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Saturday, November 12, 2011

लफ्ज़ों से छन कर आती आवाजें

१ -
वो काजल भी लगाती थी, और गर कभी उसका कजरा घुलने लगता तो उसकी कालिख उसके भीतर कहीं जमा होने लगती.. इस बदरा के मौसम में उस प्यारी की याद उसे बहुत सताने लगती है.. काश के मेघ कभी नीचे उतर कर किवाड़ से अंदर भी झांक जाता.. ये गीत लिखने वाले भी ना!!
(कहाँ से आये बदरा गीत के सन्दर्भ में)

२ -
समय बदल गया है, जमाना बदल गया है,
एक हमहीं हैं जो सदियों पुराने से लगते हैं..

३ -
तुम अब भी, यात्रारत मेरी प्यारी,
अब भी वही इन दस सालों बाद,
धंसी हुई हो मेरी बग़ल में, किसी भाले की तरह..
(मुझे याद नहीं, मेरी ही लिखी हुई या फिर कहीं का पढ़ा याद आ गया हो)

४ -
मैं उस असीम क्षण को पाना चाहता हूँ जब इस दुनिया का एक-एक इंसान यह भूल जाए की मेरा कोई अस्तित्व भी है.. और अवसाद के उस पराकाष्ठा को महसूस करना चाहता हूँ...

५ -
लेकिन वह दोपहर ऐसी न थी कि केवल चाहने भर से कोई मर जाता..
[निर्मल वर्मा कि एक कहानी से]

६ -
होश से कह दो, कभी होश आने ना पाए.
एक मदहोशी का आलम बना है अभी अभी...

७ -
लगता है जैसे एक सपना सा बीता था या कोई फ्लैश सा चमका हो.. मैं भी तो अभी फ्लैश बैक में ही जी रहा हूँ! एक अकथ पीड़ा जैसी कुछ!! जीवन में अचानक से ही अनेक घटनाएं घट जाने पर उसी तरह उन सभी बातों का मूल्यांकन कर रहा हूँ जिसका कोई मूल्य निर्धारित ना किया जा सके, सभी चीजें वैसी ही दिख रही है जिस तरह अचानक किसी निर्वात में हवा के भरते समय सनसनाहट की सी आवाज होती है.. या फिर किसी घटना से आश्चर्यचकित सा होकर कोई उन सारे घटनाओं से परे हटकर, किनारे पर बैठ कर जैसे माझी को नाव खेते हुए देखता हो..

८ -
कई दिनों से इन्द्रधनुष की तलाश में हूँ. सुना है उसके दोनों छोर, जहाँ से वह धरती से मिलता है, वहाँ खुशियाँ ही खुशियाँ पायी जाती है.. यह मूवा इन्द्रधनुष भी तो यहाँ निकलता नहीं है..

९ -
गुमे हुए लोगों की उम्र कभी बढती नहीं है, वे हमेशा वैसे ही होते हैं जैसा उन्हें आखिरी दफ़े देखा गया होता है..
आपकी यादों में...

१० -
कभी-कभी सोचता हूँ कि अपनी लिखी डायरी को एक दिन नष्ट कर दूँ, नहीं तो अगर किसी दिन वह दुनिया के हाथ लग गई तो सारी दुनिया जान जाएगी की मैं किस हद तक का नीच, कायर और डरपोक इंसान था, एक ऐसा इंसान जो खुद को धोखे में रखने कि बीमारी से ग्रसित था..

११ -
वह एक ऐसा शहर था जिसका अँधेरा मुझे कभी भयभीत नहीं करता था. उसकी भीड़-भाड़ कभी मन को विचलित नहीं करती थी. उसके बारे में मैं वैसे ही सुना करता था जैसे बचपन में दादी-नानी से बच्चे भूत-प्रेत, राजा-रानी और परियों की कहानियां सुनते हैं, पूरी बेचैनी के साथ, पूरी श्रद्धा के साथ.

उस शहर में रहने वाले लोगों से अक्सर मुझे रश्क होता आया है, मेरे लिए यह जानना भी दिलचस्प होगा की उस शहर में रहने वाले लोग किसी दूसरे शहर, कस्बे अथवा गाँव के बारे में ठीक वैसा ही सोचते होंगे, जैसा मैं उस शहर के बारे में. और वे भी ऐसे ही इर्ष्या करने को मजबूर कर दिए गए होंगे उन जगहों में रहने वालों के बारे में..

१२ -
वो भी ठीक ऐसी ही रात थी.. सुबह चार बजे तक जगा हुआ था, और आज भी ढाई बज चुके हैं.. बस उस दिन "मौसम" जैसी कोई सिनेमा साथ नहीं थी...

देखो ना, देखते ही देखते पूरे दस साल गुजर गए. मगर लगता है ऐसे जैसे कल ही की तो बात थी, फिर खुशगंवार पांच साल और अवसाद के पांच साल भी तो आज साथ हैं सुबह के चार बजाने को......

१३ -
अतीत कभी आपका पीछा नहीं छोड़ती है. आप कितना भी बच कर निकलना चाहें, मगर यह पलट कर वापस आती है और पिछले हमले से अधिक जोरदार हमला करती है. अवसाद के पहले चरण की शुरुवात यहीं से होती है, और अंत का कहीं पता नहीं..

१४ -
कुछ यादें हैं, धुंधली सी.. जैसे कोई भुला हुआ गीत, जिसके सुर तो याद हों, मगर बोल याद नहीं.. जैसे कोई भुला हुआ स्वर, जिसकी आवाज याद हैं, मगर बोलने वाले का चेहरा याद नहीं.. जैसे कोई प्रमेय, जिसका हल तो याद हैं, मगर प्रश्न नहीं.. जैसे कोई खंडहर, जिसके दरख़्त तो याद हैं, मगर उसका पता याद नहीं... यादें जो आती हैं, खो जाती हैं... अधूरी यादें.. यादों को कभी अधूरा नहीं रहना चाहिए, तुम्हारे प्यार की तरह.. उसका भी एक अंत होना चाहिए, मेरे प्यार की तरह..


पिछले कुछ महीनों में फेसबुक पर अलग-अलग मूड में लिखे गए अपडेट्स का लेखा-जोखा.

Tuesday, May 17, 2011

Space Complexity बनाम वो लड़की

Space Complexity का संगणक अभियांत्रिकी(अब कंप्यूटर इंजीनियरिंग का इससे अच्छा अनुवाद मैं नहीं कर सकता, आपको यही पढ़ना होगा.. समझे?) में बहुत महत्त्व है.. वैसे तो Time Complexity को आप Space Complexity का बड़ा भाई मान सकते हैं क्योंकि Time Complexity के पीछे-पीछे ही Space Complexity भी दौड़ा चला आता है.. बीच के उस युग को याद कर रहा हूँ, जी हाँ, यकीन मानिए जनाब, कंप्यूटर में एक साल को भी आप एक युग मान कर चल सकते हैं, जब मोबाईल तकनीक बाजार में अपने वजूद को लेकर संघर्ष में थी और कंप्यूटर के हार्ड डिस्क में इतनी जगह रहने लगी थी की 1GB का साफ्टवेयर भी इंस्टाल करने से पहले दुबारा सोचना नहीं पड़ता था.. उस युग में Space Complexity भी अपनी इज्जत खोकर कहीं सड़क किनारे भिखारी के से हालात में थी.. फिर Embedded Technology जैसे-जैसे जेबों में मोबाईल की शक्ल में समाने लगी वैसे-वैसे Space Complexity साफ्टवेयर के बाजार में फिर से पूरी इज्जत के साथ छाने लगी..



साधारण भाषा में Space Complexity किसी भी प्रोग्राम के कार्यान्वयन होते समय RAM में छेकने वाले कम से कम जगह लेने वाली प्रक्रिया को कार्यान्वयन करने वाले वाले कलन विधि(Algorithm) को कहते हैं.. रुकिए-रुकिए.. मैं मजाक में "साधारण भाषा" शब्द का प्रयोग नहीं किया हूँ.. दरअसल मैं इससे सरल भाषा में इसे नहीं लिख सकता, हाँ कभी आमने-सामने मुलाक़ात हो तो बोल कर जरूर समझा सकता हूँ.. ;)

अगर जरा अधिक अंदर घुसते हुए देखें तो किसी कलन विधि(पहले बताया था ना Alogorithm, अब दुबारा मत पूछना) T और इनपुट x के लिए DSPACE(T,x) बताता है डिस्क सेल की संख्या को जो अभिकलन(Computation) T(x) के दौरान होता है..
नोट - DSPACE (T) = O(f (n)) if DSPACE (T, x) = O(f (n)) with n = |x | (length of x).
नोट - DSPACE (T) अपरिभाषित है जब कभी T(x) हाल्ट नहीं करता..
(अब 'O' के बारे में सवाल जवाब ना ही किये जाएँ तो अच्छा है.. मैं यहाँ Time Complexity के बारे में लिखने नहीं बैठा हूँ..)


अब जरा इसके उदाहरण के ऊपर आते हैं.. पहले ही कहे देता हूँ कि ये मुक्तकछंद कविता सी दिखने वाली चीज मैंने गूगल से सर्च करके निकाला है.. मुझे C अथवा C++ का कोई भी प्रोग्राम किसी मुक्तकछंद से कम नहीं दिखता है.. कभी प्रेम रस में सराबोर तो कभी वीर रस में.. कभी कभी तो ऐसा लगता है जैसे for loop मानो ऐसा कह रहा हो जैसे for you.. जन्म-जन्मांतर का साथ हो.. continue के कार्यान्वित होने भर से ही एक उल्लास सा छा जाता है, कि यह कोड अभी छोड़ कर नहीं गया है, पुनः कार्यान्वित होगा.. break शब्द के आने मात्र से दिल टूटने का अहसास होने लगता है.. वहीं Stack Overflow हो कर प्रोग्राम के क्रैश होने की तुलना मैं मृत्यु से करना चाहूँगा..

उफ़.. मैं भी क्या बक-बक करने लगा.. फिलहाल तो आप यह मुक्तकछंद कविता के रूप में Space Complexity का एक उदाहरण पर गौर फरमाएं..
// note: x is an unsorted array
int findMin(int[] x) {
int k = 0; int n = x.length;
for (int i = 1; i < n; i++) { if (x[i] < x[k]) { k = i; }// IF END }// FOR LOOP END return k; }


क्या हुआ? इतनी अच्छी कविता है, कम से कम तारीफ़ के एक बोल-बचन तो बनते हैं यार!!

समझ सकता हूँ की आप अब तक बोर हो चुके होंगे.. तो कुछ और बात करें? Space Complexity से बात चली थी, सो उसी की बात करूँगा.. आप आगे पढ़ें..


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रात के बारह बज कर सैतालिस मिनट पर मोबाइल हल्का सा वाइब्रेट करता है, सोचता हूँ की शायद किसी ने GTalk पर पिंग किया होगा.. मोबाइल उठा कर देखता हूँ, एक SMS है..
swd

कुछ दिनों पहले तक ऐसे ही मैसेज "Swt drm" की शक्ल लिए होता था, चलो कुछ और जगह बची!!
सोचता हूँ कि "ये लड़की रातों की नींद खराब करके Sweet Dreams का मैसेज भेज रही है.." ख्यालों का घोडा कुछ और दौडाने पर ये पाता हूँ की "बड़का ना खुद IT Professional बनता फिरता हूँ.. Space Complexity का सही उपयोग तो यहाँ किया जा रहा है, वो भी एक Arts विषय की लड़की के द्वारा.. तिस पर भी बिना किसी Algorithm के.."


Note - हर कहानी में सच्चाई की तलाश अच्छी नहीं होती मित्र.. कहानी अक्सर सच एवं कल्पना के मिश्रण से ही तैयार होता है.. ;-)

Thursday, March 24, 2011

एक थी महुआ घटवारन

वो जो महुआ घटवारन का घाट है न, उसी मुलुक की थी महुआ! थी तो घटवारन मगर सौ सतवंती में एक! उसका बाप दिन-दिहाड़े ताड़ी पीकर बेहोश पड़ा रहता था, उसकी सौतेली माँ थी साक्षात राक्षसनी.. महुआ कुंवारी थी, हरी-पुरी दुनिया में कोई ना था उसका!
दुनिया बनाने वाले,
क्या तेरे मन में समाई, तुने,
काहे को दुनिया बनाई, तुने,
काहे को दुनिया बनाई?

कैसे करूँ महुआ के रूप का बखान? हिरनी जैसी कजरारी आँखे, चाँद सा चमकता चेहरा, एड़ी तक लंबे रेशमी बाल.. जब वो मुस्कुराती, तो जैसे बिजली कौंध सी जाती.. भगवान जी ही ऐसा रूप भर सकते हैं माटी के पुतले में!!
काहे बनाए तूने, माटी के पुतले?
धरती ये प्यारी-प्यारी, मुखड़े ये उजले?
काहे बनाए तूने जीवन का खेला?
जिसमें लगाया जवानी का मेला...
लुकछुप तमाशा देखे, वाह रे तेरी खुदाई, तुने,
काहे को दुनिया बनाई?

जवान हो गई थी महुआ, फिर भी कहीं शादी ब्याह की बात नहीं चलायी गई.. सुबह शाम वह अपनी मरी माँ को याद करती रोती.. रात-दिन कलपता था बिचारी का मन.. मन समझती हैं ना आप?
तू भी तो तड़पा होगा, मन को बनाकर,
तूफां ये प्यार का मन में छुपा कर,
कोई छवि तो होगी आँखों में तेरी,
आंसू भी छलके होंगे पलकों से तेरी..
बोल क्या सूझी तुझको? काहे को प्रीत जगाई?
तूने, काहे को दुनिया बनाई?

एक दिन एक थका-प्यासा मुसाफिर पानी पीने नदी किनारे आया.. महुआ को देखते ही उसपे रीझ गया.. नादान महुआ भी उसे दिल दे बैठी.. जंगल के आग की तरह फैल गई इनके प्यार की बात.. सौतेली माँ भला कैसे देख सकती थी उनका सुख? उसने महुआ को एक सौदागर के हाथ बेच दिया.. रोती-छटपटाती महुआ चली गई सौदागर के साथ, बिछुड गई जोड़ी, महुआ का प्रेमी आज भी जैसे रोता है!!!
प्रीत बना के तूने, जीना सिखाया..
हंसना सिखाया, रोना सिखाया..
जीवन के पथ पर मीत मिलाए,
मीत मिला के तूने सपने जगाये..
सपने जगा के तूने काहे को दे दी जुदाई,
तूने, काहे को दुनिया बनाई..



Friday, June 04, 2010

ब्लाह..ब्लाह..ब्लाह..

"मैं बहुत कम बोलती हूं ना, सो कभी-कभी बहुत दिक्कत हो जाती है.." पिछले दस मिनट से लगातार बोलते रहने के बाद एक लम्बा पॉज देते हुये वो बोली..

कुछ दिनों से लग रहा है कि हिंदीभाषी अब धीरे-धीरे बढ़ते जा रहे हैं मेरी कंपनी में, आज से तीन साल से तुलना करने पर उत्तर भारत के अधिक लोग दिखाई पड़ते हैं अब..

"मुझे यहां कोई हेल्प नहीं किया, जो कुछ अभी आता है वो सब खुद से ही करके सीखे हैं.. अरे, मैं भी कैसी हूं ना! तभी से खा रही हूं और आपसे पूछा भी नहीं.. मेरे बगल में बैठती है ना, क्या नाम है उसका? हां *******.. अभी परसों कुछ पूछे तो डांट दी.. मुझे रोना आ गया.. अब आप ही बताईये, आपसे कोई पूछता है तो आप उसे डांट दोगे क्या? आता है तो बता दो, आपका क्या जाता है.. नहीं आता है तो वही बोल दो.. और अगर टाईम नहीं है तो यही बोल दो.. डांटने कि क्या जरूरत है? अरे ये गट्टा आपको कैसा लगा? मम्मा बनाई है.. बहुत अच्छा बनाई है.. चावल का है, बेसन का नहीं.."

वो लगातार बोले जा रही थी.. पिछले तीन महिने से वो मेरे ही प्रोजेक्ट में मगर एक दूसरी टीम में एज अ ट्रेनी ज्वाईन की है.. हर दिन दोपहर साढ़े तीन बजे के लगभग मैं कैंटीन में जूस पीने जाता हूं, आज वह थोड़ी देर से खाना खाने आयी थी तो मुलाकात हो गई.. अमूमन इस समय कोई कैंटीन में होता नहीं है, मेरे इसी समय जाने कि असल वजह थोड़ी देर अकेले बैठने की ख्वाहिश होती है और उस समय पापाजी को अक्सर फोन भी किया करता हूं.. उसने साथ बैठने का ऑफर दिया तो मैंने मना नहीं किया.. पहली बार गौर से देख भी रहा था.. अगर दूरदर्शन के गुमशुदा तलाश केंद्र वाले उसके बारे मे बताते तो वह कुछ ऐसा होता - "कद पांच फुट दो इंच, रंग गेहुवा और चेहरा गोल है, दायें आंख के ऊपर कटे का निशान है.." :D

"मेरे साथ सबसे बड़ी प्रोब्लेम ये है कि मुझे जो आता है वो मैं समझ सकती हूं, मगर दूसरे को समझा नहीं सकती हूं.." अब अगर किसी दूसरे कि बातें अपनी सी लगती है तो आश्चर्य नहीं होता.. अब लगता है कि हर कोई किसी ना किसी मायने में हर किसी सा ही होता है.. "बचपन से चेन्नई में हूं मगर तमिल में परफेक्शन अभी तक आया नहीं है.. और चाहे कुछ भी, मगर अपने लोगों का एक्सेंट इनसे अलग होता है, सो कई बातें कहना कुछ और चाहते हैं और ये समझते कुछ और हैं.." हम्म्म!! ये भी अपना भोगा सत्य है.. मगर तीन साल में ही इससे मुझे निजात मिल गई है.. यह तो बचपन से है, अभी तक अपना एक्सेंट बदल नहीं पायी है.. हद्द है भाई.. "मुझे यहां काम करने में बिलकुल मन नहीं लगता है, मुझे जो टेक्नोलोजी पसंद है उस पर काम नहीं करा के मुझे विजुअल बेसिक पर काम दे रखा है.. मुझे जावा पसंद है.." यह कौन सी नई बात है.. यहां तो हर दुसरे प्रोजेक्ट में जाने पर एक नई टेक्नोलोजी पर काम करना पड़ता है.. मगर सोचने कि रफ़्तार बढती ही जा रही थी, वैसे भी अगर आप बोल नहीं होते हैं तो कुछ सोच रहे होते हैं..

वहां से उठने से पहले मैंने उसे सिर्फ इतना ही कहा कि अगर कोई भी डांटे तो उसी समय उसे बोल दो कि "यू शुड नॉट टॉक विथ मी लाईक दिस. इफ यू हैव एनी प्रोब्लेम देन गो थ्रू प्रोपर चैनल..".. "ओह!! ऐसा होता है क्या?".. "हां! कोई ऐसे ही किसी को नहीं डांट सकता है.. चाहे कोई भी हो, CEO ही सही.. कम से कम इस कंपनी में तो ऐसा ही है.."

अभी कुछ दिनों पहले मेरा एक मित्र भी कुछ ऐसे ही सवाल पूछ रहा था और शिकायत कर रहा था कि कोई मदद भी नहीं करता है.. शुरूवात में मेरी भी यही समस्या थी.. अब लगता है कि मैं इन सबसे ऊपर उठ चुका हूं.. ;)

जिस तरह से लगातार बोले जा रही थी, उससे तो मैं इसी बात पर खुश हूं कि मुझे इस तरीके का कोई सवाल नहीं पूछना पड़ा कि "हां बसंती, तुम्हारा नाम क्या है?" :D

Saturday, May 29, 2010

जानवरों से अधिक मासूम प्रेम अब हमें मयस्सर कहाँ

वो कई सालों तक हमारे साथ रहा.. हम बच्चों के जिद पर ही उसे घर में लाया गया था.. पटना सिटी के किसी पंछियों के दूकान से पापाजी खरीद कर लाये थे.. उससे पहले भी हमने कई बार कोशिश कि थी तोता पालने कि, मगर हर बार कोई ना कोई जुगत लगाकर सभी रफूचक्कर हो जाते थे..

दूकान वाले ने बताया था कि यह पहाड़ी तोता है, और उस जमाने में एक सौ पचास रूपये में तोता बहुत महंगा माना जाता था फिर भी पापाजी वही खरीद लाये थे.. बाकी तोतों से लगभग दोगुने साइज का था.. उसके पंख पर लाल, हरा और नीले रंग का निशान था.. पहले के अनुभव ने यही सिखाया था कि अधिकांश तोतों को तरह-तरह के रंगों में रंग दिया जाता है जिससे देखने में वह खूबसूरत दिखे और दाम भी कुछ ऊपर चढ़ जाए, सो पहली नजर में इसके पंख को लेकर भी ऐसा ही कुछ लगा था.. लगभग महीने भर हम इसे खूब नहलाते थे, जिससे इसका नकली रंग निकल जाए और यह अपने प्राकृतिक रंग में वापस आ जाये.. वह तोता भी बेचारा हैरान-परेशान, क्या करता, चुपचाप नहाता रहा.. जब उसके पुराने पंख झर गए और नए पंख आये, फिर समझ में आया कि यह इसका प्राकृतिक पंख ही है.. :) कुल मिलकर निहायत ही दिलकश पंछी था वह..

सब कुछ होने के बावजूद भी हम उसे कितना भी सिखाये कि कुछ बोले, मगर वह कुछ सिखा नहीं.. खुद में ही कुछ गुलगुलाता, और हम उसे ही उसका बोलना समझ लेते.. मेरी नानी जब भी घर आती थी तो घंटों बैठकर "बोल मिट्ठू सीत्ता-राम" तो कभी "कटोरे-कटोरे" सिखाना चाहती थी.. अब कभी मजाक में हम कहते हैं कि नानी उसको सिखा-सिखा कर मर गई, लेकिन उस नालायक को नहीं सीखना था सो नहीं सीखा.. :) एक हमारा रसोइया "विनोद जी" भी उसे खूब सिखाना चाहे थे, मगर वह भी नाकाम रहे थे..

पहले के तोतों के अनुभव से यह भी समझ में आ गया था कि इसका भोजन भी अन्य तोतों से कम से कम दोगुना है.. पिंजड़ा भी दोगुने साइज का ही खरीदना पड़ा था.. एक अलग चौकी भी बनवाया गया जो उसके पिंजडा से थोडा बड़ा था.. घर के छोटे बच्चों के जैसे ही कोई फल आया या कुछ ऐसा जिसे वह खा सके तो सबसे पहले उसे ही दिया जाता था..

एक घटना याद आ रही है कि कैसे एक बार उसे "लीची" खाने को हम दिए थे.. जैसा कि तोतों कि आदत होती है कि वह खाने में किसी कड़े चीज को ढूँढता है, सो वह लीची में भी सीधा अपना चोंच गडा दिया.. लीची में जैसे ही छेद हुई, वैसे ही रस का फव्वारा उसमे से फूट कर मेरे तोते के पूरे चेहरे पर फैल गया.. और वह बेचारा उससे इतना घबरा गया कि उस मीठे फल से भाग खड़ा हुआ.. बाद में धीरे-धीरे उसे भी मजे लेकर खाना सीख लिया..

अमूमन जैसा कि दूसरों के घर में तोतों को देखते थे रोटी या चावल खाते, उससे ठीक अलग मेरा तोता वह कभी नहीं खाता था.. उसे किसमिस बेहद पसंद था.. संतरे भी चाव से खाता था.. अंगूर में तो उसकी जान ही बस्ती थी जैसे.. आम के महीनो में आम से उसका पिंजडा महकता रहता था.. सेब, पपीता.. बाद में वह उस पिंजड़े में इतना निश्चिन्त रहने लगा था कि मैं शैतानी में कमरे कि खिडकी-दरवाजे बंद कर के उसे पिंजड़े से जैसे ही निकलता, वह ५-६ सेकेण्ड मेरे आस-पास भटकने के बाद वापस उसी पिंजड़े में घुसने कि मसक्कत में लग जाता..

शुरुवाती दिनों में भैया उसे खाना देने से लेकर उसका पूरा ख्याल रखते थे.. भैया के घर से बाहर जाने के बाद मैं वही काम करने लगा.. मगर मैं उसकी पूरी फीस उससे वसूलता था.. पिंजड़े का दरवाजा खोल कर, हाथ अंदर घुसा कर उसे सहलाता, उससे खेलता.. मगर वह मुझे काटता नहीं था.. वहीं किसी दूसरे कि यह मजाल कहाँ कि वह एक अंगुली भी उसके पिंजड़े में डाल दे.. अगर किसी दिन उसे खाना देने में जरा सी भी देर हुई नहीं कि बस, किसी छोटे बच्चे सा रूठ जाता था.. फिर उसे अपने हाथ से एक-एक चने का दाना खिलाना पड़ता था.. मेरा गिना हुआ था कि वह कितना चने खाता है.. एक बार में 30 से 35 चने खाता था वह.. अगर भूखा हो तो 45-50 तक भी गिनती पहुँच जाती थी.. और अगर नखरे मारने के मूड में हो तो, चना मुंह में लेकर उसे काट-कूट के फ़ेंक देता था..

हमारा कोई एक नियत ठिकाना तो था नहीं, सो हम जहाँ कहीं भी जाते वहाँ वह हमारे साथ भी जाता.. इसी क्रम में वह पटना, बिक्रमगंज, राजगीर, गोपालगंज भी घूम चुका था..

बाद में मैं भी घर से बाहर निकल गया, अपनी जमीन तलाशने.. अब उसका ख्याल घर के नौकर-चपरासी करने लगे.. एक बार पापा-मम्मी मुझसे बोले कि "अब यह बूढा हो गया है, पता नहीं कब मर जाएगा.. पास में मरेगा तो अच्छा नहीं लगेगा, सो इसे उड़ा देते हैं.." मुझे बहुत बुरा लगा, क्योंकि अब जब यह अपनी सारी उड़न भूल चुका है.. प्राकृतिक रूप से रहना भूल चुका है, और बूढा भी हो गया है तब इसे नए सिरे से अपनी जिंदगी शुरू करने कि मशक्कत करनी परेगी.. जब वे दो-तीन बार यही बात कहे तब एक दिन मैंने कह दिया, "फिर तो कायदे से जब मनुष्य बूढा हो जाये तब उसे भी घर से निकाल दिया जाना चाहिए?" आगे मुझे कुछ कहने कि जरूरत नहीं पड़ी..

एक दिन जब मैं होस्टल में था तब घर से मम्मी का फोन आया.. हैरान-परेशान थी और रो भी रही थी.. बोली कि एक चपरासी कि गलती से वह उड़ गया.. मुझे उसके भागने का दुःख हुआ.. मगर सबसे अधिक दुःख और भय इस बात को लेकर था कि अब वह अपनी जिंदगी कैसे लड़ पायेगा.. कोई कुत्ता-बिल्ली कहीं उसे मार ना दिया हो..

खैर उसे जाना था सो वह चला गया.. अब भी कभी रात सपने में देखता हूँ कि मेरा तोता भूखा है और मैं उसे खाना देना भूल गया हूँ.. सुबह तक वह सपना भी भूल जाता हूँ अक्सर.. मअगर जेहन में कहीं ना कहीं वह याद बची हुई है जिस कारण उसे सपने में देखता हूँ.. हाँ, मगर यह भी प्रण कर चुका हूँ की कभी किसी पंछी को कैद में नहीं रखूँगा..

अभी कुछ दिन पहले अराधना अपने फेसबुक पर अपडेट कि थी की "kali no more..." अभी कुछ दिन पहले ही कली को लेकर वह आई थी.. 'कली' के जाने से पहले हर दूसरे दिन वह फेसबुक या बज्ज या ब्लॉग पर दिख ही जाती थी.. मगर 'कली' के बाद वह भूले बिसरे ही कहीं दिखी है.. बीच में उसकी एक पोस्ट आई थी "अब सब कुछ पहले जैसा है".. मुझे दुःख हो रहा था की आभासी दुनिया की एक अच्छी मित्र दुखी और परेशान है.. उम्मीद करता हूँ की जल्द ही वह इस दुःख से बाहर निकल आएगी.. अराधना ने कली का एक वीडियो फेसबुक पर भी डाली थी जिसे उसके फेसबुक मित्र यहाँ देख सकते हैं..

Friday, May 28, 2010

क्योंकि जिंदगी से बढ़कर कोई कहानी नहीं होती

इस कहानी का कोई पात्र काल्पनिक नहीं है.. या फिर ये भी कह सकते हैं कि यह कोई कहानी नहीं है.. यह असल जिंदगी कि कड़वी सच्चाई है.. वैसे भी मेरा मानना रहा है कि असल जिंदगी से बढ़कर कोई कहानी नहीं होती है.. यह मेरी एक मित्र कि कहानी है जिससे अचानक कई सालों बाद इस बड़ी सी छोटी होती हुई जा रही दुनिया में तार जुड गए.. जब सालों बाद ई-मेल के माध्यम से मुलाक़ात हुई तो बाते भी उसी समय कि शुरू हुई जब हम आखिरी बार मिले थे, और उसी समय कि बातों से ही बाते शुरू हुई.. एक सिरा पकर कर मैंने जरा सा खिंचा, और बाकी खुद-ब-खुद उधरता चला गया..

मनुष्य के भीतर कि जिज्ञासा ही मनुष्य को नई उचाईयां भी प्रदान करता है साथ ही उन्हें या दूसरों को संकट में भी डालता है.. अब जैसे मैंने यह पहले ही बता दिया है कि यह सच्ची कहानी है, कोई कोरी कल्पना नहीं.. तो मेरे पाठक अथवा मेरे मित्रों' के मन में नाम जानने कि इच्छा सबसे पहले होगी, जो मैं किसी भी हालत में नहीं बताने वाला हूँ.. कृपया मुझसे व्यक्तिगत रूप में भी यह सवाल ना पूछें, ना तो मेल में और ना ही फोन पर.. नाम कुछ भी आप सोच लें.. रेवा-रेवती, सोनल-आरती.. कुछ भी..

उसने मुझसे कहा कि "तुम लिखते हो, तो इस पर भी कोई कहानी लिख दो.." मेरा कहना था कि मैं लिखूं तो शायद कोई नाटकीयता आ जाए, सो बेहतर है कि तुम ही लिखो और मैं उसे तुम्हारा नाम बताए बिना अपने ब्लॉग पर पोस्ट कर देता हूँ.. वैसे भी मुझे कहानी लिखनी नहीं आती है.. उसने मुझे रोमण में लिख भेजा, जिसे मैंने हिंदी में कन्वर्ट किया है सो त्रुटि कि संभावना बनी हुई है.. बाकी आप खुद ही पढ़ें :

कितना चाहती थी न मैं उसको! क्या मेरे आंसू उसके लिए कोई मायने नहीं रखते? क्यूँ किया उसने मेरे साथ ऐसा?

उस से मैं एक रिश्तेदार की शादी में मिली थी.. करीब १०-१२ साल पहले. २-४ मिनट की बात में उसने मुझसे मेरा फोन नंबर मांग लिया. दिल में खुशी मगर चेहरे पे संकोच का भाव लेकर मैंने नंबर दे दिया, साथ में ये भी बता दिया की किसी लड़की से फोन करवाएं| मन में कई सपने संजो कर मैं वापस लौट आई और इंतजार करने लगी उसके कॉल का. दिन बीते, हफ्ते बीते. कई बार सोचा की मैं ही फोन कर दूं लेकिन फिल्मों में ऐसा कहाँ दिखाते हैं? उसमे तो हमेशा लड़का ही फोन करता है, उस उम्र में फिल्मो का असर भी कुछ अधिक ही होता भी है. ऐसा सोच कर फोन रख देती थी. फिर एक दिन घंटी बजी, फोन उठाया. “हेल्लो…” दिल की धडकन जैसे रुक गयी…..ये तो उसी का फोन है! एक औपचारिक बातचीत के साथ ये सिलसिला शुरू हुआ…और कब प्यार में बदल गया पता नहीं चला! खैर….प्यार तो शायद पहली मुलाकात में ही हो गया था….उसको फार्मल बनने में टाइम लग गया. बहुत चाहने लगी थी उसको! फोन की घंटी सबसे प्रिय धुन हो गयी थी और उसके बोल भगवान के शब्द. मंदिर में जब भी सर झुकाया, सिर्फ उसके लिए मन्नत मांगी, वैष्णो देवी से लेकर साईं बाबा, सब के आगे माथा टेक लिया. भगवान का प्रसाद भी दो बार लेती थी, एक उसके नाम का भी तो लेना होता था न. मन ही मन भगवान मान लिया था मैंने उसको, मेरी पूजा, मेरी आराधना सब कुछ उसको समर्पित.

समय बीतता गया, और ये सिलसिला अभी भी फोन पर ही चल रहा था(हाँ, हम दोनों अलग अलग शहर में थे). फिर उच्च शिक्षा के लिए मैं बाहर निकली. नया शहर, नए लोग…सब कुछ नया-नया. कुछ लड़कों ने प्रेम-पींग बढ़ाने की कोशिश की लेकिन मैं अपने देवता की मूर्ती को खंडित नहीं कर सकती थी, कभी नहीं. उस से मिलने की चाह में मैं उसके शहर जा पहुंची, एक तकनिकी ट्रेनिंग के बहाने. होस्टल में थी. छुप छुप के कभी कभी मिलते थे हम दोनों. होली का त्यौहार नज़दीक था और पता नहीं क्यूँ हर साल होली के आस पास मेरी तबियत ज़रूर खराब होती है सो इस बार भी हुई. मम्मी कहती हैं मौसम बदलने के चलते. सभी घर बुला रहे थे होली के अवसर पर लेकिन मैं तो उसके साथ रहना चाहती थी, एक फागुन साथ बिताना चाहती थी. सुबह हुई, दोपहर फिर शाम और रात के १०. वो आया होस्टल के बाहर, मैं तपते हुए बुखार में उस से मिलने गयी. कमजोरी भी हो गयी थी क्यूंकि सुबह से कुछ खाया नहीं था (छुट्टी के चलते मेस भी बंद था). मैंने देखा की उसके चेहरे पे शिकन तक नहीं आई मेरी दशा देख के. मैं तो मर ही जाती उसे इस हाल में देख के. लेकिन….शाम आई शाम गयी. अब तो उसके इस उपेक्षित व्यवहार की आदि हो चुकी थी मैं. और मज़े की बात ये है की मैं खुद ही कोई ‘एक्सक्यूज' बनाती उसके व्यवहार का, और खुद ही माफ कर देती उसको. बहुत चाहती थी उसको मैं!

अब उसके घर में लोगों को पता लग चुका था हमारे प्यार के बारे में, उन्हें ये कतई मंज़ूर नहीं था. वो बहुत बड़े परिवार से था और मैं एक साधारण लेकिन पढ़े-लिखे परिवार से. वैसे उन्हें पढाई लिखाई से कोई लेना देना नहीं था. एक दिन उसकी माँ और बड़े भैया मेरे होस्टल आये, कमरे में आते ही माँ ने मुझे एक थप्पड़ रसीद दिया और कहा की मैं उनके बेटे से दूर हो जाऊं. फिर बड़े भैया ने मेरा हाथ पीछे की ओर मरोड़ा और हाथ में अपना कड़ा निकला और उस कड़े से मेरे चेहरे पे वार करने लगे और ये कहने लगे की ऐसा चेहरा कर दूंगा की कोई देख भी नहीं पायेगा. वो दोनों मारते चले गए और मैं चुपचाप सहती चली गयी. कर भी क्या सकती थी. माँ की चूडियाँ टूट के बिखर चुकी थीं और कुछ मेरे शारीर पर चुकी थी…. मगर असल चुभन तो कहीं अंदर थी. जब वो दोनों थक गए तो मुझे ऐसी ही हालत में छोड़ कर चले गए. और जब मुझे होश आया, उठने की कोशिश की तो पाया की एक हाथ नहीं उठ रहा है, टूट चूका था और चेहरे और हाथ से खून निकल रहा है एक आँख भी काली होके सूज चुकी थी. कुल मिलाकर भईया का सपना पूरा हो चूका था. मैं सच-मुच देखने लायक नहीं रह गयी थी. उसे भी ये सारी बातें पता लग चुकी थीं. मेरे घर पे भी सबको पता लग चुका था, लेकिन मैंने उन्हें अपनी हालत के बारे में नहीं बताया. घर गयी, तीन दिन बीत चुके थे लेकिन उसका कोई फोन नहीं आया. सुनने में आया की वो डर के कहीं छुप गया था, घर में एक आवाज़ तक नहीं उठाई उसने. लेकिन ये घटना भी मेरे प्यार तो नहीं तोड़ पायी. पता है की बेवकूफी थी! वो भी एक बुजदिल इंसान के लिए.

धीरे धीरे बरस बीतने लगे और एक दिन जब घर पे फोन किया तो भनक लगी की मेरी शादी की बात चलने लगी है. दिल बैठ गया मेरा. कैसे कर सकती हूँ किसी और से शादी? किसी और की कैसे हो सकती हूँ मैं? मैंने उसे फोन लगाया और सारी बात बता के रो पड़ी. उसने कहा - “अच्छा..!!'” ये क्या कह रहा है वो? उसने ठीक से सुना नहीं क्या की मैंने क्या कहा? मैंने फिर से दोहराया, उसने फिर वही कहा.

अब सब कुछ समझ में आ गया था.

उसकी शादी होने वाली है. सुना है की आजकल अपनी शेरवानी और सूट डिजाईन करवाने के लिए डीजाइनर के चक्कर लगा रहा है.


वैसे मैं बताता चलूँ कि आज वो खुश है अपने जीवन में, आत्मविश्वास के साथ अपने पैरों पर खरी है.. शायद मैं वह बातें ना पूछता तो वह बताती भी नहीं.. शायद मैंने कुछ जख्म फिर से हरे कर दिए..

Thursday, April 15, 2010

इंडिया सर ये चीज धुरंधर

किसी ने सच ही कहा है, कि अंग्रेजी में अक्सर अपशब्द डाल्यूट हो जाया करते हैं.. अपनी तीव्रता नहीं बनाये रख पाते हैं.. कुछ ऐसा ही फौलोवर शब्द के साथ भी है.. शब्दकोश.कॉम पर फौलोवर शब्द के तरह-तरह के मतलब दे रखे हैं.. मसलन - अनुगामी, अनुयायी, शिष्य, अनुसरणकर्ता, अधीन चेला, आगे दिया हुआ.. मेरी समझ में इसी का स्लैंग रूप "चमचागिरी" भी है..

आजकल अजित अंजुम जी फेसबुक पर चमचों के ऊपर रिसर्च कर रहे हैं.. उन्हें तरह-तरह के नये शब्द लोग सुझा रहे हैं.. कोई चमचाधिराज बता रहा है टो कोई चाटू नारायण.. एक भाई साहब आकर बेलचा पर भी नजरें इनायत करके आख्यान दे गये इस हिदायत के साथ कि चमचा और बेलचा का पुराना नाता है..

मेरी समझ में अगर आप किसी के साथ, अपनी इच्छा ना होते हुये भी, दो कदम अधिक चल लेते हैं तो इसे चमचागिरी के कैटेगरी में नहीं रखा जा सकता है.. एक उदहारण देना चाहूँगा, अगर आपके पास 'ए' और 'बी' ऑप्शन है और आप कुछ भी चुने इससे आपको कोई अंतर नहीं पड़ता हो, ऐसे में किसी के कहने पर आप 'ए' चुन लेते हैं और लोग आपको उसका चमचा बता जाते हैं..इस पर मुझे सिर्फ एक शेर याद आता है, "करीब जाकर छोटे लगे... वो लोग जो आसमान थे.." आज प्यार या लगाव भी चमचागिरी के फेर में पड़ने लगे हैं, खैर ये अपनी अपनी समझ का फेर है..

चमचागिरी के कैटगरी पर बात उठाने पर राजीव मिश्र जी आकर उसे छः भागों मे ऐसे बांटते हैं कि इस दुनिया जहान का हर कर्म चमचागिरी के घेरे मे आ जाये.. वो बताते हैं :

पहली वेरायटी --- वो जो बॉस की हाँ में हाँ तुरंत मिलाते हैं।

दूसरी वेरायटी --- जो बॉस की हाँ में हाँ मिलाने की पहले वजह ढूंढते हैं।

तीसरी वेरायटी --- क्या बात है सर जी, वाह भई वाह, आपने तो कमाल कर दिया, सिर्फ आप ही यह कर सकते थे आदि आदि वाक्यों से अपनी बात कहते हैं।

चौथी वेरायटी --- ऐसा कोई मौका नहीं खोते जैसे उनका जन्मदिन, शादी की सालगिरह, बच्चे का जन्म दिन, बीवी का जन्मदिन... जिसमें उनसे पहले कोई बधाई देदे।

पांचवीं वेरायटी --- कुछ ऐसे होते हैं कि कुछ लोग सिर्फ अपने होने का एहसास कराने के लिए बीच-बीच में लाइक्स इट, हं, हमममम आदि लिख देते हैं।

छठा वेरायटी --- भी जो अपनी शेखी बघारने के लिए अपने से मेल खाता विचार आने का इंतजार करते रहते हैं...

यह सब पढते हुए मेरे मन मे लालू प्रसाद यादव जी द्वारा अक्सर प्रयोग मे लाया जाने वाला जुमला याद हो आया.. टीटीएम, यानि ताबड़तोड़ तेल मालिश.. कुछ घंटे बाद ही अजित जी ने भी यह बात लिख डाली..

अंत मे रविन्द्र पंचोली जी द्वारा लिखा गया कविता, दोहा या गजल टाइप का ही कुछ भी पढते जाएँ..
सुन चमचा संसार में सभी चम्मच एक रंग
कोई उड़ाए दारू तो कोई पीए भंग
काम करने वाला रोए और ये लंबी तान कर सोए
ये काटते माल ख़ुद्दार दिहाड़ी को रोए..


अधिक विस्तार से पढ़ने के लिए आप अजित जी के फेसबुक प्रोफाइल में झाँक आयें.. चमचागिरी पर अगर कोई PHD करना चाहे तो पूरी थिसिस का माल उन्हें वहाँ मिल ही जायेगा.. कई थ्रेड बने हुए हैं चमचों के ऊपर..

Wednesday, September 09, 2009

पिछले एक महिने का लेखा जोखा

कुछ किताबें जो पढ़ी गई -

साहित्य -
1. मुर्दों का टीला (हिंदी)
2. वोल्गा से गंगा (हिंदी)
3. कतेक डारीपर (मैथिली)
4. मेघदूतम (मैथिली)
5. चार्वाक दर्शन (हिंदी)

तकनीक -
1. ProvideX Language Reference
2. Work Order in ERP System.
3. Job Cost in ERP System.
4. Software Engineering - Roger S. Pressman (अभी भी पढ़ी जा रही है)

जिसे पढ़ना है -
1. Some good books on Advance SQL.
2. Bill of Material in ERP System.
3. MAS 90 and MAS 200 ERP. Level 4 Programming Standards.

Tuesday, August 25, 2009

कमीने इफेक्ट, "वैसे मैं भी फ को फ बोलता हूं"


जिधर देखो उधर ही एक ना एक पोस्ट या आर्टिकल "कमीने" सिनेमा का पड़ा हुआ है आजकल.. जैसे यह आज के फैशन का एक हिस्सा बन गया है.. देख भले ली हो मगर यदी कुछ लिखा नहीं तो छीछालेदर होना ब्लौगजगत में आवश्यक है.. और हम तो ऐसा चाहते हैं नहीं, सो चलते चलते हम भी इस धर्म को निबाह ही जाते हैं..

यहां कई गुणीजन विशाल भारद्वाज को गरिया चुके हैं, कुछ आहत हैं, तो वहीं कुछ लोग इसे शानदार कमर्सियल सिनेमा बता कर विशाल भारद्वाज को कुछ नया करने की बधाई दे चुके हैं.. गरियाने वाले अधिकतर लोग इस सिनेमा कि तुलना ओमकारा और मक़बूल से कर रहे हैं, वहीं कुछ लोग इसके अंत में हुई अजिबोगरीब हिंसा को टेरंटिनो के सिनेमा की नकल बता रहे हैं.. वहीं कुछ लोग इसके बहाने टेरंटिनो की क्लासिक किलिंग को भी दाद दे रहे हैं.. अब जबकी लगभग सभी कुछ लिखा ही जा चुका है तो मैं क्या लिखूं? ठीक है, मैं आपलोगों को परदे के बाहर का सिनेमा दिखाता हूं..

21 अगस्त, शुक्रवार रात 9 बजकर 10 मिनट.. दोस्तों का फोन आया कि कहां हो तुम, हम सिनेमा हॉल के बाहर खड़े तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं.. "आखिर इंतजार करें भी क्यों ना? टिकट मेरे ही पास जो था.. :)" मैं चेन्नई के सत्यम सिनेमा के बाईक पार्किंग में बाईक पार्क करते हुये कहा कि बस आ रहा हूं दो मिनट में..

चेन्नई में दो-तीन जगह ही ऐसी है जहां खूबसूरत लड़कियां देखने को मिलती हैं, उसमें से सत्यम मल्टीप्लेक्स भी एक है.. उस पर भी स्वाईन फ्लू(देखा, मैंने फ को फ बोला ना? :)) का हमला बोला जा चुका था.. बहुत सारे लोग मुंह पर कुछ ना कुछ बांधकर घूम रहे थे.. ऐसे में लड़कियों के लिये तो और भी आसानी थी, उनके पास दुपट्टा या स्कार्फ तो हमेशा ही होता है.. आगे इस पर और कुछ ना लिखा जा सकेगा मुझसे.. सुबुक.. :(

अंदर जाते समय चेकिंग हुई, वो चेकिंग भी कुछ ऐसी कि अगर कोई कुछ ले जाना चाहे तो आराम से ले जा सकता है.. जिस स्क्रीन में कमीने चल रही थी उसके अंदर जाकर पता चला की हमारे पांच टिकटों में से दो टिकट एक तरफ थी तो वहीं बाकी तीन टिकट उसी रो के बिलकुल अंत में.. अब सबसे किनारे वाला सीट हो तो देखने में दिक्कत आनी स्वभाविक है.. सो मैंने वह सीट पकड़ी जहां से सबसे अच्छे से सिनेमा दिख सकती है.. हमारे मित्र आफ़्रोज़ मुझसे कहते रह गये कि यहां मैं बैठूंगा, मगर मैंने उन्हें यह कह कर पटाया की मान लो मेरे बगल में कोई लड़की आकर बैठती है तो आज तुम्हें एक भाभी मिल जायेगी.. उस समय तो वह मान गया, मगर जब मेरे बगल में एक लड़का आकर बैठ गया तो उसने फिर जिद पकर ली.. तब मुझे धारा 377 की सहायता लेनी पड़ी.. ;)

खैर सिनेमा शुरू हुई और वह सीन भी आया जब शाहिद कपूर को कोकिन एक गिटार में मिलता है.. जैसे ही उसने कोकिन निकाला वैसे ही पीछे से एक लड़के की आवाज आई, "अरे ये तो सत्तू है.." उसके बगल में से किसी लड़की की आवाज आई, "नहीं यार! कोकिन है.." फिर दो-तीन लड़के-लड़कियों की आवाज आने लगी.. "ये सत्तू है.." "नहीं ये कोकिन है.." मैंने आगे से आवाज लगाई, "हां बेटा! सत्तू है तो लिट्टी बना कर खा ले ना?" मेरे बगल में बैठे आफ़्रोज़ ने मुझे केहुनी मारी और धीरे से फुसफुसा कर मुझे बोलने से मना किया.. फिर पीछे से आवाज आई, "बनाऊंगा, जरूर बनाऊंगा.. मगर तुझे नहीं बुलाऊंगा.." और फिर वे लोग और हम लोग, सभी हंसने लगे.. तब तक सिनेमा फिर से अपनी गती पकर चुका था और सभी उस गति के साथ लय ताल मिलाने लगे थे..

इंटरवल के समय मैं पॉपकार्न वाले काऊंटर के बगल में लगे पोस्टरों को देख रहा था.. तभी पीछे से किसी लड़की की आवाज आई, "एक्सक्यूज मी!!" मैंने बिना उसे देखे उसे जाने का रास्ता देते हुये मुस्कुराते हुये कहा, "सॉरी! आई कान्ट एक्सक्यूज.." फिर उसका चेहरा देखा तो अजीब तरह से मुझे देखते हुये वो काऊंटर के लाईन में लग गई और मैं फिर से पोस्टर को देखने लगा.. तभी फिर पीछे से किसी लड़के की आवाज आई, "एक्सक्यूज मी!!" मैंने उसे भी बिना देखे उसे जाने का रास्ता देते हुये मुस्कुराते हुये कहा, "सॉरी! आई कान्ट एक्सक्यूज.." वो लड़का हंसते हुये आगे बढ़ा और काऊंटर के लाईन मे लगते हुये बोला, "नाइस आन्सर.. आगे से मैं भी यही कहा करूंगा.." अबकी वह लड़की उसे अजीब तरीके से देखने लगी.. पक्के से सोच रही होगी कि सभी लड़के शायद ऐसे ही खिसके होते हैं.. ;)

सिनेमा खत्म हो चुकी थी.. मैं आफ़्रोज़ को अपने बाईक पर बिठाया और घर तक का रास्ता लगभग 10-12 किलोमीटर की दूरी 10-15 मिनट में पूरी की और जिसमें अधिकतम रफ़्तार 90 किलोमीटर प्रति घंटे कि थी.. रास्ते में मैं सोच रहा था कि मैं भी तो 'फ' को 'फ' ही बोलता हूं, तो इस बात को लेकर इतने चर्चे क्यों हैं.. बोलकर दिखाऊं क्या?

ठीक है, ठीक है.. बोल कर दिखाता हूं.. "मेरा नाम प्रफान्त प्रियदर्फी है.." ;)


चलते-चलते -
पहले ही इस सिनेमा की इतनी तारीफ मैंने सुन रखी थी कि मैं बस मस्ती करने के मूड में सिनेमा देखने गया था ना की कोई गूढ़ अर्थ ढ़ूंढ़ने.. ना ही ओमकारा या मक़बूल से इसकी तुलना करने में समय गंवाया.. बस मस्त होकर सिनेमा देखी और खूब इंज्वाय करके वापस आ गया.. अपना तो पैसा वसूल..

Tuesday, July 28, 2009

दर्द रूकता नहीं एक पल भी


यह महरूम नुसरत फ़तेह अली खान का गाया एक कव्वाली है.. मुझे यह नेट पर पॉडकास्ट करने के लिये कहीं मिला नहीं, मगर मैं जल्द ही इसे अपलोड करके पॉडकास्ट कर दूंगा.. फिलहाल इसे पढ़कर ही इसका लुत्फ़ उठायें.. :)

दर्द रूकता नहीं एक पल भी,
इश्क की ये सजा मिल रही है..
मौत से पहले ही मर गये हम,
चोट नजरों की ऐसी लगी है..

ऐसी लगी है...
ऐसी लगी है...
ऐसी लगी है...
ऐसी लगी है उनसे...
ऐसी लगी है...
ऐसी लगी है उनसे...

मेरी रो रो के कटती है रैन पिया,
ऐसी लगी है उनसे...
ऐसी लगी है उनसे...

सावन कि काली रतों में,
जब बूंदा-बांदी होती है..
जब सुख कि नींद में सोता है,
तब बिरहा म्हारी रोती है..
बड़ी रो रो कटती है रैन पिया,
जबसे लागी है तुम संग नैन पिया..
ऐसी लगी है उनसे...
ऐसी लगी है उनसे...
ऐसी लगी है उनसे...

हे लागी नाही छूटे रामा,
चाहे जिया जाये..
ऐसी लगी है उनसे...
ऐसी लगी है उनसे...
ऐसी लगी है उनसे...

पत्थर को भी काटो तो वो कट सकता है,
काटे नहीं कटती सब-ए-फ़ुरकत मेरी..
ऐसी लगी है उनसे...
ऐसी लगी है उनसे...
ऐसी लगी है उनसे...

आंख जब से लड़ी मेरी उनकी,
जिंदगी हो गई मेरी उनकी..
ऐसी लगी है उनसे...
ऐसी लगी है उनसे...
ऐसी लगी है उनसे...

अब तो, उनसे लगी है...
अब तो, उनसे लगी है...
अब तो, उनसे लगी है...

मेरी, उनसे लगी है..
मेरी, उनसे लगी है..
मेरी, उनसे लगी है..

वही जो बैठे हैं महफ़िल में सर झुकाये हुये..
मेरी, इनसे लगी है..
मेरी, इनसे लगी है..

मेरी, उनसे लगी है..
मेरी, उनसे लगी है..
सैंया भये कोतवाल, अब डर काहे का?
मेरी, उनसे लगी है..
मेरी, उनसे लगी है..

बलमा के द्वारे, ठारी पुकारूं..
अहमद हमरो छैला हो..
बल बल जाऊं, वांकी सखी री..
हैदर जां के बीर ना हो..
जां के ललना, हंस नैन प्यारे,
ईस पे जिनका साया हो..
बेटी जां की साथ मजहरा,
सद के उन पर जियरा हो..
ऐसे पिया की उंगली पकर कर,
ले चल रे बाजरिया हो..
पुछन लगे, नगर का लोकवा,
ई का लागो तुमरा हो..
लाज की मारी कह ना सकूं मैं,
ई लागो मोरे सैंया हो..
(यहां कुछ गलतिया हो सकती है.. कुछ साफ आवाज नहीं थी यहां..)

मेरी, उनसे लगी है..
मेरी, उनसे लगी है..
मेरी, उनसे लगी है..

कह दूं तोरा मोहे डर काहे का?
प्रीत करी का मैं चोरी करी रे!!
मेरी, उनसे लगी है..
मेरी, उनसे लगी है..
मेरी, उनसे लगी है..

चोट नजरों की ऐसी लगी है,
मौत से पहले ही मर गये हम..
बेवफ़ा इतना अहसान कर दे,
कम से कम इश्क की लाज रख ले..
दो कदम चल के कांधां तो दे दे,
तेरे आसिक़ की मय्यत उठी है..

रखना दुनिया भी है,
मौका भी है,
दस्तूर भी है..
दो कदम, चल-चल के कांधां तो दे दे..
दो कदम, चल-चल के कांधां तो दे दे..
दो कदम, चल-चल के कांधां तो दे दे..

मरने वाले तो अपने जां से गये..
आपकी बेवफ़ाईयां ना गई..
चल-चल के कांधां तो दे दे..
दो कदम, चल-चल के कांधां तो दे दे..
दो कदम, चल-चल के कांधां तो दे दे..

बीमार का दिल टूट चुका,
उठ चुकी मय्यत..
अब तो कांधां तो दे दे..
दो कदम, चल-चल के कांधां तो दे दे..
दो कदम, चल-चल के कांधां तो दे दे..

दो कदम, चल-चल के कांधां तो दे दे..
तेरे आसिक़ की मय्यत उठी है..

रात कटती है गिन-गिन के तारे..
नींद आती नहीं एक पल भी..
आंख लगती नहीं अब हमारी..
आंख गुप-चुप से ऐसी लगी है..

रात कटती है गिन-गिन के, गिन-गिन के तारे..
रात कटती है गिन-गिन के, गिन-गिन के तारे..
रात कटती है गिन-गिन के, गिन-गिन के तारे..

तारों का <समझ नहीं आया :)> में आना मुहाल है..
लेकीन किसी को नींद ना आये तो क्या करे?
रात कटती है गिन-गिन के, गिन-गिन के तारे..
रात कटती है गिन-गिन के, गिन-गिन के तारे..
रात कटती है गिन-गिन के, गिन-गिन के तारे..

तुम्हारे वादे की ऐसी कटी वारी रात..
के इंतजार में तारे गिने हजारी रात..
रात कटती है गिन-गिन के, गिन-गिन के तारे..
रात कटती है गिन-गिन के, गिन-गिन के तारे..
रात कटती है गिन-गिन के, गिन-गिन के तारे..

सितारों! मेरी रातों के सहारों..
सितारों! मेरी रातों के सहारों..
सितारों! मेरी रातों के सहारों..

मुहब्बत की चमकती यादगारों..
सितारों! मुहब्बत की चमकती यादगारों..
सितारों! मुहब्बत की चमकती यादगारों..

सितारों! मेरी रातों के सहारों..
सितारों! मुहब्बत की चमकती यादगारों..

ना जाने मुझको नींद आये ना आये?
तुम्ही आराम कर लो, बेकरारों..
रात कटती है गिन-गिन के, गिन-गिन के तारे..
रात कटती है गिन-गिन के, गिन-गिन के तारे..

किसी कि सब-ए-वश्ल सोते कटे हैं..
किसी कि सब-ए-हिज्र रोते कटे हैं..
ईलाही, हमारी, ये सब कैसी सब है?
ना सोते कटे है, ना रोते कटे है..

रात कटती है गिन-गिन के, गिन-गिन के तारे..
रात कटती है गिन-गिन के, गिन-गिन के तारे..

रात कटती है गिन-गिन के तारे..
नींद आती नहीं एक पल भी..
आंख लगती नहीं अब हमारी,
आंख गुप-चुप से ऐसी लगी है..

इस कदर मेरे दिल को निचोड़ा..
एक क़तरा लहू का ना छोड़ा..
जगमगाती है जो उनकी खलबत..
वो मेरे खून की रोशनी है..
लड़खड़ाता हुआ जब भी नांदां..
उनकी रंगीन महफ़िल में पहूंचा..
देखकर मुझको लोगों से बोले..
ये वही बेवफ़ा आदमी है..

दर्द रूकता नहीं एक पल भी,
इश्क की ये सजा मिल रही है..

Tuesday, July 07, 2009

आई टी प्रोफेशन के साईड इफेक्ट

साईड इफेक्ट 1 -
पिछले शुक्रवार की बात है.. मैं दिन भर ऑफिस में काम करने के बाद रात वाले शो में सिनेमा देखने कि भी तैयारी थी.. रात आठ बजे मैं अपने ऑफिस से निकला.. बहुत जोड़ों से भूख लगी थी, सो मैंने सोचा कि पहले कहीं कुछ खा लिया जाये..

मेरे ऑफिस के ठीक बगल में "पेलिटा नासी कांदार" नाम का एक रेस्टोरेंट है जो मलेशियन खाने के लिये बहुत प्रसिद्ध जगह है, मैं वहां गया और मलेशियन चिकेन चाउमिन और्डर किया. खाना खत्म करके मैं अपना प्लेट लेकर वॉस बेसिन की ओर बढ़ने लगा, सभी लोग अजीब तरह से मुझे घूरने लगे.. तब जाकर मुझे समझ में आया कि मैं अपने ऑफिस के कैंटिन में नहीं बल्की रेस्टोरेंट में हूं और यहां मुझे अपना प्लेट को बेसिन में रखने की चिंता नहीं करनी है..

साईड इफेक्ट 2 -
खाना खाकर मैं सिनेमा हॉल कि ओर बढ़ चला.. वहां मेरे कुछ मित्र पहले से ही मेरा इंतजार कर रहे थे.. वहां जब हॉल के अंदर जाने लगा तो मैं अपना आई.डी. कार्ड दिखाया और सीधा अंदर चला गया.. गार्ड चिल्लाने लगा.. मैं समझ नहीं पाया कि आखिर जब मैंने अपना आई.डी.कार्ड दिखा दिया है तब यह क्यों चिल्ला रहा है.. वह गार्ड मेरे पास आया और मुझसे बोला कि आपने टिकट दिखाया ही नहीं.. ये आपका ऑफिस नहीं है जो आई.डी.कार्ड दिखा कर सीधा अंदर चले आ रहे हैं..

साईड इफेक्ट 3 -
सिनेमा शुरू हो चुकी थी.. थोड़ी देर बाद मुझे समय जानने की इच्छा हुई और मैं स्क्रीन के निचले-दाहिने भाग कि तरफ घड़ी ढ़ूंढ़ने लगा.. मैं अचंभित था कि घड़ी कहां चली गई? 2-3 सेकेन्ड के बाद मुझे समझ में आया कि यह कंप्यूटर स्क्रीन नहीं है, सिनेमा स्क्रीन है..

साईड इफेक्ट 4 -
देर रात सिनेमा खत्म हुआ और मैं घर कि ओर निकल लिया.. मेरे सारे मित्र सो चुके थे.. मैं अपने घर के दरवाजे के नजदीक पहूंच कर कार्ड स्वैपिंग मशीन खोजने लगा, जिस पर स्वैप करके मैं दरवाजे को खोल सकूं.. फिर मुझे याद आया कि यहां एक कौल बेल भी हुआ करता है.. ;)

एक मित्र द्वारा भेजे हुये मेल पर आधारित यह पोस्ट है.. :)

Saturday, July 04, 2009

एक चीयर गर्ल हमें भी चाहिये, आईटी वालों की पीड़ा


एक चीयर गर्ल हमें भी चाहिये.. जब भी कोई डिफेक्ट फिक्स हुआ, तो वह नाचे.. हम सभी को चीयर करे.. हिंदी सिनेमा में अक्सर सुनता आया हूं, कि जिंदगी एक खेल के समान है.. और वैसे लोगों को यह भ्रम भी है कि आई.टी. में बहुत पैसा है.. अब जबकी यह खेल भी है और इसमें पैसा भी है तो चीयर गर्ल भी क्यों ना हो?

जरा सोचिये, एक तरफ डेवेलपर की फौज हो.. दूसरी तरफ टेस्टरों की.. रेफरी की भूमिका में प्रोजेक्ट मैनेजर हों.. कैप्टन की भूमिका में प्रोजेक्ट लीड.. बस मैच चालू..

टूर्नामेंट का नाम "मेंटेनेन्स प्रोजेक्ट".. दोनों ही टीम के पास अपनी-अपनी चीयर गर्ल्स हों, जो जब तब मौका मिलने पर लोगों को चीयर कर सके और अगर सही समय हो तो मोटिवेट भी कर सके.. वैसे भी मोटिवेशन का काम मैनेजर्स के बस की बात नहीं लगती है..

डेवेलपर के पास कुछ डिफेक्ट आये.. उसने फिक्स करना शुरू किया.. फिक्स करके उसे टेस्टर के पास भेज दिया और लगा इंतजार करने कि टेस्टर उसे पास करते हैं या फेल करते हैं? ये कुछ-कुछ वैसा ही है जैसे थर्ड अंपायर के निर्णय का इंतजार करना..

टेस्टर उसमें कोई भी खामी नहीं ढ़ूंढ़ पायी.. बेचारों को मजबूरी में उसे पास करनी पड़ी.. डेवेलपर की टीम में खुशी की लहर दौड़ गई.. ठीक वैसे ही जैसे कि रन आऊट होते-होते कोई बल्लेबाज को हरी बत्ती दिख जाये.. या फिर बौंड्री पर कैच होते-होते गेंद सिक्सर चली जाये.. यही तो समय है, चीयर गर्लस का.. वे नाच-नाच कर डेवेलपर को चीयर करने लगी..

अब सीन दो पर आते हैं.. डिफेक्ट फिक्स होकर टेस्टर के पास गया.. टेस्टर ने जी-जान लगा कर उसमें गलती ढ़ूंढ़ निकाली.. बस टेस्टिंग टीम में खुशी का महौल तैयार हो गया.. चीयर गर्लस भी हाथों में रंग-बिरंगे झालर लेकर नाचने लगी.. वहीं पीछे तेज आवाज में संगीत बजने लगा..

इस खेल की सबसे बड़ी खूबी यह होती है कि मैच हमेशा ड्रा ही होता है.. मैच(यानी प्रोजेक्ट) जैसे ही खत्म वैसे ही टेस्टर और डेवेलपर, दोनों ही बेंच पर.. और मैनेजमेंट उन्हें बाहर निकालने की जुगत में..

आहा.. क्या सुंदर नजारा होगा.. बस जरा सोचिये कि आपके कार्यस्थल पर आपके काम पूरा करने पर अचानक से नाचने लगे.. कितना मजेदार नजारा होगा ना? ;)

Friday, July 03, 2009

लाईफ, जैसे कोई चैट बॉक्स


आज से लगभग एक साल पहले का यह चैट हिस्ट्री आप लोगों के सामने रख रहा हूं.. जिससे आप यह समझ सकेंगे कि ऑफिस में खाली समय में या फिर थोड़ी देर के ब्रेक में हम(मैं और मेरा मित्र शिवेन्द्र) कैसे टाईम पास करते हैं.. ;)

प्रशान्त - क्या रे..
प्रशान्त - जिंदा है अभी तक??

शिवेन्द्र - हां यार..
शिवेन्द्र - :-)

प्रशान्त - काहे जिंदा है?? किसके लिये?? जाओ डूब मरो चुल्लू भर पानी में..
प्रशान्त - ;)

शिवेन्द्र - क्यों?

प्रशान्त - ये जीना भी क्या जीना है?? साला बाबू टाईप नौकरी हो गया है..
प्रशान्त - इससे अच्छा तो डूब मरना ही है..

शिवेन्द्र - बाबू टाईप नौकरी हो गया है! मतलब?
शिवेन्द्र - ???
शिवेन्द्र - ?????
शिवेन्द्र - अबे कुछ लिखेगा बे? घास चरने चला गया है क्या?

प्रशान्त - अरे सचिवालय में बाबू का नौकरी क्या होता है?? बिलकुल मोनोटोनस..
प्रशान्त - वैस ही हो गया है..

शिवेन्द्र - ओह.. हां रे
शिवेन्द्र - :-(

प्रशान्त - डेली अपना अकाऊंट चेक करता हूं.. कहीं से कोई पैसा भी नहीं भेजता है..

शिवेन्द्र - बट क्या करें? कोई और ऑप्सन भी नहीं है..

प्रशान्त - :(
प्रशान्त - कहां है रे चुल्लू भर पानी.. कहीं दिखे तो मेरे लिये भी बचा कर रखना..

शिवेन्द्र - मुझे भी कोई पैसा नहीं भेजता है..

प्रशान्त - रुक जा.. मैं तुझे 1 रूपया ट्रांस्फर करता हूं.. तू मुझे कर..
प्रशान्त - ;)

शिवेन्द्र - गुड, जल्दी से कर
शिवेन्द्र - साला कम से कम 1 रूपया तो बढ़े

प्रशान्त - कर दिये..
प्रशान्त - :)

शिवेन्द्र - रूक चेक करने दे

प्रशान्त - मेरा 1 रूपया कम हो गया.. :(

शिवेन्द्र - :-)

प्रशान्त - मिला??

शिवेन्द्र - रूक

प्रशान्त - कितना टाईम लगाता है बे?

शिवेन्द्र - यस आ गया
शिवेन्द्र - :D

प्रशान्त - :)
प्रशान्त - अब तेरी बारी.. तू भेज..

शिवेन्द्र - नहीं भेजूंगा... :P

प्रशान्त - भेज साले..
शिवेन्द्र - मेरा 1 रूपया कम हो जायेगा

प्रशान्त - अभी बढ़ा है ना.. तो भेजो..
प्रशान्त - नहीं तो 1 रूपया बढ़ने पर पार्टी मांग लूंगा..

शिवेन्द्र - नहीं
शिवेन्द्र - नो पार्टी प्लीज
शिवेन्द्र - :-(

प्रशान्त - तो भेजो..
प्रशान्त - :)

शिवेन्द्र - ओके.. भेजते हैं
शिवेन्द्र - :-(

प्रशान्त - गुड.. :D

शिवेन्द्र - मिला?

प्रशान्त - वेट प्लीज.

शिवेन्द्र - मिला क्या
शिवेन्द्र - ???
शिवेन्द्र - ???????

प्रशान्त - वेट फॉर अ मिनट.
प्रशान्त - नहीं बढ़ा..
प्रशान्त - साला नहीं भेजा..
प्रशान्त - :(
प्रशान्त - कुत्ता..
प्रशान्त - गधा..

शिवेन्द्र - हा हा हा :-P

प्रशान्त - पार्टी दे..
प्रशान्त - नहीं तो एक काम करता हूं.. अपना घर वाला बही-खाता में 1 रूपया घटा दूंगा.. :P

शिवेन्द्र - नाउ चेक प्लीज

प्रशान्त - आ गया.. :D

शिवेन्द्र - गुड

प्रशान्त - साला 1 रूपये के लिये कितना रिसोर्स बरबाद किये हैं हम लोग.. ;)

शिवेन्द्र - हा हा हा.. सिर्फ कंप्यूटर + नेट + बैंड विड्थ..

प्रशान्त - :-)
प्रशान्त - चल अब बाबू वाला काम शुरू करें हम तुम..

शिवेन्द्र - ओके.. बी.एफ.एन.

प्रशान्त - बी.एफ.एन.

Monday, June 29, 2009

15 रूपये कि एक मुस्कुराहट और ट्रैफिक सिग्नल

अपने ऑफिस के बाहर वाले पार्किंग में खड़ा मैं फोन पर किसी से बातें कर रहा था.. तभी नीचे से कुछ आवाज आई.. मैंने देखा तो पाया की एक 3-4 साल की बच्ची थी और उसके गोद में भी एक 5-6 महिने का बच्चा था.. मैंने उसे भीख मांगने वाली समझ उसे इसारे से मना किया, कि मैं कुछ भी नहीं दूंगा.. उसने कहा, "अन्ना, नो मनी.." मैं फोन पर भी बातें कर रहा था, सो उसकी बात समझने में थोड़ा समय भी लगा और जब तक समझ में आता तब तक वो वहां से भाग गई..

मुझे कुछ समझ में नहीं आया कि वो बच्ची चाह क्या रही थी? फोन पर ही बातें करते हुये मैंने देखा कि वह वहां खड़े लगभग हर किसी से तमिल में कुछ कह रही थी और सभी उसकी बात सुनकर या तो अनसुना कर रहे थे या फिर उसकी हंसी तमिल में ही कुछ कह कर उड़ा रहे थे..

पहली नजर में मुझे लगा कि उस बच्ची को भूख लगी है.. वहीं एक चाय वाला भी बैठता है जो कटिंग वाली चाय के साथ बिस्किट और ब्रेड भी रखता है.. मैंने उसे अपने पास बुला कर अंग्रेजी में उसे समझाने की कोशिश की, और बोला कि तुम्हे जो चाहिये वो ले लो.. मगर वो वहां से भी भाग गई..

मुझे कुछ समझ में नहीं आया कि ये इस तरह से क्यों कर रही है.. एक छटपटाहट उसके चेहरे पर साफ झलक रही थी, और कारण मेरी समझ से बाहर थी.. तमिल ना आने का अपह्सोस मुझे शायद सबसे ज्यादा उसी समय हो रहा था.. तभी मैंने देखा कि चाय वाला उसे डांटते हुये कुछ बोल रहा था, टूटी-फूटी तमिल में मैं इतना समझ गया कि वह बच्ची चाह क्या रही थी..

वहीं पार्किंग के पास एक आईसक्रीम वाला भी था, और वह किसी भी तरह एक आईसक्रीम खाना चाह रही थी.. उस चाय वाले की बात मुझे यह समझ में आयी थी कि वह कटाक्ष करते हुये बोल रहा था जिसको हिन्दी में हम कुछ ऐसे कहते हैं, "अपनी औकात देखी हो, आईसक्रीम खाना चाह रही हो.. भागो यहा से और मेरे कस्टमर को परेशान मत करो.."

उसे मैंने अपने पास बुलाया, मगर वह नहीं आयी.. शायद डर गई थी.. आईसक्रीम वाले के पास जाकर मैंने उसे बुलाया तो वह झट से मेरे पास चली आयी.. मैंने आईसक्रीम वाले को बोला कि इसे जो भी आईसक्रीम चाहिये इसे दे दो.. वो आईसक्रीम वाला मुझे ऐसे देखा जैसे मैं पागल हो गया हूं.. मैंने फिर से उसे कहा तो वह चुपचाप उस बच्ची से पूछकर उसे आईसक्रीम दे दिया..

उस बच्ची के चेहरे पर अपार संतोष का भाव साफ दिख रहा था.. मैंने फिर एक अद्भुत बात देखी, वह बच्ची धीरे-धीरे करके सारा आईसक्रीम अपने गोद वाले उस छोटे बच्चे को खिला दी जिसे आईसक्रीम क्या होता है इसकी समझ भी ना होगी.. खुद उसे चखी भी नहीं..

जाने क्यों मुझे अपनी दीदी की बड़ी बेटी याद आ गई, जो कमोबेश उसी कि उमर की होगी.. जो आईसक्रीम के लिये अपना मुंह भी खोलती है तो 1 किलो वाला आईसक्रीम का पैकेट घर में आ जाता है.. अभाव क्या होता है वह उसे पता भी नहीं, दुनियादारी तो दूर की बात है..

एक डर सा लगने लगा.. इंडिया जगमगा रहा है, मगर भारत अपनी गरीबी पर रो रहा है.. तभी ट्रैफिक के शोर ने मेरा ध्यान अपनी ओर खींचा.. पास वाले सिग्नल की लाल बत्ती जगमगा रही थी.. मैंने देखा कि वह बच्ची अपने गोद वाले बच्चे को लेकर सिग्नल की ओर जा रही है.. आगे देखना शायद मुझे अच्छा नहीं लगता, सो मैं वापस अपने ऑफिस के अंदर चला आया..