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Saturday, November 08, 2008

"कैसी रही दीपावली?"

दीपावली बीत जाने के बाद इस यक्ष प्रश्न ने कई बार रास्ता घेरा तो कईयों से मैंने भी यही पूछा.. दीपावली बीते कई दिन हो गये और अब तो छठ भी बीत गया है, मुझे पता है कि कैसे अगले साल कि दीपावली आ जायेगी ये भी पता नहीं चलेगा.. जो याद रह जायेगा वो बस यह कि पिछली दीपावली कैसी थी.. फिर से मैं किसी से पूछूंगा कि "कैसी रही दीपावली?" और कुछ लोग मुझसे भी यही प्रश्न करेंगे..

चलिये मैं आपको बताता हूं कि कैसी रही मेरी दीपावली..

जब आप घर से 2500 किलोमीटर दूर अकेले, अपने दोस्तों के साथ होते हैं और कोई खास पर्व आपके सामने होकर गुजर जाता है तो यह पल बहुत चुभते हैं.. बस वैसी ही रही मेरी भी दीपावली.. बचपन को याद करके नौस्टैल्जिक भी खूब हुआ.. मुझे याद आ रहा था कि कैसे मैं घर के सबसे छोटे सदस्य कि भूमिका बखूबी निभाता था.. मिठाई और पटाखों कि लंबी सूची बनाता था.. कई बार घर के लोग मना भी करते थे कि इतने पटाखे मत लो.. ये बस पैसे कि बरबादी है.. मगर अधिकतर मेरी मांगे पूरी हो ही जाती थी.. जो मांगें पूरी नहीं होती थी उनके बारे में मैं सोचता था कि बड़ा होकर खूब मस्ती करूंगा.. जैसे बड़े होने पर लोगों के पास पैसे अपने आप आ जाते हैं.. अब दुनिया की नजर में बड़ा भी हो चुका हूं, पैसे भी कमाने लग गया हूं.. मगर ना जाने कहां से एक संकोच कि दिवार भी खड़ी हो गई है.. पैसे आने पर उसे बचाने का भी सोचने लगा हूं.. यह बात और है कि कुछ बचता नहीं है.. :)

सबसे ज्यादा तब अखरा जब मन में पटाखे खरीदने कि इच्छा भी नहीं हुई.. डर सा गया.. कहीं यह बड़ा होने कि निशानी तो नहीं है? कहीं मैं बड़ा तो नहीं हो गया हूं? बचपन तो बचपन, 20 साल का होने के बाद भी चुटपुटिया चलाने वाली पिस्तौल हर दीपावली पर खरीदना नहीं भूलता था.. अपने अपार्टमेंट के कुछ बच्चों को उसे चलाता देख अच्छा लगा.. लगा जैसे कि बचपन अब भी वैसा ही है जैसा आज से 20 साल पहले हुआ करता था..

पिछले साल कि दीपावली भी याद आई, जब मैं 3 साल के बाद दीपावली में घर पर था.. मगर मेरे लिये वो दीपावली इसलिये खास थी क्योंकि भैया कि शादी के समय मैंने नयी-नयी नौकरी करनी शुरू कि थी जिस कारण छुट्टी नहीं मिल रही थी और मैं बिलकुल मेहमान कि तरह 2 दिनों के लिये घर गया था.. भाभी से ठीक से बाते भी नहीं कर पाया था.. अब उसके बाद पहली बार घर जा रहा था और वो भी दीपावली मे.. अब मुझसे ज्यादा खुश और कौन हो सकता था?

यूं तो मैं पूजा-पाठ से कोशों दूर रहता हूं मगर पिछले साल दीपावली में पूजा के समय आरती बहुत मन से गाया था.. आरती गाने के पीछे कारण श्रद्धा नहीं बल्की गीत था जो मैं गा रहा था.. उस आरती वाले विडियो का प्रयोग इस दीपावली में बखूबी हुआ.. घर में बस शिवेन्द्र ही था जिसके हिस्से पूजा-पाठ करने कि जिम्मेदारी थी, मगर उसे लक्षमी-आरती याद नहीं थी और उस खाली स्थान को मेरे गाये पिछले साल के आरती वाले विडियो से भरा गया..

अक्सर घर में साफ सफाई चलती ही रहती है खासकर तब से जब हमारे घर में खटमलों ने हमला बोला था मगर अब हम उस हमले को पूरी तरह से नेस्तनाबूत कर चुके हैं.. :) मगर उस दिन पूरे घर कि सफाई सुबह उठ कर मैंने और मेरे मित्रों ने कि.. अपना घर सजाने के लिये ना जाने कितने ही मकड़ियों का घर उजाड़ दिया.. दोपहर में अफ़रोज़ भी आ गया.. घर में गैस पिछले 2-3 दिनों से नहीं था और किसी के पास ऑफिस से उतना समय नहीं मिल रहा था कि गैस भराया जाये, सो यह काम भी उसी दिन करना था.. उत्तर भारत में दीपावली के दिन लोग अपनी दुकानें खुला रखते हैं और उनके बीच यह मान्यता है कि दुकान जितना चलेगा, लक्ष्मी उतना ही घर में आयेगी.. मगर उसके ठीक उलट यहां लोग अपनी दुकाने बंद किये हुये थे.. घर के पास वाले जिस होटल में हम खाते हैं, वो भी बंद था सो दुसरे होटल में जाना परा.. गैस वाले ने गैस तो रख ली मगर बोला कि आज ही दे पाना संभव नहीं होगा.. सो उस दिन बिना गैस के ही काम चलाना पड़ा..

सांझ ढलते-ढलते प्रियंका भी घर आ गयी.. फिर शिवेन्द्र और प्रियंका जाकर कुछ दिये और मोमबत्ती का इंतजाम भी कर आये.. थोड़ी देर बाद प्रियंका अपने घर पूजा करने चली गयी.. रात में जितनी थोड़ी सी गैस बची हुयी थी उससे मैगी बनाई फिर सो गये.. जहां फोन पर बधाईयां देनी थी वह भी दे डाला मगर बाहर से फोन कम ही आये, क्योंकि उत्तर भारत में दीपावली अगले दिन था..

अब सोचता हूं तो लगता है कि कैसे किसी पर्व-त्योहार पर पापा-मम्मी हमारी लगभग हर मांग पूरी करते थे? उनके पास कोई कुबेर का खजाना तो था नहीं.. वही बंधा-बंधाया वेतन मिलता था.. पांचवे वेतन आयोग के आने से पहले तो बहुत ही कम हुआ करता था.. अब पाता हूं कि हमारी हर मांग को पूरा करने के लिये वो कहीं ना कहीं अपने भविष्य कि योजनाओं में कटौती करते रहे होंगे.. क्योंकि अब समझ गया हूं, बड़े होने पर पैसा अपने आप नहीं चला आता है.. उसके लिये मेहनत करनी होती है..

अभी मैं सोच रहा था कि डा.अनुराग जी जैसे ही कोई त्रिवेणी हम भी अंत में लगाते हैं.. कुछ अजीब सा बन पड़ा जो मैं नहीं लिखने वाला हूं.. उम्मीद है डा.साहब ही अब इसका इलाज करेंगे.. :D

Friday, November 07, 2008

आज मेरा चिट्ठा तर गया!! :)

मेरी एक बहुत अच्छी मित्र है, मगर उसे मेरे अपने चिट्ठे पर कुछ निजी बातों को लिखना अच्छा नहीं लगता है सो शायद ही मैं कभी अपने चिट्ठे पर उसकी चर्चा किया हूं.. उसकी बातों का जिक्र मेरे चिट्ठे पर कुछ-एक बार हुआ है, मगर वो मेरी कलम से नहीं बल्की मेरे मित्र विकास कि कलम से.. अभी वो यू.एस.ए. में है, अपने ऑफिस के काम के चलते.. ढ़ाई महीने के लिये गयी हुई थी जो अब पूरा होने को आ रहा है.. आज सुबह उसने मेरे चिट्ठे पर पहली बार एक कमेंट किया.. सबसे पहले तो वो कमेंट देखकर बहुत खुशी हुई, मगर जल्द ही वो खुशी आश्चर्य में बदल गया.. मुझे तो कभी लगता भी नहीं था कि वो मेरे चिट्ठे को पढ़ती भी होगी.. वैसे ये भरोसा उसका कमेंट पढ़ने के बाद भी नहीं है :).. क्योंकि यह भी हो सकता है कि चूंकि मैंने पिछले दो पोस्ट दोस्तों के साथ बिताये पलों पर लिखा था सो उसे पढ़ने आयी हो.. वैसे उसे उसकी जरूरत नहीं थी क्योंकि मैंने अपने लगभग सभी मित्रों को वो लेख ब्लौग पर पोस्ट करने से पहले ही मेल कर दिया था.. सो अब वो पहले कि खुशी और बाद का आश्चर्य, दोनों मिलकर आश्चर्यमिश्रित खुशी में बदल गयी..

वैसे मुझे उसे जो भी लिखना था वो मैंने उसे और अपने दोस्तों को मेल करके लिख दिया है, मगर फिर भी मैं उसके कमेंट का उल्लेख अपने चिट्ठे पर करना चाहता था सो यह पोस्ट भी ठेल दिया.. :)

उसने कमेंट किया था -
Vani said...
2nd aur last snap bahut hi achha hai, per mujhe 2nd wala bhaut hi achha laga...tum sab ki yaad aa gayi...missing my friends:-(

मेरा उसे कहना है - अरे वाणी, टेंशन काहे को लेती हो.. एक हफ्ते में तुम फिर से चेन्नई में रहोगी.. फिर कभी हो आयेंगे.. :)

यहां वाणी ने अपने कमेंट में इस चित्र के बारे में लिखा था..

इसमें सबसे आगे विकास है उसके पीछे प्रियंका और उसके पीछे मैं हूं.. चित्र उतारने का काम शिवेन्द्र का था..

सन् 2006 नवम्बर में मैंने अपना चिट्ठा शुरू किया था.. उस समय बस मैं अपनी कवितायें ही लिखा करता था जो महीने-दो महीने में एक बार कुछ लिख देता था.. अपने ब्लौग पर अहसान कर देता था.. :) दिसम्बर की छुट्टियों में वाणी ने मेरा चिट्ठा अपने भैया को दिखाई, और उन्होंने मेरी कविताओं कि काफी तारीफ भी की.. वो तारीफ उस समय मेरे ब्लौग के लिये बहुत जरूरी था.. और जाने अनजाने में वाणी ने मुझे और लिखने के लिये प्रेरित भी किया.. आज भैया से संपर्क हुये बहुत दिन हो गये हैं.. इस बीच मुझे यह भी पता नहीं कि अब वो मेरा चिट्ठा पढ़ते भी हैं या नहीं.. खैर वाणी आये तो पूछता हूं..

हो सकता है कि वाणी को मेरा उसके बारे में यह सब लिखना अच्छा ना लगे.. मगर मेरे मन में जो भावनायें थी उसे तो मैंने लिख दिया.. अब चलता हूं.. :)

Tuesday, October 21, 2008

२४ घंटे, जो ख़त्म होता सा ना दिखे (भाग दो)

अमित की कलम से
यहां भाग एक है

अंततः उसने मुझे पैसा वापस कर ही दिया और मैं बस से उतर गया.. अब तक हद हो चुकी थी.. मैं वापस बस स्टैंड आया इस आशा में कि कोई ना कोई बस मिल ही जायेगा और् आश्चर्यमिश्रित खुशी के साथ मैंने पाया कि एक बस थी भी वो भी AC बस.. मैंने फिर एक दौड़ लगायी और पहुंचा उसके कंडक्टर के पास..

मैंने उससे पुछा, "अंकल, एक सीट दे दो.." उसने मुझसे पैसे मांगे और मैंने दे दिये.. अरे ये क्या!! उसका टिकट मशीन ने काम करना बंद कर दिया.. NOT AGAIN.. 30 मिनट उसने भी कोशिश की.. पर वो ठीक नहीं हुआ.. अब तक रात के 12.15 हो चुके थे.. अंत में वह कंट्रोल रूम गया और उसे ठीक करके ले आया.. Fianlly I got the ticket और मैं बस में बैठ गया और बस चल पड़ी.. एक बात यहां ये अच्छी थी की यह बस अपने समय से 2 घंटे देरी से चल रही थी इसलिये मुझे यह बस मिल गयी..

खैर मैं बस में बैठ गया.. अब तक कि सारी बातें दिमाग में घूम रही थी और मैं सोच रहा था कि अब सब ठीक हो गया है.. पर किसे पता? मेरी किस्मत का? पता नहीं किसका चेहरा मैंने सुबह-सुबह देखा था..

हां तो अंततः मैं बस में चढ ही गया.. और बस लगभग 12.30 में खुल गयी.. अब मैंने सोचा कि चलो अब तो कुछ नहीं होगा और मैंने अपना आई-पॉड कान में डाला और सोने कि कोशिश करने लगा.. पर नींद आती तब ना? वही सारी बात दिमाग में घूम रही ती.. वही सब सोचते सोचते आंख लग गयी.. जब आंख खुली तो मैं इलेक्ट्रोनिक सिटी में आ चुका था.. मतलब बैंगलोर में घुस चुक थ.. थोड़ा सुकून मिला कि चलो बैंगलोर फहूंच गया.. लगभग 7.30 सुबह में मैजेस्टिक(बैंगलोर का प्रमुख बस अड्डा) भी पहूंच ही गया..

नया दिन नई शुरूवात.. अब कल की सारी बातें भूतकाल में जा चुकी थी.. और बैंगलोर पहूंचते ही मुझे काफी सुकून मिला.. काफी रिलैक्स महसूस करता हूं.. मैं लोकल बस स्टैंड कि तरफ बढ गया.. लोकल बस लेने के लिये.. मुझे यहां से बनसंकरी थर्ड स्टेज जाना था.. बस मिल गई.. मैं बैठ गया.. और बस चल भी पड़ी.. मैजेस्टिक से बनशंकरी बस 25-30 मिनट लगते हैं.. सो 8.10 के लगभग मुझे घर पर होना चाहिये था.. पर होनी को कुछ और ही मंजूर था.. और मेरा बैड लक अभी तक चालू था.. लगभग 5 मिनट चलने के बाद ही बस के गियर ने काम करना बंद कर डिया.. बेचारे ने बहुत कोशिश की.. पर कैसे ठीक होता मैं जो थ बैठा हुआ उस बस में.. मुझे मन में काफी हंसी आई.. खैर बस से उतर गया.. सोचा औटो ले लूं.. पर यह सोच कर कि औटो में क्यों पैसा बरबाद करूं.. सो वापस बस स्टैंड जाकर दूसरी बस ले लेता हूं.. मैं वापस बस स्टैंड गया.. पर अफ़सोस कोई बस नहीं थी.. सिर्फ एक ही नंबर 45B सीधे वहां तक जाती है और वो बस नहीं थी.. खैर कोई बात नहीं, मैंने ये सोच कर एक डूसरे नंबर की बस में बैठ गया जो बनशंकरी के पास मुझे उतार देती और वहां से मैं औटो ले लेता.. यह सोचकर मैं बैठ गया उसमें..

And thanks to God अब इस बस में कुछ नहीं हुआ और उसने मुझे BDA COMPLEX जहां मुझे उतरना था, उतार दिया.. अब बारी थी औटो लेने की.. 4-5 औटो खड़े थे.. मैंने एक-एक करके पूछा.. जिसने सबसे कम बोला मैं बैठ गया और औटो चल पड़ी.. मुश्किल से 15 मिनट का रास्ता था यहां से लेकिन लगभग 7-8 मिनट के बाद औटो रुक गयी.. मैंने पूछा क्या हुआ भाई? उसने कहा कि कुछ नहीं सर गैस खत्म हो गया है..(Not again) अभी चेंज करता हूं.. जान में जान आयी की उसके पास एक्स्ट्रा सिलेंडर था.. और वो उतर कर पीछे चला गया सिलेंडर बदलने.. काफी समय हो गय मगर वह वापस नहीं आया.. मैं भी उतर गया देखने के लिये कि इतना समय क्यों लग रहा है.. पीछे देखा.. That was Unbelievable.. I was just Shocked.. औटो वाला नीचे जमीन पर पड़ा था.. और उसके मुंह से कुछ लिक्विड निकल रहा था या कहें तो थूक निकल रहा था.. पूरा शरीर उसका बुरी तरह हिल रहा था.. मैं घबरा गया.. मुझे समझ में नहीं आया कि मैं क्या करूं.. ऐसा मेरे साथ दूसरी बार हो रहा था.. पहली बार कब हुआ था ये कहानी फिर कभी..

आस पास कोई था भी नहीं.. सुबह का समय था.. मैंने उसे हिलाया डुलाया.. लेकिन सब बेकार.. उसका कांपना लगातार जारी रहा.. अब तक मुझे ये समझ में आ चुका था कि इसे मिरगी का दौरा पड़ा है.. लेकिन मैं क्या करूं कुछ समझ में नहीं आ रहा था.. मेरे पास जो पानी था मैंने उसके चेहरे पर डाल दिया लेकिन कोई असर नहीं हुआ.. तब तक एक अंकल आते दिखे.. जौगिंग कर रहे थे वो.. मैंने उनसे मदद मांगी और उन्होंने बताया कि Epilepsy का केश है.. and see the Coincedence अरे नहीं वो डा.नहीं थे.. लेकिन उनका बेटा डाक्टर था.. उन्होंने मेरे फोन से अपने बेटे को कॉल किया.. उसने क्या कहा मुझे नहीं पता लेकिन उसके बाद अंकल ने उसे गोबर सुंघाया.. तब तक उनका बेटा भी आ गया.. और औटो वाले को होश भी आ गया थ..

उनके बेटे ने उसे कुछ टैब्लेट्स दीया.. फिर वो लोग कन्नड़ में आपस में बात करने लगे.. मुझे काफ़ी थैंक्स बोला.. औटोवाले ने तो हद ही कर दिया था.. फिर मैंने कहा यार मैं अब जाता हूं.. अब तक वो पूरी तरह नॉरमल हो चुका थ.. लेकिन औटोवाले ने बहुत जोर दिया कि वो मुझे घर तक छोड़ देगा.. और काफ़ी मना करने के बाद भी वो नहीं माना.. और एक बार फिर मैं औटो में बैठा और घर के तरफ निकल पड़ा.. वो अंकल और उनके बेटे ने भी काफी आभार प्रकट किया..

रास्ते भर औटो वाला थैंक्स बोलता रहा और बताया कि उसे कभी-कभी ये प्रोबलेम होती रहती है.. खैर लगभग 9.30 में मैं घर पहूंच गया.. जब औटो वाले को पैसा देने लगा तो उसने इंकार कर दिया लेने से.. लेकिन अंततः मैंने उसे पैसा दे ही दिया और मैं घर पहूंच गया..

Saturday, October 18, 2008

एक खास मित्र का परिचय

ज्ञान जी के चिट्ठे पर कुछ दिन पहले पढा था कि अगर किसी चिट्ठाकार को विश्वनाथ जी जैसे 3-4 पाठक मिल जायें तो उनका चिट्ठाकारी जीवन सफल हो जाये.. कुछ उसी तर्ज पर मैं कहना चाहता हूं कि अगर मनोज जैसा एक मित्र भी गलती से किसी को जीवन में मिल जाये तो उसका जीवन सफल हो जायेगा.. कुछ दिन पहले मैंने अपने मित्र मनोज कि लिखी हुई एक कविता ठेली थी, जिसके बाद ज्ञान जी ने टिपियाया था कि "सुन्दर। मनोज के परिचय में कुछ पंक्तियों की अपेक्षा थी।" मैंने उस पोस्ट में उसके बारे में कुछ भी नहीं लिखा था क्योंकि वह पोस्ट बस उस कविता के लिये समर्पित कर रखा था.. अगर वहां मैं मनोज के बारे में लिखता तो यह उस पोस्ट और मनोज के बारे में लिखी गई यह पोस्ट, दोनो के ही साथ नाइंसाफी होती..

ग्रैजुएशन मे नया नया एडमिशन लिया था.. कक्षा बहुत कम जाता था.. उस समय का उपयोग आवारागर्दी कि लम्बी कहानियां लिखने में करता था या फिर बस कुछ फालतू के कार्यों के लिये.. कक्षा ना जाने के पीछे सबसे बड़ा कारण यह था कि जो कुछ भी सिलेबस में था उसमें मुझे लगता था कि मेरे लिये कुछ भी नया नहीं है.. मित्रों कि संख्या भी बहुत सीमित थी.. अगर कभी गलती से सुबह वाले क्लास से कुछ समय पहले पहूंच गया तो मनोज को पहले से वहां पाता.. कुछ औपचारिकता होती और बस इतना ही.. धीरे-धीरे औपचारिकता मित्रता में बदलने लगी.. एक ही कक्षा में थे सो आपस में पढाई को लेकर होड़ भी लगती, मगर हमेशा मित्रवत प्रतिस्पर्धा ही रही..

हमारी मित्रता कैसे प्रगाढ मित्रता में बदली यह पता नहीं.. क्योंकि ऐसा किसी एक दिन में नहीं होता है.. इसके ऐसा होने के लिये एक-एक पल के हजार लम्हों के संयोग की जरूरत होती है.. सुख-दुख में बराबर की भागीदारी होने की जरूरत होती है.. अब अपने जिंदगी रूपक डायरी के पुराने पन्नों को पलटता हूं तो लगता है कि हमेशा उसने मेरा साथ मुझसे ज्यादा दिया.. इस मामले में मैं कहीं दूर तक नजर भी नहीं आता हूं.. शायद यही एक ऐसा कारण है जिसके कारण मैं इससे इतना ज्यादा जुड़ा हुआ हूं..

मेरा ऐसा मानना है कि अगर आपके जीवन में कोई ऐसा व्यक्ति आता है जो बिना किसी स्वार्थ के और बिना किसी वजह के आप पर सब कुछ लुटाने को तैयार रहता है और आप उस व्यक्ति को सही समय पर नहीं पहचान पाते हैं और उसे खो देते हैं, तो यहां खोने के लिये उस व्यक्ति के लिये कुछ भी नहीं होता है.. अगर कुछ खोते हैं तो आप ही.. और सबसे बड़ी बात तो यह है कि ऐसा व्यक्ति आपके जीवन में एक ही बार आता है.. हो सकता है कि उससे अच्छे लोग आपको मिल जायें जो कि अपने आप में एक मिशाल हो.. बहुत अच्छे मित्र भी आपको मिल जायें.. मगर बिना किसी स्वार्थ के आपके लिये कुछ भी और किसी भी हद तक करने को तैयार रहने वाला मित्र आपको एक ही बार मिलता है..

मेरे लिये अच्छी बात तो यह है कि मैंने अपने जीवन में ऐसे व्यक्ति कि पहचान सही समय पर कर ली.. अपने कुछ मित्रों कि तरह देरी नहीं कि..

यह पोस्ट मैं यहीं खत्म करता हूं.. इसके बारे में मैं समय-समय पर लिखता रहूंगा.. क्योंकि एक पोस्ट पूरा नहीं है इसके लिये.. सही कहूं तो मैं इसके बारे में जितने पोस्ट चाहूं उतने लिख सकता हूं.. हजारों उन लम्हों के बारे में जो हमने साथ बिताये.. खुशी के मौके.. गम का शमां.. गंगा किनारे बिताये गये क्षण.. आवारागर्दी करते हुये पटना की सड़कों कि खाक छानने का समय.. नाला रोड, मछुवा टोला, राजाबाजार, राजेन्द्रनगर, कंकड़बाग, बोरिंग रोड, शास्त्रीनगर और भी ना जाने कहां कहां.. क्लास में कि गई शैतानियां.. दिल्ली में गुजारे गये गये खुशगवार पल.. तो वहीं बिताये गये मायूस पल भी.. सिर्फ शीर्षक ही लिखूं तो 2-3 पोस्ट बन जायेंगे..

चलिये यह फिर कभी..

Friday, October 10, 2008

इंतजार भी कितनी खूबसूरत होती है.. है ना?

इंतजार भी कितनी खूबसूरत होती है..
एक ऐसा इंतजार जो कभी लगता है,
खत्म ना ही हो तो अच्छा है..
दिल को सकून तो मिलता है,
कि तुम भी शायद इसी इंतजार में हो..
मेरे इंतजार में..

भुलावे में जीना भी कभी-कभी
जीने कि वजह बन जाती है..
तुम कभी वापस मत आना..
शायद यह खुशफहमी खत्म ना हो जाये..
जीने की वजह ही खत्म ना हो जाये..
तुम कभी वापस मत आना..
प्लीज मत आना..


मेहदी हसन जी का एक गीत..

Tuesday, September 16, 2008

अजी नाम में ही तो सब कुछ है


शेक्सपीयर का लिखा हुआ और धीरे-धीरे लोकोक्ति में बदल चुक यह वाक्य कि, नाम में क्या रखा है.. मगर मजे की बात तो यह है कि जब उसने लिखा था तब उसके नीचे अपना नाम भी लिख ही दिया जिससे सभी ये जाने की इसे किसने लिखा है.. मेरा तो मानना है कि नाम में ही सभी कुछ रखा है.. कोई नामी-गिरामी आदमी जब कोई बकवास भी करता है तो सभी कान लगा कर उसकी बात सुनते हैं.. साथ में वाह-वाही भी करते हैं.. और यदी कोई अनाम व्यक्ति अगर कुछ बहुत गूढ बातें भी करता है तो कोई उसकी बात नहीं सुनता है.. साहित्य की नजर से देखने पर भी आप यही पायेंगे की छपता उसी का है जिसका कोई नाम हो, नहीं तो अच्छी रचनायें भी यूं ही फेंकी हुई मिलेगी..

आजकल मेरे भतीजे का कोई अच्छा सा नाम ढूंढा जा रहा है.. बेचारा बहुत दिनों तक बिना नाम के ही रहा.. सभी कोई अच्छा सा नाम उसके लिये सोच रहे हैं.. यूं तो कुछ नाम अभी विचाराधिन हैं मगर कोई नाम अभी तक तय नहीं हुआ है.. घर का पुकारू नाम केशू रख दिया गया है..

जब इसका जन्म हुआ था तब मुझसे पुछा गया की क्या नाम रखना है, साथ में यह भी कहा गया की भागवान के नाम पर होना चाहिये.. मैंने तुरत-फुरत ही कहा, "मुर्गन" या "मुर्गेशन".. :) सभी मुझपर चिल्लाना शुरू कर दिये कि कैसा नाम चुन रहे हो बेटा का? लग रहा है जैसे चिकेन कबाब का नाम रख रहे हो.. मैंने बताया की दक्षिण में यह नाम बहुत प्रसिद्ध है.. भगवान के ही नाम पर है.. मगर फिर एक अवरोध कि नाम कृष्ण या फिर कम से कम भगवान विष्णु के नाम पर होना चाहिये.. मैंने फिर सुझाया, "श्रीनिवासन" या "श्रीनिवास".. अगर आंध्रप्रदेश के मुताबिक नाम रखना हो तो श्रीनिवास और अगर तमिलनाडु के नाम पर रखना हो तो श्रीनिवासन.. अबकी बार मेरी भाभी की प्रतिक्रिया कुछ ऐसी थी.. "बाप रे!! आप तो पूरे मद्रासी बन गये हैं.. मेरे बच्चे का नाम बिगाड़ कर छोड़ियेगा.. आपसे नाम नहीं रखवाना है.."

अब आप ही बताईये, मैं जहां रहूंगा वहीं की संस्कृति को याद रखूंगा ना? वैसे भी मुर्गन नाम कितना अच्छा है.. जब भी अपने बच्चे की याद आयेगी, साथ में चिकेन भी याद आयेगा.. ;)

वैसे अभी "सुशांत प्रियदर्शी" नाम रखे जाने की प्रबल दावेदारी है(भले ही भगवान के नाम पर ना हो".. बच्चे के दादाजी का सुझाया नाम है.. भैया के नाम से भी बहुत मिलता जुलता नाम है क्योंकि भैया का नाम "सुस्मित प्रियदर्शी" है.. भैया के पहले नाम का पहला और अंतिम अक्षर से भी मिलाप हो रहा है.. सच कहें तो मुझे भी ये नाम पसंद है.. आखिर उसके अपने छोटे पापा के नाम से भी तो बहुत मिलता है.. "प्रशांत प्रियदर्शी"..

आप क्या कहते हैं.. कुछ आप भी सुझायें.. मगर फिर से एक बात कहूंगा.. नाम 'S' अक्षर से ही शुरू होना चाहिये..

Thursday, July 10, 2008

आम जिंदगी और मेंटोस जिंदगी. दिमाग की बत्ती जला दे..

ये है आम जिंदगी एक साफ्टवेयर प्रोफेशनल की..



और ये है मेंटोस जिंदगी एक साफ्टवेयर प्रोफेशनल की..



मेंटोस!! दिमाग की बत्ती जला दे.. :)