थी, अब तो उसे उसका ID भी याद नहीं है पासवर्ड कि बात तो बेहद दूर है..

बचपन से लेकर अभी तक दीदी मुझे लगभग हर मुसीबत(जो उन्हें ज्ञात हो) से बचाती आई है.. मैं कितना भी याद करने कि कोशिश करता हूँ मगर मुझे यह कभी याद नहीं आता कि दीदी कभी भी मुझपर हाथ उठाई हो.. हाँ, मगर ऐसे किस्से खूब याद हैं जब मैंने बचपन कि नासमझी में दीदी को मारा हूँ.. एकाध किस्सों को छोड़ दिया जाये तो मुझे पापाजी से जब कभी भी पिटाई लगी है तो सिर्फ और सिर्फ दीदी को मारने के कारण ही.. और उस समय भी मुझे बचाने वाली दीदी ही हुआ करती थी.. पापाजी से लगभग लड़ लेती थी कि मेरे भाई को मत मारिये..

पटना में आने के बाद से जब भैया आगे कि पढाई के लिए घर से बाहर निकल गए और मेरा घर से बाहर निकलना कुछ बढ़ा, तब दीदी ही मेरी मित्र-सखा सब कुछ थी.. उसी समय पहली बार हमें जेबखर्च के नाम पर कुछ मिलना शुरू हुआ था.. 1999-2000 कि बात कर रहा हूँ.. वैसे जेबखर्च मिलना-ना मिलाना, दोनों मेरे लिए बराबर ही था.. घर के सारे सामान मैं ही लाता था, सो कभी ये हिसाब नहीं रहता था कि मैंने अपने जेबखर्च से घर का सामान खरीद लिया है या फिर घर के सामान के लिए मिलने वाले पैसे को अपने ऊपर खर्च कर लिया है..

कुल जमा 300 रूपये हमें मिला करता था, और दीदी के पास वह जब कभी 500-1000 के पास पहुँचता था तब दीदी वह सारे पैसे मुझ पर खर्च कर देती थी.. कभी कोई सनग्लास तो कभी कोई टीशर्ट्स तो कभी कुछ.. दीदी कि शादी के समय दीदी के पास लगभग 300-400 रूपये थे उन्ही जेबखर्च से बचे हुए और वह भी दीदी मुझे दे दी थी.. मैंने भी उन्हें 2003 से अभी तक छुपा रखा है अपनी एक डायरी के अंदर.. यक़ीनन रूप से मैं यह कह सकता हूँ कि वह पैसे मुझ से कभी भी खर्च ना हो सकेगा..

मेरी वह डायरी भी एक अजीब अजायब घर से कम नहीं दिखती है.. एक स्केच जो मेरे लिए मोनालिसा के पेंटिंग से भी अधिक कीमती है.. दीदी के दिए कुछ रूपये, और जीजाजी से लिए गए 5 अमेरिकन डॉलर.. मेरे लिए कुछ अमूल्य पेपर कि कतरने.. दो-तीन सूखे हुए गुलाब कि झड़ी हुई पंखुडियां जिनसे अब खुश्बू नहीं आती.. कुछ खास लोगों के पासपोर्ट साइज की तस्वीरें.. इन सबमे से अगर उन रूपयों और डॉलर को हटा दिया जाए तो बाकि चीजों कि कीमत पांच पैसे भी कोई ना लगाये, मगर मैं उन्हें अपने उस ताले वाले डायरी में हमेशा बंद करके रखता हूँ.. इस कदर कि कोई उसे देख भी ना सके..

बिहार और बिहार के बाहर के लोगों का अक्सर यह मानना होता है कि जो भी बिहार बोर्ड से पढ़ा-लिखा है तो उसकी अंग्रेजी खराब होना निश्चित है(अभी तक के अनुभव से इसे सही पाया भी है, बिहारी विद्यार्थी को अक्सर इसी मोर्चे पर मात खाते भी देखा है).. दीदी इसे भी मिथ्या साबित कर दिखाई थी.. हम दोनों भाई केंद्रीय विद्यालय से पढ़े होने के बाद भी दीदी कि अंग्रेजी के सामने कुछ भी नहीं थे..

घर में शुरू से ही एक स्कूटर रहा है और बाद में एक कार भी आ गई थी.. हम सभी के वयस्क होने के बाद भी पापाजी अक्सर हमें उसे चलाने से रोकते थे.. किसी अनजाने भय से ग्रसित होकर कि एक्सीडेंट कर देगा, वगैरह-वगैरह.. दीदी अक्सर मुझे स्कूटर निकलने को कहती थी और जब तक मैं वापस ना आ जाऊं तब तक घर में संभाले रखती थी कि किसी को पता ना चल जाए कि मैं स्कूटर लेकर सिखने निकल गया हूँ.. कार में मामले में स्थिति अलग थी, कार थोड़ी बड़ी थी और सभी को आराम से पता चल जाता(फिर भी दो-तीन दफ़े मैं जब पटना में अकेला होता था तो कार लेकर कालेज चला जाता था, कुछ चलाने के लालच से और कुछ शो-ऑफ करने के लालच से)..

जब घर में हम दो बच्चे ही थे(भैया इंजीनियरिंग कि पढाई के लिए पहले ही बाहर जा चुके थे) तो उनमे झगडा होना भी जरूरी था.. और हम झगड़ते भी थे.. पूरे दो साल तक मैं हर दिन सुबह साढ़े छः-सात बजे तक दीदी को कालेज छोडने जाता था.. और यह रूटीन मेरा कभी नहीं टूटा, चाहे हम दोनों में कितना भी अनबन चल रहा हो.. हर दिन सुबह दीदी को उठाना और अगर झगडा चल रहा हो तो कोई सामान पटक कर शोर मचा कर उठाना, मगर उठाना.. गर्मी हो बरसात हो या 3-4 डिग्री वाली हाड़कंपाती सर्दी..

इसे अचानक से यहीं खत्म कर रहा हूँ, क्योंकि इसे मैं चाह कर भी किसी इंड प्वाइंट तक लाकर खत्म नहीं कर सकता.. ऐसे ही अनाप-सनाप लिखता ही चला जाऊंगा..


दो बजिया बैरागी पार्ट 1
दो बजिया बैरागी पार्ट 2

Saturday, March 06, 2010

शाईनिंग इंडिया और कैटल क्लास

मैं अबकी जब घर आ रहा था तब चार साल के बाद स्लीपर में यात्रा किया.. मैं रास्ते भर खूब इंज्वाय किया.. तरह तरह के लोग आते थे और अपने तरह से अपना बिजनेस कर रहे थे.. कोई पान-मसाला बेच रहा था तो कोई नट बन कर पैसे कमा रहा था.. कभी कोई लैंगिक विकलांग आकर जबरी वसूली कर रहा था, तो कोई गा रहा था.. कोई भीख मांग रहा था तो कोई भगवान का रूप धारण किये हुआ था.. पटना पहूंचने से ठीक पहले मुझे अचानक से लगा कि यह लोग चाहे जैसे भी अपने जीने की जद्दोजेहद में लगे हुये हैं... और मैं इन्हें देखकर मजे ले रहा हूं? क्या मैं भी उन सो-कौल्ड एलीट वर्ग में आ गया हूं जो थर्ड ए.सी., सेकेण्ड ए.सी. या फिर हवाई जहाज से यात्रा करने वालों की जमात में शामिल हो गया हूं? और उनके लिये ये सारे लोग तमाशा हो गये हैं, कुछ उसी तरह जैसे हम चिड़ियाघर में जानवरों का तमाशा देखने जाते हैं!! फिर अपने ऊपर शर्म आने लगी.. मन में आया कि यही है शाईनिंग इंडिया, जहां किसी का दर्द औरों के लिये तमाशा से अधिक और कुछ नहीं होता है..

हमारे देश में जब तक यह अमीर-गरीब की खाई यूं ही बढ़ती रहेगी तब तक भारत कभी भी उन्नती के पथ पर आगे नहीं बढ़ सकता है..

Friday, August 14, 2009

एक नास्तिक के मुंह से जन्माष्टमी? राम-राम, क्या जमाना आ गया है.. :)


मैं मंदिर नहीं जाता हूं, ना ही किसी पूजा में शरीक होता हूं.. मगर फिर भी राधा-कृष्ण की बातें जहां कहीं संगीतमय हो जाया करती है वहां मेरे लिये बस आनंदम ही आनंदम.. चाहे बात किसी राधा-कृष्ण कि अवधी भाषा में लिखी गई कव्वालिया हों या फिर दोहे या फिर भजन या फिर बंबईया सिनेमाओं के गीत.. मुझे वह अपने आप अपनी ओर खींचता सा महसूस होता है.. आप ये भी नहीं कह सकते हैं कि ये घर और आस-पास के परिवेश में बड़े होने के कारण हुआ है, क्योंकि तकरीबन कुछ-कुछ वैसा ही खिंचाव खुदा के दरबार में गाये गये कल्ट कव्वालियों को भी लेकर होता है.. अगर सही-सही बोलूं तो ठीक ऐसा ही दिवानापन मुझे रामायण की कथा और प्रेम या विरह रस में डूबी शानदार कवितायें और माईकल जैक्सन के गीतों में भी महसूस होता है..



आज कल चूंकि जन्माष्टमी का जोर भी है और भैया का बेटा जन्माष्टमी के दिन ही आज से एक साल पहले पैदा हुआ था, सो मन में जाने क्या आया और अंतर्जाल पर कृष्ण से संबंधित चीजें ढ़ूंढ़ने निकल पड़ा.. एक-दो गीत ऐसे मिले जिसने मुझे नौस्टैल्जिक कर दिया.. उन दिनों कि याद दिला दी जब घर के पास वाले किसी मंदिर से सुबह-सुबह चार बजे हम अपनी नींद तोड़ कर सुना करते थे और उसे बजाने वाले पंडे-पुजारियों को गरियाया करते थे.. पहला गीत कुछ ये है..

आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की ॥

गले में बैजंती माला, बजावै मुरली मधुर बाला ।
श्रवण में कुण्डल झलकाला, नंद के आनंद नंदलाला ।
गगन सम अंग कांति काली, राधिका चमक रही आली ।
लतन में ठाढ़े बनमाली;
भ्रमर सी अलक, कस्तूरी तिलक, चंद्र सी झलक;
ललित छवि श्यामा प्यारी की ॥


पूरा गीत पढ़ने और सुनने के लिये आप इस लिंक पर जा सकते हैं.. गीत हिंदी और आंग्ल, दोनों ही भाषा में लिखा हुआ है और मुझे यह चिट्ठा कभी किसी भी अग्रीगेटर पर नहीं मिला था.. शायद यह ठीक ही कहा गया है कि "सितारों से आगे जहां और भी है.." दूसरा गीत जिसे सुनकर मैं नौस्टैल्जिक हो उठा उसके किस्से भी सुबह उठकर पंडे-पुजारियों को गरियाने पर ही खत्म हुआ करते थे.. वह गीत ये रहा..


श्याम चूड़ी बेचने आया

मनिहारी का भेष बनाया
श्याम चूड़ी बेचने आया
छलिया का भेष बनाया
श्याम चूड़ी बेचने आया
छलिया का भेष बनाया
श्याम चूड़ी बेचने आया

गलियों में शोर मचाया
श्याम चूड़ी बेचने आया
छलिया का भेष बनाया
श्याम चूड़ी बेचने आया


इसे भी पूरा पढ़ने-सुनने के लिये आपको इस लिंक पर जाना होगा, आखिर जहां से मैंने यह सब उठाया है, वह भी तो कभी उतनी ही मेहनत किये होंगे इन गीतों को संजोने के लिये..

हिंदी सिनेमा कि बात करें तो, "मदर इंडिया" के एक गीत को मैं सबसे ऊपर रखूंगा.. जो अक्सर पाला बदल-बदल कर अक्सर मेरा रिंग टोन हो जाया करता है.. वह गीत है -

होरी आई रे कन्हाई रंग छलके,
सुना दे जरा बांसुरी..

बरसे गुलाल-रंग मोरे अंगनवा,
अपने ही रंग में रंग दे मोहे सजनवा..
मोहे भाये ना हरजाई रंग हल्के,
सुना दे जरा बांसुरी..
(पूरी तरह यादाश्त पर आधारित, सो त्रुटी होने कि पूरी गुंजाईश है..)

अगले गीत के बारे में अगर बात करें तो "जॉनी मेरा नाम" सिनेमा का गीत "मोसे मेरा श्याम रूठा" गीत के बारे में जरूर कहूंगा जो मुझे बहुत ज्यादा पसंद है.. एक झलक उसकी भी आपको दिखाये चलता हूं और यह झलक भी पूरी तरह से यादाश्त पर आधारित है..

जय जय श्याम, राधे-श्याम
राधे-श्याम, राधे-श्याम..
ए री हो...
मोसे मोरा श्याम रूठा,
काहे मोरा भाग फूटा,
काहे मैंने पाप ढोये,
असुवन बीज बोये..

छुप-छुप मीर रोये,
दर्द ना जाने कोये..


वैसे अगर सिर्फ होली की ही बात की जाये तो हिन्दी सिनेमा में अनेको गीत निकल आयेंगे, मगर उनमें से अधिकतर चलताउ गीत मुझे सिर्फ होली के समय ही अच्छे लगते हैं.. जो भंग के रंग के साथ फीके नहीं पड़ते हैं..

बस अभी-अभी मुझे रविश जी के ब्लौग पर एक तहसीन मुनव्वर जी कि लिखी हुई कुछ पंक्तिया मिली है, सो उन्हें मैं कैसे ना बांटू? यह भी आधे-अधूरे रूप में आपके सामने है.. पूरा पढ़ना चाहते हैं तो आप रविश जी के चिट्ठे पर ही जायें.. और अगर आपको पसंद आये तो यही गुजारिश है कि वह कमेंट आप उनके हिस्से में ही दे आयें..

चलो चलते हैं मथुरा में किसन की रास देखेंगे
किसन की बांसुरी से जागता अहसास देखेंगे

कभी बांके बिहारी को कभी राधा को देखेंगे
कभी मीरा की आंखों में मिलन की प्यास देखेंगे

कन्हैया लाल की भक्ति की रस में डूब जायेंगे
सुबह से शाम तक श्यामल की हम अरदास देखेंगे


वैसे तो गीत संगीत तो इतने हैं कि उस पर एक क्या हजारों ब्लौग लिखे जा सकते हैं और लिखे जा भी रहे हैं..
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अब कुछ बातें अपने किशन-कन्हैया, बाल-गोपाल के बारे में में भी करते जाता हूं.. अभी पिछले लगभग तीन सालों में मैं जब भी घर वापस आने को चलता हूं तो तो कुछ पीछे छूटने जैसा महसूस होने का अहसास खत्म सा होता जा रहा था.. अक्सर अब ऐसा होने लगा था जैसे कि जाना है तो मोह कैसा.. इन बातों से एक अलग तरह का अज्ञात भय सा भी होने लगा था.. मगर वह अहसास इसने फिर से जगा दिया.. अबकी जब घर से निकल रहा था तब आने का मन नहीं कर रहा था.. उसकी अनेकानेक लीलायें देखने के बाद अब उसकी रास लीलायें भी देखने का मन करने लगा है.. :)

सोच सोच कर आह्लादित होता हूं कि किसी दिन वह अपनी मम्मी को अपनी गर्ल फ्रेंड के बारे में बतायेगा और भाभी उसकी बाते आंखें गोल गोल करके आश्चर्य से सुनेगी और सोचेगी कि कैसे यह इतनी जल्दी बड़ा हो गया? अभी भी बहुत कुछ है लिखने के लिये, मगर मेरा एक मित्र बहुत देर से गाली दे रहा है कि टी.टी.खेलने चलो.. आज मैंने अपना काम जल्दी खत्म किया और ब्लौग लिखने बैठ गया, और वह अभी अपना काम खत्म किया और मुझे गालियां देने बैठ गया.... :D

अपने बाल गोपाल के बारे में फिर लिखता हूं..

Friday, August 07, 2009

अप्पू, तुम्हारा नाम क्या है?


- अप्पू, तुम्हारा नाम क्या है?

- अप्पू..

- पापा का क्या नाम है?

- अप्पू..

- मम्मी का क्या नाम है?

- अप्पू..

- दीदी का क्या नाम है?

- अप्पू..

दीदी कि छोटी बिटिया, अपूर्वा जो लगभग ढ़ाई साल की है, से ये कुछ सवाल मैंने अलग-अलग तरीके से किये तो मुझे अलग-अलग तरह के जवाब भी मिले.. पहला जवाब आप ऊपर पढ़ ही चुके हैं.. दुबारा पूछने पर यह जवाब मिला..

- अप्पू, तुम्हारा नाम क्या है?

- अप्पू..

- पापा का क्या नाम है?

- पापा..

- मम्मी का क्या नाम है?

- मम्मी..

- दीदी का क्या नाम है?

- दीदी..

फिर से मैंने उससे पूछा तो इस बार सही सही जवाब कुछ इस तरह मिला..

- अप्पू, तुम्हारा नाम क्या है?

- अप्पू..

- पापा का क्या नाम है?

- अजित कुमार..

- मम्मी का क्या नाम है?

- रश्मि..

- दीदी का क्या नाम है?

- अदिति..

अब बीच में दीदी मुझसे बोली कि इससे अंग्रेजी में पूछो "हाऊ आर यू", और मैंने पूछ लिया.. उसने सटीक उत्तर दिया, "आई एम फाईन".. और उसके बाद फिर से मैंने वही पुराने प्रश्न दोहराये जिसका उत्तर कुछ यूं था..

- अप्पू, तुम्हारा नाम क्या है?

- आई एम फाईन..

- पापा का क्या नाम है?

- आई एम फाईन..

- मम्मी का क्या नाम है?

- आई एम फाईन..

- दीदी का क्या नाम है?

- आई एम फाईन.. :)

Wednesday, August 05, 2009

क्या आपने मेरा ढोल देखा है?

क्या आपने मेरा ढोल देखा है? क्या कहा, नहीं देखा है? तो आज देख लें, बाद में ये मत कहें कि केशू ने अपना ढोल भी नहीं दिखाया.. अभी देखने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि आपको मैं फ्री में बजा कर भी सुना रहा हूं..