उस मोड़ पर खड़ा था मैं फिर.. ये किसी जीवन के मोड़ कि तरह नहीं थी जो अनायास ही कहीं भी और कभी भी पूरी जिंदगी को ही घुमाव दे जाती है.. ये तो निर्जीव सड़क थी, जहां आकर मुझे अपनी आत्मा के निर्जीव होने का अनुभव सा होने लगता है.. जैसे वो था या है या ऐसा ही कुछ भी.. मगर यह सड़क हमेशा मुझे जीवंत यादों में ढ़केलता रहा है..
तुम्हें आखिरी बार आते हुये भी और जाते हुये भी यहीं से देखा था.. सफेद सूट धूप में चमक रहा था.. इतना कि दूर से नजर आ जाए.. बाल खुले थे या बंधे हुये, लंबे थे या छोटे, जब तुम चलती थी तब आवाज आती थी या नहीं, तुम हंसते या रोते समय कैसी दिखती थी, इन सबका मेरे लिये कोई अर्थ नहीं था.. तब बस तुम्हारे होना ही मेरे लिये एक अर्थ रखता था और अब तुम्हारा नहीं होना..
आखिरी बार जब हम साथ थे और खुश थे, ये वही जगह थी.. उस दिन भी बरसात हो रही थी और आज भी.. अंतर बस यह रह गया है कि उस दिन कि बरसात रूमानियत भर जाती थी और आज कि बरसात विरह.. यूं ही खड़ा भींग रहा था लेकिन मन जैसे रीता ही रह गया..
जब भी इस शहर में आता हूं तो एक बेचैनी साथ लिये जाता हूं.. मन में एक हूक सी उठती रहती है.. कभी-कभी सोचता हूं कि अपनी इस भावना कि हत्या भी कर डालूं.. ठीक उसी गीत कि तरह जो मुझे हमेशा तुम्हारी याद दिलाती थी और उसे मैं नहीं सुनता था.. एक दफे दिन-रात कई दिनों तक मैं उसी गीत को सुनता रहा, इतनी बार कि उसे लेकर मन में जो भी भाव अपनी छाप छोड़ जाते थे, वे सभी खत्म हो गये.. उसी तर्ज पर उस शहर में, उन जगहों के इतने चक्कर लगा डालो कि उनको लेकर भावनाशून्य हो जाऊं.. कोई तड़प दिल में बाकी ना रहे.. कोई कसक दिल में बाकी ना रहे.. पथराती आंखों से मैं वहां से गुजरूं, बिना कोई भाव मन में लाये..
कई बार कोशिश भी कि की तुम्हारी यादों को मिटा डालूं.. कई बार जलाने कि भी कोशिश हुई और जला भी डाला.. मगर इस शहर के रूमानियत से वह अहसास फिनिक्स कि तरह राख के ढ़ेर से फिर से जी उठता है.. जैसे लगता है कि मेरी रूह में समा चुकी हो तुम..
क्यों चली गयी तुम? कहां चली गयी तुम? जाना ही था तो आयी क्यों थी? किसी को दिलासा दिलाकर छोड़ जाना अच्छा नहीं होता.. आ जाओ तुम, कहीं से भी.. बस उड़कर.. देखो तुम्हारे बिना मैं कितना अकेला हूं, कितना उदास हूं..
तुम्हें आखिरी बार आते हुये भी और जाते हुये भी यहीं से देखा था.. सफेद सूट धूप में चमक रहा था.. इतना कि दूर से नजर आ जाए.. बाल खुले थे या बंधे हुये, लंबे थे या छोटे, जब तुम चलती थी तब आवाज आती थी या नहीं, तुम हंसते या रोते समय कैसी दिखती थी, इन सबका मेरे लिये कोई अर्थ नहीं था.. तब बस तुम्हारे होना ही मेरे लिये एक अर्थ रखता था और अब तुम्हारा नहीं होना..
आखिरी बार जब हम साथ थे और खुश थे, ये वही जगह थी.. उस दिन भी बरसात हो रही थी और आज भी.. अंतर बस यह रह गया है कि उस दिन कि बरसात रूमानियत भर जाती थी और आज कि बरसात विरह.. यूं ही खड़ा भींग रहा था लेकिन मन जैसे रीता ही रह गया..
जब भी इस शहर में आता हूं तो एक बेचैनी साथ लिये जाता हूं.. मन में एक हूक सी उठती रहती है.. कभी-कभी सोचता हूं कि अपनी इस भावना कि हत्या भी कर डालूं.. ठीक उसी गीत कि तरह जो मुझे हमेशा तुम्हारी याद दिलाती थी और उसे मैं नहीं सुनता था.. एक दफे दिन-रात कई दिनों तक मैं उसी गीत को सुनता रहा, इतनी बार कि उसे लेकर मन में जो भी भाव अपनी छाप छोड़ जाते थे, वे सभी खत्म हो गये.. उसी तर्ज पर उस शहर में, उन जगहों के इतने चक्कर लगा डालो कि उनको लेकर भावनाशून्य हो जाऊं.. कोई तड़प दिल में बाकी ना रहे.. कोई कसक दिल में बाकी ना रहे.. पथराती आंखों से मैं वहां से गुजरूं, बिना कोई भाव मन में लाये..
कई बार कोशिश भी कि की तुम्हारी यादों को मिटा डालूं.. कई बार जलाने कि भी कोशिश हुई और जला भी डाला.. मगर इस शहर के रूमानियत से वह अहसास फिनिक्स कि तरह राख के ढ़ेर से फिर से जी उठता है.. जैसे लगता है कि मेरी रूह में समा चुकी हो तुम..
मेरी प्रीत भी तू,
मेरी गीत भी तू,
मेरी रीत भी तू,
संगीत भी तू..
मेरी नींद भी तू,
मेरा ख्वाब भी तू,
मेरी धूप भी तू,
माहताब भी तू..
मेरी खामोशी भी तू,
मेरी गूंज भी तू,
मेरी बूंद भी तू,
समुंद भी तू..
मेरी सांस भी तू,
मेरी प्यास भी तू,
मेरी आस भी तू,
रास भी तू..
मेरा नक़्स भी तू,
मेरी हूक भी तू,
मेरा अक्स भी तू,
मेरी रूह भी तू..
मेरा मान भी तू,
मेरा ज्ञान भी तू,
मेरा ध्यान भी तू,
मेरी जान भी तू..
मेरा रंग भी तू,
ये उमंग भी तू,
मेरा अंग भी तू,
ये तरंग भी तू..
मेरे जिगर के सरखे-सरखे में
कुछ और नहीं
बस तू ही तू..
मेरे लहू के कतरे-कतरे में
कुछ और नहीं
बस तू ही तू..
मेरी गीत भी तू,
मेरी रीत भी तू,
संगीत भी तू..
मेरी नींद भी तू,
मेरा ख्वाब भी तू,
मेरी धूप भी तू,
माहताब भी तू..
मेरी खामोशी भी तू,
मेरी गूंज भी तू,
मेरी बूंद भी तू,
समुंद भी तू..
मेरी सांस भी तू,
मेरी प्यास भी तू,
मेरी आस भी तू,
रास भी तू..
मेरा नक़्स भी तू,
मेरी हूक भी तू,
मेरा अक्स भी तू,
मेरी रूह भी तू..
मेरा मान भी तू,
मेरा ज्ञान भी तू,
मेरा ध्यान भी तू,
मेरी जान भी तू..
मेरा रंग भी तू,
ये उमंग भी तू,
मेरा अंग भी तू,
ये तरंग भी तू..
मेरे जिगर के सरखे-सरखे में
कुछ और नहीं
बस तू ही तू..
मेरे लहू के कतरे-कतरे में
कुछ और नहीं
बस तू ही तू..
क्यों चली गयी तुम? कहां चली गयी तुम? जाना ही था तो आयी क्यों थी? किसी को दिलासा दिलाकर छोड़ जाना अच्छा नहीं होता.. आ जाओ तुम, कहीं से भी.. बस उड़कर.. देखो तुम्हारे बिना मैं कितना अकेला हूं, कितना उदास हूं..