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Friday, July 03, 2009

लाईफ, जैसे कोई चैट बॉक्स


आज से लगभग एक साल पहले का यह चैट हिस्ट्री आप लोगों के सामने रख रहा हूं.. जिससे आप यह समझ सकेंगे कि ऑफिस में खाली समय में या फिर थोड़ी देर के ब्रेक में हम(मैं और मेरा मित्र शिवेन्द्र) कैसे टाईम पास करते हैं.. ;)

प्रशान्त - क्या रे..
प्रशान्त - जिंदा है अभी तक??

शिवेन्द्र - हां यार..
शिवेन्द्र - :-)

प्रशान्त - काहे जिंदा है?? किसके लिये?? जाओ डूब मरो चुल्लू भर पानी में..
प्रशान्त - ;)

शिवेन्द्र - क्यों?

प्रशान्त - ये जीना भी क्या जीना है?? साला बाबू टाईप नौकरी हो गया है..
प्रशान्त - इससे अच्छा तो डूब मरना ही है..

शिवेन्द्र - बाबू टाईप नौकरी हो गया है! मतलब?
शिवेन्द्र - ???
शिवेन्द्र - ?????
शिवेन्द्र - अबे कुछ लिखेगा बे? घास चरने चला गया है क्या?

प्रशान्त - अरे सचिवालय में बाबू का नौकरी क्या होता है?? बिलकुल मोनोटोनस..
प्रशान्त - वैस ही हो गया है..

शिवेन्द्र - ओह.. हां रे
शिवेन्द्र - :-(

प्रशान्त - डेली अपना अकाऊंट चेक करता हूं.. कहीं से कोई पैसा भी नहीं भेजता है..

शिवेन्द्र - बट क्या करें? कोई और ऑप्सन भी नहीं है..

प्रशान्त - :(
प्रशान्त - कहां है रे चुल्लू भर पानी.. कहीं दिखे तो मेरे लिये भी बचा कर रखना..

शिवेन्द्र - मुझे भी कोई पैसा नहीं भेजता है..

प्रशान्त - रुक जा.. मैं तुझे 1 रूपया ट्रांस्फर करता हूं.. तू मुझे कर..
प्रशान्त - ;)

शिवेन्द्र - गुड, जल्दी से कर
शिवेन्द्र - साला कम से कम 1 रूपया तो बढ़े

प्रशान्त - कर दिये..
प्रशान्त - :)

शिवेन्द्र - रूक चेक करने दे

प्रशान्त - मेरा 1 रूपया कम हो गया.. :(

शिवेन्द्र - :-)

प्रशान्त - मिला??

शिवेन्द्र - रूक

प्रशान्त - कितना टाईम लगाता है बे?

शिवेन्द्र - यस आ गया
शिवेन्द्र - :D

प्रशान्त - :)
प्रशान्त - अब तेरी बारी.. तू भेज..

शिवेन्द्र - नहीं भेजूंगा... :P

प्रशान्त - भेज साले..
शिवेन्द्र - मेरा 1 रूपया कम हो जायेगा

प्रशान्त - अभी बढ़ा है ना.. तो भेजो..
प्रशान्त - नहीं तो 1 रूपया बढ़ने पर पार्टी मांग लूंगा..

शिवेन्द्र - नहीं
शिवेन्द्र - नो पार्टी प्लीज
शिवेन्द्र - :-(

प्रशान्त - तो भेजो..
प्रशान्त - :)

शिवेन्द्र - ओके.. भेजते हैं
शिवेन्द्र - :-(

प्रशान्त - गुड.. :D

शिवेन्द्र - मिला?

प्रशान्त - वेट प्लीज.

शिवेन्द्र - मिला क्या
शिवेन्द्र - ???
शिवेन्द्र - ???????

प्रशान्त - वेट फॉर अ मिनट.
प्रशान्त - नहीं बढ़ा..
प्रशान्त - साला नहीं भेजा..
प्रशान्त - :(
प्रशान्त - कुत्ता..
प्रशान्त - गधा..

शिवेन्द्र - हा हा हा :-P

प्रशान्त - पार्टी दे..
प्रशान्त - नहीं तो एक काम करता हूं.. अपना घर वाला बही-खाता में 1 रूपया घटा दूंगा.. :P

शिवेन्द्र - नाउ चेक प्लीज

प्रशान्त - आ गया.. :D

शिवेन्द्र - गुड

प्रशान्त - साला 1 रूपये के लिये कितना रिसोर्स बरबाद किये हैं हम लोग.. ;)

शिवेन्द्र - हा हा हा.. सिर्फ कंप्यूटर + नेट + बैंड विड्थ..

प्रशान्त - :-)
प्रशान्त - चल अब बाबू वाला काम शुरू करें हम तुम..

शिवेन्द्र - ओके.. बी.एफ.एन.

प्रशान्त - बी.एफ.एन.

Tuesday, January 06, 2009

जाने क्यों हर शय कुछ याद दिला जाती है

पिछले कुछ दिनों से नींद कुछ कम ही आ रही है.. कल रात भी देर से नींद आयी और आज सुबह जल्दी खुल भी गयी.. मगर बिस्तर छोड़कर नहीं उठा.. बिस्तर पर ही लेटा रहा चादर को आंखों पर खींच कर औंधा ही पड़ा रहा.. घर की याद हो आयी.. सोचने लगा कि कैसे जाड़े के मौसम में सुबह-सुबह पापा अपने ठंढ़े हाथों को मेरे गालों से सटा कर मेरी नींद तोड़ते थे और मैं भी वैसे ही नखरे मारता हुआ रजाई में और अंदर घुस जाता था.. यहां ना वो ठंढ़ है, ना पापा और ना ही वो ठंढ़े हाथों का प्यार भड़ा स्पर्श..

नौ बजे सोकर उठा, चाय-कॉफी मैं साधारणतया नहीं पीता हूं मगर आज कुछ चाय जैसी कुछ चीज पीने की इच्छा हो रही थी.. पापा कि एक शिक्षा याद हो आयी जिसका पालन कभी नहीं किया.. वो कहते थे, "आलस्य मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु होता है.." मगर मैंने तो उस शत्रु के साथ दोस्ती गांठ ली है.. कुछ दिन पहले कॉफी लेकर आया था मगर बनाया बस एक बार ही.. आज भी पीने कि इच्छा होते हुये भी नहीं बनाया.. जब छोटा था तब चाय पीने की बात भी जुबान पर लाने से किसी पाप कि तरह होता था, मगर अब कभी घर जाता हूं तो बार-बार पूछा जाता है कि चाय पियोगे या नहीं? बार बार मना करने के बाद भी.. शायद अब पापा-मम्मी को कोई साथ देने वाला चाहिये होता है इसलिये.. थोड़ी देर घर में चहलकदमी करने के बाद एक सिगरेट जलाया.. तीन-चार कश मार कर आधे में ही फेंक दिया.. आज उसे पीने कि इच्छा भी नहीं हो रही थी..

थोड़ी देर कंप्यूटर पर किटर-पिटर करने के बाद तैयार होकर ऑफिस के लिये निकला.. याद आया कि जब घर में था तब कहीं बाहर जाने से पहले पापा-मम्मी का पैर छूकर, आशीर्वाद लेकर निकलता था.. एक रूटीन सा बन चुका था यह जिसका भैया अभी तक पालन कर रहे हैं पटना में.. होस्टल में था तो कमरे की मेज पर पापा-मम्मी की तस्वीर रखे हुआ था, और कालेज जाने से पहले उसी तस्वीर से आशीर्वाद लेकर कमरे से निकलता था.. यहां तो वो भी मैंने अपने ऑफिस के क्यूबिकल में लगा रखा है..

ऑफिस के लिये घर से निकलते ही सड़क को पार करते अपने ही उम्र के एक लड़के-लड़की को देखा.. मुझे उस लड़की कि याद हो आयी.. वो जब मेरे साथ होती थी तो सड़क पार करते समय कसकर मेरा हाथ पकर लेती थी, एक तरह से मेरी ओट में छुप सी जाती थी डरकर और सड़क पार करते ही अपनी झेंप छुपाने के लिये मुझसे लड़ने लगती.. "तुम्हें ठीक से सड़क पार करना भी नहीं आता.. वो कार.. वो ऑटो.. वो साईकिल.. वो बाईक.." और भी ना जाने क्या-क्या.. उसे सड़क पर चलती गाड़ियों से बहुत डर जो लगता था..

रास्ते में एक कालेज के सामने से गुजरते हुये कुछ लड़के आपस में चुहलबाजी करते हुये मिले.. अपने कालेज के दिन याद हो आये.. कैसे बिना बात के एक दूसरे कि टांग खिंचाई होती थी.. रात के दो बजे कैसे मैगी खाने कि लड़ाई होती थी.. कैसे दोस्तों कि खातिर प्रोफेसर तक से बिना आगा-पीछा सोचे बहस करते थे.. कभी किसी दोस्त को किसी नयी लड़की से बात करते देख कर ही हफ्तों तक खिंचाई होती थी, अब भले ही वो उस लड़की को कोई पता ही क्यों ना बता रहा हो.. किसी मित्र को उदास देखकर उसकी उदासी दूर करने को क्या-क्या जतन नहीं होता था.. किसी पेपर में खराब नंबर आने पर घरवालों से ज्यादा मानसिक सहयोग कैसे दोस्तों से मिलता था.. खैर, अब ये भी यादों का ही एक हिस्सा बना रहेगा..

ऑफिस पहूंच कर अपने सामानों को व्यस्त करने के बाद पापा-मम्मी कि तस्वीर देखी और याद आया कि बचपन में पापाजी के ऑफिस जाकर कितना खुश होते थे.. किसी राजकुमार कि भांति पूरे ऑफिस में घूमते थे.. पापाजी की मेज पर शुरू से ही मां सरस्वती कि एक तस्वीर होती है और पापाजी का तबादला जहां-जहां होता रहा वहां सबसे पहले पापाजी उस चित्र को ही स्थापित करते रहे हैं.. भगवान जैसी चीजों पर से आस्था खत्म होने के बाद मेरे लिये तो पापा-मम्मी कि यह तस्वीर ही हमेशा मेरे कार्यस्थल पर लगी रहेगी..

जाने यादों का यह कारवां आज कहां जाकर रूकने वाला है..

Wednesday, December 31, 2008

बड़ी शक्ति के साथ जिम्मेदारियां भी बड़ी हो जाती है

मैंने किसी चलताउ अंग्रेजी सिनेमा में एक डायलॉग सुना था, "बड़ी शक्ति के साथ जिम्मेदारियां भी बड़ी हो जाती है" जो मुझे बहुत सही भी लगा था.. मेरे पिछले लेख में मैंने जो कुछ भी लिखा वो सब एक जाने-माने साहित्यकार के बारे में लिखा था ना कि किसी साधारण व्यक्ति के बारे में.. हम हर दिन ना जाने कितने ही कानूनों को लोगों के द्वारा तोड़ते हुये देखते हैं.. क्या हम उन सभी को तवज्जो देते हैं? नहीं.. मगर जब वही काम किसी जाने माने प्रसिद्ध व्यक्ति द्वारा होते हुये देखते हैं तो तुरत पलट कर अपनी प्रतिक्रिया देते हैं.. कारण बस इतना ही है कि उनकी जिम्मेवारी भी बड़ी हो जाती है.. उन्हें समाज के सामने एक आदर्श के रूप में हम खोजने लगते हैं और जब वह हमे नहीं मिलता है तो क्षुब्ध भी होते हैं..

मेरे पिछले लेख पर कई लोगों ने अपने-अपने विचार व्यक्त किये.. कुछ निहायत ही डरपोक किस्म के व्यक्ति ने नकली प्रोफाईल के माध्यम से मुझपर व्यक्तिगत प्रहार भी किया.. जब मैं अपना वह लेख लिख रहा था तब मैंने अपने एक मित्र को कहा भी था कि देखना लोग कैसे अनाम बनकर या फिर नकली प्रोफाईल से मुझ पर व्यक्तिगत आरोप भी लगायेंगे.. हुआ भी बिलकुल वही.. आखिर इतने दिनो से हिंदी ब्लौगिंग में हूं तो इसकि नज्ब भी पहचानने लगा हूं..

अंत में कमेंट मॉडेशन के बारे में भी कुछ कहना चाहूंगा.. सुरेश चिपलूनकर जी और मुन्ना भैया(अविनाश दास जी) दोनों ही विचारों के मामले में दो अलग ध्रुव हैं, मगर फिर भी एक समानता है दोनों में कि दोनो ही चिट्ठों पर कमेंट मॉडेरेशन के पक्ष में नहीं हैं.. मैं इन दोनों के विचारों से शत-प्रतिशत सहमत कभी नहीं हुआ हूं, मगर शत-प्रतिशत असहमत भी कभी नहीं हुआ हूं.. मगर कमेंट मॉडेरेशन के मामले में मैं भी उसी विचार को मानता हूं जिससे यह दोनो ही सहमत हैं और मैंने भी मॉडेरेशन नहीं लगा रखा है.. अभी कुछ दिन पहले भी मेरे एक-दो पोस्ट पर बेहद घटिया टिप्पणी आयी थी, जिसका उत्तर तो मैंने वहां दे दिया था मगर उसे हटाया नहीं और ना ही कमेंट मॉडेरेशन लगाया.. मैंने अभी तक बस 2-3 कमेंट हटाया है जिसमें लिखे हुये शब्द मुझे किसी भी कीमत पर अस्वीकार है..

Thursday, December 18, 2008

सौ में सौ से ज्यादा नंबर कैसे लायें?

मैंने कुछ दिन पहले अपने कालेज के दिनों का एक पोस्ट लिखा था कि कैसे साफ्टवेयर इंजिनियरिंग पेपर हमे परेशान कर रखा था.. खैर पहला इंटरनल निकल चुका था और उसमें हम सभी फेल हो चुके थे.. अब सुनते हैं आगे का किस्सा..


जब हमने अपनी-अपनी कॉपी देखना शुरू किया तब पता चला कि कॉपी चेक करने वाली मैम को हूबहू किताबी भाषा चाहिये थी और जिसने भी किताबी भाषा का प्रयोग बखूबी किया था बस वही पास हुआ था.. अब जबकी समझ में आ ही गया था तो हम सभी खुद को भरोसा दिला रहे थे, "बेटा तू भी रट्टा मार सकता है.. जो कभी नहीं किया उसे आज कर ही डालो.. मतलब रट्टा मारो.." विकास ने तो यहां तक एलान कर दिया कि दूसरे इंटरनल में जो भी 45 से ज्यादा नंबर ले आयेगा वो साला रट्टू तोता होगा.. वैसे हमने बाद में अपने बीच एक रट्टू तोता को भी पाया, जिसके बारे में मैं बाद में बताता हूं..

जिंदगी में पहली बार मुझे अपने भीतर छुपी इस कला का भी पता चला कि मैं भी रट्टा मार सकता हूं.. दूसरों का तो पता नहीं मगर मैं और विकास दूसरे इंटरनल के 15-20 दिन पहले से ही रट्टा मारना शुरू कर दिये.. हर दिन और कुछ पढ़े चाहे ना पढ़ें मगर एक-दो पन्ने की साफ्टवेयर इंजिनियरिंग जरूर हो जाया करती थी..


यूं ही करते-कराते दूसरा इंटरनल वाला दिन भी आ गया.. उस रात सभी की हालत पहले से भी खराब हो रही थी.. खासतौर पर शिवेन्द्र, रूपेश और संजीव की.. क्योंकि हम सभी रट्टा मारने में सबसे बड़े फिसड्डी थे सो जहां रट्टा मारने की बात आई वहां हालत खराब होनी ही थी.. कुल मिलाकर सबसे अच्छे हालत में विकास था और उसके बाद मैं.. अगली सुबह शिवेन्द्र ने परिक्षा हॉल जाने से मना कर दिया कि नहीं मैं नहीं जा रहा हूं, अगले सेमेस्टर में फिर से यह पेपर दे दूंगा.. उसकी हालत लगभग नर्वस सिस्टम फेल होने जैसी हो चुकी थी.. हम लोग किसी तरह समझा-बुझा कर उसे ले गये कि कुछ भी नंबर आये, मगर चलो और परिक्षा दे ही दो..

परिक्षा देते समय जितना कुछ पढ़ा था, लगा जैसे सब भूल गया हूं.. खैर कुछ दिन बाद नंबर भी आये और हममे सबसे ज्यादा विकास को ही आये.. पूरे 46, पचास में.. उसी ने कहा था कि जिसका 45 से ज्यादा आयेगा वो होगा पक्का रट्टू तोता और उसने खुद को रट्टू तोता साबित कर ही दिया.. मेरे आये थे 28 या 29.. रूपेश का याद नहीं है मगर शिवेन्द्र और संजीव फिर से पास नहीं कर पाये थे.. पास मार्क 25 था..


फिर सेमेस्टर परिक्षा ने भी दस्तक दे ही दिया.. साफ्टवेयर इंजिनियरिंग शायद अंतिम पेपर था.. जब मैं परिक्षा भवन से बाहर निकला तब मुझे पूरा भरोसा था कि मैं पास तो हो ही जाऊंगा, विकास को सोचना ही नहीं था कि पास होगा या नहीं.. उसे तो अच्छे नंबर की चिंता थी.. शिवेन्द्र और संजीव सोच रहे थे कि अगले सेमेस्टर में फिर से देने कि तैयारी करनी परेगी..


क्लास रूम कि एक तस्वीर, क्लास खत्म होने के बाद का

जब मैं परिक्षा दे कर बाहर आया था तब मुझे पूरा भरोसा था की मैं पास हो जाऊंगा मगर जैसे-जैसे मैं होस्टल की ओर बढ़ रहा था वैसे-वैसे मुझे पता चल रहा था कि मैंने इसका उत्तर गलत लिखा है, तो उसका उत्तर गलत लिखा है.. फिर जोड़-घटाव करके देखा तो पाया जितना मैंने सही लिखा है उसमें अगर पूरे नंबर मिल गये तभी पास होऊंगा, नहीं तो मुझे भी तैयारी शुरू करनी ही चाहिये..

अगले सेमेस्टर की नई सुबह.. रिजल्ट आने से पहले एक दिन मैं और विकास कालेज कैंपस में घूम रहे थे और आने वाले रिजल्ट के बारे में बात कर रहे थे.. ऐसे ही जोड़कर देखा तो पाया कि विकास को अगर पूरे सौ नंबर आते हैं तो उसका 'A' ग्रेड बनेगा और 'S' ग्रेड आने के लिये उसे 108 नंबर चाहिये.. और संयोग ऐसा कि उसी शाम रिजल्ट आया.. नेट पर हमने चेक किया तो पता चला कि विकास के 'S' ग्रेड हैं.. और जिसके पास होने की कोई उम्मीद नहीं थी वह भी पास कर गया है.. कुल मिलाकर हमने यही निष्कर्स निकाला की सभी को ग्रेस नंबर मिले हैं इसी कारण सिर्फ विकास ही नहीं और भी कुछ विद्यार्थियों के सौ से ज्यादा नंबर आये थे.. ऐसा ही कुछ सेकेण्ड सेमेस्टर में माईक्रोप्रोसेसर के पेपर में भी हुआ था..


क्लास के बाहर का गैलरी

तो ऐसे हमे सौ में सौ से ज्यादा नंबर भी मिलते थे.. मगर मुझे कभी नहीं मिला.. ;) जब विकास का नंबर देखा था तब मुझे बचपन में कही पापा की बाता याद हो आयी.. वो परिक्षा के समय आशीर्वाद देते थे कि ऐसा लिखना कि मास्टर बोले बेटा कमाल लिखा है सो इसे सौ में एक सौ आठ दे दूं.. :D

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मेरे पिछले पोस्ट पर मेरे कालेज के छोटे भाई क्षितिज ने कमेंट किया था और पूछा था की भैया आपको भी कहां से इस साफ्टवेयर इंजिनियरिंग कि याद आ गयी? उसका जवाब है, "क्या बताऊं भाई, कालेज में पीछा तो छूटा मगर उस दिन मुझे एक ट्रेनिंग लेने के लिये रिस्क एनालिसिस पढ़कर डाक्यूमेंट बनाना पर रहा था.. सो बरबस ही उसकी याद हो आयी.. अब समझ में आ गया है कि इससे जीवन भर पीछा नहीं छूटने वाला है..":)

आप कभी क्षितिज के ब्लौग पर जाईये और उसकी नज्में पढ़िये.. बहुत शानदार लिखता है.. मगर उसे ज्यादा पाठक कभी नहीं मिलते हैं.. सच कहूं तो इतना बढिया नज्म मैं लगातार कभी नहीं लिख सकता हूं..

Saturday, November 15, 2008

साला बहुत बोलता है.. चिल्ल मार यार

"मालेगांव बम विस्फोट में हिंदू आतंकवादियों का हाथ बताया जा रहा है.."

"तो क्या हुआ? भारत क्रिकेट मैच तो जीत गया ना, खुश रहो.."

"फलाना कह रहा था कि ये हिंदू आतंकवादियों का काम है.."

"तो क्या हुआ? भारत क्रिकेट मैच तो जीत गया ना, खुश रहो.."

"चिलाना बोल रहा था कि हिंदू-मुसलमान आतंकवादी कुछ नहीं होता है.. आतंकवाद को धर्म से जोड़कर नहीं देखना चाहिये..

"तो क्या हुआ? भारत क्रिकेट मैच तो जीत गया ना, खुश रहो.."

"साध्वी का चार-चार बार नार्को टेस्ट हुआ, मगर कुछ नहीं निकला..

"तो क्या हुआ? भारत क्रिकेट मैच तो जीत गया ना, खुश रहो.."

"सी.बी.आई. अभी तक आरूषी के कातिलों को नहीं पकड़ पाई है.. मिडिया भी अपना टी.आर.पी.बटोर चुकी और उसे भी अब उसमें कोई इंटेरेस्ट नहीं है"

"तो क्या हुआ? भारत क्रिकेट मैच तो जीत गया ना, खुश रहो.."

"अरे सुना क्या? कल रात दिन दहाड़े भीड़ भरे सड़क पर मर्डर हो गया?"

"तो क्या हुआ? भारत क्रिकेट मैच तो जीत गया ना, खुश रहो.."

"चेन्नई में भी अब छात्र राजनीति गरमाने लगी है, जो पहले नहीं था.. अब सुना है वहां भी जे.एन.यू. और दिल्ली यूनिवर्सिटी कि तर्ज पर ए.बी.वी.पी. और आईसा के नाम दिवारों पर दिख जाते हैं.."

"तो क्या हुआ? भारत क्रिकेट मैच तो जीत गया ना, खुश रहो.."

"कल तो सुना वहां मारपीट भी हुई.. वहां भी बैकवर्ड-फारवर्ड का चक्कर है, कोई कह रहा था कि अम्बेदकर का नाम क्यों नहीं लिखा.. एक लड़का मरनाशन स्तिथी में है.."

"तो क्या हुआ? भारत क्रिकेट मैच तो जीत गया ना, खुश रहो.."

"ओबामा कह रहे थे कि आऊटसोर्सिंग बंद करा देंगे.. इससे अमेरिका में रोजगार बढेगा.. मगर भारत में तो रोजगार छिनेगा.."

"तो क्या हुआ? भारत क्रिकेट मैच तो जीत गया ना, खुश रहो.."

"फिर से चुनावी दंगल छिड़ रहा है.. टिकट के समय से ही राजनीति चालू है.. सुना है नामांकन के समय ही कईयों के सर फूटे हैं.."

"तो क्या हुआ? भारत क्रिकेट मैच तो जीत गया ना, खुश रहो.."

"राज ठाकरे बहुत नफरत फैला चुका है.."

"साला बहुत बोलता है.. चिल्ल मार यार.. भारत क्रिकेट मैच तो जीत गया ना, बस खुश रहो.."

Saturday, November 08, 2008

"कैसी रही दीपावली?"

दीपावली बीत जाने के बाद इस यक्ष प्रश्न ने कई बार रास्ता घेरा तो कईयों से मैंने भी यही पूछा.. दीपावली बीते कई दिन हो गये और अब तो छठ भी बीत गया है, मुझे पता है कि कैसे अगले साल कि दीपावली आ जायेगी ये भी पता नहीं चलेगा.. जो याद रह जायेगा वो बस यह कि पिछली दीपावली कैसी थी.. फिर से मैं किसी से पूछूंगा कि "कैसी रही दीपावली?" और कुछ लोग मुझसे भी यही प्रश्न करेंगे..

चलिये मैं आपको बताता हूं कि कैसी रही मेरी दीपावली..

जब आप घर से 2500 किलोमीटर दूर अकेले, अपने दोस्तों के साथ होते हैं और कोई खास पर्व आपके सामने होकर गुजर जाता है तो यह पल बहुत चुभते हैं.. बस वैसी ही रही मेरी भी दीपावली.. बचपन को याद करके नौस्टैल्जिक भी खूब हुआ.. मुझे याद आ रहा था कि कैसे मैं घर के सबसे छोटे सदस्य कि भूमिका बखूबी निभाता था.. मिठाई और पटाखों कि लंबी सूची बनाता था.. कई बार घर के लोग मना भी करते थे कि इतने पटाखे मत लो.. ये बस पैसे कि बरबादी है.. मगर अधिकतर मेरी मांगे पूरी हो ही जाती थी.. जो मांगें पूरी नहीं होती थी उनके बारे में मैं सोचता था कि बड़ा होकर खूब मस्ती करूंगा.. जैसे बड़े होने पर लोगों के पास पैसे अपने आप आ जाते हैं.. अब दुनिया की नजर में बड़ा भी हो चुका हूं, पैसे भी कमाने लग गया हूं.. मगर ना जाने कहां से एक संकोच कि दिवार भी खड़ी हो गई है.. पैसे आने पर उसे बचाने का भी सोचने लगा हूं.. यह बात और है कि कुछ बचता नहीं है.. :)

सबसे ज्यादा तब अखरा जब मन में पटाखे खरीदने कि इच्छा भी नहीं हुई.. डर सा गया.. कहीं यह बड़ा होने कि निशानी तो नहीं है? कहीं मैं बड़ा तो नहीं हो गया हूं? बचपन तो बचपन, 20 साल का होने के बाद भी चुटपुटिया चलाने वाली पिस्तौल हर दीपावली पर खरीदना नहीं भूलता था.. अपने अपार्टमेंट के कुछ बच्चों को उसे चलाता देख अच्छा लगा.. लगा जैसे कि बचपन अब भी वैसा ही है जैसा आज से 20 साल पहले हुआ करता था..

पिछले साल कि दीपावली भी याद आई, जब मैं 3 साल के बाद दीपावली में घर पर था.. मगर मेरे लिये वो दीपावली इसलिये खास थी क्योंकि भैया कि शादी के समय मैंने नयी-नयी नौकरी करनी शुरू कि थी जिस कारण छुट्टी नहीं मिल रही थी और मैं बिलकुल मेहमान कि तरह 2 दिनों के लिये घर गया था.. भाभी से ठीक से बाते भी नहीं कर पाया था.. अब उसके बाद पहली बार घर जा रहा था और वो भी दीपावली मे.. अब मुझसे ज्यादा खुश और कौन हो सकता था?

यूं तो मैं पूजा-पाठ से कोशों दूर रहता हूं मगर पिछले साल दीपावली में पूजा के समय आरती बहुत मन से गाया था.. आरती गाने के पीछे कारण श्रद्धा नहीं बल्की गीत था जो मैं गा रहा था.. उस आरती वाले विडियो का प्रयोग इस दीपावली में बखूबी हुआ.. घर में बस शिवेन्द्र ही था जिसके हिस्से पूजा-पाठ करने कि जिम्मेदारी थी, मगर उसे लक्षमी-आरती याद नहीं थी और उस खाली स्थान को मेरे गाये पिछले साल के आरती वाले विडियो से भरा गया..

अक्सर घर में साफ सफाई चलती ही रहती है खासकर तब से जब हमारे घर में खटमलों ने हमला बोला था मगर अब हम उस हमले को पूरी तरह से नेस्तनाबूत कर चुके हैं.. :) मगर उस दिन पूरे घर कि सफाई सुबह उठ कर मैंने और मेरे मित्रों ने कि.. अपना घर सजाने के लिये ना जाने कितने ही मकड़ियों का घर उजाड़ दिया.. दोपहर में अफ़रोज़ भी आ गया.. घर में गैस पिछले 2-3 दिनों से नहीं था और किसी के पास ऑफिस से उतना समय नहीं मिल रहा था कि गैस भराया जाये, सो यह काम भी उसी दिन करना था.. उत्तर भारत में दीपावली के दिन लोग अपनी दुकानें खुला रखते हैं और उनके बीच यह मान्यता है कि दुकान जितना चलेगा, लक्ष्मी उतना ही घर में आयेगी.. मगर उसके ठीक उलट यहां लोग अपनी दुकाने बंद किये हुये थे.. घर के पास वाले जिस होटल में हम खाते हैं, वो भी बंद था सो दुसरे होटल में जाना परा.. गैस वाले ने गैस तो रख ली मगर बोला कि आज ही दे पाना संभव नहीं होगा.. सो उस दिन बिना गैस के ही काम चलाना पड़ा..

सांझ ढलते-ढलते प्रियंका भी घर आ गयी.. फिर शिवेन्द्र और प्रियंका जाकर कुछ दिये और मोमबत्ती का इंतजाम भी कर आये.. थोड़ी देर बाद प्रियंका अपने घर पूजा करने चली गयी.. रात में जितनी थोड़ी सी गैस बची हुयी थी उससे मैगी बनाई फिर सो गये.. जहां फोन पर बधाईयां देनी थी वह भी दे डाला मगर बाहर से फोन कम ही आये, क्योंकि उत्तर भारत में दीपावली अगले दिन था..

अब सोचता हूं तो लगता है कि कैसे किसी पर्व-त्योहार पर पापा-मम्मी हमारी लगभग हर मांग पूरी करते थे? उनके पास कोई कुबेर का खजाना तो था नहीं.. वही बंधा-बंधाया वेतन मिलता था.. पांचवे वेतन आयोग के आने से पहले तो बहुत ही कम हुआ करता था.. अब पाता हूं कि हमारी हर मांग को पूरा करने के लिये वो कहीं ना कहीं अपने भविष्य कि योजनाओं में कटौती करते रहे होंगे.. क्योंकि अब समझ गया हूं, बड़े होने पर पैसा अपने आप नहीं चला आता है.. उसके लिये मेहनत करनी होती है..

अभी मैं सोच रहा था कि डा.अनुराग जी जैसे ही कोई त्रिवेणी हम भी अंत में लगाते हैं.. कुछ अजीब सा बन पड़ा जो मैं नहीं लिखने वाला हूं.. उम्मीद है डा.साहब ही अब इसका इलाज करेंगे.. :D

Wednesday, November 05, 2008

हम भाग जायेंगे यहां से

"हम भाग जायेंगे यहां से.." खिजते हुये प्रियंका ने कहा..

"हां! तुम तो बैंगलोर भाग ही रही हो.."

"नहीं! मन नहीं लग रहा है.. हम अभी भाग जायेंगे.."

"अच्छा रहेगा कि चलो कहीं घूम कर आते हैं.. क्या बोलती हो? समुद्र तट कैसा रहेगा?"

"हां.. चलो.."

विकास से पुछा, मगर उसे काम था और उसकी एक मित्र भी आई हुई थी सो साथ नहीं चलने कि स्थिति में था.. फिर थोड़ी देर में हमारा प्लान बदल गया..

"चलो पहले सत्यम चलते हैं.. वहां मूवी का टिकट देखते हैं.. उसके बाद समुद्र तट जायेंगे.." प्रियंका ने कहा..

"ठीक है.. चलो.."

प्रियंका गाड़ी चला रही थी और मैं पीछे बैठा हुआ था.. उस समय मैं गाड़ी चलाने के मूड में नहीं था, सो चलाने का ऑफर भी नहीं किया.. बस आराम से पीछे बैठा रहा.. उस समय लगा कि घर में जब होता हूं तो भैया हमेशा पीछे क्यों बैठते हैं.. बाईक चलाने का अपना अलग ही लुत्फ़ होता है मगर पीछे बैठने का मजा भी अलग ही होता है..

शनिवार रात का गोलमाल रिटर्न्स का टिकट मिल रहा था.. मगर वो किसी को नहीं देखना था.. फिर पता चला कि रविवार कि रात फैशन का टिकट मिल रहा है.. विकास को फोन किया, वो चलने को तैयार था.. अफ़रोज़ को फोन किया, उसने फोन नहीं उठाया.. शिवेंद्र को फोन ही नहीं किया, पता था कि वो कहेगा कि नहीं जाना है.. सो उससे बिना पूछे ही उसका भी टिकट ले लिये.. :)

"अब कहां चलें? सी बीच?" प्रियंका ने पुछ..

"चलो स्पेंसर प्लाजा चलते हैं, यहीं पास में है.. मुझे एक स्पोर्ट्स शू लेने का बहुत दिन से मन कर रहा है.. वहां एडिडास के शोरूम में डिस्काऊंट तो चल रहा होगा ना?"

"पता नहीं.. चल कर देख लेते हैं.."

फिर से प्रियंका गाड़ी चलाने लगी और मैं पीछे आराम से बैठ गया.. तभी सामने एक फ्लाईओवर दिखा.. मैंने पूछा, "ये रास्ता किधर जाता है?"

"पता नहीं.. चलो चल कर देख लेते हैं.."

फ्लाईओवर से उतरने पर पता चला कि हम रायपेट्टाह पहूंच गये हैं.. रास्ता मुझे कुछ जाना पहचाना लग रहा था मगर बिलकुल सही पता नहीं चल रहा था कि हम कहां हैं.. फिर भी आगे बढते चले गये.. मुझे बस दिशा ज्ञान था कि समुद्र तट जिस दिशा में है हम उसी दिशा में बढ रहे थे.. थोड़ी देर बाद पता चल ही गया कि हम उसी रास्ते पर हैं जिस इलाके में पहले मैं रहता था.. दिल खुश हो गया.. बहुत दिनों बाद इधर आना हुआ था.. उत्साह के साथ प्रियंका को बताना शुरू कर दिया कि देखो ये क्या है तो वो क्या है.. पता नहीं मन ही मन में कितनी गालियां दी होगी मुझे, मगर सामने कुछ बोली नहीं.. :)

उसने पूछा, "ईगा थियेटर कहां है?"

"चलो वो भी आज दिखा ही देता हूं.." फिर मैं उसे रास्ता बताने लगा.. माऊंट रोड से होते हुये चेन्नई सेंट्रल रेलवे स्टेशन.. फिर वहां से पूनामल्ली हाई रोड पकड़ कर चेटपेट से होते हुये मैंने उसे ईगा थियेटर दिखाया.. ईगा थियेटर कि खूबी यह है कि चेन्नई में बस यही इकलौता सिनेमा हॉल है जहां सिर्फ हिंदी सिनेमा लगती है.. रास्ते में हमने अमरूद भी खरीदा जिसे मैं आराम से पीछे बैठ कर खाया..(पीछे बैठने का फायदा अब समझ में आया? :))

बीच ट्रैफिक में प्रियंका को दौड़ा पड़ने लगा.. :) कहती है, "मुझे चिल्लाने का मन कर रहा है.."

"हां, चिल्लाओ.. लोग तुम्हें तो कुछ नहीं कहेंगे.. मुझे ही मारेंगे.. अब लड़की के पीछे बैठा हुआ हूं और लड़की चिल्लाने लगे तो और क्या होगा?"

"नहीं मुझे चिल्लाना है.."

"ठीक है चिल्लाओ.."

और लगी वो चिल्लाने.. खैर अच्छी बात तो यह थी कि ट्रैफिक की आवाज में उसकी आवाज दब गई थी और किसी ने नहीं सुनी.. घड़ी में देखा तो 8 बजने जा रहे थे.. हम लगभग 30-35 किलोमीटर घूम चुके थे.. अभी तक अन्ना नगर का सिग्नल भी नहीं आया था जहां से हमें सी.एम.बी.टी. से होते हुये वडापलनी, अपने घर जाना था..

"आज रात 10.30 में सी-बीच चलोगे?" उसने पहले पूछा.. फिर झिझकते हुये कहा, "इतनी रात जाना ठीक रहेगा?"

"नहीं.. रात के समय सी-बीच पर कैसा माहौल रहता है वो मुझे नहीं पता.. मैरिना बीच का मुझे पता है कि वो रात में जाने लायक नहीं है.. बेसंत नगर बीच का मुझे पता नहीं.." थोड़ी देर के लिये शांति सी छा गयी.. वो चुप थी और ट्रैफिक का शोर बढ गया था.. मुझे लगा कि उसे सी-बीच जाने का बहुत मन है.. सो मैंने आगे कहा, "चलो कल सुबह सूर्योदय देखने चलते हैं.. क्या कहती हो?"

बस फिर क्या था.. प्रियंका खुश.. :) "हां हां.. ये ठीक रहेगा.. कल सुबह मुझे 3.30 मे उठा देना और अभी किसी को मत बताना.. सरप्राईज देंगे सभी को.."

मैंने कहा, "सभी को पहले ही बता दो, नहीं तो पता चलेगा कि सुबह-सुबह हमे सरप्राईज मिल रहा है और कोई नहीं गया.." और बस, हमारा प्लान पक्का हो गया.. फिर यूं ही बातें होती रही और प्रियंका बेहद भयंकर वाले ट्रैफिक में से बहुत कुशलता के साथ गाड़ी निकालते हुये घर पहुंचा दी..

अगले भाग में समुद्र तट का सूर्योदय..

Wednesday, October 22, 2008

भैया के जन्मदिन पर ओ गदही बोलने वाली चिड़िया के नाम एक पोस्ट और

कल रात घर पर फोन से बातें हुई.. बातें शुरू होते ही बातों का रूख अचानक से मेरे चिट्ठे की ओर घूम गया.. एक एक करके सभी "एक चिड़िया जो ओ गदही पुकारती थी" वाले पोस्ट पर अपने विचार व्यक्त करने लगे.. यूं तो मुझे पता है कि मेरे हर पोस्ट को मेरे घर में सभी पढते हैं मगर मेरे उस पोस्ट पर कल पहली बार भैया कमेंट करने कि कोशिश भी किये जिसमें असफल रह गये(नेट कनेक्शन कि कुछ दिक्कत थी उन्हें) और आज फिर से उन्होंने कोशिश कि और उनका कमेंट कुछ यूं था.. सच कहूँ तो मुझे लगता है कि जब भी मैंने आपका कोई स्तम्भ पढा है तो मुझे उसमें कुछ ना कुछ खामियाँ ही नज़र आयी, इसमें भी है जैसे कि सीतामढी होता है ना कि सितामढी, पर आपने इतने दिल से लिखा है कि आँखें नम हो गयी। अचानक ही लगा कि मैं 20 साल पीछे चला गया हूँ, वही सब कुछ आँखों के सामने आ गया।

उन्होंने सच ही लिखा है.. इससे पहले जो कुछ भी मैं लिखता था उसमें बस मेरी यादें जुड़ी रहती थी मगर उस पोस्ट में बस मेरी ही नहीं पापा-मम्मी, भैया-दीदी, सभी कि यादें जुड़ी हुई थी.. तभी पापाजी से मैंने पूछा कि आप कितने दिनों के लिये चक्रधरपुर गये थे? उन्होंने कहा शायद 2-3 महीनों के लिये.. तभी पीछे से मम्मी कि आवाज आयी कि नहीं बस 1 महीने में ही लौट आये थे.. मेरे मन में यह बात आयी कि सच में जब इंतजार का लम्हा बहुत लम्बा हो जाता है तब एक-एक दिन महिनों कि तरह गुजरता सा मालूम होता है..

उस पोस्ट पर कुछ यादगार कमेंट्स भी आये जिनकी चर्चा अगर मैं यहां नहीं करूं तो यह मेरे पाठकों के साथ अन्याय ही होगा.. डा.अमर कुमार जी ने तो पूरी एक कविता और एक पोस्ट ही उस पर ठेल दी.. मैंने पापाजी को कहा था कि वो कविता मैं उन्हें मेल करूंगा मगर आज फिर से उसे यहीं डा.साहब से पूछे बिना ही अपने पोस्ट पर डाल रहा हूं.. मैं उम्मीद करता हूं कि वो से अन्यथा नहीं लेंगे..

आहः पुछरू, निमिष मात्र में
तुमने मुझे कहाँ से कहाँ पहुँचा दिया,
सीतामढ़ी के आगे का स्टेशन रीगा,
उसके बगल ही में सुगर फ़ैक्टरी,
आहः पुछरू,जीते रहो !

ठीक उसके पीछे एक गाँव उफ़रौलिया,
जिसकी पगडंडियों पर ऊँगली पकड़ कर चलते हुये,
अपने बाबा से मिलती संस्कार शिक्षा...
सबकुछ अब जैसे बिखरा हुआ है, वहाँ !
आहः पुछरू,जीते रहो !

आधा गाँव तो कलकत्ता कमाने पहुँचा
बाकी को पटना मुज़फ़्फ़रपुर राँची ने निगल लिया।
बचे फ़ुटकर जन छिटपुट शहरों में हैं,
एक नाम उफ़रौलिया को जीते हुये ...
आहः पुछरू,जीते रहो !

कसमसाते हुये, लाल टोपी को कोसते हुये
उफ़रौलिया की गलियों में विचर रहेः हैं
उम्र की इस ठहरी दहलीज पर
उस माटी में लोटते हुये
आहः पुछरू,जीते रहो !

पर मैं भी कितना स्वार्थी हूँ कि
यह सब याद करते करते जाने कहाँ खो गया
और तुम्हारी गदहिया पर
कोई प्रतिक्रिया भी नहीं दी ..
आहः पुछरू,जीते रहो !

यह मेरे पोस्ट का सौभाग्य ही है जो किसी और को भी यादों कि गलियों में भटका गया.. आपका बहुत बहुत धन्यवाद डा.साहब..

उस पोस्ट को पढने के बाद ज्ञान जी भी यादों कि गलियों में ही भटकते पाये गये.. उन्हें बचपन में गाया गया यह गीत याद हो आया..
तीसी क तेल
भांटा क फूल
हम तुम अकेल
जूझैं बघेल!


नीतिश राज जी ने कहा - पुराने दिनों की याद ताजा कर दी आपने प्रशांत। बहुत ही अच्छा लिखा है। साथ में एक बात और लगता है आपके पिताजी के ट्रांस्फर के कारण आप भी कई जगह देख चुके हैं। उसके ऊपर भी लिखिएगा कभी यदि मौका लगे तो जगहों के बारे में।

मेरा कहना है - नीतिश जी, मैं जरूर लिखूंगा.. आखिर कभी ना कभी यह पोटली भी तो खुलनी ही चाहिये..

दिनेश जी का कमेंट भी दिल को छू गया.. उन्होंने लिखा - यह वही चिड़िया है फिर से जनम पा कर आप के पास चली आयी है। पुराने दिनों की याद दिलाने।

अनिल जी, जितेन्द्र जी, लवली, ताऊ जी, दीपक जी, अनुराग जी, भूतनाथ जी, अनुप शुक्ल जी ने भी इसे सराहा.. सभी को यह यादें कहीं ना कहीं खींच कर अपने साथ लेती चली गई..

पूजा जी ने देर से मगर लिखा - यादों की गलियों से गुजरना अच्छा लगा. चिट्ठी के बारे में मेरा भी यही ख्याल है, हाथ के लिए ख़त में एक खास अपनापन होता है. शब्दों पर उँगलियाँ फेर मन लिखनेवाले के पास पहुँच जाता है. बिल कुल दिल से आपने लिखा है. मुझे भी अपना बचपन और गाँव याद आ गया. आज के इस भाग-दौड़ की दुनिया में अगर किसी को किसी कि याद दिला कर दो पल के लिये चैन कि दुनिया में मैं लौटा ले गया.. अब इससे बड़ी खुशी मेरे लिये और क्या हो सकती है?


आज मेरे लिये एक और बड़ी खुशी कि बात है.. आज मेरे भैया सुस्मित प्रियदर्शी का जन्मदिन भी है.. आप भी लगे हाथों उन्हें बधाईयां देते जाईये.. :)

Tuesday, October 07, 2008

२४ घंटे, जो ख़त्म होता सा ना दिखे

मेरे मित्र अमित द्वारा

अमूमन मैं इतना लम्बा नहीं लिखता हूँ.. उतना धीरज ही नहीं है की लिखू.. पता नहीं क्यों आज लिखने का मन कर रहा है और आज लिख रहा हूँ.. इससे पहले भी मेरे साथ बहुत साड़ी अजीबोगरीब घटनाएं हो चुकी हैं.. मगर आमतौर से मैं बांटता नहीं हूँ और बांटता भी हूँ तो बहुत कम लोगो से..

शुरु से शुरु करते हैं.. पहले मैं हरेक दूसरे हफ्ते या हर हफ्ते बैंगलोर जाया करता था.. पर इस बीच में हालत कुछ ऐसे हो गए कि मैं लगभग एक-दो महीनों से बैंगलोर नहीं जा सका.. पिछले हफ्ते किसी तरह मौका निकाल कर मैंने बैंगलोर जाने का मन बनाया और शुक्रवार को निकल पड़ा बैंगलोर के लिए.. अक्सर मैं ऑफिस से ही निकला करता था लेकिन उस दिन मैं ऑफिस से घर आया फिर घर से निकला.. घर से निकलते ही मुझे अपने आस पास के चीज़ों पर से कण्ट्रोल ख़तम होता सा लगाने लगा.. ऐसा मुझे काफी बाद मैं पता चला.. खैर!! घर से निकलते ही लिफ्ट के पास पहुंचा.. बटन दबाया.. पर लिफ्ट काम नहीं कर रहा था.. ऐसा अक्सर होता है.. इसलिए मैं सीढियों से नीचे गया..

फिर बारी आई ऑटो लेने कि.. जिस भी ऑटो वाले से पूछो कोई ८०-९० रूपये से कम बोल नहीं रहा था.. मेरे घर से कोयम्बेदु(चेन्नई इंटर सिटी बस स्टैंड) तक का साधारण किराया ४० रूपया है.. मैंने लगभग १० ऑटो छोडे फिर जाकर एक ऑटो वाले ने ४५ रूपये में मुझे कोयुम्बेदु पहुंचाया.. अब यहाँ सबसे पहले मुझे वापसी का टिकट लेना था.. आमतौर से मैं वापसी का टिकट बैंगलोर से चेन्नई ले लेता हूँ जिससे आते समय कोई दिक्कत ना हो.. और जाने का टिकट वहीँ लेता हूँ.. इसके लिए मुझे ATM से पैसा निकालना था.. अभी तक ज्यादा कुछ नहीं हुआ था.. खैर जब ATM के पास गया तो पता चला ATM ख़राब है.. मेरे पास सिर्फ १०० रूपये थे.. मुझे हर हालत में पैसा निकालने थे.. फिर क्या मैंने वापस ऑटो लिया और वापस १०० फीट रोड आकर पैसे निकाला और फिर उसी ऑटो से वापस बस स्टैंड पहुंचा.. अब मुझे टिकट लेना था वापसी का और मैं सोच रहा था की काश टिकट काउंटर पर भीड़ ना हो.. और यही हुआ भी.. टिकट काउंटर पर बिलकुल भीड़ नहीं थी.. देख कर जान में जान आई(पर मुझे पता नहीं था कि क्या होने वाला है मेरे साथ).. बस मेरे आगे 2 लोग ही थे.. ३ मिनट में मेरा नंबर आ गया..

टिकट काउंटर पर जो बैठा था उसने मेरी सारी जानकारी फीड कर दिया और टिकट निकालने के लिए उसने कन्फर्म बटन दबा कर मुझसे पैसे ले लिए.. बस अब इंतजार था प्रिंटआउट आने का.. ५ मिनट बीता.. १० मिनट बीता.. १५ मिनट हो गए.. पर कुछ नहीं आया.. उसने फिर से कन्फर्म बटन दबाया.. कुछ आना था नहीं सो नहीं आया.. इंतजार करते-करते ३० मिनट हो चले.. वो बटन दबाता पर कुछ नहीं होता.. बीच में मैंने उससे कहा भी कि फिर से बंद करके शुरू करे पर वो नहीं माना.. खैर इसी तरह करते-करते एक घंटे हो गए.. टाइम १० बजकर ३० मिनट.. बैंगलोर जाने वाली बसें निकलती जा रही थी और मैं लाचार होकर बस देखता जा रहा था.. अब टिकट काउंटर वाले किसी जानकार को बुला रहे थे.. मैं उन्हें अपनी बात समझा भी नहीं सकता था.. तमिल मैं बोल नहीं सकता और इंगलिश उन्हें समझ में नहीं आ रही थी.. अबा समय था ११.०० PM.. किसी तरह मैंने उन्हें फिर से ऍप्लिकेशन को बंद करने और शुरू करने के लिए मना लिया.. और अंततः ११.२० तक मेरा टिकट हाथ में आ गया..

लेकिन अब तक लगभग सारी बसें जा चुकी थी.. एक बस खुलने वाली थी.. मैं दौड़ के वहां पहुंचा.. कंडक्टर दिख नहीं रहा था.. तभी एक आदमी ने आवाज़ दिया.. मैं गया उसके पास.. ताबेअत्याप जैसा ही दिख रहा था.. एक कंडक्टर के पास जो होना चाहिए सब थे उसके पास.. खैर! मैंने पुछा आप उस बस के कंडक्टर हो.. उसने कहा हाँ और ये भी की बस एक सीट खाली है, जल्दी करो.. मुझे भी जल्दी थी.. मैंने उसे पैसे दिए और उसने मुझे सीट नंबर ३४ का टिकट दे दिया.. मैं भाग कर बस के अन्दर गया.. लेकिन यह क्या? उस सीट पर कोई और बैठा था.. उसने अपना टिकट दिखाया और उसका भी नंबर ३४ था.. बस लगभग खुल चुकी थी और स्टैंड से निकलने लगी थी.. मैं नीचे उतरा कंडक्टर को खोजने.. वो तो कहीं नहीं मिला इस बस का कंडक्टर मिला.. मैंने उससे कहा की ३४ सीट नंबर पर कोई है जबकि वो मेरी जगह है.. उसने इंतजार करने को कहा...मैं फिर बस के अन्दर चला गया.. बस स्टैंड से निकल चुकी थी और मैं बेवकूफ जैसे बस में खडा था.. कंडक्टर आया.. वो सीट नंबर ३४ के पास गया.. फिर वापस आया.. उसने मुझसे पुछा की ये टिकट मैंने दिया है और मैंने यहाँ झूठ बोला क्योंकि अबतक मैं जान चूका था की मुझे किसी ने मामू बना दिया है.. बस मैंने पूरे आत्मविश्वास से कहा, "हाँ भाई आपसे ही तो लिया है.." बेचारा सोच में पड़ गया.. अंततः उसने मुझे ड्राईवर के ठीक पीछे भैटने का ऑफर किया.. वहां बैठ नहीं सकते थे इसलिए मैंने उससे पैसा वापस के लिए कहा..

क्रमशः...

Wednesday, October 01, 2008

नये न्यूज चैनल VMM का खबरिया, प्रशान्त

नमस्कार!! आप देख रहे हैं VMM न्यूज चैनेल.. आज का समाचार आप प्रशान्त प्रियदर्शी से सुनने जा रहे हैं.. आज के मुख्य समाचार इस प्रकार हैं..

*शिवेन्द्र अपने घर बीबीपुर, छपरा के लिये रवाना, वडापलानी चिड़ियाघर में खुशियों का सा माहौल..
*वडापलानी चिड़ियाघर में इंडियन आईडल का धमाल..
*कोलकाता में त्योहारों का उल्लास मगर नीता को अपने पैसे अभी तक नहीं मिलने से उनका मन उदास..
*मुम्बई में लंगड़ा त्यागी जी प्रशान्त कि नयी कविता के इंतजार में.. संजीव के 3-4 कॉल अमित ने मिस किये..
*बैंगलोर में सन्नाटा..
*USA में आर्थिक संकट..
*प्रशान्त ने क्रिकेट टीम से अपना नाम वापस लिया.. चंदन शतक कि ओर..


अब समाचार विस्तार से सुने..
अभी-अभी हमारे विश्वस्त सूत्रों से पता चला है कि शिवेन्द्र कुमार गुप्ता जी अपने घर बीबीपुर जाने के लिये चेन्नई सेन्ट्रल पहूंच चुके हैं.. यह खबर सुनते ही वडापलानी चिड़ियाघर में स्थित हमारे मित्रों में खुशियों की लहर सी दौर गई.. हमारे संवाददाता ने उनसे फोन लाईन पर संपर्क किया और पुछा आपको कैसा लग रहा है.. उन्होंने बताया की बहुत उल्लास पूर्वक वो घर जा रहे हैं.. संवाददाता ने उन्हें याद दिलाया कि बोतल में चूड़ा का भूंजा पैक करके लाना ना भूलें.. वो इन दिनों बहुत परेशान नजर आ रहे थे, उनकी परेशानी दूनी हो गई जब उन्हें पता चला कि 25 वर्ष तक ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिये और 25 से 50 तक गृहस्थ का.. उन्हें पता चला की इस तरह उन्होंने अपना 1 वर्ष और 1 महिना व्यर्थ कर दिया है.. हम उम्मीद लगा रहे हैं कि बीबीपुर से वापस आ कर साथ में अप्नी बीबी का भी हाल समाचार सुनायेंगे.. यह समाचार हम सबसे पहले आप तक पहूंचा रहे हैं.. हमारे दूसरे फोन लाईन पर मौजूद हैं वडापलानी चिड़ियाघर में रहने वाले एक प्राणी विकास..
"हां विकास जी, क्या आप हमें सुन पा रहे हैं?"
घर्रर्रर्र.. "हां कहिये.."
"आपको कैसा लग रहा है?"
"अच्छा हुआ साला चला गया.. कुछ दिन मन को शांति मिलेगी.. एक साला से उसकी सूरत देख-देख कर पक गया था.. दूसरी बात यह है कि जब घर से आयेगा तो खाने-पीने का सामान भी लेता आयेगा.."
"तो आप देख रहे हैं कि वडापलानी चिड़ियाघर के प्राणियों के चेहरे पर कितनी खुशी छाई हुई है.."
सबसे तेज VMM न्यूज चैनल..

आज-कल वडापलानी चिड़ियाघर में स्थित हमारे सभी जानवर गण रात में अपने पिंजड़े में पहूंचते ही ठ्V पर टूट परते हैं.. आज-कल वहां इंडियन आईडल और जरा-जरा नच के दिखा जैसे रियालिटी शो ने धमाल मचा रखा है.. आज-कल प्रशान्त को उनके मित्र विकास, अमित और शिव इंडियन आईडल में भाग लेने के लिये चने कि झाड़ पर चढा रहे हैं.. देखिये कब तक चने कि झाड़ पर प्रशान्त चढने में सफल होते हैं, जिससे कि उन्हें वहां से धक्का दिया जा सके..

दशहरा के पावन मौके पर कोलकाता में खुशियों का सा महौल है.. रोज खरीददारी करके बाकी जगहों के लोगो को जलाया जा रहा है.. उधर हमें अभी-अभी पता चला है कि नीता को अपने पैसे नीरज से वापस नहीं मिले हैं.. वो काफी गुस्से में हैं और उदास भी.. और इस त्योहार में नीरज को गालियों का उपहार देने का सोच रहीं हैं..

आज ही पता चला कि हमारे अनुज कुमार सिंह उर्फ़ 'लंगड़ा त्यागी' काफी दिनों से दूसरों कि कवितायें पढकर बोर हो जाने के कारण से एक अदद कविता कि मांग प्रशान्त प्रियदर्शी के सामने रखे हैं.. उन्होंने धमकी दी है कि अगर जल्द से जल्द उन तक कविता ना पहूंचाई गयी तो वो देशव्यापी बंद का आयोजन करेंगे.. इधर प्रशान्त घबरा कर अपने ऑफिस में ही किसी कविता कि तलाश में जुट गये हैं.. एक कविता को वो जानते थे, मगर वो तो दूसरे ब्रांच में काम करती है..

उधर कल रात अमित ने संजीव भाई के 3-4 बार फोन करने पर भी फोन नहीं उठाया.. हमारे विश्वत शूत्रों से पता चला है कि अमित ने वो कॉल देखा ही नहीं.. मगर अमित कि हालत पतली बताई जा रही है.. उन्हें डर है कि कहीं मुम्बई से भाई लोगों का फोन जबरदस्ती टैक्स वसूलने के लिये तो नहीं था? उन्होंने अभी तक पुलिस को खबर नहीं की है और इससे अपने स्तर से निकलने कि तैयारी में हैं..

आज ही अर्चना का मेल भी मिला, जिसमें उन्होंने कहा एडवांस में हैप्पी ईद और हैप्पी दशहरा.. हाल में हुये बम धमाकों को मद्देनजर रखते हुये इसे एक प्रकार कि धमकी के रूप में लिया जा रहा है.. माना जा रहा है कि इसमें उच्च स्तर के तकनीक का प्रयोग किया गया है.. मुम्बई के किसी Wi-Fi नेट्वर्क को हैक करके यह ई-मेल भेजे जाने कि भी संभावना व्यक्त की जा रहीं है.. विरोधी पार्टी इस ई-मेल कि जांच उच्च स्तर पर किये जाने की मांग कर रहे हैं..

उधर बैंगलोर में काफी सन्नाटा छाया हुआ है.. कहीं से किसी प्रकार कि खबर मिलने कि सूचना नहीं है.. आशंका व्यक्त की जा रही है कि कहीं यह तूफान से पहले की शांति तो नहीं है?

अब चलते हैं कुछ अंतरराष्ट्रीय खबरों कि ओर..
वाणी मिश्रा के USA पहूंचने कि खबर सुनते ही वहां आर्थिक मंदी का माहौल तैयार हो गया है.. माना जा रहा है कि ऐसे कंजूस के वहां पहूंचने से वहां की उपभोक्तावाद संस्कृति पर भी काफ़ी बुरा असर परा है और लोग पैसे खर्च करना बंद कर दिये हैं.. फेडेरल बैंक ने इस स्थिति से बाहर निकलने के लिये $700 बिलियन बाजार में लाने का प्रबंध कर रही थी मगर राष्ट्रपति बुश ने यह सोचकर इसे खारीज कर दिया कि वाणी को तो अब बस 1.5 महिने ही यहां रहना है.. उसके बाद सब खुद ही ठीक हो जायेगा..

अभी अभी हमारे तेज खबरिया रिपोर्टर से पता चला है कि USA में छाई मंदी का असर कोलकाता में भी हुआ है.. नीरज अफ़रा-तफ़री में अपना सारा पैसा बैंको से निकाल कर अपने घर में जमा कर रहे हैं.. उन्हें चोर-लूटेरों का भी भय हो रहा है, मगर वह निश्चिंत हैं की बैंक जैसे चोर-लूटेरों से तो मोहल्ले वाले चोर-लूटेरों अच्छे हैं.. कुछ तो छोड़ ही जायेंगे.. बैंक वाले तो कुछ भी नहीं छोड़ते हैं..

अब कुछ खेल समाचार..
अभी पूरा विश्व दिल थामे बैठे हैं कि कब चंदन अपना शतक पूरा करते हैं.. वो अभी नर्वस नाईन्टी में पहूंच चुके हैं.. 90किलो पार करने के बाद वो अभी संभल कर बल्लेबाजी कर रहे हैं.. उम्मीद जतायी जा रही है कि एक बार 100 पूरा कर लेने के बाद फिर से उनकी धुवांधार बल्लेबाजी देखने को मिलेगी.. इधर चेन्नई में CSS कंपनी के तरफ से आयोजित क्रिकेट टूर्नामेंट से प्रशान्त ने अपना नाम वापस ले लिया है.. माना जा रहा है कि उन्हें चयनकर्ताओ ने जबरी टीम में शामिल कर लिया था..

इसी के साथ आज का समाचार समाप्त होता है.. नमस्कार..

आपको यह समाचार कैसा लगा? आप अपना जवाब हमें इस पते पर दे सकते हैं..
पिंजड़ा नंबर 420,
वडापलानी चिड़ियाघर, चेन्नई-26
या फिर आप हमें ई-मेल भी कर सकते हैं.. पता है - prashant7aug@gmail.com
या फिर आप अपना विचार हमें SMS के द्वारा भी बता सकते हैं.. नंबर है - 9940648140

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यह पत्र मैंने अपने दोस्तों के लिये लिखा था.. इसमें वडापलानी में मेरा घर है जिसे सभी मित्रगण वडापलानी चिड़ियाघर के नाम से बुलाते हैं.. और बाकी सभी मेरे कालेज के मित्रों के नाम हैं.. VMM का फुल फार्म है - VIT MCA Mitra Mandali NEWS Channel.. ;)

Tuesday, September 16, 2008

अजी नाम में ही तो सब कुछ है


शेक्सपीयर का लिखा हुआ और धीरे-धीरे लोकोक्ति में बदल चुक यह वाक्य कि, नाम में क्या रखा है.. मगर मजे की बात तो यह है कि जब उसने लिखा था तब उसके नीचे अपना नाम भी लिख ही दिया जिससे सभी ये जाने की इसे किसने लिखा है.. मेरा तो मानना है कि नाम में ही सभी कुछ रखा है.. कोई नामी-गिरामी आदमी जब कोई बकवास भी करता है तो सभी कान लगा कर उसकी बात सुनते हैं.. साथ में वाह-वाही भी करते हैं.. और यदी कोई अनाम व्यक्ति अगर कुछ बहुत गूढ बातें भी करता है तो कोई उसकी बात नहीं सुनता है.. साहित्य की नजर से देखने पर भी आप यही पायेंगे की छपता उसी का है जिसका कोई नाम हो, नहीं तो अच्छी रचनायें भी यूं ही फेंकी हुई मिलेगी..

आजकल मेरे भतीजे का कोई अच्छा सा नाम ढूंढा जा रहा है.. बेचारा बहुत दिनों तक बिना नाम के ही रहा.. सभी कोई अच्छा सा नाम उसके लिये सोच रहे हैं.. यूं तो कुछ नाम अभी विचाराधिन हैं मगर कोई नाम अभी तक तय नहीं हुआ है.. घर का पुकारू नाम केशू रख दिया गया है..

जब इसका जन्म हुआ था तब मुझसे पुछा गया की क्या नाम रखना है, साथ में यह भी कहा गया की भागवान के नाम पर होना चाहिये.. मैंने तुरत-फुरत ही कहा, "मुर्गन" या "मुर्गेशन".. :) सभी मुझपर चिल्लाना शुरू कर दिये कि कैसा नाम चुन रहे हो बेटा का? लग रहा है जैसे चिकेन कबाब का नाम रख रहे हो.. मैंने बताया की दक्षिण में यह नाम बहुत प्रसिद्ध है.. भगवान के ही नाम पर है.. मगर फिर एक अवरोध कि नाम कृष्ण या फिर कम से कम भगवान विष्णु के नाम पर होना चाहिये.. मैंने फिर सुझाया, "श्रीनिवासन" या "श्रीनिवास".. अगर आंध्रप्रदेश के मुताबिक नाम रखना हो तो श्रीनिवास और अगर तमिलनाडु के नाम पर रखना हो तो श्रीनिवासन.. अबकी बार मेरी भाभी की प्रतिक्रिया कुछ ऐसी थी.. "बाप रे!! आप तो पूरे मद्रासी बन गये हैं.. मेरे बच्चे का नाम बिगाड़ कर छोड़ियेगा.. आपसे नाम नहीं रखवाना है.."

अब आप ही बताईये, मैं जहां रहूंगा वहीं की संस्कृति को याद रखूंगा ना? वैसे भी मुर्गन नाम कितना अच्छा है.. जब भी अपने बच्चे की याद आयेगी, साथ में चिकेन भी याद आयेगा.. ;)

वैसे अभी "सुशांत प्रियदर्शी" नाम रखे जाने की प्रबल दावेदारी है(भले ही भगवान के नाम पर ना हो".. बच्चे के दादाजी का सुझाया नाम है.. भैया के नाम से भी बहुत मिलता जुलता नाम है क्योंकि भैया का नाम "सुस्मित प्रियदर्शी" है.. भैया के पहले नाम का पहला और अंतिम अक्षर से भी मिलाप हो रहा है.. सच कहें तो मुझे भी ये नाम पसंद है.. आखिर उसके अपने छोटे पापा के नाम से भी तो बहुत मिलता है.. "प्रशांत प्रियदर्शी"..

आप क्या कहते हैं.. कुछ आप भी सुझायें.. मगर फिर से एक बात कहूंगा.. नाम 'S' अक्षर से ही शुरू होना चाहिये..

Thursday, July 10, 2008

आम जिंदगी और मेंटोस जिंदगी. दिमाग की बत्ती जला दे..

ये है आम जिंदगी एक साफ्टवेयर प्रोफेशनल की..



और ये है मेंटोस जिंदगी एक साफ्टवेयर प्रोफेशनल की..



मेंटोस!! दिमाग की बत्ती जला दे.. :)