पिछले कुछ दिनों से नींद कुछ कम ही आ रही है.. कल रात भी देर से नींद आयी और आज सुबह जल्दी खुल भी गयी.. मगर बिस्तर छोड़कर नहीं उठा.. बिस्तर पर ही लेटा रहा चादर को आंखों पर खींच कर औंधा ही पड़ा रहा.. घर की याद हो आयी.. सोचने लगा कि कैसे जाड़े के मौसम में सुबह-सुबह पापा अपने ठंढ़े हाथों को मेरे गालों से सटा कर मेरी नींद तोड़ते थे और मैं भी वैसे ही नखरे मारता हुआ रजाई में और अंदर घुस जाता था.. यहां ना वो ठंढ़ है, ना पापा और ना ही वो ठंढ़े हाथों का प्यार भड़ा स्पर्श..
नौ बजे सोकर उठा, चाय-कॉफी मैं साधारणतया नहीं पीता हूं मगर आज कुछ चाय जैसी कुछ चीज पीने की इच्छा हो रही थी.. पापा कि एक शिक्षा याद हो आयी जिसका पालन कभी नहीं किया.. वो कहते थे, "आलस्य मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु होता है.." मगर मैंने तो उस शत्रु के साथ दोस्ती गांठ ली है.. कुछ दिन पहले कॉफी लेकर आया था मगर बनाया बस एक बार ही.. आज भी पीने कि इच्छा होते हुये भी नहीं बनाया.. जब छोटा था तब चाय पीने की बात भी जुबान पर लाने से किसी पाप कि तरह होता था, मगर अब कभी घर जाता हूं तो बार-बार पूछा जाता है कि चाय पियोगे या नहीं? बार बार मना करने के बाद भी.. शायद अब पापा-मम्मी को कोई साथ देने वाला चाहिये होता है इसलिये.. थोड़ी देर घर में चहलकदमी करने के बाद एक सिगरेट जलाया.. तीन-चार कश मार कर आधे में ही फेंक दिया.. आज उसे पीने कि इच्छा भी नहीं हो रही थी..
थोड़ी देर कंप्यूटर पर किटर-पिटर करने के बाद तैयार होकर ऑफिस के लिये निकला.. याद आया कि जब घर में था तब कहीं बाहर जाने से पहले पापा-मम्मी का पैर छूकर, आशीर्वाद लेकर निकलता था.. एक रूटीन सा बन चुका था यह जिसका भैया अभी तक पालन कर रहे हैं पटना में.. होस्टल में था तो कमरे की मेज पर पापा-मम्मी की तस्वीर रखे हुआ था, और कालेज जाने से पहले उसी तस्वीर से आशीर्वाद लेकर कमरे से निकलता था.. यहां तो वो भी मैंने अपने ऑफिस के क्यूबिकल में लगा रखा है..
ऑफिस के लिये घर से निकलते ही सड़क को पार करते अपने ही उम्र के एक लड़के-लड़की को देखा.. मुझे उस लड़की कि याद हो आयी.. वो जब मेरे साथ होती थी तो सड़क पार करते समय कसकर मेरा हाथ पकर लेती थी, एक तरह से मेरी ओट में छुप सी जाती थी डरकर और सड़क पार करते ही अपनी झेंप छुपाने के लिये मुझसे लड़ने लगती.. "तुम्हें ठीक से सड़क पार करना भी नहीं आता.. वो कार.. वो ऑटो.. वो साईकिल.. वो बाईक.." और भी ना जाने क्या-क्या.. उसे सड़क पर चलती गाड़ियों से बहुत डर जो लगता था..
रास्ते में एक कालेज के सामने से गुजरते हुये कुछ लड़के आपस में चुहलबाजी करते हुये मिले.. अपने कालेज के दिन याद हो आये.. कैसे बिना बात के एक दूसरे कि टांग खिंचाई होती थी.. रात के दो बजे कैसे मैगी खाने कि लड़ाई होती थी.. कैसे दोस्तों कि खातिर प्रोफेसर तक से बिना आगा-पीछा सोचे बहस करते थे.. कभी किसी दोस्त को किसी नयी लड़की से बात करते देख कर ही हफ्तों तक खिंचाई होती थी, अब भले ही वो उस लड़की को कोई पता ही क्यों ना बता रहा हो.. किसी मित्र को उदास देखकर उसकी उदासी दूर करने को क्या-क्या जतन नहीं होता था.. किसी पेपर में खराब नंबर आने पर घरवालों से ज्यादा मानसिक सहयोग कैसे दोस्तों से मिलता था.. खैर, अब ये भी यादों का ही एक हिस्सा बना रहेगा..
ऑफिस पहूंच कर अपने सामानों को व्यस्त करने के बाद पापा-मम्मी कि तस्वीर देखी और याद आया कि बचपन में पापाजी के ऑफिस जाकर कितना खुश होते थे.. किसी राजकुमार कि भांति पूरे ऑफिस में घूमते थे.. पापाजी की मेज पर शुरू से ही मां सरस्वती कि एक तस्वीर होती है और पापाजी का तबादला जहां-जहां होता रहा वहां सबसे पहले पापाजी उस चित्र को ही स्थापित करते रहे हैं.. भगवान जैसी चीजों पर से आस्था खत्म होने के बाद मेरे लिये तो पापा-मम्मी कि यह तस्वीर ही हमेशा मेरे कार्यस्थल पर लगी रहेगी..
जाने यादों का यह कारवां आज कहां जाकर रूकने वाला है..
नौ बजे सोकर उठा, चाय-कॉफी मैं साधारणतया नहीं पीता हूं मगर आज कुछ चाय जैसी कुछ चीज पीने की इच्छा हो रही थी.. पापा कि एक शिक्षा याद हो आयी जिसका पालन कभी नहीं किया.. वो कहते थे, "आलस्य मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु होता है.." मगर मैंने तो उस शत्रु के साथ दोस्ती गांठ ली है.. कुछ दिन पहले कॉफी लेकर आया था मगर बनाया बस एक बार ही.. आज भी पीने कि इच्छा होते हुये भी नहीं बनाया.. जब छोटा था तब चाय पीने की बात भी जुबान पर लाने से किसी पाप कि तरह होता था, मगर अब कभी घर जाता हूं तो बार-बार पूछा जाता है कि चाय पियोगे या नहीं? बार बार मना करने के बाद भी.. शायद अब पापा-मम्मी को कोई साथ देने वाला चाहिये होता है इसलिये.. थोड़ी देर घर में चहलकदमी करने के बाद एक सिगरेट जलाया.. तीन-चार कश मार कर आधे में ही फेंक दिया.. आज उसे पीने कि इच्छा भी नहीं हो रही थी..
थोड़ी देर कंप्यूटर पर किटर-पिटर करने के बाद तैयार होकर ऑफिस के लिये निकला.. याद आया कि जब घर में था तब कहीं बाहर जाने से पहले पापा-मम्मी का पैर छूकर, आशीर्वाद लेकर निकलता था.. एक रूटीन सा बन चुका था यह जिसका भैया अभी तक पालन कर रहे हैं पटना में.. होस्टल में था तो कमरे की मेज पर पापा-मम्मी की तस्वीर रखे हुआ था, और कालेज जाने से पहले उसी तस्वीर से आशीर्वाद लेकर कमरे से निकलता था.. यहां तो वो भी मैंने अपने ऑफिस के क्यूबिकल में लगा रखा है..
ऑफिस के लिये घर से निकलते ही सड़क को पार करते अपने ही उम्र के एक लड़के-लड़की को देखा.. मुझे उस लड़की कि याद हो आयी.. वो जब मेरे साथ होती थी तो सड़क पार करते समय कसकर मेरा हाथ पकर लेती थी, एक तरह से मेरी ओट में छुप सी जाती थी डरकर और सड़क पार करते ही अपनी झेंप छुपाने के लिये मुझसे लड़ने लगती.. "तुम्हें ठीक से सड़क पार करना भी नहीं आता.. वो कार.. वो ऑटो.. वो साईकिल.. वो बाईक.." और भी ना जाने क्या-क्या.. उसे सड़क पर चलती गाड़ियों से बहुत डर जो लगता था..
रास्ते में एक कालेज के सामने से गुजरते हुये कुछ लड़के आपस में चुहलबाजी करते हुये मिले.. अपने कालेज के दिन याद हो आये.. कैसे बिना बात के एक दूसरे कि टांग खिंचाई होती थी.. रात के दो बजे कैसे मैगी खाने कि लड़ाई होती थी.. कैसे दोस्तों कि खातिर प्रोफेसर तक से बिना आगा-पीछा सोचे बहस करते थे.. कभी किसी दोस्त को किसी नयी लड़की से बात करते देख कर ही हफ्तों तक खिंचाई होती थी, अब भले ही वो उस लड़की को कोई पता ही क्यों ना बता रहा हो.. किसी मित्र को उदास देखकर उसकी उदासी दूर करने को क्या-क्या जतन नहीं होता था.. किसी पेपर में खराब नंबर आने पर घरवालों से ज्यादा मानसिक सहयोग कैसे दोस्तों से मिलता था.. खैर, अब ये भी यादों का ही एक हिस्सा बना रहेगा..
ऑफिस पहूंच कर अपने सामानों को व्यस्त करने के बाद पापा-मम्मी कि तस्वीर देखी और याद आया कि बचपन में पापाजी के ऑफिस जाकर कितना खुश होते थे.. किसी राजकुमार कि भांति पूरे ऑफिस में घूमते थे.. पापाजी की मेज पर शुरू से ही मां सरस्वती कि एक तस्वीर होती है और पापाजी का तबादला जहां-जहां होता रहा वहां सबसे पहले पापाजी उस चित्र को ही स्थापित करते रहे हैं.. भगवान जैसी चीजों पर से आस्था खत्म होने के बाद मेरे लिये तो पापा-मम्मी कि यह तस्वीर ही हमेशा मेरे कार्यस्थल पर लगी रहेगी..
जाने यादों का यह कारवां आज कहां जाकर रूकने वाला है..