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Sunday, January 26, 2014

एक अप्रवासी का पन्ना

बात अधिक पुरानी नहीं है...मात्र एक साल पुरानी...अब एक साल में कितने दिन, कितने महीने, कितने हफ्ते और कितने घंटे होते हैं, यह गिनने बैठा तो लगता है जैसे एक युग पहले कि बात की जा रही हो. मगर यह फक़त एक साल पुरानी ही बात है. आज रात ही को चेन्नई से निकला था बैंगलोर के लिए और सत्ताईस की सुबह पहुँचा था.

चेन्नई छोड़े मात्र एक साल हुआ है, मगर ऐसा लगता है जैसे कभी वहां था ही नहीं. वह भी तब जबकि जीवन में दूसरा सबसे लम्बा समय उस शहर में ही बीता है. पहला पटना था, और तीसरे की खोज में हिसाब-किताब करने बैठा नहीं, वरना तो किस्तों में ज़िन्दगी जाने कितने ही शहर दिखा चुकी है.

जिस शिद्दत से पटना कभी याद आता है, उतनी शिद्दत से मगर चेन्नई को कभी याद नहीं कर पाया. पता नहीं उम्र का असर ठहरा या वाकई उस शहर से उतना लगाव ही ना हो पाया हो? कारण कुछ भी हो सकता है. उम्र का असर इसलिए की समय के साथ आस-पास के जगहों का तिलिस्म टूटने लगता है. शायद यह बहुत बड़ी वजह होती है कि बचपन में बिताये समय और मित्र हमेशा ही ज़ेहन में वैसे ही याद रहते हैं जैसे कल की ही बात हो.

अब भी याद आता है, चेन्नई छोड़ने से महीने भर पहले साथ काम करने वाली एक मित्र ने पूछा था, "क्या हमें याद करोगे वहां?" उस समय तुरत बिना एक क्षण सोचे जवाब दिया था "नहीं".. फिर जैसे-जैसे बैंगलोर आने का दिन नजदीक आने लगा वैसे-वैसे ही कुछ अच्छा नहीं लग रहा था. आखिर छः साल का समय कम भी नहीं होता है. एक दिन ईमानदारी से उस मित्र को अपना जवाब फिर दिया.. "चेन्नई याद आये चाहे ना आये, मगर आप जैसे दोस्त जरुर याद आयेंगे." और अंततः वही बात सही साबित भी हुई.


मुझे अब भी याद आता है, जिस दिन मैंने वहां अपना त्यागपत्र दिया, उस दिन बहुत खुश था. मन में एक ख्याल यह भी था कि इस शहर और इस कंपनी से पीछा छूटा आखिर! मगर जैसे-जैसे दिन करीब आते गए वैसे-वैसे अकुलाहट भी बढती गई. मन मायूस सा होता गया. और आखिर आज के ही दिन अपना सामान बाँध कर रात की बस से बैंगलोर के लिए निकल लिया.

पिछले एक साल के बैंगलोर का पूरा ब्यौरा दूँ तो, कार्यस्थल पर काफी कुछ सीखने को मिला. सबसे अधिक मन में एक 'भय'.. हाँ, वह भय ही था. नयी तकनीक, नया प्रक्षेत्र(Domain) और उस पर भी अपने अनुभव के मुताबिक़ कार्य संपन्न करने का दवाब. कर पाऊंगा या नहीं, इसकी शंका. खैर, इन सबसे उबरने में अधिक मेहनत-मशक्कत नहीं करनी पड़ी. दूसरी बात यह कि वहां कई सालों से एक ही जगह कार्य करने से एक कम्फर्ट जोन में था, वह यहाँ फिर से बनाना. खैर, नए लोगों से मिलना, उन्हें जानना-समझना अच्छा लगता है, सो जल्द ही यहाँ भी अपना कम्फर्ट जोन बना ही लिया.

खैर, जीवन यूँ भी खानाबदोश हो चुका है. अपने देश में रहते हुए भी अप्रवासी होने को हम अभिशप्त हैं. कहने को भले ही कितना भी पटना को अपना कहूँ, मगर अब पटना जाने पर ही परायापन महसूस होता है. और वापस बैंगलोर(पहले चेन्नई) में प्रवेश करते ही लगता है जैसे अपने शहर, अपने घर में आ गया हूँ. पटना अब मात्र नौस्टैल्जिक होने वाला शहर ही बन कर रह गया है.

Friday, March 15, 2013

ज़िन्दगी जैसे अलिफ़लैला के किस्से

अभी तक इस शहर से दोस्ती नहीं हुई. कभी मैं और कभी ये शहर मुझे अजीब निगाह से घूरते हैं, मानो एक दुसरे से पूछ रहे हों उसका पता. सडकों से गुजरते हुए कुछ भी अपना सा नहीं लगता. पहचान होगी, धीरे-धीरे, समय लगेगा यह तय है.

चेन्नई को समझने के लिए कभी इतना समय नहीं मिला. ज़िन्दगी बेहद मसरूफ़ थी और मन में भी पहले से बैठे कई पूर्वाग्रह थे, और वे सभी पूर्वाग्रह मिल कर एक ऐसा कोलाज तैयार कर चुके थे जिसमें दोस्ती का कोई सवाल ही ना था. मन में यही था कि जब तक यहाँ रहना है तब तक समय गुजार लो. फिर कौन देखने आया है? यूँ भी अपनी-अपनी जड़ों से कट कर यायावरों सी ही ज़िन्दगी तो गुजार रहे हैं हम जैसे सभी लोग, जो नौकरी कि तलाश में घर से निकल आये थे कभी! अब तो ना अपनी जगह अपनी सी लगती है और ना ही वो जगह जहाँ उस वक़्त हम होते हैं. अपनी जड़ों से कटने कि भी सजा तय है मानो, उम्र कैद!!! ताउम्र ऐसे ही भटकने कि सजा.

मगर यह भ्रम तब टूटा जब चेन्नई छूट रहा था. फेसबुक पर भैया मुझे टैग करके लिखे थे "प्रशान्त का हाल बाबुल मोरा नैहर छूटो जाए वाला है". लगा कि हमारी दोस्ती तो हो चुकी थी. कब कैसे ये कुछ पता नहीं. २५ जनवरी को दफ्तर में आखिरी दिन था और एक्जिट प्रोसेस का फॉर्म मेरे पास २४ को ही आ चुके थे. जैसे ही मेरे दफ्तर के ईमेल अकाउंट में एक्जिट प्रोसेस का फॉर्म आया वैसे ही लगा जैसे कुछ छूट रहा हो. मन मानने को तैयार नहीं कि जिस शहर से मैं बस भाग जाना चाहता था उस शहर के छूटने पर तकलीफ भी हो सकती थी, मगर यही सच था. वो शहर जिसने मुझे कभी दुत्कारा नहीं, हमेशा लाड-प्यार से रखा. मगर बदले में मुझसे घृणा ही पाया.

शुरू के छः महीने, या ये कहें कि पांच महीने चेन्नई में सिर्फ नाम मात्र को हम(शिवेंद्र और मैं) होते थे. ऑफिस के दिनों में मैन्सन से ऑफिस और ऑफिस से मैन्सन. बस. और जैसे ही साप्ताहांत आया वैसे ही चेन्नई से वेल्लोर. वहां शिवेंद्र होस्टल में ना रह कर बाहर एक कमरा ले रखा था, जो बाद में उसका कमरा कम और हम दोस्तों का ऐशगाह ज्यादा बना रहा. तो चेन्नईसे वेल्लोर जाने के बाद हम वहीं ठहरते थे.

अमूमन हम जब भी चेन्नई से वेल्लोर जाते थे तब शायद ही कभी हमारी टिकट चेक हुआ हो. मगर एक बार कि घटना है, हम टिकट के लिए लाइन में लगे हुए थे, और ट्रेन बस खुलने ही वाली थी. हमने देखा कि ट्रेन खुल रही है, बस उसी वक़्त हमने तय किया कि टिकट तो वैसे भी कोई चेक करता नहीं है, सो पकड़ लो, वरना अगली गाडी तीन घंटे बाद है. जीवन में सिर्फ एक ही दफे बिना टिकट यात्रा करते पकड़ा भी गया था. इन्टर्न करने वाले और उससे मिलने वाले स्टाइपेंड के पैसे से जीने वाले के पास पैसे आमतौर पर नहीं हो होते हैं, मगर संयोग से पास में पैसे थे नहीं तो खुदा ही मालिक होता.

मैं ठहरा सामिष, और शिवेंद्र निरामिष. अब इसी नॉन-वेज को लेकर भी उसी पांच महीने में दो मजेदार घटनाएं घटी. पहली घटना तब जब हमारे कुछ मित्र किसी इंटरव्यू के लिए चेन्नई आये हुए थे, और उनके जाते समय हम उन्हें छोड़ने चेन्नई सेन्ट्रल पर आये. रात के साढ़े आठ या नौ बज रहे थे. मुझे छोड़ सभी भूखे भी थे और ट्रेन खुलने में कुछ समय भी था. मैं दफ्तर के पास ही शाम में कुछ खाया था. वहीं पास के एक बिरयानी स्टाल से सभी ने अपनी-अपनी सुविधानुसार बिरयानी लिए, कोई अंडा बिरयानी तो कोई चिकेन बिरयानी और कुछ वेज बिरयानी. उन्हें देने के बाद वो स्टाल भी बंद हो गया. शिवेंद्र ने एक चम्मच ही खाया और मुझे जबरदस्ती बहुत अधिक इंसिस्ट करते हुए खाने के लिए कहा. बोला कि बहुत शानदार बिरयानी है, थोडा टेस्ट कर लो. मैंने जैसे ही टेस्ट किया मुझे चिकेन का टेस्ट आया, समझ गया कि वेज बिरयानी में चिकेन ग्रेवी डाला गया है. मैं जबरदस्ती उससे छीन कर सारा खा गया, मगर उसे कुछ बताया नहीं. इस बाबत उसकी गालियाँ मुझे तब तक सुननी पड़ी जब तक मैंने उसे सारा हाल नहीं बताया. उसे इस बात को लेकर मैं अभी तक चिढाता हूँ.

दूसरी घटना उस जगह कि थी जहाँ हम रोज रात में खाना खाने जाते थे. वहीं पास में स्टेडियम था जहाँ अक्सरहां क्रिकेट मैच हुआ करता है. हम जहाँ खाते थे वो छोटा सा होटल एक पंजाबी दम्पति का था. बाद में उन्होंने ने ही बताया कि वो निःसंतान भी थे, सो ढेर सारे पैसे का कोई मोह नहीं था और इसलिए वो सिर्फ रात में ही होटल खोलते थे. वर्ना उनका होटल हम जैसे उत्तर भारत से आये लड़कों कि वजह से खूब चलता था. वहां फुल्के वाली रोटी तीन रुपये कि थी और कोई भी दाल या सब्जी पंद्रह रुपये की. लगभग एक समय का भोजन तीस रुपये में अच्छे से हो जाता था. नॉन-वेज के नाम पर वो सिर्फ अंडाकड़ी रखते थे. वो तीस रुपये में दो अंडे के साथ मिलता था. वो शायद २००७ का अप्रैल का महिना था. हमें एक-डेढ़ महीने में ही अपना इन्टरन का प्रोजेक्ट ख़त्म करके वापस घर जाना था और फिर जून में वापस आना था. शिवेंद्र बहुत तृप्त होकर मुझसे कहता है, "अंकल-आंटी के खाने का एक और फायदा है, ये लोग साफ़-सफाई पर बहुत ध्यान देते हैं. वेज और नॉन-वेज को कभी मिक्स नहीं करते हैं." उस दिन मैंने खुद के लिए अंडाकड़ी मंगाया था. हमारे ठीक सामने अंकल सब्जी और अंडाकड़ी निकाल रहे थे और आंटी रोटी बना रही थी. अंकल ने पहले अंडाकड़ी निकाला और फिर उसी चम्मच से सब्जी भी निकाल कर सामने रख दिए..बेचारा शिवेंद्र कहे तो क्या कहे? बस अंकल को बोला सब्जी दुसरे चम्मच से निकाल कर दो. मगर यह भी समझ गया कि पता नहीं कितनी बार वो ऐसे ही खा चुका होगा.

खैर, ज़िन्दगी के ये किस्से भी तो अलिफ़लैला के किस्सों से अलग नहीं ही होते हैं. हर दिन हम गर गौर से देखें तो एक नया किस्सा निकल आता है. फिलवक्त के लिए अलविदा.

Wednesday, March 13, 2013

शहर

बैंगलोर कि सड़कों पर पहले भी अनगिनत बार भटक चुका हूँ. यह शहर अपनी चकाचौंध के कारण आकर्षित तो करता रहा मगर अपना कभी नहीं लगा. लगता भी कैसे? रहने का मौका भी तो कभी नहीं मिला था. २००५ में पहली दफे इस शहर में आया था, शायद जुलाई का महिना था वह. और लगभग साढ़े सात साल बाद बसने कि नियत से इस साल जनवरी में आया.

अभी भी लगता है जैसे कल कि ही बात थी. कालेज के दिनों में पहली बार अपने दो दोस्तों के साथ यहाँ आया था, इरादा कुछ तफरी करने का था. वेल्लोर से बैंगलोर. जब २००५ जुलाई कल कि बात लग सकती है तो २००७ जनवरी तो उससे भी अधिक नजदीक का मामला है. २००६ दिसंबर में जयपुर दीदी के घर गया था, ठीक ३१ दिसंबर को रेल से चेन्नई उतरा. कहने को तो उससे पहले भी चेन्नई से होकर गुजरने का मौका मिला था, मगर रेल से होकर ही निकल लेता था. हाँ, जब पहली दफे वेल्लोर जा रहा था कालेज में एडमिशन के लिए तब चेन्नई एयरपोर्ट से चेन्नई सेन्ट्रल तक का रास्ता टैक्सी में तय किया था. मगर तब घबराहट रास्तों को और उस शहर को देखने अधिक थी.

जब भी चेन्नई होते हुए वेल्लोर जाता था तब सिर्फ इतना ही समझ में आया था, कि जिस स्टेशन पर गाड़ी के रुकते ही पसीने से तर-ब-तर हो जाओ, वही चेन्नई है.

३१ दिसंबर को चेन्नई उतरने के बाद शिवेंद्र का इन्तजार थोड़ी देर किया. वह वेल्लोर से चेन्नई आया था. २ जनवरी को हमें अपनी पहली नौकरी ज्वाइन करनी थी चेन्नई में, मगर उससे पहले रहने का ठिकाना भी तलाश करना था. फिर तो हमारे लिए बेहद अजीबोगरीब नामों का सिलसिला ही निकल पड़ा, जिसमें सबसे पहला नाम "चुलाईमेदू" था. एक सीनियर ने हमें बताया था कि वहीं रहते हैं, और उनके ही मैन्सन में हमारा भी इंतजाम हो जाएगा, जो कि ना हो सका. और फिर उसके बाद तो एक झड़ी सी लग गई ऐसे नामों की. जैसे कोयम्बेदू, त्यागराया(जिसे अंग्रेजी में Thyagaraya लिखते हैं और हम उत्तर भारत के लोग उसे "थ्यागराया" पढ़ते हैं, टी नगर में टी का मतलब यही है), ट्रिप्लिकेन, वरासलावक्कम, नुगमबक्कम, केलाबक्कम, पैरिस, थोरईपक्कम.. खैर हमें इतना ही समझ आया कि चेन्नई में जगहों का नाम कुछ "अक्कम-बक्कम" टाईप होता है और बैंगलोर में "हल्ली-पल्ली" टाईप.

एक और नई बात पता चली कि यहाँ PG को लोग मैन्सन कहते हैं. सच कहूँ तो मुझे उस वक़्त तक पता नहीं था कि मैन्सन का मतलब क्या होता है? मुझे बाद में शब्दकोष का सहारा लेना पड़ा था. खैर!! जब चुलाईमेदू में ना मिला तो फिर कुछ ने सलाह दी कि टी नगर में ढूंढो, वहां मिल जाएगा. खैर वहां भी ना मिला, मगर वहां ढूँढने के चक्कर में चेन्नई के एक ऐसे इलाके का पता चला जिसे देख कर हम दंग रह गए थे. हम कोडम्बक्कम से लोकल लेकर माम्बलम में उतरे, जो कि टी नगर का लोकल स्टेशन है, और जैसे ही स्टेशन से बाहर निकलने वाली गली में घुसे, लगा जैसे ग़दर मचा हुआ हो. एक लम्बी से गली, उसमें जितने दूकान, उन सब का नाम सर्वणा स्टोर, और लोग ऐसे धक्कम धक्का मचाये हुए जैसे आज ना लिए तो कल कुछ नहीं मिलेगा. जैसे कर्फ्यू लगने के बाद थोड़े समय कि ढील दी गई हो लोगों को खरीददारी करने के लिए. हम पहली बार चेन्नई कि गर्मी को देख रहे थे, उसमें भी ऐसी जगह आ गए थे. वह तो बाद में पता चला कि सालों भर उस जगह का यही हाल रहता था.

फिर वहीं किसी ने कहा कि ट्रिप्लिकेन चले जाओ, वहां जरूर मिल जाएगा. वहां मिल भी गया. और वो भी मुश्किल से दस-पंद्रह मिनट के मशक्कत में ही. वहां जाने पर ऐसा लगा जैसे दिल्ली के मुनिरका या कठबरियासराय-जियासराय वाले इलाके में आ गए हों. माहौल वैसा ही, सिर्फ एक ही भाषाई अंतर मिला, अलबत्ता सब एक बराबर. हाँ, यहाँ कि सड़के कठबरियासराय-जियासराय से अधिक चौड़ी थी. मेरा यह यकीन और पुख्ता हो चला कि सारे शहर का मिज़ाज एक सा ही होता है, बाहर से चमचमाती दिखती महानगर अंदर से ऐसे ही इलाकों में गरीबी में गिजगिजाती है, जहाँ अधिकांश नौकरी करने वाले अथवा पढने के लिए बड़े शहर में आने वाले युवा रहते हैं. शहर के अभिजात्य वर्ग ऐसे इलाकों को नफ़रत से देखती है, मगर शहरें संभली होती हैं ऐसे ही बिगड़े हुए इलाकों से.

Saturday, June 11, 2011

एकालाप

किसी के कमेन्ट का इच्छुक नहीं हूँ, सो कमेन्ट ऑप्शन हटा रहा हूँ.. मेरे करीबी मित्र अथवा कोई भी, कृपया इस बाबत फोन या ईमेल करके भी ना ही पूछें तो बेहतर होगा.. इसे एकालाप मान कर ही चलें, जिसमें किसी के दखल कि कोई आवश्यकता नहीं है मुझे.. हर किसी को अपना स्पेस चाहिए होता है, और हर किसी में मैं भी आता हूँ..

शनिवार का दिन है, दफ्तर में अकेला बैठा हुआ हूँ.. कोई मजबूरी नहीं, बहुत अधिक काम नहीं.. अगले हफ्ते शुक्रवार की छुट्टियों के इंतजामात करने के लिए आज दफ्तर में हूँ.. एक डिफेक्ट है, बहुत आसान सा, मगर उस पर ध्यान केंद्रित नहीं कर पा रहा हूँ.. उसे ऐसे ही छोड़ रखा है, पता है कि कितना भी दिमाग खराब करूँ, अब आज नहीं होने वाला है तो नहीं ही होगा, बाद में देखा जायेगा इसे.. घर जाने की भी इच्छा नहीं हो रही है..

चेन्नई एक ऐसा शहर है जहाँ आप कहीं भी चुपचाप अकेले बैठ कर समय गुजारने के बारे में नहीं सोच सकते हैं, हर जगह लोगों की रेलमपेल इतनी अधिक होती है और साथ में इतनी गर्मी की अगर वहाँ पंखा ना हो तो आप एक जगह टिक ही नहीं सकते, खासतौर से जब अकेले हों.. कुल मिलाकर एक ही जगह बचती है, समुद्र तट, और वहाँ भी जाने की इच्छा नहीं है.. घर जाना नहीं चाह रहा हूँ क्योंकि अभी किसी मित्र के साथ का इच्छुक नहीं हूँ..

चश्मे की दूकान पर जाना है, चश्मे का नया फ्रेम बनवाना है, पुराना इतनी बुरी तरह खराब हो गया है की आप उसकी तुलना किसी एंटीक पीस से कर सकते हैं, और ऊपर से बहुत सारे स्क्रैचेज चश्मे के शीशे पर.. बहुत दिनों से टाल रहा था, मगर आज सुबह घर से ठान कर निकला था की लौटते हुए आज नये के लिए ऑर्डर दे ही दूँगा.. मगर अब लग रहा है आज भी यह टल जायेगा.. दफ्तर से निकल कर उस चश्मे की दूकान के अलावा एक दो जगह और भी जाना था, मगर वहाँ जाने की भी इच्छा अब नहीं हो रही है.. तब जबकि जरूरी सभी कुछ है.. घडी की बैटरी खत्म हो गई है.. लैपटॉप की दूकान पर जाकर कुछ पूछताछ करनी है.. कुछ सामान किसी शौपिंग मॉल से जाकर लानी है.. ब्लाह.. ब्लाह.. ब्लाह.. ब्लाह..

कुछ दिन पहले एक अच्छी खबर पर मन इतना खुश था की कोई बेहद अजीज पास होता तो गले से लगाकर खुशी जाहिर कर देता.. चाहे घर के लोग या दोस्त.. कुछ लोगों को फोर करके खुशी बांटी, मगर आस पास कोई नहीं.. पिछले सात-आठ साल से अकेला रहने की वजह से अकेला रहने की इस कदर आदत हो चुकी है कि किसी का लगातार साथ मुझे घबरा सा देता है.. इस व्यवहार में कुछ बदलाव तब आया था जब अभी ढाई महीने घर पर लगातार रहा.. मगर फिर चार-पाँच महीने में वैसा ही होता जा रहा हूँ.. कई महीनों बाद सिगरेट पीने की बेवजह तलब सी लग रही है.. मन में आ रहा है की बीस सिगरेट वाला डब्बा खरीद कर एक ही बार में सारा पी जाऊं.. यू नो, चेन स्मोकिंग? आगे देखता हूँ तो लगता है कि समय कि रफ़्तार कितनी धीमी है, मगर पीछे मुड कर देखता हूँ तो लगता है कि इसकी रफ़्तार सी तेज कुछ भी नहीं, प्रकाश कि गति को भी ये मात दे दे.. हर वह बात जो बस कल की ही लगती है, दरअसल बरसों पुरानी बात हो चुकी होती है..

अभी दफ्तर से बाहर निकलूंगा भी तो ट्रैफिक इतनी अधिक होगी कि गाड़ी चलानी मुश्किल.. हद्द है, सडकों पर भी चैन नहीं.. ऊपर से T.Nagar से आने-जाने का रास्ता!! लोग ऐसे लुधके होंगे दुकानों में जैसे आज नहीं लेंगे तो सारा सामान हमेशा के लिए खत्म ही हो जायेगा..


ब्लाह.. ब्लाह.. ब्लाह.. ब्लाह..



Wednesday, April 20, 2011

नम्मा चेन्नई!!!!

मुझे कई लोग मिले हैं जो मुझे चेन्नई शहर से प्रेम करते देख मुझे ऐसे देखते हैं जैसे कोई अहमक हूँ मैं.. बहस करने वाले भी कई मिले हैं जो यह गिनाने को आतुर रहते हैं कि चेन्नई में क्या-क्या खराबियां हैं.. मेरे पास उनसे अधिक वजहें होती हैं इससे इश्क में डूबने के बजाये इसके की मैं इससे नफरत करूँ.. वैसे भी मुझे यह समझ में नहीं आता है कि कोई किसी शहर से नफरत कैसे कर सकता है? आप किसी शहर के उन लोगों से नफरत कर सकते हैं जो आपके लिए बुरें रहे हों.. आप शहर की गन्दगी से नफरत कर सकते हैं.. किसी शहर की गर्मी से नफरत कर सकते हैं.. मगर पूरे शहर से ही नफरत!! आश्चर्यजनक!! मेरे लिए भी कुछ शहर ऐसे हैं जहाँ की यादें हमेशा मुझे उदास ही करती हैं और अवसाद में धकेलने की कोशिश करती है, मगर फिर भी उन शहरों से नफरत तो कभी ना कर सका मैं.. हाँ कुछ उदासीन जरूर हो चुका हूँ उन शहरों से!!

चेन्नई एक ऐसा शहर है जिसने मुझे जिंदगी की पहली कमाई की पहली रोटी का बंदोबस्त किया, अब इतने बड़े अहसान को मैं भूल जाऊं, इतना अहसानफरामोश नहीं हो सकता हूँ मैं.. पटना मेरे रगों में रचा-बसा है, धीरे-धीरे यह शहर भी रगों में दौड़ने का अहसास जगाने लगा है.. पटना शहर की तरह इस शहर में उस लड़की का कोई निशान नहीं, यह भी एक अलग सुकून देता है, इस शहर में जिन्दा रहने को..

कई तरह के संघर्षों का साक्षी यह शहर, इसका नशा इतनी जल्दी नहीं उतरने वाला है.. अंतर्द्वंदों से लेकर ज़माने की लड़ाई तक.. यूँ तो जमाने से लड़ने का जज्बा पटना शहर से ही सीख कर चला था मगर खुद से लड़ने का तरीका इसी शहर के एकाकीपन ने सिखाया.. अकेले घर में बैठे-ठाले अचानक से बाईक उठाकर रात के तीन बजे माउंट रोड पर बिना मतलब का 30-40 km का चक्कर लगाना, सुनसान सड़क पर 90+ की रफ़्तार से भागना और अचानक से 20-25 की गति पकड़ कर चलना.. बिना किसी डर भय के की कुछ बुरा घट सकता है मेरे साथ.. सुरक्षा की यह भावना किसी और शहर में कभी नहीं मिली.. सिटी बसों को उन पतली गलियों से निकलते हुए भी आज तक कभी किसी बड़े दुर्घटना का गवाह बनते नहीं देखा.. हमारे घर वाली लगभग अनजान सी गली(गूगल मैप में जो एक पतली सी रेखा में अंकित है) में भी सुबह-सुबह नगरपालिका के कर्मचारियों को सफाई करते देखने का मौका उनकी कर्मठता को ही दर्शाता है..


मेरे रहने की जगह लाल लकीर में

कुछ बुरे अनुभव भी हुए हैं यहाँ मगर वह उन सारे अच्छे अनुभवों के सामने बहुत कम अनुपात में है.. वैसे भी बुरे अनुभव तो हर शहर के हैं, जहाँ कहीं मैं गया हूँ.. आजकल चेन्नई अपनी प्रसिद्द गर्मी के उफान पर है, ज्यों-ज्यों उमस वाली गर्मी बढती जा रही है, इसका नशा भी सर चढ़कर बोलने लगता है..



नोट : आज अचानक से इस वीडियो पर पहुँच गया, इसे देखते हुए जो ख्याल मन में आये उसे यहाँ लिख भी दिया..

Saturday, October 23, 2010

किस्सों में बंधा एक पात्र

हर बार घर से वापस आने का समय अजीब उहापोह लिए होता रहा है, इस बार भी कुछ अलग नहीं.. अंतर सिर्फ इतना की हर बार एक-दो दिन पहले ही सारे सामान तैयार रखता था आखिर में होने वाली हड़बड़ी से बचने के लिए, मगर अबकी सारा काम आखिरी दिन के लिए ही छोड़ दिया.. साढ़े बारह बजे के आस-पास घर से निकलना भी था और आठ साढ़े आठ से पहले मैं जग नहीं सकता ये भी पता.. कुल मिला कर मैं मानसिक तौर पर इस बात के लिए तैयार था कि कुछ ना कुछ मैं छोड़ कर ही आऊंगा..

"अब ये क्या है?" माँ कुछ दे रही थी, तीन-चार पन्नियों में अच्छे से जकड़ा हुआ एक पैकेट.. "काजू-किशमिश का पैकेट है.. तुम्हे अच्छा लगता है, और मुझे पता है कि तुम खरीदता नहीं है वहाँ.." यही कुछ जवाब आया.. पिछली दफे मैं हर ऐसे किसी पैकेट पर ऐतराज जताता रहता था जिसे मैं चेन्ना में आसानी से खरीद सकता हूँ, मगर अबकी मैं अन्य दिनों कि अपेक्षा चुपचाप सब रखे जा रहा हूँ.. अपना लगभग खाली सा बैग टटोलता हूँ, याद आता है कि आते समय पापा कि कई किताबें याद करके लेता आया था.. कुछ सामान भी था जैसे दीदी की साडी, बच्चों कि कुछ चीजें, एक अन्य मित्र के लिए कांचीपुरम की साडी.. अब बैग लगभग आधा से अधिक खाली है.. हाँ, जितनी किताबें लेकर आया था, लगभग उतनी ही पुनः लेते जाना है.. उसे कंधे पर टांगने वाले बैग में रख लूँगा.. इस बैग को कार्गो में भेजना है, जिसका वजन अधिक नहीं होना चाहिए.. वैसे भी किताबों का वजन कुछ अधिक ही होता है, चाहे दिमाग पर हो या कन्धों पर.. "बगल में एक डब्बा भी रखा हुआ है, उसे भी रख लो.." एक और संवाद, "अब क्या है इसमें?" "मखाना भूंज कर, पीस कर रखा हुआ है.. वहाँ ये नहीं मिलता होगा, खीर बना कर खाना.." मैं थोड़ी सी जगह बनाता हूँ और उसे भी रख लेता हूँ.. आलमीरा से एक शर्ट निकालता हूँ.. पास मौजूद हर चीज से कोई ना कोई किस्सा जुड़ा होता है, कई लोग अपना पात्र निभा चुके होते हैं उन किस्सों में.. उस शर्ट से भी जुड़े कुछ किस्से याद आते हैं.. कुछ-कुछ पुराने जमाने के सिनेमा कि तरह बैक्फ्लैश के कुछ सीन आँखों के सामने से गुजर कर थम जाता है.. कुछ साल पुराने किस्से.. वे किस्से जो आज भी मेरे भीतर कहीं पैठ जमाये हुए हैं, फिर से उस किस्से में अपना पात्र याद नहीं करना चाहता हूँ सो वापस रख देता हूँ..

नाश्ते के लिए पूछा जाता है, मैं मना कर देता हूँ.. कहता हूँ कि एक ही बार खाना खाकर एयरपोर्ट के लिए निकलूंगा.. वापस जाने का उद्देश्य सोचते हुए घर में टहलता हूँ.. पापा मम्मी के कमरे में जाता हूँ.. पापा नाश्ता करके नींद में हैं.. उनके बगल में लेट कर उनके गोद में समाने की असफल कोशिश करता हूँ.. याद आता है कि अब उनसे भी एक-दो इंच लंबा हो चुका हूँ, मगर उनके सामने जाता हूँ तो हमेशा मुझे वही पापा याद आते हैं जो बचपन में दिन भर मुझे गोद में उठाये घुमते थे.. कई किस्से आँखों के सामने घूम जाते हैं.. मुझे वह पापा याद आते हैं जिनके मातहत कर्मचारी उन्हें हम बच्चों के साथ हंसी-ठिठोली करते देख सदमे कि स्थिति में आ जाया करते थे, उन्होंने सपने में भी ये कभी नहीं सोचा था कि इतने कड़क साहब का यह रूप भी हो सकता है.. कुछ उससे पुराने किस्से भी नज़रों के सामने घूमने लगते हैं जब गाँव जाने पर भैया-दीदी कहीं और निकल जाते थे मगर मैं पापा या मम्मी को छोड़ कर कहीं नहीं जाता था और अब हालात कुछ ऐसे हैं कि पापा-मम्मी से सबसे अधिक समय तक अलग रहने का रिकार्ड सा बनाते हुए इतनी दूर फिर से निकल जाना है.. जीवन का लक्ष्य क्या है? क्या पैसे कमाना ही 'कुछ' या 'सब कुछ' है? कहीं मैं किसी मृगमरीचिका के पीछे तो नहीं भागा जा रहा हूँ? कहीं हम सभी किसी मृगमरीचिका के पीछे तो नहीं भाग रहे हैं? कुछ प्रश्न मन में आते हैं, जिनका कोई उत्तर ना पाकर मैं खीज उठता हूँ, और उन्हें नजरअंदाज ना करते हुए भी नजरअंदाज कर देता हूँ.. पापा को नींद में कसमसाते हुए देखकर उनकी गोद में समाने कि अपनी असफल कोशिशों को मुल्तवित कर देता हूँ.. धीरे से उनका हाथ लेकर अपने गाल पर रखता हूँ.. एक किस्सा फिर कहीं नज़रों के सामने घूमने लगता है.. बचपन में भैया के एक मित्र 'रॉबिन्सन हैम्ब्रम' जब पहली दफे हमारे चक्रधरपुर वाले घर में पापा से मिले थे तब बाद में आश्चर्य से बोले थे, "अंकल का हाथ कितना बड़ा है!!" मैं पापा का बायां हाथ अपने दाहिने हाथ में लेकर अपने हाथ से नापता हूँ.. कुछ मिलीमीटर का फर्क अब भी है, अंतर सिर्फ इतना है कि अब मेरा हाथ बड़ा है.. मैं धीरे से उनके हाथ को चूमता हूँ.. और रख देता हूँ..

बचपन में माँ कहती थी, "तुम खा लिए तो मेरा पेट भर गया.." मुझे आश्चर्य होता था.. अहा!! ये कैसा जादू है? जो मेरे खाने से माँ का पेट भर जाता है? मुझे महाभारत का वह किस्सा याद आता है जिसमें भगवान कृष्ण ने मात्र एक चावल के दाने से सभी ऋषि-मुनियों को तृप्त कर दिया था.. हकीकत का ध्यान बड़े होने पर ही आया.. "मिथकें भी भला कभी सच होती है क्या?" जिस दिन घर में पलाव बनता था उस दिन हम सभी भाई-बहन आपस में लड़ते थे माँ के साथ खाने के लिए, वो काजू-किशमिश चुन कर हम लोगों के लिए अलग रख देती थी.. कहती थी कि उन्हें अच्छा नहीं लगता है ये.. सच कहूँ तो मुझे आज भी नहीं पता कि माँ को खाने में क्या अच्छा लगता है? शायद पापा को पता हो.. मगर हमारी हर एक पसंद-नापसंद का ख्याल तब भी रखती थी, और आज भी रखती है.. अब जब हम भी ख्याल रखने के हालत में आ चुके हैं तब भी मुझे सिर्फ इतना ही पता है कि उन्हें 'वेनिला फ्लेवर' का आइसक्रीम बेहद पसंद है.. शायद भैया को इससे अधिक पता हो, उन्हें उनके साथ समय बिताने का अधिक मौके मिले हैं..

मैं वापस उस बड़े वाले हॉल में आता हूँ जिसमे मुझे हर चीज बड़ी-बड़ी दिखती है.. टीवी बड़ा.. सामने टंगे हुए फोटो बड़े-बड़े.. हम सभी की तस्वीर वह टंगी हुई है.. माँ भी बड़े वाले सोफे पर आराम से बैठी हुई है.. उनके पास जाता हूँ.. पास जाकर जमीन पर बैठ कर अपना सर उनके गोद में रख लेता हूँ.. माँ के हाथ को अपने गालों पर महसूस करता हूँ.. बचपन के किये एक जिद्द कि याद हो आती है.. कितना छोटा था, यह अब याद नहीं.. मगर यकीनन मैं बहुत ही अधिक छोटा रहा होऊंगा, क्योंकि बेहद धुंधली सी याद बाकी है.. माँ अपने घर के काम को लेकर हैरान-परेशान सी थी और मैं जिद्द पकड़े बैठा था कि खाना खाऊंगा तो माँ के गोद में ही बैठ कर.. मेरी वह जिद्द पूरी भी हुई, उनके सारे जरूरी कामों को छोड़कर.. उनके गर्भ में समाने कि इच्छा होती है, जिससे उनसे दूर ना जा सकूं.. चूंकि पता है कि यह एक असफल कोशिश ही होगी, सो कोशिश ही नहीं करता हूँ.. रोने कि असीम इच्छा होती है, मगर नहीं रोता हूँ.. यह एक कष्टप्रद स्थिति होती है जब आपको कुछ करने कि असीम इच्छा हो और आप ना कर पायें.. एक बेचैनी, छटपटाहट की धार भीतर ही कहीं घाव करती एवं कुरेदती रहती है.. समय देखता हूँ, समय होने ही जा रहा है.. धीरे से वहाँ से उठ जाता हूँ.. खाना लेता हूँ, खाता हूँ और निकल जाता हूँ मुस्कुराते हुए चेहरे के साथ.. मैं अपनी पहचान खोता जा रहा हूँ, जिंदगी एक नया पाठ सीखा रही है.. एक ओढ़ी हुई मुस्कराहट जो अब कभी-कभी लगता है मेरी नई पहचान ही बनती जा रही है..

इन सब बातों को बीते हुए लगभग डेढ़ महीना होने को आ रहा है.. देखिये मम्मी, घर से लाया काजू खत्म होने के बाद मैंने फिर खरीद लिया है.. रात के, नहीं-नहीं.. सुबह के साढ़े चार बजने जा रहे हैं.. मेरी माँ मुझसे नाराज है, पापा तटस्थ मुद्रा लिए हैं, और मैं बहुत उदास हूँ.. कारण बता कर दुनिया के सामने नंगा नहीं होना चाहता.. पापा-मम्मी, I Love You Too Much..

इस लेख से कमेन्ट का ऑप्शन स्वेच्छा से हटाया गया है..

Saturday, August 21, 2010

क्यों पार्टनर, आपकी पोलिटिक्स क्या है?

"Oh! So you are from Lalu's place?"

यह एक ऐसा जुमला है जो बिहार से बाहर निकलने पर जाने कितनी ही बार सुना हूँ.. मानो बिहार में लालू के अलावा और रहता ही ना हो.. वह चाहे कोई भी हो, उसे जैसे ही पता चलता है कि यह बन्दा उत्तर भारत से है तो स्वाभाविक तौर से वह पूछ बैठता है कि कहाँ से हो? उत्तर बिहार के रूप में जैसे ही मिलता है वैसे ही एक कटाक्ष के रूप में सुनने को वही मिलता है.. "Oh! So you are from Lalu's place?"

कम से कम नब्बे फ़ीसदी लोगों का कमेन्ट यही रहता है..

जब मूड ठीक होता है तो बस मुस्कुरा कर सहमति जता कर चल देता हूँ.. जब मूड थोड़ा खराब रहता है तो पलट कर पूछ लेता हूँ "जनाब, यह कहने का आपका मतलब क्या है?" और वह जबदस्ती का कोई तर्क देता है और अंत में कहता है, "Just Kidding buddy" जिसे सुनकर पहले तो मन में गालियाँ देता हूँ कि "अबे, तू मेरे ससुराल वालों में से हो क्या या लंगोटिया यार हो जो बिना परमिट के ही पहली मुलाकात में मजाक करने का अधिकार मिल गया?" फिर उसका कहा अनसुना करके निकल लेता हूँ.. मगर जब मूड बेहद खराब रहता है और इस सवाल से बुरी तरह इरिटेट हो चुका होऊं तो पलट कर मैं कटाक्ष कर देता हूँ "Partner, what is your politics?" अव्वल तो यह सवाल अमूमन उन्हें समझ में ही नहीं आता है, और सामने वाले को अगर यह सवाल समझ में आ गया तो वह इस सवाल से बुरी तरह अकचका जाता है, कि सामने वाला कहना क्या चाहता है? सवाल को नहीं समझने वाले से मैं कुछ कहता नहीं हूँ, समझाना भी नहीं चाहता हूँ.. जिन्हें समझ में आती है उनसे अगला सवाल दाग देता हूँ "Do you want to demoralize me with this question? Or do you want show off that look buddy, I am better than you. Because I am not from Lalu's place, I am from Jaya's or Karunanidhi's place and 'they are very neat and clean'."

अक्सर कुछ कुतर्क सुनने को मिल जाया करते हैं मगर मेरे इस सवाल का अभी तक 'उनसे' संतोषजनक जवाब नहीं मिला है..

माफ़ी चाहूँगा, मगर कुर्ग यात्रा अगले भाग में. :)

Thursday, June 17, 2010

बस ऐंवे ही कुछ भी

उसे पता था कि मेरा फोन रोमिंग पर है, मगर फिर भी हम फोन पर लगे हुये थे.. चलो, इस सरकार में चावल दाल की कीमते भले ही आसमान छू रही हों, मगर कम से कम मोबाईल बिल रोमिंग पर भी कम ही आता है.. शायद सरकार बातों से ही जनता का पेट भरने के चक्कर में हों.. उसने पूरे उत्साह से बताना शुरू किया कि मैंने तुम्हारा पोस्ट पढ़ा भी और कमेंट भी किया.. सच कहूं तो मुझे घोर आश्चर्य हुआ, क्योंकि उसे अगर देवनागरी में कुछ लंबा मेल भी लिख देता हूं तो उससे बात करने पर उसकी चिढ़न साफ महसूस होती है.. उसे कंप्यूटर स्क्रीन पर देवनागरी पढ़ना बिलकुल पसंद नहीं है..

सारी बात बताने के बाद लड़ना चालू, "ओये, वो पूरी मैंने बनाई थी.. तू कैसे लिख दिया कि तूने जो बनाई वही तो मैं खाऊंगी?" और मेरा कहना था "आटा शिवेंद्र साना, पूरी तुम बेली, और उसे तला मैंने.. फिर तुम कैसे सारा क्रेडिट लिए जा रही हो?" खैर थोड़ी ही देर में हम अपनी ही बात पर टिके ना रह कर हँसने-चिढाने लगे.. :)

पिछले गुरूवार को तमिलनाडु एक्सप्रेस में उसे बिठा आया.. अच्छी तरह देख-भाल लिया कि ट्रेन गई कि नहीं? जब ट्रेन निकल गई तभी संतुष्टी हुई कि हां अब वापस नहीं आने वाली है.. ;)

मैंने अब तक कई लेख स्वजनों पर लिख रखें हैं.. अगर ब्लॉग से इतर लोगों की बात की जाये तो शायद ही किसी ने ब्लॉग पर ही प्रतिउत्तर में अपनी बात कही हो.. अक्सर मित्रगण ई-पत्रों के द्वारा अपने मन की बात कहते हैं, कई दफ़े वह भी नहीं.. मैं वैसे भी जिसके बारे में लिखता हूं, उनसे प्रतिउत्तर की उम्मीद नहीं रखता हूं.. अक्सर कई दफ़े मैं बताता भी नहीं हूं कि आपके बारे में कुछ लिखा है.. मगर चूंकि मैं यहाँ इसकी एक तस्वीर लगाना चाह रहा था, सो इससे पूछा कि लगाऊं कि नहीं, और इसे पता चल गया कि इसके बारे में कुछ लिखा गया है.. :) साथ ही साथ इसका एक कमेन्ट भी मिल गया..

इसने लिखा था :

इस सलीके से जिंदगी का तार बुना है
हर शहर से मसरूफियत का अलंकार जुड़ा है
नये लोगों को दोस्त बनाने मे होती है जो कशमकश
हर शहर के रास ना आने में छिपी वो वजह है

शायद अपनी बात ठीक से कह नहीं पायी मैं यहाँ...पर बताने का प्रयास जरूर करुँगी..मैं हिंदी ब्लॉग नहीं पढ़ती और प्रशान्त ये बहुत अच्छे से जानते हो तुम..पर मेरे बारे में क्या लिखे हो ये Thought थोडा Motivating था मेरे लिए...
बहुत कम शब्दों में पूरा मर्म कह दिया तुमने....
अपने परिवार, अपने दोस्त, अपने शहर से बाहर आने में तकलीफ होती है और कुछ भी नया अपनाने में विरोध होता है...वही विरोध झलकता है किसी नए शहर को कोसने में....पर विरोध में भी एक जुड़ाव है और वही जुड़ाव उस जगह से दूर जाने पर दिखता है..
मुझे तो ये फिकर है कि चेन्नई को कोस नहीं पाउंगी अब.. :-P पर तसल्ली के लिए एक नया शहर मिल गया है बैंगलोर....
बहुत अच्छी पोस्ट है तुम्हारी....या मुझे इसलिए पसंद आई क्योंकि मेरे बारे में थी???


अब मुझे मुक्ता से यह कहना है कि वह पोस्ट मैंने अच्छी लिखी थी या नहीं यह मेरे पाठकों पर ही छोड़ दिया जाए, तो अच्छा होगा.. तुम या मैं शायद निष्पक्ष होकर नहीं बता पायेंगे कि कैसी लिखी गई थी.. मगर तुम्हे कवितागिरी का क्या शौक चर्रा गया यार? I am either totally confused or surprised.. मुझे भी नहीं पता.. :D

वैसे यह बात सही कही तुमने दोस्त कि नई चीजें स्वीकार करने में मन में अक्सर एक विरोध होता है, और वही विरोध झलकता है किसी नए शहर को कोसने में.. मगर यह सच्चाई भी है कि परिवर्तन ही संसार का नियम भी है.. खैर मैं भी क्या दर्शन बांटने लग गया हूँ.. अच्छे से कोसना नए शहर को.. :)

नोट : मेरे विचार से आज कि यह पोस्ट घोर ब्लोगरिय पोस्ट है.. :D

वैसे अगर आप इस पोस्ट को पढेंगे तभी इस पोस्ट का मुआमला कुछ-कुछ समझ में आएगा.. :)

Friday, June 04, 2010

ब्लाह..ब्लाह..ब्लाह..

"मैं बहुत कम बोलती हूं ना, सो कभी-कभी बहुत दिक्कत हो जाती है.." पिछले दस मिनट से लगातार बोलते रहने के बाद एक लम्बा पॉज देते हुये वो बोली..

कुछ दिनों से लग रहा है कि हिंदीभाषी अब धीरे-धीरे बढ़ते जा रहे हैं मेरी कंपनी में, आज से तीन साल से तुलना करने पर उत्तर भारत के अधिक लोग दिखाई पड़ते हैं अब..

"मुझे यहां कोई हेल्प नहीं किया, जो कुछ अभी आता है वो सब खुद से ही करके सीखे हैं.. अरे, मैं भी कैसी हूं ना! तभी से खा रही हूं और आपसे पूछा भी नहीं.. मेरे बगल में बैठती है ना, क्या नाम है उसका? हां *******.. अभी परसों कुछ पूछे तो डांट दी.. मुझे रोना आ गया.. अब आप ही बताईये, आपसे कोई पूछता है तो आप उसे डांट दोगे क्या? आता है तो बता दो, आपका क्या जाता है.. नहीं आता है तो वही बोल दो.. और अगर टाईम नहीं है तो यही बोल दो.. डांटने कि क्या जरूरत है? अरे ये गट्टा आपको कैसा लगा? मम्मा बनाई है.. बहुत अच्छा बनाई है.. चावल का है, बेसन का नहीं.."

वो लगातार बोले जा रही थी.. पिछले तीन महिने से वो मेरे ही प्रोजेक्ट में मगर एक दूसरी टीम में एज अ ट्रेनी ज्वाईन की है.. हर दिन दोपहर साढ़े तीन बजे के लगभग मैं कैंटीन में जूस पीने जाता हूं, आज वह थोड़ी देर से खाना खाने आयी थी तो मुलाकात हो गई.. अमूमन इस समय कोई कैंटीन में होता नहीं है, मेरे इसी समय जाने कि असल वजह थोड़ी देर अकेले बैठने की ख्वाहिश होती है और उस समय पापाजी को अक्सर फोन भी किया करता हूं.. उसने साथ बैठने का ऑफर दिया तो मैंने मना नहीं किया.. पहली बार गौर से देख भी रहा था.. अगर दूरदर्शन के गुमशुदा तलाश केंद्र वाले उसके बारे मे बताते तो वह कुछ ऐसा होता - "कद पांच फुट दो इंच, रंग गेहुवा और चेहरा गोल है, दायें आंख के ऊपर कटे का निशान है.." :D

"मेरे साथ सबसे बड़ी प्रोब्लेम ये है कि मुझे जो आता है वो मैं समझ सकती हूं, मगर दूसरे को समझा नहीं सकती हूं.." अब अगर किसी दूसरे कि बातें अपनी सी लगती है तो आश्चर्य नहीं होता.. अब लगता है कि हर कोई किसी ना किसी मायने में हर किसी सा ही होता है.. "बचपन से चेन्नई में हूं मगर तमिल में परफेक्शन अभी तक आया नहीं है.. और चाहे कुछ भी, मगर अपने लोगों का एक्सेंट इनसे अलग होता है, सो कई बातें कहना कुछ और चाहते हैं और ये समझते कुछ और हैं.." हम्म्म!! ये भी अपना भोगा सत्य है.. मगर तीन साल में ही इससे मुझे निजात मिल गई है.. यह तो बचपन से है, अभी तक अपना एक्सेंट बदल नहीं पायी है.. हद्द है भाई.. "मुझे यहां काम करने में बिलकुल मन नहीं लगता है, मुझे जो टेक्नोलोजी पसंद है उस पर काम नहीं करा के मुझे विजुअल बेसिक पर काम दे रखा है.. मुझे जावा पसंद है.." यह कौन सी नई बात है.. यहां तो हर दुसरे प्रोजेक्ट में जाने पर एक नई टेक्नोलोजी पर काम करना पड़ता है.. मगर सोचने कि रफ़्तार बढती ही जा रही थी, वैसे भी अगर आप बोल नहीं होते हैं तो कुछ सोच रहे होते हैं..

वहां से उठने से पहले मैंने उसे सिर्फ इतना ही कहा कि अगर कोई भी डांटे तो उसी समय उसे बोल दो कि "यू शुड नॉट टॉक विथ मी लाईक दिस. इफ यू हैव एनी प्रोब्लेम देन गो थ्रू प्रोपर चैनल..".. "ओह!! ऐसा होता है क्या?".. "हां! कोई ऐसे ही किसी को नहीं डांट सकता है.. चाहे कोई भी हो, CEO ही सही.. कम से कम इस कंपनी में तो ऐसा ही है.."

अभी कुछ दिनों पहले मेरा एक मित्र भी कुछ ऐसे ही सवाल पूछ रहा था और शिकायत कर रहा था कि कोई मदद भी नहीं करता है.. शुरूवात में मेरी भी यही समस्या थी.. अब लगता है कि मैं इन सबसे ऊपर उठ चुका हूं.. ;)

जिस तरह से लगातार बोले जा रही थी, उससे तो मैं इसी बात पर खुश हूं कि मुझे इस तरीके का कोई सवाल नहीं पूछना पड़ा कि "हां बसंती, तुम्हारा नाम क्या है?" :D

Tuesday, June 01, 2010

एक शहर, मसरूफियत और जिंदगी

अब उसका यहाँ चेन्नई से जाना लगभग तय हो चुका है.. एक तरह का काउंटडाउन चल रहा है.. कल तक जब उसका जाना तय नहीं था तब वह हर दूसरे-तीसरे दिन चेन्नई को कोसती हुई मिलती थी.. और किसी तरह यहाँ से भागने कि इच्छा जताती रहती थी.. दफ्तर में वर्क प्रेसर भी सामान्य से कुछ अधिक ही था उसे, ऊपर से अपने टीम के भीतर की राजनीति में भी बुरी तरह पिसी हुई थी.. कुल मिलाकर माहौल कुछ ऐसा बन भी चुका था कि कोई भी वह शहर ही छोड़ कर भागने को छटपटाने लगे..

जिसके बारे में बता रहा हूँ उसका नाम मुक्ता है..

कल मैंने उसे अपने घर खाने पर बुलाया था, और एक अरसे बाद कई घंटे बैठ कर बातें हुई.. जिंदगी मुसलसल कुछ इस तरह उलझा देती है कि एक ही शहर में रहते हुए भी मसरूफियत में मिलने का ख्याल भी नहीं आ पाता है.. उसका कहना था कि जमाने बाद पूरी खा रही है(मैंने जो बनाया था, वही तो खायेगी न :))..

इससे दोस्ती भी अजीब तरीके से हुई.. यह मेरी कालेज के मित्र कि मित्र है, और जब TCS वालों ने इसकी पोस्टिंग चेन्नई दे दी तब मेरी मित्र की मित्र ने इसे मेरा नंबर देते हुए कहा की "प्रशान्त चेन्नई में है, और उससे जो भी मदद करने को कहोगी, वह कर देगा".. अब मैंने कितनी मदद की, इसका हिसाब तो इसे ही बैठाने दिया जाए..

यह कई दिनों से चेन्नई से बाहर जाने कि जुगत में लगी हुई थी, मगर TCS के भीतर ही.. यह प्रयास कर रही थी Relocation का.. पहले इसके जाने का दिन भी तय हो गया था.. मगर फिर अचानक से इसे कहा गया कि चाहे कुछ भी हो, छः महीने से पहले टीम से Release नहीं किया जा सकता है.. ठीक उसी समय इसे Wipro में नई नौकरी मिल गई और आनन-फानन में Resign मार कर निकल गई वहां से..

अब जब इसके जाने के दिन पास आ गए हैं तब इसकी बातों में चेन्नई को लेकर कोई कसक नहीं दिख रही थी, उल्टा कहीं ना कहीं इस शहर से एक लगाव सा भी झलक रहा था.. इसका कहना था, "इस शहर ने मुझे बहुत कुछ सिखाया है.. कम से कम एक इंसान के कई चेहरे के दर्शन मुझे चेन्नई में ही हुए".. मेरा मानना है कि अगर हालात बहुत कठिन हों तो आपको कई बातें अपने आप ही सिखने को भी मिल जाती है..

चेन्नई शहर में रहते हुए भी पहले साल में सिर्फ एक बार इससे मिला था.. अगर दूसरे साल कि बात याद करूँ तो इससे हुए मुलाक़ात को भी अँगुलियों पर गिन सकता हूँ.. मगर हाँ, पिछले छः महीने में इससे मिलने कि रफ़्तार में कुछ तेजी आई थी.. अकेलेपन कि कुछ साथियों में इसका नाम भी शुमार कर सकता हूँ.. जब यह चेन्नई में ही थी तब भी कम ही मिलता था.. हम दोनों कि ही अपनी व्यस्तताएं थी.. अब भी कम ही मिलूँगा.. मगर एक-एक करके साथियों का चेन्नई छोड़ कर जाना अखर रहा है..

यह जब परेशान थी तब मैं चाहता था कि इसे कोई नई नौकरी मिल ही जाए चेन्नई से बाहर, जिस दिन इसे नौकरी मिली उस दिन मैं भी खुश था कि चलो इसे टेंशन से छुटकारा तो मिला.. मगर जैसे-जैसे इसके जाने के दिन आ रहे हैं, वैसे-वैसे कुछ अच्छा नहीं लग रहा है.. कम से कम एक तसल्ली तो है कि अधिक दूर नहीं है, बैंगलोर में ही तो रहेगी.. फिलहाल तो चेन्नई में एक और साथी कि कमी महसूस होगी..

इस चित्र में - यह चित्र इसके फेसबुक के प्रोफाइल से लिया हूँ मैं..

मुझे पता है कि यहाँ "मसरूफियत" कि स्पेलिंग सही नहीं है, क्या कोई मुझे बताएँगे कि सही क्या है?

Monday, October 19, 2009

दिवाली की रात मेरे घर में भूतों का हंगामा


इसमें मैं यह नहीं लिखूंगा की दिवाली की रात हमने कैसे दिये जलाये? क्या-क्या पकाया? और कितने पटाखे जलाये.. ये सब तो लगभग सभी किये होंगे.. मगर दिवाली कि रात कुछ हटकर अलग सा कुछ हो तभी तो मजा है, और वो भी अनायास हो तो सोने पे सुहागा.. तो चलिये सीधे किस्से पर आते हैं..

दिवाली मनाने के बाद हम सभी मित्र खाना खाकर सोने चले गये.. मेरा एक मित्र(नाम नहीं बताऊंगा नहीं तो बाद में बहुत गरियायेगा) :) मेरे घर पर ही रात में रोक लिया गया और उसके लिये बिस्तर मैंने अपने बगल ही लगा दिया.. लगभग रात साढ़े बारह बजे तक हम दोनों टी.वी. देखते रहे और कुछ बाते करते रहे, इस बीच मेरे बाकी दो मित्र सो चुके थे.. एक बजे तक हम दोनों भी सो गये..

मैं गहरी नींद में था तभी अचानक से मुझे अजीब तरीके से किसी के चीखने की आवाज आई, जैसे कोई चुड़ैल चिल्ला रही हो.. कम से कम वह किसी इंसान के चीखने की आवाज तो नहीं थी(नींद में तो ऐसा ही लग रहा था).. उसी समय मैंने एक हाथ अपने गले पर पाया.. अब तक मेरी नींद नहीं खुली थी और मैं काफी हद तक डर गया था और डर के मारे चिल्लाने लगा.. तभी एक भारी सी चीज मेरे ऊपर कूद पड़ी.. अब तक मेरी हालत खराब हो चुकी थी.. एक तो कोई अजीब तरीके से चिल्ला रहा था.. दूसरा मेरे गले को पकड़ने की कोशिश में था.. तीसरा कोई मेरे ऊपर कूद भी रहा था जिसका वजन कम से कम 2-3 किलो रहा होगा..

डर के मारे मैं भी चिल्लाने लगा और हाथ इधर-उधर फेंकने लगा.. मेरे हाथ में किसी के सर का बाल आ गया और मैंने उसे जोड़ से पकर कर खींचने लगा.. यह तमाशा लगभग एक मिनट तक चला और तब तक मेरी और मेरे मित्र की नींद भी खुल गई.. हम दोनों ही अकबका कर उठ बैठे थे और अंधेरे में ही कुछ देखने की कोशिश कर रहे थे.. तब तक मेरे बाकी दो मित्र जो दूसरे कमरे में सो रहे थे वो दोनों भी हमारे दरवाजे पर आकर खड़े हो गये थे और बत्ती जला चुके थे..

तब जाकर सारा माजरा समझ में आया.. मेरा मित्र जो मेरे बगल में सोया हुआ था वह नींद में कोई सपना देखकर डर गया था और चिल्ला पड़ा था.. साथ ही उसने मेरा हाथ पकड़ना चाहा तो मेरी गरदन उसके हाथ में आ गई थी.. इसी बीच एक बिल्ली, जो मेरे कमरे में घूम रही थी, इस हंगामे से डरकर भागना चाही और मेरे ऊपर ही कूद गई.. उसके कूदने से मैं भी डरकर चिल्लाने लगा और इसी बीच मेरे हाथ में मेरे मित्र के सर का बाल आ गया.. अब हम दोनों चिल्ला रहे थे और वो मेरा गला पकड़ कर हिला रहा था और मैं उसके सर का बाल पकड़ कर खींच रहा था.. और हमारे बाकी दोनों मित्र हंसे जा रहे हैं..

खैर नींद टूटने से सारा माजरा तो समझ में आ गया, मगर दिवाली की रात फिर हम दोनों सो नहीं सके.. मेरा मित्र उस सपने से बहुत डरा हुआ था.. और मैं डरा हुआ था कि कहीं ये नींद में फिर से मेरा गला ना दबाने लग जाये ;).. साथ ही एक ने रसोई की बत्ती जला दी, और उस रोशनी से भी मुझे नींद नहीं आ रही थी.. :)

Monday, June 29, 2009

15 रूपये कि एक मुस्कुराहट और ट्रैफिक सिग्नल

अपने ऑफिस के बाहर वाले पार्किंग में खड़ा मैं फोन पर किसी से बातें कर रहा था.. तभी नीचे से कुछ आवाज आई.. मैंने देखा तो पाया की एक 3-4 साल की बच्ची थी और उसके गोद में भी एक 5-6 महिने का बच्चा था.. मैंने उसे भीख मांगने वाली समझ उसे इसारे से मना किया, कि मैं कुछ भी नहीं दूंगा.. उसने कहा, "अन्ना, नो मनी.." मैं फोन पर भी बातें कर रहा था, सो उसकी बात समझने में थोड़ा समय भी लगा और जब तक समझ में आता तब तक वो वहां से भाग गई..

मुझे कुछ समझ में नहीं आया कि वो बच्ची चाह क्या रही थी? फोन पर ही बातें करते हुये मैंने देखा कि वह वहां खड़े लगभग हर किसी से तमिल में कुछ कह रही थी और सभी उसकी बात सुनकर या तो अनसुना कर रहे थे या फिर उसकी हंसी तमिल में ही कुछ कह कर उड़ा रहे थे..

पहली नजर में मुझे लगा कि उस बच्ची को भूख लगी है.. वहीं एक चाय वाला भी बैठता है जो कटिंग वाली चाय के साथ बिस्किट और ब्रेड भी रखता है.. मैंने उसे अपने पास बुला कर अंग्रेजी में उसे समझाने की कोशिश की, और बोला कि तुम्हे जो चाहिये वो ले लो.. मगर वो वहां से भी भाग गई..

मुझे कुछ समझ में नहीं आया कि ये इस तरह से क्यों कर रही है.. एक छटपटाहट उसके चेहरे पर साफ झलक रही थी, और कारण मेरी समझ से बाहर थी.. तमिल ना आने का अपह्सोस मुझे शायद सबसे ज्यादा उसी समय हो रहा था.. तभी मैंने देखा कि चाय वाला उसे डांटते हुये कुछ बोल रहा था, टूटी-फूटी तमिल में मैं इतना समझ गया कि वह बच्ची चाह क्या रही थी..

वहीं पार्किंग के पास एक आईसक्रीम वाला भी था, और वह किसी भी तरह एक आईसक्रीम खाना चाह रही थी.. उस चाय वाले की बात मुझे यह समझ में आयी थी कि वह कटाक्ष करते हुये बोल रहा था जिसको हिन्दी में हम कुछ ऐसे कहते हैं, "अपनी औकात देखी हो, आईसक्रीम खाना चाह रही हो.. भागो यहा से और मेरे कस्टमर को परेशान मत करो.."

उसे मैंने अपने पास बुलाया, मगर वह नहीं आयी.. शायद डर गई थी.. आईसक्रीम वाले के पास जाकर मैंने उसे बुलाया तो वह झट से मेरे पास चली आयी.. मैंने आईसक्रीम वाले को बोला कि इसे जो भी आईसक्रीम चाहिये इसे दे दो.. वो आईसक्रीम वाला मुझे ऐसे देखा जैसे मैं पागल हो गया हूं.. मैंने फिर से उसे कहा तो वह चुपचाप उस बच्ची से पूछकर उसे आईसक्रीम दे दिया..

उस बच्ची के चेहरे पर अपार संतोष का भाव साफ दिख रहा था.. मैंने फिर एक अद्भुत बात देखी, वह बच्ची धीरे-धीरे करके सारा आईसक्रीम अपने गोद वाले उस छोटे बच्चे को खिला दी जिसे आईसक्रीम क्या होता है इसकी समझ भी ना होगी.. खुद उसे चखी भी नहीं..

जाने क्यों मुझे अपनी दीदी की बड़ी बेटी याद आ गई, जो कमोबेश उसी कि उमर की होगी.. जो आईसक्रीम के लिये अपना मुंह भी खोलती है तो 1 किलो वाला आईसक्रीम का पैकेट घर में आ जाता है.. अभाव क्या होता है वह उसे पता भी नहीं, दुनियादारी तो दूर की बात है..

एक डर सा लगने लगा.. इंडिया जगमगा रहा है, मगर भारत अपनी गरीबी पर रो रहा है.. तभी ट्रैफिक के शोर ने मेरा ध्यान अपनी ओर खींचा.. पास वाले सिग्नल की लाल बत्ती जगमगा रही थी.. मैंने देखा कि वह बच्ची अपने गोद वाले बच्चे को लेकर सिग्नल की ओर जा रही है.. आगे देखना शायद मुझे अच्छा नहीं लगता, सो मैं वापस अपने ऑफिस के अंदर चला आया..

Friday, June 12, 2009

मेरे घर के आगे एक रंगोली

नये घर में शिफ्ट हुये एक महिना बीत चुका है.. तो महिने का किराया देने का भी समय आ गया था.. 50 रूपये बरामदा साफ करने वाले को भी देना था.. हमारा कहना था कि महिना में एक दिन भी उसने आकर साफ सफाई नहीं की है तो हम 50 रूपये क्यों दें? तो बस उसी दिन सफाई करने वाली आयी और उसने बरामदा साफ करके दरवाजे पर रंगोली भी बना गई.. ये उसी रंगोली कि तस्वीर है..



इस तरह कि रंगोली आप दक्षिण भारत के लगभग हर घर के आगे सुबह-सुबह देख सकते हैं.. वैसे मेरे दोस्तों का कहना था कि वह 50 रूपया हम प्रशान्त को दे देते हैं, आखिर उसी ने तो महिने भर बरामदे कि सफाई की है.. ;)

Tuesday, June 09, 2009

दीवानगी ऐसी कि परदे पर भगवान देख रहे हों

कुछ दिन पहले मेरे इस लेख को अजय जी ने इसे अपने चवन्नी छाप नामक ब्लौग में स्थान दिया था.. मगर मेरे कुछ मित्र जो चवन्नी छाप ब्लौग नहीं पढ़ते हैं, उनके लिये मैं इसे अपने ब्लौग पर भी पोस्ट कर रहा हूं..
अजय जी को धन्यवाद सहित..



यूं तो तमिलनाडु जुलाई सन 2004 में आया था.. मन में कई बातें लेकर जैसे वहां तमिल वालों के बीच रहने में दिक्कत होगी, भाषाओं के बीच के अंतर्द्वंद को झेलना होगा.. मगर यहां आकर ऐसा कुछ नहीं लगा क्योंकि सभी मित्र उत्तर भारत के ही थे.. इसका एक तरफ फायदा हुआ तो वहीं दूसरी ओर घाटा भी हुआ.. यहां की संस्कॄति को भी ठीक से समझ नहीं पाया..

सिनेमा के मामले में भी कुछ हद तक यही हाल रहा.. दक्षिण में होते हुए भी यहां के सिनेमा कल्चर से कोसों दूर रहा.. बस गीत संगीत सुनता था, वो भी इसलिये क्योंकि होस्टल में रहते हुए कभी-कभार यहां के गीत किसी कमरे से पूरी आवाज में सुनाई दे जाता था.. शुरूआत में कुछ तमिल गाने भी खूब सुने,जिनमें अधिकतर तमिल से हिंदी में डब किये हुए गीतों के ओरिजिनल साउंड ट्रैक होते थे या फिर धूम-धड़ाके वाले गीत.. अब चूंकि तमिल समझ में आती तो थी नहीं सो संगीत पर ही सब कुछ टिका हुआ था.. ये कुछ ऐसा ही है जैसे अधिकतर छोटे शहरों में रहने वाले भारतीय वेंगाब्वाज को सुनना पसंद करते हैं, मैं भी अपवाद नहीं हूं इनमें.. यहां आकर ये भी जाना कि हिमेश रेशमिया यहां के लोगों का सबसे प्रिय संगीतकार है, कुछ-कुछ उसकी वजह भी वही धूम धड़ाका है..

फिर जनवरी 2007 में चेन्नई आ गया अपने अंतिम सेमेस्टर के प्रोजेक्ट के लिये.. मेरे साथ मेरा मित्र शिवेन्द्र भी था.. यहां आकर भी यहां हम नहीं होते थे.. क्योंकि लगभग हर साप्ताहांत पर हम वापस वेल्लोर, अपने कॉलेज को निकल लेते थे और पूरे सप्ताह भर घर से ऑफिस और ऑफिस से घर मे ही निकल जाता था.. छः महीने फिर से ऐसे ही निकल गये, मगर इस बार के छः महीने में कुछ तमिल मित्र बनाने का मौका मिला.. वे लोग भी अपना अंतिम सेमेस्टर का प्रोजेक्ट पूरा करने के लिये यहां आये थे.. उनसे कुछ तमिल सिनेमा की जानकारी भी मिली.. मगर कुछ ऐसा नहीं जिसका उल्लेख किया जा सके..

दोबारा चेन्नई आना हुआ 2007 जून में, जब नौकरी ज्वाइन करने के लिये बुलाया गया.. संयोग कुछ ऐसा कि जिस दिन मुझे ज्वाइन करना था उसी दिन रजनीकांत का "शिवाजी द बॉस" रिलीज हो रही थी.. सुबह-सुबह जल्दी जाना था सो कुछ पता नहीं चला, मगर जहां हमारा स्वागत समारोह रखा गया था वहीं एक मित्र ने बताया कि वो इस सिनेमा को किसी भी हालत में जल्दी देखना चाहता था मगर अगले एक महीने तक की सभी टिकटें बुक हो चुकी है.. सो वो रात के 1 से 4 का शो देखकर सुबह सात बजे यहां पहुंच रहा है.. वो तारीख कभी नहीं भूल सकता हूं, आखिर पहली नौकरी का पहला दिन जो था.. :) वो 15 जून था.. उस दिन शाम में घर लौटते समय देखा कि घर के पास बहुत भीड़ थी, लोग लम्बी-लम्बी कतारों में खड़े थे.. थोड़ी देर बाद समझ में आया कि मेरे घर के ही पास में एक सिनेमा हॉल है और वहां शिवाजी द बॉस देखने के लिये इतनी भीड़ है.. मैंने सोचा कि ज्यादा से ज्यादा एक हफ्ते रहेगी ये भीड़, मगर नहीं बिलकुल उतनी ही भीड़ अगले दो महीने से भी ज्यादा दिनों तक रही.. तब जाकर समझ में आया कि रजनीकांत क्या चीज है तमिलनाडु के लिये..

चेन्नई में रहते हुए कुछ दिन होने के बाद मुझे पता चला कि मेरे घर के पास ही एक फिल्म स्टूडियो भी है, जिसका नाम ए.वी.एम. स्टूडियो है.. अब जबकि चेन्नई में ही हूं तो एक बार मुझे शिवाजी द बॉस भी देखने का मौका मिला और तब जाकर पता चला कि ये सिनेमा भी ए.वी.एम. स्टूडियो में ही बना है.. कुछ तमिल मित्रों से छानबीन की तो ये भी पता चला कि दूर-दराज के देहाती इलाकों से आने वाले लोगो चेन्नई आते हैं वो एक बार जरूर ए.वी.एम. स्टूडियो देखने की चाहत रखते हैं..

यहां दक्षिण भारत आकर मैंने जो सबसे पहला सिनेमा देखा उसका नाम था "अनियन", जिसे बहुत बाद में हिंदी में भी डब करके लाया गया था "अपरिचित" के नाम से.. उस समय के मुताबिक मुझे वह एक अच्छी एक्शन फिल्‍म लगी थी.. मगर वही बाद में जब हिंदी में आया तब वही सिनेमा मैं हिंदी में एक बार भी पूरा नहीं देख पाया था.. दूसरी तमिल फिल्‍म जो मैंने देखी थी उसकी छाप मेरे मन पर अभी तक है.. उसका नाम था "गिली".. किसी भी फार्मूला सिनेमा में जो कुछ भी हो सकता है, वह सभी कुछ उसमें था.. एक अच्छी और मशालेदार कहानी.. शानदार एक्शन, जिसके अंत में तमिल स्टाइल का एक्शन भी देखने को मिला(अरे वही, एक घूसा लगने पर हवा में चार-पांच बार गोते खाना.. :)) शानदार गाने(उत्तर भारतियों को गिली के गाने अच्छे लगने के पीछे इसका तेज म्यूजिक है और साथ ही एक और कारण होता है वह है उदित नारायण की आवाज..) यहां तक कि अभी भी कोई मुझे कोई तमिल गाना गाने को कहता है तो इसी सिनेमा का एक गीत "अप्पड़ी पोड़े, पोड़े" ही मुंह से निकलता है.. मुझसे मेरे कई तमिल मित्र यह भी शिकायत कर चुके हैं कि तुम सभी उत्तर भारतीयों से कोई भी तमिल गीत गाने को कहो तो यही गीत गाते हो.. :) "गिली" की सबसे बड़ी खूबी यह थी कि इसमें तेजी बहुत अधिक थी और डायरेक्शन पर बहुत अच्छे से काम किया गया था..

यहां लोगों कि दीवानगी सिनेमा के प्रति कुछ ऐसी है जैसे वे भगवान का ही एक रूप हों.. जैसा वो परदे पर अपने भगवान को ही देख रहें हों.. ऐसी दीवानगी हमें उत्तर भारत में शायद ही देखने को मिले..

Saturday, June 06, 2009

ना फुरसतिया जी को फुरसत, और ना मुझे

फुरसतिया जी चेन्नई आये और चले गये.. लगभग 7 दिन पहले अनूप जी का फोन आया और वो अपने चिर-परिचित अंदाज में बोले, "पीडी, मैं ये देखने चेन्नई आ रहा हूं कि सच में तुम्हारा पैर टूटा है या बस नाटक कर रहे हो?" मैंने तुरत फुरत में कारण जानना चाहा, फुरसतिया जी को चाहे कितनी भी फुरसत हो मगर इतनी दूर चेन्नई बस फुरसत के पल बिताने के लिये आने से तो रहे..

खैर, उन्होंने भी उत्तर देने कि औपचारिकता निभाते हुये तुरत कहा कि बेटे का काऊंसेलिंग है, उसी के लिये आ रहा हूं.. अगला प्रश्न भी तैयार था, "किस कॉलेज में?"
"कोई वी.आई.टी. करके कॉलेज है."

अब मुझे तो पता नहीं कि बांछें कहां होती है, मगर जहां भी होती है वो वहीं पर खिल गई.. आखिर खिलती भी क्यों ना? आखिर मेरे ही कॉलेज में वो अपने बेटे को प्रवेश दिलाने ले जा रहे थे.. अब जल्दी से मैंने उनका प्लान पूछा और उनका सारा प्लान जानने के बाद वो बांछे जैसे खिली थी वैसे ही मुरझा भी गई.. क्योंकि उनका सारा प्लान सप्ताह के कार्य दिवस के बीच ही था.. मतलब मुझे दिन भर फुरसत नहीं और अगर रात में भी जल्दी निकलना हो तो अपने बॉस को कई तरह के तर्क देना..

खैर अनूप जी(अरे वही फुरसतिया) अपने बेटे के साथ 2 जून को चेन्नई आये और अगले ही दिन वेल्लोर के लिये निकल लिये.. दिन भर वहां व्यस्त रहने के बाद शाम में वापस आये, उनके बेटे को वहां प्रवेश भी मिल गया और मेरे मुताबिक वी.आई.टी. के कुछ अच्छे ब्रांचों में से एक ब्रांच भी मिल गया..

अब 4 जून भी आ गया, जिस दिन उन्हें जाना था, और 4 कि शाम जल्दी ऑफिस से निकलने के चक्कर में 3 को देर रात तक काम भी करना पड़ा.. "देखिये फुरसतिया जी, केतना कष्ट उठवायें हैं आप हमको.. :)" अब 4 को दिन भर वह क्या किये यह आप उनसे ही जाकर पूछिये.. हम तो उसके आगे का हाल सुनाते हैं..

संयोग से मेरे गुरू जी(अरे वही, बॉस) को हैदराबाद जाना था सो वो जल्दी निकल लिये.. अब मेरे लिये शाम 7.30 मे ऑफिस से निकलना थोड़ा आसान हो गया.. हम निकलने से पहले पूछे, "कहां हैं आप और कहां मिलना है?"
"हां पीडी, तुम एक काम करो.. बॉम्बे हलवा सेंटर पर आ जाओ.." जैसे वो फोन पर बोलते हैं, बिलकुल उसी स्टाईल में लिखे हैं.. ;)
उन्होंने कहने को तो कह दिया कि बॉम्बे हलवा सेंटर पर आ जाओ, मगर हमें यह भी तो पता होना चाहिये कि यह है कहां? वैसे फुरसतिया जी इतना कांफिडेंट होकर बोके थे कि हमें लगा बहुत फेमस जगह होगी, जिसके बारे में फुरसतिया जी को पता है मगर मुझे चेन्नई में रहते हुये भी नहीं पता.. उनके बताने के तरीके से तो ऐसा लग रहा था कि वह हलवा सेंटर मेरे घर के नुक्कड़ पर ही है, और मैं ऐसे ही आ जाऊंगा.. :D अब हमने अपने कुछ उन दोस्तों से उसका पता पूछा जो चेन्नई में ही पैदा हुये हैं और यहीं मरने कि तमन्ना भी रखते हैं.. मगर नतिजा सिफ़र.. किसी को कुछ भी नहीं पता..

सो फिर से मैंने फोन लगाया, और पूछा कि यह है कहां? उन्होंने अपने मित्र से पूछ कर बताया कि ईगा थियेटर के पास है.. चलो कम से कम ईगा थियेटर को चेन्नई में रहने वाला लगभग हर उत्तर भारतीय जानता है, कारण यह चेन्नई के उन चंद सिनेमा हॉल में से है जहां हिंदी सिनेमा लगता है..

मैं सोचने लगा, अब वहां कैसे जाऊं? अगर सार्टकट से जाता हूं तो ट्रैफिक बहुत मिलेगा.. सो थोड़ा लौंग कट ही मारा जाये.. ट्रैफिक थोड़ा कम मिलेगा.. अब मैंने पूरा माऊंट रोड(चेन्नई का लाईफ लाईन कह सकते हैं जैसे दिल्ली में रिंग रोड) घूम कर पूनामल्ली हाई रोड पकड़ा और ईगा थियेटर पहूंचकर फिर से फोन लगाया.. अब पता चला कि हम जिस ओर से आ रहे हैं उसी तरफ ईगा थियेटर से 2-3 किलोमीटर आगे है.. हमने यू टर्न मारा और सीधा बॉम्बे हलवा हाऊस(असली नाम बॉम्बे हलवा सेंटर नहीं, बॉम्बे हलवा हाऊस है) जाकर ही माने..

वहां फुरसतिया जी भी मिल गये.. उनको प्रणाम करने लगे तो उन्होंने गले लगा लिया.. :) अब तक उन्हें बहुत देर हो चुकी थी, सो बॉम्बे हलवा हाऊस के अंदर ना जाकर सीधा चेन्नई सेंट्रल(अजी वही रेलवे स्टेशन) जाने का प्रोग्राम बन गया.. मैं बाईक से आगे-आगे, फुरसतिया जी अपने बेटे के साथ ऑटो पर पीछे-पीछे.. इतने में अचानक मूसलाधार वर्षा.. मुझे संभलने का बस इतना ही समय मिला कि मैं अपनी सारी जरूरी कागजात अपने बैग में रखे प्लास्टिक कि थैली में डाल सकूं.. बस मैंने सारा सामान उसके अंदर डाला और भींगते हुये पहूंचा स्टेशन..

चेन्नई सेंट्रल पर मुझे सबसे ज्यादा जो बात परेशान करती है वह ये कि बाईक कैसे पार्क करूं? थोड़ी सी जगह, उसी में सभी अपनी अपनी मोटरसाईकल लेकर जुटे रहते हैं.. मेरे साथ और बड़ी परेशानी यह होती है कि 150 किलो कि बड़ी गाड़ी उस छोटे से जगह में कैसे घुसाऊ? खैर जब तक मैं पार्क करता तब तक अनूप जी भी वहां पहूंच गये और मेरे लिये प्लेटफार्म टिकट भी ले लिये..

अब जाकर थोड़ा चैन से उनसे बाते हुई, और वहीं पर उनके बेटे से भी मिला.. बच्चा जिन कपड़ों में था, उन कपड़ों में जिस मात्रा में अधिकतम स्टाईल मारा जा सकता था, उतना स्टाईल में था.. :D वैसे मुझे इसमें कोई ऐतराज नहीं है.. बच्चा था बहुत ही शालीन(कम से कम अपने पापा के सामने..) :D सौमित्र नाम है अनूप जी के बेटे का..

हमलोग वहीं ईडली खाये.. फुरसतिया जी ने मुझे कानपुरिया मिठाई भी खिलाई.. उन्होंने पूरा डब्बा मेरे सामने खोल कर रख दिया और मैंने जैसे ही एक मिठाई ली वैसे ही उसे अंदर रखने लगे.. मगर हम भी ठहरे मैथिल आदमी(अब इतना भी नहीं समझे? अरे, मिथिलांचल के रहने वाले), तुरत उनसे डब्बा ले लिये.. अब किसी को साल भर के बाद मोतीचूर के लड्डू मिले तो भला वह क्यों और किसके लिये छोड़ेगा? :D

हमने अपने ब्लौग दुनिया में बहुत डायरियां पढ़ी है.. दुर्योधन की डायरी जो शिव भैया लिखते हैं, वो तो इतिहास बना ही रहा है.. खुद हमने भी एक लड़की कि डायरी लिख डाली थी.. जब इतनी डायरी लिखी-पढ़ी जा चुकी है तो फुरसतिया जी ने सोचा होगा कि पीडी को "एक नौकरानी कि डायरी" भी पढ़ा ही देते हैं.. उन्होंने मुझे दो किताबें भी भेंट की -
"एक नौकरानी कि डायरी"
"नेकी कर अखबार में डाल"


इसमें से "नेकी कर अखबार में डाल" के लेखक तो हमारे ब्लौग दुनिया में भी धमाल दिखाते ही रहते हैं.. अजी वही आलोक पुराणिक जी.. पिछले साल इनसे भी मिलने का सौभाग्य पंगेबाज जी और मैथिली जी के सौजन्य से मुझे प्राप्त हो चुका है..

4 कि शाम में जब मैं अनूप जी से मिलने को निकलने ही वाला था उसी समय शिव जी का फोन भी आया, वह यह जानने को उत्सुक थे कि फुरसतिया जी से मिले या नहीं? हम उन्हें बताये कि बस उन्हीं से मिलने के लिये निकल ही रहे हैं..


यह फोटो अंधेरे का शिकार हो गई है.. :(

बस थोड़ी देर में कुछ मिनटों कि देरी से ट्रेन भी वहां से रवाना हो गई.. कुल मिला कर अनूप जी से पहली बार मिलना बहुत ही सुखद रहा.. कुल मिलाकर मैं बस इतना ही कह सकता हूं कि जैसा उनका लेखन है और जिस प्रकार से वह फोन पर बतियाते हैं, उससे कुछ भी अलग नहीं है.. वैसे ही खुशमिजाज, वैसा ही उनका सेंस ऑफ ह्यूमर.. कुल मिला कर बहुत ही बढ़िया अनुभव रहा उनसे मिलने का.. :)

दो दिन देर से छापा इसे.. कारण - हमने सोचा कि फुरसतिया जी के बारे में कुछ भी लिखने से पहले पूरा फुरसत निकालो, और वह फुरसत आज ही मिली है.. :)

Friday, May 08, 2009

एक जन्मदिन रेलवे प्लेटफार्म पर

रेलवे प्लेटफार्म पर जन्म दिन मनाने पर कैसा महसूस करेंगे आप? लोगों की भीड़ आपको घूरती रहे, सभी आंखें मानों कई सवाल लिये हो.. और आप इन सबकी कोई परवाह ना करते हुये बस अपनी धुन में जन्मदिन का केक काटने में मशगूल हों!

जी हां कुछ ऐसा ही नजारा था 6 मई कि रात चेन्नई सेंट्रल, प्लेटफार्म नंबर 9 पर.. मेरा मित्र संजीव(जिसकी चर्चा मैं कई बार अपने इस ब्लौग पर कर चुका हूं) के मम्मी-पापा एक शादी में शामिल होने के लिये चेन्नई आये हुये थे.. हम सभी मित्रों में से ऐसा कोई भी नहीं था जो पहले उनसे ना मिला हो, सो औपचारिकता जैसी कोई बात ही नहीं थी.. सब कुछ बिलकुल घर जैसा ही था.. हम सभी खुश कि अंकल-आंटी आये हुये हैं.. मैं और शिवेंद्र 5 कि सुबह(जिस दिन शादी थी) पहले ही अंकल-आंटी से उनके होटल में जाकर मिल चुके थे.. और चूंकी 6 को आंटी का जन्मदिन था सो काफी कुछ संजीव कि ओर से हमें ढ़ेर सारे अनुदेश(इंस्ट्रक्शन) मिल चुके थे..

उनकी ट्रेन 6 मई कि रात में थी और उन्हें रांची जाना था.. 6 कि सुबह ही जब ऑफिस जाने कि तैयारी कर रहा था उस समय शिवेंद्र से बात करते हुये अचानक से केक का भी प्लान बना डाला.. कि रात में जब स्टेशन पर अंकल-आंटी से मिलने जायेंगे तब वहीं स्टेशन पर ही केक की कटाई भी होनी चाहिये.. :)

दिन भर ऑफिस में होने के कारण किसी का भी अंकल-आंटी से मिलना संभव नहीं था.. (कुछ हद तक मेरे लिये ही यह संभव था क्योंकि जहां शादी हुई थी वह स्थान मेरे ऑफिस के बिलकुल पास में ही था, मगर मुझे इसकी कोई खबर नहीं थी जिसका बाद में मुझे अफ़सोस भी हुआ..) शाम में हमारे मित्र अन्वेष का फोन आया कि तुम कैसे और कब जा रहे हो स्टेशन? मैंने प्लान बताया, फिर उसने कहा कि मैं भी आ रहा हूं और सीधा तुम्हारे ऑफिस आऊंगा.. वहीं से साथ चलेंगे..

मेरे लिये तो ऑफिस रात में ही जवान होती है.. और मैं सारे काम छोड़कर भागने के चक्कर में था.. मगर उसकी जरूरत नहीं पड़ी.. मैं सही समय पर निकला और नियत समय पर अन्वेष से मिल भी लिया.. शिवेंद्र भी मेरे ही ऑफिस आ गया.. फिर हमने फोन किया तो पता चला कि ट्रेन लगभग 3 घंटे देरी से चल रही है.. फिर पूछने पर पता चला कि वो तो बिलकुल हमारे पास में ही हैं.. हम सीधा शादी वाले जगह के लिये ही निकल लिये..

थोड़ी देर उनसे बाते करके और अन्वेष को उनके पास बैठा कर मैं और शिवेंद्र निकल लिये केक लाने के लिये.. उधर से वाणी का भी फोन आ चुका था कि कुछ लाल गुलाबों का एक गुलदस्ता भी बनवा कर लेते आना.. संयोग से मेरा ऑफिस चेन्नई के सबसे बड़े व्यवसायिक इलाका टी.नगर में ही है.. जहां हर चीज आसानी से उपलब्ध है..

मैं और शिवेंद्र केक और गुलदस्ता लेकर पहूंचे मगर उसे गार्ड के पास ही छोड़ आये.. सारे बारात के सामने केक कि कटाई हमें कुछ जंच नहीं रहा था और साथ ही हमें विकास और वाणी का भी इंतजार करना था.. थोड़ी देर में ही वे दोनों भी आ पहुंचे.. वे दोनों अंकल-आंटी के लिये गिफ्ट पहले ही पैक करके लेते आये थे जिसे बैग कि मेहरबानी से छुपाया गया था..

फिर वहां से निकल कर स्टेशन के लिये चल पड़े, हम पांच मित्र थे और हमारे पास 3 गाड़ियां थी.. मतलब एक सीट अभी भी खाली थी हमारे पास और अंकल ने उसका बखूबी इस्तेमाल किया.. वैसे पल्सर 200 पर चढ़कर पीछे बैठने का अनुभव जानना हो तो कभी मेरे पापा से या फिर अंकल से पूछना ही ठीक रहेगा.. ;)

स्टेशन पर पहूंच कर हमने एक-एक करके अपने सारे पत्ते खोलना शुरू किया.. आंटी को भी बताया कि हमने कुछ प्लान भी बना रखा है आज के खास दिन के लिये.. आंटी का कहना था, "हम तो आज तक कभी भी केक नहीं काटे हैं.." इस पर हम सभी का कहना था कि "पहला केक काटना और वो भी रेलवे प्लेटफार्म पर, कभी नहीं भूल पायेंगे आप.." :)

फिर केक काटा गया.. कुछ प्यार भरी और कुछ हंसी मजाक की बाते हुई.. जाते-जाते हमने भी ढ़ेर सारा आशीर्वाद बटोरा, कुछ भी इधर-उधर छिटकने नहीं दिया.. :) थोड़ी देर में ट्रेन भी आई और वे चले गये..

चलते-चलते - हम मित्र आपस में अक्सर ये बातें करते हैं कि संजीव इतना बोलता क्यों है.. इस बार इसका जवाब हमने ढ़ूंढ़ निकाला.. आंटी अध्यापक और अंकल अधिवक्ता.. अब ऐसे में बच्चे भला कैसे चुप रह सकते हैं?? :D

नोट - यह सभी चित्र चेन्नई रेलवे स्टेशन का है, जहां हमने केक पार्टी की थी.. इसमें सफेद रंग के टी-शर्ट में अन्वेष है, कत्थई रंग के शर्ट में विकास है, नीले रंग के शर्ट में शिवेंद्र, हरे रंग के कपड़े में मैं खुद और साथ में वाणी भी.. अंकल-आंटी को तो आप ऐसे भी पहचान लेंगे यह उम्मीद करता हूं.. :)

Friday, April 17, 2009

अथ हिंदीभाषी कथा इन चेन्नई

पिछली कथा पढ़कर घुघुती जी ने मुझसे यह उम्मीद जतायी कि मैं जल्द ही यहां हिंदी बोलने के ऊपर कि कोई कथा लेकर आऊंगा, तो लिजिये हाजिर हूं.. इसके कयी छोटे-छोटे अध्याय हैं और सभी अद्याय अपने आप में संपूर्ण.. तो चलिये आपको यहां कि भाष के साथ अपने और अपने मित्रों के कुछ हिंदी से जुड़े दिलचस्प और कड़वे अनुभव सुनाता हूं..

अध्याय एक -
मेरा एक मित्र जब पॉडिचेरी घूम रहा था तब उसे एक ट्रैफिक पुलिस ने पकर लिया.. पुलिस का कहना था कि आप वन वे में हैं और मेरा मित्र का कहना था कि यहां कहां लिखा हुआ है कि यह वन वे है? उसने उसे साईन बोर्ड दिखाया जिसमे तमिल में लिखा हुआ था.. मेरे मित्र ने उसे कहा कि उसे तमिल कि समझ नहीं है, तो उस पर उस पुलिस वाले ने कमेंट करते हुये कहा कि तमिल नहीं आती तो तमिलनाडु में क्यों आये? मेरे मित्र ने उस समय उससे बहस के मूड में नहीं था लेकिन बाद में उसका कहना था कि अगर इन्हें हिंदी नहीं आती तो भारत में क्या कर रहे हैं? इन्हें श्रीलंका ही भगा देना चाहिये..

अध्याय दो -
यहां तमिलनाडु में रहते हुये हमने सबसे पहले एक से दस तक तमिल में गिनती सीख ली.. जब शुरूवात में चेन्नई आये थे तब मैं और मेरा मित्र शिवेन्द्र बस से ऑफिस तक का सफर साथ-साथ किया करते थे.. हम जब भी अंग्रेजी में कंडक्टर को कहते थे कि, "अन्ना टू टिकट!! पौंडिबाजार".. तो तमिल में उत्तर आता था.. एक दिन हममे से किसी ने टिकट के लिये कंडक्टर को तमिल में कहा, "अन्ना रंड टिकट!! पौंडिबाजार".. उधर से जवाब आया, "दो टिकट चाहिये?" ;)
(तमिल गिनती में रंड का मतलब दो होता है)

अध्याय तीन -
मेरी एक मित्र का हमेशा कहना होता है कि, "यहां बाजार में कहीं चलते हुये अगर् किसी को हिंदी बोलते हुये सुन लो तो झट से आंखों कि बत्ती जल जाती है.. अरे, ये तो नोर्थ इंडियन है.." ;)
जी हां, यह बिलकुल सच है.. यहां के लोग अपनी भाषा को बिलकुल पकर कर रहते हैं और किसी भी हालत में उसे छोड़ना पसंद नहीं करते हैं.. अगर उन्हें हिंदी आती भी है तो हिंदी ना समझने का नाटक करते रहते हैं.. वैसे अब धीरे-धीरे यह मानसिकता खत्म हो रही है.. खासतौर से उन लोगों का अनुभव जिन्हें हिंदी नहीं आती है और कभी उत्तर भारत चले गये हों तो उनकी परेशानी का कोई ठिकाना नहीं रहा था..

अभी कुछ दिन पहले यहां के एक लोकल समाचार पत्र में मैंने पढ़ा था कि अब यहां के लोग अपने बच्चों को तमिल के साथ-साथ हिंदी भी सिखाने के लिये आगे आ रहे हैं.. क्योंकि अब उन्हें भी समझ में आ रहा है कि इस ग्लोबलाईजेशन के समय में हो सकता है कि उनके बच्चों को उत्तर भारत में जाकर काम करना परे.. उस रिपोर्ट में यह भी था कि यहां के बुजुर्ग जो तमिल भाषा को बिलकुल पकड़ कर बैठे हुये हैं, वे इसे तमिल के ऊपर हिंदी का हमला मान रहे हैं मगर उनके पास भी कोई दूसरा विकल्प नहीं है..

Monday, March 30, 2009

यादों के काफिले में जुड़ा एक और कारवां

थोड़ी देर के लिये मैं अपनी यादों के फ्लैश बैक में चला गया था.. लगभग 13-14 साल पहले.. चक्रधरपुर के मेले में पापा के साथ घूम रहा हूं और पापा से जिद कर रहा हूं..

"पापा मुझे बैलून फोड़ना है.."
"बैलून से खेलते हैं, उसे फोड़ते थोड़े ही हैं.." पापा जी अक्सर हमें ऐसे ही बहलाते थे..
"नहीं मुझे बंदूक चला कर बैलून फोड़ना है.."
"अरे बंदूक तो चोर-डाकू चलाते हैं.."
"नहीं मुझे निशाना लगाना है.."

बहुत देर तक परेशान करने के बाद पापा जी अंततः हमें वहां ले जाकर निशाना लगवा ही देते थे और साथ में हौशला भी बढ़ाते जाते थे कि और अच्छा निशाना लगाओ..

कुछ ऐसा ही नजारा था जब मैं विवेक जी से यहां चेन्नई में मिला.. उनका बड़ा बेटा अंतु यहां के मैरीना बीच पर घूमते हुये हर चीज के लिये ऐसे ही जिद कर रहा था और विवेक जी भी उसकी जिदों को पूरा किये जा रहे थे, उसे बहलाने की कोशिश भी कर रहे थे मगर वो भी मेरी ही तरह ना बहलने की जैसे कसम खा रखा था..

शनिवार की बात है.. घर से कुछ ही दिन पहले नेट कनेक्शन कटवाने की वजह से दोपहर में मैं किसी काम से मैं साईबर कैफे गया था और वहां अपने मेल बाक्स में विवेक जी का मेल देखा.. जिसमे उन्होंने शाम में मैरीना बीच पर मिलने की बात कही थी और साथ में अपना नंबर भी दे रखे थे.. मैंने तुरत उन्हें फोन घुमाया और मिलने का समय तय कर लिया.. शाम पांच बजे मैरीना बीच पर.. मैं ठीक 5 बजकर 10 मिनट पर वहां था.. फिर एक दुसरे को ढ़ूंढ़ने का काम चालू हुआ.. बाद में पता चला की विवेक जी अपने पूरे परिवार के साथ दक्षिण भारत भ्रमण पर निकले हुये हैं और वह जहां वह अपने परिवार को छोड़कर मुझे ढ़ूंढ़ने निकले थे वहां मैं खड़ा था और विवेक जी कहीं और मुझे ढ़ूंढ़ रहे थे.. :)


विवेक जी और मैं
दिल की बात कहूं तो मुझे उनका छोटा बेटा संतु बहुत, बहुत, बहुत प्यारा लगा.. उनके साथ उनके दोनों बेटे अंतु, संतु, उनकी पत्नी, और उनके माताजी-पिताजी भी थे.. मैं सिर्फ विवेक जी को ही जानता था मगर जब रात में मैंने उन्हें विदा किया तब मैं उनके साथ-साथ उनके दोनों बेटों से भी अच्छी दोस्ती कर ली..

दिल के साफ और खुले विचार वाले विवेक जी में दिखावा बिलकुल भी नहीं था.. लगभग 3-4 घंटे में मैंने उनसे कई बातों पर बात किया जिसमें ब्लौगिंग से लेकर चेन्नई तक और पानीपत से लेकर पटना तक की बातें भी शामिल थी.. वहां उनके तीन मित्रों से भी मुलाकात हुयी.. राजेश जी, गुप्ता जी और मनोहर जी.. जिसमें से राकेश जी और गुप्ता जी उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं और मनोहर जी खालिश चेन्नई के.. यह तीनों ही विवेक जी के साथ तब थे जब विवेक जी चेन्नई में रहते थे..


विवेक जी और उनके मित्र राजेश जी
उनसे अचानक मिलना बहुत ही अच्छा अनुभव रहा.. और वो भी एक साथ उनके पूरे परिवार से मिलने की बात तो उम्मीद के परे थी.. उनके और उनके बच्चों के सात मैंने कई पल जी लिये जो मेरे लिये अनमोल है और हमेशा के लिये यादगार हो गये हैं..


कुछ अन्य चित्र..

विवेक जी


मैरीना बीच पर बिकते शंख और समुद्री शीपों के चित्र



मैरीना बीच पर बिकते शंख और समुद्री शीपों के चित्र

Friday, March 27, 2009

खट्टी खीर उर्फ़ तईर सादम का रहस्य (बनाने की विधि के साथ)

वैधानिक चेतावनी - कल वाले पोस्ट के वैधानिक चेतावनी को आप मजाक में ले सकते हैं, मगर आज वाले व्यंजन बनाने के बाद उसे चखने का खतरा आप अपने ऊपर ही लें.. मेरे ऊपर कोई जिम्मेदारी नहीं बनती है..(सच्ची बहुत खतरनाक है..) इस पोस्ट को लिखने के पीछे शिखा दीदी का मेरे पिछले पोस्ट पर आया कमेंट भी है जिसमें उन्होंने कहा था, "क्या बात है। पहले तो लगा कि कहीं सच में तो तमिलनाडु में बनने वाली मीठी खिचड़ी की विधि तो नहीं दे रहे हैं। पर पढ़ के पता चला यह तो........................कमाल की खिचड़ी है।".. मैंने सोचा क्यों ना दक्षिण भारत का ही एक पकवान बनाना सिखाता चलूं.. ;)

भूमिका - होस्टल का पहला दिन, घर से बहुत पहले ही बाहर निकल चुका था और कुछ दिन दिल्ली में काटने के बाद होस्टल आया था सो बाहर रहने की भी आदत हो चुकी थी.. मेस में गया और खाना देखते ही खुशी से उछल पड़ा.. खीर और वो भी इतनी सारी? अपनी आंखों पर भरोसा नहीं हुआ.. कोई रोक रूकावट नहीं.. जितना खाना चाहो उतना खाओ.. सीधा दिल्ली से होस्टल आ रहा था, और वहां दिल्ली में बाहर का खाना खा-खा कर परेशान हो चुका था सो मेरे लिये तो किसी अमृत के ही समान था..

उस खीर में मैंने करी पत्ता का छौंक भी देखा, मगर मैंने सोचा की शायद यहां के लोग खीर में भी करी पत्ता डालते होंगे.. थाली भर कर खीर लिया और कुछ रोटियां ली.. मुझे इतनी सारी खीर लेते देख मेस के ही एक आदमी ने मुझसे पूछा की तबीयत ठीक नहीं है क्या? जिसका मतलब मुझे बाद में समझ में आया.. रोटी का एक कौर तोड़ा और उसे खीर में डाल कर जैसे ही मुंह में डाला की बस..... ना निगलते बने और ना ही उगलते बने.. हल्का खट्टापन लिये हुये, थोड़ा नमकीन भी.. कुछ ऐसा ही स्वाद था उसका.. बाद में पता चला की यह दही-चावल था जिसे उत्तर भारतीय यहां कर्ड-राईस और दक्षिण भारतीय तमिल में तईर-सादम कहते हैं..

उस पहले दिन के अनुभव ने मुझे उसका नाम खट्टा खीर रखने को विवश कर दिया.. सबसे मजे की बात तो यह है की मेरे अधिकतर कालेज के दोस्तों को यही अनुभव हुआ था.. वे भी पहले दिन खीर के लालच में ढ़ेर सारा खट्टा खीर ले बैठे थे और बाद में पता चला की यह तो कर्ड-राईस है.. :D

तमिल शब्द का ज्ञान -
तईर - दही
सादम - उबला हुआ चावल.. :)

बनाने की विधि -
1. जितना खाना हो उतना चावल उबाल लें..
2. अब अपनी मर्जी के मुताबिक उसमें जितना चाहे उतना दही मिला लें..
3. अपने स्वाद के अनुसार उसमें नमक फेंट लें..
4. करी पत्ता, जीरा, सरसो, मिर्चा.. जो भी मिले उसका उसमें छौंक लगा लें.. :D

उपयोगिता -
आपकी तबियत नर्म हो या पेट में कुछ गड़बड़ी हो.. यह भोजन हर समय आपके शरीर के लिये फायदा ही करता है.. कभी भी नुकसान नहीं पहूंचायेगा.. हल्का-फुल्का खाना हो तो भी यही सही है.. सादा भोजन लेना हो तो भी यही बढ़िया रहेगा..

चलते चलते -
मेरा खाना खजाना प्रोग्राम कैसा लग रहा है यह भी बताते जाईयेगा.. साथ ही सलाह भी देते जाईयेगा की इसे आगे भी बढ़ाया जाये या नहीं? :)

Sunday, March 01, 2009

घर जाने की छटपटाहट

शुक्रवार को ऑफिस पहूंचा.. मेरा बांया पैर पूरी तरह से सूज कर फुला हुआ था, काफी दर्द भी था.. ऑफिस में सभी मुझसे बोल रहे थे कि आज ऑफिस आने की क्या जरूरत थी? आज छुट्टी ले लेते और घर पर ही आराम करते.. दोस्तों ने पूछा तो मैंने कहा की ऑफिस में कुछ जरूरी काम था, आज वीकली स्टेटस रीपोर्ट बनाने को लेकर कुछ काम था.. और ऑफिस में किसी ने पूछा तो उन्हें कहा की घर में अकेले रह कर क्या करता सो ऑफिस आ गया..

आज ऐसे सलाह देने वालों में मेरे बॉस भी थे जो मेरी छुट्टी मंजूर करते हैं.. मगर मुझे पता है कि आज भले ही बॉस कह रहे थे की छुट्टी ले लेते, लेकिन अगर मैं छुट्टी ले लेता तो अप्रैल के अंत में होने वाले अप्रैजल में वही मुझसे यह प्रश्न पूछते की इतना छुट्टी क्यों लिये हो? पहले ही दो बार मुझसे एच.आर. के लोग यह प्रश्न पूछ चुके हैं.. उनका कहना था की तुम अपनी टीम में(जो 35 लोगों की है) अब तक सबसे जुआदा छुट्टी ले चुके हो और कोई भी तुम्हारे आस-पास भी नहीं है.. कारण भी मैंने उन्हें बताया है कि साल में अगर दो बार भी घर जाता हूं तो ऐसे ही 10-12 छुट्टियां हो ही जाती है.. उनका कहना था की यहां और लोग भी तो घर जाते हैं, मगर वे तो इतनी छुट्टियां नहीं लेते हैं.. उन्हें मैंने इसका कारण भी बताया है, कि यहां सारे लोग यहीं तमिलनाडु या आंध्र प्रदेश के हैं.. ऐसे में वो साल में चाहे जितनी बार भी घर जायें, उन्हें छुट्टियों की कोई जरूरत नहीं होती है.. साप्ताहांत कि दो छुट्टियां बहुत होती है उनके लिये.. मगर यह जवाब उन्हें पता नहीं क्यों संतुष्ट नहीं कर पाता है और ना ही मेरी इस बात को वह काट पाते हैं..

गुरूवार कि सुबह मैं ऑफिस जा रहा था, मेरे घर से कुछ दूरी पर वडापलानी सिग्नल है और उससे आगे लगभग 300 मीटर तक वन वे शुरू हो जाता है.. जैसा की चित्र में दिखाया गया है.. चित्र में जिस जगह लाल बिंदू है उस जगह एक बाईक वाले ने गलत दिशा से पूरे स्पीड में आकर मेरे पैर में ठोक दिया.. मैं गिरा तो नहीं मगर मेरे बायें पैर में कुछ चोट आयी जो उस समय कुछ पता नहीं चला कि कितना है.. मैं सीधा ऑफिस पहूंच गया और जूता खोल कर बैठ गया.. किसी तरह उस रात वापस घर भी आ गया.. मगर अब तक दर्द बहुत बढ़ चुका था.. पैर को सेंक कर और कुछ मालिश वगैरह करके सो गया.. अगली सुबहा उठकर देखा तो पैर बुरी तरह सूज चुका है और मैं हवाई चप्पल भी नहीं पहन पा रहा हूं..

घर की बहुत याद आ रही है.. घर में होता तो मम्मी पैर को सेकने के लिये पता नहीं क्या-क्या प्रयोजन करती.. कभी तेल में हल्दी मिलाती तो कभी नमक पानी से सेंकती और साथ में आयोडेक्स से भी मालिश कर देती.. मेरी गलती ना होते हुये भी पापाजी मुझे अच्छी खासी नसीहतें देते.. "कैसे गाड़ी चलाते हो? देख कर नहीं चल सकते हो? जरूर गलती तुम्हारी ही होगी.." और भी ना जाने क्या-क्या.. मगर यहां रह कर उन्हें यह बताया भी नहीं है.. बेकार का वहां बैठकर टेंशन में आते.. जितनी चोट नहीं लगी है उससे कहीं ज्यादे की कल्पना करके खूब चिंता करते.. मुझे पता है कि वे मेरा पोस्ट पढ़ते हैं और यह पढ़कर उन्हें पता भी चल जायेगा.. मगर साथ में मुझे यह भी पता है कि 3-4 दिनों तक वे यह नहीं पढ़ने वाले हैं.. किसी काम से बाहर गये हुये हैं.. और जब तक वापस लौटेंगे तब तक यह सूजन और दर्द भी या तो खत्म हो चुका होगा या फिर बहुत कम हो चुका होगा..