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Saturday, September 06, 2008

एक नरसंहार के बाद दूसरे भीषण नरसंहार की तैयारी

जैसा की सुशांत झा जी का एक लेख मैंने मोहल्ला पर पढा था की ये बाढ नहीं नरसंहार है.. बिहार में आये बाढ को मैं भी नरसंहार की संज्ञा देना ज्यादा उचित समझता हूं.. राष्ट्र के कर्ता-धर्ता, राज्य प्रसाशन, जिला प्रसाशन.. सभी जानते थे की बाढ आनी है.. मगर सभी हाथ पर हाथ धरकर बैठ पानी के आने का इंतजार कर रहे थे.. आखिर बाढ का पानी और पैसे का जबर्दस्त संबंध जो है..

अगर राष्ट्र स्तर पर देखा जाये तो अभी सारे राजनितिक दल सियासत की राजनीति खेलने में लगे हुये हैं.. आरोप-प्रत्यारोप का दौर चल रहा है जो अगले चुनाव से पहले खत्म नहीं होने वाला है.. अगर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो वहां भी मनमोहन सिंह की कठपुतली सरकार और नेपाल की माओवादी सरकार एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोपों में ही घिर कर रह गयी है.. भारत सरकार का कहना है की भारत अपने ईंजिनियरों और मजदूरों को तटबंध की मरम्मत करने के लिये वहां भेजी थी जहां तटबंध टूट रहा था और जो नेपाल के हिस्से में आता है जहां माओवादियों ने उन्हें मार-पीट कर भगा दिया, और नेपाल सरकार का कहना है की मजदूरों के साथ मेहनताना को लेकर कुछ दिक्कतें आयी थी जिसके कारण वे लोग वहां से लोग वहां से वापस आ गये थे.. अभी हाल-फिलहाल में मैंने किसी न्यूज पोर्टल पर पढा था की इंजिनियर वहां तब पहूंचे थे जब स्थिति नियंत्रण से बाहर हो चुकी थी..

खैर अब समय ऐसे वाद-विवाद से कहीं आगे करने का आ चुका है.. अभी समय है एक नरसंहार के बाद दूसरे नरसंहार को नहीं होने देने का.. मेरी जानकारी के मुताबिक जब बाढ का पानी उतरता है तो पीछे छोड़ जाता है कई तरह कि बीमारियां.. घुटने भर कीचड़.. विस्थापितों का दर्द.. बिलखते अनाथ बच्चे.. और इन सबसे मरने वालों की संख्या बाढ से मरने वालों से कहीं ज्यादा होती है.. अगर अभी भी हम नहीं चेते तो इस भीषण नरसंहार के हम भी भागीदार होंगे..

जैसा की हमें पहले ही ज्ञात है, 30 लाख से ज्यादा लोग विस्थापित हो चुके हैं और उन्हें कम से कम 3-4 महिनों तक राहत शिविरों में रहना पर सकता है.. अगर हम 100 दिनों का भी अनुमान लगाते हैं और 50 रूपये प्रति व्यक्ति प्रतिदिन का सोचते हैं तो भी हर दिन 15 करोड़ का खर्च आता है.. मुझे नहीं पता है कि कित्ने पैसे अभी तक इकट्ठा हुआ है बाढ राहत के लिये, मैं अभी आंकड़े जुटा रहा हूं, मगर मुझे ये पता है कि 1500 करोड़ से कहीं ज्यादा खर्च होने वाला है इन सब पर.. और इतने पैसे अभी तक नहीं आ पाये हैं.. मैं आप सभी से ये आग्रह करता हूं की जितना हो सके आप मदद करें और दूसरों को भी इसके लिये प्रेरित करें.. अगर आप अभी भी कुछ ना करेंगे तो इस अगले भीषण नरसंहार के लिये आप सभी भी जिम्मेदार होंगे..

मेरे अगले पोस्ट में - आप कैसे और क्या कर सकते हैं, और चेन्नई में हम क्या कर रहे हैं इसकी जानकारी..

Friday, September 05, 2008

छुट्टियों में मुझे व्यथित करने वाले कुछ अहम प्रश्न

अभी कुछ दिनों पहले मैं छुट्टियों में घर गया हुआ था.. अगर आप मेरा चिट्ठा पढते होंगे तो आपको पता होगा की कुछ खुशियां मेरे परिवार में आयी है.. घर में हर दिन, हर तरफ उत्सव सा ही माहौल था.. मगर इन सबके बीच कुछ प्रश्न मुझे लगातार व्यथित करता रहा.. "बाढ़".. बिहार का शोक कही जाने वली नदी कोशी अपने पूरे उफान पर थी.. घर पर होने के कारण समाचार चैनलों को भी करीब से देखने का मौका मिला..

अगर अभी हाल-फिलहाल की बात छोड़ दिया जाये तो शुरूवाती दिनों में किसी भी चैनल पर कोई खबर नहीं थी.. ये हालात है बुद्धिजिवियों का गढ माने जाने वाले बिहार का.. सबसे अधिक पत्रकार पैदा करने वाली भूमी पर संकट और उसी धरती का कहीं कोई कवरेज नहीं और अगर कहीं कवरेज था भी तो वो बस खानापूर्ती करने के लिये.. इसी बीच भारत के होनहार खिलाड़ी सुशील कुमार भारत के लिये ओलंपिक में पदक भी जीते मगर उन दिनों जेड गुडी बिग बॉस क्यों छोड़कर जा रही है ये बात समाचार चैनलों को ज्यादा महत्वपूर्ण लग रहा था.. कोशी और बिहार का मानों भारत में कोई अस्तित्व ही नहीं था..

मेरे पड़ोस की एक भाभी जिनका मायका बीरपुर है अपने भाई के हवाले से बता रही थी(जो हाल-फिलहाल में ही अपनी जान बचा कर वहां से आया था) की कैसे कोशी अपना रौद्र रूप मनुष्यों को दिखा रही थी.. किस तरह से लाशों का ढेर उनके घर के सामने से बह कर जा रही थी.. चारों ओर एक प्रकार का हाहाकार मचा हुआ था जो बेआवाज थी.. बस पानी का कलरव.. मेरे मन में कुछ करने का जज्बा हिलोरें मार रहा था, मगर उचित संस्था या व्यक्ति से संपर्क नहीं होने के कारण कुछ नहीं कर सका.. बाढ में जाकर लोगों की सेवा करने का भी ख्याल आया, मगर ये भी जानता था की घर से मुझे कोई भी अपनी जान सांसत में डालने के लिये मुझे वहां कोई नहीं भेजने वाला है.. सो किसी से ये बात कही नहीं.. इसी बीच मेरे एक मित्र के मित्र जो मधेपुरा के रहने वाले थे और वहां अपने रिश्तेदारों को बचाने के लिये जा रहे थे उनसे मैंने संपर्क साधा और 3 लाईफ़ जैकेट खरीद कर उन्हें दिया.. ये कहकर की जितनों की जिंदगी बचा सकते हैं बचा लाईयेगा..

मगर अभी भी एक अहम प्रश्न मेरे सामने था.. क्या 3 लाईफ जैकेट काफी है? उत्तर मुझे पता है.. नहीं.. मगर फिर भी जो कुछ हम कर सकते हैं वो हमें करना चाहिये..

अगले पोस्ट में - एक नरसंहार के बाद अगले भीषण नरसंहार की तैयारी