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Wednesday, August 15, 2012

लोनलिनेस इज द बेस्ट फ्रेंड ऑफ़ ओनली ह्युमनस

हम हों चाहे किसी जलसे में
अकेलापन का साथी
कभी साथ नहीं छोड़ता हमारा

हम हों चाहे प्रेमिका के बाहों में
अकेलापन का साथी
कभी साथ नहीं छोड़ता हमारा

हम पा लिए हों चाहे मनुष्यता का शिरोबिंदु
अकेलापन का साथी
कभी साथ नहीं छोड़ता हमारा

हम बैठे हों किसी प्रयाग में
अकेलापन का साथी
कभी साथ नहीं छोड़ता हमारा

बुद्ध ने भी ज्ञान प्राप्त किया था
अकेलेपन में ही
हिटलर ने की थी आत्महत्या
अकेलेपन में ही
बड़ी वैज्ञानिक खोजे भी होती हैं
अकेलेपन में ही

जाने क्यों लेमिंग करता है
सामूहिक आत्महत्या?

मेरी समझ में तो
लोनलिनेस इज द बेस्ट फ्रेंड ऑफ़ ओनली ह्युमनस

Friday, September 17, 2010

एक अधूरी कविता

उस दिन जब तूने छुवा था
अधरों से और किये थे
कुछ गुमनाम से वादे..
अनकहे से वादे..
चुपचाप से वादे..
कुछ वादियाँ सी घिर आयी थी तब,
जिसकी धुंध में हम गुम हुए से थे..
कुछ समय कि हमारी चुप्पी,
आदिकाल का सन्नाटा..
अपनी तर्जनी से
मुझ पर कुछ आकार बनाती सी,
फिर हवाओं में
उस आकार का घुलता जाना..
किसी धुवें की तरह..
अभी मैं भी तो अधूरा ही हूँ..


Thursday, May 06, 2010

मैं कई बार मर चुका हूंगा - पाब्लो नेरूदा

सारी रात मैंने अपनी ज़िन्दगी तबाह की
कुछ गिनते हुए,
गायें नहीं
पौंड नहीं
फ़्रांक नहीं, डालर नहीं...
न, वैसा कुछ भी नहीं


सारी रात मैंने अपनी ज़िन्दगी तबाह की
कुछ गिनते हुए,
कारें नहीं
बिल्लियाँ नहीं
मुहब्बतें नहीं...
न!


रौशनी में मैंने अपनी ज़िन्दगी तबाह की
कुछ गिनते हुए,
क़िताबें नहीं
कुत्ते नहीं
हिंदसे नहीं...
न!


सारी रात मैंने चांद को तबाह किया
कुछ गिनते हुए,
बोसे नहीं
वधुएँ नहीं
बिस्तर नहीं...
न!


लहरों में मैंने रात को तबाह किया
कुछ गिनते हुए,
बोतलें नहीं
दाँत नहीं
प्याले नहीं...
न!


शान्ति में मैंने युद्ध को तबाह किया
कुछ गिनते हुए,
सड़कें नहीं
नगमें नहीं...
न!


छाया में मैंने ज़मीन को तबाह किया
कुछ गिनते हुए,
बाल नहीं झुर्रियाँ नही
गुम गई चीज़ें नहीं...
न!


ज़िन्दगी में मैंने मौत को तबाह किया
कुछ गिनते हुए,
क्या उस सबको भी जोड़ा जाय ?
याद नहीं पड़ता...
न!


मौत में मैंने ज़िन्दगी को तबाह किया
कुछ गिनते हुए,
नफ़ा कहूँ या नुकसान !
नहीं जानता
न ज़मीन ही...
वग़ैरह वग़ैरह..

सुरेश सलिल जी द्वारा स्पेनिश से हिंदी में अनुवादित.

नेरूदा के बारे में अधिक पढ़ने के लिए यहाँ जाएँ..

Tuesday, May 04, 2010

समाजवाद बबुआ, धीरे-धीरे आई

समाजवाद बबुआ, धीरे-धीरे आई

समाजवाद उनके धीरे-धीरे आई

हाथी से आई

घोड़ा से आई

अँगरेजी बाजा बजाई, समाजवाद...

नोटवा से आई

बोटवा से आई

बिड़ला के घर में समाई, समाजवाद...

गाँधी से आई

आँधी से आई

टुटही मड़इयो उड़ाई, समाजवाद...

काँगरेस से आई

जनता से आई

झंडा से बदली हो आई, समाजवाद...

डालर से आई

रूबल से आई

देसवा के बान्हे धराई, समाजवाद...

वादा से आई

लबादा से आई

जनता के कुरसी बनाई, समाजवाद...

लाठी से आई

गोली से आई

लेकिन अंहिसा कहाई, समाजवाद...

महंगी ले आई

गरीबी ले आई

केतनो मजूरा कमाई, समाजवाद...

छोटका का छोटहन

बड़का का बड़हन

बखरा बराबर लगाई, समाजवाद...

परसों ले आई

बरसों ले आई

हरदम अकासे तकाई, समाजवाद...

धीरे-धीरे आई

चुपे-चुपे आई

अँखियन पर परदा लगाई

समाजवाद उनके धीरे-धीरे आई ।

गोरख पाण्डेय जी द्वारा रचित(रचनाकाल :1978). उनकी अन्य रचनाएँ आप यहाँ पढ़ सकते हैं.

Tuesday, February 02, 2010

क्यों चली आती हो


क्यों चली आती हो ख्वाबों में
क्यों भूल जाती हो
तुमने ही खत्म किया था
अपने उन सारे अधिकारों को
मुझ पर से
अब इन ख्वाबों पर भी
तुम्हारा कोई अधिकार नहीं

क्यों चली आती हो ख्यालो में
कभी नींद चुराने, कभी चैन चुराने
तुमने ही तो मुझे
अपने ख्यालों से निकाल फेंका था
अब मैं तुम्हारा
बहिष्कार करना चाहता हूं
पर तुम हो कि मानती ही नहीं

मेरे हिस्से कि दिन की गरमी
से घबरा उठी थी तुम,
अब क्यों रातों कि
चांदनी चुराने आती हो
ये शीतलता ही मेरे
जीने का भरोसा है
ये जैसे तुम जानती ही नहीं

Tuesday, January 20, 2009

हर तरफ बस तू ही तू

उस मोड़ पर खड़ा था मैं फिर.. ये किसी जीवन के मोड़ कि तरह नहीं थी जो अनायास ही कहीं भी और कभी भी पूरी जिंदगी को ही घुमाव दे जाती है.. ये तो निर्जीव सड़क थी, जहां आकर मुझे अपनी आत्मा के निर्जीव होने का अनुभव सा होने लगता है.. जैसे वो था या है या ऐसा ही कुछ भी.. मगर यह सड़क हमेशा मुझे जीवंत यादों में ढ़केलता रहा है..

तुम्हें आखिरी बार आते हुये भी और जाते हुये भी यहीं से देखा था.. सफेद सूट धूप में चमक रहा था.. इतना कि दूर से नजर आ जाए.. बाल खुले थे या बंधे हुये, लंबे थे या छोटे, जब तुम चलती थी तब आवाज आती थी या नहीं, तुम हंसते या रोते समय कैसी दिखती थी, इन सबका मेरे लिये कोई अर्थ नहीं था.. तब बस तुम्हारे होना ही मेरे लिये एक अर्थ रखता था और अब तुम्हारा नहीं होना..

आखिरी बार जब हम साथ थे और खुश थे, ये वही जगह थी.. उस दिन भी बरसात हो रही थी और आज भी.. अंतर बस यह रह गया है कि उस दिन कि बरसात रूमानियत भर जाती थी और आज कि बरसात विरह.. यूं ही खड़ा भींग रहा था लेकिन मन जैसे रीता ही रह गया..

जब भी इस शहर में आता हूं तो एक बेचैनी साथ लिये जाता हूं.. मन में एक हूक सी उठती रहती है.. कभी-कभी सोचता हूं कि अपनी इस भावना कि हत्या भी कर डालूं.. ठीक उसी गीत कि तरह जो मुझे हमेशा तुम्हारी याद दिलाती थी और उसे मैं नहीं सुनता था.. एक दफे दिन-रात कई दिनों तक मैं उसी गीत को सुनता रहा, इतनी बार कि उसे लेकर मन में जो भी भाव अपनी छाप छोड़ जाते थे, वे सभी खत्म हो गये.. उसी तर्ज पर उस शहर में, उन जगहों के इतने चक्कर लगा डालो कि उनको लेकर भावनाशून्य हो जाऊं.. कोई तड़प दिल में बाकी ना रहे.. कोई कसक दिल में बाकी ना रहे.. पथराती आंखों से मैं वहां से गुजरूं, बिना कोई भाव मन में लाये..

कई बार कोशिश भी कि की तुम्हारी यादों को मिटा डालूं.. कई बार जलाने कि भी कोशिश हुई और जला भी डाला.. मगर इस शहर के रूमानियत से वह अहसास फिनिक्स कि तरह राख के ढ़ेर से फिर से जी उठता है.. जैसे लगता है कि मेरी रूह में समा चुकी हो तुम..

मेरी प्रीत भी तू,
मेरी गीत भी तू,
मेरी रीत भी तू,
संगीत भी तू..

मेरी नींद भी तू,
मेरा ख्वाब भी तू,
मेरी धूप भी तू,
माहताब भी तू..

मेरी खामोशी भी तू,
मेरी गूंज भी तू,
मेरी बूंद भी तू,
समुंद भी तू..

मेरी सांस भी तू,
मेरी प्यास भी तू,
मेरी आस भी तू,
रास भी तू..

मेरा नक़्स भी तू,
मेरी हूक भी तू,
मेरा अक्स भी तू,
मेरी रूह भी तू..

मेरा मान भी तू,
मेरा ज्ञान भी तू,
मेरा ध्यान भी तू,
मेरी जान भी तू..

मेरा रंग भी तू,
ये उमंग भी तू,
मेरा अंग भी तू,
ये तरंग भी तू..

मेरे जिगर के सरखे-सरखे में
कुछ और नहीं
बस तू ही तू..

मेरे लहू के कतरे-कतरे में
कुछ और नहीं
बस तू ही तू..

क्यों चली गयी तुम? कहां चली गयी तुम? जाना ही था तो आयी क्यों थी? किसी को दिलासा दिलाकर छोड़ जाना अच्छा नहीं होता.. आ जाओ तुम, कहीं से भी.. बस उड़कर.. देखो तुम्हारे बिना मैं कितना अकेला हूं, कितना उदास हूं..

Monday, January 12, 2009

एक कला और सिखला दो

सपने बुनने कि कला,
तुमसे सीखा था मैंने..
मगर यह ना सोचा,
सपने मालाओं जैसे होते हैं..
एक धागा टूटने से
बिखर जाते हैं सारे..
बिलकुल मोतियों जैसे..
वो धागा टूट गया या तोड़ा गया?
पता नहीं!!
लेकिन सपने सारे बिखर गये..
बिखरे सपनो को फिर कैसे सजाऊं,
तुमने यह नहीं बताया था..
खुद से इस कला को कैसे सीखूं?
आ जाओ तुम,
सिर्फ एक बार..
एक कला और सीखनी है तुमसे..

Tuesday, November 11, 2008

मेरे हिस्से का चांद



कभी देखा है उस चांद को तुमने?
ये वही चांद है,
जिसे बांटा था तुमने कभी आधा-आधा..
कभी तेज भागती सड़कों पर,
हाथों में हाथे डाले..
तो कभी उस पहाड़ी वाले शहर कि,
लम्बी सुनसान सड़क पर..
तुमने तो रेल कि,
खिड़की से झांकते चांद को भी..
बांट लिया था आधा..
मेरे आंगन में आज,
चांद चमक रहा है आधा..
शायद तुम्हारे हिस्से का है!
मेरे हिस्से वाला चांद,
तुम्हारे आंगन में होगा..
उसे लौटा दो..
मेरे हिस्से का चांद मुझे लौटा दो..



Sunday, November 09, 2008

त्रिवेणी फिर कभी, आज यह कविता सही


कविता से पहले मैं अनुराग जी को धन्यवाद देना चाहूंगा कि उन्होंने मुझे त्रिवेणी संबंधित कुछ बढिया बाते बताई.. वैसे मैंने एक लिखी भी है मगर वो किसी और में डालूंगा.. पता नहीं वो त्रिवेणी ही है या कुछ और.. :)
परछाई

किसी परछाई का हाथ थामा है आपने?
मैंने थामा था एक बार..
कोरोमंगला कि तेज-भागती सड़कों पर..
हल्की बारिश कि बूंदों के बीच..
ट्रैफिक के हूजूमों में..
कभी ऑटो वाले को रुकने का
इशारा करते हुये..
तो कभी उसकी
खिलखिलाती हंसी के बीच..

अब भी उन सड़कों पर पहूंच कर,
अपने अस्तित्व का अहसास
खत्म सा महसूस होता है..
मानो पूरी दुनिया किसी परछाई में,
सिमट कर रह गई हो..
यह परछाई दिनो-दिन
और गहरी होती जाती है..
जैसे अमावस रात कि कालिमा..
फिर भी अच्छा लगता है,
उस परछाई का हाथ थामना...

Sunday, October 12, 2008

इंतजार है मुझे(एक कविता मनोज द्वारा)


जाने किसका इंतजार है मुझे..
जब घर में अकेला होता हूं मैं,
सन्नाटों से घिरा होता हूं मैं..
कोई आहट सी होती है तो,
चौंक जाता हूं..
दरवाजे पर निगाहें टिकी होती है,
दस्तक कोई दे रहा हो जैसे..
जाने किसका इंतजार है मुझे..

अखबारों को पलटते समय,
निगाहें बेकरार होती है जैसे..
हर खबर को पढकर,
कुछ ढूंढती हुई निगाहें जैसे..
अखबारों के हर पन्ने से,
खेल रहा होता हूं मै..
जाने किसका इंतजार है मुझे..

कभी चबूतरे पर बैठा हुआ,
सड़कों पर नजरें जमाये,
कुछ सोचते हुये..
दौड़ते-भागते गाड़ियों में जैसे,
कुछ ढूंढ रहा होता हूं मैं..
जाने किसका इंतजार है मुझे..

भीड़ में चलते लोगों में,
किसी को पहचानने कि
कोशिस कर रहा होता हूं मैं..
पता नहीं कोई मिल जाये कभी..
इन ख्यालों में घुम रहता हूं मैं..
जाने किसका इंतजार है मुझे..

मेरे खास मित्र मनोज द्वारा प्रस्तुत यह कविता.. यह उनका प्रथम प्रयास है, आप उनका उत्साहवर्धन अपने टिप्पणियों द्वारा करें..

चित्र के लिये Artbywicks.com को साभार..

Wednesday, June 25, 2008

अब मैं बड़ा हो गया हूँ माँ..


जो आप नहीं कर पाई,
वो दुनिया ने कर दिखाया..
अब मैं बड़ा हो गया हूँ माँ..

कुछ अच्छा लगता है तो
मुस्कुरा देता हूँ..
कुछ बुरा लगता है तो
मुस्कुरा देता हूँ..
अब मैं बड़ा हो गया हूँ माँ..

वो अछूत सी लगने वाली सब्जी,
भी अब खा लेता हूँ..
रात में अब चावल से भी
परहेज नहीं है..
अब मैं बड़ा हो गया हूँ माँ..

कोई अब पूछता नहीं,
की कहाँ जा रहे हो..
कोई अब पूछता नहीं
की किससे मिल के आ रहे हो..
अब मैं बड़ा हो गया हूँ माँ..

कोई अब पूछता नहीं
की खाना खाए या नहीं..
कोई अब पूछता नहीं
की खाए तो क्या खाए..
अब मैं बड़ा हो गया हूँ माँ..

कोई दोस्त अब कहीं
बुलाते नहीं..
उनके साथ ना जाने पर
पहले जैसे कुछ सुनाते नहीं..
हर पल ये अहसास दिलाते हैं..
अब मैं बड़ा हो गया हूँ माँ..

कुछ मिलने पर ना अब वो
पहले सा उत्साह आता है..
ना कुछ खोने पर आँखें
नम होती है..
अब मैं बड़ा हो गया हूँ माँ..

जिसकी चाहत बचपन से थी,
बड़ा होने की..
अब वो नहीं चाहता हूँ..
पर क्या करूं माँ..
अब मैं बड़ा हो गया हूँ माँ..

ये कविता मैंने बहुत पहले लिखी थी.. मदर्स डे पर.. मुझे याद है, मम्मी बहुत भावुक हो गई थी इसे पढ़कर..

Sunday, June 22, 2008

एक लड़की


एक लड़की,
ख्वाबों में जीने वाली लड़की,
ख्वाबों में ही मेरे पास आती,
ख्वाबों में ही मुझे गले लगाती,
ख्वाबों में ही कभी यूं ही,
मेरी राहों से होकर गुजर जाती,
ख्वाबों में अक्सर मैं उसका होता,
मुझे पाकर कभी वो चूम लेती,
कभी गले लगा लेती,
मुझे पाकर वो खुश होती,
हंसती खिल-खिलाकर,
अक्सर मैं कहता,
एक हंसी उधार दे दो,
मैं हंसता कम हूं,
वो कहती,
मैं आपकी ही हूं,
जो चाहे ले लो,
हकीकत का आभास भी था उसे,
मगर वो ख्वाबों में जीती थी..

एक लड़की,
ख्वाबों में जीने वाली लड़की,