पापा ने करीब ३ महीने पहले केशू को एक खेल सिखाया बच्चों वाला जिससे वो किसी भी चीज़ को गायब कर सकता था और उसे फिर वापिस भी ला सकता था, बस उसके लिए उसे आँख बंद करके और हाथों की अँगुलियो को शक्तिमान के स्टाईल में घुमाते हुए ये बोलना था..."गायब करने के लिए 'जादू मंतर जादू मंतर blah blah गायब', और फिर उसे वापिस लाने के लिए 'जादू मंतर जादू मंतर blah blah आ जाओ'"|
उसके भोले मन और विश्वास का एक और उदाहरण कल देखने को मिला, जब वो shoe rack पर अपने जूते ढूँढ रहा था तो उसके एक पैर का जूता उसे मिल गया और दूसरे का नहीं मिला तो उसने कहा
"दादू बन्तल दादू बन्तल केतू का दूता आ दा"
मगर जूता वहाँ होता तब तो आता तो उसने कहा
"अले नहीं आया",
फिर उसने वही दोहराया
"दादू बन्तल दादू बन्तल केतू का दूता आ दा",
फिर जब नहीं आया तो उसने फिर से कहा
"अले नहीं आया"
३ बार बोलने के बाद भी जब जूता उसका नहीं आया तो वो मेरे पास आकर बोला,
"डाईडी केतू का दादू नहीं हो लहा है"
मुझे उसकी मासूमियत पर बहुत प्यार आया और मैंने कहा,
"केशू ने जरूर आँख बंद नहीं किया होगा"
अबकी बार केशू ने पूरे विश्वास से आँख बंद करके कहा
"दादू बन्तल दादू बन्तल केतू का दूता आ दा"
और आँख खुलते ही सामने जूता दिखा, तो वो बहुत खुश हुआ और बोला
"डाईडी केतू का दूता आ गया"
(मैंने चुपके से उसका जूता वहाँ ला कर रख दिया था, आखिर उसके मासूमियत से भरे भरोसे को कैसे टूटने देता).................................
भैया की कलम से
उसके भोले मन और विश्वास का एक और उदाहरण कल देखने को मिला, जब वो shoe rack पर अपने जूते ढूँढ रहा था तो उसके एक पैर का जूता उसे मिल गया और दूसरे का नहीं मिला तो उसने कहा
"दादू बन्तल दादू बन्तल केतू का दूता आ दा"
मगर जूता वहाँ होता तब तो आता तो उसने कहा
"अले नहीं आया",
फिर उसने वही दोहराया
"दादू बन्तल दादू बन्तल केतू का दूता आ दा",
फिर जब नहीं आया तो उसने फिर से कहा
"अले नहीं आया"
३ बार बोलने के बाद भी जब जूता उसका नहीं आया तो वो मेरे पास आकर बोला,
"डाईडी केतू का दादू नहीं हो लहा है"
मुझे उसकी मासूमियत पर बहुत प्यार आया और मैंने कहा,
"केशू ने जरूर आँख बंद नहीं किया होगा"
अबकी बार केशू ने पूरे विश्वास से आँख बंद करके कहा
"दादू बन्तल दादू बन्तल केतू का दूता आ दा"
और आँख खुलते ही सामने जूता दिखा, तो वो बहुत खुश हुआ और बोला
"डाईडी केतू का दूता आ गया"
(मैंने चुपके से उसका जूता वहाँ ला कर रख दिया था, आखिर उसके मासूमियत से भरे भरोसे को कैसे टूटने देता).................................
भैया की कलम से
