Wednesday, February 25, 2009

एक लड़की के डायरी के पन्ने(पहली मुलाकात - भाग तीन)

कुछ दिन पहले की बात है, बातों ही बातों में उसने मुझे कहा था, "तुम्हारे बाल बहुत सुंदर हैं.. इसे कभी छोटा मत करना.. मैं तुमसे जब भी मिलूंगा तब तुम्हें खुले बालों के साथ देखना पसंद करूंगा.." मैंने उसकी बात बखूबी रखी, और आज खुले बालों में ही आयी थी.. अब चूंकी उसने मुझे खुले बालों में देख ही लिया था सो अब मुझे अपने बालों को थोड़ा छोटा करने के लिये परमिशन भी लेना था.. ओह नो!! उसने मना कर दिया.. मेरा सारा एक्सप्लानेशन गया कचरे में.. अंततः उसने हां कह ही दिया मगर एक आग्रह के साथ की इसे बहुत छोटा मत करना.. पता नहीं लड़कों को लंबे बालों से इतना लगाव क्यों होता है.. अगर एक हफ्ते के लिये भी इतने लम्बे बालों को किसी लड़के को संभालना पर जाये तब समझ में आये उन लोगों को कि कितनी तकलीफ उठानी पड़ती है इन लम्बे बालों के कारण.. मेरा दावा है कि उसके बाद वे छोटे बालों की ही वकालत करते फिरेंगे.. अगर इन बातों को यहीं छोड़ कर दूसरी बातों पर ध्यान देते हैं तो, उसके बात करने का ढ़ंग.. किसी भी बात को विस्तार से समझाना.. इट्स जस्ट अमेजिंग.. इट वाज लाईक आई वाज जस्ट फ्लैटर्ड.. जो भी हो, मगर मुझे उसके एक-एक शब्दों से सुखद अनुभूती हो रही थी..

फिर हमारी बातें उसके हाथों पर बने हुये टैटू पर केंद्रित हो गया.. बड़े ही अच्छे ढ़ंग से उसने बताया कि टैटू कैसे कराते हैं.. इसके क्या-क्या नुकसान हो सकते हैं.. जानकारियों का तो जैसे वह भंडार अपने साथ लेकर घूम रहा था.. किस देश में लोग किस तरह के टैटू पसंद करते हैं.. भारत के किस शहर में कहां अच्छे टैटू बनवाये जा सकते हैं.. फिर कुछ बाते सिनेमा पर भी हुई.. मुझे हिंदी सिनेमा की ज्यादा समझ नहीं है और मैंने देखे भी बहुत कम ही हैं.. सो बस चुपचाप उसकी बाते सुनती रही.. 1930 के जमाने से लेकर अभी तक के लगभग हर सिनेमा और उसके गानों की जानकारी अपने साथ समेटे हुआ था.. मैं बस इंतजार कर रही थी कि कुछ इंग्लिश मूवीज पर भी बातें हो, मगर जब उस पर भी बातें हुई तो उसके पास जानकारियों का खजाना ही निकला.. धीरे-धीरे यह अहसास हुआ की उसे लगभग दुनिया के हर हिस्से के हर भाषा की अच्छी मूवीज की जानकारी थी.. लेटेस्ट टेक्नॉलॉजी की बात हो या फिर लेटेस्ट गैजेट की, उसके बताने और समझाने का तरीका ही बता दे रहा था की वह कितना प्रैक्टिकल है और अपने मैनेजमेंट की डिग्री का बखूबी इस्तेमाल करना भी जानता है..

इसी बीच उसकी कॉफी खत्म हो चुकी थी और उस कॉफी शॉप के एक कर्मचारी ने फीडबैक फार्म भी लाकर दे दिया.. वह हमें दो फार्म दे गया था.. जिसमें से एक को ही हम दोनों ने शेयर किया.. पहले मैंने लिखना शुरू किया और वह बहुत गौर से मेरी हैंण्डराईटिंग को देखता रहा, और फिर आधे के बाद वह फार्म मैंने उसे पकड़ा दिया.. वह अचानक इस प्रस्ताव से अकचका सा गया.. वह तो अपने ही फार्म को पूरा भरने के इरादे से था.. पता नहीं लड़के सच में इतने ही नासमझ होते हैं या फिर हमेशा नासमझी कि एक्टिंग ही करते हैं? फिर उसने मेरे हाथों से मेरा आधा भड़ा हुआ फार्म ले लिया और उसे पूरा कर दिया.. वह उस फार्म को वापस करने ही जा रहा था कि मैंने उसके हाथों से वह फार्म ले ली, और उसे अपने पर्स का रास्ता दिखा दी.. इतनी आसानी से मैं अपने इस पहले ज्वाइंट वेंचर को कैसे जाने देती? :) और दूसरे फार्म को जल्दी-जल्दी भर कर उसे वापस कर दी..

इसका अगला भाग ही अंतिम भाग है उसे पढ़ना ना भूलें.. वैसे यह एकता कपूर के धारावाहिक का भी रूप ले सकता है, मतलब जितना चाहो उतना ही बढ़ता चला जाये.. कुछ गाने नहीं ना सही, मगर कुछ कवितायें तो डाल ही सकता हूं.. अगर आप लोग कहें तो थोड़ा और रोमांटिक बना सकता हूं.. या फिर "एक लड़के की डायरी के पन्ने(पहली मुलाकात)" नामक कहानी आपको एक लड़के के नजरीये से भी दिखा सकता हूं.. अरे दोस्तों फागुन का महीना चल रहा है, सो थोड़ा रोमांटिक होना मेरा भी फर्ज बनता है.. ;)

एक लड़की के डायरी के पन्ने(पहली मुलाकात - भाग एक)
एक लड़की के डायरी के पन्ने(पहली मुलाकात - भाग दो)

Tuesday, February 24, 2009

एक लड़की के डायरी के पन्ने(पहली मुलाकात - भाग दो)

उन पांच सेकेण्ड में मैंने उसकी कई बातों पर गौर किया.. गर्मजोशी से हाथ मिलाना, हाथों पर सफेद रंग का बैंड, कार्गो जींस, नाईकी के जूते, टी-शर्ट, हाथों में कोई घड़ी नहीं, और भी ना जाने क्या-क्या.. इस बीच मैं उसे अपनी बातों में उलझाये रखी.. यहां का काम खत्म हुआ या नहीं? अभी तक की यात्रा कैसी रही? मुंबई वापस कब जाना है? वगैरह-वगैरह.. मैं उसके जवाबों की परवाह किये बिना लगातार उसकी बात सुने जा रही थी.. एक सवाल के जवाब ने मुझे आश्चरय में डाल दिया.. मैंने पूछा, "इतना लेट किया मैंने, आप तो मुझे गालियां दे रहे होंगे?" और उसने कहा,"हां!" मैं बिलकुल चौंक गयी, मेरे लिये यह उत्तर आश्चर्यजनक इसलिये था क्योंकि मैंने पहली ही मुलाकात में अभी तक इतने स्पष्टवादी व्यक्ति से नहीं मिली थी.. क्या कोई इस तरह भी उत्तर दे सकता है? कम से कम सामान्य शिष्टाचार तो इसकी इजाजत नहीं देता है.. मगर यह लड़का!! उफ्फ!!! नो कमेंट्स एज पर नॉउ अबॉउट इट.. इस बीच शायद वह भी यह महसूस कर चुका था कि मुझे यह पसंद नहीं आया, सो उसने भी अपनी बातों को ढ़कने की बेहतरीन कोशिश की जिसे मैंने अपने मुस्कान के साथ सहमती दे दी जैसे मैं कह रही हूं कि मैं समझ गयी..

बातें करते हुये हम उस शौपिंग माइल के अंदर चले गये.. मुझे समझ नहीं आता है कि लोग मॉल के पीछे इतने पागल क्यों होते हैं? आई जस्ट हेट मॉल्स.. पता नहीं भविष्य में मेरे यह विचार बदलते हैं या नहीं.. अभी से इस पर कुछ भी कहना ठीक नहीं.. हम दोनों ही कहीं बैठने के लिये जगह तलाश कर रहे थे और एक कॉफी शौप में घुस गये.. बरिस्टा नाम था उसका, शायद..

मैं कई तरह की स्मृतियों को संजोने में लगी हुयी थी और दूसरी चीजों की परवाह करनी छोड़ दी थी.. किसका फोन आ रहा था मेरे मोबाईल पर मुझे इसकी भी परवाह नहीं थी.. जाने क्यों मेरी प्राथमिकतायें बदल चुकी थी.. मैंने उस फोन को नजर अंदाज करते हुये उसे ऐसे देखने की कोशिश करने लगी कि उसे समझ में ना आये कि मैं उसकी एक-एक गतिविधि को गौर कर रही हूं.. फिर से फोन.. इस बार मैं फोन उठा लिया और उसकी ओर ध्यान से देखने लगी.. वह मेनू कार्ड पढ़ने व्यस्त था, और थोड़ी ही देर में काऊंटर पर उसका आर्डर देने और पैसे देने मे व्यस्त हो चुका था.. जब तक वह वापस आता तब तक मैंने फोन रख दिया.. अब उसकी बारी थी, कोई उसे फोन कर रहा था.. शायद उसकी मां थी.. रौंग गेस.. दीदी..

खैर जो भी हो, छोटी सी बात करके उसने फोन रख दिया और मुझे अपने दोस्तों और घर वालों की तस्वीरें अपने मोबाईल में दिखाने लगा.. इस चक्कर में मेरी अंगुली से उसकी अंगुली टच हो गई.. यह तीसरी बार ऐसा हुआ.. उफ्फ.. पता नहीं क्यों मैं यह गिनती गिने जा रही हूं.. फिर उसने मेरा मोबाईल पूरे अधिकार से ले लिया, बिना पूछे.. मैंने भी मना नहीं किया, जैसे उसे पता था कि मैं बुरा नहीं मानूंगी.. थोड़ी देर बस यूं ही हाथों में नचाता रहा और बाते भी करता रहा.. यहां आने में उसके साथ क्या क्या हुआ? ऑटो वाला कैसे बातें कर रहा था.. उसके ऑफिस में आजकल क्या चल रहा है.. मेरा काम कैसा चल रहा है.. अपने कालेज के किस्से.. एकेडमिक अचिवमेंट्स.. और भी ना जाने क्या-क्या...

फिर मेरे मोबाईल के कौंटैक्ट में जाकर अपने नाम "संजय जी" को बदल कर "संजू" कर दिया.. मैं अभी तक सोच में हूं कि मैंने कई महिनों का समय लिया मगर "संजय जी" को "संजूं" नहीं कर पायी वहीं उसे यह कैसे इतनी आसानी से कुछ ही सेकेण्ड में कर दिया.. बातें करते करते उसके पिछले प्यार पर पता नहीं कैसे बातों का रूख मुड़ गया.. उसने साफ तौर पर नकार दिया मगर मैंने उसकी आखों में अब भी उस प्यार की झलक देख ली.. पता नहीं क्यों, मुझे कुछ जलन का भी अहसास भी हुआ जो क्षणिक था.. क्योंकि उसके प्यार को लेकर उसकी आंखों में सच्चाई दिख रही थी.. पहला प्यार इतनी आसानी से पीछा नहीं छोड़ता है, और ना ही भुलाये भुलता है.. शायद यह सच है.. "खैर छोड़ो.." यह हम दोनों ही एक साथ बोले और दोनो ही हंस दिये..

एक लड़की के डायरी के पन्ने(पहली मुलाकात - भाग एक)

Sunday, February 22, 2009

एक लड़की के डायरी के पन्ने(पहली मुलाकात - भाग एक)

बस 200 कदम की दूरी से मैं उस अजनबी को देख रही थी, जो इस मुलाकात के बाद मेरे लिये अजनबी नहीं रहा.. जाने क्यों मैं उसे अजनबी का नाम दे रही हूं, जबकी मैं उसे अपने किसी भी अन्य मित्र से ज्यादा जानती हूं.. मेरे उन मित्रों से भी ज्यादा जिन्हें मैं बरसों से जानती हूं और इसे बस आठ महिनों से ही..

उसे देखने से साफ लग रहा था कि वह इस उम्मीद में था कि मैं बायें से आऊंगी, और मैं इस इंतजार में थी कि वह मेरी ओर पलट कर देखे जहां मैं कई तरह के विचारों और भावनाओं को समेटे हुई थी जिसे चंद शब्दों में समेट पाना संभव नहीं है.. मैं बस इतना ही लिख सकती हूं कि किसी तरह अपनी भावनाओं पर काबू पाने की कोशिश में थी और कई तरह के विचार मुझे परेशान भी कर रहा था जो मेरे हर उस सांस से ज्यादा कीमती थी जिसे मैं उस समय ले रही थी..

पूरे 2 मिनट तक वहां खड़ी होकर बहुत सूक्ष्मता से मैं उसके हर गतिविधि का मुआयना किया.. अंततः मेरे दिमाग ने मुझे झकझोरा और मुझे याद दिलाया कि मेरे पास सिर्फ 1 घंटा और 20 मिनट है क्योंकि मुझे 12 बजे अपने ऑफिस के लिये निकल जाना होगा.. मिलने का समय मैं अपने समय सारणी और आने वाली घटनाओं पर छोड़ रखी थी.. एक नजर अपनी घड़ी पर डाल कर मैंने ठंढ़ी सांस ली और उसकी ओर बढ़ चली.. बस चार कदम बढ़ने पर ही अचानक से वह मेरी ओर मुड़ गया.. हमारे बीच एक बेआवाज संवाद स्थापित हो चुका था जो आंखों से और चेहरे पर की मुस्कान से साफ झलक रहा था, जो लगभग 4 सेकेण्ड तक चला जब तक मैंने अपनी पलकें नहीं झपकायी..

बहुत पहले उसने मुझे अपनी एक तस्वीर भेजी थी जिसका शीर्षक में खुद को शैतान बताया था.. अगर वह खुद को शैतान बता रहा था तो यह शैतानियत की पराकाष्ठा ही थी जो मुझे उसकी ओर जाने क्यों खींचता है और अनायास ही मन में एक सम्मान का स्थान भी बनाता है.. यह सम्मान सिर्फ उसकी आवाज या एक अच्छा कवि होने के कारण नहीं है.. यह उसके संपूर्ण व्यक्तित्व के कारण है जो उसे इस पागल भीड़ और ऐसे व्यक्तियों से अलग करता है जिनसे आप हर पल मिलते हैं.. किसी की भावनाओं कि कद्र करना ही उसकी सबसे बड़ी खूबी है जो उसे किसी अन्य से अलग करता है.. मैं सच में जानने को उत्सुक हूं कि किस तरह वह खुद को आज के इस मुलाकात में भी शैतान साबित करना चाहे.. मुझे पता है वह ऐसा नहीं है..

अब तक मैं उसके पास पहूंच चुकी थी और हमने एक दूसरे को "हाय" कहकर अभिनंदन भी किया.. मैंने लगभग दो सेकेण्ड तक इंतजार किया कि शायद वह अपना हाथ मेरी ओर बढ़ाये हाथ मिलाने के लिये.. फिर मैंने ही शुरूवात करते हुये अपना हाथ आगे बढ़ाया.. मेरी तरफ से, अगर वह अपना हाथ पहले आगे बढ़ाता तो मैं ज्यादा पसंद करती.. मगर मेरी सोच के मुताबिक, मैं पिछले कुछ मिनटों से उसे देख कर खुद को तैयार कर रही थी और अभी वह इसी प्रक्रिया से गुजर रहा था..

(इस पोस्ट के लिये बस इतना ही.. पाठकों के ऊपर निर्भर करता है कि मैं इस डायरी वाले कहानी को आगे बढ़ाऊं या नहीं.. आप ही मुझे सलाह दें.. अगर आप इसे और आगे पढ़ना चाहेंगे तभी मैं इसे आगे बढ़ाऊंगा.. :)) यह आप पर निर्भर करता है कि इसे किस्सागोई समझें या सच्चाई..

Sunday, February 15, 2009

लईका के शहर के लागल बा हवा

पिछले साप्ताहांत की बात है.. मैं अपने मित्रों के साथ बैठकर बातें कर रहे थे.. बातें होते-होते जाने कैसे शादियों पर बात होने लगी.. शायद इसका कारण यह रहा हो कि आजकल हर दूसरे-तीसरे दिन कहीं ना कहीं से किसी ना किसी कि शादी की खबर सुनने को मिल रही है.. प्रसंग आगे चलने पर दहेज पर भी बातें हुई.. मेरे एक मित्र, जो हम सभी मित्रों में अकेले हैं जो गांव से सीधा संबंध रखते हैं, ने अपना अनुभव सुनाया..

उसके मुताबिक जब वह अपने गांव गया था और उसकी शादी पर बात हुई तब उसने सबसे पहले साफ मना कर दिया की एक तो अभी शादी नहीं करनी है और दूसरी जब भी उसकी शादी होगी तब उसमें दहेज की कोई गुंजाईश ना हो.. इस पर उसके भाई की प्रतिक्रिया थी, "का भईया! पगला गईल बा का?" आगे उसने बताया की वह यह बात अपने सिर्फ अपने घर वालों से ही कहा था, उसका कहना था कि अगर वह अपने गांव के मित्रों के सामने यह बात कहता तो उनकी यही प्रतिक्रिया होती, "लईका के शहर के हवा लाग गईल बा.."

मेरे मित्र के मुताबिक जब उसने पहली बार यह बात अपने घर में कही थी तब कोई भी उससे सहमत नहीं हुआ था.. मगर वही बात लगातार दोहराते जाने पर धीरे-धीरे उसके घर वाले भी सहमत होते जा रहे हैं.. विरोध का स्वर पहले जितना नहीं है..

क्या बदलाव ऐसे ही नहीं आते हैं धीरे-धीरे? बस जरूरत है इसकी पहल करने की.. स्वयं मेरे मित्र के शब्दों में, "अगर वह कभी अपने गांव से बाहर निकल कर बाहर की दुनिया नहीं देखता तो उसके विचार भी किसी और को देख कर यही रहता की लईका के शहर के हवा लाग गईल बा!!"

मुझे उसकी बात सुन कर मनोज तिवारी का एक गीत याद आ गया जो कुछ इस प्रकार था, "लईकी के शहर के लागल बा हवा.. औरी पढ़ावा!!" जिसके ऊपर मैंने यह शीर्षक रखा है..

Saturday, February 14, 2009

तुम मुझसे इतने दिन गुस्सा कैसे रह सकती हो?

- इस खेल में बस नौ खाने ही क्यों होते हैं?

- मुझे क्या पता?

- फिर किसे पता होगा?

- सब समझती हूं, मुझे बातों में उलझा कर इस बाजी को जीतना चाहते हो..

- जहां खाने सिर्फ नौ हों वहां एक बार बाजी निकल जाने पर जीतने की संभावना वैसे भी कम ही हो जाती है.. तुम तो इसे ऐसे भी जीत रही हो..

- लिखना ही है तो कॉपी पर लिखो ना, मेरे हाथों पर क्यों लिख रहे हो?

- कुछ नहीं, बस तुम पर लाईन मार रहा हूं..

- कोई बाते बनाना तो तुमसे सीखे..

- और मुझे बनाना तुमसे..

- ठीक है, ठीक है.. ये मैंने अपना कुट्टा लगा दिया है.. अब मेरे चेहरे को छोड़ कॉपी भी एक बार देख लो..

- कॉपी क्यों देखूं? जब अपने जीवन की किताब पढ़ रहा हूं..

- नजर हटाओ, मुझे शर्म आती है.. अब तुम्हारा चांस है.. एक बार कॉपी भी देख लिया करो, कहीं कोई बेईमानी तो नहीं कर रहा है?

- ये क्या, तुमने सच में बेईमानी की है.. यह तुम जान कर हार रही हो..

- हां!!

- मैं बेईमानी वाला खेल नहीं खेलता हूं, चाहे वो बेईमानी मुझे जीताने के लिये ही हो..

- देखो, तुम जीत गये ना?

- तुम्हें जानबूझकर मुझसे हारकर क्या मिलता है जो हारती हो?

- बस ऐसे ही.. तुम नहीं समझोगे..(और वो हंसने लगी)

हर हार में तुम जीत खोजती थी, चाहे वो कट्टम-कुट्टा का खेल हो या बिंदुओं को मिलाकर चौखट बनाने का.. जीतते समय भी जानबूझकर हार जाती थी और तुम्हारी खुशी देख कर मैं भी खुश हो लेता था.. कई बार जानबूझकर हारने की कोशिश करने पर भी हार नहीं पाता था, कोई ना कोई कुतर्क हमेशा तुम्हारे पास होता था हारने का.. फिर आज अचानक इस जीत से तुम्हें खुशी कैसे मिलने लगी? या फिर से मैं ही जीता हूं जिसे मैं समझ नहीं पाया और तुम खुश हो? कुछ समझ नहीं आ रहा है.. जिंदगी के कुछ प्रश्न कभी समझ नहीं आते हैं..


नोट - यह शीर्षक पूजा के चिट्ठे से लिया गया है

एक कविता बिना शीर्षक की

साथ बिताये वो
अनगिनत पल,
हर पल में गुथे
अनगिनत शब्दों की मोतियां..
अब याद के अलावा
कुछ शेष नहीं..
अब भी इन
खामोशियों की चीख,
मीलों तक सुनाई देता है
सर्द खुश्क रातों मे..
वो आवाजें जो दिलों को
नश्तर सा छेद जाती है..
एक बेआवाज तड़प
ही बाकी है सिर्फ..
क्या यह आवाज तुम तक भी जाती है?

Friday, February 13, 2009

एक के घर में चोरी हुआ, सियार बोले हुवां-हुवां. मौज लो दोस्तों, मौज

कभी कभी लगता है जैसे यह हिंदी ब्लौग जगत भी किसी सियार के दल से कम नहीं है.. एक ने किया हुवां और चहुं ओर से आवाज आयी.. हुवां... हुवां...

एक किस्सा कालेज का याद आता है.. होस्टल का जमाना था.. पूरी रात गप्पों पर ही बीत जाया करती थी.. उन्हीं गप्पों में अगर किसी ने अपना किस्सा सुनाना शुरू किया कि "कुछ साल पहले मेरे घर में चोरी हुई थी.." बस अब क्या एक एक करके सभी के घर में चोरी होनी शुरू हो जाती थी.. सभी के पास कोई ना कोई किस्सा होता ही था कि उनके घर में या पड़ोस में कहीं चोरी हुई हो..

यहां आमतौर से मैंने यही देखा है कि अगर कोई किसी के पक्ष में कुछ लिखा है तो उस पर आने वाले सारे कमेंट उसी के पक्ष में होती है.. अगर गलती से किसी ने उसके विरोध में लिख भी दिया(चाहे संभ्रांत भाषा में ही क्यों ना लिखा हो) तो या तो उसका कमेंट डिलीट कर दिया जाता है या फिर सभी लट्ठ लेकर उसके पीछे पर जाते हैं.. तर्क-वितर्क-कुतर्क कुछ भी चलेगा, मगर इसे चुप कराओ, यहां से भगाओ या फिर जबरी सहमत कराओ..

अबकी बारी उस कमेंट लिखने वाले साहब/साहिबा की.. आखिर हिंदी ब्लौग के ऐसे कितने पाठक हैं जिनका अपना कोई भी हिंदी ब्लौग ना हो? 10% भी नहीं होगा.. तो अब बारी आती है उस पाठक की जो अब ब्लौगर का किरदार बखूबी अदा करता है.. और अपनी बात अपने ब्लौग में लिखता है.. फिरसे वही बात वहां भी दोहरायी जाती है.. अबकी बार बस किरदार बदला हुआ है..

कुछ दिन ऐसा ही चलता है, फिर व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप का दौर चलना शुरू होता है.. छीछलेदारी भी खूब होती है.. अश्लील आरोप भी कई बार लगाये जाते रहे हैं.. 5-10 दिनों से लेकर 15-30 दिनों तक यही प्रकरण चलता रहता है.. फिर वे सभी कुछ दिनों तक ब्लौग से बाहर रहकर फिरसे वापस लौट आते हैं.. जिस बात को लेकर बहस आरंभ हुआ था वह किस गर्त में समा चुका होता है इसकी ना तो किसी को खबर होती है और ना ही फिकर.. उसका समाधान तो दूर की बात है..

मुझे इसी फरवरी में दो साल हुये हैं इस हिंदी ब्लौगजगत को गंभीरता से पढ़ते हुये.. यही चक्र हर बार खुद को दोहराता रहा है.. वैसे हमने बहुत कुछ सीखा भी है इस हिंदी ब्लौगजगत से.. मगर सबसे अच्छी बात जो सीखी है वो है मौज लेना.. जहां तक किसी ब्लौग पर गंभीरता से बहस होती रहती है, हम भी गंभीर पाठक के तौर पर जमे रहते हैं और कई बार प्रत्युत्तर भी कर जाते हैं.. मगर जैसे ही आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हुआ नहीं की बस हम साईड में खड़े होकर मौज लेना शुरू कर देते हैं.. कुछ उसी तरह जैसे किसी सड़क पर दो लोग आपस में गाली-गलौज कर रहे हों और पूरी भीड़ तमाशा देख कर खुश होती है की बिना टिकट तमाशा देख लिया..

अभी पिंक चड्डी पर भी वैसा ही तमाशा शुरू हुआ है और हम मौज ले रहे हैं.. आखिर अब हम भी मौज लेना सीख गये हैं..

कभी कभी लगता है कि अंग्रेजी में तीन साल खपाये होते तो महीने के कम से कम 100-200 डॉलर बन ही जाते वो भी गुमनाम रहकर, बेकार का ईधर आये.. मगर इस ब्लौग दुनिया ने हमें कुछ ऐसे अच्छे लोगों से भी मिलवाया है जिनके बारे में सोचकर मन संतुष्ट हो जाता है..

Thursday, February 12, 2009

पटना शहर क्या है?

पटना.. मैंने अब तक किसी शहर को जाना है तो वो है पटना.. किसी शहर को जीया है तो वो है पटना.. किसी शहर को दिल से अपना माना है तो वो है पटना.. किसी शहर ने मुझे अपना बनाया है तो वो है पटना..

इस शहर ने मुझे नाकामी भी दी तो वहीँ फर्श से अर्श तक भी पहुँचाया है.. कुछ पाने का जूनून होना सिखाया है तो वहीँ कुछ खोने के अहसास का मतलब भी बताया है.. किशोरावस्था से लेकर जवानी तक कुछ दिल में बस है तो वो पटना ही है.. एक से बढ़कर एक अच्छे मित्र भी इसी पटना ने दिए.. पटना ने ही सिखाया कि दोस्ती किस चीज का नाम है.. वही दुश्मनों से दुश्मनी भी वहीँ सीखी..

आवारागर्दी के किस्सों कि डायरी को मोटा भी मैंने पटना में ही बनाया है.. अपने पिता और बडे भाई कि छाया से अलग पहचान भी मुझे पटना ने ही दिया है.. पटना सिटी से लेकर दानापुर तक, ऐसा लगता है जैसे पूरा पटना ही मेरा है.. सच कहूँ तो पटना शहर मेरे दिलो-दिमाग पर एक नशे कि तरह छाया है.. ऐसा नशा जो उतरने का नाम ही ना ले.. पूरे भारत में बदनाम शहर पटना, जिसका नाम होना या बदनाम होना मेरे लिए कोई मायने नहीं रखता..



गोलघर से उचक कर पूरे पटना को देखने कि कोशिश करना, तो कभी गंगा किनारे बैठ कर ठंढी हवा से खेलना.. कभी म्यूजियम के सामने "सिलाव का खाजा" का आनंद उठाना, तो कभी कदमकुवां में फुटपाथ के बगल वाले दूकान कि लस्सी पीना.. मुनेर के लड्डू और आरा के उद्वंत नगर का खुरमा के किस्से भी अलग ही हैं.. प्यार करना भी इसी शहर ने सिखाया तो वहीँ कभी कभी हद से ज्यादा और बिना मतलब का कठोर हो जाना भी यही सीखा..

छठ पूजा में लोगों का उत्साह देखना हो तो भी पटना छोड़कर कुछ और याद नहीं आता है.. लड़कियों को घूरना भी मैंने पटना में बोरिंग रोड में ही सीखा(भैया कि कृपा ;)).. जिन्दगी का हर सही-गलत पाठ मुझे पटना ने ही सिखाया.. अच्छे-बुरे का ज्ञान कराया.. राजेंद्र नगर के चक्कर काटना, रात के अंधियारे में रंगीन चश्मा पहन कर स्कूटर दौड़ाना.. स्कूल कि दीवार फंड कर गोल्फ क्लब से बेकार परे गेंद चुराना, सुबह-सुबह उठ कर राजभवन के सामने स्केटिंग करना.. (पहली बार स्केट बोर्ड लेकर मैं और भैया ही वहां गए थे यह भी याद है.. लोंग घूर घूर कर हमें देख रहे थे कि यह क्या है.. :)) अलसाए सी दुपहरी में दिन भर आवारागर्दी करके लौटने पर मम्मी कि डांट खाना और उसे अनसुना करके मम्मी से खाना मांगना..

जितनी ठोकरे मुझे पटना ने दिए, उतना ही इस शहर ने मुझे संभाला भी है.. यह शहर मेरे लिए क्या है यह मेरे अलावा और कोई नहीं समझ सकता..

आज पूजा कि यह पोस्ट पढ़कर अचानक से ही मैं बहुत नौस्टाल्जिक हुआ जा रहा हूँ.. क्या आपके लिए भी इस शहर के कुछ भावनात्मक मायने हैं? अगर हैं तो आपकी एक पोस्ट मैं जरूर पढना चाहूँगा.. पटना पर पोस्ट लिखने के बाद अपना लिंक देना ना भूलें..

Tuesday, February 10, 2009

वेलेंटाईन डे से पहले ही दो घूसे

पिछले साल की बात है.. दिन शायद 12 या 13 फरवरी रहा होगा.. दोपहर के खाने के समय मेरे साथ काम करने वाली मेरी एक मित्र ने बातों ही बातों में ऐसे ही मुझसे पूछ लिया, "वॉट आर यू डूईंग ऑन 14 फेब?"

"नथिंग.." मेरा उत्तर था..

"यू आर नॉट गोईंग ऑन डेट?"

"नो.." इतना कहने के बाद मैंने भी उसका सवाल उसी से पूछ लिया, "वॉट अबाउट यू?"

"नो डा!! नो प्लान.." (तमिल में मित्रों को "डा" कह कर बुलाते हैं)

"व्हाई?"

"चुम्मा.."(तमिल में चुम्मा का मतलब "बस यूं ही" होता है)

अब मैंने उसे चिढ़ाया, "व्हाई नॉट यू आर कमिंग विथ मी? वी बोथ आर फ्री ओन 14!!"

"नॉट दिस ईयर, बट स्योरली नेक्स्ट ईयर आई विल कम विथ यू.." उसने भी बात हंसी में उड़ाते हुये कहा..

अब आज की ही बात है.. काफी वाले जगह पर संयोग से हम दोनों मिल गये.. मैंने उसे याद दिलाया, कि पिछले साल उसने क्या कहा था.. साथ ही यह भी कहा की इस बार तुम ना नहीं कह सकती हो.. मैंने आखिर एक साल इंतजार किया है.. थोड़ी देर तक मैं उसे चिढ़ाता रहा.. फिर जो भी हम दोनों के ही मित्र थे उन सभी को भी यह बात याद दिलायी, क्योंकि पिछले साल यह बातें उन लोगों के सामने ही हुई थी.. कुछ देर बाद मुझे दो घूसा मारी और चली गई.. अब आप ही कहिये, इसमें मेरी क्या गलती थी? मैंने तो बस उसे उसकी ही बात याद दिला दी थी.. :)

(जब मैं यह कंपनी ज्वाईन किया था तब ट्रेनिंग का समय भी किसी कालेज में बिताये गये समय जैसा ही था.. दोस्तों के बीच दोस्ती भी कालेज के जमाने जैसी ही थी.. हुल्लड़-हुड़दंग भी वैसा ही था.. नहीं तो इस तरह का मजाक प्रोफेशनल जीवन में नहीं किया जा सकता है.. :))

Monday, February 09, 2009

ताऊ की जर्मनी यात्रा

ये बात तब की है जब ताऊ गोटू सोनार का सारा माल उड़ा कर कहीं छिपने की जगह ढ़ूंढ़ रहा था.. तो उसके दिमाग में यह ख्याल आया कि क्यों ना जर्मनी चला जाऊं.. अपना राज भटिया तो है ही वहां, सो मौज से दिन गुजरेंगे.. सो बांधा उन्होंने बोरिया-बिस्तर, खबर दी राज भाटिया जी को कि मैं जर्मनी आ रहा हूं और पहूंच गये जर्मनी.. वहां हवाई-अड्डे पर राज भाटिया जी को ना देखकर हुये बहुत हैरान परेशान..

राज जी तो अलग ही जुगत में थे, उनका सोचना था कि यही ताऊ है जिसने मेरे पिस्से अभी तक वापस नहीं किये, इतनी आसानी से तो जाने ना दूंगा.. अबकी बार तो भारत से बाहर है और इसे तो अंग्रेजी भी ठीक से नहीं आता है, जर्मन तो दूर की बात.. पहले खूब परेशान करूंगा और फिर अपने पिस्से निकलवा कर ही छोड़ूंगा.. वो नहीं पहूंचे हवाई अड्डा उन्हें लेने.. अब ताऊ क्या करे? जर्मनी में तो राज भाटिया जी को छोड़कर और किसी को जानते ही नहीं थे.. उन्होंने सोचा क्यों ना फोन पर पता कर लूं.. ताऊ ने फोन किया.. उधर से राज भाटिया जी के बेटे ने फोन उठाया जो पता नहीं क्यों फुसफुसा कर बातें कर रहा था.. उन दोनों के बीच कुछ ऐसी बातें हुई जिसके बाद ताऊ ने सोचा कि जब बेटा इतना खुराफाती है तो बाप कैसा होगा, और ऊपर से तो मुझपर उधार भी चढ़ा हुआ है.. और यह सोचकर उल्टे पांव वहां से भारत भाग निकले..

तो आप भी सुने राज भाटिया जी के बेटे से अपने ताऊ ने क्या बातें की..

"पापा घर पर हैं?"

"हां!!"

"क्या मैं उनसे बात कर सकता हूं?"

"नहीं!!"

बेचारे ताऊ सोच में आ गये.. अब उन्हें किसी बड़े से तो बात करनी ही थी सो आगे उन्होंने पूछा, "मम्मी घर पर हैं?"

फिर से उधर से फुसफुसाहट की आवाज आयी, "हां!!"

"उनसे बात कर सकता हूं?"

"नहीं!!"

अब तक ताऊ चिढ़ चुके थे.. उन्होंने गुस्साते हुये पूछा, "कोई और बड़ा घर पर है?"

"हां!!" फुसफुसाहट भड़ी आवाज में ही उसने कहा.. "पुलिस!"

अबकी तऊ घबरा गये.. सोच में पड़ गये कि गोटू सुनार के पिस्से मैंने उड़ाये हैं, कहीं उसकी बात यहां तक तो नहीं पहूंच गई.. फिर सोचा कि पहले मामला जान लूं सो उन्होंने पूछा, "बेटा जरा पुलिस को फोन देना.."

"नहीं!!" बच्चे का सपाट सा उत्तर आया.. "वो अपना काम कर रहे हैं.."

"क्या कर रहे हैं?"

"पापा-मम्मी और दमकल वालों(फायरमैन) से बात कर रहे हैं.."

अबकी ताओ बेचारे सोच में आ गये कि क्या हो रहा है.. तभी उन्हें फोन पर तेज शोर सुनाई दी.. उन्होंने पूछा, "यह कैसी आवाज है?"

"हेलिकाप्टर का!!"

अब ताऊ थोड़ा ज्यादा ही घबरा गये.. जोर देकर उन्होंने पूछा, "सही-सही बताओ, क्या हो रहा है वहां पर?"

"ढ़ूंढ़ रहे हैं.." फिर से फुसफुसाहट की आवाज आयी..

"किसे ढ़ूंढ़ रहे हैं?"

बच्चे ने फिर फुसफुसाते हुये और हल्की हंसी के साथ कहा, "मुझे.."

इतना सुनना था कि बस ताऊ अगली फ्लाईट पकड़ कर वापस भारत भाग आये.. सोचा जिसका बेटा इत्ता खुराफाती बुद्धि का है उसका बाप तो उसका बाप ही होगा..

गोटू सुनार के बारे में जानने के लिये यहां पढ़ें..

Sunday, February 08, 2009

Blaze of Glory - द्वारा जॉन बॉन जोवी


मैं कुछ नया ना चेप कर आज यह गीत पोस्ट कर रहा हूं जो पिछले कुछ दिनों से मेरे मन में गूंज रहा है.. मेरे सर्वप्रिय आंग्ल भाषा के गायक जॉन बॉन जोवी द्वारा गाया हुआ यह गीत मुझे बेहद पसंद है.. इनकी सबसे बड़ी खूबी मुझे यह लगती है कि इनका जब कभी कोई नया अल्बम बाजार में आता है तो लगता है कि यह बॉन जोवी का अब तक का किया हुआ सर्वश्रेष्ठ निर्माण है जो अगले अल्बम के साथ ही झूठा लगने लगता है.. इनका हर अल्बम अपने आप में मील का पत्थर साबित होता है..

कभी फुरसत में इनके बारे में बताऊंगा, फिलहाल आप फुरसत से यह गीत सुनिये.. गिटार के हल्के धुन के साथ गीत शुरू होकर धीरे-धीरे हार्ड रॉक में तब्दील हो जाता है.. अगर इस गाने की पंक्तियों पर ध्यान देंगे तो पायेंगे कि किस कदर जोश से भरा हुआ गीत है जो हमेशा संघर्ष में लीन रहने का संदेश देती है..

फिलहाल आप इस गीत को सुने..

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I wake up in the morning
And I raise my weary head
I've got an old coat for a pillow
And the earth was last night's bed
I don't know where I'm going
Only God knows where I've been
I'm a devil on the run
A six gun lover
A candle in the wind

When you're brought into this world
They say you're born in sin
Well at least they gave me something
I didn't have to steal or have to win
Well they tell me that I'm wanted
Yeah, I'm a wanted man
I'm a colt in your stable
I'm what Cain was to Abel
Mister catch me if you can

I'm going out in a blaze of glory
Take me now but know the truth
I'm going out in a blaze of glory
Lord I never drew first
But I drew first blood
I'm no one's son
Call me young gun

You ask about my conscience
And I offer you my soul
You ask if I'll grow to be a wise man
Well I ask if I'll grow old
You ask me if I've known love
And what it's like to sing songs in the rain
Well, I've seen love come
And I've seen it shot down
I've seen it die in vain

Shot down in a blaze of glory
Take me now but know the truth
'Cause I'm going down in a blaze of glory
Lord I never drew first
But I drew first blood
I'm the devil's son
Call me young gun

Solo

Each night I go to bed
I pray the Lord my soul to keep
No I ain't looking for forgiveness
But before I'm six foot deep
Lord, I got to ask a favor
And hope you'll understand
'Cause I've lived life to the fullest
Let this boy die like a man
Staring down a bullet
Let me make my final stand

Shot down in a blaze of glory
Take me now but know the truth
I'm going out in a blaze of glory
Lord I never drew first
But I drew first blood
And I'm no one's son
Call me young gun
I'm a young gun



कल पढ़ें "ताऊ की जर्मन यात्रा" :)

Friday, February 06, 2009

अरे! मैं लेखक कब से बन गया?

मेरे कल के पोस्ट(हमें नहीं पढ़ना जी आपका ब्लौग, कोई जबरदस्ती है क्या?) पर सबसे अंत में रोहित त्रिपाठी जी का कमेन्ट आया, जिसका उत्तर पहले मैंने मेल में लिखा.. मगर बाद में लगा कि इसे सार्वजनिक करने में भी कोई बुराई नहीं तो मैं इसे पोस्ट कर रहा हूँ..

उन्होंने ने लिखा था -
प्रशान्त सर, लोग कुछ समझ कर ही तो मेल करते होगे ना आपको? आपके ब्लॉग पर 40 कमेन्ट उसके बेचारे के ब्लॉग पर एक भी नहीं और 40 कमेन्ट देख कर लगा कि शायद बहुत बड़े लेखक है जो कि इनके ब्लॉग पर इत्ते कमेन्ट आये इसलिए बेचारा भेज देता है कि आप कुछ लिख देगे उसकी पोस्ट पर तो मन कितना खुश हो जायेगा कि कितने बड़े लेखक ने उसके पोस्ट पर कमेन्ट किया :-) :-) कुछ सोचिये प्रशान्त भाई.

मेरा उत्तर है उन्हें -
आपका कहना सही है रोहित जी,

मगर शायद आप दूसरी बार मेरे चिट्ठे पर आये हैं(यह आपका मेरे चिट्ठे पर दूसरा कमेन्ट है सो बस एक अंदाजा लगाया है :)) सो कुछ बातें मैं पहले बताना चाहूँगा..

मैं कोई बड़ा या छोटा लेखक नहीं हूँ.. या यूँ कहें कि लेखक हूँ ही नहीं तो ज्यादा अच्छा रहेगा.. अगर आप मेरे कुछ पुराने पोस्ट देखेंगे तो आप जान जायेंगे कि मैं भी किसी आम ब्लॉगर कि तरह ही हूँ जिसकी कोई पोस्ट बहुत पढ़ी जाती है और 40-50 से ज्यादा कमेंट्स भी मिलते हैं तो वहीँ दूसरी तरफ कुछ को 3-4 से ज्यादा कमेंट्स नहीं मिलते हैं(और वे 3-4 कमेंट्स भी उन्हीं के होते हैं जिनसे एक तरह कि आत्मीयता हो गयी है इस चिट्ठाजगत में)..

मैं दिन भर में आने वाले लगभग हर पोस्ट पर एक नजर जरूर डालता हूँ और जो मुझे पढने लायक लगता है उसे पढता जरूर हूँ.. और जिसे भी देखकर ऐसा लगता है कि कमेन्ट करना चाहिए उस पर कमेन्ट भी जरूर करता हूँ.. मगर कमेंट्स से ज्यादा जरूरी पढना समझता हूँ..

एक महाशय मेरे हर पोस्ट पर अपने नये पोस्ट का विज्ञापन चढा जाते हैं.. और उनका वह विज्ञापन उस दिन आये लगभग हर पोस्ट पर दिखता था.. अगर बिना किसी पूर्वाग्रह के सच्चे दिल से कहूँ तो उनकी कवितायेँ मुझे पसंद है और कई कविताओं कि मैंने जम कर तारीफ भी कि है उनके पोस्ट पर.. मगर बिना पढ़े नहीं.. अच्छे से पढ़कर और सोच समझकर..

लगातार अच्छा लिखो, लोग खुद ही आयेंगे पढने के लिए.. हाँ कुछ दिन इंतजार करना भी होगा.. यही मेरा मानना है.. यहाँ जितने भी लोगों को ढेर सारे कमेंट्स मिलते हैं या ज्यादा पढ़े जाते हैं वे सभी या तो काफी दिनों से हिंदी ब्लॉग दुनिया में लगातार बने हुए हैं या फिर जबरदस्त लेखनी से कुछ ही दिनों में छा गए.. नहीं तो मैं आज देखता हूँ कि 2-3 साल पहले के कई चिट्ठाकार आज दिखाई नहीं देते हैं.. और यही यदा-कदा उनकी कोई पोस्ट आ भी जाती है तो पुराने लोगों को छोड़कर ना तो कोई उन्हें पढना चाहता है और ना ही टिपियाना चाहता है..

अब और क्या लिखूं?

आपका बहुत-बहुत धन्यवाद..

Wednesday, February 04, 2009

हमें नहीं पढ़ना जी आपका ब्लौग, कोई जबरदस्ती है क्या?

हर दिन कम से कम 6-7 मेल जरूर मिलता है ऐसा जिसका उद्देश्य कुछ ऐसा ही होता है कि मैंने अभी-अभी एक पोस्ट लिखा है.. आप जरूर पढ़ें और अपनी राय दें.. कुछ मेल तो इस तरीके से लिखा होता है जैसे हम तो मरे जा रहे हैं उनका पोस्ट पढ़ने के लिये.. ऐसे में अगर किसी को चिढ़ हो ऐसे मेल से तो मानव मनोविज्ञान तो यही कहता है कि बिना पढ़े उसे डिलीट कर दो, और मैं भी इस मानव मनोविज्ञान को भली-भांती निभा रहा हूं.. ऐसा हो सकता है कि जो कुछ वह महाशय अपने पोस्ट में लिखें हैं वह मेरी पसंद का हो, मगर फिर भी उसे पढ़ना ही होगा तो मैं ढूंढ कर पढ़ ही लूंगा..

कुछ मेल तो इस अंदाज में भेजा होता है जैसे वह कह रहे हों, "क्यों बच्चू! कभी देखा है ऐसा पोस्ट? वो तो हमी हैं जो ऐसा लिख पाते हैं और सबसे बड़ी बात तो यह है कि आपको हम मेल भी करते हैं.. अब इतना अहसान तो मान ही लो.."

कुछ चिट्ठाजगत के मित्रगण तो उस दिन आने वाले हर पोस्ट पर जाते हैं और पहले एक बधाई फिर अपने ब्लौग को पढ़ने का आग्रह और साथ में अपने नये पोस्ट का पता देते हैं.. बिकलुल यही कमेंट लगभग हर पोस्ट पर दिखता है, जिसे देखकर कोई भी समझ सकता है कि उन्होंने ना पोस्ट पढ़ा है और ना ही पढ़ने की इच्छा रखते हैं.. मगर साथ में चाहते हैं कि हर कोई उनका पोस्ट पढ़े भी और टिपियाये भी.. मैं किसी का नाम तो नहीं लूंगा, मगर समझने वाले समझ ही जायेंगे की मैं किनके लिये यह पोस्ट लिख रहा हूं.. वे लोग हो सकता है मुझे अख्खड़ भी समझें, कोई परवाह नहीं..

अगर सकारात्मक रूप से लें तो हिंदी के लिये यह अच्छा ही है, क्योंकि अंग्रेजी मेल में स्पाम का जन्म भी इसी तरह हुआ था.. कुछ ही दिनों में इस तरह के बल्क मेल हिंदी स्पाम में भी जगह बना ही लेंगे.. हिंदी अब अपना पांव पसार रही है.. मगर अभी मैं सकारात्मक लेना नहीं चाह रहा हूं.. मुझ पर कृपा करके इस तरह के मेल भेजना बंद करें.. अगर आपने सच में कुछ ऐसा लिखा है जो मेरे मुताबिक पढ़ने योग्य है तो उसे मैं कहीं ना कहीं से ढूंढ ही लूंगा.. इसके कई तरीके हैं.. एग्रीगेटर साईट्स, गूगल रीडर, फीड फेचर..

Monday, February 02, 2009

और किताबों से 1.5 घंटे की दूरी बढ़ गयी

मेरे लिये सबसे अच्छा समय किताबों को पढ़ने का बस में सफर करते समय होता था.. हर दिन सुबह में 1 घंटे और रात में लगभग 30 से 45 मिनट.. कुल मिलाकर 1.5 घंटे हर रोज.. जबसे मैंने गाड़ी खरीदने का सोचा था तभी से मेरे मन में यह बात थी की बाईक आने के बाद मेरा यह समय छीनने वाला है.. क्योंकि घर पहूंच कर और कुछ करने का मन ही नहीं करता है तो किताबों की क्या बात है? वैसे भी किताबें पढ़ने के लिये रात के समय बत्ती जलाना एक तरह से पूरे घर में सभी के लिये कष्टप्रद हो जाता है.. अब कौन सा समय निकालूं किताबों के लिये, मैं यही सोच रहा हूं..

कुछ कुछ किताबों की ही तरह कई जरूरी फोन भी मैं बस से ऑफिस आते या जाते समय कर लिया करता था.. अब उसके लिये भी अलग से समय निकालना पर रहा है.. मगर एक बात तो जरूर है, कई फोन मैं बस का इंतजार करते हुये समय बिताने के लिये भी किया करता था.. अब उस तरह के मोबाईल बिल से छुटकारा मिल रहा है.. मगर वो बाईक के पेट्रोल में एडजस्ट हो जाता है.. :)