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Saturday, May 29, 2010

जानवरों से अधिक मासूम प्रेम अब हमें मयस्सर कहाँ

वो कई सालों तक हमारे साथ रहा.. हम बच्चों के जिद पर ही उसे घर में लाया गया था.. पटना सिटी के किसी पंछियों के दूकान से पापाजी खरीद कर लाये थे.. उससे पहले भी हमने कई बार कोशिश कि थी तोता पालने कि, मगर हर बार कोई ना कोई जुगत लगाकर सभी रफूचक्कर हो जाते थे..

दूकान वाले ने बताया था कि यह पहाड़ी तोता है, और उस जमाने में एक सौ पचास रूपये में तोता बहुत महंगा माना जाता था फिर भी पापाजी वही खरीद लाये थे.. बाकी तोतों से लगभग दोगुने साइज का था.. उसके पंख पर लाल, हरा और नीले रंग का निशान था.. पहले के अनुभव ने यही सिखाया था कि अधिकांश तोतों को तरह-तरह के रंगों में रंग दिया जाता है जिससे देखने में वह खूबसूरत दिखे और दाम भी कुछ ऊपर चढ़ जाए, सो पहली नजर में इसके पंख को लेकर भी ऐसा ही कुछ लगा था.. लगभग महीने भर हम इसे खूब नहलाते थे, जिससे इसका नकली रंग निकल जाए और यह अपने प्राकृतिक रंग में वापस आ जाये.. वह तोता भी बेचारा हैरान-परेशान, क्या करता, चुपचाप नहाता रहा.. जब उसके पुराने पंख झर गए और नए पंख आये, फिर समझ में आया कि यह इसका प्राकृतिक पंख ही है.. :) कुल मिलकर निहायत ही दिलकश पंछी था वह..

सब कुछ होने के बावजूद भी हम उसे कितना भी सिखाये कि कुछ बोले, मगर वह कुछ सिखा नहीं.. खुद में ही कुछ गुलगुलाता, और हम उसे ही उसका बोलना समझ लेते.. मेरी नानी जब भी घर आती थी तो घंटों बैठकर "बोल मिट्ठू सीत्ता-राम" तो कभी "कटोरे-कटोरे" सिखाना चाहती थी.. अब कभी मजाक में हम कहते हैं कि नानी उसको सिखा-सिखा कर मर गई, लेकिन उस नालायक को नहीं सीखना था सो नहीं सीखा.. :) एक हमारा रसोइया "विनोद जी" भी उसे खूब सिखाना चाहे थे, मगर वह भी नाकाम रहे थे..

पहले के तोतों के अनुभव से यह भी समझ में आ गया था कि इसका भोजन भी अन्य तोतों से कम से कम दोगुना है.. पिंजड़ा भी दोगुने साइज का ही खरीदना पड़ा था.. एक अलग चौकी भी बनवाया गया जो उसके पिंजडा से थोडा बड़ा था.. घर के छोटे बच्चों के जैसे ही कोई फल आया या कुछ ऐसा जिसे वह खा सके तो सबसे पहले उसे ही दिया जाता था..

एक घटना याद आ रही है कि कैसे एक बार उसे "लीची" खाने को हम दिए थे.. जैसा कि तोतों कि आदत होती है कि वह खाने में किसी कड़े चीज को ढूँढता है, सो वह लीची में भी सीधा अपना चोंच गडा दिया.. लीची में जैसे ही छेद हुई, वैसे ही रस का फव्वारा उसमे से फूट कर मेरे तोते के पूरे चेहरे पर फैल गया.. और वह बेचारा उससे इतना घबरा गया कि उस मीठे फल से भाग खड़ा हुआ.. बाद में धीरे-धीरे उसे भी मजे लेकर खाना सीख लिया..

अमूमन जैसा कि दूसरों के घर में तोतों को देखते थे रोटी या चावल खाते, उससे ठीक अलग मेरा तोता वह कभी नहीं खाता था.. उसे किसमिस बेहद पसंद था.. संतरे भी चाव से खाता था.. अंगूर में तो उसकी जान ही बस्ती थी जैसे.. आम के महीनो में आम से उसका पिंजडा महकता रहता था.. सेब, पपीता.. बाद में वह उस पिंजड़े में इतना निश्चिन्त रहने लगा था कि मैं शैतानी में कमरे कि खिडकी-दरवाजे बंद कर के उसे पिंजड़े से जैसे ही निकलता, वह ५-६ सेकेण्ड मेरे आस-पास भटकने के बाद वापस उसी पिंजड़े में घुसने कि मसक्कत में लग जाता..

शुरुवाती दिनों में भैया उसे खाना देने से लेकर उसका पूरा ख्याल रखते थे.. भैया के घर से बाहर जाने के बाद मैं वही काम करने लगा.. मगर मैं उसकी पूरी फीस उससे वसूलता था.. पिंजड़े का दरवाजा खोल कर, हाथ अंदर घुसा कर उसे सहलाता, उससे खेलता.. मगर वह मुझे काटता नहीं था.. वहीं किसी दूसरे कि यह मजाल कहाँ कि वह एक अंगुली भी उसके पिंजड़े में डाल दे.. अगर किसी दिन उसे खाना देने में जरा सी भी देर हुई नहीं कि बस, किसी छोटे बच्चे सा रूठ जाता था.. फिर उसे अपने हाथ से एक-एक चने का दाना खिलाना पड़ता था.. मेरा गिना हुआ था कि वह कितना चने खाता है.. एक बार में 30 से 35 चने खाता था वह.. अगर भूखा हो तो 45-50 तक भी गिनती पहुँच जाती थी.. और अगर नखरे मारने के मूड में हो तो, चना मुंह में लेकर उसे काट-कूट के फ़ेंक देता था..

हमारा कोई एक नियत ठिकाना तो था नहीं, सो हम जहाँ कहीं भी जाते वहाँ वह हमारे साथ भी जाता.. इसी क्रम में वह पटना, बिक्रमगंज, राजगीर, गोपालगंज भी घूम चुका था..

बाद में मैं भी घर से बाहर निकल गया, अपनी जमीन तलाशने.. अब उसका ख्याल घर के नौकर-चपरासी करने लगे.. एक बार पापा-मम्मी मुझसे बोले कि "अब यह बूढा हो गया है, पता नहीं कब मर जाएगा.. पास में मरेगा तो अच्छा नहीं लगेगा, सो इसे उड़ा देते हैं.." मुझे बहुत बुरा लगा, क्योंकि अब जब यह अपनी सारी उड़न भूल चुका है.. प्राकृतिक रूप से रहना भूल चुका है, और बूढा भी हो गया है तब इसे नए सिरे से अपनी जिंदगी शुरू करने कि मशक्कत करनी परेगी.. जब वे दो-तीन बार यही बात कहे तब एक दिन मैंने कह दिया, "फिर तो कायदे से जब मनुष्य बूढा हो जाये तब उसे भी घर से निकाल दिया जाना चाहिए?" आगे मुझे कुछ कहने कि जरूरत नहीं पड़ी..

एक दिन जब मैं होस्टल में था तब घर से मम्मी का फोन आया.. हैरान-परेशान थी और रो भी रही थी.. बोली कि एक चपरासी कि गलती से वह उड़ गया.. मुझे उसके भागने का दुःख हुआ.. मगर सबसे अधिक दुःख और भय इस बात को लेकर था कि अब वह अपनी जिंदगी कैसे लड़ पायेगा.. कोई कुत्ता-बिल्ली कहीं उसे मार ना दिया हो..

खैर उसे जाना था सो वह चला गया.. अब भी कभी रात सपने में देखता हूँ कि मेरा तोता भूखा है और मैं उसे खाना देना भूल गया हूँ.. सुबह तक वह सपना भी भूल जाता हूँ अक्सर.. मअगर जेहन में कहीं ना कहीं वह याद बची हुई है जिस कारण उसे सपने में देखता हूँ.. हाँ, मगर यह भी प्रण कर चुका हूँ की कभी किसी पंछी को कैद में नहीं रखूँगा..

अभी कुछ दिन पहले अराधना अपने फेसबुक पर अपडेट कि थी की "kali no more..." अभी कुछ दिन पहले ही कली को लेकर वह आई थी.. 'कली' के जाने से पहले हर दूसरे दिन वह फेसबुक या बज्ज या ब्लॉग पर दिख ही जाती थी.. मगर 'कली' के बाद वह भूले बिसरे ही कहीं दिखी है.. बीच में उसकी एक पोस्ट आई थी "अब सब कुछ पहले जैसा है".. मुझे दुःख हो रहा था की आभासी दुनिया की एक अच्छी मित्र दुखी और परेशान है.. उम्मीद करता हूँ की जल्द ही वह इस दुःख से बाहर निकल आएगी.. अराधना ने कली का एक वीडियो फेसबुक पर भी डाली थी जिसे उसके फेसबुक मित्र यहाँ देख सकते हैं..

Wednesday, October 15, 2008

मत पढिये इसे, सब बकवास लिखा है

आज 2-3 शीर्षकों के ऊपर मैं चर्चा करना चाहूंगा जिसके बाद बुद्धिजिवी वर्ग के प्राणी बहस तक कर सकते हैं कि क्या इस तरह की चिट्ठाकारी को आप साहित्य का दर्जा दे सकते हैं? और उन लोगों का भ्रम भी टूटेगा जो चिट्ठाकारिता को एक साहित्य के रूप में सामने रख कर पढने कि नाकाम कोशिश करते हैं.. तो चलिये चलते हैं पहले बकवास की ओर..

कौवा क्या सोचता होगा?

क्या अजीब शीर्षक है ना? मगर आपने कभी सोचा है कि इतनी जगह से दुत्कारे जाने के बाद भी वो आपके द्वार पर दुबारा क्यों आता है? क्या उसके मन में रोष जैसी भावना नहीं आती होगी? कभी कोई प्रेमिका अपने प्रीतम की याद में(साठ के दशक वाले स्टाईल में सोचे तभी कल्पना कर सकते हैं) किसी कौवे से प्राथना करती दिखेगी तब उस समय एक कौवा क्या सोचता होगा?

बहुत पहले की बात है.. हमने घर में हमने एक तोता पाला था.. बहुत प्यार से.. मेनका गांधी से भी छुपा कर.. एक जाड़े की नर्म धूपा में(कुछ याद आ रहा है क्या? हां जी गाना.. या जाड़े की, नर्म धूपा में.. आंगन में लेट कर.. अर्रर्र.. मैं विषय से भटक रहा हूं, अगर कहीं विषय जैसी कुछ चीज होगी तो..) हम उसका पिंजड़ा रख छोड़े थे.. तभी एक कौवे ने आकर उसे बहुत परेशान किया.. तभी हमें कौवे की एक बात पता चली.. हमारा तोता बेचारा, जब तक वहां कौवा था तब तक कौवे की भाषा में बोलता रहा.. पहले तो हमें लगा कि तोता परेशान होकर कांय-कांय चिल्ला रहा है सो उस कौवे को मार कर भगा दिया.. बाद में खूब सोचा तब जाकर महसूस हुआ कि वो बेचारा तड़प रहा था कौवे से बात करने के लिये.. इतना ज्यादा बेचैन था कि वो सुध-बुध खोकर भूल बैठा कि वो तोता है, कौवा नहीं.. और उसी की भाषा में बोलने लगा.. बाद में पाया कि रात में कभी किसी बिल्ले ने आकर तंग किया तो भी कौवे की भाषा में पुकारता था.. कांय-कांय.. नेवला परेशान करे तो भी वहीं भाषा.. कांय कांय..

मन में आया कि कहीं मैकाले की कोई प्रजाति कौवे में भी तो नहीं थी जिसके कारण मेरा तोता अपनी भाषा का सम्मान करना छोड़कर अंग्रेजों.. आं.. माफ किजियेगा कौवे की भाषा में बोलने लगा है..(कॄपया यह प्रश्न ना उठायें कि कौवे अंग्रेज कब से हो गये या फिर अंग्रेज कौवे कैसे.. एक काला और दूजा गोरा.. दोनो में समानता कैसे.. भई हम ब्लौगरों का यही काम ही होता है.. जो चाहे सिद्ध कर सकते हैं.. वैसे भी भई मेरा चिट्ठा है, मेरा लेख है.. जो मन में आये लिखूंगा).. ;) फिर मैंने सोचा कि जब यही कौवा इतना अच्छा है तो क्यों ना कौवा ही पाल लिया जाये.. वैसे भी एक दिन मेरा तोता पिंजड़े से संन्यास लेकर निकल भागा.. अब संन्यास से फिर कुछ याद आ रहा है.. गांगुली.. अजी क्या बतायें हम.. हमको कितना अच्छा लगता है.. वो भी संन्यास ले लिये हैं..

उस दिन से अब तक प्रतिक्षा में हैं कि कब कोई कौवा उस पिंजड़े में आकर बैठता है.. मगर उसकी प्रजाति में गुलाम होना नहीं लिखा है.. सो अब क्या करें.. देखिये.. आपने तो मुझे विषय से ही भटका दिया था.. विषय था कौवा क्या सोचता होगा? मैंने बहुत सोचा और अंततः समझ भी गया.. वो सोचता होगा "कांव-कांव".. अगर मैं गलत हूं तो साबित करके दिखायें.. :D

चलिये अब दूसरे बकवास की ओर चलते हैं.. क्या अभी भी आपमें इतनी उर्जा बची हुई है कि दूसरा बकवास भी पढेंगे? अगले पोस्ट का इंतजार तो कर लें.. :)