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Wednesday, February 25, 2009

एक लड़की के डायरी के पन्ने(पहली मुलाकात - भाग तीन)

कुछ दिन पहले की बात है, बातों ही बातों में उसने मुझे कहा था, "तुम्हारे बाल बहुत सुंदर हैं.. इसे कभी छोटा मत करना.. मैं तुमसे जब भी मिलूंगा तब तुम्हें खुले बालों के साथ देखना पसंद करूंगा.." मैंने उसकी बात बखूबी रखी, और आज खुले बालों में ही आयी थी.. अब चूंकी उसने मुझे खुले बालों में देख ही लिया था सो अब मुझे अपने बालों को थोड़ा छोटा करने के लिये परमिशन भी लेना था.. ओह नो!! उसने मना कर दिया.. मेरा सारा एक्सप्लानेशन गया कचरे में.. अंततः उसने हां कह ही दिया मगर एक आग्रह के साथ की इसे बहुत छोटा मत करना.. पता नहीं लड़कों को लंबे बालों से इतना लगाव क्यों होता है.. अगर एक हफ्ते के लिये भी इतने लम्बे बालों को किसी लड़के को संभालना पर जाये तब समझ में आये उन लोगों को कि कितनी तकलीफ उठानी पड़ती है इन लम्बे बालों के कारण.. मेरा दावा है कि उसके बाद वे छोटे बालों की ही वकालत करते फिरेंगे.. अगर इन बातों को यहीं छोड़ कर दूसरी बातों पर ध्यान देते हैं तो, उसके बात करने का ढ़ंग.. किसी भी बात को विस्तार से समझाना.. इट्स जस्ट अमेजिंग.. इट वाज लाईक आई वाज जस्ट फ्लैटर्ड.. जो भी हो, मगर मुझे उसके एक-एक शब्दों से सुखद अनुभूती हो रही थी..

फिर हमारी बातें उसके हाथों पर बने हुये टैटू पर केंद्रित हो गया.. बड़े ही अच्छे ढ़ंग से उसने बताया कि टैटू कैसे कराते हैं.. इसके क्या-क्या नुकसान हो सकते हैं.. जानकारियों का तो जैसे वह भंडार अपने साथ लेकर घूम रहा था.. किस देश में लोग किस तरह के टैटू पसंद करते हैं.. भारत के किस शहर में कहां अच्छे टैटू बनवाये जा सकते हैं.. फिर कुछ बाते सिनेमा पर भी हुई.. मुझे हिंदी सिनेमा की ज्यादा समझ नहीं है और मैंने देखे भी बहुत कम ही हैं.. सो बस चुपचाप उसकी बाते सुनती रही.. 1930 के जमाने से लेकर अभी तक के लगभग हर सिनेमा और उसके गानों की जानकारी अपने साथ समेटे हुआ था.. मैं बस इंतजार कर रही थी कि कुछ इंग्लिश मूवीज पर भी बातें हो, मगर जब उस पर भी बातें हुई तो उसके पास जानकारियों का खजाना ही निकला.. धीरे-धीरे यह अहसास हुआ की उसे लगभग दुनिया के हर हिस्से के हर भाषा की अच्छी मूवीज की जानकारी थी.. लेटेस्ट टेक्नॉलॉजी की बात हो या फिर लेटेस्ट गैजेट की, उसके बताने और समझाने का तरीका ही बता दे रहा था की वह कितना प्रैक्टिकल है और अपने मैनेजमेंट की डिग्री का बखूबी इस्तेमाल करना भी जानता है..

इसी बीच उसकी कॉफी खत्म हो चुकी थी और उस कॉफी शॉप के एक कर्मचारी ने फीडबैक फार्म भी लाकर दे दिया.. वह हमें दो फार्म दे गया था.. जिसमें से एक को ही हम दोनों ने शेयर किया.. पहले मैंने लिखना शुरू किया और वह बहुत गौर से मेरी हैंण्डराईटिंग को देखता रहा, और फिर आधे के बाद वह फार्म मैंने उसे पकड़ा दिया.. वह अचानक इस प्रस्ताव से अकचका सा गया.. वह तो अपने ही फार्म को पूरा भरने के इरादे से था.. पता नहीं लड़के सच में इतने ही नासमझ होते हैं या फिर हमेशा नासमझी कि एक्टिंग ही करते हैं? फिर उसने मेरे हाथों से मेरा आधा भड़ा हुआ फार्म ले लिया और उसे पूरा कर दिया.. वह उस फार्म को वापस करने ही जा रहा था कि मैंने उसके हाथों से वह फार्म ले ली, और उसे अपने पर्स का रास्ता दिखा दी.. इतनी आसानी से मैं अपने इस पहले ज्वाइंट वेंचर को कैसे जाने देती? :) और दूसरे फार्म को जल्दी-जल्दी भर कर उसे वापस कर दी..

इसका अगला भाग ही अंतिम भाग है उसे पढ़ना ना भूलें.. वैसे यह एकता कपूर के धारावाहिक का भी रूप ले सकता है, मतलब जितना चाहो उतना ही बढ़ता चला जाये.. कुछ गाने नहीं ना सही, मगर कुछ कवितायें तो डाल ही सकता हूं.. अगर आप लोग कहें तो थोड़ा और रोमांटिक बना सकता हूं.. या फिर "एक लड़के की डायरी के पन्ने(पहली मुलाकात)" नामक कहानी आपको एक लड़के के नजरीये से भी दिखा सकता हूं.. अरे दोस्तों फागुन का महीना चल रहा है, सो थोड़ा रोमांटिक होना मेरा भी फर्ज बनता है.. ;)

एक लड़की के डायरी के पन्ने(पहली मुलाकात - भाग एक)
एक लड़की के डायरी के पन्ने(पहली मुलाकात - भाग दो)

Tuesday, February 24, 2009

एक लड़की के डायरी के पन्ने(पहली मुलाकात - भाग दो)

उन पांच सेकेण्ड में मैंने उसकी कई बातों पर गौर किया.. गर्मजोशी से हाथ मिलाना, हाथों पर सफेद रंग का बैंड, कार्गो जींस, नाईकी के जूते, टी-शर्ट, हाथों में कोई घड़ी नहीं, और भी ना जाने क्या-क्या.. इस बीच मैं उसे अपनी बातों में उलझाये रखी.. यहां का काम खत्म हुआ या नहीं? अभी तक की यात्रा कैसी रही? मुंबई वापस कब जाना है? वगैरह-वगैरह.. मैं उसके जवाबों की परवाह किये बिना लगातार उसकी बात सुने जा रही थी.. एक सवाल के जवाब ने मुझे आश्चरय में डाल दिया.. मैंने पूछा, "इतना लेट किया मैंने, आप तो मुझे गालियां दे रहे होंगे?" और उसने कहा,"हां!" मैं बिलकुल चौंक गयी, मेरे लिये यह उत्तर आश्चर्यजनक इसलिये था क्योंकि मैंने पहली ही मुलाकात में अभी तक इतने स्पष्टवादी व्यक्ति से नहीं मिली थी.. क्या कोई इस तरह भी उत्तर दे सकता है? कम से कम सामान्य शिष्टाचार तो इसकी इजाजत नहीं देता है.. मगर यह लड़का!! उफ्फ!!! नो कमेंट्स एज पर नॉउ अबॉउट इट.. इस बीच शायद वह भी यह महसूस कर चुका था कि मुझे यह पसंद नहीं आया, सो उसने भी अपनी बातों को ढ़कने की बेहतरीन कोशिश की जिसे मैंने अपने मुस्कान के साथ सहमती दे दी जैसे मैं कह रही हूं कि मैं समझ गयी..

बातें करते हुये हम उस शौपिंग माइल के अंदर चले गये.. मुझे समझ नहीं आता है कि लोग मॉल के पीछे इतने पागल क्यों होते हैं? आई जस्ट हेट मॉल्स.. पता नहीं भविष्य में मेरे यह विचार बदलते हैं या नहीं.. अभी से इस पर कुछ भी कहना ठीक नहीं.. हम दोनों ही कहीं बैठने के लिये जगह तलाश कर रहे थे और एक कॉफी शौप में घुस गये.. बरिस्टा नाम था उसका, शायद..

मैं कई तरह की स्मृतियों को संजोने में लगी हुयी थी और दूसरी चीजों की परवाह करनी छोड़ दी थी.. किसका फोन आ रहा था मेरे मोबाईल पर मुझे इसकी भी परवाह नहीं थी.. जाने क्यों मेरी प्राथमिकतायें बदल चुकी थी.. मैंने उस फोन को नजर अंदाज करते हुये उसे ऐसे देखने की कोशिश करने लगी कि उसे समझ में ना आये कि मैं उसकी एक-एक गतिविधि को गौर कर रही हूं.. फिर से फोन.. इस बार मैं फोन उठा लिया और उसकी ओर ध्यान से देखने लगी.. वह मेनू कार्ड पढ़ने व्यस्त था, और थोड़ी ही देर में काऊंटर पर उसका आर्डर देने और पैसे देने मे व्यस्त हो चुका था.. जब तक वह वापस आता तब तक मैंने फोन रख दिया.. अब उसकी बारी थी, कोई उसे फोन कर रहा था.. शायद उसकी मां थी.. रौंग गेस.. दीदी..

खैर जो भी हो, छोटी सी बात करके उसने फोन रख दिया और मुझे अपने दोस्तों और घर वालों की तस्वीरें अपने मोबाईल में दिखाने लगा.. इस चक्कर में मेरी अंगुली से उसकी अंगुली टच हो गई.. यह तीसरी बार ऐसा हुआ.. उफ्फ.. पता नहीं क्यों मैं यह गिनती गिने जा रही हूं.. फिर उसने मेरा मोबाईल पूरे अधिकार से ले लिया, बिना पूछे.. मैंने भी मना नहीं किया, जैसे उसे पता था कि मैं बुरा नहीं मानूंगी.. थोड़ी देर बस यूं ही हाथों में नचाता रहा और बाते भी करता रहा.. यहां आने में उसके साथ क्या क्या हुआ? ऑटो वाला कैसे बातें कर रहा था.. उसके ऑफिस में आजकल क्या चल रहा है.. मेरा काम कैसा चल रहा है.. अपने कालेज के किस्से.. एकेडमिक अचिवमेंट्स.. और भी ना जाने क्या-क्या...

फिर मेरे मोबाईल के कौंटैक्ट में जाकर अपने नाम "संजय जी" को बदल कर "संजू" कर दिया.. मैं अभी तक सोच में हूं कि मैंने कई महिनों का समय लिया मगर "संजय जी" को "संजूं" नहीं कर पायी वहीं उसे यह कैसे इतनी आसानी से कुछ ही सेकेण्ड में कर दिया.. बातें करते करते उसके पिछले प्यार पर पता नहीं कैसे बातों का रूख मुड़ गया.. उसने साफ तौर पर नकार दिया मगर मैंने उसकी आखों में अब भी उस प्यार की झलक देख ली.. पता नहीं क्यों, मुझे कुछ जलन का भी अहसास भी हुआ जो क्षणिक था.. क्योंकि उसके प्यार को लेकर उसकी आंखों में सच्चाई दिख रही थी.. पहला प्यार इतनी आसानी से पीछा नहीं छोड़ता है, और ना ही भुलाये भुलता है.. शायद यह सच है.. "खैर छोड़ो.." यह हम दोनों ही एक साथ बोले और दोनो ही हंस दिये..

एक लड़की के डायरी के पन्ने(पहली मुलाकात - भाग एक)

Sunday, February 22, 2009

एक लड़की के डायरी के पन्ने(पहली मुलाकात - भाग एक)

बस 200 कदम की दूरी से मैं उस अजनबी को देख रही थी, जो इस मुलाकात के बाद मेरे लिये अजनबी नहीं रहा.. जाने क्यों मैं उसे अजनबी का नाम दे रही हूं, जबकी मैं उसे अपने किसी भी अन्य मित्र से ज्यादा जानती हूं.. मेरे उन मित्रों से भी ज्यादा जिन्हें मैं बरसों से जानती हूं और इसे बस आठ महिनों से ही..

उसे देखने से साफ लग रहा था कि वह इस उम्मीद में था कि मैं बायें से आऊंगी, और मैं इस इंतजार में थी कि वह मेरी ओर पलट कर देखे जहां मैं कई तरह के विचारों और भावनाओं को समेटे हुई थी जिसे चंद शब्दों में समेट पाना संभव नहीं है.. मैं बस इतना ही लिख सकती हूं कि किसी तरह अपनी भावनाओं पर काबू पाने की कोशिश में थी और कई तरह के विचार मुझे परेशान भी कर रहा था जो मेरे हर उस सांस से ज्यादा कीमती थी जिसे मैं उस समय ले रही थी..

पूरे 2 मिनट तक वहां खड़ी होकर बहुत सूक्ष्मता से मैं उसके हर गतिविधि का मुआयना किया.. अंततः मेरे दिमाग ने मुझे झकझोरा और मुझे याद दिलाया कि मेरे पास सिर्फ 1 घंटा और 20 मिनट है क्योंकि मुझे 12 बजे अपने ऑफिस के लिये निकल जाना होगा.. मिलने का समय मैं अपने समय सारणी और आने वाली घटनाओं पर छोड़ रखी थी.. एक नजर अपनी घड़ी पर डाल कर मैंने ठंढ़ी सांस ली और उसकी ओर बढ़ चली.. बस चार कदम बढ़ने पर ही अचानक से वह मेरी ओर मुड़ गया.. हमारे बीच एक बेआवाज संवाद स्थापित हो चुका था जो आंखों से और चेहरे पर की मुस्कान से साफ झलक रहा था, जो लगभग 4 सेकेण्ड तक चला जब तक मैंने अपनी पलकें नहीं झपकायी..

बहुत पहले उसने मुझे अपनी एक तस्वीर भेजी थी जिसका शीर्षक में खुद को शैतान बताया था.. अगर वह खुद को शैतान बता रहा था तो यह शैतानियत की पराकाष्ठा ही थी जो मुझे उसकी ओर जाने क्यों खींचता है और अनायास ही मन में एक सम्मान का स्थान भी बनाता है.. यह सम्मान सिर्फ उसकी आवाज या एक अच्छा कवि होने के कारण नहीं है.. यह उसके संपूर्ण व्यक्तित्व के कारण है जो उसे इस पागल भीड़ और ऐसे व्यक्तियों से अलग करता है जिनसे आप हर पल मिलते हैं.. किसी की भावनाओं कि कद्र करना ही उसकी सबसे बड़ी खूबी है जो उसे किसी अन्य से अलग करता है.. मैं सच में जानने को उत्सुक हूं कि किस तरह वह खुद को आज के इस मुलाकात में भी शैतान साबित करना चाहे.. मुझे पता है वह ऐसा नहीं है..

अब तक मैं उसके पास पहूंच चुकी थी और हमने एक दूसरे को "हाय" कहकर अभिनंदन भी किया.. मैंने लगभग दो सेकेण्ड तक इंतजार किया कि शायद वह अपना हाथ मेरी ओर बढ़ाये हाथ मिलाने के लिये.. फिर मैंने ही शुरूवात करते हुये अपना हाथ आगे बढ़ाया.. मेरी तरफ से, अगर वह अपना हाथ पहले आगे बढ़ाता तो मैं ज्यादा पसंद करती.. मगर मेरी सोच के मुताबिक, मैं पिछले कुछ मिनटों से उसे देख कर खुद को तैयार कर रही थी और अभी वह इसी प्रक्रिया से गुजर रहा था..

(इस पोस्ट के लिये बस इतना ही.. पाठकों के ऊपर निर्भर करता है कि मैं इस डायरी वाले कहानी को आगे बढ़ाऊं या नहीं.. आप ही मुझे सलाह दें.. अगर आप इसे और आगे पढ़ना चाहेंगे तभी मैं इसे आगे बढ़ाऊंगा.. :)) यह आप पर निर्भर करता है कि इसे किस्सागोई समझें या सच्चाई..