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Friday, March 15, 2013

ज़िन्दगी जैसे अलिफ़लैला के किस्से

अभी तक इस शहर से दोस्ती नहीं हुई. कभी मैं और कभी ये शहर मुझे अजीब निगाह से घूरते हैं, मानो एक दुसरे से पूछ रहे हों उसका पता. सडकों से गुजरते हुए कुछ भी अपना सा नहीं लगता. पहचान होगी, धीरे-धीरे, समय लगेगा यह तय है.

चेन्नई को समझने के लिए कभी इतना समय नहीं मिला. ज़िन्दगी बेहद मसरूफ़ थी और मन में भी पहले से बैठे कई पूर्वाग्रह थे, और वे सभी पूर्वाग्रह मिल कर एक ऐसा कोलाज तैयार कर चुके थे जिसमें दोस्ती का कोई सवाल ही ना था. मन में यही था कि जब तक यहाँ रहना है तब तक समय गुजार लो. फिर कौन देखने आया है? यूँ भी अपनी-अपनी जड़ों से कट कर यायावरों सी ही ज़िन्दगी तो गुजार रहे हैं हम जैसे सभी लोग, जो नौकरी कि तलाश में घर से निकल आये थे कभी! अब तो ना अपनी जगह अपनी सी लगती है और ना ही वो जगह जहाँ उस वक़्त हम होते हैं. अपनी जड़ों से कटने कि भी सजा तय है मानो, उम्र कैद!!! ताउम्र ऐसे ही भटकने कि सजा.

मगर यह भ्रम तब टूटा जब चेन्नई छूट रहा था. फेसबुक पर भैया मुझे टैग करके लिखे थे "प्रशान्त का हाल बाबुल मोरा नैहर छूटो जाए वाला है". लगा कि हमारी दोस्ती तो हो चुकी थी. कब कैसे ये कुछ पता नहीं. २५ जनवरी को दफ्तर में आखिरी दिन था और एक्जिट प्रोसेस का फॉर्म मेरे पास २४ को ही आ चुके थे. जैसे ही मेरे दफ्तर के ईमेल अकाउंट में एक्जिट प्रोसेस का फॉर्म आया वैसे ही लगा जैसे कुछ छूट रहा हो. मन मानने को तैयार नहीं कि जिस शहर से मैं बस भाग जाना चाहता था उस शहर के छूटने पर तकलीफ भी हो सकती थी, मगर यही सच था. वो शहर जिसने मुझे कभी दुत्कारा नहीं, हमेशा लाड-प्यार से रखा. मगर बदले में मुझसे घृणा ही पाया.

शुरू के छः महीने, या ये कहें कि पांच महीने चेन्नई में सिर्फ नाम मात्र को हम(शिवेंद्र और मैं) होते थे. ऑफिस के दिनों में मैन्सन से ऑफिस और ऑफिस से मैन्सन. बस. और जैसे ही साप्ताहांत आया वैसे ही चेन्नई से वेल्लोर. वहां शिवेंद्र होस्टल में ना रह कर बाहर एक कमरा ले रखा था, जो बाद में उसका कमरा कम और हम दोस्तों का ऐशगाह ज्यादा बना रहा. तो चेन्नईसे वेल्लोर जाने के बाद हम वहीं ठहरते थे.

अमूमन हम जब भी चेन्नई से वेल्लोर जाते थे तब शायद ही कभी हमारी टिकट चेक हुआ हो. मगर एक बार कि घटना है, हम टिकट के लिए लाइन में लगे हुए थे, और ट्रेन बस खुलने ही वाली थी. हमने देखा कि ट्रेन खुल रही है, बस उसी वक़्त हमने तय किया कि टिकट तो वैसे भी कोई चेक करता नहीं है, सो पकड़ लो, वरना अगली गाडी तीन घंटे बाद है. जीवन में सिर्फ एक ही दफे बिना टिकट यात्रा करते पकड़ा भी गया था. इन्टर्न करने वाले और उससे मिलने वाले स्टाइपेंड के पैसे से जीने वाले के पास पैसे आमतौर पर नहीं हो होते हैं, मगर संयोग से पास में पैसे थे नहीं तो खुदा ही मालिक होता.

मैं ठहरा सामिष, और शिवेंद्र निरामिष. अब इसी नॉन-वेज को लेकर भी उसी पांच महीने में दो मजेदार घटनाएं घटी. पहली घटना तब जब हमारे कुछ मित्र किसी इंटरव्यू के लिए चेन्नई आये हुए थे, और उनके जाते समय हम उन्हें छोड़ने चेन्नई सेन्ट्रल पर आये. रात के साढ़े आठ या नौ बज रहे थे. मुझे छोड़ सभी भूखे भी थे और ट्रेन खुलने में कुछ समय भी था. मैं दफ्तर के पास ही शाम में कुछ खाया था. वहीं पास के एक बिरयानी स्टाल से सभी ने अपनी-अपनी सुविधानुसार बिरयानी लिए, कोई अंडा बिरयानी तो कोई चिकेन बिरयानी और कुछ वेज बिरयानी. उन्हें देने के बाद वो स्टाल भी बंद हो गया. शिवेंद्र ने एक चम्मच ही खाया और मुझे जबरदस्ती बहुत अधिक इंसिस्ट करते हुए खाने के लिए कहा. बोला कि बहुत शानदार बिरयानी है, थोडा टेस्ट कर लो. मैंने जैसे ही टेस्ट किया मुझे चिकेन का टेस्ट आया, समझ गया कि वेज बिरयानी में चिकेन ग्रेवी डाला गया है. मैं जबरदस्ती उससे छीन कर सारा खा गया, मगर उसे कुछ बताया नहीं. इस बाबत उसकी गालियाँ मुझे तब तक सुननी पड़ी जब तक मैंने उसे सारा हाल नहीं बताया. उसे इस बात को लेकर मैं अभी तक चिढाता हूँ.

दूसरी घटना उस जगह कि थी जहाँ हम रोज रात में खाना खाने जाते थे. वहीं पास में स्टेडियम था जहाँ अक्सरहां क्रिकेट मैच हुआ करता है. हम जहाँ खाते थे वो छोटा सा होटल एक पंजाबी दम्पति का था. बाद में उन्होंने ने ही बताया कि वो निःसंतान भी थे, सो ढेर सारे पैसे का कोई मोह नहीं था और इसलिए वो सिर्फ रात में ही होटल खोलते थे. वर्ना उनका होटल हम जैसे उत्तर भारत से आये लड़कों कि वजह से खूब चलता था. वहां फुल्के वाली रोटी तीन रुपये कि थी और कोई भी दाल या सब्जी पंद्रह रुपये की. लगभग एक समय का भोजन तीस रुपये में अच्छे से हो जाता था. नॉन-वेज के नाम पर वो सिर्फ अंडाकड़ी रखते थे. वो तीस रुपये में दो अंडे के साथ मिलता था. वो शायद २००७ का अप्रैल का महिना था. हमें एक-डेढ़ महीने में ही अपना इन्टरन का प्रोजेक्ट ख़त्म करके वापस घर जाना था और फिर जून में वापस आना था. शिवेंद्र बहुत तृप्त होकर मुझसे कहता है, "अंकल-आंटी के खाने का एक और फायदा है, ये लोग साफ़-सफाई पर बहुत ध्यान देते हैं. वेज और नॉन-वेज को कभी मिक्स नहीं करते हैं." उस दिन मैंने खुद के लिए अंडाकड़ी मंगाया था. हमारे ठीक सामने अंकल सब्जी और अंडाकड़ी निकाल रहे थे और आंटी रोटी बना रही थी. अंकल ने पहले अंडाकड़ी निकाला और फिर उसी चम्मच से सब्जी भी निकाल कर सामने रख दिए..बेचारा शिवेंद्र कहे तो क्या कहे? बस अंकल को बोला सब्जी दुसरे चम्मच से निकाल कर दो. मगर यह भी समझ गया कि पता नहीं कितनी बार वो ऐसे ही खा चुका होगा.

खैर, ज़िन्दगी के ये किस्से भी तो अलिफ़लैला के किस्सों से अलग नहीं ही होते हैं. हर दिन हम गर गौर से देखें तो एक नया किस्सा निकल आता है. फिलवक्त के लिए अलविदा.

Wednesday, March 13, 2013

शहर

बैंगलोर कि सड़कों पर पहले भी अनगिनत बार भटक चुका हूँ. यह शहर अपनी चकाचौंध के कारण आकर्षित तो करता रहा मगर अपना कभी नहीं लगा. लगता भी कैसे? रहने का मौका भी तो कभी नहीं मिला था. २००५ में पहली दफे इस शहर में आया था, शायद जुलाई का महिना था वह. और लगभग साढ़े सात साल बाद बसने कि नियत से इस साल जनवरी में आया.

अभी भी लगता है जैसे कल कि ही बात थी. कालेज के दिनों में पहली बार अपने दो दोस्तों के साथ यहाँ आया था, इरादा कुछ तफरी करने का था. वेल्लोर से बैंगलोर. जब २००५ जुलाई कल कि बात लग सकती है तो २००७ जनवरी तो उससे भी अधिक नजदीक का मामला है. २००६ दिसंबर में जयपुर दीदी के घर गया था, ठीक ३१ दिसंबर को रेल से चेन्नई उतरा. कहने को तो उससे पहले भी चेन्नई से होकर गुजरने का मौका मिला था, मगर रेल से होकर ही निकल लेता था. हाँ, जब पहली दफे वेल्लोर जा रहा था कालेज में एडमिशन के लिए तब चेन्नई एयरपोर्ट से चेन्नई सेन्ट्रल तक का रास्ता टैक्सी में तय किया था. मगर तब घबराहट रास्तों को और उस शहर को देखने अधिक थी.

जब भी चेन्नई होते हुए वेल्लोर जाता था तब सिर्फ इतना ही समझ में आया था, कि जिस स्टेशन पर गाड़ी के रुकते ही पसीने से तर-ब-तर हो जाओ, वही चेन्नई है.

३१ दिसंबर को चेन्नई उतरने के बाद शिवेंद्र का इन्तजार थोड़ी देर किया. वह वेल्लोर से चेन्नई आया था. २ जनवरी को हमें अपनी पहली नौकरी ज्वाइन करनी थी चेन्नई में, मगर उससे पहले रहने का ठिकाना भी तलाश करना था. फिर तो हमारे लिए बेहद अजीबोगरीब नामों का सिलसिला ही निकल पड़ा, जिसमें सबसे पहला नाम "चुलाईमेदू" था. एक सीनियर ने हमें बताया था कि वहीं रहते हैं, और उनके ही मैन्सन में हमारा भी इंतजाम हो जाएगा, जो कि ना हो सका. और फिर उसके बाद तो एक झड़ी सी लग गई ऐसे नामों की. जैसे कोयम्बेदू, त्यागराया(जिसे अंग्रेजी में Thyagaraya लिखते हैं और हम उत्तर भारत के लोग उसे "थ्यागराया" पढ़ते हैं, टी नगर में टी का मतलब यही है), ट्रिप्लिकेन, वरासलावक्कम, नुगमबक्कम, केलाबक्कम, पैरिस, थोरईपक्कम.. खैर हमें इतना ही समझ आया कि चेन्नई में जगहों का नाम कुछ "अक्कम-बक्कम" टाईप होता है और बैंगलोर में "हल्ली-पल्ली" टाईप.

एक और नई बात पता चली कि यहाँ PG को लोग मैन्सन कहते हैं. सच कहूँ तो मुझे उस वक़्त तक पता नहीं था कि मैन्सन का मतलब क्या होता है? मुझे बाद में शब्दकोष का सहारा लेना पड़ा था. खैर!! जब चुलाईमेदू में ना मिला तो फिर कुछ ने सलाह दी कि टी नगर में ढूंढो, वहां मिल जाएगा. खैर वहां भी ना मिला, मगर वहां ढूँढने के चक्कर में चेन्नई के एक ऐसे इलाके का पता चला जिसे देख कर हम दंग रह गए थे. हम कोडम्बक्कम से लोकल लेकर माम्बलम में उतरे, जो कि टी नगर का लोकल स्टेशन है, और जैसे ही स्टेशन से बाहर निकलने वाली गली में घुसे, लगा जैसे ग़दर मचा हुआ हो. एक लम्बी से गली, उसमें जितने दूकान, उन सब का नाम सर्वणा स्टोर, और लोग ऐसे धक्कम धक्का मचाये हुए जैसे आज ना लिए तो कल कुछ नहीं मिलेगा. जैसे कर्फ्यू लगने के बाद थोड़े समय कि ढील दी गई हो लोगों को खरीददारी करने के लिए. हम पहली बार चेन्नई कि गर्मी को देख रहे थे, उसमें भी ऐसी जगह आ गए थे. वह तो बाद में पता चला कि सालों भर उस जगह का यही हाल रहता था.

फिर वहीं किसी ने कहा कि ट्रिप्लिकेन चले जाओ, वहां जरूर मिल जाएगा. वहां मिल भी गया. और वो भी मुश्किल से दस-पंद्रह मिनट के मशक्कत में ही. वहां जाने पर ऐसा लगा जैसे दिल्ली के मुनिरका या कठबरियासराय-जियासराय वाले इलाके में आ गए हों. माहौल वैसा ही, सिर्फ एक ही भाषाई अंतर मिला, अलबत्ता सब एक बराबर. हाँ, यहाँ कि सड़के कठबरियासराय-जियासराय से अधिक चौड़ी थी. मेरा यह यकीन और पुख्ता हो चला कि सारे शहर का मिज़ाज एक सा ही होता है, बाहर से चमचमाती दिखती महानगर अंदर से ऐसे ही इलाकों में गरीबी में गिजगिजाती है, जहाँ अधिकांश नौकरी करने वाले अथवा पढने के लिए बड़े शहर में आने वाले युवा रहते हैं. शहर के अभिजात्य वर्ग ऐसे इलाकों को नफ़रत से देखती है, मगर शहरें संभली होती हैं ऐसे ही बिगड़े हुए इलाकों से.

Saturday, June 11, 2011

एकालाप

किसी के कमेन्ट का इच्छुक नहीं हूँ, सो कमेन्ट ऑप्शन हटा रहा हूँ.. मेरे करीबी मित्र अथवा कोई भी, कृपया इस बाबत फोन या ईमेल करके भी ना ही पूछें तो बेहतर होगा.. इसे एकालाप मान कर ही चलें, जिसमें किसी के दखल कि कोई आवश्यकता नहीं है मुझे.. हर किसी को अपना स्पेस चाहिए होता है, और हर किसी में मैं भी आता हूँ..

शनिवार का दिन है, दफ्तर में अकेला बैठा हुआ हूँ.. कोई मजबूरी नहीं, बहुत अधिक काम नहीं.. अगले हफ्ते शुक्रवार की छुट्टियों के इंतजामात करने के लिए आज दफ्तर में हूँ.. एक डिफेक्ट है, बहुत आसान सा, मगर उस पर ध्यान केंद्रित नहीं कर पा रहा हूँ.. उसे ऐसे ही छोड़ रखा है, पता है कि कितना भी दिमाग खराब करूँ, अब आज नहीं होने वाला है तो नहीं ही होगा, बाद में देखा जायेगा इसे.. घर जाने की भी इच्छा नहीं हो रही है..

चेन्नई एक ऐसा शहर है जहाँ आप कहीं भी चुपचाप अकेले बैठ कर समय गुजारने के बारे में नहीं सोच सकते हैं, हर जगह लोगों की रेलमपेल इतनी अधिक होती है और साथ में इतनी गर्मी की अगर वहाँ पंखा ना हो तो आप एक जगह टिक ही नहीं सकते, खासतौर से जब अकेले हों.. कुल मिलाकर एक ही जगह बचती है, समुद्र तट, और वहाँ भी जाने की इच्छा नहीं है.. घर जाना नहीं चाह रहा हूँ क्योंकि अभी किसी मित्र के साथ का इच्छुक नहीं हूँ..

चश्मे की दूकान पर जाना है, चश्मे का नया फ्रेम बनवाना है, पुराना इतनी बुरी तरह खराब हो गया है की आप उसकी तुलना किसी एंटीक पीस से कर सकते हैं, और ऊपर से बहुत सारे स्क्रैचेज चश्मे के शीशे पर.. बहुत दिनों से टाल रहा था, मगर आज सुबह घर से ठान कर निकला था की लौटते हुए आज नये के लिए ऑर्डर दे ही दूँगा.. मगर अब लग रहा है आज भी यह टल जायेगा.. दफ्तर से निकल कर उस चश्मे की दूकान के अलावा एक दो जगह और भी जाना था, मगर वहाँ जाने की भी इच्छा अब नहीं हो रही है.. तब जबकि जरूरी सभी कुछ है.. घडी की बैटरी खत्म हो गई है.. लैपटॉप की दूकान पर जाकर कुछ पूछताछ करनी है.. कुछ सामान किसी शौपिंग मॉल से जाकर लानी है.. ब्लाह.. ब्लाह.. ब्लाह.. ब्लाह..

कुछ दिन पहले एक अच्छी खबर पर मन इतना खुश था की कोई बेहद अजीज पास होता तो गले से लगाकर खुशी जाहिर कर देता.. चाहे घर के लोग या दोस्त.. कुछ लोगों को फोर करके खुशी बांटी, मगर आस पास कोई नहीं.. पिछले सात-आठ साल से अकेला रहने की वजह से अकेला रहने की इस कदर आदत हो चुकी है कि किसी का लगातार साथ मुझे घबरा सा देता है.. इस व्यवहार में कुछ बदलाव तब आया था जब अभी ढाई महीने घर पर लगातार रहा.. मगर फिर चार-पाँच महीने में वैसा ही होता जा रहा हूँ.. कई महीनों बाद सिगरेट पीने की बेवजह तलब सी लग रही है.. मन में आ रहा है की बीस सिगरेट वाला डब्बा खरीद कर एक ही बार में सारा पी जाऊं.. यू नो, चेन स्मोकिंग? आगे देखता हूँ तो लगता है कि समय कि रफ़्तार कितनी धीमी है, मगर पीछे मुड कर देखता हूँ तो लगता है कि इसकी रफ़्तार सी तेज कुछ भी नहीं, प्रकाश कि गति को भी ये मात दे दे.. हर वह बात जो बस कल की ही लगती है, दरअसल बरसों पुरानी बात हो चुकी होती है..

अभी दफ्तर से बाहर निकलूंगा भी तो ट्रैफिक इतनी अधिक होगी कि गाड़ी चलानी मुश्किल.. हद्द है, सडकों पर भी चैन नहीं.. ऊपर से T.Nagar से आने-जाने का रास्ता!! लोग ऐसे लुधके होंगे दुकानों में जैसे आज नहीं लेंगे तो सारा सामान हमेशा के लिए खत्म ही हो जायेगा..


ब्लाह.. ब्लाह.. ब्लाह.. ब्लाह..



Wednesday, April 20, 2011

नम्मा चेन्नई!!!!

मुझे कई लोग मिले हैं जो मुझे चेन्नई शहर से प्रेम करते देख मुझे ऐसे देखते हैं जैसे कोई अहमक हूँ मैं.. बहस करने वाले भी कई मिले हैं जो यह गिनाने को आतुर रहते हैं कि चेन्नई में क्या-क्या खराबियां हैं.. मेरे पास उनसे अधिक वजहें होती हैं इससे इश्क में डूबने के बजाये इसके की मैं इससे नफरत करूँ.. वैसे भी मुझे यह समझ में नहीं आता है कि कोई किसी शहर से नफरत कैसे कर सकता है? आप किसी शहर के उन लोगों से नफरत कर सकते हैं जो आपके लिए बुरें रहे हों.. आप शहर की गन्दगी से नफरत कर सकते हैं.. किसी शहर की गर्मी से नफरत कर सकते हैं.. मगर पूरे शहर से ही नफरत!! आश्चर्यजनक!! मेरे लिए भी कुछ शहर ऐसे हैं जहाँ की यादें हमेशा मुझे उदास ही करती हैं और अवसाद में धकेलने की कोशिश करती है, मगर फिर भी उन शहरों से नफरत तो कभी ना कर सका मैं.. हाँ कुछ उदासीन जरूर हो चुका हूँ उन शहरों से!!

चेन्नई एक ऐसा शहर है जिसने मुझे जिंदगी की पहली कमाई की पहली रोटी का बंदोबस्त किया, अब इतने बड़े अहसान को मैं भूल जाऊं, इतना अहसानफरामोश नहीं हो सकता हूँ मैं.. पटना मेरे रगों में रचा-बसा है, धीरे-धीरे यह शहर भी रगों में दौड़ने का अहसास जगाने लगा है.. पटना शहर की तरह इस शहर में उस लड़की का कोई निशान नहीं, यह भी एक अलग सुकून देता है, इस शहर में जिन्दा रहने को..

कई तरह के संघर्षों का साक्षी यह शहर, इसका नशा इतनी जल्दी नहीं उतरने वाला है.. अंतर्द्वंदों से लेकर ज़माने की लड़ाई तक.. यूँ तो जमाने से लड़ने का जज्बा पटना शहर से ही सीख कर चला था मगर खुद से लड़ने का तरीका इसी शहर के एकाकीपन ने सिखाया.. अकेले घर में बैठे-ठाले अचानक से बाईक उठाकर रात के तीन बजे माउंट रोड पर बिना मतलब का 30-40 km का चक्कर लगाना, सुनसान सड़क पर 90+ की रफ़्तार से भागना और अचानक से 20-25 की गति पकड़ कर चलना.. बिना किसी डर भय के की कुछ बुरा घट सकता है मेरे साथ.. सुरक्षा की यह भावना किसी और शहर में कभी नहीं मिली.. सिटी बसों को उन पतली गलियों से निकलते हुए भी आज तक कभी किसी बड़े दुर्घटना का गवाह बनते नहीं देखा.. हमारे घर वाली लगभग अनजान सी गली(गूगल मैप में जो एक पतली सी रेखा में अंकित है) में भी सुबह-सुबह नगरपालिका के कर्मचारियों को सफाई करते देखने का मौका उनकी कर्मठता को ही दर्शाता है..


मेरे रहने की जगह लाल लकीर में

कुछ बुरे अनुभव भी हुए हैं यहाँ मगर वह उन सारे अच्छे अनुभवों के सामने बहुत कम अनुपात में है.. वैसे भी बुरे अनुभव तो हर शहर के हैं, जहाँ कहीं मैं गया हूँ.. आजकल चेन्नई अपनी प्रसिद्द गर्मी के उफान पर है, ज्यों-ज्यों उमस वाली गर्मी बढती जा रही है, इसका नशा भी सर चढ़कर बोलने लगता है..



नोट : आज अचानक से इस वीडियो पर पहुँच गया, इसे देखते हुए जो ख्याल मन में आये उसे यहाँ लिख भी दिया..

Friday, November 05, 2010

ड्राफ्ट्स

१:
"आखिर मैं कहाँ चला जाता हूँ? अक्सर कम्प्युटर के स्क्रीन पर नजर टिकी होती है.. स्क्रीन पर आते-जाते, गिरते-पड़ते अक्षरों को देखते हुए भी उन्हें नहीं देखता होता हूँ क्या? या फिर उन्हें देख कर भी ना देखते हुए मैं अपनी एक अलग दुनिया बुनता रहता हूँ और रह-रह कर उस दुनिया से इस दुनिया तक के बीच सामंजस्य बनाने के लिए आँखें स्क्रीन पर टिकी रहती है?" सच भी है कि हर किसी कि अपनी दुनिया भी होती है.. जिसे वह हमेशा साथ लेकर चलता है.. हर एक कि अपनी दुनिया दूसरे कि दुनिया से जुदा भी होती है.. इस दुनिया के साथ चलते हुए किसी दूसरी दुनिया में जीने की कला हर एक को आती है.. और उम्र के साथ-साथ उस दुनिया में भी बदलाव आता है..

२:
मैं आस-पास देखने समझने कि कोशिश करता हूँ.. कुछ भी पल्ले नहीं पड़ता.. शहर, जाने कौन सा भी हो, अपनी सी शक्लें लिए भागता सा दिखता है.. मैं उठता हूँ.. जी जान लगा कर दौड़ता हूँ.. थकता हूँ.. हांफता हूँ.. रूकता हूँ.. गरियाता हूँ शहर वालों को.. फिर दौड़ने कि हालत में ना होने पर बैठ जाता हूँ, सोचते हुए कि इस रेस में ही जितने वाले क्या जीते? मन का दूसरा कोना बताता है कि कहीं अंगूर खट्टे ना हों.. उसे डपियाटा हूँ, आँखें तरेरता हूँ, इशारों में समझाता हूँ जिससे दोबारा ऐसी बात ना कहे.. वो सब अनसुना करके अपना राग गाये चला जाता है.. एक हिस्सा इस दौड़ को ख़ारिज करने पर तुला हुआ है तो दूसरा अंगूर खट्टे बताना चाह रहा है.. दोनों का शोर में दिमाग पर जोर अधिक होता है.. बेदम होकर गिर जाता हूँ.. सुबह घर वाले बताते हैं कि फिर मैं देर रात तक जगा हुआ था और बेसुध हो कर बिस्तर पर गिरा हुआ था, साथ में सलाह भी आती है कि अपना समय सारिणी को बदलना होगा.. मैं प्रतिकार नहीं कर पाता, बता नहीं पाता हूँ कि अभी तक मैं सोया ही नहीं हूँ.. कितनी रातों से नहीं सोया हूँ.. हर रोज का यही किस्सा.. लोग जिसे सोना कहते हैं.. मेरे लिए वह थक कर होशोहवास खो देना है..

३:
सिगरेट का एक अधजला टुकड़ा असल की हकीकत से रूबरू कराता सा लगता है.. उन दिनों कि याद दिलाता है.. मुफलिसी की.. आधा टुकड़ा जला कर, आधे को अगले समय के लिए बुझा कर रख लेना.. जले टुकड़े को फिर से सुलगाने पर एक अलग ही कड़वाहट मुंह में भर जाना.. यह सब उस रात तक चलता रहा जिसके अगले दिन बढ़ी हुई तनख्वाह ना मिल गई थी.. सब अब मुझे मेरी दुनिया से अलग दुनिया सा लगता है.. या शायद मेरी ही दुनिया का एक अलग आयाम हो जिसका सामना मैं नहीं करना चाहता हूँ.. कहीं मुझे चौथा आयाम भी तो नहीं दिख रहा है, मनुष्यों कि नज़रों से इतर? कहीं जिंदगी हर पल एक नए आयाम में तो प्रवेश नहीं करती है, जिसका पता हमें नहीं लगता है?
जिंदगी भी सिगरेट जैसी ही होती है, यकीन के साथ तो नहीं कह सकता मगर शायद कुछ-कुछ.. जब तक इसे लबों से लगाए रखते हैं, यह एक अलग ही सुखद अहसास देता रहता है.. नशीला अहसास.. जिंदगी भी तो नशा ही है! एक बार इसे बुझा कर और फिर जलाना वैसी ही कड़वाहट घोल जाता है जैसे सिगरेट, या जैसे जिंदगी..
४:
लोग समझते हैं कि मुझे ना सोने की बीमारी है.. अक्सरहां मुझे जगा हुआ ही या आँख खोले किसी सपने में जीते हुए पाते हैं.. सपने अक्सर अच्छे या बुरे होते हैं.. बचपन में एक सपना अक्सर बहुत परेशान करता था मुझे.. अब वह सपना तो नहीं आता, मगर उस सपने का डर अभी तक गया नहीं है.. अब तक किसी से मैंने यह बांटा नहीं है, माँ-पापा से भी नहीं जिनसे अपने बीते प्रेम प्रसंग पर भी बेधड़क चर्चा कर लेता हूँ.. एक बैलगाड़ी और उसमें बंधे दो बैल.. वे बैल बैलगाड़ी के साथ मेरा पीछा करते थे.. मुझे अपने सींघ से डराते थे.. मगर घिर जाने पर मारते नहीं थे, मेरे घिरने पर मुझे मेरे जो कोई भी प्रियजन बचाने आते थे उनका खून पीने लगते.. वे प्रियजन अक्सर अपना रूप बदल कर आते थे.. कभी माँ, कभी पापा, कभी दादी, कभी दीदी.. मैं डरकर जगता, पसीने में भींगा हुआ, फिर माँ से चिपककर सो रहता..

५:
दूसरों का तो पता नहीं मगर मेरे साथ यह अक्सर होता है.. कहीं भाग जाने का मन करने लगता है.. इस "कहीं" शब्द का कोई निश्चित परिभाषा तय नहीं है, यह "कहीं" कहीं भी हो सकता है.. जब ऐसी इच्छा होती है उस वक़्त भी इस "कहीं" का कोई अपना निश्चित "पता" कहीं नहीं होता है.. मगर जिस अक्षांस और देशांतर में उस पल मैं होता हूँ, वहाँ होने कि इच्छा नहीं होती है.. बस भाग जाने का मन करता है.. ये कोई अवसाद कि स्थिति में ही हो, यह तय नहीं है.. सामान्य अवस्था में रहते हुए भी उस तरह कि बातें मन में पनपने लगती है..

ये सभी बातें पांच अलग-अलग विचारावस्था में लिखी गई थी जो मेरे ड्राफ्ट में रखी हुई थी.. आज सभी को एक ही जगह इक्कट्ठा करके यहाँ पोस्ट कर दिया.. अब आपको जो कुछ भी पढ़ने-समझने जैसा लगे वह पढ़े समझे..


Saturday, October 23, 2010

किस्सों में बंधा एक पात्र

हर बार घर से वापस आने का समय अजीब उहापोह लिए होता रहा है, इस बार भी कुछ अलग नहीं.. अंतर सिर्फ इतना की हर बार एक-दो दिन पहले ही सारे सामान तैयार रखता था आखिर में होने वाली हड़बड़ी से बचने के लिए, मगर अबकी सारा काम आखिरी दिन के लिए ही छोड़ दिया.. साढ़े बारह बजे के आस-पास घर से निकलना भी था और आठ साढ़े आठ से पहले मैं जग नहीं सकता ये भी पता.. कुल मिला कर मैं मानसिक तौर पर इस बात के लिए तैयार था कि कुछ ना कुछ मैं छोड़ कर ही आऊंगा..

"अब ये क्या है?" माँ कुछ दे रही थी, तीन-चार पन्नियों में अच्छे से जकड़ा हुआ एक पैकेट.. "काजू-किशमिश का पैकेट है.. तुम्हे अच्छा लगता है, और मुझे पता है कि तुम खरीदता नहीं है वहाँ.." यही कुछ जवाब आया.. पिछली दफे मैं हर ऐसे किसी पैकेट पर ऐतराज जताता रहता था जिसे मैं चेन्ना में आसानी से खरीद सकता हूँ, मगर अबकी मैं अन्य दिनों कि अपेक्षा चुपचाप सब रखे जा रहा हूँ.. अपना लगभग खाली सा बैग टटोलता हूँ, याद आता है कि आते समय पापा कि कई किताबें याद करके लेता आया था.. कुछ सामान भी था जैसे दीदी की साडी, बच्चों कि कुछ चीजें, एक अन्य मित्र के लिए कांचीपुरम की साडी.. अब बैग लगभग आधा से अधिक खाली है.. हाँ, जितनी किताबें लेकर आया था, लगभग उतनी ही पुनः लेते जाना है.. उसे कंधे पर टांगने वाले बैग में रख लूँगा.. इस बैग को कार्गो में भेजना है, जिसका वजन अधिक नहीं होना चाहिए.. वैसे भी किताबों का वजन कुछ अधिक ही होता है, चाहे दिमाग पर हो या कन्धों पर.. "बगल में एक डब्बा भी रखा हुआ है, उसे भी रख लो.." एक और संवाद, "अब क्या है इसमें?" "मखाना भूंज कर, पीस कर रखा हुआ है.. वहाँ ये नहीं मिलता होगा, खीर बना कर खाना.." मैं थोड़ी सी जगह बनाता हूँ और उसे भी रख लेता हूँ.. आलमीरा से एक शर्ट निकालता हूँ.. पास मौजूद हर चीज से कोई ना कोई किस्सा जुड़ा होता है, कई लोग अपना पात्र निभा चुके होते हैं उन किस्सों में.. उस शर्ट से भी जुड़े कुछ किस्से याद आते हैं.. कुछ-कुछ पुराने जमाने के सिनेमा कि तरह बैक्फ्लैश के कुछ सीन आँखों के सामने से गुजर कर थम जाता है.. कुछ साल पुराने किस्से.. वे किस्से जो आज भी मेरे भीतर कहीं पैठ जमाये हुए हैं, फिर से उस किस्से में अपना पात्र याद नहीं करना चाहता हूँ सो वापस रख देता हूँ..

नाश्ते के लिए पूछा जाता है, मैं मना कर देता हूँ.. कहता हूँ कि एक ही बार खाना खाकर एयरपोर्ट के लिए निकलूंगा.. वापस जाने का उद्देश्य सोचते हुए घर में टहलता हूँ.. पापा मम्मी के कमरे में जाता हूँ.. पापा नाश्ता करके नींद में हैं.. उनके बगल में लेट कर उनके गोद में समाने की असफल कोशिश करता हूँ.. याद आता है कि अब उनसे भी एक-दो इंच लंबा हो चुका हूँ, मगर उनके सामने जाता हूँ तो हमेशा मुझे वही पापा याद आते हैं जो बचपन में दिन भर मुझे गोद में उठाये घुमते थे.. कई किस्से आँखों के सामने घूम जाते हैं.. मुझे वह पापा याद आते हैं जिनके मातहत कर्मचारी उन्हें हम बच्चों के साथ हंसी-ठिठोली करते देख सदमे कि स्थिति में आ जाया करते थे, उन्होंने सपने में भी ये कभी नहीं सोचा था कि इतने कड़क साहब का यह रूप भी हो सकता है.. कुछ उससे पुराने किस्से भी नज़रों के सामने घूमने लगते हैं जब गाँव जाने पर भैया-दीदी कहीं और निकल जाते थे मगर मैं पापा या मम्मी को छोड़ कर कहीं नहीं जाता था और अब हालात कुछ ऐसे हैं कि पापा-मम्मी से सबसे अधिक समय तक अलग रहने का रिकार्ड सा बनाते हुए इतनी दूर फिर से निकल जाना है.. जीवन का लक्ष्य क्या है? क्या पैसे कमाना ही 'कुछ' या 'सब कुछ' है? कहीं मैं किसी मृगमरीचिका के पीछे तो नहीं भागा जा रहा हूँ? कहीं हम सभी किसी मृगमरीचिका के पीछे तो नहीं भाग रहे हैं? कुछ प्रश्न मन में आते हैं, जिनका कोई उत्तर ना पाकर मैं खीज उठता हूँ, और उन्हें नजरअंदाज ना करते हुए भी नजरअंदाज कर देता हूँ.. पापा को नींद में कसमसाते हुए देखकर उनकी गोद में समाने कि अपनी असफल कोशिशों को मुल्तवित कर देता हूँ.. धीरे से उनका हाथ लेकर अपने गाल पर रखता हूँ.. एक किस्सा फिर कहीं नज़रों के सामने घूमने लगता है.. बचपन में भैया के एक मित्र 'रॉबिन्सन हैम्ब्रम' जब पहली दफे हमारे चक्रधरपुर वाले घर में पापा से मिले थे तब बाद में आश्चर्य से बोले थे, "अंकल का हाथ कितना बड़ा है!!" मैं पापा का बायां हाथ अपने दाहिने हाथ में लेकर अपने हाथ से नापता हूँ.. कुछ मिलीमीटर का फर्क अब भी है, अंतर सिर्फ इतना है कि अब मेरा हाथ बड़ा है.. मैं धीरे से उनके हाथ को चूमता हूँ.. और रख देता हूँ..

बचपन में माँ कहती थी, "तुम खा लिए तो मेरा पेट भर गया.." मुझे आश्चर्य होता था.. अहा!! ये कैसा जादू है? जो मेरे खाने से माँ का पेट भर जाता है? मुझे महाभारत का वह किस्सा याद आता है जिसमें भगवान कृष्ण ने मात्र एक चावल के दाने से सभी ऋषि-मुनियों को तृप्त कर दिया था.. हकीकत का ध्यान बड़े होने पर ही आया.. "मिथकें भी भला कभी सच होती है क्या?" जिस दिन घर में पलाव बनता था उस दिन हम सभी भाई-बहन आपस में लड़ते थे माँ के साथ खाने के लिए, वो काजू-किशमिश चुन कर हम लोगों के लिए अलग रख देती थी.. कहती थी कि उन्हें अच्छा नहीं लगता है ये.. सच कहूँ तो मुझे आज भी नहीं पता कि माँ को खाने में क्या अच्छा लगता है? शायद पापा को पता हो.. मगर हमारी हर एक पसंद-नापसंद का ख्याल तब भी रखती थी, और आज भी रखती है.. अब जब हम भी ख्याल रखने के हालत में आ चुके हैं तब भी मुझे सिर्फ इतना ही पता है कि उन्हें 'वेनिला फ्लेवर' का आइसक्रीम बेहद पसंद है.. शायद भैया को इससे अधिक पता हो, उन्हें उनके साथ समय बिताने का अधिक मौके मिले हैं..

मैं वापस उस बड़े वाले हॉल में आता हूँ जिसमे मुझे हर चीज बड़ी-बड़ी दिखती है.. टीवी बड़ा.. सामने टंगे हुए फोटो बड़े-बड़े.. हम सभी की तस्वीर वह टंगी हुई है.. माँ भी बड़े वाले सोफे पर आराम से बैठी हुई है.. उनके पास जाता हूँ.. पास जाकर जमीन पर बैठ कर अपना सर उनके गोद में रख लेता हूँ.. माँ के हाथ को अपने गालों पर महसूस करता हूँ.. बचपन के किये एक जिद्द कि याद हो आती है.. कितना छोटा था, यह अब याद नहीं.. मगर यकीनन मैं बहुत ही अधिक छोटा रहा होऊंगा, क्योंकि बेहद धुंधली सी याद बाकी है.. माँ अपने घर के काम को लेकर हैरान-परेशान सी थी और मैं जिद्द पकड़े बैठा था कि खाना खाऊंगा तो माँ के गोद में ही बैठ कर.. मेरी वह जिद्द पूरी भी हुई, उनके सारे जरूरी कामों को छोड़कर.. उनके गर्भ में समाने कि इच्छा होती है, जिससे उनसे दूर ना जा सकूं.. चूंकि पता है कि यह एक असफल कोशिश ही होगी, सो कोशिश ही नहीं करता हूँ.. रोने कि असीम इच्छा होती है, मगर नहीं रोता हूँ.. यह एक कष्टप्रद स्थिति होती है जब आपको कुछ करने कि असीम इच्छा हो और आप ना कर पायें.. एक बेचैनी, छटपटाहट की धार भीतर ही कहीं घाव करती एवं कुरेदती रहती है.. समय देखता हूँ, समय होने ही जा रहा है.. धीरे से वहाँ से उठ जाता हूँ.. खाना लेता हूँ, खाता हूँ और निकल जाता हूँ मुस्कुराते हुए चेहरे के साथ.. मैं अपनी पहचान खोता जा रहा हूँ, जिंदगी एक नया पाठ सीखा रही है.. एक ओढ़ी हुई मुस्कराहट जो अब कभी-कभी लगता है मेरी नई पहचान ही बनती जा रही है..

इन सब बातों को बीते हुए लगभग डेढ़ महीना होने को आ रहा है.. देखिये मम्मी, घर से लाया काजू खत्म होने के बाद मैंने फिर खरीद लिया है.. रात के, नहीं-नहीं.. सुबह के साढ़े चार बजने जा रहे हैं.. मेरी माँ मुझसे नाराज है, पापा तटस्थ मुद्रा लिए हैं, और मैं बहुत उदास हूँ.. कारण बता कर दुनिया के सामने नंगा नहीं होना चाहता.. पापा-मम्मी, I Love You Too Much..

इस लेख से कमेन्ट का ऑप्शन स्वेच्छा से हटाया गया है..

Saturday, August 21, 2010

क्यों पार्टनर, आपकी पोलिटिक्स क्या है?

"Oh! So you are from Lalu's place?"

यह एक ऐसा जुमला है जो बिहार से बाहर निकलने पर जाने कितनी ही बार सुना हूँ.. मानो बिहार में लालू के अलावा और रहता ही ना हो.. वह चाहे कोई भी हो, उसे जैसे ही पता चलता है कि यह बन्दा उत्तर भारत से है तो स्वाभाविक तौर से वह पूछ बैठता है कि कहाँ से हो? उत्तर बिहार के रूप में जैसे ही मिलता है वैसे ही एक कटाक्ष के रूप में सुनने को वही मिलता है.. "Oh! So you are from Lalu's place?"

कम से कम नब्बे फ़ीसदी लोगों का कमेन्ट यही रहता है..

जब मूड ठीक होता है तो बस मुस्कुरा कर सहमति जता कर चल देता हूँ.. जब मूड थोड़ा खराब रहता है तो पलट कर पूछ लेता हूँ "जनाब, यह कहने का आपका मतलब क्या है?" और वह जबदस्ती का कोई तर्क देता है और अंत में कहता है, "Just Kidding buddy" जिसे सुनकर पहले तो मन में गालियाँ देता हूँ कि "अबे, तू मेरे ससुराल वालों में से हो क्या या लंगोटिया यार हो जो बिना परमिट के ही पहली मुलाकात में मजाक करने का अधिकार मिल गया?" फिर उसका कहा अनसुना करके निकल लेता हूँ.. मगर जब मूड बेहद खराब रहता है और इस सवाल से बुरी तरह इरिटेट हो चुका होऊं तो पलट कर मैं कटाक्ष कर देता हूँ "Partner, what is your politics?" अव्वल तो यह सवाल अमूमन उन्हें समझ में ही नहीं आता है, और सामने वाले को अगर यह सवाल समझ में आ गया तो वह इस सवाल से बुरी तरह अकचका जाता है, कि सामने वाला कहना क्या चाहता है? सवाल को नहीं समझने वाले से मैं कुछ कहता नहीं हूँ, समझाना भी नहीं चाहता हूँ.. जिन्हें समझ में आती है उनसे अगला सवाल दाग देता हूँ "Do you want to demoralize me with this question? Or do you want show off that look buddy, I am better than you. Because I am not from Lalu's place, I am from Jaya's or Karunanidhi's place and 'they are very neat and clean'."

अक्सर कुछ कुतर्क सुनने को मिल जाया करते हैं मगर मेरे इस सवाल का अभी तक 'उनसे' संतोषजनक जवाब नहीं मिला है..

माफ़ी चाहूँगा, मगर कुर्ग यात्रा अगले भाग में. :)

Sunday, July 04, 2010

तबे एकला चलो रे।

यह लड़ाई किससे है? कैसा है यह अंतर्द्वंद? लग रहा है जैसे हारी हुई बाजी को सजा रहा हूँ फिर से हारने के लिए । अंतर्द्वंद में कोई भी मैच टाई नहीं होता है, खुद ही हारता भी हूँ और खुद ही जीतता भी! अक्सर हम जीती हुई बाजी को याद करने के बजाये हारी हुई बाजी को याद करते हैं और उसकी कसक मन के किन्ही परतों के नीचे दबी हुई सी होती है । वह हमारे मन को कुरेदती है । कई दफे उससे कुछ रिसने का आभास भी होता है जो अंदर तक तकलीफ पहुंचाती है । खुद को ही तर्कों से हरा कर या जीता कर कुछ भी हाशिल होता नहीं दिखता है । किसी लक्ष्य के पीछे भागना(अगर वह हो तो) एक तरह कि मृग-मरीचिका जैसी लगने लगती है.. जिससे कुछ भी हाथ नहीं आता ।
यदि तोर डाक शुने केऊ न आसे
तबे एकला चलो रे।

एकला चलो, एकला चलो, एकला चलो रे!
यदि केऊ कथा ना कोय, ओरे, ओरे, ओ अभागा,
यदि सबाई थाके मुख फिराय, सबाई करे भय-
तबे परान खुले
ओ, तुई मुख फूटे तोर मनेर कथा एकला बोलो रे!

यदि सबाई फिरे जाय, ओरे, ओरे, ओ अभागा,
यदि गहन पथे जाबार काले केऊ फिरे न जाय-
तबे पथेर काँटा
ओ, तुई रक्तमाला चरन तले एकला दलो रे!

यदि आलो ना घरे, ओरे, ओरे, ओ अभागा-
यदि झड़ बादले आधार राते दुयार देय धरे-
तबे वज्रानले
आपुन बुकेर पांजर जालियेनिये एकला जलो रे!

बाद में जोड़ा गया :
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जब वे तुम्हारी पुकार ना सुनें,
एकला चलो रे!

जब कोई तुमसे कुछ ना कहे, अरे अभागे,
जब सब तुमसे मुंह फेर लें सब भयभीत हों --
तब अपने अन्दर झांको
अरे अपने मुंह से अपनी बात एकला बोलो रे.

जब सब दूर चले जाएँ, अरे अभागे,
जब कंटीले पथ पर कोई तुम्हारा साथ ना दे --
तब अपने पथ पर
काँटों को अकेले ही पद-दलित करो रे.

जब कोई प्रकाश न करे, अरे अभागे,
जब रात काली और तूफानी हो --
तब अपने ह्रदय की पीड़ा के आवेश में
अकेले जलो रे.
एकला चलो! एकला चलो! एकला चलो रे!


Thursday, June 17, 2010

बस ऐंवे ही कुछ भी

उसे पता था कि मेरा फोन रोमिंग पर है, मगर फिर भी हम फोन पर लगे हुये थे.. चलो, इस सरकार में चावल दाल की कीमते भले ही आसमान छू रही हों, मगर कम से कम मोबाईल बिल रोमिंग पर भी कम ही आता है.. शायद सरकार बातों से ही जनता का पेट भरने के चक्कर में हों.. उसने पूरे उत्साह से बताना शुरू किया कि मैंने तुम्हारा पोस्ट पढ़ा भी और कमेंट भी किया.. सच कहूं तो मुझे घोर आश्चर्य हुआ, क्योंकि उसे अगर देवनागरी में कुछ लंबा मेल भी लिख देता हूं तो उससे बात करने पर उसकी चिढ़न साफ महसूस होती है.. उसे कंप्यूटर स्क्रीन पर देवनागरी पढ़ना बिलकुल पसंद नहीं है..

सारी बात बताने के बाद लड़ना चालू, "ओये, वो पूरी मैंने बनाई थी.. तू कैसे लिख दिया कि तूने जो बनाई वही तो मैं खाऊंगी?" और मेरा कहना था "आटा शिवेंद्र साना, पूरी तुम बेली, और उसे तला मैंने.. फिर तुम कैसे सारा क्रेडिट लिए जा रही हो?" खैर थोड़ी ही देर में हम अपनी ही बात पर टिके ना रह कर हँसने-चिढाने लगे.. :)

पिछले गुरूवार को तमिलनाडु एक्सप्रेस में उसे बिठा आया.. अच्छी तरह देख-भाल लिया कि ट्रेन गई कि नहीं? जब ट्रेन निकल गई तभी संतुष्टी हुई कि हां अब वापस नहीं आने वाली है.. ;)

मैंने अब तक कई लेख स्वजनों पर लिख रखें हैं.. अगर ब्लॉग से इतर लोगों की बात की जाये तो शायद ही किसी ने ब्लॉग पर ही प्रतिउत्तर में अपनी बात कही हो.. अक्सर मित्रगण ई-पत्रों के द्वारा अपने मन की बात कहते हैं, कई दफ़े वह भी नहीं.. मैं वैसे भी जिसके बारे में लिखता हूं, उनसे प्रतिउत्तर की उम्मीद नहीं रखता हूं.. अक्सर कई दफ़े मैं बताता भी नहीं हूं कि आपके बारे में कुछ लिखा है.. मगर चूंकि मैं यहाँ इसकी एक तस्वीर लगाना चाह रहा था, सो इससे पूछा कि लगाऊं कि नहीं, और इसे पता चल गया कि इसके बारे में कुछ लिखा गया है.. :) साथ ही साथ इसका एक कमेन्ट भी मिल गया..

इसने लिखा था :

इस सलीके से जिंदगी का तार बुना है
हर शहर से मसरूफियत का अलंकार जुड़ा है
नये लोगों को दोस्त बनाने मे होती है जो कशमकश
हर शहर के रास ना आने में छिपी वो वजह है

शायद अपनी बात ठीक से कह नहीं पायी मैं यहाँ...पर बताने का प्रयास जरूर करुँगी..मैं हिंदी ब्लॉग नहीं पढ़ती और प्रशान्त ये बहुत अच्छे से जानते हो तुम..पर मेरे बारे में क्या लिखे हो ये Thought थोडा Motivating था मेरे लिए...
बहुत कम शब्दों में पूरा मर्म कह दिया तुमने....
अपने परिवार, अपने दोस्त, अपने शहर से बाहर आने में तकलीफ होती है और कुछ भी नया अपनाने में विरोध होता है...वही विरोध झलकता है किसी नए शहर को कोसने में....पर विरोध में भी एक जुड़ाव है और वही जुड़ाव उस जगह से दूर जाने पर दिखता है..
मुझे तो ये फिकर है कि चेन्नई को कोस नहीं पाउंगी अब.. :-P पर तसल्ली के लिए एक नया शहर मिल गया है बैंगलोर....
बहुत अच्छी पोस्ट है तुम्हारी....या मुझे इसलिए पसंद आई क्योंकि मेरे बारे में थी???


अब मुझे मुक्ता से यह कहना है कि वह पोस्ट मैंने अच्छी लिखी थी या नहीं यह मेरे पाठकों पर ही छोड़ दिया जाए, तो अच्छा होगा.. तुम या मैं शायद निष्पक्ष होकर नहीं बता पायेंगे कि कैसी लिखी गई थी.. मगर तुम्हे कवितागिरी का क्या शौक चर्रा गया यार? I am either totally confused or surprised.. मुझे भी नहीं पता.. :D

वैसे यह बात सही कही तुमने दोस्त कि नई चीजें स्वीकार करने में मन में अक्सर एक विरोध होता है, और वही विरोध झलकता है किसी नए शहर को कोसने में.. मगर यह सच्चाई भी है कि परिवर्तन ही संसार का नियम भी है.. खैर मैं भी क्या दर्शन बांटने लग गया हूँ.. अच्छे से कोसना नए शहर को.. :)

नोट : मेरे विचार से आज कि यह पोस्ट घोर ब्लोगरिय पोस्ट है.. :D

वैसे अगर आप इस पोस्ट को पढेंगे तभी इस पोस्ट का मुआमला कुछ-कुछ समझ में आएगा.. :)

Friday, June 04, 2010

ब्लाह..ब्लाह..ब्लाह..

"मैं बहुत कम बोलती हूं ना, सो कभी-कभी बहुत दिक्कत हो जाती है.." पिछले दस मिनट से लगातार बोलते रहने के बाद एक लम्बा पॉज देते हुये वो बोली..

कुछ दिनों से लग रहा है कि हिंदीभाषी अब धीरे-धीरे बढ़ते जा रहे हैं मेरी कंपनी में, आज से तीन साल से तुलना करने पर उत्तर भारत के अधिक लोग दिखाई पड़ते हैं अब..

"मुझे यहां कोई हेल्प नहीं किया, जो कुछ अभी आता है वो सब खुद से ही करके सीखे हैं.. अरे, मैं भी कैसी हूं ना! तभी से खा रही हूं और आपसे पूछा भी नहीं.. मेरे बगल में बैठती है ना, क्या नाम है उसका? हां *******.. अभी परसों कुछ पूछे तो डांट दी.. मुझे रोना आ गया.. अब आप ही बताईये, आपसे कोई पूछता है तो आप उसे डांट दोगे क्या? आता है तो बता दो, आपका क्या जाता है.. नहीं आता है तो वही बोल दो.. और अगर टाईम नहीं है तो यही बोल दो.. डांटने कि क्या जरूरत है? अरे ये गट्टा आपको कैसा लगा? मम्मा बनाई है.. बहुत अच्छा बनाई है.. चावल का है, बेसन का नहीं.."

वो लगातार बोले जा रही थी.. पिछले तीन महिने से वो मेरे ही प्रोजेक्ट में मगर एक दूसरी टीम में एज अ ट्रेनी ज्वाईन की है.. हर दिन दोपहर साढ़े तीन बजे के लगभग मैं कैंटीन में जूस पीने जाता हूं, आज वह थोड़ी देर से खाना खाने आयी थी तो मुलाकात हो गई.. अमूमन इस समय कोई कैंटीन में होता नहीं है, मेरे इसी समय जाने कि असल वजह थोड़ी देर अकेले बैठने की ख्वाहिश होती है और उस समय पापाजी को अक्सर फोन भी किया करता हूं.. उसने साथ बैठने का ऑफर दिया तो मैंने मना नहीं किया.. पहली बार गौर से देख भी रहा था.. अगर दूरदर्शन के गुमशुदा तलाश केंद्र वाले उसके बारे मे बताते तो वह कुछ ऐसा होता - "कद पांच फुट दो इंच, रंग गेहुवा और चेहरा गोल है, दायें आंख के ऊपर कटे का निशान है.." :D

"मेरे साथ सबसे बड़ी प्रोब्लेम ये है कि मुझे जो आता है वो मैं समझ सकती हूं, मगर दूसरे को समझा नहीं सकती हूं.." अब अगर किसी दूसरे कि बातें अपनी सी लगती है तो आश्चर्य नहीं होता.. अब लगता है कि हर कोई किसी ना किसी मायने में हर किसी सा ही होता है.. "बचपन से चेन्नई में हूं मगर तमिल में परफेक्शन अभी तक आया नहीं है.. और चाहे कुछ भी, मगर अपने लोगों का एक्सेंट इनसे अलग होता है, सो कई बातें कहना कुछ और चाहते हैं और ये समझते कुछ और हैं.." हम्म्म!! ये भी अपना भोगा सत्य है.. मगर तीन साल में ही इससे मुझे निजात मिल गई है.. यह तो बचपन से है, अभी तक अपना एक्सेंट बदल नहीं पायी है.. हद्द है भाई.. "मुझे यहां काम करने में बिलकुल मन नहीं लगता है, मुझे जो टेक्नोलोजी पसंद है उस पर काम नहीं करा के मुझे विजुअल बेसिक पर काम दे रखा है.. मुझे जावा पसंद है.." यह कौन सी नई बात है.. यहां तो हर दुसरे प्रोजेक्ट में जाने पर एक नई टेक्नोलोजी पर काम करना पड़ता है.. मगर सोचने कि रफ़्तार बढती ही जा रही थी, वैसे भी अगर आप बोल नहीं होते हैं तो कुछ सोच रहे होते हैं..

वहां से उठने से पहले मैंने उसे सिर्फ इतना ही कहा कि अगर कोई भी डांटे तो उसी समय उसे बोल दो कि "यू शुड नॉट टॉक विथ मी लाईक दिस. इफ यू हैव एनी प्रोब्लेम देन गो थ्रू प्रोपर चैनल..".. "ओह!! ऐसा होता है क्या?".. "हां! कोई ऐसे ही किसी को नहीं डांट सकता है.. चाहे कोई भी हो, CEO ही सही.. कम से कम इस कंपनी में तो ऐसा ही है.."

अभी कुछ दिनों पहले मेरा एक मित्र भी कुछ ऐसे ही सवाल पूछ रहा था और शिकायत कर रहा था कि कोई मदद भी नहीं करता है.. शुरूवात में मेरी भी यही समस्या थी.. अब लगता है कि मैं इन सबसे ऊपर उठ चुका हूं.. ;)

जिस तरह से लगातार बोले जा रही थी, उससे तो मैं इसी बात पर खुश हूं कि मुझे इस तरीके का कोई सवाल नहीं पूछना पड़ा कि "हां बसंती, तुम्हारा नाम क्या है?" :D

Tuesday, June 01, 2010

एक शहर, मसरूफियत और जिंदगी

अब उसका यहाँ चेन्नई से जाना लगभग तय हो चुका है.. एक तरह का काउंटडाउन चल रहा है.. कल तक जब उसका जाना तय नहीं था तब वह हर दूसरे-तीसरे दिन चेन्नई को कोसती हुई मिलती थी.. और किसी तरह यहाँ से भागने कि इच्छा जताती रहती थी.. दफ्तर में वर्क प्रेसर भी सामान्य से कुछ अधिक ही था उसे, ऊपर से अपने टीम के भीतर की राजनीति में भी बुरी तरह पिसी हुई थी.. कुल मिलाकर माहौल कुछ ऐसा बन भी चुका था कि कोई भी वह शहर ही छोड़ कर भागने को छटपटाने लगे..

जिसके बारे में बता रहा हूँ उसका नाम मुक्ता है..

कल मैंने उसे अपने घर खाने पर बुलाया था, और एक अरसे बाद कई घंटे बैठ कर बातें हुई.. जिंदगी मुसलसल कुछ इस तरह उलझा देती है कि एक ही शहर में रहते हुए भी मसरूफियत में मिलने का ख्याल भी नहीं आ पाता है.. उसका कहना था कि जमाने बाद पूरी खा रही है(मैंने जो बनाया था, वही तो खायेगी न :))..

इससे दोस्ती भी अजीब तरीके से हुई.. यह मेरी कालेज के मित्र कि मित्र है, और जब TCS वालों ने इसकी पोस्टिंग चेन्नई दे दी तब मेरी मित्र की मित्र ने इसे मेरा नंबर देते हुए कहा की "प्रशान्त चेन्नई में है, और उससे जो भी मदद करने को कहोगी, वह कर देगा".. अब मैंने कितनी मदद की, इसका हिसाब तो इसे ही बैठाने दिया जाए..

यह कई दिनों से चेन्नई से बाहर जाने कि जुगत में लगी हुई थी, मगर TCS के भीतर ही.. यह प्रयास कर रही थी Relocation का.. पहले इसके जाने का दिन भी तय हो गया था.. मगर फिर अचानक से इसे कहा गया कि चाहे कुछ भी हो, छः महीने से पहले टीम से Release नहीं किया जा सकता है.. ठीक उसी समय इसे Wipro में नई नौकरी मिल गई और आनन-फानन में Resign मार कर निकल गई वहां से..

अब जब इसके जाने के दिन पास आ गए हैं तब इसकी बातों में चेन्नई को लेकर कोई कसक नहीं दिख रही थी, उल्टा कहीं ना कहीं इस शहर से एक लगाव सा भी झलक रहा था.. इसका कहना था, "इस शहर ने मुझे बहुत कुछ सिखाया है.. कम से कम एक इंसान के कई चेहरे के दर्शन मुझे चेन्नई में ही हुए".. मेरा मानना है कि अगर हालात बहुत कठिन हों तो आपको कई बातें अपने आप ही सिखने को भी मिल जाती है..

चेन्नई शहर में रहते हुए भी पहले साल में सिर्फ एक बार इससे मिला था.. अगर दूसरे साल कि बात याद करूँ तो इससे हुए मुलाक़ात को भी अँगुलियों पर गिन सकता हूँ.. मगर हाँ, पिछले छः महीने में इससे मिलने कि रफ़्तार में कुछ तेजी आई थी.. अकेलेपन कि कुछ साथियों में इसका नाम भी शुमार कर सकता हूँ.. जब यह चेन्नई में ही थी तब भी कम ही मिलता था.. हम दोनों कि ही अपनी व्यस्तताएं थी.. अब भी कम ही मिलूँगा.. मगर एक-एक करके साथियों का चेन्नई छोड़ कर जाना अखर रहा है..

यह जब परेशान थी तब मैं चाहता था कि इसे कोई नई नौकरी मिल ही जाए चेन्नई से बाहर, जिस दिन इसे नौकरी मिली उस दिन मैं भी खुश था कि चलो इसे टेंशन से छुटकारा तो मिला.. मगर जैसे-जैसे इसके जाने के दिन आ रहे हैं, वैसे-वैसे कुछ अच्छा नहीं लग रहा है.. कम से कम एक तसल्ली तो है कि अधिक दूर नहीं है, बैंगलोर में ही तो रहेगी.. फिलहाल तो चेन्नई में एक और साथी कि कमी महसूस होगी..

इस चित्र में - यह चित्र इसके फेसबुक के प्रोफाइल से लिया हूँ मैं..

मुझे पता है कि यहाँ "मसरूफियत" कि स्पेलिंग सही नहीं है, क्या कोई मुझे बताएँगे कि सही क्या है?

Monday, February 15, 2010

समय बड़ा बलवान हो भैया!!

जैसे-जैसे समय भागता जा रहा है, ठीक वैसे-वैसे ही मायूसी भी बढ़ती जा रही है.. लगता है जैसे दोनों समानुपाती हैं.. डर लगता है, कहीं मायूसी डुदासी का और उदासी अवसाद का सबब ना बन जाये.. मुझे इस मायूसी के कारणों का भी ज्ञान है, मगर वे कुछ वैसी ही बातें हैं जिसे मैं किसी से भी बांटना नहीं चाहूंगा!! देखता हूं कि आगे क्या होता है? वैसे भी कहा गया है, "समय से पहले और भाग्य से अधिक किसी को कुछ नहीं मिलता है" और मजे कि बात ये है कि आजकल मैं ये मानने भी लग गया हूँ..

कल रात बैंगलोर से बस पकड़ते समय मम्मी को एक एस.एम.एस.लिखा था.. "miss you mommy!! :'( "

Monday, February 08, 2010

दिल में बैठा एक डर

सुबह अमूमन देर से उठता हूं, दफ़्तर का समय भी कुछ उसी समय होता है.. मगर आज जल्दी नींद खुल गई.. सुबह के दैनिक क्रिया से निवृत होकर अपना मेल बाक्स चेक कर ही रहा था कि उधर से मेरे मित्र का फोन आया.. बेहद हड़बड़ी में था.. हेलो बोले बिना बोला "जल्दी से मेरे लिये पटना का एक फ्लाईट बुक करा दो".. उसका इतना कहना था और मैं समझ गया कि मसला क्या है.. मगर फिर भी प्रतिक्रिया में मेरे मुंह से अचानक निकल गया, "पटना!! क्यों क्या हुआ?" उधर से बस इतनी आवाज आई "पापा!!" और फफकर रोने लगा.. दो-तीन सेकेण्ड बाद फोन काट दिया.. मिनट भर किंकर्तव्यविमूढ़ जैसी स्थिति में रहने के बाद मैंने नेट पर टिकट चेक किया और नेट पर टिकट मिलने में देर लगने कि स्थिति जान अपने दूसरे मित्र को फोन किया, कि तुम टिकट बुक कराओ और मैं उसे लेने घर से निकलता हूं..

दो मिनट के भीतर मैं घर से बाहर अपने बाईक पर था.. बाईक चलाना मेरे शौक में शामिल होते हुये भी चलाने में दिल नहीं लग रहा था और इसी कारण से मैंने अपने घर से अशोक पिलर तक की दूरी नापने में अभी तक का सबसे अधिक समय लगा.. बहुत संभल कर और धीरे-धीरे चला रहा था.. रास्ते में दो-चार आंसू भी ढलक गये..

बाद में जब अपने मित्र को फ्लाईट पर चढ़ा कर वापस घर आया तब जाकर यह अहसास हुआ कि दुःख से अधिक मन में कहीं डर बैठा था.. कभी ना कभी मेरे साथ भी यही होने वाला है जैसा डर.. अपने आस पास खुद से बड़े उम्र के लोगों में ऐसी स्थिति पहले भी देखी है, यहां तक कि अपने पापा-मम्मी के साथ भी.. मगर अपने बेहद अभिन्न मित्र के साथ भी ऐसा ही होने पर मन बेहद टूटा सा महसूस हो रहा है..

बार-बार सोच रहा हूं, "क्या इसी के लिये हमें घर से बाहर निकलना पड़ता है? जिसे लोग जीवन कि उन्नति समझते हैं वो ऐसे कीमत पर भी मिले तो भी क्या हम सफल होते हैं?" अभी मेरे मन में श्मशान वैराग्य जैसा कुछ भी नहीं है.. थोड़े से आक्रोश के साथ थोड़ी सी लज्जा भी है मन में इस जीवन के प्रति.. अपनो के लिये कुछ ना कर पाने कि छटपटाहट भी है साथ में..

लज्जित हूं अपने मन में आयी एक बात को लेकर.. मन में एक बात आयी थी कि कुछ और बेहतर स्थिति में आने पर पापा-मम्मी को लेकर अपने पास आ जाऊंगा.. फिर मुझे इसमें अपना स्वार्थ दिखने लगा.. जिस जगह उन्होंने अपना पूरा जीवन गुजार दिया, उसे छोड़ कर आने में क्या उन्हें कष्ट नहीं होगा? और मैं सब छोड़ कर वापस जाने कि स्थिति में हूं नहीं..

अजीब सा कश-म-कश चल रहा है मन में.. जीवन कि विडंबनायें भी अजीब होती हैं..

चलते-चलते : वैसे यह अजीब शब्द भी कुछ अजीब नहीं होते हैं!! कुछ समझ में ना आये तो वह अजीब.. कुछ लीक से हटकर घटे तो वह अजीब.. नई चीज अगर समझ में ना आये तो वह अजीब.. यूं तो इस संसार में हर कोई किसी ना किसी मायने में अजीब ही होते हैं..

अभी एक दो दिन पहले कि ही बात है.. हम चार मित्र बैठकर यूं ही बातें कर रहे थे.. मेरे मित्र ने बातों ही बातों में कहा कि उसके गांव के लोगों का मानना है कि अगर इस गांव में किसी एक कि मौत होती है तो एक के बाद एक लगातार चार और लोगों कि भी मृत्यु होती ही है और अभी तक दो लोगों कि मृत्यु हो चुकी है.. हमने मजाक ही मजाक में कहा कि हम सभी मिलकर तुझे ही मार देते हैं.. आज जब उसे विदा करने को फिर से हम चारों मित्र एयरपोर्ट पर थे तब वही बात उठी, और हमारा कहना था कि अब अगर ऐसे हालात हों तो इस अंधविश्वास पर हमारे मित्र का विश्वास और भी बढ़ जायेगा, और एक तरह से यह भी और दो का इंतजार करने लगेगा.. जब हम ये बातें कर रहे थे तब हमारा मित्र कहीं और गया हुआ था..

कुछ बाते जो मुझे हद्द दर्जे तक परेशान करती हैं.. हमेशा..

अमूमन मेरी कोशिश रहती है कि हद तक किसी से झूठ ना बोलूँ.. मगर एक आम इंसान कि तरह सच को मैं भी छुपाता हूँ.. खासतौर से जब पूरी तरह से मेरी बात हो तब झूठ बोलने कि अपेक्षा मैं कुछ ना कहना ही पसंद करता हूँ.. वैसे भी मेरे साथ ऐसे किस्से कम ही आते हैं जब मुझे किसी से अपने बारे में कोई बात छुपानी पड़ी हो.. नहीं तो आमतौर से कोई मुझसे मेरे बारे में कुछ भी पूछता है तो मैं बिना किसी लाग लपेट के सही सही बता देता हूँ.. जीवन के कई मोड पर इससे कई बार नुक्सान भी उठाना पडा है, मगर फिर भी मेरे लिए चलता है.. मैं यहाँ सिर्फ और सिर्फ अपने बारे में ही लिख रहा हूँ, अगर बात किसी और के बारे में है तो मैं अक्सर उन विषयों पर बाते ना करके उसे छिपा भी जाता हूँ.. मैं भला क्यों किसी और कि परेशानी की गवाही किसी और के सामने क्यों दूं?

मेरे जिंदगी का सौ फीसदी ना भी तो कम से कम नब्बे फीसदी बाते मेरे आस पास रहने वाले लगभग सभी को पता है.. मगर बाकी के दस फीसदी फिर भी मुझे कभी ना कभी कुरेदती है.. अंदर तक भेदती है.. लगता है कि मैं जमाने से नहीं, खुद से ही कुछ छिपा रहा हूँ.. और वे बाते ऐसी हैं जिसे मैं सिर्फ अपने लिए ही छोड रखा है.. भला कुछ तो अपना हो, हर बात दूसरों को कह कर दिल कि भड़ास निकाल लेना भी ठीक नहीं.. मगर वह जो मन के अंदर है, उससे कुछ हमेशा सा रिसता सा महसूस होता रहा है.. टीस हमेशा उठती रही है.. कभी-कभी सोचता हूँ कि यह भी किसी बेहद अपने को सूना कर मन हल्का कर लूं.. अपने आस पास तलाशता हूँ किसी ऐसे उपयुक्त शख्स को.. मगर कोई मिलता नहीं, और शायद उन बातो को मैं किसी से बांच सकूं.. ऐसा कोई मिलेगा भी नहीं.. अपनी उन कमियों को मैं किसी के सामने जाहिर नहीं कर सकता.. खुद कि उन कमियों से खुद को मैं किसी के भी सामने कमजोर नहीं देख सकता.. वैसे यह ब्लॉग ही है जो मेरे हर कन्फेशन को शांति से सुनता रहा है.. मगर इस ब्लॉग के हिस्से भी वे दस फीसदी नहीं हैं..

ऐसी कई बाते हैं, जिसे सुनकर जो भी मेरा भला चाहते हैं वे मुझे कम से कम घंटे भर का लेक्चर भी सुनायेंगे.. पता नहीं इंसान अपनी कमजोरी से हमेशा क्यों भागना चाहता है.. कुछ कुंठाएं अगर मन में बैठी हों तो सारे जमाने कि कुंठाए क्यों दिखने लगती है?

आज फिर जाने क्या-क्या बकवास लिखने बैठ गया हूँ..


चलते-चलते : कई लोग मुझसे कहते हैं कि मैं पुरानी बाते बहुत सोचता हूँ.. कंचन दीदी ने तो मेरा नाम ही नौस्टैल्जिया ही रख दिया है.. यहाँ मैं कुछ पुरानी बातों का जिक्र करते हुए भी नौस्टैल्जिक टाइप नहीं लिखा.. वैसे मूड तो अभी भी कुछ-कुछ वैसा ही है.. :)

Monday, January 18, 2010

ख्यालातों के अजीब से कतरन

रात बहुत हो चुकी है, अब सो जाना चाहिये.. कहकर हम दोनों ने ही चादर को सर तक ढ़क लिया.. वैसे भी चेन्नई से बैंगलोर जाने वाले को ही समझ में आता है कि सर्दी क्या होती है, और अगर किसी तमिलियन को सर्दी के मौसम में दिल्ली भेज दो तो जिंदा या मुर्दा, मगर अकड़ा हुआ शरीर ही वापस आयेगा..

यूं तो कुछ दिन पहले भी बैंगलोर गया था.. उसी मित्र के यहां ठहरा था.. अमूमन इससे पहले मैं अपने कालेज वाले मित्र के घर ठहरता था, मगर पिछले दो-तीन बार से कालेज से बहुत पहले के जमाने के मित्र के घर ठहर रहा हूं..

चादर से थोड़ी देर बाद सर निकाल कर फिर एक नई बात निकल आती है, और हम दोनों ही उचक कर बैठ जाते हैं.. कौन मित्र कहां है? अभी कौन क्या कर रहा है.. जिंदगी में अभी तक क्या-क्या झेला है.. कुछ ऐसे मित्र जो अच्छे या बुरे थे.. एक तरह का गौसिप ही समझ लें.. बात निकल आती है..

मेरे कालेज के मित्र अक्सर मुझसे कहते हैं कि तुम अक्सरहां बहुत रिजर्व रहते हो, और अपना इमेज कुछ ऐसा बना लेते हो कि कोई कुछ कहने-पूछने में भी तुमसे डरने लगता है.. मगर वे यह नहीं जानते हैं कि जो मेरी जिंदगी में खुद अपनी जगह बनाते चले जाते हैं, उन्हें मैं कभी रोकता नहीं हूं.. मेरे बहुत कम और गिने-चुने ऐसे ही दोस्तों, जो पूरे अधिकार से मुझे कुछ भी कह-सुन लेते हैं, इन में से एक यह भी है.. रविन्द्र.. इसके अलावा कुछ और नाम सोचता हूं तो, एक विद्योतमा(रूबी) थी(अब कहीं इस दुनिया में खो गई है, पता नहीं कहां और कैसी होगी).. स्वाति थी(उसका भी कुछ पता नहीं).. एक मनोज है.. शिल्पी.. विकास को इसमें नहीं रखता हूं, उसे मैंने खुद बिना स्पेस मांगे मैंने दे दिया है.. सो इस लिस्ट में वह नहीं है.. शायद बस इतना ही..

सोचने की बिमारी बहुत पुरानी है.. किसी से कुछ कह दिया, तो उसके बारे में सोचता हूं.. किसी ने कुछ कह दिया, तो खूब सोचता हूं.. किसी ने कुछ नहीं कहा, तब भी सोचता हूं.. रिश्तों की बात आती है, चाहे वह खून का रिश्ता हो या फिर दोस्ती का, तब सोच-सोच कर पगला ही जाता हूं.. पुराने दिनों को भी खूब याद करता हूं.. अच्छे पल भी याद आते हैं, बुरे पल भी.. मगर कमबख्त याद बेहिसाब आते हैं.. वो शहर भी याद आता है.. वह लड़की भी याद आती है.. उसके घर को जाने वाली गली याद आती है, राजेन्द्र नगर रोड नंबर दो.. वह गीत भी याद आता है, जिसे सुनकर वह रो दी थी.. लगता है जैसे कुछ बदलना है पीछे जाकर.. अपनी कुछ गलतियां सुधारनी है.. मगर आगे आने वाली गलतियों का क्या? क्या उसे कोई माफ़ करेगा? क्या मैं उनकी गलतियों को माफ करूंगा? कहना आसान होता है, मगर करना मुश्किल..

अब नौस्टैल्जिक होना बेवकूफी कहलाती है.. और जरूरत से अधिक ईमानदार होना दूसरे के मन में शक पैदा करता है.. किसी का जरूरत से अधिक ख्याल कर जाता हूं तो अगले ही पल यह डर बैठ जाता है कि इससे कहीं वह इरीटेट तो नहीं हो गया होगा/होगी? तकलीफ में हूं, मगर जैसे ही कोई चैट बाक्स ऊछलकर सामने आ जाता है वैसे ही एक स्माईली बना देता हूं और सामने वाला समझता है कि बंदा बहुत खुश है.. उसकी स्माईली देखकर मुझे भी उसकी खुशी से ईर्ष्या होती है..

आज ही विकास का भेजा एक मेल पढ़ा जिसमें ग्राफ बना कर समझाया हुआ था कि इंटरनेट पर लोग अधिक ईमानदारी दिखाते हैं.. मन में आया कि जैसे जैसे संवाद एकतरफ़ा होता जाता है वैसे-वैसे ही ईमानदारी का लेवल भी बढ़ता जाता है.. पहले फोन फिर एस.एम.एस. और अब इंटरनेट ईमानदारी का पैमाना बन गया है.. सच भी है, नहीं तो इतनी रात गये कौन मेरी इस ईमानदारी से लिखी बातों को सुनेगा..

"याद है, पहले दिन बी.सी.ए. में तुम्हारे साथ तुम्हारे कालेज गया था.. उसे देखकर मैंने कहा था कि अगर यहां पर कोई तुम्हारे लायक है तो वह वही है.. और कोई उसके लायक है तो वह तुम ही हो.." रविन्द्र मुझसे कहता है.. मैं आगे जोड़ देता हूं, "और मैंने कहा था कि, तुझे जहां कोई खूबसूरत लड़की दिखी नहीं कि बस वहीं चालू हो जाते हो.." आज से नौ साल पहले हुये इस बात को याद करके दोनों ठहाके लगाते हैं.. फिर एक चुप्पी छा जाती है.. लगभग दस मिनट बाद मैं अपने मोबाईल पर गाना बजाने लगता हूं.. "तुम मुझे यूं भुला ना पाओगे.." लाता की आवाज कानों में मिश्री घोलने लगती है.. आधे मिनट बाद रविन्द्र कह उठता है.. काश जिंदगी को रिवाईंड कर पाते.. बीच में रविन्द्र बोलता है, "अबे तुम खुद तो सेंटी हो ही रहे हो, मुझे भी सेंटी कर रहे हो.." मैं अनसुना कर जाता हूं और आंखे बंद कर अपनी जिंदगी रिवाईंड करने लग जाता हूं..

होस्टल में रात भर जागकर गौसिप कर रहा हूं दोस्तों के साथ.. बैंगलोर में मुझसे मिलने के लिये वह आयी थी और उसका चेहरा खिला हुआ था.. विकास के साथ पहली बार बैंगलोर गया था.. उसके गोद में सर रख कर लेटा हुआ हूं और वह तिनकों से मेरे कान में गुदगुदी कर रही है.. रविन्द्र के साथ पटना की सड़कों पर गाड़ी दौड़ा रहा हूं.. मनोज को लेकर घर में बिना बताये "गांधी सेतू" पर पर स्कूटर दौड़ा रहा हूं.. शिल्पी मुझे पहली बार राखी बांधते कितनी इमोशनल हो गई थी.. रविन्द्र उसे लेकर कालेज के पहले दिन कितना चिढ़ा रहा है और मैं रविन्द्र को गरिया रहा हूं.. चक्रधरपुर के स्कूल में खो-खो खेल रहा हूं.. दीदी-भैया से लड़ाई कर रहा हूं.. मम्मी के डांटने पर मम्मी के ही पल्लू में छिपने की कोशिश कर रहा हूं.. पापा के गोद में सिमट कर सो रहा हूं और पापा जी मुझे कोई कविता या कहानी सुना रहे हैं..

बस यहां तक आने पर मन को सुकून मिल जाता है और नींद आने लगती है.. कड़वे पलों को याद करने का मन नहीं था उस वक्त.. किसी ने सच ही कहा है कि, "जिन्हें नींद नहीं आती वह अपराधी होते हैं.." आज फिर जाने कैसे अपराधबोध मन में लिये अभी तक जाग रहा हूं..

Tuesday, January 05, 2010

खुशियों का जरिया : ई-मेल या स्नेल-मेल


अभी थोड़ी देर हुये जब बीबीसी के हिंदी ब्लौग पर सलमा जैदी जी को पढ़ा, जिन्होंने नये साल में मिले ग्रीटिंग कार्ड को लेकर अपनी खुशी जाहिर की है.. और यह संयोग ही है कि आज ही मेरी प्यारी बहन और उतनी ही प्यारी मित्र स्नेहा का नये साल का ग्रीटिंग कार्ड के साथ हस्तलिखित खत भी मिला है..

उस पर भी तुर्रा यह कि खत पूरी तरह से अंग्रेजी में नहीं है, बल्कि हिंदी और अंग्रेजी का मिश्रण है.. जिसकी उम्मीद मुझे तो बिलकुल नहीं थी.. नहीं तो हस्तलिखित देवनागरी देखे ही जमाना बीत गया है(पिछली बार जब फुरसतिया जी चेन्नई यात्रा पर थे तब उन्होंने दो किताबें उपहार में मुझे दी थी, जिसपर उन्होंने देवनागरी में लिखा था..)

खैर फिलहाल तो मैं वह खत फिर से पढ़ रहा हूं.. ये कुल जमा चौथी बार है उसे पढ़ते हुये.. इससे पिछली दफ़ा मुझे हाथों से लिखा खत मेरी मित्र अर्चना ने भेजा था जब वह मेरे लिये यूएस से आई-पॉड लायी थी और फिर उसे मुंबई से चेन्नई कूरियर की थी..

इस ई-मेल के जमाने में आपको आखिरी हस्तलिखित खत कब मिला था? :)

Monday, October 19, 2009

दिवाली की रात मेरे घर में भूतों का हंगामा


इसमें मैं यह नहीं लिखूंगा की दिवाली की रात हमने कैसे दिये जलाये? क्या-क्या पकाया? और कितने पटाखे जलाये.. ये सब तो लगभग सभी किये होंगे.. मगर दिवाली कि रात कुछ हटकर अलग सा कुछ हो तभी तो मजा है, और वो भी अनायास हो तो सोने पे सुहागा.. तो चलिये सीधे किस्से पर आते हैं..

दिवाली मनाने के बाद हम सभी मित्र खाना खाकर सोने चले गये.. मेरा एक मित्र(नाम नहीं बताऊंगा नहीं तो बाद में बहुत गरियायेगा) :) मेरे घर पर ही रात में रोक लिया गया और उसके लिये बिस्तर मैंने अपने बगल ही लगा दिया.. लगभग रात साढ़े बारह बजे तक हम दोनों टी.वी. देखते रहे और कुछ बाते करते रहे, इस बीच मेरे बाकी दो मित्र सो चुके थे.. एक बजे तक हम दोनों भी सो गये..

मैं गहरी नींद में था तभी अचानक से मुझे अजीब तरीके से किसी के चीखने की आवाज आई, जैसे कोई चुड़ैल चिल्ला रही हो.. कम से कम वह किसी इंसान के चीखने की आवाज तो नहीं थी(नींद में तो ऐसा ही लग रहा था).. उसी समय मैंने एक हाथ अपने गले पर पाया.. अब तक मेरी नींद नहीं खुली थी और मैं काफी हद तक डर गया था और डर के मारे चिल्लाने लगा.. तभी एक भारी सी चीज मेरे ऊपर कूद पड़ी.. अब तक मेरी हालत खराब हो चुकी थी.. एक तो कोई अजीब तरीके से चिल्ला रहा था.. दूसरा मेरे गले को पकड़ने की कोशिश में था.. तीसरा कोई मेरे ऊपर कूद भी रहा था जिसका वजन कम से कम 2-3 किलो रहा होगा..

डर के मारे मैं भी चिल्लाने लगा और हाथ इधर-उधर फेंकने लगा.. मेरे हाथ में किसी के सर का बाल आ गया और मैंने उसे जोड़ से पकर कर खींचने लगा.. यह तमाशा लगभग एक मिनट तक चला और तब तक मेरी और मेरे मित्र की नींद भी खुल गई.. हम दोनों ही अकबका कर उठ बैठे थे और अंधेरे में ही कुछ देखने की कोशिश कर रहे थे.. तब तक मेरे बाकी दो मित्र जो दूसरे कमरे में सो रहे थे वो दोनों भी हमारे दरवाजे पर आकर खड़े हो गये थे और बत्ती जला चुके थे..

तब जाकर सारा माजरा समझ में आया.. मेरा मित्र जो मेरे बगल में सोया हुआ था वह नींद में कोई सपना देखकर डर गया था और चिल्ला पड़ा था.. साथ ही उसने मेरा हाथ पकड़ना चाहा तो मेरी गरदन उसके हाथ में आ गई थी.. इसी बीच एक बिल्ली, जो मेरे कमरे में घूम रही थी, इस हंगामे से डरकर भागना चाही और मेरे ऊपर ही कूद गई.. उसके कूदने से मैं भी डरकर चिल्लाने लगा और इसी बीच मेरे हाथ में मेरे मित्र के सर का बाल आ गया.. अब हम दोनों चिल्ला रहे थे और वो मेरा गला पकड़ कर हिला रहा था और मैं उसके सर का बाल पकड़ कर खींच रहा था.. और हमारे बाकी दोनों मित्र हंसे जा रहे हैं..

खैर नींद टूटने से सारा माजरा तो समझ में आ गया, मगर दिवाली की रात फिर हम दोनों सो नहीं सके.. मेरा मित्र उस सपने से बहुत डरा हुआ था.. और मैं डरा हुआ था कि कहीं ये नींद में फिर से मेरा गला ना दबाने लग जाये ;).. साथ ही एक ने रसोई की बत्ती जला दी, और उस रोशनी से भी मुझे नींद नहीं आ रही थी.. :)

Wednesday, September 02, 2009

ओनम के अवसर पर मेरे ऑफिस में फूलों से बनी कुछ रंगोली

ओनम के अवसर पर मेरे ऑफिस में 31 अगस्त को फूलों से बने रंगोली की प्रतियोगिता रखी गई थी.. उसमें जितने रंगोली बनाये गये थे उन सभी की तस्वीर मैंने अपने मोबाईल कैमरा से उतार ली थी.. सबसे नीचे वाली रंगोली को विजेता घोषित किया गया था..












Monday, June 29, 2009

15 रूपये कि एक मुस्कुराहट और ट्रैफिक सिग्नल

अपने ऑफिस के बाहर वाले पार्किंग में खड़ा मैं फोन पर किसी से बातें कर रहा था.. तभी नीचे से कुछ आवाज आई.. मैंने देखा तो पाया की एक 3-4 साल की बच्ची थी और उसके गोद में भी एक 5-6 महिने का बच्चा था.. मैंने उसे भीख मांगने वाली समझ उसे इसारे से मना किया, कि मैं कुछ भी नहीं दूंगा.. उसने कहा, "अन्ना, नो मनी.." मैं फोन पर भी बातें कर रहा था, सो उसकी बात समझने में थोड़ा समय भी लगा और जब तक समझ में आता तब तक वो वहां से भाग गई..

मुझे कुछ समझ में नहीं आया कि वो बच्ची चाह क्या रही थी? फोन पर ही बातें करते हुये मैंने देखा कि वह वहां खड़े लगभग हर किसी से तमिल में कुछ कह रही थी और सभी उसकी बात सुनकर या तो अनसुना कर रहे थे या फिर उसकी हंसी तमिल में ही कुछ कह कर उड़ा रहे थे..

पहली नजर में मुझे लगा कि उस बच्ची को भूख लगी है.. वहीं एक चाय वाला भी बैठता है जो कटिंग वाली चाय के साथ बिस्किट और ब्रेड भी रखता है.. मैंने उसे अपने पास बुला कर अंग्रेजी में उसे समझाने की कोशिश की, और बोला कि तुम्हे जो चाहिये वो ले लो.. मगर वो वहां से भी भाग गई..

मुझे कुछ समझ में नहीं आया कि ये इस तरह से क्यों कर रही है.. एक छटपटाहट उसके चेहरे पर साफ झलक रही थी, और कारण मेरी समझ से बाहर थी.. तमिल ना आने का अपह्सोस मुझे शायद सबसे ज्यादा उसी समय हो रहा था.. तभी मैंने देखा कि चाय वाला उसे डांटते हुये कुछ बोल रहा था, टूटी-फूटी तमिल में मैं इतना समझ गया कि वह बच्ची चाह क्या रही थी..

वहीं पार्किंग के पास एक आईसक्रीम वाला भी था, और वह किसी भी तरह एक आईसक्रीम खाना चाह रही थी.. उस चाय वाले की बात मुझे यह समझ में आयी थी कि वह कटाक्ष करते हुये बोल रहा था जिसको हिन्दी में हम कुछ ऐसे कहते हैं, "अपनी औकात देखी हो, आईसक्रीम खाना चाह रही हो.. भागो यहा से और मेरे कस्टमर को परेशान मत करो.."

उसे मैंने अपने पास बुलाया, मगर वह नहीं आयी.. शायद डर गई थी.. आईसक्रीम वाले के पास जाकर मैंने उसे बुलाया तो वह झट से मेरे पास चली आयी.. मैंने आईसक्रीम वाले को बोला कि इसे जो भी आईसक्रीम चाहिये इसे दे दो.. वो आईसक्रीम वाला मुझे ऐसे देखा जैसे मैं पागल हो गया हूं.. मैंने फिर से उसे कहा तो वह चुपचाप उस बच्ची से पूछकर उसे आईसक्रीम दे दिया..

उस बच्ची के चेहरे पर अपार संतोष का भाव साफ दिख रहा था.. मैंने फिर एक अद्भुत बात देखी, वह बच्ची धीरे-धीरे करके सारा आईसक्रीम अपने गोद वाले उस छोटे बच्चे को खिला दी जिसे आईसक्रीम क्या होता है इसकी समझ भी ना होगी.. खुद उसे चखी भी नहीं..

जाने क्यों मुझे अपनी दीदी की बड़ी बेटी याद आ गई, जो कमोबेश उसी कि उमर की होगी.. जो आईसक्रीम के लिये अपना मुंह भी खोलती है तो 1 किलो वाला आईसक्रीम का पैकेट घर में आ जाता है.. अभाव क्या होता है वह उसे पता भी नहीं, दुनियादारी तो दूर की बात है..

एक डर सा लगने लगा.. इंडिया जगमगा रहा है, मगर भारत अपनी गरीबी पर रो रहा है.. तभी ट्रैफिक के शोर ने मेरा ध्यान अपनी ओर खींचा.. पास वाले सिग्नल की लाल बत्ती जगमगा रही थी.. मैंने देखा कि वह बच्ची अपने गोद वाले बच्चे को लेकर सिग्नल की ओर जा रही है.. आगे देखना शायद मुझे अच्छा नहीं लगता, सो मैं वापस अपने ऑफिस के अंदर चला आया..

Friday, June 12, 2009

मेरे घर के आगे एक रंगोली

नये घर में शिफ्ट हुये एक महिना बीत चुका है.. तो महिने का किराया देने का भी समय आ गया था.. 50 रूपये बरामदा साफ करने वाले को भी देना था.. हमारा कहना था कि महिना में एक दिन भी उसने आकर साफ सफाई नहीं की है तो हम 50 रूपये क्यों दें? तो बस उसी दिन सफाई करने वाली आयी और उसने बरामदा साफ करके दरवाजे पर रंगोली भी बना गई.. ये उसी रंगोली कि तस्वीर है..



इस तरह कि रंगोली आप दक्षिण भारत के लगभग हर घर के आगे सुबह-सुबह देख सकते हैं.. वैसे मेरे दोस्तों का कहना था कि वह 50 रूपया हम प्रशान्त को दे देते हैं, आखिर उसी ने तो महिने भर बरामदे कि सफाई की है.. ;)