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Friday, June 04, 2010

ब्लाह..ब्लाह..ब्लाह..

"मैं बहुत कम बोलती हूं ना, सो कभी-कभी बहुत दिक्कत हो जाती है.." पिछले दस मिनट से लगातार बोलते रहने के बाद एक लम्बा पॉज देते हुये वो बोली..

कुछ दिनों से लग रहा है कि हिंदीभाषी अब धीरे-धीरे बढ़ते जा रहे हैं मेरी कंपनी में, आज से तीन साल से तुलना करने पर उत्तर भारत के अधिक लोग दिखाई पड़ते हैं अब..

"मुझे यहां कोई हेल्प नहीं किया, जो कुछ अभी आता है वो सब खुद से ही करके सीखे हैं.. अरे, मैं भी कैसी हूं ना! तभी से खा रही हूं और आपसे पूछा भी नहीं.. मेरे बगल में बैठती है ना, क्या नाम है उसका? हां *******.. अभी परसों कुछ पूछे तो डांट दी.. मुझे रोना आ गया.. अब आप ही बताईये, आपसे कोई पूछता है तो आप उसे डांट दोगे क्या? आता है तो बता दो, आपका क्या जाता है.. नहीं आता है तो वही बोल दो.. और अगर टाईम नहीं है तो यही बोल दो.. डांटने कि क्या जरूरत है? अरे ये गट्टा आपको कैसा लगा? मम्मा बनाई है.. बहुत अच्छा बनाई है.. चावल का है, बेसन का नहीं.."

वो लगातार बोले जा रही थी.. पिछले तीन महिने से वो मेरे ही प्रोजेक्ट में मगर एक दूसरी टीम में एज अ ट्रेनी ज्वाईन की है.. हर दिन दोपहर साढ़े तीन बजे के लगभग मैं कैंटीन में जूस पीने जाता हूं, आज वह थोड़ी देर से खाना खाने आयी थी तो मुलाकात हो गई.. अमूमन इस समय कोई कैंटीन में होता नहीं है, मेरे इसी समय जाने कि असल वजह थोड़ी देर अकेले बैठने की ख्वाहिश होती है और उस समय पापाजी को अक्सर फोन भी किया करता हूं.. उसने साथ बैठने का ऑफर दिया तो मैंने मना नहीं किया.. पहली बार गौर से देख भी रहा था.. अगर दूरदर्शन के गुमशुदा तलाश केंद्र वाले उसके बारे मे बताते तो वह कुछ ऐसा होता - "कद पांच फुट दो इंच, रंग गेहुवा और चेहरा गोल है, दायें आंख के ऊपर कटे का निशान है.." :D

"मेरे साथ सबसे बड़ी प्रोब्लेम ये है कि मुझे जो आता है वो मैं समझ सकती हूं, मगर दूसरे को समझा नहीं सकती हूं.." अब अगर किसी दूसरे कि बातें अपनी सी लगती है तो आश्चर्य नहीं होता.. अब लगता है कि हर कोई किसी ना किसी मायने में हर किसी सा ही होता है.. "बचपन से चेन्नई में हूं मगर तमिल में परफेक्शन अभी तक आया नहीं है.. और चाहे कुछ भी, मगर अपने लोगों का एक्सेंट इनसे अलग होता है, सो कई बातें कहना कुछ और चाहते हैं और ये समझते कुछ और हैं.." हम्म्म!! ये भी अपना भोगा सत्य है.. मगर तीन साल में ही इससे मुझे निजात मिल गई है.. यह तो बचपन से है, अभी तक अपना एक्सेंट बदल नहीं पायी है.. हद्द है भाई.. "मुझे यहां काम करने में बिलकुल मन नहीं लगता है, मुझे जो टेक्नोलोजी पसंद है उस पर काम नहीं करा के मुझे विजुअल बेसिक पर काम दे रखा है.. मुझे जावा पसंद है.." यह कौन सी नई बात है.. यहां तो हर दुसरे प्रोजेक्ट में जाने पर एक नई टेक्नोलोजी पर काम करना पड़ता है.. मगर सोचने कि रफ़्तार बढती ही जा रही थी, वैसे भी अगर आप बोल नहीं होते हैं तो कुछ सोच रहे होते हैं..

वहां से उठने से पहले मैंने उसे सिर्फ इतना ही कहा कि अगर कोई भी डांटे तो उसी समय उसे बोल दो कि "यू शुड नॉट टॉक विथ मी लाईक दिस. इफ यू हैव एनी प्रोब्लेम देन गो थ्रू प्रोपर चैनल..".. "ओह!! ऐसा होता है क्या?".. "हां! कोई ऐसे ही किसी को नहीं डांट सकता है.. चाहे कोई भी हो, CEO ही सही.. कम से कम इस कंपनी में तो ऐसा ही है.."

अभी कुछ दिनों पहले मेरा एक मित्र भी कुछ ऐसे ही सवाल पूछ रहा था और शिकायत कर रहा था कि कोई मदद भी नहीं करता है.. शुरूवात में मेरी भी यही समस्या थी.. अब लगता है कि मैं इन सबसे ऊपर उठ चुका हूं.. ;)

जिस तरह से लगातार बोले जा रही थी, उससे तो मैं इसी बात पर खुश हूं कि मुझे इस तरीके का कोई सवाल नहीं पूछना पड़ा कि "हां बसंती, तुम्हारा नाम क्या है?" :D

Friday, June 20, 2008

और गधे को पहलवान बना ही डाला(अंतिम भाग)

कैंपस सेलेक्सन के दिनों में जिनका कैंपस हो जाता था वे लोग भी किसी को पार्टी नहीं देते थे.. बस इस इंतजार में कि जब मेरे सारे मित्रों का हो जाये तभी मैं पार्टी दूंगा.. सच कहूं तो पूरी कक्षा में एकता ऐसी हो गई थी जो मिशाल देने लायक थी.. मेरे साथ ये अक्सर होता आया है कि जिसकी मुझे चाह होती है वो मुझे नहीं मिलता है और जिसकी चाह नहीं होती है वो बैठे-बिठाये झोली में आ धमकता है.. मेरे साथ कैंपस के दिनों में भी यही हुआ..

21 जुलाई सन् 2006 का दिन था.. ठीक 1 महिना पहले मैं 21 जून को अपने पहले कंपनी में बैठा था(IBM).. 21 जुलाई को CSS कैंपस के लिये हमारे कालेज में आयी हुई थी.. हमारे बीच इस कंपनी कि छवि बहुत अच्छी नहीं थी और ना ही हमारे सिनीयर के बीच.. इस कारण से मुझे इस कंपनी में नौकरी करने की इच्छा भी नहीं थी.. मगर उस समय मेरे पास कोई भी नौकरी नहीं होने के कारण मेरे पास कोई और चारा भी नहीं था.. मेरे साथ मेरे कालेज के लगभग 450 विद्यार्थी भी इसके रिटेन परीक्षा में बैठे और उसमें से 18 विद्यार्थी को सेलेक्ट किया गया.. जब मैं रिटेन दे रहा था तब मन में सोच रहा था कि मेरा रिटेन में ना हो तो बढिया हो.. मगर जैसे-जैसे प्रश्न पढ़ता गया वैसे-वैसे उत्तर भी सूझता गया.. अब सही के बदले गलत उत्तर लिखना ना तो मेरी प्रकॄति है और ना ही मैं वैसा करने की स्तिथि में था क्योंकि मेरे पास कोई नौकरी नहीं थी.. हां मगर एक बात तो थी कि इसमें चोरी नहीं हुई थी और अगर हुई भी होगी तो मुझे पता नहीं चला.. Online परीक्षा हुई थी, सो चोरी के चांस बहुत काम हो गए थे..

जब रिजल्ट आने वाला था तब मैं अपने प्लेसमेंट भवन के नीचे अपने दोस्तों के साथ बैठा हुआ था.. शुरू में बस 5 लोगों का नाम भेजा गया कि इनका सेलेक्सन साक्षात्कार के लिये हो गया है.. मेरी मित्र श्रुति ने ना जाने कहा से मेरा नाम भी उसमें देख लिया और मुझे बधाई देने चली आई.. जब मैंने कहा कि मेरा नहीं हुआ है और वापस होस्टल जाने लगा तो उसने पूरे आत्मविश्वास से कहा कि कुछ देर रूक जाओ शायद कुछ और नाम आये और उसमें तुम्हारा भी हो.. थोरी देर मैं और रूक गया और अगली लिस्ट में मेरा भी नाम था.. तब उसने कहा कि होने पर पहली मिठाई मुझे ही मिलनी चाहिये..

मेरा अपना अनुभव है कि जब साक्षात्कार शुरू होता है तब जो कोई भी साक्षात्कार में पहले जाता है उसका सेलेक्सन होने की संभावना ज्यादा होती है क्योंकि उस समय साक्षात्कार लेने वाले बिलकुल फ़्रेश होते हैं और उनकी सोच सकारात्मक.. जैसे-जैसे समय बढता जाता है वैसे ही वो सुस्त होते जाते हैं और उनकी सोच भी धीरे-धीरे नकारात्मक होती जाती है..

मैं फिर से बाहर कक्ष में बैठा पेप्सी के प्रचार वाले लड़के की तरह सोच रहा था कि मेरा नंबर कब आयेगा.. जो आया बहुत बाद में.. मेरे मन में ये बैठ चुका था कि आज भी मेरा सेलेक्सन नहीं होगा और कहीं ना कहीं से मैं खुश भी था कि चलो ये अफसोस तो नहीं होगा कि मैंने जान-बूझ कर ये कंपनी छोड़ी और सच्चाई ये थी कि इस कंपनी में मैं जाना भी नहीं चाहता था..

साक्षात्कार लेने वाले Resume पर ज्यादा ध्यान दे रहे थे और जो भी उसमें लिखा था उसी से संबंधित प्रश्न पूछ रहे थे उससे ज्यादा कुछ भी नहीं.. मुझसे सबसे पहले उन्होंने लगभग 15-20 मिनट यूनिक्स पर प्रश्न पूछे और मैंने सारे का सही उत्तर दिया.. एक प्रश्न में अटका मगर उसका उत्तर भी दिया ये कहकर कि मैं इस उत्तर को लेकर संतुष्ट नहीं हूं मगर शायद यही होना चाहिये.. बाद में पता चला कि मैंने सही उत्तर दिया था.. फिर डाटा-स्ट्रक्चर से संबंधित प्रश्न पूछे गये जो लगभग आधे घंटे चला.. उसमें सारे का मैंने सही उत्तर दिया..

एक मजेदार घटना घटी डाटा-स्ट्रक्चर वाले राउंड में.. उन्होंने मुझसे मर्ज सार्ट बताने के लिये कहा.. मैंने बताया.. फिर उन्होंने मुझसे कहा कि इसका 'C' भाषा में प्रोग्राम लिख सकते हो क्या? मैंने कहा कि हां लिख सकता हूं.. फिर पूछा गया कि इसका अल्गोरीथ्म याद है तुम्हें? मैंने कहा कि नहीं याद है मगर मुझे इसका लाजिकल कांसेप्ट पता है सो मैं लिख दूंगा.. उन्होंने लिखने के लिये कहा.. मैंने लिखना शुरू किया.. मेरे हर एक लाईन लिखने के बाद वो मुझसे किसी दूसरे विषय पर प्रश्न पूछते फिर सॉरी कह कर आगे लिखने को कहते.. लगभग 5 मिनट के बाद उन्होंने मुझसे कहा कि कितना समय लोगे? मैंने कहा कि कम से कम 20 मिनट.. उन्होंने कहा कि कंपनी में शायद इतना समय तुम्हे ना मिले.. अब चूंकि मेरे मन में कोई डर था नहीं, कि सेलेक्सन हो चाहे ना हो कोई बात नहीं, सो मैंने वैसे ही उत्तर दे दिया कि कंपनी में मेरे पास अल्गोरीथ्म होगा और नहीं भी होगा तो कम से कम उस समय अल्गोरीथ्म रटने कि मुझे कभी जरूरत नहीं होगी, मैं उसे नेट पर सर्च करूँगा और वहाँ से अल्गोरिथम ले लूँगा.. मैं तो ये सोचकर उत्तर दिया था कि शायद मेरे जवाब से वे चिढ जायेंगे मगर हुआ ठीक इसके उल्टा, वो प्रभावित हो गये.. आखिर वो एक और गधे का दिन था.. :)

एक मजेदार घटना 'C' वाले राऊंड में भी घटी.. उन्होंने प्रश्न पूछ कि बिना किसी तीसरे वैरियेबल को प्रयोग में लाये 2 वैरियेबल के वैल्यू(Value) को स्वैप(Swap) कैसे करते हैं.. अब उन्हें ये नहीं पता था कि मैंने अपने जीवन का सबसे पहला 'C' प्रोग्राम यही बनाया था सो ये प्रोग्राम तो मैं आंख मूंदकर भी लिख दूंगा.. मगर उस समय मैंने नाटक करते हुये ये दिखाया कि इसका लॉजिक मैं यहीं सोच रहा हूं.. और 3-4 बार काटने के बाद मैंने सही बना कर दिखा दिया.. कुल मिला कर मुझसे यूनिक्स, 'C', 'C++', डाटा-स्ट्रक्चर, डाटाबेस, 'VC++' और ऑपरेटिंग सिस्टम से प्रश्न पूछे गये थे..


दो राऊंड में लगभग 2-3 घंटे इंटरव्यू चला और उन्होंने मुझे सेलेक्ट कर लिया.. मैंने जो उस दिन ना जाने कितनी ही गलतियाँ की (कुछ जान बूझकर और कुछ अंजाने में) वो सभी मेरे लिये अच्छा ही साबित हुआ.. क्योंकि वो दिन मेरा था.. कुछ इसी तरह के सोच ने मुझे इसका शीर्षक जब "अल्लाह मेहरबान तो गधा पहवान" रखने के लिये प्रेरित किया.. उस दिन ये गधा भी पहलवान बन ही गया.. मेरा एक और करीबी मित्र उस दिन सेलेक्ट हुआ, शिवेन्द्र(इसके बारे में फिर कभी)..


कालेज के बाहर एक पोस्टर के साथ मस्ती करते हुये..

2006 में मेरे जन्मदिन के पार्टी की तस्वीर, ये दोनों ही चित्र मेरे कैंपस होने के महीने भर के भीतर की ही है.. :)

Tuesday, May 20, 2008

वो बुल्गेरियन प्रोग्रामर

(आई टी में अपना कैरीयर बनाने की चाह रखने वालों के लिये)

शिव कुमार, मेरी कंपनी में एक ऐसा नाम जो CEO तो नहीं है पर उनका रूतबा उससे कुछ कम नहीं हैं.. कुछ साल पहले वो CEO ही हुआ करते थे फिर स्वेच्छा से उन्होंने वो पद अपने भाई शिव रमाणी को दे दिया.. जिस दिन हमने इस कंपनी को जाईन किया था, उस दिन उन्होंने हमें एक किस्सा सुनाया था.. किस्सा बुल्गेरियन प्रोग्रामर का, जो उनका मित्र हुआ करता था.. किस्सा कुछ ऐसा है..

उन दिनों CSS कि शुरूवात भर ही हुई थी.. वे लोग कड़ी मेहनत किये जा रहे थे एक कंपनी की नींव खड़ी करने के लिये.. उस समय एक कोई छोटा सा प्रोजेक्ट उनके पास आया, जिसे उन्हें नियत समय में खत्म करके देना था.. क्लाईंट ने ही इनसे पूछा की आप किस प्लेटफार्म या लैंग्वेज में इसे बनाना चाहते हैं.. उस समय और आज भी उनकी नजर में वो बुल्गेरियन ही सबसे अच्छा प्रोग्रामर था सो उन्होंने उसी पर सब छोड़ दिया की आप जैसा चाहें वैसा बनाये..

उस प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिये 1.5 महीने का समय मिला था और उस समय में से उस बुल्गेरियन ने लगभग 10-15 दिन तक कोई जवाब नहीं दिया और ना ही किसी से मिला.. 10-15 दिनों के बाद वो अपने पूरे अल्गोरीथम के साथ वापस आये और उसने शिव कुमार से ही पूछा कि आप किस लैंग्वेज में इसे चाहते हैं? जिसमें आप चाहेंगे मैं उसी में बनाऊंगा.. और फिर उसे डेल्फाई में बनाया गया.. जब टेस्टिंग टीम ने उसे टेस्ट किया तो एक भी बग उसके हिस्से में नहीं आया.. हर चीज बिलकुल सही..

शिव कुमार हर नये ज्वाईन किये हुये व्यक्ति को ये किस्सा सुनाते हैं बस ये बताने के लिये की भाषा और प्लेटफार्म किसी भी प्रोग्रामर के लिये कोई बंधन नहीं बनाता है.. अगले पोस्ट में मैं शिव कुमार के व्यक्तित्व के बारे में कुछ लिखूंगा जो अपने आप में अनूठा है और मुझे उसने बहुत प्रभावित भी किया है..

Saturday, April 19, 2008

Do you believe in Ghost??

कल... नहीं-नहीं आज सुबह जब आफिस से लौटा तो सुबह के ३:३० हो रहे थे.. मैंने इससे पहले कभी इतना समय कार्यालय में नहीं बिताया.. पिछला पूरा सप्ताह कुछ ऐसे बिता जैसे अपनी कोई निजी जिन्दगी ही ना हो.. उधार पर दे रखा हो अपनी कम्पनी वालों को.. पूरे १९ घंटे लगातार कंप्यूटर के मानीटर पर नजर गड़ा कर देखते जाना.. पहले Code को Code Coverage और Ultra Edit नामक Tool से Check करना की कितना प्रतिशत इस प्रोग्राम का Code Execute हो रहा है और अगर नहीं हो रहा है तो क्यों नहीं हो रहा है.. फिर उसका Documentation करना..

अनायास मुझे एक चुटकुला याद आ रहा था.. जिसमे सांभा आज के IT युग में गब्बर से कहता है की सरदार मैंने आपका Code लिखा है और गब्बर जवाब में कहता है की ले अब Documentation कर..

खैर वो भी एक दुस्वप्न की तरह गुजर गया लगता है, या फिर मैं गलत हूँ? मुझे तो पक्का यकीन है कि मैं गलत हूँ.. मैंने अपने अभी तक के कंप्यूटर कैरियर में तो यही पाया है कि अगर किसी के पास काम है तो बहुत है या फिर नहीं है तो वो किसी निकम्मे कि तरह बैठा रहता है..

कल रात एक मजेदार घटना भी घटी.. जब मैं और मेरा बास (Project Leader) बैठ कर काम कर रहे थे तभी मेरे Cubical के पास वाले ट्यूब लाईट का कवर निकल कर गिर गया.. उस समय रात के २ बज रहे थे और मेरे पूरे फ्लोर पर मैं और मेरे बास के अलावा कोई नहीं था.. मैं और मेरा बास एक दूसरे को देख कर बस मुस्कुरा दिए और फिर काम में लग गए.. थोडी देर बाद मैंने काम करते-करते अपने Project Leader से कहा, "Srini(his name), do you believe in GHOST?" वो अजीब तरह से मुस्कुराते हुए (या यूं कहें घूरते हुए मुस्कुरा कर) बोले, "At this time do you want to make fun? Still do you have that much energy?" मैंने कुछ नहीं कहा बस मुस्कुराया और फिर से काम में लग गया.. लगभग १५ मिनट के बाद उन्होने कहा, "Yeh!! I believe..." शायद तभी से उनके मन में बस यही चल रहा होगा..:D या शायद मैंने उन्हें डरा दिया.. जो भी हो मुझे तो मजा आ गया.. ;)

Keywords : Project Leader, Documentation, Office, Code Coverage, Cybernet-Slash Support Chennai, Ultra Edit.