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Saturday, November 15, 2008

साला बहुत बोलता है.. चिल्ल मार यार

"मालेगांव बम विस्फोट में हिंदू आतंकवादियों का हाथ बताया जा रहा है.."

"तो क्या हुआ? भारत क्रिकेट मैच तो जीत गया ना, खुश रहो.."

"फलाना कह रहा था कि ये हिंदू आतंकवादियों का काम है.."

"तो क्या हुआ? भारत क्रिकेट मैच तो जीत गया ना, खुश रहो.."

"चिलाना बोल रहा था कि हिंदू-मुसलमान आतंकवादी कुछ नहीं होता है.. आतंकवाद को धर्म से जोड़कर नहीं देखना चाहिये..

"तो क्या हुआ? भारत क्रिकेट मैच तो जीत गया ना, खुश रहो.."

"साध्वी का चार-चार बार नार्को टेस्ट हुआ, मगर कुछ नहीं निकला..

"तो क्या हुआ? भारत क्रिकेट मैच तो जीत गया ना, खुश रहो.."

"सी.बी.आई. अभी तक आरूषी के कातिलों को नहीं पकड़ पाई है.. मिडिया भी अपना टी.आर.पी.बटोर चुकी और उसे भी अब उसमें कोई इंटेरेस्ट नहीं है"

"तो क्या हुआ? भारत क्रिकेट मैच तो जीत गया ना, खुश रहो.."

"अरे सुना क्या? कल रात दिन दहाड़े भीड़ भरे सड़क पर मर्डर हो गया?"

"तो क्या हुआ? भारत क्रिकेट मैच तो जीत गया ना, खुश रहो.."

"चेन्नई में भी अब छात्र राजनीति गरमाने लगी है, जो पहले नहीं था.. अब सुना है वहां भी जे.एन.यू. और दिल्ली यूनिवर्सिटी कि तर्ज पर ए.बी.वी.पी. और आईसा के नाम दिवारों पर दिख जाते हैं.."

"तो क्या हुआ? भारत क्रिकेट मैच तो जीत गया ना, खुश रहो.."

"कल तो सुना वहां मारपीट भी हुई.. वहां भी बैकवर्ड-फारवर्ड का चक्कर है, कोई कह रहा था कि अम्बेदकर का नाम क्यों नहीं लिखा.. एक लड़का मरनाशन स्तिथी में है.."

"तो क्या हुआ? भारत क्रिकेट मैच तो जीत गया ना, खुश रहो.."

"ओबामा कह रहे थे कि आऊटसोर्सिंग बंद करा देंगे.. इससे अमेरिका में रोजगार बढेगा.. मगर भारत में तो रोजगार छिनेगा.."

"तो क्या हुआ? भारत क्रिकेट मैच तो जीत गया ना, खुश रहो.."

"फिर से चुनावी दंगल छिड़ रहा है.. टिकट के समय से ही राजनीति चालू है.. सुना है नामांकन के समय ही कईयों के सर फूटे हैं.."

"तो क्या हुआ? भारत क्रिकेट मैच तो जीत गया ना, खुश रहो.."

"राज ठाकरे बहुत नफरत फैला चुका है.."

"साला बहुत बोलता है.. चिल्ल मार यार.. भारत क्रिकेट मैच तो जीत गया ना, बस खुश रहो.."

Sunday, November 09, 2008

त्रिवेणी फिर कभी, आज यह कविता सही


कविता से पहले मैं अनुराग जी को धन्यवाद देना चाहूंगा कि उन्होंने मुझे त्रिवेणी संबंधित कुछ बढिया बाते बताई.. वैसे मैंने एक लिखी भी है मगर वो किसी और में डालूंगा.. पता नहीं वो त्रिवेणी ही है या कुछ और.. :)
परछाई

किसी परछाई का हाथ थामा है आपने?
मैंने थामा था एक बार..
कोरोमंगला कि तेज-भागती सड़कों पर..
हल्की बारिश कि बूंदों के बीच..
ट्रैफिक के हूजूमों में..
कभी ऑटो वाले को रुकने का
इशारा करते हुये..
तो कभी उसकी
खिलखिलाती हंसी के बीच..

अब भी उन सड़कों पर पहूंच कर,
अपने अस्तित्व का अहसास
खत्म सा महसूस होता है..
मानो पूरी दुनिया किसी परछाई में,
सिमट कर रह गई हो..
यह परछाई दिनो-दिन
और गहरी होती जाती है..
जैसे अमावस रात कि कालिमा..
फिर भी अच्छा लगता है,
उस परछाई का हाथ थामना...

Saturday, November 08, 2008

"कैसी रही दीपावली?"

दीपावली बीत जाने के बाद इस यक्ष प्रश्न ने कई बार रास्ता घेरा तो कईयों से मैंने भी यही पूछा.. दीपावली बीते कई दिन हो गये और अब तो छठ भी बीत गया है, मुझे पता है कि कैसे अगले साल कि दीपावली आ जायेगी ये भी पता नहीं चलेगा.. जो याद रह जायेगा वो बस यह कि पिछली दीपावली कैसी थी.. फिर से मैं किसी से पूछूंगा कि "कैसी रही दीपावली?" और कुछ लोग मुझसे भी यही प्रश्न करेंगे..

चलिये मैं आपको बताता हूं कि कैसी रही मेरी दीपावली..

जब आप घर से 2500 किलोमीटर दूर अकेले, अपने दोस्तों के साथ होते हैं और कोई खास पर्व आपके सामने होकर गुजर जाता है तो यह पल बहुत चुभते हैं.. बस वैसी ही रही मेरी भी दीपावली.. बचपन को याद करके नौस्टैल्जिक भी खूब हुआ.. मुझे याद आ रहा था कि कैसे मैं घर के सबसे छोटे सदस्य कि भूमिका बखूबी निभाता था.. मिठाई और पटाखों कि लंबी सूची बनाता था.. कई बार घर के लोग मना भी करते थे कि इतने पटाखे मत लो.. ये बस पैसे कि बरबादी है.. मगर अधिकतर मेरी मांगे पूरी हो ही जाती थी.. जो मांगें पूरी नहीं होती थी उनके बारे में मैं सोचता था कि बड़ा होकर खूब मस्ती करूंगा.. जैसे बड़े होने पर लोगों के पास पैसे अपने आप आ जाते हैं.. अब दुनिया की नजर में बड़ा भी हो चुका हूं, पैसे भी कमाने लग गया हूं.. मगर ना जाने कहां से एक संकोच कि दिवार भी खड़ी हो गई है.. पैसे आने पर उसे बचाने का भी सोचने लगा हूं.. यह बात और है कि कुछ बचता नहीं है.. :)

सबसे ज्यादा तब अखरा जब मन में पटाखे खरीदने कि इच्छा भी नहीं हुई.. डर सा गया.. कहीं यह बड़ा होने कि निशानी तो नहीं है? कहीं मैं बड़ा तो नहीं हो गया हूं? बचपन तो बचपन, 20 साल का होने के बाद भी चुटपुटिया चलाने वाली पिस्तौल हर दीपावली पर खरीदना नहीं भूलता था.. अपने अपार्टमेंट के कुछ बच्चों को उसे चलाता देख अच्छा लगा.. लगा जैसे कि बचपन अब भी वैसा ही है जैसा आज से 20 साल पहले हुआ करता था..

पिछले साल कि दीपावली भी याद आई, जब मैं 3 साल के बाद दीपावली में घर पर था.. मगर मेरे लिये वो दीपावली इसलिये खास थी क्योंकि भैया कि शादी के समय मैंने नयी-नयी नौकरी करनी शुरू कि थी जिस कारण छुट्टी नहीं मिल रही थी और मैं बिलकुल मेहमान कि तरह 2 दिनों के लिये घर गया था.. भाभी से ठीक से बाते भी नहीं कर पाया था.. अब उसके बाद पहली बार घर जा रहा था और वो भी दीपावली मे.. अब मुझसे ज्यादा खुश और कौन हो सकता था?

यूं तो मैं पूजा-पाठ से कोशों दूर रहता हूं मगर पिछले साल दीपावली में पूजा के समय आरती बहुत मन से गाया था.. आरती गाने के पीछे कारण श्रद्धा नहीं बल्की गीत था जो मैं गा रहा था.. उस आरती वाले विडियो का प्रयोग इस दीपावली में बखूबी हुआ.. घर में बस शिवेन्द्र ही था जिसके हिस्से पूजा-पाठ करने कि जिम्मेदारी थी, मगर उसे लक्षमी-आरती याद नहीं थी और उस खाली स्थान को मेरे गाये पिछले साल के आरती वाले विडियो से भरा गया..

अक्सर घर में साफ सफाई चलती ही रहती है खासकर तब से जब हमारे घर में खटमलों ने हमला बोला था मगर अब हम उस हमले को पूरी तरह से नेस्तनाबूत कर चुके हैं.. :) मगर उस दिन पूरे घर कि सफाई सुबह उठ कर मैंने और मेरे मित्रों ने कि.. अपना घर सजाने के लिये ना जाने कितने ही मकड़ियों का घर उजाड़ दिया.. दोपहर में अफ़रोज़ भी आ गया.. घर में गैस पिछले 2-3 दिनों से नहीं था और किसी के पास ऑफिस से उतना समय नहीं मिल रहा था कि गैस भराया जाये, सो यह काम भी उसी दिन करना था.. उत्तर भारत में दीपावली के दिन लोग अपनी दुकानें खुला रखते हैं और उनके बीच यह मान्यता है कि दुकान जितना चलेगा, लक्ष्मी उतना ही घर में आयेगी.. मगर उसके ठीक उलट यहां लोग अपनी दुकाने बंद किये हुये थे.. घर के पास वाले जिस होटल में हम खाते हैं, वो भी बंद था सो दुसरे होटल में जाना परा.. गैस वाले ने गैस तो रख ली मगर बोला कि आज ही दे पाना संभव नहीं होगा.. सो उस दिन बिना गैस के ही काम चलाना पड़ा..

सांझ ढलते-ढलते प्रियंका भी घर आ गयी.. फिर शिवेन्द्र और प्रियंका जाकर कुछ दिये और मोमबत्ती का इंतजाम भी कर आये.. थोड़ी देर बाद प्रियंका अपने घर पूजा करने चली गयी.. रात में जितनी थोड़ी सी गैस बची हुयी थी उससे मैगी बनाई फिर सो गये.. जहां फोन पर बधाईयां देनी थी वह भी दे डाला मगर बाहर से फोन कम ही आये, क्योंकि उत्तर भारत में दीपावली अगले दिन था..

अब सोचता हूं तो लगता है कि कैसे किसी पर्व-त्योहार पर पापा-मम्मी हमारी लगभग हर मांग पूरी करते थे? उनके पास कोई कुबेर का खजाना तो था नहीं.. वही बंधा-बंधाया वेतन मिलता था.. पांचवे वेतन आयोग के आने से पहले तो बहुत ही कम हुआ करता था.. अब पाता हूं कि हमारी हर मांग को पूरा करने के लिये वो कहीं ना कहीं अपने भविष्य कि योजनाओं में कटौती करते रहे होंगे.. क्योंकि अब समझ गया हूं, बड़े होने पर पैसा अपने आप नहीं चला आता है.. उसके लिये मेहनत करनी होती है..

अभी मैं सोच रहा था कि डा.अनुराग जी जैसे ही कोई त्रिवेणी हम भी अंत में लगाते हैं.. कुछ अजीब सा बन पड़ा जो मैं नहीं लिखने वाला हूं.. उम्मीद है डा.साहब ही अब इसका इलाज करेंगे.. :D

Saturday, October 18, 2008

एक खास मित्र का परिचय

ज्ञान जी के चिट्ठे पर कुछ दिन पहले पढा था कि अगर किसी चिट्ठाकार को विश्वनाथ जी जैसे 3-4 पाठक मिल जायें तो उनका चिट्ठाकारी जीवन सफल हो जाये.. कुछ उसी तर्ज पर मैं कहना चाहता हूं कि अगर मनोज जैसा एक मित्र भी गलती से किसी को जीवन में मिल जाये तो उसका जीवन सफल हो जायेगा.. कुछ दिन पहले मैंने अपने मित्र मनोज कि लिखी हुई एक कविता ठेली थी, जिसके बाद ज्ञान जी ने टिपियाया था कि "सुन्दर। मनोज के परिचय में कुछ पंक्तियों की अपेक्षा थी।" मैंने उस पोस्ट में उसके बारे में कुछ भी नहीं लिखा था क्योंकि वह पोस्ट बस उस कविता के लिये समर्पित कर रखा था.. अगर वहां मैं मनोज के बारे में लिखता तो यह उस पोस्ट और मनोज के बारे में लिखी गई यह पोस्ट, दोनो के ही साथ नाइंसाफी होती..

ग्रैजुएशन मे नया नया एडमिशन लिया था.. कक्षा बहुत कम जाता था.. उस समय का उपयोग आवारागर्दी कि लम्बी कहानियां लिखने में करता था या फिर बस कुछ फालतू के कार्यों के लिये.. कक्षा ना जाने के पीछे सबसे बड़ा कारण यह था कि जो कुछ भी सिलेबस में था उसमें मुझे लगता था कि मेरे लिये कुछ भी नया नहीं है.. मित्रों कि संख्या भी बहुत सीमित थी.. अगर कभी गलती से सुबह वाले क्लास से कुछ समय पहले पहूंच गया तो मनोज को पहले से वहां पाता.. कुछ औपचारिकता होती और बस इतना ही.. धीरे-धीरे औपचारिकता मित्रता में बदलने लगी.. एक ही कक्षा में थे सो आपस में पढाई को लेकर होड़ भी लगती, मगर हमेशा मित्रवत प्रतिस्पर्धा ही रही..

हमारी मित्रता कैसे प्रगाढ मित्रता में बदली यह पता नहीं.. क्योंकि ऐसा किसी एक दिन में नहीं होता है.. इसके ऐसा होने के लिये एक-एक पल के हजार लम्हों के संयोग की जरूरत होती है.. सुख-दुख में बराबर की भागीदारी होने की जरूरत होती है.. अब अपने जिंदगी रूपक डायरी के पुराने पन्नों को पलटता हूं तो लगता है कि हमेशा उसने मेरा साथ मुझसे ज्यादा दिया.. इस मामले में मैं कहीं दूर तक नजर भी नहीं आता हूं.. शायद यही एक ऐसा कारण है जिसके कारण मैं इससे इतना ज्यादा जुड़ा हुआ हूं..

मेरा ऐसा मानना है कि अगर आपके जीवन में कोई ऐसा व्यक्ति आता है जो बिना किसी स्वार्थ के और बिना किसी वजह के आप पर सब कुछ लुटाने को तैयार रहता है और आप उस व्यक्ति को सही समय पर नहीं पहचान पाते हैं और उसे खो देते हैं, तो यहां खोने के लिये उस व्यक्ति के लिये कुछ भी नहीं होता है.. अगर कुछ खोते हैं तो आप ही.. और सबसे बड़ी बात तो यह है कि ऐसा व्यक्ति आपके जीवन में एक ही बार आता है.. हो सकता है कि उससे अच्छे लोग आपको मिल जायें जो कि अपने आप में एक मिशाल हो.. बहुत अच्छे मित्र भी आपको मिल जायें.. मगर बिना किसी स्वार्थ के आपके लिये कुछ भी और किसी भी हद तक करने को तैयार रहने वाला मित्र आपको एक ही बार मिलता है..

मेरे लिये अच्छी बात तो यह है कि मैंने अपने जीवन में ऐसे व्यक्ति कि पहचान सही समय पर कर ली.. अपने कुछ मित्रों कि तरह देरी नहीं कि..

यह पोस्ट मैं यहीं खत्म करता हूं.. इसके बारे में मैं समय-समय पर लिखता रहूंगा.. क्योंकि एक पोस्ट पूरा नहीं है इसके लिये.. सही कहूं तो मैं इसके बारे में जितने पोस्ट चाहूं उतने लिख सकता हूं.. हजारों उन लम्हों के बारे में जो हमने साथ बिताये.. खुशी के मौके.. गम का शमां.. गंगा किनारे बिताये गये क्षण.. आवारागर्दी करते हुये पटना की सड़कों कि खाक छानने का समय.. नाला रोड, मछुवा टोला, राजाबाजार, राजेन्द्रनगर, कंकड़बाग, बोरिंग रोड, शास्त्रीनगर और भी ना जाने कहां कहां.. क्लास में कि गई शैतानियां.. दिल्ली में गुजारे गये गये खुशगवार पल.. तो वहीं बिताये गये मायूस पल भी.. सिर्फ शीर्षक ही लिखूं तो 2-3 पोस्ट बन जायेंगे..

चलिये यह फिर कभी..

एक चिड़िया जो ओ गदही पुकारती थी

मुझे उस चिड़िया का नाम पता नहीं है जो ओ गदही पुकारती थी.. हम तीनों भाई-बहन बहुत छोटे थे उस समय.. मैं छठी कक्षा में था, भैया आठवीं में और दीदी नौंवी में.. पापाजी हम तीनों को अलग-अलग नामों से पुकारते थे.. मुझे पुछरू(अब इस नाम से पुकारे गये जमाना बीत गया है), भैया को नकपिच्चू और दीदी को गदही.. इस नाम से पुकारे जाने पर पूरे जन्म भर का प्यार उमर आता था..(शायद अब भी पुकारे जाने पर वही एहसास रहे.).. दो कमरे और एक ड्राईंग रूम के अलावा दो लैट्रिन-बाथरूम, एक बाल्कनी, रसोई घर, डायनिंग हॉल और एक छोटा सा बगीचा हुआ करता था.. हम सभी सितामढी में रहते थे.. कुछ धुंधली सी यादें जानकी मंदिर कि भी है जिसके बारे में मान्यता है कि सीता जी का जन्म वहीं हुआ था..

बगीचे में 5-6 अमरूद के पेड़ थे, कुछ पपीते के और केला के पेड़ों का एक समूह भी जिसे बहुत छोटे में मैंने ही लगाया था और जब सूखने लगा था तब गुस्से से काट भी दिया था.. मगर बाद में चाचाजी ने उस कटे हुये पेड़ को फिर अच्छे से लगाया तो वह लग गया.. शायद 5-6 साल का रहा हो ऊंगा उस समय.. एक खास तरह कि चिड़िया अक्सर उन्हीं पेड़ों में से किसी पर आकर बैठती थी और "टू नी नी" जैसी आवाज निकालती थी.. एक दिन दीदी को पापाजी ने बताया कि वह ओ गदही पुकार रही है.. मतलब तुम्हें बुलाती है.. बचपन का मासूम मन भी इसे मान लिया.. वैसे भी दीदी किसी आम लड़की कि तरह चिड़िया जैसे उड़ना चाहती थी.. हवाओं को अपने मुट्ठी में बंद कर उड़ाना चाहती थी.. जमाने कि फिक्र से बेफिक्र..

ठीक-ठीक याद नहीं है पर शायद 1992-93 में पापाजी का तबादला चक्रधरपुर, जो बिरसा मुंडा कि कर्मभूमी रह चुकी है और अब झारखंड में है, हो गया.. पापाजी 2-3 महीने या शायद 3-4 महीने के लिये हमलोगों को वहीं छोड़कर वहां चले गये.. हो सकता है 1-2 महीने के लिये ही गये हों मगर वही सालभर से कम नहीं था मेरे बालमन के लिये.. सो अभी तक बस इतना ही याद है कि बहुत दिनों तक नहीं आये थे.. फोन का जमाना उस समय तक हमलोगों के लिये नहीं आया था.. सारा काम चिट्ठियों से ही होता था जो महिने में 2-3 ही मिलते थे.. वो चिड़िया भी लगता था उन्हीं के साथ चली गयी थी.. उसने भी आना कम कर दिया था.. जब कभी ओ गदही जैसी आवाज आती हम दौड़ पड़ते बगीचे कि तरफ.. लगता जैसे पापाजी का संदेश लेकर आयी हो..

सितामढी के बाद कभी भी उस चिड़िया कि आवाज नहीं सुनी.. मैं सोचता था कि कहीं वो भी तो विलुप्त नहीं हो गयी होगी? आज सुबह-सुबह लगभग 5.30 में एक फोन के आने से नींद खुल गई.. बाहर बालकनी में आया तो ठंडी हवा चल रही थी.. आसमान में बादल छाये हुये थे.. तभी कहीं से वही आवाज सुनी.. "ओ गदही" या कह सकते हैं "टू नी नी".. लगा कि बस हम इंसानों की भाषा ही बदलती है.. पंछी-जानवरों कि भाषा हर जगह एक जैसी ही होती है.. लगा जैसे कि वही बचपन फिर से लौट आया है.. मन ख्यालों में डूब गया.. लगा जैसे पापाजी अभी कहेंगे कि देखो स्वीटी, तुम्हें ये चिड़िया "ओ गदही" बुला रही है..

भले ही अब हर दिन घर बात हो जाती है.. जब जिससे संपर्क में आना चाहूं आ सकता हूं.. चौबिसों घंटे मोबाईल भी साथ होता है.. ई-पत्रों से सुविधा और भी बढ गयी है.. मगर उस हाथ के लिखे पत्रों कि महत्ता खत्म नहीं हो सकती है.. उसकी छुवन से वो अहसास कभी नहीं जा सकता है.. हस्तलिपी से आप पल भर में किसी को पास पा सकते हैं.. कुछ दिन पहले मैंने पापाजी को एक ई-पत्र लिखा था जिस पर उन्होंने कहा था कि मैं तुम्हें इसके जवाब में सेन्ड नहीं पोस्ट करूंगा.. 10 दिन हो गये हैं.. अभी तक मुझे मिला नहीं है.. या तो पापाजी भूल गये भेजना या फिर कहीं रास्ते में अटका होगा.. पता नहीं.. खैर अगर भूल गये होंगे तो मेरा यह पोस्ट पढकर याद आ जायेगा..

Sunday, October 12, 2008

इंतजार है मुझे(एक कविता मनोज द्वारा)


जाने किसका इंतजार है मुझे..
जब घर में अकेला होता हूं मैं,
सन्नाटों से घिरा होता हूं मैं..
कोई आहट सी होती है तो,
चौंक जाता हूं..
दरवाजे पर निगाहें टिकी होती है,
दस्तक कोई दे रहा हो जैसे..
जाने किसका इंतजार है मुझे..

अखबारों को पलटते समय,
निगाहें बेकरार होती है जैसे..
हर खबर को पढकर,
कुछ ढूंढती हुई निगाहें जैसे..
अखबारों के हर पन्ने से,
खेल रहा होता हूं मै..
जाने किसका इंतजार है मुझे..

कभी चबूतरे पर बैठा हुआ,
सड़कों पर नजरें जमाये,
कुछ सोचते हुये..
दौड़ते-भागते गाड़ियों में जैसे,
कुछ ढूंढ रहा होता हूं मैं..
जाने किसका इंतजार है मुझे..

भीड़ में चलते लोगों में,
किसी को पहचानने कि
कोशिस कर रहा होता हूं मैं..
पता नहीं कोई मिल जाये कभी..
इन ख्यालों में घुम रहता हूं मैं..
जाने किसका इंतजार है मुझे..

मेरे खास मित्र मनोज द्वारा प्रस्तुत यह कविता.. यह उनका प्रथम प्रयास है, आप उनका उत्साहवर्धन अपने टिप्पणियों द्वारा करें..

चित्र के लिये Artbywicks.com को साभार..

Thursday, September 18, 2008

अनुभव के साथ कूपमंडुकता भी आती है

बहुत पहले मेरे बॉस ने मुझे कहा था की, "Experiance brings stupidity." वो उस समय अपनी तुलना मुझसे कर रहे थे.. उन्होंने कहा था कि अनुभव के साथ सोचने की दिशा ही बदल जाती है.. लोग सोचने लगते हैं कि जैसा उनके साथ हुआ था वही सही है, भले ही वो सबसे ज्यादा गलत हो.. ये कुछ ऐसा ही है जैसे कोई अंधविश्वास.. किसी समय कोई व्यक्ति घर से बाहर कहीं जा रहा होगा, उसी समय उसे छींक आ गई होगी, और बाद में उसका सारा काम खराब हो गया होगा.. बस उसी से ये माना जाने लगा होगा की जाते समय छींक आने से काम खराब हो जाता है..

आज सुबह बहुत देर से बिस्तर छोड़ा.. जब आंख खुली तब घर से मेरे सारे मित्र अपने-अपने ऑफिस जा चुके थे.. घड़ी में देखा तो 10.20 हो रहा था.. रात में 4 बजे के बाद ही नींद आई थी.. हड़बड़ी में उठा और जल्दी से तैयार हुआ.. फिर समय देखा तो 10.40 हो रहे थे.. सोचा कि 10 मिनट मेल चेक कर ही सकता हूं.. कंप्यूटर ऑन करके मैंने जी-मेल खोला.. दिनेश राय जी का पत्र आया हुआ था, जिसमें उन्होंने लिखा था की उन्होंने मेरा ई-पता अपने बेटे को दिया है जो अभी एम.सी.ए. के पांचवीं सेमेस्टर में है.. एक पत्र उनके बेटे वैभव राय द्विवेदी का भी था.. जिसमें उसने कुछ सलाह मांगी थी..

मैं सोच में पर गया.. अभी कितना खुला आसमान है उसके सामने.. जिधर चाहे और जिस तकनीक में चाहे, वो खुद को ढाल सकता है.. चाहे डॉट नेट हो या जावा या फिर ओपेन सोर्स.. मगर यही एक-दो साल के अनुभव के बाद वो जिस तकनीक में काम करता होगा उसमें थोड़ा बंध कर रह जायेगा.. जिस स्थिति में मैं अभी हूं.. मगर फिर भी कुछ हद तक किसी नये तकनीक में काम कर सकता हूं.. मगर यही अगर 3-4 साल का अनुभव हो जाने पर क्या होगा.. टाईप्ड होकर रह जायेंगे.. जिस तकनीक में काम करते होंगे बस वही सूझेगा.. किसी और तकनीक के बारे में तो सोच भी नहीं सकेंगे.. और अगर किसी और तकनीक में काम करना पड़ा तो बहुत मुश्किल होगी उसे सीखने में..

खैर वैभव ने मुझसे कुछ प्रश्न पूछे हैं.. मैं चलता हूं उसे उसका उत्तर देने.. आप लोगों से फिर मिलता हूं..
---अलविदा..

Wednesday, June 25, 2008

अब मैं बड़ा हो गया हूँ माँ..


जो आप नहीं कर पाई,
वो दुनिया ने कर दिखाया..
अब मैं बड़ा हो गया हूँ माँ..

कुछ अच्छा लगता है तो
मुस्कुरा देता हूँ..
कुछ बुरा लगता है तो
मुस्कुरा देता हूँ..
अब मैं बड़ा हो गया हूँ माँ..

वो अछूत सी लगने वाली सब्जी,
भी अब खा लेता हूँ..
रात में अब चावल से भी
परहेज नहीं है..
अब मैं बड़ा हो गया हूँ माँ..

कोई अब पूछता नहीं,
की कहाँ जा रहे हो..
कोई अब पूछता नहीं
की किससे मिल के आ रहे हो..
अब मैं बड़ा हो गया हूँ माँ..

कोई अब पूछता नहीं
की खाना खाए या नहीं..
कोई अब पूछता नहीं
की खाए तो क्या खाए..
अब मैं बड़ा हो गया हूँ माँ..

कोई दोस्त अब कहीं
बुलाते नहीं..
उनके साथ ना जाने पर
पहले जैसे कुछ सुनाते नहीं..
हर पल ये अहसास दिलाते हैं..
अब मैं बड़ा हो गया हूँ माँ..

कुछ मिलने पर ना अब वो
पहले सा उत्साह आता है..
ना कुछ खोने पर आँखें
नम होती है..
अब मैं बड़ा हो गया हूँ माँ..

जिसकी चाहत बचपन से थी,
बड़ा होने की..
अब वो नहीं चाहता हूँ..
पर क्या करूं माँ..
अब मैं बड़ा हो गया हूँ माँ..

ये कविता मैंने बहुत पहले लिखी थी.. मदर्स डे पर.. मुझे याद है, मम्मी बहुत भावुक हो गई थी इसे पढ़कर..

Friday, June 06, 2008

खिंचाव! कुछ रिश्तों का और कुछ...!

मुझे इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स और बाईक्स का बहुत शौक है.. इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स में भी अगर वो संगीत से जुड़ा हो तो फिर क्या कहना.. मेरे हाथ जो भी नया मोबाईल फोन या आई पॉड या फिर एक हेडफोन ही लग जाये, बस सबसे पहले यही देखता हूं कि इसे किस अधिकतम सीमा तक प्रयोग में लाया जा सकता है.. मेरे पास एक सोनी का ईयर फोन है, जिसे मैंने 2003 में खरीदा था लगभग 1700 रूपये में.. उस पर तो ना जाने क्या-क्या प्रयोग करके देख चुका हूं.. कंप्यूटर में तरह-तरह के साफ्टवेयर से अधिकतम आवाज में लगा कर.. बस ये जानने के लिये कि किस सीमा पर खराब आवाज देना शुरू करे.. मगर वो अभी तक किसी भी प्रयोग में अनुत्तीर्ण नहीं हुआ है.. हां उसके अलावा मेरे पास ना जाने कितने ही हेड फोन हैं जो मेरे इस जुल्म का शिकार होकर दम तोड़ चुके हैं..

कुछ साल पहले भैया ने एक बाईक खरीदी थी.. एवेंजर.. जहां तक मुझे पता है ये बाईक अभी तक बिहार में लांच नहीं हुआ है.. भैया ने ये लखनऊ में खरीदी थी.. जब उन्हें पुना किसी ट्रेनिंग के लिये जाना था और उसी समय मैं कुछ दिनों के लिये पटना जाने वाला था तब उन्होंने अपनी बाईक पटना में लाकर रख दिया.. मेरे चलाने के लिये.. पटना में उस समय ये गाड़ी एक अलग ही चीज की तरह देखी जाती थी.. सबसे अलग जो थी.. शान से उस पर मैं घूमता था.. फिर ये बाईक भी मेरे जुल्म का शिकार हुआ.. कितने कम सेकेण्ड में ये 60 कि गति पकड़ेगा, 10 सेकेण्ड में कितने की अधिकतम गति पर पहूंच सकता है और भी ना जाने क्या-क्या प्रयोग मैंने उस पर किया.. अधिकतम गति के मामले में उसने मुझे 125 के लगभग कि गति दी.. इसने भी मुझे निराश नहीं किया.. हां मैं बस उसी चीज पर ये प्रयोग करता हूं, जिसे अपना समझता हूं.. एक-दो बार कुछ अपनों की वस्तुओं को भी अपना समझने की भूल करके एक सबक सीख चुका हूं.... कहते हैं ना, जिंदगी हर दिन कुछ सिखाती है.. मैं भी निरंतर सीखता गया.. कुछ सही, कुछ गलत..

कभी-कभी लगता है मैं रिश्तों के मामले में भी यही गलती कर जाता हूं.. जिसे अपना समझता हूं, उस पर पूरा अधिकार दिखा जाता हूं.. इतना, जितना कि नहीं दिखाना चाहिये.. चाहे ये रिश्ता कोई सा भी क्यों ना हो(दोस्ती का भी).. भूल जाता हूं कि ये कोई भौतिक चीज नहीं है जो अगर अच्छे गुणवत्ता कि हो तो अपने अधिकतम खिंचाव पर भी आपका साथ नहीं छोड़ती है.. और अगर साथ छोड़ भी दे तो आपके पास विकल्प होता है कि आप उसे त्याग कर वैसा ही एक नया ले आयें.. जो कि आप रिश्तों के साथ नहीं कर सकते हैं..

जिंदगी ने जो ताजातरीन सबक सिखाया है वो कुछ यूं है.. जो आपके पास है वो भी आपका है या नहीं ये पूरी तरह आपके विवेक पर और आपकी किस्मत पर निर्भर करता है.. मैंने किस्मत कि बात इसलिये कि क्योंकि आप कभी मानव स्वभाव को नहीं समझ सकते कि कौन कब और कैसा रूप आपको दिखा जाये..

कोई हाथ भी ना मिलाएगा, जो गले मिलोगे तपाक से..
ये नए मिजाज का शहर है, जरा फासलों से मिला करो..

-----------बसीर बद्र

Sunday, April 27, 2008

अकेलापन और यायावरी मनुष्य का सच्चा साथी

आज फिर मैं अपनी यायावरी पर निकल गया.. मेरा सोचना है की यायावरी का असली मजा अकेले ही यायावरी करने में आता है.. अगर आपको भरोसा ना हो तो कभी आप भी करके देखिये, मेरा दावा है की आप भी मुझसे सहमत होंगे.. हर बात पर आप बारीक नजर डालेंगे जितना आप उस समय कभी नहीं डाल सकते हैं जब कोई आपके साथ हो.. हर चीज को एक अलग ही नजरिये से देखेंगे..

मेरा सोचना है की अगर आप अकेले जीवन के मजे लेना सिख लिए हैं तो आपको इस दुनिया से कोई शिकायत नहीं रह जायेगी.. अकेलापन ही आपका सच्चा साथी है जो कभी आपका साथ नहीं छोड़ता है..

आज जो मैंने देखा उसे आप मेरी नजर से देखिये..

1. ढेर सारे लोग नए-नए फैसनेबल कपडे पहने हुए और दूसरों को ऐसे देखना जैसे उसकी साडी मेरी साडी से सफेद क्यों? (आज मैं चेन्नई के सबसे बड़े शौपिंग मॉल स्पेंसर प्लाजा गया था)

2. एक देहाती जोड़े को एस्केलेटर पर चढ़ते हुए देखना.. शायद महिला के लिए ये पहला अनुभव था एस्केलेटर पर चढ़ना.. पति उसका हाथ पकर कर चढ़ने लगे तो वो महिला घबरा कर वापस आ गयी और पति देव ऊपर चढ़ गए.. वो महिला सीढ़ी से ऊपर चढ़ना चाह रही थी मगर पति जी वापस आकर फिर से उसका हाथ पकर कर ऊपर ले जाना चाहे और वो महिला घबरा कर अपने पति से लिपट गयी मगर तभी उसे ध्यान आया की वो एक भीड़ भरे जगह पर है और ये जान कर उसका शर्म से दोहरा होते जाना..
उसके बगल से एक व्यक्ति जो टी-शर्ट और थ्री-फोर्थ पहने हुए था उन्हें देखकर ऐसे तन कर उतर रहा था जैसे वो बिना डरे एस्केलेटर पर चढ़ कर कोई बहुत ही महान काम कर रहा है.. :)

3. एक डार्ट से निशाने लगाने का कम्पीटिशन होना जिसे एक बच्चे ने पूरा कर दिखाया और बांकी सारे बरे लोग उसका मुंह देखते रह गए.. क्योंकि कोई भी बड़ा आदमी उसे पूरा नहीं कर पाया..

4. एक बहुत बड़े किताब की दूकान में जाने पर वहां एक भी हिंदी की किताब का ना दिखना.. अधिकतर अंग्रेजी की किताब का होना और कुछ तमिल की किताबें.. बस.. ऊपर से सभी किताब कम से कम २५० रूपये का होना..

5. उसी दूकान में हिंदी सिनेमा की ज्यादा सीडी होना.. जो ये साफ दिखाता है की हिंदी सिनेमा का चलन तमिलनाडू में भी बहुत है.. और दूसरी बात ये की लोग हिंदी नहीं पढना चाहते हैं पर हिंदी सिनेमा देखना चाहते हैं..

नोट : मेरी अगली पोस्ट में यूनुस जी ने मुझसे ज्यादा मेहनत की है जो अभी मेरे ड्राफ्ट में परा है.. उसके बाद मैं कब लिखूंगा मुझे पता नहीं.. जब अपनी बात नहीं कह पाने की कुंठा से ग्रस्त हो जाऊँगा तब लिखूंगा.. या फिर उस कुंठा की वजह से अवसाद ग्रस्त हो जाऊं और फिर से ना लिखूं.. देखिये.. मैं चिट्ठाकारों की दुनिया को अलविदा भी नहीं कह रहा हूँ.. बस अवकाश पर जा रहा हूँ.. पर मैं यहाँ सारे चिट्ठों को पढता भी रहूँगा और उन पर टिपियाता भी रहूँगा.. ज्ञान जी की भाषा में कहूं तो "मेरे होने का दस्तावेजी प्रमाण बन रहा है यह ब्लॉग" क्योंकि जो मैं किसी से नहीं कह पाता हूँ उसे अपने ब्लौग पर डाल देता हूँ..

Keyword : Yayavari, Human Mind, Chennai spencer plaza

Friday, April 25, 2008

काश हम इश्क ही ना करते किसी से

काश हम इश्क ही ना करते किसी से..


ना किसी दराज में रखते सूखे गुलाब छुपा कर..

ना बटुवे में कोई तस्वीर ही होती..

होती एक ऐसी दुनिया जहां,

जीने की तस्वीर ही अलग होती..


काश हम इश्क ही ना करते किसी से..


कहीं अचानक टकरा जाना सड़क पर

और हफ़्तों तक न दिखना का,

मलाल भी ना होता..

कभी यूं ही निगाहें मिल जाने पर,

उनका चेहरा लाल भी ना होता..


काश हम इश्क ही ना करते किसी से..


अपने हिस्से का चुंबन लेकर

उनके वापस दौड़ जाने पर

कोई गम भी ना होता..

इस जहान में उनका साथ छूटने पर,

आंखें नम भी ना होता..


काश हम इश्क ही ना करते किसी से..




कल मैं हिन्द-युग्म के ब्लौग पर गया और वहां एक कविता पढी.. उसी पर कमेंट लिखते समय ये कविता मेरी झोली से गिर गई जिसे मैं यहां डाल रहा हूं..

Keywords : Poem By Prashant, Love

Friday, April 04, 2008

सोचा भी ना था

सोचा था, तुम्हारे दर्द में मैं
और मेरे दर्द में तुम जागो सारी रात..
मैं तो आज भी जाग रहा हूं,
सोचकर कि तुम्हें कोई तकलीफ़ तो नहीं?
क्या तुम भी जागती हो?

सोचा था कि तुम्हारी खुशियों
में तुमसे ज्यादा मैं खुश होउंगा..
इसी भ्रम में आज भी खुश रहने की कोशिश करता हूं..
बिछड़कर मुझसे क्या तुम भी खुश रहती हो?

सुना था समय हर दर्द को भुला देता है..
मैं अब इसी भ्रम में हूं
कि मेरे घाव भी भर गये हैं..
क्या तुम्हें भी अब दर्द नहीं होता है?

आज कुछ भी लिखने का मन नहीं है सो आज मैं अपनी पिछली पोस्ट को पूरा नहीं कर रहा हूं.. और आपके सामने ये लेकर आया हूं..

Thursday, March 27, 2008

जो मन में आयेगा कहूंगा तुझे, आखिर मेरी बहन हो!!(पार्ट II)

जैसा नाम है उसका बिलकुल वैसी ही है वो.. स्नेहमयी.. शिल्पी उसके घर का पुकारू नाम है बाहर का नाम स्नेहा है.. मेरे जीवन में उसका दायरा बहुत बड़ा है.. उसका हर रूप समय के साथ मेरे लिये बदल जाता है.. जब किसी मित्र की सबसे ज्यादा जरूरत होती है तो वो मेरे लिये सबसे अच्छी मित्रा के रूप में मेरे सामने होती है.. जब कुछ गलत करता हूं तो और किसी को चाहे बताऊं या ना बताऊं पर उसे जरूर बताता हूं और उस समय इससे मुझे किसी छोटे बच्चे की तरह डांट भी खानी परती है.. और कभी कभी मुझसे छोटी बहन की तरह नखरें करते हुये कुछ भी मांग कर बैठती है.. मैं अपने घर में सबसे छोटा हूं और इसने मेरे जीवन में आकर मेरी ये इच्छा पूरी कर दी की मुझसे छोटा भी कोई भाई-बहन हो..

स्नेहा(शिल्पी) से मेरी पहली बार अपने ग्रैजुयेसन के दिनों में मुलाकात हुई थी.. हम दोनों एक ही कक्षा में थे और अपनी कक्षा के होनहार छात्रों में से गिने जाते थे.. जहां लोग मेरी कंप्यूटर प्रोग्रामिंग का लोहा मानते थे(जो भ्रम धीरे-धीरे टूटता चला गया :)) वहीं कक्षा में नंबर लाने में इसका कोई सानी नहीं था.. अगस्त का समय था, शायद चौथे सेमेस्टर की बात है, रक्षाबंधन के बाद हमारा कालेज खुला और इसने आकर मुझसे कहा की मैंने तुम्हें राखी वाली ई-ग्रिटिंग भेजी है.. और मैंने कहा की वर्चुवल क्यों रियल राखी बांध दो..और बस तब से हमारे बीच एक प्यार भरे रिश्ते की शुरूवात भी हो गई.. एक प्यारी सी राखी इसने ना जाने कैसे और कहां से ढूंढी क्योंकि रक्षाबंधन के बाद राखी का मिलना बंद हो गया था.. और अगले दिन इसने मुझे वो राखी लाकर मुझे बांध दी.. उससे पहले हम बस एक साधारण से मित्र हुआ करते थे.. हमारे बीच प्रगाढ मित्रता कालेज खत्म होने के बाद आया..

BCA खत्म करने के बाद मैं आगे की पढाई करने के लिये VIT, वेल्लोर आ गया और ये पूरी तन्मयता से बैंक PO की तैयारी में जुट गई.. मगर जैसा कहा जाता है की समय से पहले और भाग्य से ज्याद कभी किसी को कुछ नहीं मिलता है, बिलकुल वैसे ही सारी खूबियां होते हुये भी इसे 2.5सालों तक कोई सफलता नहीं मिली.. ये लगभग अवसादग्रस्त होकर अपने सारे पुराने दोस्तों से संबंध लगभग ना के बराबर कर लिये.. एक मैं ही था जो ये फोन करे या ना करे मगर मैं हमेशा फोन पर फोन करता रहता था.. एक दिन इसने मुझे बहुत घबरा कर फोन किया, मुझे लगा की क्या हो गया है.. इसने मुझे बताया की जिस बैंक की परीक्षा इसने दी थी उसका रिसल्ट आ गया है और उसे नेट पर चेक करके बताओ.. मैंने चेक किया और उसे अच्छी खबर सुना दी.. और खुशी से इसके मुंह से कुछ भी नहीं निकला.. बस बहुत देर तक रोती रही.. मैंने इसे प्यार से कहा की अब रोना छोड़ो और जाकर पापा मम्मी का आशीर्वाद ले लो..

लिखने को इतनी बातें हैं की अगर मैं सारा कुछ लिख दूं तो वो एक मोटा सा ग्रंथ बन जायेगा और ये मुझे भी पता है की ग्रंथ पढना किसी को पसंद नहीं होता है.. :)

मैं और शिल्पी मेरठ में रात का खाना खाना खाते हुये
अंतिम भाग अगले अंक में..

Tuesday, March 25, 2008

जो मन में आयेगा कहूंगा तुझे, आखिर मेरी बहन हो!!(पार्ट I)

घर से मैं सुबह 4 बजे निकल चुका था.. बाहर कुछ औटो तो लगे हुये थे मगर उसके चालक गहरी निंद्रा में थे और मैं जानता था की उन्हें उठाने का कोई मतलब नहीं था क्योंकि वो या तो जाते नहीं या फिर जगने के बाद उनका नखरे ज्य़ादा होता.. खैर अगर कोई औटो नहीं मिलने की स्थिती में तो उन्हें जगाना था ही जिसकी नौबत नहीं आयी..

मैं औटो से एयर पोर्ट पहूंचा जहां से मुझे दिल्ली की फ्लाईट पकड़नी थी.. मेरा फ्लाईट नंबर शायद DC610 था जो समय पर थी और उसने समय पर दिल्ली पहूंचा भी दिया.. दिल्ली जाने से पहले डा.प्रवीण चोपड़ा जी से मेरी बात हुई थी और उन्हीं से मैंने पूछा था की मेरठ जाने के लिये बस कहां से मिलेगी.. मेरठ में मेरी मुहबोली बहन रहती है शिल्पी और मुझे उससे मिले कई साल हो गये थे, सो उससे मिलने की इच्छा तीव्र हो गई ती.. प्रवीण जी ने जैसे मुझे बताया था मैं वैसे ही दिल्ली एयरपोर्ट से औटो लेकर ISBT पहूंचा और वहां कुछ खा-पीकर(जो कहीं से भी स्वास्थवर्धक तो नहीं था) मेरठ जाने वाली बस में बैठ गया..

1 बजे के लगभग बस वाले ने मुझे मेरठ उतार दिया.. जैसा की भारत के किसी भी रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड या एयरपोर्ट के आस-पास होता है, मेरे उतरते ही मुझे ढेर सारे रिक्सा चालकों ने घेर लिया.. मैंने बिना किसी रिक्से वाले की तरफ़ देखे ही मोलभाव करना शुरू कर दिया और वहां से मुझे शिल्पी के बैंक तक जाना था जहां वो काम करती है क्योंकि वो शुक्रवार था और वो वहीं थी.. शौदा 10 रूपये में पटा और शौदा पटते ही रिक्से वाले ने मुझसे मेरा बैग ले लिया अपने रिक्से पर चढाने के लिये.. तब मैं पहली बार उस रिक्से वाले की तरफ देखा जो कम से कम 70 साल से ज्यादा का रहा होगा.. जैसे ही मैंने उसकी तरफ देखा वैसे ही मैंने उससे अपना बैग ले लिया क्योंकि मुझे अच्छा नहीं लग रहा था की मुझे बैठा कर वो अपना रिक्सा खींचे.. मगर तभी ये भी ख्याल आया की ये भी तो किसी मजबूरी के कारण ही इस उम्र में भी रिक्सा चला रहा है और अगर मैं नहीं बैठूंगा तो फिर से इसे दूसरा ग्राहक पटाने में बड़ी दिक्कत होगी.. सो अंततः मैं उसी के रिक्से पर बैठ गया मगर शिल्पी के बैंक पहूंचकर 10 के बदले 20 रूपये दे दिये और बोला "बाबा रख लो इसे.."

मैंने पाया वो थी तो अपने आफिस में मगर काम में उसका मन नहीं लग रहा था उसका.. बेसब्री से वो मेरा इंतजार कर रही थी.. उसके आफिस में लगभग हर कोई ये जान रहा था की इसका भाई आज यहां आने वाला है.. कुछ लोग तो इस आश्चर्य में भी थे की ये लड़की तो बस तीन बहन थी, अचानक से एक भाई कहां से पैदा हो गया..:) वहां उसने मुझसे पूछा की पैर भी छूना परेगा क्या? मैंने मना कर दिया..
शेष अगले अंक में...



शिल्पी

Tuesday, February 05, 2008

मैं पागल हूं

कल रात सोने से पहले मुझे इस ब्रह्मज्ञान का पता चला की मैं पागल हूं और आज जब मैंने अपने ब्लौग पर टिप्पणीयां देखी तो मन खुश हो गया की चलो एक पागल के पागलपने से भरे हुये बातों को भी लोग पढते हैं और लगे हाथों टिप्पणीयां भी करते हैं। डा. साहब कि बातों को मान कर अपने तकनीक संवाद नामक ब्लौग को फिर से जीवंत करने की इच्छा हो गई जिसे मैं तब तक के लिये टालना चाह रहा था जब तक कि मैं घर पर नेट कनेक्सन ना ले लूं।

खैर चलिये आज पहले मेरी ये कविता पढिये और मुझे गरियाईये इतनी बेकार सी पागलपने से भरी कविता पढाने के लिये।

मैं पागल हूं,
क्योंकि मैं सोचता हूं..

मैं पागल हूं,
क्योंकि मैं पूरे समाज को,
एक चश्में से देखने की कोशिश करता हूं..

मैं पागल हूं,
क्योंकि मैं अंग्रेजी को,
अपना सब कुछ मानने वाले समाज में,
भी हिंदी बोलना चाहता हूं..

मैं पागल हूं,
क्योंकि मैं अपना समय बरबाद होने की चिंता छोड़कर,
दूसरों की मदद करना चाहता हूं..

मैं पागल हूं,
क्योंकि मैं महाराष्ट्र या गुजरात नहीं,
बिहार जाना चाहता हूं..

मैं पागल हूं,
क्योंकि मैं किसी जलसे में,
किसी के कपड़े फाड़ने के पक्ष में नहीं हूं..

मैं पागल हूं,
क्योंकि ऐसे लोगों को दुनिया,
पागल ही कहती है..

और मैं खुश हूं,
क्योंकि मैं पागल हूं..

Wednesday, January 16, 2008

और वो डरी सहमी सी चुपचाप बैठी थी

कल मैंने सुबह उठ कर पूछा, "नाश्ता कर ली हो क्या?" उधर से विकास की आवाज आयी, "हां कर लिया हूं।"

मेरे मुंह से एक प्यार भरी गाली निकली, "साले तेरे को अपने सिवा कुछ दिखता नहीं है क्या? तुमसे कौन पूछ रहा है?"

विकास किचन में आया और देख कर मुस्कुरा कर बोलते हुये चला गया, "तुम नहीं सुधरने वाले हो।"

हमारे बीच कई बार ऐसे वार्तालाप चले हैं और हमेशा मैं ही कुछ ना कुछ बोलता रहता हूं। आजतक उसकी कोई आवाज नहीं सुनी। हर समय उसकी डरी-सहमी आंखें मेरी ओर याचना भरी दृष्टि से देखती रहती है। मैं कितनी ही बार उसे क्यों ना समझाऊं, मगर वो शायद मेरी भाषा भी समझने को तैयार नहीं है। हमलोग अक्सर मजाक में कहते हैं की शायद ये हिंदी नहीं समझती है, इसके लिये हमें तमिल सीखना पड़ेगा।

मगर प्यार कि कोई भाषा नहीं होती है ये अब मुझे समझ में आने लगा है। आजकल वो भी निर्भीकता से अपने पंखों से हमारे चेहरे पर हवा झलते हुये आती है और वैसे ही बाहर भी निकल जाती है। आखिर उसे भी तो अपने और अपने बच्चों का ख्याल रखने के लिये कुछ दाना-पानी की जरूरत होती है।

ये सारा किस्सा है मेरे घर में अपना एक छोटा सा घर बनाये हुये एक कबूतर की, जिसने मेरे घर के रसोई वाले भाग में अपना छोटा सा आशियां बना रखा है। मैं कार्यालय से घर पहूंचते ही सबसे पहले उसे ही उसकी मासूम सी आंखों को देखता हूं, और उसे चैन से पा कर निश्चिंत हो जाता हूं। कई बार उससे मूर्खों कि तरह बातें करना भी अच्छा लगता है। ठीक उसी तरह जैसे हम किसी छोटे से बच्चे से बात कर रहें हों जबकी हमें पता होता है की वो हमें नहीं समझ रहा है। उसकी तो एक अलग ही भाषा होती है।

मगर मुझे पता है, जैसे ही उस पर से अपने बच्चों की जिम्मेदारी खत्म होगी वैसे ही वो फिर से अपने किसी नये आशियाने कि तलाश में उड़ जायेगी। और मेरा घर फिर से सूना हो जायेगा। मेरे अकेलेपन का साथी चला जायेगा और मैं फिर से दिवारों से बाते करने लगूंगा।

ये चित्र मैंने गूगल इमेज से उठाया है पर दिखने में है बिलकुल मेरे घर वाले कबूतर जैसा। :)

Thursday, January 10, 2008

तारे जमीं पर और मेरा बचपन

मैंने कल ये फिल्म थोड़ी देर से ही सही मगर देख ली। मुझे काफी हद तक इसमें अपना बचपन दिख रहा था। बिलकुल वैसी ही विवशता, दोस्तों के बीच वैसा ही खुद को छोटा पाना। घर में वैसे ही बड़ा भाई क्लास टापरों में से एक और खेल-कूद से लेकर लगभग हर चीज में अव्वल आने वाले और एक इधर मैं किसी तरह घिसट कर प्रोमोटेड होकर पास करने वाला साधारण सा छात्र। इतनी भी हिम्मत नहीं कि खेल-कूद में भी हिस्सा ले सकूं। उस बच्चे की ही तरह हर वक्त घर में पड़े बेकार चीजों से कुछ ना कुछ बनाने कि कोशिशें करते रहना और अगर कोई बेकार चीज ना मिले तो अच्छी खासी चीजों को ही पहले बेकार बनाना और फिर से कोशिशे जारी रखना। :)

कुछ मायनों में यह सिनेमा मेरे जीवन से अलग भी था। जैसे मुझे अपने घर में उस बच्चे की तरह दुत्कार नहीं मिला, और सबसे ज्यादा मुझ पर मेरे पापाजी ही करते थे। मैं फिसड्डी तो था पर उस बच्चे कि तरह हर जगह नहीं। मेरी आंखों के आगे शब्द नाचते नहीं थे, हां आंग्रेजी का अक्षर विन्यास मुझे कभी याद नही हो पाते था। और सबसे बड़ी बात ये की मेरे जीवन में वैसा कोई अध्यापक नहीं आया जो मेरी काया कल्प ही बदल डाले। और तो और, मेरी चित्रकारी भी सुभानअल्ला के अलावा और कुछ नहीं था।

जहां तक मैं समझता हूं, हर व्यक्ति की एक इच्छा होती है कि वो जो कुछ भी कर रहा हो उसमें सबसे अच्छा करे। इससे कोई फर्क नहीं परता कि वो कोई वयस्क है या कोई छोटा सा बच्चा।

आज मैं चाहे कितना ही मुश्किल कंप्यूटर प्रोग्राम के लाजिक को क्यों ना समझ लूं पर जार्गनस(Jargons) और टेक्निकल टर्म मुझे ज्यादा याद नहीं रहते हैं। कुछ ऐसा ही था कि मुझे बचपन में अक्षर-विन्यास याद नहीं होते थे। मगर इसका मतलब ये नहीं कि मुझे कुछ भी याद करने में ही परेशानी होती है, अगर आप संख्या ओं की बात करेंगे तो मुझे लगभग अपने मोबाईल में सुरक्षित सारे नम्बर याद हैं जो लगभग 150 से ज्यादा हैं।

जब मैं ये फ़िल्म देखने जा रहा था तो मेरी मुहबोली बहन स्नेहा ने मुझसे बोला था कि तुम ये सिनेमा देख कर जरूर रो दोगे और जवाब में मैंने कहा था कि अभी तक तो कोई भी सिनेमा देख कर मैं नहीं रोया हूं क्योंकि मेरे मन में हमेशा यही होता है कि ये एक सिनेमा है ना कि आम जिंदगी। सो हम दोनों में ठन गई। और मैच ड्रा रहा। क्योंकि मेरी आंखें तो नम हुई थी मगर सिनेमा देख कर नहीं, उस गाने पर जो मां के उपर था। वो गाना सुन कर मुझे अपनी मां की बहुत याद आने लगी थी।

चलिये आप भी उस गाने को मेरे साथ सुने :

Maa - Taare Zameen...


मैं कभी बतलाता नहीं
पर अन्धेरे से डरता हूं मैं मां
यूं तो मैं, दिखलाता नहीं
तेरी परवाह करता हूं मैं मां
तुझे सब है पता, है ना मां
तुझे सब है पता,,मेरी मां

भीड़ में यूं ना छोड़ो मुझे
घर लौट के भी आ ना पाऊं मां
भेज ना इतना दूर मुझको तू
याद भी तुझको आ ना पाऊं मां
क्या इतना बुरा हूं मैं मां
क्या इतना बुरा मेरी मां

जब भी कभी पापा मुझे
जो जोर से झूला झुलाते हैं मां
मेरी नजर ढूंढे तुझे
सोचूं यहीं तू आ के थामेगी मां

उनसे मैं ये कहता नहीं
पर मैं सहम जाता हूं मां
चेहरे पे आने देता नहीं
दिल ही दिल में घबराता हूं मां
तुझे सब है पता है ना मां
तुझे सब है पता मेरी मां

मैं कभी बतलाता नहीं
पर अंधेरे से डरता हूं मैं मां
यूं तो मैं, दिखलता नहीं
तेरी परवाह करता हूं मैं मां
तुझे सब है पता, है ना मां
तुझे सब है पता,,मेरी मां


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ये सिनेमा मैं अपने दोस्तों के सथा रात 10 बजे वाले शो में देखने गया था। और वहां से लौटते-लौटते 1:30 से ज्यादा हो गये थे और उपर से सुबह उठ कर आफिस जाने की जल्दी भी थी। इसलिये मैं सो गया पर नींद पूरी नहीं हुई और पूरे दिन भर आफिस में अल्साया सा घूमता रहा। सिनेमा देखते समय मेरे साथ मेरी मित्र बैठी हुई थी जो ज्यादा कुछ बोलती नहीं है और उसे टंग करने में बहुत मजा भी आता है, सो मैं उसे पूरे फिल्म में चिढाता भी रहा। :)

Monday, December 10, 2007

मानवाधिकार दिवस और मेरी दीदी

आज 10 दिसम्बर है, आज मानवाधिकार दिवस है, आज मेरी दीदी का जन्मदिन है। अब चूंकि आज मानवाधिकार दिवस के दिन मेरी दीदी का जन्म हुआ है तो ये स्वभाविक है की जब भी अपने अधिकारों को लेकर दीदी कुछ कहती तो बस हम दोनों छोटे भाई चिढाना चालू कर देते कि मानवाधिकार दिवस के दिन पैदा हुई है सो हर समय उसी की बातें करती रहती है।

बात उन दिनों कि है जब भैया अपनी पढाई के लिये घर से बाहर निकल गये थे, पापाजी भी पटना से बाहर पदस्थापित थे और घर में बस मम्मी, दीदी और मैं था। दीदी को हर दिन मैं मैनेजमेंट क्लास के लिये छोड़ने जाता था और घर लौटने पर एक दूसरे को घंटो बैठ कर अपने-अपने कालेज के किस्से सुनाते थे। दीदी को कालेज छोड़ने का मेरा यह क्रम लगातार दो सालों तक चलता रहा, चाहे कितनी भी ठंड हो या वर्षा हो रही हो, या फिर हम दोनों के बीच झगड़ा ही हुआ हो। मगर मेरा यह क्रम कभी भी नहीं टूटा।

किसी भी समझदार परिवार की तरह मेरे घर में भी दीदी की इच्छाओं का सबसे ज्यादा ख्याल रखा जाता था और जब तक हम दोनों भाई छोटे थे तब तक हम दोनो ही इससे बहुत ज्यादा चिढते थे। और उस पर भी कभी-कभी जब दीदी महिला अधिकारों की बाते करती थी तो लगता था की पुरूष अधिकार की रक्षा संबंधी कोई संघटन क्यों नहीं बनाया जाता है। :)

दीदी के भीतर बौद्धिक क्षमता कूट-कूट कर भरी हुई है। उनमें तार्किक शक्ति और बौद्धिक क्षमता का सामंजस्य अद्भुत है।

मैं कभी भी पाप-पून्य और भूत-भगवान को नहीं माना हूं, पर मुझे लगता है कि मैं सच में बहुत नसीब वाला हूं जो मुझे ऐसी दीदी मिली। दीदी मुझसे 3 साल बड़ी है और जब मैं छोटा था तब हमारे बीच जब कभी भी झगड़ा होता था तो मैं दीदी को बहुत मारता भी था। पर दीदी उस समय भी, जब उनमें शारीरिक शक्ति मुझसे बहुत ज्यादा थी, कभी मुझपर हाथ तक नहीं उठाया। उल्टा जब दीदी को रोता देख कर पापाजी मुझे मारने आते थे तब मुझे उनसे मुझे बचाती ही थी।

आज दीदी जयपूर में मेरे जीजाजी और मेरी दो भांजीयों के सथ रह रही है। और उनका गृहस्थ जीवन बहुत सुखी है। और मैं इतनी दूर हूं उनसे की वहां जाने का सोचने के लिये भी दो महिने पहले से ही योजना बनानी पड़ती है।

मैं इस चिट्ठे से अपनी दीदी को बस इतना ही कहना चाहूंगा कि, "दीदी, आप मेरा मार्गदर्शन हमेशा करते रहना। जब भी मैं कहीं भटकने लगूं तो मुझे सही राह दिखाना। और अगर अगले जन्म जैसी कोई चीज भी होती है तो हर जन्म में मेरी दीदी बन कर मुझपर अपनी ममता बिखेरते रहना।"



सन् 2002 का पटना संजय गांधी जैविक उद्यान में लिया गया चित्र.. जिसमें पापा, मम्मी, दीदी और मैं हूं..

Sunday, December 09, 2007

जिंदगी किसी के बिना रूकती नहीं

अक्सर यादें आया करती थी,
यादों में एक चेहरा था..
चेहरे पे एक मासूमियत,
और उस मासूमियत में थी मेरी जिंदगी..
आज ना वो यदें हैं,
ना ही वो चेहरा,
और ना ही वो मासूमियत..
ऐसा लगता है जैसे वो मासूमियत,
कहीं गुम हो गई हो,
जीवन के इस वस्तविकता में..

उस मासूमियत को,
तलाशता फिर रहा हूं हर जगह..
पर वि इन प्लस्टिक के चेहरों में,
कहीं गुम सी नजर आती है..
पर जिंदगी किसी के बिना रूकती नहीं,
वो तो निर्बाध गति से चलती जाती है..

Saturday, September 29, 2007

दो विपरीत अनुभव

पहला अनुभव

मैं चेन्नई में जहां रहता हूं वहां से कार्यालय जाने वाले रास्ते में 'बस' में बहुत ज्यादा भीड़ होती है। उस भीड़ का एक नजारा आप भी इस तस्वीर में ले सकते हैं। (चित्र के लिये आभार 'हिंदू' को)

मैं उस दिन अपने कार्यालय से जल्दी घर के लिये निकल गया था। मैं उस दिन अपने कार्यालय से जल्दी घर के लिये निकल गया था। 'बस' में अपने लिये जगह बनाने के लिये मैं 'बस' के पीछे वाले हिस्से में चला गया। वहां देखा एक बहुत ही बुजुर्ग, जो शायद मेरे दादा जी के उम्र के होंगें और जिन्हें चलने में भी परेशानी होती होगी, वहां खड़े हैं। मुझे वहां बैठे अपने उम्र के लोगों पर तरस आया की इनके पास इतना भी संस्कार नहीं है की खुद उठ कर उन्हें बैठने के लिये जगह दे दें। संस्कार कि बात अगर हटा भी दें तो इतनी मानवीयता तो होनी ही चाहिये। थोड़ी देर बाद मैंने देखा की आगे वाले एक जगह खाली हो रही थी और मैंने लपक कर उस जगह पर बैठ गया। और अपने बगल में खड़े एक सज्जन को कहा की उन्हें यहां बुला दें जिससे मैं उनको बैठने के लिये जगह दे सकूं। वो सज्जन अंग्रेजी नहीं समझ पा रहे थे और मुझे तमिल नहीं आ रही थी। खैर मैंने किसी तरह इशारों में उन्हें समझाया और अंततः वो समझ गये और उन्हें बुलाया। मैं वहां से खड़ा हो गया और उनको बैठने के लिये जगह दे दिया, उन्होंने मुझे तमिल में कुछ कहा जिसे मैं समझ नहीं पाया पर इतना जरूर अंदाजा लगा लिया की वो मुझे आशीर्वाद दे रहे हैं। फिर मैंने देखा कि वहां बैठे लोग मुझे ऐसे देख रहे थे जैसे मैंने कुछ गलती कर दी हो और उनकी नजरें मेरा उपहास कर रही थे। पर मुझे उन नजरों की कोई चिंता नहीं थी, और उनके उपहास भड़ी नजरों से मेरा सर गर्व से और ऊंचा हो गया।

दूसरा अनुभव

यहां मैंने पाया है कि चेन्नई में उत्तरी भारतीय लोगों के लिये एक बात बहुत आम है और वो यह है कि यहां अक्सर आपको ऐसे लोग मिल जायेंगे जो आपसे हिंदी में बात करेंगे और बतायेंगे की कैसे वो यहां आये थे और कैसे उनका सारा सामान चोरी हो गया और अब उनके पास खाने के लिये कुछ भी नहीं है। वो वापस कैसे जायेंगे इसका भी कुछ पता नहीं है। कुछ पैसों से अगर मदद मिल सके तो कर दें। वे सारे लोग आपको अच्छे कपड़ों मे सजे-धजे दिखेंगे और अगर आप चेन्नई में नये हैं तो आप जरूर उनके बहकावे में आकर ठगे जायेंगे।

उस दिन मेरे मित्र विकास के पापा आने वाले थे और मुझे उनको लेने रेलवे स्टेशन जाना था। उसके लिये मैंने यहां के मांम्बलम स्टेशन से लोकल लेकर चेन्नई सेंट्रल जाना मुनासिब समझा। जब मैं अपने कार्यालय से स्टेशन के रास्ते पर था तो मुझे ऐसा लगा जैसे मुझे कोई पूकार रहा हो। "भाई साहब आप हिंदी जानते हैं!" मैं ठिठक गया, सोचा शायद ऐसा कोई हो जिसे कहीं जाने का रास्ता या पता चाहिये होगा। और उसे सही सही कोई बता नहीं पा रहा होगा।
मैंने देखा एक आदमी अपनी बीबी और एक बच्चे के साथ था। वो बताने लगा की वो औरंगाबाद महाराष्ट्र का रहने वाला है और उसकी बात यहां कोई समझ नहीं पा रहा है, क्योंकि उसे अंग्रेजी ठीक से नहीं आती है। मैं उस समय जल्दी में था पर फिर भी रूक कर उसकी बात सुनने लगा की शायद कोई मदद कर सकूं। मगर वो भी वही बात दोहराने लगा जो मैं चेन्नई में आने के बाद कई बार सुन चुका हूं। और फिर मैं अपना मुंह बनाते हुये उसकी पूरी बात सुने बिना आगे बढ गया। पर आगे बढने के बाद मुझे ऐसा लगा जैसे मैंने कुछ गलत कर दिया हो, क्योंकि मुझे उसके बच्चे का चेहरा याद आया जो मासूमियत से भड़ा हुआ था और अपने पिता को देखे जा रहा था। उसे शायद पूरी उम्मीद थी की शायद इस बार कुछ बन सके। और वो कुछ भूखा भी लग रहा था। मुझे पहली बार ऐसा लगा की वो आदमी सही था। लेकिन मैं अब वापस पीछे नहीं जा सकता था नहीं तो मुझे बहुत देर हो जाती। मैंने अपने मन को समझाया कि अगर मैं उसकी मदद करना चाहता, तब भी नहीं कर पाता क्योंकि मेरे पास 7-8 रूपये चिल्लर के अलावा कुछ 500 के नोट थे। लेकिन मुझे पता है कि वो गलत तर्क है, क्योंकि अगर मैं उसकी मदद करना चाहता तो मेरे पास 3-3 कार्ड थे और वो रास्ता बड़े-बड़े डिपार्टमेंटल स्टोर से भड़ा हुआ था। अगर मैं चाहता तो कुछ खाने के लिये खरीद कर उसे दे सकता था।

अभी भी मैं सोचता हूं तो थोड़ी तकलीफ होती है कि किस तरह हमलोग ठगों से बचने के चक्कर में जरूरतमंदों से भी नजरें मोड़ लेते हैं।