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Monday, February 22, 2010

दिमाग का एक और फितूर


मन में ठान लिया था कि अब नहीं सोचूंगा, बहुत सोच लिये और सोच-सोच कर दुखी भी हो लिये.. अब खुश रहना चाहता हूं.. वैसे भी जीवन ने यही पाठ पढ़ाया है कि जिसके लिये हम सोचते हैं और दुखी होते हैं उसके लिये हमारे प्रति उन सोच, प्यार, आदर, सम्मान का कोई मोल नहीं होता है.. और जिसे हम बस यूं ही लेकर चलते हैं तो बाद में पाते हैं कि खजाना उधर ही छुपा हुआ है.. अधिकांश अनुभव तो ऐसे ही हैं अपने..

जिंदगी फिर एक नई करवट लेने का प्रयत्न कर रही है.. पता नहीं इस बार ऊंट किस करवट बैठेगा? बचपन से इस बात को घुट्टी में घोंट के पिला दिया गया है कि परिवर्तन ही संसार का अकाट्य सत्य है, और ये मन है कि जब तब इस बात को मानने से इंकार करने लगा तब जिंदगी ने भी वापस वही पाठ पढ़ाया.. पता नहीं दूसरे किस प्रकार के होते हैं, मैं तो किसी भी परिवर्तन से बहुत घबराता हूं.. चाहे बात रिश्तों में हुये परिवर्तन की हो या फिर किसी साफ्टवेयर का नया अपग्रेड वर्सन ही उपयोग में लाना हो.. हां, नई तकनीक को आसानी से स्वीकार करना व्यसायिक मजबूरियों ने सीखा दिया है, सो अब यहाँ सब आसान लगने लगा है.. नहीं तो वह भी आसानी से बदलना नहीं चाहता था मैं.. देखता हूँ कि जिंदगी कब सिखाती है परिवर्तन को आसानी से स्वीकार करना?

हां, मैं स्पष्ट रूप से स्वीकार करता हूं कि मुझे परिवर्तन अधिक नहीं सुहाता..

अभी घर जाने की कवायद चल रही है.. दफ़्तर में छुट्टियां लेने से लेकर कुछ खरीददारी करने तक.. हर बार घर जाने से पहले सोचता हूं कि मां से खूब बातें करूंगा.. जो बातें फोन पर नहीं कर पाता हूं, या फिर जिसे फोन पर कहने में हिचक होती है, वो सब कह डालूँगा.. मगर ये हो नहीं हो पाता है.. किसी ना किसी प्रकार कि व्यस्तता घेर लेती है.. फिर भी अगर समय निकलता है और मम्मी के गोद में सर रख कर चैन से लेटा होता हूं तब पाता हूं कि सामने वह बात कहना और भी मुश्किल है.. फोन अधिक आसान कर देता है कुछ भी कहना.. कई बाते ये सोच कर भी नहीं कहता हूँ कि शायद कह दूं तो वे यह सोच कर परेशान होंगे कि बेटा उदास है या फिर परेशान है..

छः साल बाद होली पर घर में रहूंगा.. मुझसे अधिक उत्साहित घर के लोग हैं.. एक तरह से इंतजार किया जा रहा है मेरा वहां..

फिलहाल तो छाया गांगुली जी का गाया एक गीत सुन रहा हूं.. जिसके बोल हैं,

"जब फागुन रंग झमकते हों,
तब देख बहारें होरी की..
परियों के रंग दमकते हों,
जब शीशे जाम झलकते हों..
महबूब नशे में छकते हों..
तब देख बहारें होरी की.."


अगर मौका लगा तो अगले पोस्ट में इसे पोडकास्ट करता हूँ.. :)

चित्र गूगल से सर्च करके लिया गया है. जिस साईट से लिया गया है वहाँ कापीराईट का कोई T&C मुझे नहीं दिखा. अगर किसी को आपत्ति हो तो बताये, आपत्ति जायज होगी तो चित्र हटा लिया जायेगा.

Monday, February 15, 2010

समय बड़ा बलवान हो भैया!!

जैसे-जैसे समय भागता जा रहा है, ठीक वैसे-वैसे ही मायूसी भी बढ़ती जा रही है.. लगता है जैसे दोनों समानुपाती हैं.. डर लगता है, कहीं मायूसी डुदासी का और उदासी अवसाद का सबब ना बन जाये.. मुझे इस मायूसी के कारणों का भी ज्ञान है, मगर वे कुछ वैसी ही बातें हैं जिसे मैं किसी से भी बांटना नहीं चाहूंगा!! देखता हूं कि आगे क्या होता है? वैसे भी कहा गया है, "समय से पहले और भाग्य से अधिक किसी को कुछ नहीं मिलता है" और मजे कि बात ये है कि आजकल मैं ये मानने भी लग गया हूँ..

कल रात बैंगलोर से बस पकड़ते समय मम्मी को एक एस.एम.एस.लिखा था.. "miss you mommy!! :'( "

Monday, February 08, 2010

दिल में बैठा एक डर

सुबह अमूमन देर से उठता हूं, दफ़्तर का समय भी कुछ उसी समय होता है.. मगर आज जल्दी नींद खुल गई.. सुबह के दैनिक क्रिया से निवृत होकर अपना मेल बाक्स चेक कर ही रहा था कि उधर से मेरे मित्र का फोन आया.. बेहद हड़बड़ी में था.. हेलो बोले बिना बोला "जल्दी से मेरे लिये पटना का एक फ्लाईट बुक करा दो".. उसका इतना कहना था और मैं समझ गया कि मसला क्या है.. मगर फिर भी प्रतिक्रिया में मेरे मुंह से अचानक निकल गया, "पटना!! क्यों क्या हुआ?" उधर से बस इतनी आवाज आई "पापा!!" और फफकर रोने लगा.. दो-तीन सेकेण्ड बाद फोन काट दिया.. मिनट भर किंकर्तव्यविमूढ़ जैसी स्थिति में रहने के बाद मैंने नेट पर टिकट चेक किया और नेट पर टिकट मिलने में देर लगने कि स्थिति जान अपने दूसरे मित्र को फोन किया, कि तुम टिकट बुक कराओ और मैं उसे लेने घर से निकलता हूं..

दो मिनट के भीतर मैं घर से बाहर अपने बाईक पर था.. बाईक चलाना मेरे शौक में शामिल होते हुये भी चलाने में दिल नहीं लग रहा था और इसी कारण से मैंने अपने घर से अशोक पिलर तक की दूरी नापने में अभी तक का सबसे अधिक समय लगा.. बहुत संभल कर और धीरे-धीरे चला रहा था.. रास्ते में दो-चार आंसू भी ढलक गये..

बाद में जब अपने मित्र को फ्लाईट पर चढ़ा कर वापस घर आया तब जाकर यह अहसास हुआ कि दुःख से अधिक मन में कहीं डर बैठा था.. कभी ना कभी मेरे साथ भी यही होने वाला है जैसा डर.. अपने आस पास खुद से बड़े उम्र के लोगों में ऐसी स्थिति पहले भी देखी है, यहां तक कि अपने पापा-मम्मी के साथ भी.. मगर अपने बेहद अभिन्न मित्र के साथ भी ऐसा ही होने पर मन बेहद टूटा सा महसूस हो रहा है..

बार-बार सोच रहा हूं, "क्या इसी के लिये हमें घर से बाहर निकलना पड़ता है? जिसे लोग जीवन कि उन्नति समझते हैं वो ऐसे कीमत पर भी मिले तो भी क्या हम सफल होते हैं?" अभी मेरे मन में श्मशान वैराग्य जैसा कुछ भी नहीं है.. थोड़े से आक्रोश के साथ थोड़ी सी लज्जा भी है मन में इस जीवन के प्रति.. अपनो के लिये कुछ ना कर पाने कि छटपटाहट भी है साथ में..

लज्जित हूं अपने मन में आयी एक बात को लेकर.. मन में एक बात आयी थी कि कुछ और बेहतर स्थिति में आने पर पापा-मम्मी को लेकर अपने पास आ जाऊंगा.. फिर मुझे इसमें अपना स्वार्थ दिखने लगा.. जिस जगह उन्होंने अपना पूरा जीवन गुजार दिया, उसे छोड़ कर आने में क्या उन्हें कष्ट नहीं होगा? और मैं सब छोड़ कर वापस जाने कि स्थिति में हूं नहीं..

अजीब सा कश-म-कश चल रहा है मन में.. जीवन कि विडंबनायें भी अजीब होती हैं..

चलते-चलते : वैसे यह अजीब शब्द भी कुछ अजीब नहीं होते हैं!! कुछ समझ में ना आये तो वह अजीब.. कुछ लीक से हटकर घटे तो वह अजीब.. नई चीज अगर समझ में ना आये तो वह अजीब.. यूं तो इस संसार में हर कोई किसी ना किसी मायने में अजीब ही होते हैं..

अभी एक दो दिन पहले कि ही बात है.. हम चार मित्र बैठकर यूं ही बातें कर रहे थे.. मेरे मित्र ने बातों ही बातों में कहा कि उसके गांव के लोगों का मानना है कि अगर इस गांव में किसी एक कि मौत होती है तो एक के बाद एक लगातार चार और लोगों कि भी मृत्यु होती ही है और अभी तक दो लोगों कि मृत्यु हो चुकी है.. हमने मजाक ही मजाक में कहा कि हम सभी मिलकर तुझे ही मार देते हैं.. आज जब उसे विदा करने को फिर से हम चारों मित्र एयरपोर्ट पर थे तब वही बात उठी, और हमारा कहना था कि अब अगर ऐसे हालात हों तो इस अंधविश्वास पर हमारे मित्र का विश्वास और भी बढ़ जायेगा, और एक तरह से यह भी और दो का इंतजार करने लगेगा.. जब हम ये बातें कर रहे थे तब हमारा मित्र कहीं और गया हुआ था..

कुछ बाते जो मुझे हद्द दर्जे तक परेशान करती हैं.. हमेशा..

अमूमन मेरी कोशिश रहती है कि हद तक किसी से झूठ ना बोलूँ.. मगर एक आम इंसान कि तरह सच को मैं भी छुपाता हूँ.. खासतौर से जब पूरी तरह से मेरी बात हो तब झूठ बोलने कि अपेक्षा मैं कुछ ना कहना ही पसंद करता हूँ.. वैसे भी मेरे साथ ऐसे किस्से कम ही आते हैं जब मुझे किसी से अपने बारे में कोई बात छुपानी पड़ी हो.. नहीं तो आमतौर से कोई मुझसे मेरे बारे में कुछ भी पूछता है तो मैं बिना किसी लाग लपेट के सही सही बता देता हूँ.. जीवन के कई मोड पर इससे कई बार नुक्सान भी उठाना पडा है, मगर फिर भी मेरे लिए चलता है.. मैं यहाँ सिर्फ और सिर्फ अपने बारे में ही लिख रहा हूँ, अगर बात किसी और के बारे में है तो मैं अक्सर उन विषयों पर बाते ना करके उसे छिपा भी जाता हूँ.. मैं भला क्यों किसी और कि परेशानी की गवाही किसी और के सामने क्यों दूं?

मेरे जिंदगी का सौ फीसदी ना भी तो कम से कम नब्बे फीसदी बाते मेरे आस पास रहने वाले लगभग सभी को पता है.. मगर बाकी के दस फीसदी फिर भी मुझे कभी ना कभी कुरेदती है.. अंदर तक भेदती है.. लगता है कि मैं जमाने से नहीं, खुद से ही कुछ छिपा रहा हूँ.. और वे बाते ऐसी हैं जिसे मैं सिर्फ अपने लिए ही छोड रखा है.. भला कुछ तो अपना हो, हर बात दूसरों को कह कर दिल कि भड़ास निकाल लेना भी ठीक नहीं.. मगर वह जो मन के अंदर है, उससे कुछ हमेशा सा रिसता सा महसूस होता रहा है.. टीस हमेशा उठती रही है.. कभी-कभी सोचता हूँ कि यह भी किसी बेहद अपने को सूना कर मन हल्का कर लूं.. अपने आस पास तलाशता हूँ किसी ऐसे उपयुक्त शख्स को.. मगर कोई मिलता नहीं, और शायद उन बातो को मैं किसी से बांच सकूं.. ऐसा कोई मिलेगा भी नहीं.. अपनी उन कमियों को मैं किसी के सामने जाहिर नहीं कर सकता.. खुद कि उन कमियों से खुद को मैं किसी के भी सामने कमजोर नहीं देख सकता.. वैसे यह ब्लॉग ही है जो मेरे हर कन्फेशन को शांति से सुनता रहा है.. मगर इस ब्लॉग के हिस्से भी वे दस फीसदी नहीं हैं..

ऐसी कई बाते हैं, जिसे सुनकर जो भी मेरा भला चाहते हैं वे मुझे कम से कम घंटे भर का लेक्चर भी सुनायेंगे.. पता नहीं इंसान अपनी कमजोरी से हमेशा क्यों भागना चाहता है.. कुछ कुंठाएं अगर मन में बैठी हों तो सारे जमाने कि कुंठाए क्यों दिखने लगती है?

आज फिर जाने क्या-क्या बकवास लिखने बैठ गया हूँ..


चलते-चलते : कई लोग मुझसे कहते हैं कि मैं पुरानी बाते बहुत सोचता हूँ.. कंचन दीदी ने तो मेरा नाम ही नौस्टैल्जिया ही रख दिया है.. यहाँ मैं कुछ पुरानी बातों का जिक्र करते हुए भी नौस्टैल्जिक टाइप नहीं लिखा.. वैसे मूड तो अभी भी कुछ-कुछ वैसा ही है.. :)

Wednesday, December 16, 2009

अब भी उसे जब याद करता हूं, तो बहुत शिद्दत से याद करता हूं

समय के साथ बहुत कुछ बदला है.. मैं भी बदला हूं, मेरी सोच के साथ-साथ परिस्थितियां भी बदली है.. कई रिश्तों के मायने बदले हैं.. पहले जिन बातों के बदलने पर तकलीफ़ होती थी, अब उन्ही चीजों को देखने का नजरिया भी बदला है और उन्हें उसी रूप में स्वीकार कर आगे बढ़ने की प्रवॄति भी आ गई है.. जिन चीजों के बदलने पर तकलीफ होती थी अब उन बातों को आसानी से स्वीकारने भी लगा हूं..

जिस मित्र के साथ हर बात बांचते थे और जिसके पास मेरे बैंक एकाऊंट का पासवर्ड होना भी कोई मायने नहीं रखता था, अब उन्ही मित्रों से कई बाते छुपा जाया करता हूं.. वे भी अमूमन वैसा ही करते हैं, जैसा मैं करता हूं.. वे भी तब वैसा ही करते थे जैसा मैं करता था.. मुझमें और उनमें कोई अंतर बाकी ना रहा.. ना तब, और ना अब..

पहले कुछ भी अपना नहीं होता था, अब कई चीजें सिर्फ अपने लिये होने लगी हैं.. कभी-कभी लगता है कि कहीं स्वार्थी तो नहीं होता जा रहा हूं? मगर फिर लगता है कि अगर यह स्वार्थीपना है तो हम चारों ओर स्वार्थियों से ही घिरे हुये हैं.. वहीं कभी आशावादी तरीके से भी सोचता हूं.. सोचता हूं कि यही तो जीवन का सत्य है.. मानव स्वभाव है.. इसमें स्वार्थीपना कहीं भी नहीं है.. हर कोई अपना एक स्पेस चाहता है, तो उस स्पेस में क्यों जबरन घुसा जाये?

अपने शहर में जाता हूं तो अपने घर के इर्द-गिर्द कई नये बेजान से मकानों को देखता हूं.. हर छः महिने में कम से कम 2-3 नये मकान.. उस मैदान पर जहां मैं क्रिकेट खेला करता था और जिस पर 2-3 टीम एक साथ खेलती थी, उस पर अब एक छोटी सी टीम के खेलने लायक जगह भी नहीं बची है.. बदलावों के बयार में तो हर कुछ बह रहा है..

अब रोना कम हो गया है.. पहले हर इमोशनल बातों पर रोना आता था.. अब वैसी बाते आने पर हंसी आती है.. खिसियानी हंसी.. लगता है जैसे खुद को धोखा देने कि कोशिश में लगा हूं.. दुनिया को दिखाना चाहता हूं कि देखो, मैं कितना प्रैक्टिकल हो गया हूं.. प्रक्टिकल होना या प्रोफेशनल होना अब भी मेरी समझ के बाहर की चीज है.. अब हर बात को पॉलिटिकली करेक्ट करने की कोशिश अधिक लगती है बजाये की दिल कि बात कही जाये.. प्रैक्टिकल होना या प्रोफेशनल होने का अभी तक एक ही मतलब समझ पाया हूं, महसूस कम करना.. कुछ भी महसूस ना करना.. जो जितना कम महसूस करता है, वह उतना ही प्रैक्टिकल है..

एक बात तो समझ में आती है कि मैंने मन में गांठ बांध लिया है की "बदलाव ही जीवन का अटूट सत्य है".. देर से ही सही, समझ में तो आया.. अब तुम्हारा वह पहाड़ी वाला शहर भी अधिक तकलीफ़ नहीं देता है, और ना ही यादों में अधिक ढ़केलता है.. सच कहूं तो तुम्हारे उस शहर में जाकर अंतरमन में रस्साकस्सी बहुत अधिक चलती है.. दिल उन यादों में डूबना चाहता है, मगर दिमाग कहीं और खींचना चाहता है..

कुछ दिन पहले उसी शहर में रहने वाला एक मित्र पूछ बैठा था तुम्हारे बारे में, "क्या उसे अब भी याद करते हो?" "ना!!" तुरत जबान से निकल पड़ा.. आधे मिनट की चुप्पी के बाद मैंने कहा, "अब यादों में डूबे रहना जमाने को प्रैक्टिकल नहीं लगता है.. मगर अब भी उसे जब याद करता हूं, तो बहुत शिद्दत से याद करता हूं.." पता नहीं क्यों, मैं उससे झूठ नहीं बोल पाया.. मगर कई बातें नहीं कह पाया.. जैसे.. उस शहर में अब भी तुम्हारी खुश्बू महसूस करना चाहता हूं, मगर अब उस अहसास का पीछा नहीं करता हूं.. समझ गया हूं.. यह एक मृग-मरिचिका से अधिक और कुछ नहीं है..

चलते-चलते : एक बात जो समझा हूं, एक चीज कभी नहीं बदलती है.. चाहे सारा जमाना बदल जाये.. सारे रिश्तों के मायने बदल जाये.. ब्रह्मांड के बदलाव के नियम को झूठलाते हुये ना बदलने वाली चीज है, मां-पापा का प्यार और स्नेह..

Tuesday, November 11, 2008

मेरे हिस्से का चांद



कभी देखा है उस चांद को तुमने?
ये वही चांद है,
जिसे बांटा था तुमने कभी आधा-आधा..
कभी तेज भागती सड़कों पर,
हाथों में हाथे डाले..
तो कभी उस पहाड़ी वाले शहर कि,
लम्बी सुनसान सड़क पर..
तुमने तो रेल कि,
खिड़की से झांकते चांद को भी..
बांट लिया था आधा..
मेरे आंगन में आज,
चांद चमक रहा है आधा..
शायद तुम्हारे हिस्से का है!
मेरे हिस्से वाला चांद,
तुम्हारे आंगन में होगा..
उसे लौटा दो..
मेरे हिस्से का चांद मुझे लौटा दो..



Saturday, October 18, 2008

एक चिड़िया जो ओ गदही पुकारती थी

मुझे उस चिड़िया का नाम पता नहीं है जो ओ गदही पुकारती थी.. हम तीनों भाई-बहन बहुत छोटे थे उस समय.. मैं छठी कक्षा में था, भैया आठवीं में और दीदी नौंवी में.. पापाजी हम तीनों को अलग-अलग नामों से पुकारते थे.. मुझे पुछरू(अब इस नाम से पुकारे गये जमाना बीत गया है), भैया को नकपिच्चू और दीदी को गदही.. इस नाम से पुकारे जाने पर पूरे जन्म भर का प्यार उमर आता था..(शायद अब भी पुकारे जाने पर वही एहसास रहे.).. दो कमरे और एक ड्राईंग रूम के अलावा दो लैट्रिन-बाथरूम, एक बाल्कनी, रसोई घर, डायनिंग हॉल और एक छोटा सा बगीचा हुआ करता था.. हम सभी सितामढी में रहते थे.. कुछ धुंधली सी यादें जानकी मंदिर कि भी है जिसके बारे में मान्यता है कि सीता जी का जन्म वहीं हुआ था..

बगीचे में 5-6 अमरूद के पेड़ थे, कुछ पपीते के और केला के पेड़ों का एक समूह भी जिसे बहुत छोटे में मैंने ही लगाया था और जब सूखने लगा था तब गुस्से से काट भी दिया था.. मगर बाद में चाचाजी ने उस कटे हुये पेड़ को फिर अच्छे से लगाया तो वह लग गया.. शायद 5-6 साल का रहा हो ऊंगा उस समय.. एक खास तरह कि चिड़िया अक्सर उन्हीं पेड़ों में से किसी पर आकर बैठती थी और "टू नी नी" जैसी आवाज निकालती थी.. एक दिन दीदी को पापाजी ने बताया कि वह ओ गदही पुकार रही है.. मतलब तुम्हें बुलाती है.. बचपन का मासूम मन भी इसे मान लिया.. वैसे भी दीदी किसी आम लड़की कि तरह चिड़िया जैसे उड़ना चाहती थी.. हवाओं को अपने मुट्ठी में बंद कर उड़ाना चाहती थी.. जमाने कि फिक्र से बेफिक्र..

ठीक-ठीक याद नहीं है पर शायद 1992-93 में पापाजी का तबादला चक्रधरपुर, जो बिरसा मुंडा कि कर्मभूमी रह चुकी है और अब झारखंड में है, हो गया.. पापाजी 2-3 महीने या शायद 3-4 महीने के लिये हमलोगों को वहीं छोड़कर वहां चले गये.. हो सकता है 1-2 महीने के लिये ही गये हों मगर वही सालभर से कम नहीं था मेरे बालमन के लिये.. सो अभी तक बस इतना ही याद है कि बहुत दिनों तक नहीं आये थे.. फोन का जमाना उस समय तक हमलोगों के लिये नहीं आया था.. सारा काम चिट्ठियों से ही होता था जो महिने में 2-3 ही मिलते थे.. वो चिड़िया भी लगता था उन्हीं के साथ चली गयी थी.. उसने भी आना कम कर दिया था.. जब कभी ओ गदही जैसी आवाज आती हम दौड़ पड़ते बगीचे कि तरफ.. लगता जैसे पापाजी का संदेश लेकर आयी हो..

सितामढी के बाद कभी भी उस चिड़िया कि आवाज नहीं सुनी.. मैं सोचता था कि कहीं वो भी तो विलुप्त नहीं हो गयी होगी? आज सुबह-सुबह लगभग 5.30 में एक फोन के आने से नींद खुल गई.. बाहर बालकनी में आया तो ठंडी हवा चल रही थी.. आसमान में बादल छाये हुये थे.. तभी कहीं से वही आवाज सुनी.. "ओ गदही" या कह सकते हैं "टू नी नी".. लगा कि बस हम इंसानों की भाषा ही बदलती है.. पंछी-जानवरों कि भाषा हर जगह एक जैसी ही होती है.. लगा जैसे कि वही बचपन फिर से लौट आया है.. मन ख्यालों में डूब गया.. लगा जैसे पापाजी अभी कहेंगे कि देखो स्वीटी, तुम्हें ये चिड़िया "ओ गदही" बुला रही है..

भले ही अब हर दिन घर बात हो जाती है.. जब जिससे संपर्क में आना चाहूं आ सकता हूं.. चौबिसों घंटे मोबाईल भी साथ होता है.. ई-पत्रों से सुविधा और भी बढ गयी है.. मगर उस हाथ के लिखे पत्रों कि महत्ता खत्म नहीं हो सकती है.. उसकी छुवन से वो अहसास कभी नहीं जा सकता है.. हस्तलिपी से आप पल भर में किसी को पास पा सकते हैं.. कुछ दिन पहले मैंने पापाजी को एक ई-पत्र लिखा था जिस पर उन्होंने कहा था कि मैं तुम्हें इसके जवाब में सेन्ड नहीं पोस्ट करूंगा.. 10 दिन हो गये हैं.. अभी तक मुझे मिला नहीं है.. या तो पापाजी भूल गये भेजना या फिर कहीं रास्ते में अटका होगा.. पता नहीं.. खैर अगर भूल गये होंगे तो मेरा यह पोस्ट पढकर याद आ जायेगा..

Thursday, October 16, 2008

दूसरी बकवास - अर्चना ऐ ईनो

परसो कि बात है.. मैं अपने आफिस के एक साथी के साथ उसके बाईक से घर लौट रहा था.. यूं ही बातें भी हो रही थी.. बातों ही बातों में हिंदी सिनेमा के ऊपर बातें होने लगी.. उन्हें हिंदी टूटी-फूटी समझ में आ जाती है.. सो हिंदी सिनेमा का खूब लुत्फ़ भी उठाते हैं.. बाते करते करते अचानक से उन्होंने पूछा.. Hey! What was that movie? "अर्चना ऐ ईनो"?
मैं सोच में आ गया.. अर्चना ऐ ईनो? ऐसा नाम तो मैंने किसी हिंदी सिनेमा का नहीं सुना था.. बहुत दिमाग घुमाया, कुछ समझ में नहीं आया.. फिर उसी से पूछा कि एक्टर कौन था.. उन्हें याद नहीं.. फिर पूछा एक्ट्रेस कौन थी? अबकी एक नाम बताया.. बिपासा.. फिर सोचा.. हां याद आ गया.. मैंने पूछा क्या आप बचना ऐ हसीनों कि बात कर रहे हैं? जवाब आया Yes yes.. और मेरा हंसते-हंसते बुरा हाल हो गया.. बेचारे मेरे साथी मुझे अजीब तरीके घूरे जा रहे थे.. :D

मेरे पहले बकवास को पसंद करने से मेरा हौसला बढता ही जा रहा है.. सोच रहा हूं कि कोई नया चिट्ठा ही बकवास करने के लिये शुरू कर दूं.. (बकवास कर रहा हूं, सो लोड ना लें..) वैसे कम्यूनिटी चिट्ठा शुरू करने पर ज्यादा फायदे नजर आ रहे हैं, यहां सभी इस बकवास की तारीफ करने वालों को भी बकवास करने के लिये एक चिट्ठा मिल जायेगा.. दिनेश जी सबसे पहले हौसला बढाने के लिये आये.. पीछे-पीछे संजीत जी हा हा हा करते हुये आये.. अरे हां इससे याद आया.. हमेशा मन में आता था कि टीवी सिरीयल के राक्षस सभी इतने हट्ठे-कट्ठे क्यों होते थे.. बहुत सोचने पर पाया कि हंसी ही उनका राज था.. बात-बेबात की हंसी.. इससे यह शिक्षा मिलती है कि आप भी दिल खोल कर हंसिये और हट्ठे-कट्ठे बने रहिये.. अनिल जी, अपने ताऊ और रंजन जी इस पोस्ट से खूब मजे लिये और अगले के इंतजार में भी पाये गये.. एक तरह अभिषेक ओझा जी को यह सबसे बकवास लगा तो अजित जी इसमें बकवास ढूंढ भी नहीं पाये.. हद हो गई भाई.. इतना बकवास करने पर भी किसी को बकवास ना लगे तो मन खट्टा हो जाता है.. कुश जी बढिया कह कर निकल गये तो मसिजिवी जी बस मुस्कुरा कर रह गये.. वैसे भी कई बार देखा गया है कि लोग मुसिबतों का मुस्कुराकर सामना करते हैं.. मसिजिवी जी का कहीं यही हाल तो नहीं है? वैसे भी वो तस्वीर में जितने खूंखार टाईप दिखते हैं असल जिंदगी में उतने ही हंसमुख मिजाज हैं.. सो कुछ भी कह लें वे तो हमेशा मुस्कुराते ही रहेंगे..(कम से कम मैं तो यही सोचता हूं).. :)

और अंत में सबसे अच्छी बकवास से भड़े कमेंट का ईनाम जाता है जितेन्द्र भगत जी को.. उन्होंने फरमाया "थाली में मुर्गे की लाश है, पौधों में फुल की तलाश है, सागर में जल की प्‍यास है, सोचा था ऐसी टि‍प्‍पणी दूँ जो लगे कि‍ बकवास है, पर लगता है आपकी तरह मैं भी गड़बड़ा गया।"


आप सभी को धन्यवाद..

Sunday, October 12, 2008

इंतजार है मुझे(एक कविता मनोज द्वारा)


जाने किसका इंतजार है मुझे..
जब घर में अकेला होता हूं मैं,
सन्नाटों से घिरा होता हूं मैं..
कोई आहट सी होती है तो,
चौंक जाता हूं..
दरवाजे पर निगाहें टिकी होती है,
दस्तक कोई दे रहा हो जैसे..
जाने किसका इंतजार है मुझे..

अखबारों को पलटते समय,
निगाहें बेकरार होती है जैसे..
हर खबर को पढकर,
कुछ ढूंढती हुई निगाहें जैसे..
अखबारों के हर पन्ने से,
खेल रहा होता हूं मै..
जाने किसका इंतजार है मुझे..

कभी चबूतरे पर बैठा हुआ,
सड़कों पर नजरें जमाये,
कुछ सोचते हुये..
दौड़ते-भागते गाड़ियों में जैसे,
कुछ ढूंढ रहा होता हूं मैं..
जाने किसका इंतजार है मुझे..

भीड़ में चलते लोगों में,
किसी को पहचानने कि
कोशिस कर रहा होता हूं मैं..
पता नहीं कोई मिल जाये कभी..
इन ख्यालों में घुम रहता हूं मैं..
जाने किसका इंतजार है मुझे..

मेरे खास मित्र मनोज द्वारा प्रस्तुत यह कविता.. यह उनका प्रथम प्रयास है, आप उनका उत्साहवर्धन अपने टिप्पणियों द्वारा करें..

चित्र के लिये Artbywicks.com को साभार..

Friday, October 10, 2008

इंतजार भी कितनी खूबसूरत होती है.. है ना?

इंतजार भी कितनी खूबसूरत होती है..
एक ऐसा इंतजार जो कभी लगता है,
खत्म ना ही हो तो अच्छा है..
दिल को सकून तो मिलता है,
कि तुम भी शायद इसी इंतजार में हो..
मेरे इंतजार में..

भुलावे में जीना भी कभी-कभी
जीने कि वजह बन जाती है..
तुम कभी वापस मत आना..
शायद यह खुशफहमी खत्म ना हो जाये..
जीने की वजह ही खत्म ना हो जाये..
तुम कभी वापस मत आना..
प्लीज मत आना..


मेहदी हसन जी का एक गीत..

Sunday, September 14, 2008

सच में मम्मी, कहां फंसा दी

कुछ दिन पहले मैंने अपने एक पोस्ट में अपने भतीजे के जन्म पर एक पोस्ट लिखा था की क्या मम्मी कहां फंसा दी.. वो पोस्ट बस एक मजाक भर में लिखा हुआ था.. खुशियों से भरा हुआ.. मगर कभी-कभी सच में लगता है की क्या मम्मी कहां फंसा दी जन्म देकर.. हर दिन एक नयी चुनौती का सामना करना पड़ता है.. नये अंतर्द्वंद सामने आते हैं.. हर समस्या को हम उचित तरीके से हल नहीं कर पाते हैं तो कुछ समस्याओं का समाधान हमारे बस के बाहर की चीज लगती है, जो होती भी है.. कभी कुछ ना कर पाने का दर्द होता है तो कभी कुछ करने पर भी खोने का डर लगा रहता है..

अगर मैं अपने जीवन के अबतक के बीते हुये सालों पर गौर करता हूं तो पाता हूं की मैं जितना पाने के लायक हूं उतना मुझे कभी मिला नहीं है.. खासतौर पर मैं जो कुछ भी पाने के लिये जी-तोड़ मेहनत करता हूं वो मुझे कभी नहीं मिला है.. जिस किसी से बहुत ज्यादा लगाव होता है, वो मेरे जीवन में क्षणभर से ज्यादा नहीं रहता है.. चाहे वो कोई भौतिक पदार्थ हो या कोई मित्र हो या कोई अपना..

कुछ चीजें इतनी अधिक तकलीफ पहूंचाती है जो मेरे सहनशक्ति से बाहर लगता है.. तब मन में ये जरूर लगता है की क्या मम्मी कहां फंसा दी.. पापा-मम्मी से बहुत ज्यादा लगाव है मुझे, मगर उनसे इतनी दूर हो गया हूं कि जब कभी मुझे उनके साथ की जरूरत होती है तब कभी उन्हें अपने पास नहीं पाया हूं.. स्वभाव कुछ ऐसा मिला है कि अपनी बात अपने भीतर ही रख लेता हूं, किसी से मन की कुछ बात कहना भी चाहूं तो कह नहीं पाता हूं.. कई बार ये भी महसूस हुआ है की अंदर ही अंदर घुटा जा रहा हूं..

कहने को तो ब्लौगिंग एक ऐसा संसार है जहां आप अपने मन की बात बिना किसी सोच-संकोच के रख देते हैं, लिख देते हैं.. मगर हिंदी ब्लौगिंग का चरित्र अंग्रेजी ब्लौगिंग से अलग है.. यहां हम सभी सार्वजनिक होते हैं.. अब ऐसे हालात में अपने मन की बात को सार्वजनिक करना भी उचित नहीं होता है.. किसी सीमा में रहकर ही अपने मन की बात लिखता हूं.. सच कहूं तो मैं अभी भी अंदर ही अंदर घुट रहा हूं.. क्या करूं, कहां जाऊं कुछ समझ में नहीं आ रहा है..

जाता हूं मम्मी से बात करने.. उन्हें कहने.. उनसे पूछने.. कि क्या मम्मी कहां फंसा दी जन्म देकर..

कुछ दिनों से ब्लौगजगत से बिलकुल बाहर हो चला था.. अपने कुछ निजी कारणों से.. अपने अगले पोस्ट में बताता हूं यहां चेन्नई में किये गये बाढ सहायता कार्यों के बारे में..

Monday, July 14, 2008

बदलते चेहरे

कल रात ऑफिस से निकलकर चल परा मैं माम्बलम रेलवे स्टेशन की तरफ.. ऑफिस से लगभग 1 किलोमीटर या उससे कुछ ज्यादा दूरी रही होगी.. एक ओवरब्रिज, उसके बगल में कुछ टूटा हुआ या कुछ तोड़ा गया.. पता नहीं जो भी हो, मगर अंदर प्लेटफार्म पर जाने के लिये एक रास्ता भर.. मुझे तो बस इसी से मतलब था.. चेन्नई के सबसे व्यस्त इलाके से गुजरते हुये पीछे कि तरफ से माम्बलम स्टेशन में प्रवेश किया.. जब नया-नया चेन्नई आया था तब माम्बलम का मतलब पता चला था "आम".. बाद में पता चला कि इसी नाम से एक स्टेशन भी है.. अच्छा लगा कि चलो एक स्टेशन के नाम का मतलब तो पता है..

कानों में मोबाईल का फोन लगा हुआ था और उस पर एफ.एम. रेडियो से कोई हिंदी गाना चल रहा था.. रात 8 से 9 तक किसी चैनेल पर हिंदी गाना आता है.. दो अलग-अलग गीत मुझे दो अलग-अलग लड़कियों कि याद में धकेल गया जो मेरी जिंदगी के पड़ाव में महत्वपूर्ण स्थान पा चुकी है.. माम्बलम स्टेशन पर टिकट लेकर ट्रेन का इंतजार करने लगा.. भीड़ बहुत ज्यादा थी.. सोचा कि क्या इससे भी ज्यादा भीड़ मुंबई में होती होगी? पता नहीं.. इससे ज्यादा भीड़ अगर कहीं रहे तो आदमी 1 इंच भी ना खिसक पाये.. माम्बलम चेन्नई का सबसे व्यस्त स्टेशनों में से एक है.. कारण टी.नगर, पोथी, नल्ली और सर्वणा स्टोर(इसके बारे में फिर कभी)..

माम्बलम से चेन्नई सेंट्रल की ओर बढते हुये अगला स्टेशन कोडमबक्कम.. जब भी यहां से गुजरता हूं तो गार्गी की याद एक बार जरूर आ जाती है.. ना जाने कितनी ही बार कभी उसे छोड़ने तो कभी उसे लेने तो कभी उसके साथ यहां से कहीं और जाने के आता था.. तब ये स्टेशन अपना सा लगता था, अब लगता है जैसे स्टेशन भी पराया हो गया है.. लोग पराये हो जाते हैं, समझ में आता है.. निर्जीव वस्तुयें भी कैसे परायी होती है, समझ के बाहर है.. जब गार्गी चेन्नई में थी तब अक्सरहां उससे सिरीयस वाली लड़ाई हो जाया करती थी.. 3-4 बात नहीं करते थे फिर पुनर्मुशको भवः हो जाता था..

उसके जाने के बाद अब गार्गी की याद आती है.. सोचता हूं कि फिर कभी किसी एक शहर में बसे तो कभी लड़ाई नहीं करूंगा.. मगर मैं जानता भी हूं की ऐसा नहीं होगा.. हमारी दिनचर्या फिर से वहीं हो जायेगी.. उसका कोलकाता वाला घर याद आता है.. उसकी मम्मी और नानी मां का प्यार से खाना खिलाना याद आता है.. उसके पापा का वो गिटार बजाना याद आता है जिसपर मैं जगजीत का कोई गजल गा रहा हूं.. फिर सभी एक झटके से गायब हो जाते हैं..

एक लड़की को यहां चढते हुये देखा.. शायद उत्तर भारत के किसी हिस्से में उसे देखता तो ध्यान भी नहीं देता.. मगर यहां उत्तरी भारतीय को देखकर सोच में पर जाता हूं.. क्या ये भी किसी कॉल सेंटर या साफ्टवेयर कंपनी में काम करती है? क्या इसे भी घर गये महीनों बीत गये होंगे? बेतरतीबी और उदासीन सा चेहरा.. एक सिंपल सी जींस और टी-शर्ट में.. लोग उसे ऐसे देख रहे थे मानों किसी चिड़ियाघर से भाग कर आ गई हो.. सोचा, जो कपड़े दिल्ली में बिलकुल सामान्य सा है वही यहां के लोगों को हजम नहीं होता है.. मन में 2-4 गालियां दी.. उसे इस सबसे कोई मतलब नहीं था.. वो तो शायद ट्रेन में थी भी नहीं.. चेहरा बता रहा था कि कहीं जल्दी से उड़कर पहूंच जाना चाहती थी वो.. एक पल में.. खैर मुझे इससे क्या? मैं मुंह फेरकर खड़ा हो गया..

ऐसे ही सोचते-सोचते नुगमबक्कम, चेटपेट कब गुजरा पता भी नहीं.. भीड़ का हुजुम एग्मोर में उतर गया.. बैठने के लिये जगह खाली हो गया.. सोचा क्या बैठ जाऊं? 2 मिनट में तो पार्क स्टेशन आ जायेगा.. वहीं तो उतरना है.. फिर वहां से सेंट्रल पैदल.. दोस्त को छोड़ने जाना था वहां.. वो दिल्ली जा रही थी.. अब आ ही गया हूं तो 3 मिस्टेक्स ऑफ माई लाईफ भी ले ही लूं.. पता चला की उसकी टेर्न 2 घंटे लेट हो गई है.. अब रात के बारह बजे जायेगी.. उसे बताया तो उसे भरोसा नहीं हुआ.. ये ट्रेन कभी लेट हो ही नहीं सकती है.. कभी नहीं होती है.. आज कैसे.. टिकट भी कंफर्म नहीं है.. "तुम कैसे पता करते हो कि कंफर्म हुआ की नहीं?" उसने पूछा.. हर जवाब इंटरनेट पर मिल जाता है.. "अच्छा!" हंसी उड़ाता हुआ सा चेहरा.. फिर अपने एक मित्र से पूछना.. हुर्रे!! मेरा टिकट कंफर्म हो गया.. सेकेंण्ड ए.सी. में है.. सोचता हूं, लोग कैसे इतना उर्जावान रहते हैं? शायद मैं भी होता.. अगर घर जाने की बात होती तो.. घर-घर-घर.. क्या मैं भी घर के पीछे पर गया हूं..

11.30 में मैं उसे ट्रेन में बिठा कर विदा ले लेता हूं.. इतनी रात में तो ट्रेन मिल ही जायेगी.. मोबाईल की घंटी बजती है.. विकास है.. कहां हो? कब तक आओगे.. परेशान सी आवाज.. ऑफिस के अलावा कहीं और से इतनी देर से घर नहीं गया हूं.. शायद इसलिये.. आ रहा हूं.. पार्क स्टेशन में फिर जाता हूं.. 11.45 हो गये.. अगर ट्रेन नहीं मिला तो ऑटो से जाना होगा.. कुछ लोग दिखे जो ट्रेन के इंतजार में थे.. अरे लोग हैं तो ट्रेन भी आ जायेगी.. बगल में बैठा दो लड़का हिंदी में बात कर रहा है.. कान लगा कर सुनने लगा.. चेन्नई में हिंदी.. नार्थ इंडियन है.. किसी की मां-बहन एक की जा रही थी.. गाली सुनने के लिये तो मैं हिंदी नहीं सुनने वाला हूं.. लो ट्रेन भी आ गई.. अभी की ट्रेन और थोड़ी देर पहले की ट्रेन में अंतर था.. वातावरण का मिजाज भी बदला हुआ था.. ओह!! तो ट्रेन भी शक्लें बदलती है हर घंटे.. अभी भी एक लड़की जा रही थी.. साउथ इंडियन बहुत ही सलीके के कपड़ों में थी.. मगर उस लड़की की तरह बेपरवाह नहीं थी.. कुछ खुबसूरत भी नहीं थी.. मगर चेहरे पर एक डर था.. निगाहें चौकन्नी थी.. घबराई हुई थी.. मैंने घड़ी देखी 12.30 से ज्यादा हो चुके थे..