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Monday, April 27, 2009

बारिश

कई दिनों से बारिश नहीं हुई..
मन रीता सा लगता है..
अगर बारिश हो जाये तो
अपनी यादों को अच्छे से खंघालूं..
जो पुरानी यादें हैं उसे धो डालूं..
और रख दूं सूखने धूप में..
तब तक उसे सुखाता रहूं,
जब तक पुरानी यादों का दर्द उड़ ना जाये..
आखिर ये शरीर भी तो मांगता है,
बिना दर्द का मन....


अचानक से दोस्तों को मेल लिखते हुये यह कुछ पंक्तियां भी लिख डाला.. आज इसे ही पढ़ लिजिये, बेटा मन में लड्डू फूटा कथा का अंतिम भाग कल सुनाता हूं.. :)

Saturday, April 25, 2009

बेटा मन में लड्डू फूटा (पार्ट दो)

एक दिन "एक्स डियो" का एड देखा.. मन को बहुत भाया.. बस एक बार डियो लगाओ और सारी लड़कियां मेरे पीछे भागेगी.. मैंने प्रचार में देखा भी था कि एक्स डियो थोड़ा सा नहीं लगाया जाता है.. उसे तो ऐसे लगाते हुये दिखाता है जैसे उसी से नहा रहा हो.. मैंने भी तुरत जाकर एक एक्स डियो खरीदा.. पानी और साबुन से रगड़-रगड़ कर नहाने के बाद उस डियो से फिर से अच्छे से नहाया.. आजकल टूटे पैर कि वजह से एम.टी.सी(मद्रास ट्रांस्पोर्ट कॉरपोरेशन) का प्रयोग कर रहा हूं, सो निकल लिया ऑफिस के तरफ जाने वाली बस पकड़ने के लिये..

बस में चढ़ते ही मेरी नजर तो बस भटक रही थी कि शायद बस अभी कोई खूबसूरत सी लड़की अपना फोन नंबर देगी.. आस-पास की लड़कियां तो मेरी ओर देख ही रही थी और जैसे ही मैं उनके पास से गुजर रहा था वैसे ही उनके चेहरे का भाव भी बदल रहा था.. मैं खुश.. समझ गया कि यह जरूर डियो का ही असर है.. सोच, चलो इस बार तो काम बना.. मगर किसी ने अपना नंबर नहीं दिया.. मुझे इस बात कि भी खुशी हुई कि चलो अभी तक अपनी तथाकथित भारतीय संस्कार भी बचे हुये हैं.. अब तक मैं ऑफिस पहूंच चुका था.. जैसे ही ऑफिस के अंदर गया मेरे एक मित्र ने मुझे रोक कर यूं ही मजाक उड़ाते हुये पुछ, "कितने दिनों से नहीं नहाये हो भाई?" मैं चौंक गया और पूछा, "क्यों?" उसका कहना था कि इतना डियो तो बस वही लगाता है जो 3-4 दिनों से नहाया ना हो..

बस मेरी सारी खुशी हवा हो गई और अब जाकर समझ में आया कि वे सभी मुझे इतना घूर-घूर कर क्यों देख रही थी.. फिर पूरे दिन भर बस यही कोशिश करता रहा कि मैं जिस हद तक हो सके सभी से दूर ही रहो.. कोई और भी वैसा ही ना समझ ले.. मैं अक्सर रात में बहुत देर से घर आता हूं.. मेरे घर के आस-पास घूमने वाले आवारा कुत्ते भी मुझे मेरी शक्ल से नहीं मेरी गंध से पहचानते हैं.. अब 11 बजे रात में घर पहूंचा.. वहां के आवारा कुत्तों ने भी पहचानने से इनकार कर दिया.. गलती उनकी भी नहीं थी, बेचारों ने कभी शक्ल देखी ही नहीं है.. कुत्ता भी साला कुत्ता निकला.. आव ना देखा ताव बस दौड़ा दिया.. अब टूटे पैर से कैसे दौड़ा ये मैं ही जानता हूं या मेरा बेचारा पैर.. मन ही मन एक्स डियो वालों को गालियां देता हुआ जैसे तैसे घर पहूंचा..

अब अखिरी किस्से में मन में लड्डू फूटने कि कथा भी सुने.. यह कथा जो भी सुनता है उसके सात पुस्तों तक पुण्य का लाभ होता है.. :)

Thursday, April 23, 2009

अथ श्री बेटा मन में लड्डू फूटा कथा (पार्ट एक)

मैं चकाचक सफेद टी-शर्ट के ऊपर नीले रंग का जींस चढ़ा कर क्रिकेट खेलने के लिये मैंदान में पहूंचा था.. अंततः मेरा दोस्त आऊट हुआ और मेरी बैटिंग आ ही गई.. मेरे भीतर पूरा आत्मविश्वास था और पहली ही गेंद पर सिक्सर लगा दिया.. अरे यह क्या गेंद तो पड़ोस वाले अंकल के घर में चला गया.. अब चूंकि सबसे ज्यादा सफेद और चमकदार कपड़ा मैंने ही पहना था.. रिन डिटर्जेंट से रगड़-रगड़ कर.. सो जाहिर सी बात है सबसे ज्यादा आत्मविश्वास मेरे ही भीतर था.. और कायदा यही कहता है कि जो बैटिंग कर रहा हो वही गेंद लेकर आये.. मैं निकला पूरे आत्मविश्वास के साथ और अंकल जी से गेंद मांगा.. अंकल जी एक छड़ी लेकर खड़े थे, बोले "बेटा सिक्सर मारेगा? हाथ आगे करो.." मैंने अपने आत्मविश्वास का प्रयोग करते हुये दोनों हाथ बढ़ा दिया और बोला, "अंकल अगला बॉल भी सिक्सर ही जायेगा.." अंकल जी ने कान पकड़ा और दनादन छड़ी कि बरसात कर दी.. पहले मेरा पिछवाड़ा मार-मार सुजा दिये और फिर गेंद देकर बोले, "जा बेटा.. अब जी भर कर सिक्सर मारना.." अब काहे का सिक्सर भैया? चला भी नहीं जा रहा था..

कथा पूर्ण नहीं हुई है.. कल भी आईयेगा..
इसके शीर्षक से यह ना समझें कि कथा कुछ और है और शीर्षक कुछ और.. कथा का अंत मन में लड्डू फुटने से ही होगा.. :)

कथा पसंद आने पर ऊपर अपनी पसंद पर क्लिक करना ना भूलें.. :)

Wednesday, April 22, 2009

टुकड़ों में बंटा पोस्ट

पहला टुकड़ा -
आज मेरे पापा-मम्मी कि बत्तीसवीं शादी कि सालगिरह है.. घर कि याद भी बहुत आ रही है..

दुसरा टुकड़ा -
कल ऑफिस में मुझे कुछ बहुत जरूरी काम है मगर ऑफिस आना बहुत मुश्किल लग रहा है.. आखिर कल तमिलनाडु बंद है.. अगर कल नहीं आया तो मुझे शनिवार को ऑफिस आना पड़ेगा, जो मैं नहीं चाह रहा हूं..

तीसरा टुकड़ा -
मैंने अभी घर(पटना) जाने का प्लान बना रखा था.. मेरी मित्र की शादी है 5 मई को कोलकाता में उसी के लिये.. बस इसी शादी में जाने के लिये मैं होली में भी घर नहीं गया था और अभी भी ऑफिस के चक्कर में मेरा जाना संभव नहीं हो पा रहा है.. बहुत लाचारी महसूस हो रही है.. :(

चौथा टुकड़ा -
यह कोई टुकड़ा नहीं है दोस्तों.. असल में आज कुछ लिखने का मन कर भी रहा है और नहीं भी कर रहा है.. तो सोचा कि क्यों ना कुछ लिखे भी दूं और ना भी लिखूं.. ;) और इसलिये मैंने यह टुकड़ों में बंटा पोस्ट ठेल दिया..

Saturday, April 18, 2009

अथ हिंदीभाषी कथा इन चेन्नई भाग दो

मेरा पिछला पोस्ट पढ़कर मेरे अधिकतर मित्रों ने कमेंट के द्वारा रोष ही प्रकट किया है.. चाहे वह तमिल या किसी अन्य प्रादेशिक भाषा को लेकर हो या फिर लोग किसी प्रदेश में जाकर भी वहां कि भाषा-संस्कृति को लेकर अपना सम्मान नहीं दिखाते हैं उसे लेकर..

पहला कमेंट ही कुछ ऐसा था जो PN Subramanian जी ने लिखा था, "रोचक अनुभव. करोड़ों दक्षिण भारतीय उत्तर में अपनी रोजी रोटी में लगे हैं. उन्हें कोई परेशानी नहीं है. लेकिन अब जब कुछ उत्तर वासियों को दक्षिण जाना पड़ रहा है तो बड़ा हाय तौबा मचा दिया, ऐसा क्यों? यह आपकी मानसिकता का प्रतिबिम्ब है." मुझे बस यह समझ में नहीं आया कि मेरी मानसिकता का पता इतनी आसानी से वे कैसे लगा लिये और व्यक्तिगत आक्षेप लगाने में भी नहीं चूके.. मैंने कहीं भी ये नहीं लिखा था कि मुझे चेन्नई पसंद नहीं या तमिल से मुझे चिढ़ है.. मैं उन्हें उनका चिट्ठा मल्हार से जानता हूं और एक विवेकशील समझता था और अभी भी समझता हूं.. खैर, यह उनकी सोच है..

रंजना [रंजू भाटिया] जी ने लिखा, "रोचक अनुभव है यह ..पर अब जिस तरह से नौकरी के लिए कहीं भी जाना पड़ सकता है तो बिना किसी भेद भाव के वहां कि भाषा का ज्ञान हो तो अच्छा है.." बिलकुल सही कहा आपने.. मगर भाषा कोई भी हो, उसे सीखने में समय लगता है.. और जब बात तमिल की हो, जो एक ऐसी भाषा है जिसका देवनागरी लीपी से कोई संबंध नहीं है तो, ऐसे में उसे सीखने में उत्तर भारत से आये लोगों को समय लगता ही है..

रवि रतलामी जी ने अपना अनुभव भी सुनाया वेल्लोर शहर का.. मैंने अपने कालेज का समय वेल्लोर में ही बिताया है और कालेज में मेरे बैच में एक भी तमिल भाषी विद्यार्थी नहीं था.. अब ऐसे में पूरे ढ़ाई साल मुझे ना तो तमिल सीखने का मौका मिला और पूरा समय हिंदी और अंग्रेजी के सहारे ही बिताना पड़ा.. मैं अभी तक तमिलनाडु में जितने भी शहर में गया हूं उसमें वेल्लोर में ही सबसे अधिक हिंदी भाषी लोग मिले हैं.. क्योंकि वहां का व्यवसाय पूरी तरह से उत्तर भारत से आने वाले मरीजों और विद्यार्थियों पर निर्भर है..

कविता वाचक्नवी Kavita Vachaknavee जी ने कहा, "आपने जिस प्रकार के उदाहरण दिए हैं वे एकतरफ़ा हैं, मानो,जिसने तमिलनाडु तो क्या केवल मद्रास को भी पूरा ठीक ठीक पूरा नहीं जाना।" जी बिलकुल सही पहचाना.. अभी जानने सीखने कि प्रक्रिया से ही गुजर रहा हूं.. सच कहूं तो मैं अभी तक अपने जन्म स्थान दरभंगा को भी ठीक से नहीं जान सका हूं..

अनिल जी ने लिखा, "मेरा दोस्त तो तमिलनाडु में हिंदी बोलने पर पिट चुका है! कभी फुरसत से पढ़ियेगा।" उनके मित्र का अनुभव सच में बहुत भयावह है मगर फिर भी उनसे मेरा कहना है कि दोस्त, अच्छे और बुरे लोग तो हर जगह मिलते हैं.. अगर हम चंद बुरे तमिलभाषी लोगों के चलते हम पूरे तमिलभाषी को ही कठघरे में खरा कर दें हमारी मानसिकता और उनकी मानसिकता में कोई अंतर ही नहीं रह जायेगा..

चलते-चलते मैं अपना एक और अनुभव भी सुनाता चलता हूं.. मैं अभी तक जितने भी तमिल लोगों के संपर्क में आया हूं उसमें से अधिकतर स्वभाव के बहुत विनम्र हैं और मित्रवत भी हूं.. ऑफिस में भी अधिकतर ऐसा होता कि दोपहर के खाने के समय वे मुझसे टूटी-फूटी हिंदी में पूछते हैं, "खाना खाने चलो" और मैं उन्हें जवाब देता हूं, "पोलामा.."(मतलब चलिये)....

Friday, April 17, 2009

अथ हिंदीभाषी कथा इन चेन्नई

पिछली कथा पढ़कर घुघुती जी ने मुझसे यह उम्मीद जतायी कि मैं जल्द ही यहां हिंदी बोलने के ऊपर कि कोई कथा लेकर आऊंगा, तो लिजिये हाजिर हूं.. इसके कयी छोटे-छोटे अध्याय हैं और सभी अद्याय अपने आप में संपूर्ण.. तो चलिये आपको यहां कि भाष के साथ अपने और अपने मित्रों के कुछ हिंदी से जुड़े दिलचस्प और कड़वे अनुभव सुनाता हूं..

अध्याय एक -
मेरा एक मित्र जब पॉडिचेरी घूम रहा था तब उसे एक ट्रैफिक पुलिस ने पकर लिया.. पुलिस का कहना था कि आप वन वे में हैं और मेरा मित्र का कहना था कि यहां कहां लिखा हुआ है कि यह वन वे है? उसने उसे साईन बोर्ड दिखाया जिसमे तमिल में लिखा हुआ था.. मेरे मित्र ने उसे कहा कि उसे तमिल कि समझ नहीं है, तो उस पर उस पुलिस वाले ने कमेंट करते हुये कहा कि तमिल नहीं आती तो तमिलनाडु में क्यों आये? मेरे मित्र ने उस समय उससे बहस के मूड में नहीं था लेकिन बाद में उसका कहना था कि अगर इन्हें हिंदी नहीं आती तो भारत में क्या कर रहे हैं? इन्हें श्रीलंका ही भगा देना चाहिये..

अध्याय दो -
यहां तमिलनाडु में रहते हुये हमने सबसे पहले एक से दस तक तमिल में गिनती सीख ली.. जब शुरूवात में चेन्नई आये थे तब मैं और मेरा मित्र शिवेन्द्र बस से ऑफिस तक का सफर साथ-साथ किया करते थे.. हम जब भी अंग्रेजी में कंडक्टर को कहते थे कि, "अन्ना टू टिकट!! पौंडिबाजार".. तो तमिल में उत्तर आता था.. एक दिन हममे से किसी ने टिकट के लिये कंडक्टर को तमिल में कहा, "अन्ना रंड टिकट!! पौंडिबाजार".. उधर से जवाब आया, "दो टिकट चाहिये?" ;)
(तमिल गिनती में रंड का मतलब दो होता है)

अध्याय तीन -
मेरी एक मित्र का हमेशा कहना होता है कि, "यहां बाजार में कहीं चलते हुये अगर् किसी को हिंदी बोलते हुये सुन लो तो झट से आंखों कि बत्ती जल जाती है.. अरे, ये तो नोर्थ इंडियन है.." ;)
जी हां, यह बिलकुल सच है.. यहां के लोग अपनी भाषा को बिलकुल पकर कर रहते हैं और किसी भी हालत में उसे छोड़ना पसंद नहीं करते हैं.. अगर उन्हें हिंदी आती भी है तो हिंदी ना समझने का नाटक करते रहते हैं.. वैसे अब धीरे-धीरे यह मानसिकता खत्म हो रही है.. खासतौर से उन लोगों का अनुभव जिन्हें हिंदी नहीं आती है और कभी उत्तर भारत चले गये हों तो उनकी परेशानी का कोई ठिकाना नहीं रहा था..

अभी कुछ दिन पहले यहां के एक लोकल समाचार पत्र में मैंने पढ़ा था कि अब यहां के लोग अपने बच्चों को तमिल के साथ-साथ हिंदी भी सिखाने के लिये आगे आ रहे हैं.. क्योंकि अब उन्हें भी समझ में आ रहा है कि इस ग्लोबलाईजेशन के समय में हो सकता है कि उनके बच्चों को उत्तर भारत में जाकर काम करना परे.. उस रिपोर्ट में यह भी था कि यहां के बुजुर्ग जो तमिल भाषा को बिलकुल पकड़ कर बैठे हुये हैं, वे इसे तमिल के ऊपर हिंदी का हमला मान रहे हैं मगर उनके पास भी कोई दूसरा विकल्प नहीं है..

Monday, April 13, 2009

ताऊ का तोता हिरामन या पोपटलाल?


कुछ साल पहले कि बात है.. कौन बनेगा करोड़पति बिलकुल सुपर-डुपर हिट टीवी का प्रोग्राम था.. ताऊ के घर में भी बहुत प्रसिद्ध था यह.. ताऊ, ताई, सैम, बीनू-फिरंगी, हिरामन, रामप्यारी.. सभी साथ बैठकर कौन बनेगा करोड़पति देखा करते थे और साथ में करोड़पति बनने के सपने भी देखते थे.. सभी सपने में सोचते थे कि कभी हमें भी इस हॉट सीट पर बैठने का मौका मिलेगा.. उस हॉट सीट का उन्हें दो फायदा दिखता था.. पहला पैसा कमाने का मौका लेकिन दूसरा सबसे बड़ा फायदा अमिताभ बच्चन के साथ बैठने का मौका मिलना.. मगर कभी करोड़पति का फोन नंबर लगने की बात तो दूर आज तक उन्हें कभी किसी मित्र ने फोन अ फ्रेंड में भी फोन नहीं किया.. मगर वे सभी तो थे धुन के पक्के.. इंतजार करना नहीं छोड़े..

अब एक दिन की बात है.. एक फोन आया और उसे संयोग से हिरामन तोते ने उठाया.. उधर से अमिताभ बच्चन जैसी आवाज थी..

"मैं अमिताभ बच्चन बोल रहा हूं कौन बनेगा करोड़पति से.. क्या पोपटलाल है?"

हिरामन सोचा कि मैं तो हिरामन हूं, सो बोला "नहीं".. इससे आगे कुछ कहता उससे पहले ही उधर से फोन रख दिया गया..

दुबारा फिर से फोन आया, "मैं अमिताभ बच्चन बोल रहा हूं कौन बनेगा करोड़पति से.. क्या पोपटलाल है?"

फिर से हिरामन ने कहा, "नहीं" और फिर से फोन रख दिया गया..

एक बार फिर फोन आया, "मैं अमिताभ बच्चन बोल रहा हूं कौन बनेगा करोड़पति से.. क्या पोपटलाल है?"

अबकी हिरामन समझ गया कि हो ना हो कोई ऐसे ही परेशान कर रहा है. आखिर ताऊ का तोता था सो होशियारी उसमें कूट-कूट कर भड़ी हुई थी.. उसे गुस्सा भी खूब आया, मगर वो पूरी धीरता से फोन का जवाब दे रहा था..

ऐसे ही करके 6-7 बार फोन आया और हर बार यही पूछता और जैसे ही हिरामन 'नहीं' कहता वैसे ही फोन रख दिया जाता.. अब तक हिरामन बहुत गुस्से में आ गया था, मगर उसने खुद को संभालते हुये सोचा कि जब सामने वाला मजाक कर रहा है तो मैं भी क्यों ना थोड़ा सा मजाक कर लूं..

अबकी बार जैसे ही फोन आया और उधर से आवाज आयी, "मैं अमिताभ बच्चन बोल रहा हूं कौन बनेगा करोड़पति से.. क्या पोपटलाल है?" वैसे ही हिरामन बोला.. "हां.. पोपटलाल है.."

उधर से आवाज आयी,"गलत जवाब.. पोपट लाल नहीं पोपट हरा होता है.." और फिर फोन नहीं आया..

इधर हमारा हिरामन गुस्से से लाल होकर अपना शक्ल आईने में देख कर सोच रहा था कि मैं तो पोपट ही हूं और गुस्से से लाल भी.. तो जवाब गलत कहां था? जवाब तो सही था.................

Monday, February 09, 2009

ताऊ की जर्मनी यात्रा

ये बात तब की है जब ताऊ गोटू सोनार का सारा माल उड़ा कर कहीं छिपने की जगह ढ़ूंढ़ रहा था.. तो उसके दिमाग में यह ख्याल आया कि क्यों ना जर्मनी चला जाऊं.. अपना राज भटिया तो है ही वहां, सो मौज से दिन गुजरेंगे.. सो बांधा उन्होंने बोरिया-बिस्तर, खबर दी राज भाटिया जी को कि मैं जर्मनी आ रहा हूं और पहूंच गये जर्मनी.. वहां हवाई-अड्डे पर राज भाटिया जी को ना देखकर हुये बहुत हैरान परेशान..

राज जी तो अलग ही जुगत में थे, उनका सोचना था कि यही ताऊ है जिसने मेरे पिस्से अभी तक वापस नहीं किये, इतनी आसानी से तो जाने ना दूंगा.. अबकी बार तो भारत से बाहर है और इसे तो अंग्रेजी भी ठीक से नहीं आता है, जर्मन तो दूर की बात.. पहले खूब परेशान करूंगा और फिर अपने पिस्से निकलवा कर ही छोड़ूंगा.. वो नहीं पहूंचे हवाई अड्डा उन्हें लेने.. अब ताऊ क्या करे? जर्मनी में तो राज भाटिया जी को छोड़कर और किसी को जानते ही नहीं थे.. उन्होंने सोचा क्यों ना फोन पर पता कर लूं.. ताऊ ने फोन किया.. उधर से राज भाटिया जी के बेटे ने फोन उठाया जो पता नहीं क्यों फुसफुसा कर बातें कर रहा था.. उन दोनों के बीच कुछ ऐसी बातें हुई जिसके बाद ताऊ ने सोचा कि जब बेटा इतना खुराफाती है तो बाप कैसा होगा, और ऊपर से तो मुझपर उधार भी चढ़ा हुआ है.. और यह सोचकर उल्टे पांव वहां से भारत भाग निकले..

तो आप भी सुने राज भाटिया जी के बेटे से अपने ताऊ ने क्या बातें की..

"पापा घर पर हैं?"

"हां!!"

"क्या मैं उनसे बात कर सकता हूं?"

"नहीं!!"

बेचारे ताऊ सोच में आ गये.. अब उन्हें किसी बड़े से तो बात करनी ही थी सो आगे उन्होंने पूछा, "मम्मी घर पर हैं?"

फिर से उधर से फुसफुसाहट की आवाज आयी, "हां!!"

"उनसे बात कर सकता हूं?"

"नहीं!!"

अब तक ताऊ चिढ़ चुके थे.. उन्होंने गुस्साते हुये पूछा, "कोई और बड़ा घर पर है?"

"हां!!" फुसफुसाहट भड़ी आवाज में ही उसने कहा.. "पुलिस!"

अबकी तऊ घबरा गये.. सोच में पड़ गये कि गोटू सुनार के पिस्से मैंने उड़ाये हैं, कहीं उसकी बात यहां तक तो नहीं पहूंच गई.. फिर सोचा कि पहले मामला जान लूं सो उन्होंने पूछा, "बेटा जरा पुलिस को फोन देना.."

"नहीं!!" बच्चे का सपाट सा उत्तर आया.. "वो अपना काम कर रहे हैं.."

"क्या कर रहे हैं?"

"पापा-मम्मी और दमकल वालों(फायरमैन) से बात कर रहे हैं.."

अबकी ताओ बेचारे सोच में आ गये कि क्या हो रहा है.. तभी उन्हें फोन पर तेज शोर सुनाई दी.. उन्होंने पूछा, "यह कैसी आवाज है?"

"हेलिकाप्टर का!!"

अब ताऊ थोड़ा ज्यादा ही घबरा गये.. जोर देकर उन्होंने पूछा, "सही-सही बताओ, क्या हो रहा है वहां पर?"

"ढ़ूंढ़ रहे हैं.." फिर से फुसफुसाहट की आवाज आयी..

"किसे ढ़ूंढ़ रहे हैं?"

बच्चे ने फिर फुसफुसाते हुये और हल्की हंसी के साथ कहा, "मुझे.."

इतना सुनना था कि बस ताऊ अगली फ्लाईट पकड़ कर वापस भारत भाग आये.. सोचा जिसका बेटा इत्ता खुराफाती बुद्धि का है उसका बाप तो उसका बाप ही होगा..

गोटू सुनार के बारे में जानने के लिये यहां पढ़ें..

Friday, February 06, 2009

अरे! मैं लेखक कब से बन गया?

मेरे कल के पोस्ट(हमें नहीं पढ़ना जी आपका ब्लौग, कोई जबरदस्ती है क्या?) पर सबसे अंत में रोहित त्रिपाठी जी का कमेन्ट आया, जिसका उत्तर पहले मैंने मेल में लिखा.. मगर बाद में लगा कि इसे सार्वजनिक करने में भी कोई बुराई नहीं तो मैं इसे पोस्ट कर रहा हूँ..

उन्होंने ने लिखा था -
प्रशान्त सर, लोग कुछ समझ कर ही तो मेल करते होगे ना आपको? आपके ब्लॉग पर 40 कमेन्ट उसके बेचारे के ब्लॉग पर एक भी नहीं और 40 कमेन्ट देख कर लगा कि शायद बहुत बड़े लेखक है जो कि इनके ब्लॉग पर इत्ते कमेन्ट आये इसलिए बेचारा भेज देता है कि आप कुछ लिख देगे उसकी पोस्ट पर तो मन कितना खुश हो जायेगा कि कितने बड़े लेखक ने उसके पोस्ट पर कमेन्ट किया :-) :-) कुछ सोचिये प्रशान्त भाई.

मेरा उत्तर है उन्हें -
आपका कहना सही है रोहित जी,

मगर शायद आप दूसरी बार मेरे चिट्ठे पर आये हैं(यह आपका मेरे चिट्ठे पर दूसरा कमेन्ट है सो बस एक अंदाजा लगाया है :)) सो कुछ बातें मैं पहले बताना चाहूँगा..

मैं कोई बड़ा या छोटा लेखक नहीं हूँ.. या यूँ कहें कि लेखक हूँ ही नहीं तो ज्यादा अच्छा रहेगा.. अगर आप मेरे कुछ पुराने पोस्ट देखेंगे तो आप जान जायेंगे कि मैं भी किसी आम ब्लॉगर कि तरह ही हूँ जिसकी कोई पोस्ट बहुत पढ़ी जाती है और 40-50 से ज्यादा कमेंट्स भी मिलते हैं तो वहीँ दूसरी तरफ कुछ को 3-4 से ज्यादा कमेंट्स नहीं मिलते हैं(और वे 3-4 कमेंट्स भी उन्हीं के होते हैं जिनसे एक तरह कि आत्मीयता हो गयी है इस चिट्ठाजगत में)..

मैं दिन भर में आने वाले लगभग हर पोस्ट पर एक नजर जरूर डालता हूँ और जो मुझे पढने लायक लगता है उसे पढता जरूर हूँ.. और जिसे भी देखकर ऐसा लगता है कि कमेन्ट करना चाहिए उस पर कमेन्ट भी जरूर करता हूँ.. मगर कमेंट्स से ज्यादा जरूरी पढना समझता हूँ..

एक महाशय मेरे हर पोस्ट पर अपने नये पोस्ट का विज्ञापन चढा जाते हैं.. और उनका वह विज्ञापन उस दिन आये लगभग हर पोस्ट पर दिखता था.. अगर बिना किसी पूर्वाग्रह के सच्चे दिल से कहूँ तो उनकी कवितायेँ मुझे पसंद है और कई कविताओं कि मैंने जम कर तारीफ भी कि है उनके पोस्ट पर.. मगर बिना पढ़े नहीं.. अच्छे से पढ़कर और सोच समझकर..

लगातार अच्छा लिखो, लोग खुद ही आयेंगे पढने के लिए.. हाँ कुछ दिन इंतजार करना भी होगा.. यही मेरा मानना है.. यहाँ जितने भी लोगों को ढेर सारे कमेंट्स मिलते हैं या ज्यादा पढ़े जाते हैं वे सभी या तो काफी दिनों से हिंदी ब्लॉग दुनिया में लगातार बने हुए हैं या फिर जबरदस्त लेखनी से कुछ ही दिनों में छा गए.. नहीं तो मैं आज देखता हूँ कि 2-3 साल पहले के कई चिट्ठाकार आज दिखाई नहीं देते हैं.. और यही यदा-कदा उनकी कोई पोस्ट आ भी जाती है तो पुराने लोगों को छोड़कर ना तो कोई उन्हें पढना चाहता है और ना ही टिपियाना चाहता है..

अब और क्या लिखूं?

आपका बहुत-बहुत धन्यवाद..

Wednesday, February 04, 2009

हमें नहीं पढ़ना जी आपका ब्लौग, कोई जबरदस्ती है क्या?

हर दिन कम से कम 6-7 मेल जरूर मिलता है ऐसा जिसका उद्देश्य कुछ ऐसा ही होता है कि मैंने अभी-अभी एक पोस्ट लिखा है.. आप जरूर पढ़ें और अपनी राय दें.. कुछ मेल तो इस तरीके से लिखा होता है जैसे हम तो मरे जा रहे हैं उनका पोस्ट पढ़ने के लिये.. ऐसे में अगर किसी को चिढ़ हो ऐसे मेल से तो मानव मनोविज्ञान तो यही कहता है कि बिना पढ़े उसे डिलीट कर दो, और मैं भी इस मानव मनोविज्ञान को भली-भांती निभा रहा हूं.. ऐसा हो सकता है कि जो कुछ वह महाशय अपने पोस्ट में लिखें हैं वह मेरी पसंद का हो, मगर फिर भी उसे पढ़ना ही होगा तो मैं ढूंढ कर पढ़ ही लूंगा..

कुछ मेल तो इस अंदाज में भेजा होता है जैसे वह कह रहे हों, "क्यों बच्चू! कभी देखा है ऐसा पोस्ट? वो तो हमी हैं जो ऐसा लिख पाते हैं और सबसे बड़ी बात तो यह है कि आपको हम मेल भी करते हैं.. अब इतना अहसान तो मान ही लो.."

कुछ चिट्ठाजगत के मित्रगण तो उस दिन आने वाले हर पोस्ट पर जाते हैं और पहले एक बधाई फिर अपने ब्लौग को पढ़ने का आग्रह और साथ में अपने नये पोस्ट का पता देते हैं.. बिकलुल यही कमेंट लगभग हर पोस्ट पर दिखता है, जिसे देखकर कोई भी समझ सकता है कि उन्होंने ना पोस्ट पढ़ा है और ना ही पढ़ने की इच्छा रखते हैं.. मगर साथ में चाहते हैं कि हर कोई उनका पोस्ट पढ़े भी और टिपियाये भी.. मैं किसी का नाम तो नहीं लूंगा, मगर समझने वाले समझ ही जायेंगे की मैं किनके लिये यह पोस्ट लिख रहा हूं.. वे लोग हो सकता है मुझे अख्खड़ भी समझें, कोई परवाह नहीं..

अगर सकारात्मक रूप से लें तो हिंदी के लिये यह अच्छा ही है, क्योंकि अंग्रेजी मेल में स्पाम का जन्म भी इसी तरह हुआ था.. कुछ ही दिनों में इस तरह के बल्क मेल हिंदी स्पाम में भी जगह बना ही लेंगे.. हिंदी अब अपना पांव पसार रही है.. मगर अभी मैं सकारात्मक लेना नहीं चाह रहा हूं.. मुझ पर कृपा करके इस तरह के मेल भेजना बंद करें.. अगर आपने सच में कुछ ऐसा लिखा है जो मेरे मुताबिक पढ़ने योग्य है तो उसे मैं कहीं ना कहीं से ढूंढ ही लूंगा.. इसके कई तरीके हैं.. एग्रीगेटर साईट्स, गूगल रीडर, फीड फेचर..

Friday, January 23, 2009

एण्ड ब्लू डेविल एट माई एक्साईटमेंट

कई साल इसने इंतजार करवाया.. यूं तो मैं बहुत पैसे वाले परिवार से नहीं आता हूं मगर मुझे खाते-पीते परिवार का तो कह ही सकते हैं.. जब बड़ा हुआ और ड्राईविंग लाईसेंस बना तभी से मुझे चलाने को स्कूटर मिल गया.. एक तरह से संपूर्ण अधिकार के साथ.. पापा पटना में बहुत कम होते थे और होते भी थे तो स्कूटर कम ही चलाते थे, उनकी सवारी चार-पहिया ही होती थी.. और जहां तक भैया की बात है तो वो अपने पढ़ाई के चलते लगभग हमेशा अपने कॉलेज में ही रहते थे और जब आते भी थे तो स्कूटर चलाने में आत्मविश्वास की कमी के चलते लगभग नहीं के बराबर ही चलाते थे.. उस स्कूटर का सारा कर्ता-धर्ता एक तरह से मैं ही था.. मुझे यह भी पता था कि मुझे एक अदद स्कूटर भी मिला है नहीं तो अधिकतर मेरी उम्र के लड़कों को यह भी नसीब नहीं होता है.. फिर भी नये स्टाईलिस और शक्तिशाली इंजन वाले बाईक को देखकर दिल ललचाया जरूर करता था.. सोचता था कि कब मेरे पास मेरी अपनी और मेरे पसंद की बाईक होगी.. भैया जब एवेंजर खरीदे थे तब उस पर भी पूर्ण स्वामित्व कि भावना से ही बैठता था और बैठूंगा भी, मगर शत्-प्रतिशत स्वामित्व की भावना नहीं आई(भैया अगर आप पढ़ रहे हैं तो बुरा मत मानियेगा.. आप जानते ही हैं कि आपका छोटे भाई में यह बुराई है कि वह सोचता कुछ ज्यादा ही है..)

कल मैंने यह बाईक शोरूम से उठा कर ले आया.. मगर मुझे समझ में नहीं आ रहा था की जब मैं शोरूम जा रहा था तब भी कोई उत्साह नहीं लग रहा था और जब लेकर आ गया तब भी नहीं.. ऐसा लगता है सारे उत्साह को मैंने इसके बूकिंग के समय ही खर्च कर डाले हैं.. नौकरी जबसे करनी शुरू की तब से ना जाने कितनी ही बार कितने ही छोटी-बड़ी जरूरतों को अनदेखा करके पैसे बचाये काफी पैसे भैया ने भी दिये और इसे खरीदा.. मगर फिर भी.....

मन में कुछ खटक सा रहा है.. कहीं कुछ कमी सी लग रही है.. सोच रहा हूं किसके लिये इसे लिया हूं? किसके सामने प्रदर्शन के लिये इतने तड़क-भड़क वाली गाड़ी खरीदा हूं? मानसिक मंथन चल रहा है मगर कोई उत्तर नहीं मिल रहा है और मुझे लगता भी नहीं है कि उत्तर मिलेगा.. कहीं कुछ कमी जरूर है.. क्या? पता नहीं...

मैं कभी लोन पर नहीं लेना चाहता था, क्योंकि आजकल के बाजार का पता है.. पता नहीं कब सड़कों पर आ जाऊं.. बेरोजगारी के धक्के भी खाने को मिले.. सो उधारी से जितना बच सको उतना बच लो.. कई मित्र सलाह देते थे कि लोन पर उठा लो, मगर इसके लिये ना तो मैं तैयार था और ना ही पापा-मम्मी.. खैर इसके लिये जितना इंतजार करना पड़ा सो ठीक है लेकीन आज किसी बैंक पर अपनी उधारी तो नहीं चढ़ी है..


चलते-चलते -
मैंने पल्सर 200 खरीदा है.. जिसका रंग नीला है.. पल्सर 220, एवेंजर 200 और करिज्मा यह तीनों ही बाईक मशीनी ताकत के मामले में इसी के आस-पड़ोस के हैं.. लेकीन फिर भी पल्सर 200 लेने के पीछे कुछ कारण थे..
1. एवेंजर मुझे बहुत पसंद है लेकीन घर में पहले से ही यह है.. अगर घर में यह नहीं होता तो शायद मैं वही लेता..
2. पल्सर 220 और पल्सर 200 में बस 20CC के इंजन का अंतर है मगर दाम में लगभग 16,000 का अंतर है.. सो बस 20CC के लिये मैं 16,000 ज्यादा खर्च करना अनुचित समझा..
3. करिज्मा ना लेने का सबसे बड़ा कारण इसका हेडलाईट था जो इसके बॉडी से ही ही जुड़ा हुआ है.. अगर इसका हेड लाईट इसके हैंडल से जुड़ा होता तो शायद यह तगड़ा दावेदार होता..

बाद में पता चला कि पल्सर 220 में भी हेडलाईट के साथ यही समस्या है..

यामहा के नये मॉडल FZ-15/16 के साथ ना जाने के पीछे कारण इसका सही रीव्यू उपलब्ध ना होना था.. नेट पर जितने भी रीव्यू मैंने पढ़े उसे पढ़कर मेरे लिये भ्रामक स्थिति बन रही थी.. कुछ शंका भी मन में उत्पन्न हो रहा था.. जैसे कम CC के इंजन से जितने मात्रा में पॉवर उतपन्न हो रहा है उससे आगे चलकर इसके इंजन पर तो कोई असर नहीं पड़ेगा? कुल मिला कर मेरे लिये बजट कोई समस्या नहीं थी, अगर होता भी तो मैं कुछ दिन और इंतजार कर लेता मगर लेता वही जो मुझे पसंद होता.. जैसे इतने दिन इंतजार किया वैसे ही..

एक बार बहुत पहले, सन् 2001 में, मुझसे किसी ने कहा था कि तुम्हारे भीतर पेशेन्स बिलकुल नहीं है.. क्या इससे भी ज्यादा पेशेन्स की उम्मीद उसे थी? अगर यह ना होती तो कभी का ही लोन पर ले चुका होता..

Tuesday, January 20, 2009

हर तरफ बस तू ही तू

उस मोड़ पर खड़ा था मैं फिर.. ये किसी जीवन के मोड़ कि तरह नहीं थी जो अनायास ही कहीं भी और कभी भी पूरी जिंदगी को ही घुमाव दे जाती है.. ये तो निर्जीव सड़क थी, जहां आकर मुझे अपनी आत्मा के निर्जीव होने का अनुभव सा होने लगता है.. जैसे वो था या है या ऐसा ही कुछ भी.. मगर यह सड़क हमेशा मुझे जीवंत यादों में ढ़केलता रहा है..

तुम्हें आखिरी बार आते हुये भी और जाते हुये भी यहीं से देखा था.. सफेद सूट धूप में चमक रहा था.. इतना कि दूर से नजर आ जाए.. बाल खुले थे या बंधे हुये, लंबे थे या छोटे, जब तुम चलती थी तब आवाज आती थी या नहीं, तुम हंसते या रोते समय कैसी दिखती थी, इन सबका मेरे लिये कोई अर्थ नहीं था.. तब बस तुम्हारे होना ही मेरे लिये एक अर्थ रखता था और अब तुम्हारा नहीं होना..

आखिरी बार जब हम साथ थे और खुश थे, ये वही जगह थी.. उस दिन भी बरसात हो रही थी और आज भी.. अंतर बस यह रह गया है कि उस दिन कि बरसात रूमानियत भर जाती थी और आज कि बरसात विरह.. यूं ही खड़ा भींग रहा था लेकिन मन जैसे रीता ही रह गया..

जब भी इस शहर में आता हूं तो एक बेचैनी साथ लिये जाता हूं.. मन में एक हूक सी उठती रहती है.. कभी-कभी सोचता हूं कि अपनी इस भावना कि हत्या भी कर डालूं.. ठीक उसी गीत कि तरह जो मुझे हमेशा तुम्हारी याद दिलाती थी और उसे मैं नहीं सुनता था.. एक दफे दिन-रात कई दिनों तक मैं उसी गीत को सुनता रहा, इतनी बार कि उसे लेकर मन में जो भी भाव अपनी छाप छोड़ जाते थे, वे सभी खत्म हो गये.. उसी तर्ज पर उस शहर में, उन जगहों के इतने चक्कर लगा डालो कि उनको लेकर भावनाशून्य हो जाऊं.. कोई तड़प दिल में बाकी ना रहे.. कोई कसक दिल में बाकी ना रहे.. पथराती आंखों से मैं वहां से गुजरूं, बिना कोई भाव मन में लाये..

कई बार कोशिश भी कि की तुम्हारी यादों को मिटा डालूं.. कई बार जलाने कि भी कोशिश हुई और जला भी डाला.. मगर इस शहर के रूमानियत से वह अहसास फिनिक्स कि तरह राख के ढ़ेर से फिर से जी उठता है.. जैसे लगता है कि मेरी रूह में समा चुकी हो तुम..

मेरी प्रीत भी तू,
मेरी गीत भी तू,
मेरी रीत भी तू,
संगीत भी तू..

मेरी नींद भी तू,
मेरा ख्वाब भी तू,
मेरी धूप भी तू,
माहताब भी तू..

मेरी खामोशी भी तू,
मेरी गूंज भी तू,
मेरी बूंद भी तू,
समुंद भी तू..

मेरी सांस भी तू,
मेरी प्यास भी तू,
मेरी आस भी तू,
रास भी तू..

मेरा नक़्स भी तू,
मेरी हूक भी तू,
मेरा अक्स भी तू,
मेरी रूह भी तू..

मेरा मान भी तू,
मेरा ज्ञान भी तू,
मेरा ध्यान भी तू,
मेरी जान भी तू..

मेरा रंग भी तू,
ये उमंग भी तू,
मेरा अंग भी तू,
ये तरंग भी तू..

मेरे जिगर के सरखे-सरखे में
कुछ और नहीं
बस तू ही तू..

मेरे लहू के कतरे-कतरे में
कुछ और नहीं
बस तू ही तू..

क्यों चली गयी तुम? कहां चली गयी तुम? जाना ही था तो आयी क्यों थी? किसी को दिलासा दिलाकर छोड़ जाना अच्छा नहीं होता.. आ जाओ तुम, कहीं से भी.. बस उड़कर.. देखो तुम्हारे बिना मैं कितना अकेला हूं, कितना उदास हूं..

Monday, January 19, 2009

प्रेम करने वाली लड़की जिसके पास एक डायरी थी

उसके पास भी एक डायरी थी.. जिसे वह हर किसी से छुपा कर रखती थी.. जब वह कालेज जाती थी तब वह डायरी उसके कालेज बैग का एक हिस्सा होती थी.. और घर पहूंचने पर उसकी आलमीरा का एक हिस्सा.. अगर कालेज बैग साथ में ना हो तो उसके हाथों कि शोभा बढ़ाती थी वह डायरी.. जो भी उसे करीब से जानता था उसके लिये वह डायरी चंद्रकांता के तिलिस्म से कम नहीं होता था.. कालेज खत्म होने के बाद वही डायरी अक्सर उसके पर्स का एक हिस्सा बन जाया करती है.. साल दर साल बीतते जाते हैं, मगर उसकी डायरी कभी नहीं बदलती है.. हर दिन उसे उसी डायरी के साथ देखने की भी एक आदत सी हो जाती है..

- क्या है इस डायरी में?

- मैं नहीं बताऊंगी..

- मुझे भी नहीं बताओगी?

- नहीं..

- तुम तो कहती थी कि तुमसे कुछ भी नहीं छुपाती हूं मैं.. फिर इसे क्यों छुपा रही हो? क्या वो बातें भूल गई हो?

- नहीं यार! ऐसी कोई बात नहीं है.. कुछ छुपा नहीं रही हूं.. इसमें कुछ है ही नहीं..

- कुछ नहीं है तो मुझे दो देखने के लिये..

- नाह.. नहीं दे सकती..

- तो मैं छीन लूंगा..

- तुम नहीं छीन पाओगे..

- लो मैंने तुम्हारा बैग ले लिया.. इसी में वह डायरी है न?

- मेरा बैग मुझे दे दो..

- मुझे बैग से क्या लेना देना.. ये लो.. लेकीन डायरी ना दूंगा..

.......थोड़ी देर शांति........

- अरे यार!! इतना उदास क्यों हो रही हो? जाओ नहीं पढ़ता तुम्हारी डायरी.. मगर तुम्हे उदास नहीं देख सकता..

- दे दो ना मेरी डायरी.. प्लीज..

- लो.. मगर अब तो मुस्कुरा दो..

- मैं जानती थी कि तुम मुझे दे दोगे.. ये सब तो नाटक था.. डायरी वापस लेने का..

- सोचो, तुम्हे नाटक में भी उदास नहीं देख सकता.. सच में उदास हो जाओगी फिर मेरा क्या होगा?

- देखो आईसक्रीम वाला जा रहा है.. एक आईसक्रीम दिला दो ना..

- इतनी ठंढ में? नहीं.. आज नहीं..

- नहीं मुझे चाहिये.. दिला दो ना.. प्लीज..

- कितनी जिद्दी हो तुम.. चलो..


ऐसा क्यों अक्सर होता है! हर प्रेम करने वाली लड़की के पास एक डायरी होती है.. जिसे वह छिपा कर रखती है.. यहां तक कि अपने प्रेमी से भी.. क्या सच में उस डायरी में कुछ लिखा होता है? या फिर सिर्फ एक गल्प कथा बनाने के लिये ही वह डायरी उसके पास होती है? जिससे सभी को भरमाया जा सके..

Saturday, January 17, 2009

शिव जी का लैप-टॉप और मेरा सर

कल अचानक लवली का फोन उसके कोलकाता वाले नंबर से आया, फोन उठाते ही उसने कहा, "भैया पता है अभी मैं घर्रर्रर्र..(टेलीफोन की घरघराहट)"
"क्या? किनके साथ हो?" मैंने छूतते ही पूछा..
"शिव कुमार मिश्रा!!"
"अरे वाह.." हम किसी तरह अपनी आवाज में खुशी घोलते हुये कहे.. अब हम बैठे ही इत्ते दूर हैं कि किसी की खुशी देखते ही दुखी हो जाते हैं.. खासतौर से जब से शिव जी ने धमकियाने के अंदाज में कमेंट लिखने वाला पोस्ट हत्या करने के कैसे-कैसे बहाने.... लिखा है तब से उनके साथ कोई पंगा हम नहीं लेने वाले हैं.. क्या पता पहला निशाना उनके लैपटॉप का मेरा सर ही हो?
आगे लवली बोली, "लिजिये इनसे बात किजिये.." कहकर उन्हें फोन पकड़ा दी..

हम तो ठहरे सीधे-साधे बेचारे टाईप प्राणी.. ई फोनवा भी बहुत बुरी चीज होती है ससुरी, लोग चाहे जो बोलें मगर चेहरे का भाव नहीं बता पाती है.. अगर बता पाती तो शिव जी तो मेरी हालत देख कर ही खुश हो लेते..

खैर हम कांपते हाथों से फोन पर उनसे हाल-चाल पूछे.. शिव जी बहुत खुश लग रहे थे.. आखिर क्यों ना हों, लवली के साथ जो बैठ गप्पे जो हांक रहे थे.. ज्यादा लम्बी बात नहीं हुई, मगर छोटी सी ही बात-चीत में उन्होंने कहा, "प्रशान्त! तुम कलकत्ता आ ही जाओ.. मैं तुम्हें लैपटॉप उठाकर नहीं मारूंगा.."

मैंने थोड़ा और आश्वस्त होने के इरादे से पूछा, "कहीं आप डेस्कटॉप से मारने का इरादा तो नहीं बना रहे हैं?"
उनका कहना था, "मेरे पास डेस्कटॉप है ही नहीं.."

अब जाकर मेरी छोटी बुद्धि में यह बात आयी.. वो मेरी तलाश क्यों कर रहे हैं.. अपने लैपटॉप की मजबूती जानने के लिये मुझे खोज रहे हैं.. "लैपटॉप से नहीं मारूंगा" वाली बात तो बहलाने के लिये कहा था उन्होंने.. अब वैसे भी एक ऐसे व्यक्ति पर कैसे भरोसा कैसे किया जा सकता है जो कभी दुर्योधन कि डायरी चुरा लाते हैं तो कभी किसी उद्योगपति कि डायरी.. जो जगह सी.बी.आई. वालों के लिये भी अगम्य मानी जाती है वहां से भी बातें उड़ा लाते हैं..

फिर उन्होंने कहा कि मैं तुम्हें बाद में फोन करता हूं.. मेरा कहना था कि मैं ही आपको फोन कर लूंगा.. मन ही मन सोचते हुये कि "पहले थोड़ी हिम्मत तो जुटा लूं".. बहाना बना दिया कि "आजकल अतिव्यस्त चल रहा हूं, सो पता नहीं जब आप फोन करें उस समय मैं व्यस्त रहूं और ठीक से बात ना हो पाये?" काश वो मेरे चेहरे के भाव देख सकते और कम से कम खुश तो हो ही लेते कि चलो मुझसे डर ही गया है, सो इसे अपने लैपटॉप से नहीं मारूंगा.. वैसे भी भय ज्यादा कारक होता है.. वो फिल्मी मार्का डायलॉग सुने ही होंगे, "अपने सारे पत्ते कभी नहीं खोलना चाहिये"..

मन में डर भी लग रहा था कि आज लवली का क्या होगा? क्या उसका सर बचेगा? शाम में लवली का फिर से फोन आया.. उससे बातें हुयी और जानकर अच्छा लगा कि उसका सर सही सलामत है.. मैंने इस पर खूब सोचा कि ये बचकर कैसे आ गयी? कुछ बातें दिमाग में आई जिसे नीचे लिख रहा हूं..
1. शायद लवली उनके हर पोस्ट पर टिपिया आई होगी.. मगर इसकी पुष्टी करनी होगी.. अगर यह कारण ना हो तो, तो उसके बचने का दूसरा कारण दूसरे प्वाईंट में है..
2. महिला ब्लौगर होने का फायदा उसे मिल गया होगा.. शिव जी भी चाहे जिससे भी पंगा ले लें मगर महिला ब्लौगर से पंगा नहीं लेंगे इसका मुझे पूरा भरोसा है.. इतनी समझ तो उन्हें होगी ही कि उनसे पंगा लेने पर कल को कोई उनके खिलाफ मोर्चा खोल दे.. "यह पुरूष ब्लौगर पितृसत्ता समाज का अगुवा है.. चुन-चुन कर महिला ब्लौगर पर हमला कर रहा है.. महिला को आगे बढ़ते नहीं देखना चाहता है.. कुछ दिन पहले लवली का नाम राजस्थान के एक अखबार में छपा था इसी कारण उसकी बढ़ती लोकप्रियता से चिढ़कर उस पर हमला किया गया है.. इत्यादी इत्यादी.."
3. जब से प्रत्यक्षा जी ने उन्हें जेंटलमैन का खिताब दिया है, तब से वे अपने खिताब को बचाये हुये हैं और इसे आगे भी बचाये रखना चाहते होंगे..

चलिये अब मैं अपनी सुरक्षा व्यवस्था बताता हूं जिससे उनके लैपटॉप से अपने सर को बचाया जा सके..
1. अतिव्यस्तता के कारण मैं उनका पिछला 2-3 पोस्ट पढ़कर नहीं टिपिया पाया हूं, सो समय मिलते ही सबसे पहले उसी पर टिपियाऊंगा..
2. मुझे उनका 26 जनवरी वाला किस्सा हमें कल शाम में पता चला.. अब हम जब चाहे उन्हें काला-पुरूष(ब्लैक मेल) कर सकते हैं.. या नहीं तो वो खुद ही अपना किस्सा हमें पूरे मजे के साथ सुना दें.. हम भी बहुत चाव से सुनने को तैयार हैं.. :)
3. एक हेल्मेट पहन कर ही उनके पास जाऊं, पूछने पर कहना कि हम भी आपके ही तरह क्रिकेट के दीवाने हैं, क्या पता भारतीय क्रिकेट टीम से कब बुलावा आ जाये.. आखिर उनकी क्रिकेट मैनिया के बारे में पता है तो कुछ लाभ भी उठाना चाहिये.. :)

Friday, January 16, 2009

बेटा हो जा जवान तेरी शादी करूंगा

कुछ दिन पहले इरफ़ान भाई ने यह गीत अपने चिट्ठे पर लगाया था.. तभी से यह गीत जुबान पर चढ़ा हुआ है.. तो सोचा क्यों ना आज अपने बिटवा के बारे में लिखा जाये? वैसे भी बहुत दिनों से अपने बिटवा के बारे में कुछ लिखा नहीं हूं.. आज यह कुल 4 महीना और 26 दिन का हो गया है.. भैया-भाभी से पता चलता रहता है कि आजकर कैसे बोलने लगा है.. बात-बात पर "हां-गै" जैसी आवाजें भी निकालने लगा है.. ठंढ़ का मौसम होने के कारण जैसे ही इसे टोपी पहनाओ वैसे ही यह आपको टोपी पहनाने के चक्कर में आ जायेगा.. मतलब, अब इसे घूमाने कहीं बाहर ले जाओ.. :)

बात-बात पर अपनी बात से पलटी मार जाना तो हमारे देश के नेताओं की आदत हो चुकी है, तो भला इसने पलटी मार कर क्या बुरा किया? जी हां, आजकल हमारे बिटवा जी खूब पलटी भी मारने लगे हैं.. इन्होंने पहली बार करवट बदल कर पलटी 26 दिसम्बर को अपने दादाजी के साठवें जन्मदिन पर मारा था.. जब भी इससे बात करने के लिये फोन करता हूं, यह चुप हो जाता है.. आखिर शैतानी के मामले में अपने बाप पर नहीं जायेगा तो किस पर जायेगा.. भैया कि तरह थोड़ा बड़ा होकर शैतानी करेगा फिर जाकर भैया को पता चलेगा कि उनकी शैतानी से पापा-मम्मी को कितनी परेशानी होती होगी.. ;) और साथ में छोटे पापा तो हैं ही इसे बिगाड़ने को.. :)

इस चित्र में हमारे लाट साहब "शाश्वत प्रियदर्शी" अपने दादा जी के गोद में ठाठ से बैठे हुये धूप की गरमाहट के मजे ले रहे हैं.. यह तस्वीर लगभग एक माह पहले ली गई थी, अब तो और भी बदलाव आ गये होंगे..


चलते-चलते यह गीत भी सुनते जाईये जिसे मैंने अपने पोस्ट का शीर्षक बना रखा है.. इस गीत जे दो बोल भी लिखता जा रहा हूं.. मैंने इसे इरफ़ान भाई के चिट्ठे से ही लिया है, जिसके लिये उन्हें बहुत-बहुत धन्यवाद.. अगर उन्हें कोई आपत्ति हो तो बताते जायें, मैं पॉडकास्ट को यहां से हटा दूंगा..

मैं अपने खजाने को खाली करूंगा,
बेटा हो जा जवान तेरी शादी करूंगा..


इस पोस्ट को पढ़कर मेरे पापाजी क्या सोच रहे होंगे? कि मैं अपने बेटे कि शादी के बारे में सोचता हूँ और वो तैयार नहीं होता है और ये अभी से ही अपने बेटे कि शादी के बारे में सोच रहा है.. :D

Monday, January 12, 2009

पैर पर पैर रखिये, सॉरी कहिये, आगे बढिए

"पैर पर पैर रखिये, सॉरी कहिये, आगे बढिए"..
"आउच.. देख कर नहीं चल सकते हो क्या? मेरे पैर पर चढ़ते चले आ रहे हो.."
"अब क्या करून बहन जी, इतनी भीड़ है.. और कंडक्टर भी तो कह रहा है, पैर पर पैर रखिये, सॉरी कहिये, आगे बढिए.. चलिए मैं भी सॉरी बोल देता हूँ.."

पिछली बार जब मैंने दिल्ली के बस में सफ़र किया था तो वहां बस के भीतर के हालत कुछ ऐसे ही थे.. वैसे तो चेन्नई में भी बसों के हालत कुछ अच्छे नहीं हैं मगर उस दिन दिल्ली में जम कर बारिश हो रही थी, मैं पूरा भींगा हुआ था और मेरे साथ मेरा भारी बैग भी था.. मुझे तो इस तरह के हालत देख कर जाने क्यों एक अलग सा सुकून मिल रहा था.. शायद यह तसल्ली हो रही थी कि उनकी बाते समझ में तो आ रही हैं.. यहाँ चेन्नई में कौन क्या कह रहा है, सब ऊपर से निकल जाता है..

डी.टी.सी. और ब्लू लाइन बस के किस्से तो आपने खूब सुने होंगे, आज चेन्नई के एक बस कि तस्वीर भी देख लीजिये..

इस तस्वीर को मेरे एक मित्र विशाल ने लिया था.. एक बस से दूसरे बस कि.. मैं काफी दिनों तक संभल कर रखा था इस तस्वीर को, ताकि कभी आप लोगों के सामने इसे ला सकूं.. :)

यह नजारा सुबह के समय का है.. चेन्नई में सुबह-सुबह बस में स्कूली बच्चों कि भीड़ होती है.. दिन चढ़ने के साथ ऑफिस जाने वालों कि भीड़ बढती जाती है जो तक़रीबन ११ साढ़े ११ बजे तक रहती है.. उसके बाद कालेज जाने वालों कि भीड़ का समय होता है.. फिर १-२ बजे के आस-पास सड़क थोडी खाली मिलती है जो ३-४ बजे तक रहता है.. फिर वैसे ही लौटने वालों का हुजूम आता है.. पहले स्कूली बच्चे, फिर कालेज वाले फिर ऑफिस से आने वाले.. भीड़ रात के ९ बजे जाकर कुछ थमती है.. मगर अफ़सोस मेरे रूट में यह रात के १० साढ़े १० बजे जाकर भीड़ कम होती है.. चलिए बहुत बता दिया चेन्नई के बसों के बारे में.. अब कभी भी चेन्नई आने का इरादा हो तो मेरे इस पोस्ट को पढना ना भूलें.. :)

एक कला और सिखला दो

सपने बुनने कि कला,
तुमसे सीखा था मैंने..
मगर यह ना सोचा,
सपने मालाओं जैसे होते हैं..
एक धागा टूटने से
बिखर जाते हैं सारे..
बिलकुल मोतियों जैसे..
वो धागा टूट गया या तोड़ा गया?
पता नहीं!!
लेकिन सपने सारे बिखर गये..
बिखरे सपनो को फिर कैसे सजाऊं,
तुमने यह नहीं बताया था..
खुद से इस कला को कैसे सीखूं?
आ जाओ तुम,
सिर्फ एक बार..
एक कला और सीखनी है तुमसे..

Saturday, January 10, 2009

एक माईक्रो पोस्ट- मेरी नई बाईक

आज मैंने अपनी नयी बाईक कि बुकिंग कि है.. मैं नीले रंग कि मोटरसाइकिल खरीदना चाह रहा था जो मोटरसाइकिल डीलर के पास नहीं था और उसने बताया कि ट्रांसपोर्टरों कि हड़ताल के चलते मुझे वह मशीन मिलने में 15 दिनों तक का समय भी लग सकता है.. अभी मैं इसके बारे में ज्यादा नहीं बताऊंगा, मगर इतना भी जरूर बताते जाऊँगा कि यह बाईक किसी भारतीय कंपनी द्वारा बनाये गए सबसे उन्नत बाईकों में से है.. एक बार मुझे यह मिल जाने दीजिये फिर मैं इसके बारे में विस्तार से बताता हूँ.. :)

नोट - युनुस जी और अमित से आग्रह है कि अगर वह यह पढ़ रहे हैं तो कृपया राज न खोलें.. (हिंदी ब्लौग जगत में बस यही दो व्यक्ति हैं जिन्हें यह बात पता है.. :)) :D

Tuesday, January 06, 2009

जाने क्यों हर शय कुछ याद दिला जाती है

पिछले कुछ दिनों से नींद कुछ कम ही आ रही है.. कल रात भी देर से नींद आयी और आज सुबह जल्दी खुल भी गयी.. मगर बिस्तर छोड़कर नहीं उठा.. बिस्तर पर ही लेटा रहा चादर को आंखों पर खींच कर औंधा ही पड़ा रहा.. घर की याद हो आयी.. सोचने लगा कि कैसे जाड़े के मौसम में सुबह-सुबह पापा अपने ठंढ़े हाथों को मेरे गालों से सटा कर मेरी नींद तोड़ते थे और मैं भी वैसे ही नखरे मारता हुआ रजाई में और अंदर घुस जाता था.. यहां ना वो ठंढ़ है, ना पापा और ना ही वो ठंढ़े हाथों का प्यार भड़ा स्पर्श..

नौ बजे सोकर उठा, चाय-कॉफी मैं साधारणतया नहीं पीता हूं मगर आज कुछ चाय जैसी कुछ चीज पीने की इच्छा हो रही थी.. पापा कि एक शिक्षा याद हो आयी जिसका पालन कभी नहीं किया.. वो कहते थे, "आलस्य मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु होता है.." मगर मैंने तो उस शत्रु के साथ दोस्ती गांठ ली है.. कुछ दिन पहले कॉफी लेकर आया था मगर बनाया बस एक बार ही.. आज भी पीने कि इच्छा होते हुये भी नहीं बनाया.. जब छोटा था तब चाय पीने की बात भी जुबान पर लाने से किसी पाप कि तरह होता था, मगर अब कभी घर जाता हूं तो बार-बार पूछा जाता है कि चाय पियोगे या नहीं? बार बार मना करने के बाद भी.. शायद अब पापा-मम्मी को कोई साथ देने वाला चाहिये होता है इसलिये.. थोड़ी देर घर में चहलकदमी करने के बाद एक सिगरेट जलाया.. तीन-चार कश मार कर आधे में ही फेंक दिया.. आज उसे पीने कि इच्छा भी नहीं हो रही थी..

थोड़ी देर कंप्यूटर पर किटर-पिटर करने के बाद तैयार होकर ऑफिस के लिये निकला.. याद आया कि जब घर में था तब कहीं बाहर जाने से पहले पापा-मम्मी का पैर छूकर, आशीर्वाद लेकर निकलता था.. एक रूटीन सा बन चुका था यह जिसका भैया अभी तक पालन कर रहे हैं पटना में.. होस्टल में था तो कमरे की मेज पर पापा-मम्मी की तस्वीर रखे हुआ था, और कालेज जाने से पहले उसी तस्वीर से आशीर्वाद लेकर कमरे से निकलता था.. यहां तो वो भी मैंने अपने ऑफिस के क्यूबिकल में लगा रखा है..

ऑफिस के लिये घर से निकलते ही सड़क को पार करते अपने ही उम्र के एक लड़के-लड़की को देखा.. मुझे उस लड़की कि याद हो आयी.. वो जब मेरे साथ होती थी तो सड़क पार करते समय कसकर मेरा हाथ पकर लेती थी, एक तरह से मेरी ओट में छुप सी जाती थी डरकर और सड़क पार करते ही अपनी झेंप छुपाने के लिये मुझसे लड़ने लगती.. "तुम्हें ठीक से सड़क पार करना भी नहीं आता.. वो कार.. वो ऑटो.. वो साईकिल.. वो बाईक.." और भी ना जाने क्या-क्या.. उसे सड़क पर चलती गाड़ियों से बहुत डर जो लगता था..

रास्ते में एक कालेज के सामने से गुजरते हुये कुछ लड़के आपस में चुहलबाजी करते हुये मिले.. अपने कालेज के दिन याद हो आये.. कैसे बिना बात के एक दूसरे कि टांग खिंचाई होती थी.. रात के दो बजे कैसे मैगी खाने कि लड़ाई होती थी.. कैसे दोस्तों कि खातिर प्रोफेसर तक से बिना आगा-पीछा सोचे बहस करते थे.. कभी किसी दोस्त को किसी नयी लड़की से बात करते देख कर ही हफ्तों तक खिंचाई होती थी, अब भले ही वो उस लड़की को कोई पता ही क्यों ना बता रहा हो.. किसी मित्र को उदास देखकर उसकी उदासी दूर करने को क्या-क्या जतन नहीं होता था.. किसी पेपर में खराब नंबर आने पर घरवालों से ज्यादा मानसिक सहयोग कैसे दोस्तों से मिलता था.. खैर, अब ये भी यादों का ही एक हिस्सा बना रहेगा..

ऑफिस पहूंच कर अपने सामानों को व्यस्त करने के बाद पापा-मम्मी कि तस्वीर देखी और याद आया कि बचपन में पापाजी के ऑफिस जाकर कितना खुश होते थे.. किसी राजकुमार कि भांति पूरे ऑफिस में घूमते थे.. पापाजी की मेज पर शुरू से ही मां सरस्वती कि एक तस्वीर होती है और पापाजी का तबादला जहां-जहां होता रहा वहां सबसे पहले पापाजी उस चित्र को ही स्थापित करते रहे हैं.. भगवान जैसी चीजों पर से आस्था खत्म होने के बाद मेरे लिये तो पापा-मम्मी कि यह तस्वीर ही हमेशा मेरे कार्यस्थल पर लगी रहेगी..

जाने यादों का यह कारवां आज कहां जाकर रूकने वाला है..

Monday, January 05, 2009

ताऊ का डॉगी भी ताऊगिरी में कम नहीं

कुत्ते को कुत्ता कहना जैसे कुत्ते को गाली देना है सो मैं उसे डॉगी कह रहा हूं.. बात यह है कि जब वही बात अंग्रेजी में कहते हैं तो लगता है जैसे अमृत वर्षा हो रही हो.. ये कुछ-कुछ वैसा ही है जैसे किसी अंधे को अंधा नहीं कहकर आजकल हम ब्लाईंड परसन तो लगता ही नहीं है कि हम कुछ बुरा कह रहे हैं.. कुछ गालियां भी ऐसी ही है, जिन्हें अगर हम हिंदी में कहें तो अक्षम्य हो जाये मगर अंग्रेजी में तो सब क्षम्य होता है.. ये कुछ ऐसा ही है जैसे पंछियों में राज हंस की बोली और आदमियों में गोरों की.. हजारी प्रसाद द्विवेदी जी के शब्दों में कहूं तो, "जिसकी प्रशंसा हंस भी करे वह जरूर बड़ा तत्वज्ञानी होगा.. यह बात बहुत-कुछ ऐसी ही थी जैसे आजकल घटित हो रही है.. जिसकी प्रशंसा श्वेतकाय अंग्रेज कर दे उसे आज भी महान तत्वज्ञानी मान लिया जाता है.."

मैं आया था ताऊ के डॉगी के किस्से सुनाने और ना जाने क्या बक-बक करने लग गया.. क्या करें ब्लौगरी जो ना सिखाये.. कभी तिल का ताड़ बना डालते हैं तो कभी बिना बात के जाने क्या-क्या लिख जाते हैं.. तो चलिये सुनते हैं ताऊ के डॉगी के किस्से..

अब वह ताऊ का डॉगी था तो कुछ ताऊगिरी उसने भी सीख ली थी.. एक बार वह और ताऊ जंगल से जा रहे थे.. ताऊ अपने लठ्ठ के साथ मगन थे और चले जा रहे थे, तभी उनके डॉगी को खुजली होने लगी.. बस क्या था, लगा कभी कान खुजाने तो कभी मुंह खुजाने.. ताऊ को पता भी ना चला कि कब डॉगी उनसे बिछड़ गया.. ताऊ को तो पता ना चला मगर डॉगी बेचारा कभी इधर भागता तो कभी उधर.. उसे समझ में ही ना आया कि जाऊं तो किस दिशा में?

तभी एक शेर को आते देखा उसने.. शेर को देख डॉगी डर के मारे कांपने लगा थर-थर और सोचने लगा कि बेटा आज तेरा हो गया राम नाम सत्त.. तभी डॉगी को वहीं पड़ी हुई कुछ हड्डियां दिखी.. उसके दिमाग की बत्ती जली.. वह लगा उस हड्डी को बड़े चाव से चबाने और साथ ही जोर से बोलने लगा, "वाह आज तो बस मजा आ गया इस शेर का शिकार करके.. अब बस एक शेर और मिल जाये तो दावत ही हो जाये.." शेर ने जैसे ही ये बात सुनी, उसका दिमाग ठनका.. सोचने लगा कि अरे ये कुत्ता तो बड़ा कमीना निकला, ये तो शेर का शिकार करता है.. और वह शेर वहां से दुम दबा कर चंपत हो गया..

वहीं पेड़ पर बैठा एक बंदर यह तमाशा देख रहा था.. उसने सोचा कि जाकर शेर को सब बात बता देता हूं.. इसी बहाने शेर से भी दोस्ती हो जायेगी और जीवन भर के लिये जान का खतरा भी खत्म हो जायेगा.. बंदर उछलता कूदता पहूंचा शेर के पास और कह डाली सब बात.. शेर गुस्से में दहाड़ा और बंदर को बोला, "तू बैठ मेरी पीठ पर, मैं अभी उस कुत्ते को कच्चा चबा जाता हूं.."

उधर डॉगी जी(क्या करें इत्ता चालाक डॉगी और उपर से ताऊ का, तो इज्जत से बात करनी ही पड़ती है) बंदर को जाते हुये सोच रहे थे कि जरूर कुछ गड़बड़झाला है.. तभी शेर की पीठ पर् बंदर को आते देख वो सब समझ गया और सोच में पर गया कि अब क्या किया जाये? फिर से उसके दिमाग कि बत्ती जली और फिर से वह शेर कि ओर पीठ करके बैठ गया और जोर-जोर से बोलने लगा, "इस बंदर को भेजे इतनी देर हो गई, साला बंदर एक शेर तक को फांस कर नहीं ला सकता.."

इतना सुनना था कि शेर बंदर को वहीं पटक कर सर पर पांव रख भाग गया.. तब तक ताऊ भी वहां अपने डॉगी को खोजते हुये पहूंच गये और दोनों खुशी-खुशी अपनी राह चल दिये..